B.Com 1st Year Business Environment Hindi Short Notes

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प्रश्न – ‘व्यावसायिक वातावरण को समझाइए। 

Explain Business Environment’. 

उत्तर – व्यावसायिक वातावरण का अर्थ एवं परिभाषा

(Meaning and Definition of Business Environment) 

किसी भी व्यवसाय का जीवन तथा अस्तित्व इस बात पर निर्भर करता है कि वह व्यवसाय अपने भौतिक साधनों तथा वित्तीय साधनों एवं अन्य क्षमताओं का उद्यम के अनुरूप किस प्रकार समायोजन करता है। किसी भी व्यावसायिक संस्था को प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से प्रभावित करने वाले वातावरण को व्यावसायिक पर्यावरण के रूप में जाना जाता है। व्यावसायिक पर्यावरण का संस्था की कार्यकुशलता पर व्यापक प्रभाव पड़ता है। इस व्यावसायिक पर्यावरण को निम्नलिखित दो रूपों में प्रकट किया जा सकता है

(i) बाह्य पर्यावरण, (ii) आन्तरिक पर्यावरण।

यद्यपि आन्तरिक पर्यावरण को सम्यक् कारकों द्वारा नियन्त्रित किया जा सकता है, किन्तु बाह्य पर्यावरण को परिवर्तित करना प्रायः सम्भव नहीं होता, अत: इसके प्रभाव क्षेत्र के अन्तर्गत रहते हुए ही व्यावसायिक कार्यों का निष्पादन करना होता है।

प्रमुख विद्वानों ने व्यावसायिक पर्यावरण को निम्नलिखित रूप में परिभाषित किया है

(1) विलियम ग्लुक व जॉक के शब्दों में, “व्यावसायिक पर्यावरण व्यावसायिक फर्मों त्था उद्योगों के बाहर की उन सभी बातों का योग है जो उनके संगठन एवं संचालन को उभावित करती हैं।”

(2) उरविक तथा हण्ट के अनुसार, “व्यवसाय एक उद्यम है, जो किसी वस्तु या सेवा का निर्माण करता है, वितरण करता है या समाज के उन अन्य सदस्यों को प्रदान करता है जिन्हें उसकी आवश्यकता है तथा जो इसकी कीमत के भुगतान के लिए सक्षम तथा इच्छुक है।”

(3) डेविस के अनुसार, “व्यवसाय वस्तुओं तथा सेवाओं के उत्पादन करने, बाजार में उनकी बिक्री करने तथा इस प्रयास से लाभ प्राप्त करने वाले व्यक्तियों का संगठित प्रयास है।”

उपर्युक्त परिभाषाओं के आधार पर हम कह सकते हैं कि जिन विशिष्ट दशाओं में रहते हए व्यावसायिक संस्था को अपने क्रिया-कलापों को क्रियान्वित करना होता है, वे समस्त दशाएँ व्यावसायिक पर्यावरण के अन्तर्गत ही आती हैं।

व्यावसायिक पर्यावरण का व्यवसाय पर आंशिक अथवा विस्तृत रूप में प्रभाव पड़ता है। प्राय: बाह्य कारकों को अपने अनुकूल करना सम्भव नहीं होता है, अत: उन कारकों के अनुगामी होकर हमें अपने कार्यों को दिशा देनी पड़ती है और उनके अनुकूल समायोजन करना पड़ता है। ऐसा न कर पाने की दशा में व्यवसाय में ह्रास का होना निश्चित है।

प्रश्न – व्यवसाय और वातावरण के मध्य सम्बन्ध की व्याख्या कीजिए। 

Explain the relationship between business and environment.

उत्तर – द्रुत गति से आगे बढ़ते हुए औद्योगिक युग में सफलता प्राप्ति हेतु व्यवसाय के क्षेत्र में व्यावसायिक पर्यावरण का अध्ययन एक आवश्यकता बन चुका है। इसके व्यवस्थित अध्ययन द्वारा आन्तरिक वातावरण को तो अपने अनुरूप ढाला ही जा सकता है, साथ ही बाह्य वातावरण की चुनौतियों का भी काफी सीमा तक सफल मुकाबला किया जा सकता है। निम्नलिखित कारणों से व्यवसाय और वातावरण के मध्य सम्बन्ध अत्यन्त आवश्यक एवं महत्त्वपूर्ण होता है

1. परिवर्तनशीलता की जानकारी-आज का औद्योगिक युग एक क्रान्तिकारी युग है। वर्तमान सहज रूप में ही अतीत का वरण कर लेता है। नई वस्तु शीघ्र ही पुरानी हो जाती है। नित नए-नए फैशन बदलते रहते हैं। तकनीक में सुधार आता रहता है। नए उत्पादों की उपलब्धता बढ़ जाती है। इन सब के साथ तारतम्यता स्थापित करने हेतु व्यावसायिक पर्यावरण का अध्ययन आवश्यक हो जाता है। इसका अध्ययन परिवर्तनशीलता की सही जानकारी करा कर उद्योग में लाभकारी स्थिति प्रदान करता है। इन सभी परिवर्तनों की जानकारी हासिल करने के लिए पर्यावरण का अध्ययन करना अत्यन्त आवश्यक है।

2. व्यावसायिक उतार-चढ़ाव का ज्ञान-व्यावसायिक परिवेश में अनेक उतार-चढ़ाव आते रहते हैं। दूसरे, इन उतार-चढ़ावों की गति/दर भी समान नहीं होती है। कुछ संस्थाओं में यह दर काफी अधिक रहती है; जैसे-कम्प्यूटर साफ्टवेयर। अतः इन सभी उच्चावचनों को जानने के लिए व्यावसायिक पर्यावरण का अध्ययन आवश्यक है।

3. व्यावसायिक विविधताओं एवं जटिलताओं का ज्ञान-व्यवसाय जगत में अत्यधिक प्रतियोगिता का वातावरण है। इस प्रतियोगितात्मक स्वरूप में अनेक जटिलताओं का सामना करना पड़ता है। अनेक जोखिम-भरे परिवर्तन व उतार-चढ़ाव देखने को मिलते हैं। इन सब को समझने तथा इनका सम्यक् निदान प्राप्त करने के लिए व्यावसायिक पर्यावरण का अध्ययन आवश्यक हो जाता है। इसके अध्ययन के द्वारा इन समस्त जटिलताओं का निराकरण किया जा सकता है।

4. विभिन्न घटकों के आपसी प्रभावों का अध्ययन-व्यवसाय के प्रत्येक वर्ग में उच्चावच की दर भिन्न होती है। अतः विभिन्न व्यवसायों के उच्चावचनों में अन्तर का होना स्वाभाविक है। साफ्टवेयर के क्षेत्र में यह दर तीव्रतम है और इस क्षेत्र में प्रतिस्पर्द्धा भी तीव्र है। इसक विपरीत चीनी उद्योग, सीमेण्ट उद्योग आदि में यह दर न्यन है। इसके स्वाभाविक तथा अस्वाभाविक परिवर्तनों का ज्ञान प्राप्त करने के लिए व्यावसायिक पर्यावरण का अध्ययन काफी महत्त्वपूर्ण सिद्ध होता है।

प्रश्न – क्षेत्रीय असन्तुलन के कारणों का संक्षेप में वर्णन करो। 

Discuss in brief the causes of regional imbalance. 

उत्तर – क्षेत्रीय असन्तुलन के कारण तथा प्रभाव

(Causes and Effects of Regional Imbalance) 

भारत की अर्थव्यवस्था में क्षेत्रीय असन्तुलन के प्रमुख कारण एवं प्रभाव निम्नलिखित हैं

1. भौगोलिक परिस्थितियाँ-भारत के कई क्षेत्रों के पिछड़े होने का कारण वहाँ की भौगोलिक परिस्थितियाँ भी हैं; जैसे-जम्मू व कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, अरुणाचल प्रदेश तथा उत्तराखण्ड प्रदेश पहाड़ी क्षेत्र होने के कारण पिछड़े रहे हैं। पहाड़ी क्षेत्र होने के कारण यहाँ यातायात की परेशानी रहती है, जिससे इन प्रदेशों में आवागमन काफी कठिन होता है। जलवायु भी क्षेत्रीय असन्तुलन को जन्म देती है। गंगा-यमुना का मैदानी भाग जितना उपजाऊ है, उतना उपजाऊ अन्य कोई क्षेत्र नहीं है। इसी वजह से ये क्षेत्र पानी की कमी न होने के कारण विकसित हो गए किन्तु शेष क्षेत्र, जहाँ पानी की कमी थी, पिछड़ गए।

2: ब्रिटिश शासन-आजादी के पूर्व का इतिहास यदि उठाकर देखें तो यह विदित होता है कि क्षेत्रीय असन्तुलन के लिए ब्रिटिश शासन काफी हद तक जिम्मेदार रहा। उन्होंने भारत को एक व्यापारिक केन्द्र के रूप में ही प्रयोग किया। अंग्रेजों ने यहाँ का कच्चा माल विदेशों में भेजा तथा वहाँ से आया हुआ पक्का माल यहाँ बेचा। परिणाम यह हआ कि यहाँ व्यापार तथा उद्योग पिछड़ गए। उन्होंने केवल उन्हीं क्षेत्रों का विकास किया जिनसे उन्हें लाभ

होता था। उन्होंने पश्चिम बंगाल तथा महाराष्ट्र का ही विकास किया। इसी तरह जमींदारी कषि को विकसित नहीं होने दिया। आय के बड़े हिस्से पर साहकारों तथा जमींदारों का सा होता था। इस शासन के दौरान जिन स्थानों से नहरें निकाली गईं वे ही क्षेत्र विकसित हो पाए।

3. नए विनियोग-नए विनियोगों का जहाँ तक प्रश्न है; विशेषकर निजी क्षेत्र में पहले यमित क्षेत्रों में ज्यादा नया विनियोग किया गया है, जिसका उद्देश्य ज्यादा लाभ कमाना भी  होता है। दूसरे विकसित क्षेत्रों में पानी, बिजली, सड़क, बैंक, बीमा कम्पनियाँ, श्रमिकों का लिना. बाजार का नजदीक होना इत्यादि का लाभ भी प्राप्त हो जाता है। इस वजह से भी क्षेत्रीय असन्तुलन हो जाता है।

प्रश्न – नई औद्योगिक नीति के प्रमुख उद्देश्य समझाइए।

What are the main objectives of new industrialpolicy?

उत्तर – औद्योगिक नीति, 1991 की घोषणा में सरकार ने निम्नलिखित उद्देश्यों पर बल दिया

(1) आत्मनिर्भरता प्राप्त करना तथा तकनीकी एवं निर्माणी क्षेत्र का विकास करना एवं इसमें घरेलू क्षमता का प्रयोग करना।

(2) साहसी वर्ग को विकसित करने हेतु औद्योगिक विकास के लिए सुदृढ़ नीतियों के समूह को अपनाना जिससे शोध एवं विकास में विनियोग से घरेलू तकनीक विकसित हो सके, नियमन व्यवस्था को हटाया जा सके, पूँजी बाजार का विकास हो सके तथा अर्थव्यवस्था की प्रतिस्पर्धात्मक शक्ति को बढ़ाया जा सके।

(3) लघु उद्योग के विकास पर बल देना, ताकि यह क्षेत्र अधिक कुशलता एवं तकनीकी सुधार के वातावरण में विकसित होता रहे।

(4) तकनीक का उच्च स्तर प्राप्त करने, निर्यातों में वृद्धि करने तथा उत्पादन आधार को विस्तृत करने हेतु विदेशी विनियोग एवं तकनीकी सहकार्य को बढ़ावा देना।

(5) सुरक्षा एवं सैन्य मामलों को छोड़कर व्यक्तिगत उपक्रम की एकाधिकारी स्थिति को समाप्त करना।

(6) सार्वजनिक क्षेत्र देश के सामाजिक, आर्थिक क्षेत्र को विकसित करने में अपनी उचित भूमिका का निर्वाह करे इसके लिए प्रयास करना, व्यावसायिक आधार पर कार्य करे तथा राष्ट्रीय महत्त्व के क्षेत्रों में नेतृत्वपूर्ण भूमिका निभाए।

(7) श्रमिकों के हितों की रक्षा करना, औद्योगिक समृद्धि में उन्हें समान भागीदार बनाना तथा श्रम सहकारिताओं को प्रोत्साहन देना।

प्रश्न –  सामाजिक अन्याय से आपका अभिप्राय है

What do you mean by social injustice ? 

उत्तर – सामाजिक अन्याय से आशय

(Meaning of Social Injustice) 

सामाजिक अन्याय से आशय समाज के विभिन्न वर्गों के साथ किए जाने वाले अन्याय से है। सामाजिक अन्याय अल्पकालीन या दीर्घकालीन दोनों ही प्रकार का हो सकता है। दीर्घकालीन सामाजिक अन्याय काफी घातक होता है जिसका प्रभाव कई सदियों तक बना रहता है।

किसी राष्ट के आर्थिक विकास में सबसे बड़ी बाधा ‘सामाजिक अन्याय’ है। अब यह समस्या अन्तर्राष्ट्रीय स्तर की हो चुकी है। शायद ही कोई ऐसा राष्ट्र होगा जिसमें कुछ-न-कुछ मात्रा में सामाजिक अन्याय न होता हो। विभिन्न अध्ययन यह बताते हैं कि विकसित देशों की तुलना में विकासशील देशों में सामाजिक अन्याय की समस्या अधिक गम्भीर है। अशिक्षा,

रूढ़िवादिता, अन्धविश्वास, आर्थिक साधनों की कमी व ऐसे ही अनेक कारण विकासशील देशों में सामाजिक अन्याय को दूर करने में बाधक हैं। यदि कोई राष्ट्र अपने नागरिकों को सामाजिक न्याय दिलाने में असमर्थ होता है तो उस राष्ट्र के आर्थिक विकास के सभी आयाम अधूरे ही रहेंगे।

प्रश्न भारत में राष्ट्रीय आय की धीमी वृद्धि के कारण कोन – कोन से हैं।

Write the cause of slow growth in national income in India. 

उत्तर – राष्ट्रीय आय में धीमी गति से वृद्धि के कारण

(Causes of Slow Growth in National Income in India)

भारत में योजनाकाल में राष्ट्रीय आय एवं प्रति व्यक्ति आय में लगातार वृद्धि होती दिखाई दे रही है, किन्तु स्थिर कीमतों के आधार पर देखें तो यह वृद्धि सन्तोषजनक नहीं कही जा सकती। विश्व के अन्य देशों की तुलना में भारत की राष्ट्रीय आय एवं प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि दर बहुत कम है। योजनाकाल में भारत की राष्ट्रीय आय में धीमी गति से वृद्धि के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं

1. कृषि का प्राकृतिक घटकों पर आश्रित होना – भारत की राष्ट्रीय आय की वृद्धि में कृषि क्षेत्र का महत्त्वपूर्ण योगदान है, किन्तु भारतीय कृषि मानसून पर निर्भर करती है। मानसून अनुकूलन रहने पर कृषि उत्पादन बढ़ने से राष्ट्रीय आय बढ़ जाती है और मानसून के प्रतिकूल रहने पर कृषि उत्पादन घटने से राष्ट्रीय आय घट जाती है। यद्यपि कृषि की मानसून पर निर्भरता को कम करने के लिए योजनाकाल में सिंचाई के साधनों का विकास किया गया है, किन्तु ऐसा कुल कृषि क्षेत्र के केवल 1/3 भाग पर ही हो सका है। शेष क्षेत्र वर्षा पर ही आश्रित है। इससे राष्ट्रीय आय में उतार-चढ़ाव आते रहते हैं।

2. जनसंख्या में विस्फोटक वृद्धि – भारत में प्रति व्यक्ति आय की धीमी वृद्धि का एक प्रमुख कारण जनसंख्या में विस्फोटक वृद्धि भी रहा है। भारत में जिस दर से जनसंख्या बढ़ रही है, वह सारे बढ़े हुए उत्पादन के लाभों को हजम कर जाती है और उत्पादन व राष्ट्रीय आय बढ़ने के बावजूद प्रति व्यक्ति आय में पर्याप्त वृद्धि नहीं हो पाती है।

3. अर्थव्यवस्था में मुद्रा प्रसार – भारतीय अर्थव्यवस्था मुद्रा प्रसार एवं आवश्यक वस्तुओं के मूल्यों में भारी वृद्धि से पीड़ित रही है। राष्ट्रीय आय के अनुमानों को देखने से स्पष्ट हो जाता है कि चालू मूल्यों पर राष्ट्रीय आय में भारी वृद्धि हो रही है. किन्त स्थिर कीमतों पर यह वद्धि बहत कम है जो कि स्पष्ट रूप से मुद्रा स्फीति की स्थिति की सचक है। मूल्य वृद्धि क कारण राष्ट्रीय आय में वास्तविक वृद्धि बहत कम है। मद्रास्फीति माँग और पर्ति पक्ष दोना का विपरीत रूप से प्रभावित करती है।

4. औद्योगिक क्षेत्र में विकास की मन्द गति – यद्यपि योजनाकाल मश औद्योगीकरण को गति मिली है, किन्तु औद्योगिक क्षेत्र में विकास की गति मन्द है। कुछ तो केवल कृषि से सम्बन्धित कच्चे माल की पूर्ति पर ही आश्रित हैं: जैसे-सूती वस्त्र, च र वनस्पति तेल उद्योग आदि। इन उद्योगों का विकास कच्चे माल की पूर्ति पर निर्भर कच्चे

माल की कमी के अतिरिक्त शक्ति के साधनों का अभाव, यातायात सुविधाओं का अभाव, वित्त की कमी, प्रबन्ध-श्रम सम्बन्ध आदि भी औद्योगिक विकास में बाधक रहे हैं। औद्योगिक विकास की मन्द गति के इन कारणों द्वारा भी राष्ट्रीय आय में धीमी गति से वृद्धि हो रही है।

5. कृषि उत्पादकता में वृद्धि की गति में कमी – भारत में कृषि क्षेत्र में उत्पादन अन्य देशों की तुलना में बहुत कम है। यद्यपि अब आधुनिक वैज्ञानिक विधियों का प्रयोग कर कृषि क्षेत्र में उत्पादकता बढ़ाने के प्रयास किए जा रहे है, तथापि कृषि उत्पादकता में वृद्धि की गति अभी भी अत्यन्त धीमी होने के कारण राष्ट्रीय आय में अपेक्षित गति से वद्धि नहीं हो पा रही है।

प्रश्न – भारत में राष्ट्रीय आय बढ़ाने के लिए सुझाव दीजिए। 

Suggest measures to raise national income in India. 

उत्तर – देश की राष्ट्रीय आय बढ़ाने हेतु सुझाव 

(Suggestios for Raising The National Income of the Country) 

देश की राष्ट्रीय आय बढ़ाने हेतु कतिपय सुझाव निम्नलिखित हैं

(1) ग्रामों का समन्वित विकास होना चाहिए,

(2) कृषि का समुचित विकास किया जाए, 

(3) सामाजिक पूँजी का विकास किया जाए, 

(4) औद्योगिक विकास की दर को और अधिक बढ़ाया जाए, 

(5) वित्तीय स्थिरता लायी जाए, 

(6) पूँजी तथा उत्पादन अनुपात में कमी लायी जानी चाहिए, 

(7) बचत तथा विनियोग की दर को बढ़ाया जाना चाहिए, 

(8) मानवीय पूँजी का विकास अत्यधिक मात्रा में किया जाए, 

(9) वैज्ञानिक तथा तकनीकी विकास तेजी से होना चाहिए,

(10) जनसंख्या को नियन्त्रित करने की आवश्यकता है। “One Child Norm” को अपताना अहिए।

प्रश्न – रोजगार पर मुद्रा स्फीति के प्रभावों की व्याख्या कीजिए। 

Discuss the effects of Inflation on Employment.

उत्तर – श्रमिक तथा अन्य निश्चित आय वर्ग में प्राय: वे सभी व्यक्ति शामिल किए जा सकते हैं जो मुख्यत: अपनी सेवाओं का विक्रय करते हैं, अर्थात् कृषि श्रमिक, औद्योगिक श्रमिक, कार्यालयों में कार्य करने वाले, अध्यापक आदि सब इसी वर्ग में आते हैं। यद्यपि इस अवधि में रोजगार आदि के नए अवसर प्राप्त होते हैं तथापि कुल मिलाकर इस वर्ग पर मुद्रा स्फीति का बुरा प्रभाव ही पड़ता है क्योंकि मुद्रा की क्रय-शक्ति में कमी हो जाने के कारण इस वर्ग का जीवन-स्तर बहुत गिर जाता है। इसमें सन्देह नहीं कि मुद्रा स्फीति काल में महंगाई भत्त (Dearness Allowance) आदि में भी वृद्धि की जाती है, परन्तु फिर भी मूल्य वृद्धि

प्रश्न विशेष आर्थिक क्षेत्र या सेज (SEZ) से क्या आशय है? इसकी प्रमुख विशेषताएँ समझाइये।

What is meant by Special Economic Zone (SEZ) ? Write its main characteristics 

उत्तर – विशेष आर्थिक क्षेत्र-सेज

(Special Economic Zone : SEZ) 

विशेष आर्थिक क्षेत्र एक ऐसा शुल्क मुक्त आर्थिक क्षेत्र है जहाँ विस्तृत रूप से विदेशी निवेश को आकर्षित करने के साथ-साथ निर्यात व्यापार को बढ़ावा दिया जाता है। सेज बनाने का मुख्य उद्देश्य निर्यात उत्पादन को नियमों व कानूनों की अड़चनों से मुक्त रखना है। भारत में सेज की स्थापना के लिए नीतिगत योजना 1 अप्रैल, 2000 से शुरू की गई ताकि निर्यात उत्पादन के लिए अन्तर्राष्ट्रीय प्रतिस्पर्धी, एक बाधारहित वातावरण का निर्माण हो।

(1) भारत में सेज स्थापित करने की योजना मुख्यत: चीन से प्रेरित है। चीन ने 1990 के दशक में सेज की स्थापना कर अपने निर्यात व्यापार में तीन गुना वृद्धि कर ली है।

(2) सेज की स्थापना के बाद भारत के निर्यात व्यापार की वार्षिक वृद्धि लगभग 15-18% के बीच रही है, जो इन क्षेत्रों की स्थापना के पहले की वृद्धि (8-10%) से लगभग दुगुनी है।

(3) कांडला और सूरत (गुजरात), सांताक्रूज (महाराष्ट्र), कोच्चि (केरल), चेन्नई (तमिलनाडु), विशाखापट्टनम (आंध्र प्रदेश), फाल्टा (प० बंगाल) और नोएडा (उ०प्र०) स्थित सभी आठ निर्यात संवर्द्धन क्षेत्रों को विशेष आर्थिक क्षेत्र में बदल दिया गया है। विशेष आर्थिक क्षेत्र अधिनियम के अन्तर्गत निजी/संयुक्त क्षेत्र में अथवा राज्य सरकारों और उसकी एजेंसियों को विशेष आर्थिक क्षेत्र स्थापित करने के लिए औपचारिक अनुमति प्रदान कर दी गई है।

सेज की मुख्य विशेषताएँ

(Main Characteristics of SEZ) 

सेज की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

(1) सेज के तहत कुछ ऐसे एनक्लेव यानी परिक्षेत्र स्थापित किए गए हैं, जिन्हें किसी आयात-निर्यात नियमों का पालन किए बगैर अपने विदेशी व्यापार करने की पूर्ण स्वतन्त्रता है।

(2) सेज की इकाइयाँ उत्पादन व्यवसाय या सेवा से सम्बन्धित कार्य करती हैं।

(3) सेज को व्यवसाय परिचालन तथा शुल्कों एवं करों के लिए एक विदेशी उपनिवेश माना गया है जिसकी इकाइयाँ तीन वर्षों के भीतर एक सकारात्मक शुद्ध विदेशी विनिमय प्राप्तकर्ता के रूप में परिवर्तित हो जाएंगी।

(4) सेज के उत्पादों और सेवाओं के लिए पूर्ण शुल्क पर घरेलू बिक्री कर लागू होता है जो प्रचलित आयात शुल्क के अधीन होगी।

(5) निर्यात एवं आयात कार्गों की कस्टम द्वारा कोई नियमित जाँच नहीं होगी, साथ ही कस्टम एवं एक्जिम नीति के लिए अलग से किसी दस्तावेज की आवश्यकता नहीं है।

(6) विकास आयुक्त के नेतृत्व में एवं कस्टम अधिकारियों से निर्मित समिति द्वारा सेज की इकाइयों की निगरानी की जाएगी।

(7) आयकर अधिनियम की धारा 10A के प्रावधानों के तहत सेज की इकाइयाँ सन् 2010 तक कॉर्पोरेट टैक्स हॉलीडे के लिए पात्र होंगी।

(8) अस्त्र-शस्त्रों, विस्फोटक पदार्थों, आण्विक पदार्थों, नारकोटिक्स, हानिकारक रसायनों, ऐल्कोहॉलयुक्त पेय पदार्थों, सिगरेट, सिगार व तम्बाकू से निर्मित अन्य वस्तुओं के अतिरिक्त स्वचालित मार्ग के अन्तर्गत सेज की इकाइयों के निर्माण क्षेत्र में 100% प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की अनुमति।

(9) सेज, इकाइयों के परिक्षेत्र से प्रत्यक्ष निर्यात के लिए घरेलू निर्यातकों की ओर से कार्य ले सकती है।

(10) घरेलू प्रशुल्क क्षेत्र (Domestic Tariff Area) से भी बिना टर्मिनल उत्पाद शुल्क का भुगतान किए सेज की इकाइयाँ कच्चे माल का पूँजीगत सामान खरीद सकती हैं।

प्रश्न –  औद्योगिक लाइसेंसिंग नीति का आशय एवं उद्देश्य समझाइये।

Write the meaning and objectives of industrial licencing policy? 

उत्तर – औद्योगिक लाइसेन्सिग नीति का आशय

(Meaning of Industrial Licensing Policy) 

सरकार द्वारा किसी औद्योगिक इकाई को दी गई लिखित अनुमति को ‘लाइसेन्स’ (Licence) कहा जाता है, जिसमें उद्योग के स्थान, उत्पादित वस्तु की मात्रा आदि का पूर्ण विवरण होता है। भारत में औद्योगिक नीति के प्रस्ताव को मूर्त रूप देने के लिए औद्योगिक लाइसेन्सिग प्रणाली को अपनाया गया।

औद्योगिक (विकास तथा नियमन) अधिनियम, 1951′ के अनुसार, “लाइसेन्स किसी औद्योगिक उपक्रम को केन्द्रीय सरकार द्वारा दी गई वह लिखित आज्ञा है जिसके अनुसार वह उपक्रम औद्योगिक (विकास व नियमन) अधिनियम की प्रथम अनसची में निर्दिश वस्तओं का उत्पादन या निर्माण कर सकता है।”

इस प्रकार देश की अर्थव्यवस्था के विकास के लिए औद्योगिक लाइसेन्सिंग नीति एक महत्त्वपूर्ण उपकरण का कार्य करती है। यह नीति किसी उद्योग को देश की सामाजिक तथा आर्थिक प्राथमिकताओ के अनुसार दिशा प्रदान करती है।

औद्योगिक लाइसेन्सिंग नीति के उद्देश्य 

(Objectives of Industrial Licensing Policy) 

औद्योगिक लाइसेन्सिग नीति के निम्नलिखित महत्त्वपूर्ण उद्देश्य हैं

(1) सरकारी नीतियों को सफल बनाने में सहयोग देना। 

(2) उत्पादन में निरन्तर वृद्धि एवं आत्मनिर्भरता को प्राप्त करना। 

(3) उद्योगों के लिए नवीनतम तकनीक एवं उत्पादन विधियों को प्रोत्साहित करना। 

(4) दुर्लभ विदेशी विनिमय साधनों का अनुकूलतम उपयोग करना।

(5) विनियोजको को राष्ट्रीय प्राथमिकता के अनुसार उद्योगों का विकास करने के लिए प्रेरित करना।

(6) एकाधिकारी प्रवृत्तियों को नियन्त्रित कर विकेन्द्रीकरण को बढ़ावा देना। 

(7) देश की औद्योगिक नीति के क्रियान्वयन में सहायता प्रदान करना।

(8) नियोजन की प्राथमिकताओं के अनुसार देश के औद्योगिक विकास को दिशा प्रदान करना।

(9) उद्योगों के स्थानीकरण को रोककर प्रादेशिक विषमताओं को दूर करना।

(10) लघु एवं वृहद् स्तरीय उद्योगों में अनावश्यक प्रतिस्पर्धा को रोकना तथा लघु उद्योगों को संरक्षण देना।

प्रश्न काले धन की उत्पत्ति के कारण कोन – कोन से हैं

What are the causes of the origin of black money? 

उत्तर- काले धन की उत्पत्ति के कारण

(Causes of the Origin of Black Money) 

काले धन की उत्पत्ति के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं

1. कर-चोरी रोकने के शिथिल प्रयास – भारत में सर्वाधिक ऊँची दरों पर करों का आरोपण किया जाता है, लेकिन कर की अदायगी करने वाले लोगों का प्रतिशत अत्यन्त न्यून है। कर की इस चोरी को सरकार रोक पाने में अभी तक सफल नहीं हो सकी है। करों की चोरी के द्वारा काले धन की वृद्धि होती जाती है।

2. वस्तुओं की तस्करी – तस्करी भी काले धन को बढ़ाने में मदद करती है। कुछ देशद्रोही लोग देश से चोरी-छिपे माल बाहर विदेशों को भेजते हैं और विदेशों से यहाँ लाते हैं। इस क्रिया से कीमतों पर प्रभाव पड़ने के साथ-साथ काले धन की मात्रा भी बढ़ती है। सोना, मादक पदार्थों व जानवरों आदि की तस्करी, सीमा पार के और दूर-दराज के देशों में होती रहती है।

3. कराधान की ऊँची दरें – भारत में करों की दरें विश्व के किसी भी राष्ट्र के सापेक्ष सर्वाधिक है। भारत में कराधान की दरें इतनी अधिक होने के कारण धनी व्यक्ति भी अपनी वास्तविक आय बताने में हिचकिचाता है। इस प्रकार से लोगों के पास काफी धनराशि, जिसका कोई हिसाब-किताब नहीं होता, एकत्र होती जाती है, जो धीरे-धीरे बेहिसाबी मुद्रा या काले धन में बदल जाती है। देश में प्रत्यक्ष करों की आय, परोक्ष करों की आय के अनुपात में लगातार घटती गई है, जो प्रत्यक्ष करों की लगातार चोरी को प्रकट करती है।

4. कठोर नियन्त्रण नीति – समानान्तर अर्थव्यवस्था अथवा काले धन के सृजन में अनेक प्रकार की कठोर नियन्त्रण वाली नीतियों का भी प्रमख हाथ है। ये नीतियाँ है कीमत व वितरण सम्बन्धी नियन्त्रण, प्रशासनिक नियन्त्रण, लाइसेन्सिंग पद्धति आदि। देश में सम्पूर्ण सरकारी मशीनरी का संचालन इस प्रकार से होता है कि मामूली-सा काम कराने के लिए भी रिश्वत का सहारा लेना पड़ता है। भारत में आर्थिक क्रिया पर नियन्त्रण के विस्तार व जटिलता के कारण कर की चोरी वाली आमदनी का सृजन हुआ है।

प्रश्न वैश्विक संकट का भारत पर क्या प्रभाव पड़ा?

What is the effect of global crisis on India ? 

अथवा भारत में बहुराष्ट्रीय कम्पनी से क्या खतरे हैं?

What are the expected dangers of MNC’s in India ? 

उत्तर – वैश्विक संकट का भारत पर प्रभाव

(Global Crisis : Effect on India) 

विश्व अर्थव्यवस्था की ही भाँति, वैश्विक संकट के प्रकट होने तक, भारतीय अर्थव्यवस्था में भी तीव्र गति से आर्थिक वृद्धि हो रही थी, जिसका संचालन घरेलू मांग के द्वारा हो रहा था। घरेलू माँग में वृद्धि घरेलू निवेश के कारण हो रही थी, जिसका वित्त पोषण प्रमुखतः घरेलू बचत द्वारा ही हो रहा था। वस्तुतः उपभोग तथा बचत में संतुलन बना हुआ था। घरेलू मांग द्वारा प्रेरित सेवा क्षेत्र अधिक वृद्धि की गति को स्थिर रखने में योगदान दे रहा था। मुद्रास्फीति की दर निम्न स्तर पर स्थिर बनी हुई थी। भारत की इस अच्छी आर्थिक स्थिति को वित्त क्षेत्र में हुआ सुधार सहायता पहुंचा रहा था। इनके अतिरिक्त, व्यापार तथा पूँजी प्रवाह के क्षेत्र में क्रमिक उदारीकरण तथा बाजार में विनिमय दर के निर्धारण में बढ़ती भमिका ने वैश्वीकरण (globalization) की प्रक्रिया को तेज कर दिया, फलतः भारत विश्व अर्थव्यवस्था के साथ जड़ता चला गया और इस प्रकार वित्तीय स्थिरता को बनाए रखना सरकारी नीति का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा बन गया। वैश्विक संकट से पूर्व वित्तीय स्थिरता मौद्रिक नीति का एक प्रमुख उद्देश्य था। इसने भी वैश्विक एकीकरण के द्वारा भारत को लाभ पहुंचाया तथा इस प्रकार वैश्विक संकट का देश ने अच्छी तरह से सामना किया। लेकिन फिर भी वैश्विक संकट ने भारत को व्यापार, वित्त तथा विश्वास के माध्यम से काफी प्रभावित किया।

वैश्विक संकट के प्रथम चरण में, इस संकट का प्रभाव भारतीय वित्तीय बाजार पर मन्द ही रहा। इसका कारण यह था कि भारत के वित्तीय बाजार पर बैंक का प्रभूत्व था और बैंकिंग व्यवस्था का बैलेंस शीट एवं तरलहीन परिसम्पत्ति से सरोकार कम ही था. जिसने विकसित देशो में इस संकट को जन्म दिया। लेकिन भारत भी इस संकट से अछता नहीं रह सका। 2008-09 के द्वितीय अर्द्ध में वैश्विक संकट का असर भारत के वित्तीय एवं वस्तु (real)

क्रियाओं पर पड़ा। भारत का वित्तीय बाजार जैसे इक्विटी बाजार, मुद्रा बाजार, विदेशी विनिमय बाजार तथा साख बाजार आदि भी इससे प्रभावित हुआ और वैश्विक संकट का यह असर सभी दिशाओं से पड़ा।

प्रश्न विश्व व्यापार की प्रवृत्तियों पर टिप्पणी लिखिए। 

Write short note on Trends in World Trade.

उत्तर – विश्व व्यापार जिन दो प्रमुख तत्त्वों से प्रभावित होता है, उनमें से एक तत्त्व है विकास की रणनीति-आयात प्रतिस्थापन या निर्यात प्रोत्साहन। विश्व व्यापार की वृद्धि के लिए आयात प्रतिस्थापन की रणनीति हानिकारक होती है, जबकि निर्यात प्रोत्साहन की रणनीति सहायक होती है। विश्व व्यापार का दूसरा तत्त्व यह है कि विश्व उत्पाद की वृद्धि दर में तेजी आने का प्रभाव, विश्व व्यापार पर सकारात्मक होता है।

2004 में विश्व उत्पत्ति में 5.1% की वृद्धि हुई। इसी वर्ष विश्व व्यापार में 10.3% की प्रभावशाली वृद्धि हुई। 2008 की विश्वव्यापी मन्दी का कुछ प्रभाव विश्व व्यापार पर हास पड़ा। 2009 में विश्व उत्पत्ति में 2.2% का ह्रास होने के कारण विश्व व्यापार में 14.4% का ह्रास हुआ।

विश्व निर्यातों तथा विकासशील देशों के निर्यातों में सादृश्यता देखी जा सकती है। जब विश्व निर्यात बढ़ता है तब विकासशील देशों का निर्यात भी बढ़ता है।

वैश्विक अर्थव्यवस्था में 2013 में 3.0%, 2014 में 3.6% तथा 2015 में 3.9% की वृद्धि दर्ज की गई। इन्हीं अवधियों में विश्व व्यापार में क्रमश: 3.0%,4.3% तथा 5.3% की वृद्धि हुई।

विश्व निर्यातों तथा विकासशील देशों के निर्यातों में सादृश्यता देखी जा सकती है। विश्व निर्यात बढ़ता है, विकासशील देशों का निर्यात भी बढ़ता है।

वर्ष 2012 में विश्व व्यापार के परिमाण की वृद्धि दर 2.8% थी। इस वर्ष यह वृद्धि दर उन्नत अर्थ व्यवस्थाओं में 1.4% तथा उदीयमान और विकासशील अर्थ व्यवस्थाओं में 5-0% रही। इस दौरान चीन के व्यापार परिमाण की वृद्धि दर 7.7% तथा भारत के व्यापार परिमाण की वृद्धि दर 7.7% रही। इसके बाद के वर्षों में विश्व व्यापार परिमाण में क्रमश: वृद्धि होती गई। वर्ष 2014 में विश्व के व्यापार परिमाण की वृद्धि दर 5.3% हो गई। इस वर्ष यह वृद्धि दर उन्नत अर्थ व्यवस्थाओं में 2.3% रही, जबकि उभरती और विकासशील अर्थव्यवस्थों में यह वृद्धि दर 5.3% रही। इस वर्ष के दौरान भारत के विदेशी व्यापार के परिमाण की वृद्धि दर 6.4% रही।

प्रश्न – भारत में औद्योगिक विकास की मुख्य समस्याओं की व्याख्या कीजिए।

Discuss three main weaknesses of industrial development in India.

उत्तर – शक्ति के साधनों का अभाव – देश के समक्ष शक्ति के साधनों की आपूर्ति की समस्या है तथा फैक्ट्री को निरन्तर चलाने के लिए लगातार शक्ति के साधनों का होना अति आवश्यक है। शक्ति के साधनों में एल०पी०जी०, पेट्रोल, डीजल, विजली का होना अति आवश्यक है।

इस समस्या का समाधान सौर ऊर्जा और नदी-घाटी योजनाओं या अणु शक्ति द्वारा उत्पादित बिजली की आपूर्ति करके किया जाना चाहिए।

2. आधारभूत ढाँचे का अभाव – औद्योगिक ढाँचे के विकास के लिए आधारभत ढाँचे का मजबूत होना अनिवार्य है, किन्तु देश में परिवहन, संचार, बैंकिंग आदि क्षेत्रों (जो कि आधारभूत ढाँचे के ही अंग हैं) का आज भी भली-भाँति विकास नहीं हा पाया है।

सरकार को निजी क्षेत्र की मदद एवं विदेशी सहायता लेकर पिछड़े क्षेत्रों का विकास करना चाहिए। खासकर इन क्षेत्रों में आधारभूत ढाँचे को खड़ा किया जाना चाहिए। जो निजी क्षेत्र स्वेच्छा से इस दिशा में आगे आते हैं उन्हें प्रोत्साहन तथा करों में छूट मिलनी चाहिए।

3. गुण नियन्त्रण की समस्या–भारत में उत्पादों की गुणवत्ता विदेशी माल की तुलना में निम्न होती है, जिसकी वजह से विदेशों से अधिक मात्रा में निर्यात आदेश प्राप्त नहीं हो पाते हैं।

इस सन्दर्भ में गुणवत्ता सम्बन्धी प्रमाण-पत्र जारी करते समय कठोर जाँच की जानी चाहिए। कारखाना स्तर पर पूरी गुणवत्ता का ख्याल किया जाना चाहिए। अच्छे कच्चे माल का प्रयोग किया जाना चाहिए।

प्रश्न –  मौद्रिक नीति से क्या तात्पर्य है? इसके प्रमुख उद्देश्य कोन – कोन से हैं?

What is meant by Monetary Policy? What are its main objectives? 

अथवा भारत की वर्तमान मौद्रिक नीति पर टिप्पणी लिखिए।

Write short note on the Present Monetary Policy of India. 

उत्तर – मौद्रिक नीति से आशय

(Meaning of Monetary Policy) 

मौद्रिक नीति से आशय एक ऐसी नीति से है जिसके द्वारा मुद्रा के मूल्य में स्थायित्व हेतु मद्रा व साख की पूर्ति का नियमन किया जाता है। भारत में रिजर्व बैंक मौद्रिक नीति का नियमन करता है। इसको साख के नियन्त्रणात्मक विस्तार की नीति के रूप में जाना जाता है। इसका मख्य उद्देश्य कीमतों को नियन्त्रित रखना,तथा आवश्यक सुख-सुविधाओं का विकास करना होता है। नियन्त्रित मौद्रिक विस्तार के द्वारा रिजर्व बैंक पर्याप्त वित्त का प्रबन्धन करता है तथा साथ ही देश में मूल्य-स्थिरता की अवस्था को बनाए रखता है।

पॉल इंजिग के शब्दों में, “मौद्रिक नीति के अन्तर्गत उन सभी मौदिक निर्णयों और उपायों को सम्मिलित किया जाता है जिनका उद्देश्य मौद्रिक प्रणालीको प्रभावित करना होता है।”

प्रो० कैण्ट के शब्दों में, “मौद्रिक नीति का आशय एक निश्चित उद्देश्य की पूर्ति क लिए चलन के विस्तार और संकुचन की व्यवस्था करने से है।

प्रो हैरी जाँनसन के शब्दों में “मौदिक नीति का आशय उस नीति से है जिसके द्वारा कन्द्राय बक सामान्य आर्थिक नीति के उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए मद्रा की पति को नियान्त्रत करता है।”

एक अच्छी मौद्रिक नीति वह है जिसमें आन्तरिक मल्य स्तर में सापेक्षिक स्थिरता, विनिमय दरों में स्थायित्व, आर्थिक विकास. आर्थिक स्थिरता और रोजगार की समुचित व्यवस्था की जा सके। मौद्रिक नीति के निश्चित व अपरिवर्तनशील सिद्धान्त नहीं हैं वरन् देश, काल एवं परिस्थितियों के अनुसार इनमें परिवर्तन किया जा सकता है।

मौद्रिक नीति के प्रमुख उद्देश्य

(Main Objectives of Monetary Policy) 

मौद्रिक नीति के प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित हैं

1. आर्थिक विकास – कीमत स्थिरता एवं पूर्ण रोजगार का स्तर पाने के उद्देश्य, आर्थिक प्रगति के लिए सहायक होते हैं। मौद्रिक नीति आर्थिक विकास को बढ़ावा देने के लिए अपनायी जाती है। यह नीति आर्थिक उतार-चढ़ाव को रोकने के अस्त्र के रूप में अपनायो जाती है। आर्थिक विकास के लिए मौद्रिक नीति बचतों को प्रोत्साहित करती है एवं इन्हें उचित प्रकार से विनियोजित करने में भी मदद करती है।

2. आर्थिक विकास के लिए वित्तीय साधनों को बढ़ाना – मौद्रिक नीति देश के आर्थिक विकास के लिए वित्तीय साधनों को एकत्र करने एवं बढ़ाने में काफी योगदान करती है। क्योंकि विकासशील राष्ट्रों में वित्तीय साधनों का अभाव रहता है, अतः उचित मौद्रिक नीति के द्वारा मुद्रा तथा साख की पूर्ति को बढ़ाया जा सकता है।

3. कामता मे स्थायित्व कीमतों में उतार – चढ़ाव को रोकना ही कीमत स्थायित्वं कहलाता है। कीमत स्तर ऐसा होना चाहिए जो कि विनियोजनों के लिा अधिक विनियोग हेत प्रेरणादायक रहे तथा उपभोक्ता वर्ग के लिए भी न्यायोचित हो। अर्थव्यवस्था में कीमतों में निरन्तर उतार-चढ़ाव से विनियोग, उत्पादन, आय, प्रभावी माँग एवं राष्ट्रीय आय पर व्यापक प्रभाव पड़ता है। मौद्रिक नीति में आवश्यक परिवर्तन करके कीमतों पर नियन्त्रण रखा जा सकता है एवं अर्थव्यवस्था के महत्त्वपूर्ण चलों (Variables) की गति को सीमित किया जा सकता है तथा अर्थव्यवस्था को वांछित दिशा में मोड़ा जा सकता है।

4.विनिमय दरों में स्थायित्व – स्वर्णमान की समाप्ति के पश्चात् तथा अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (I.M.F.) की स्थापना हो जाने के बावजूद विनिमय दर में स्थायित्व मौद्रिक नीति का ही उद्देश्य माना जाता है। जिन देशों में विदेशी विनिमय की दर अस्थिर होती है वहाँ अन्य देशों से विदेशी पूँजी का प्रवाह अवरुद्ध हो जाता है जिससे इन देशों (खासकर अल्पविकसित देशों) में आर्थिक विकास के लिए वित्तीय कठिनाइयाँ उपस्थित हो जाती हैं। इतना ही नहीं, जिन देशों की अर्थव्यवस्था विदेशी व्यापार पर आश्रित है वहाँ विनिमय दर में स्थायित्व, मौद्रिक नीति का बड़ा ही उपयोगी उद्देश्य होता है।

5.आर्थिक स्थिरता – विकसित देशों में भी मौद्रिक नीति बड़ी ही लाभदायक होती है। इन देशों में आर्थिक स्थिरता बनाए रखने में मौद्रिक नीति बहुत उपयोगी होती उचित मौद्रिक नीति के द्वारा मुद्रा की माँग व पर्ति में साम्य बनाए रखा जा सकता है। इस आर्थिक उच्चावचनों को भी नियन्त्रित रखा जा सकता है।

 कुछ अर्थशास्त्रियों के अनुसार मौद्रिक नीति का उद्देश्य मुद्रा को तटस्थता होना चाहिए। दूसरे शब्दों में, देश में मुद्रा की पूर्ति में परिवर्तन नहीं होना चाहि क्योंकि मुद्रा की पूर्ति में बहुत अधिक परिवर्तन अर्थव्यवस्था को अस्त-व्यस्त कर देता है। 

7.कुशल भुगतान तन्त्र – देश के आर्थिक विकास के लिए हमें एक कुशल भुगतान तन्त्र की व्यवस्था करनी होती है। यह इसलिए महत्त्वपूर्ण है क्योंकि विकास के साथ-साथ अर्थव्यवस्था के मौद्रिक क्षेत्र का विस्तार हो जाता है। अत: ऐसी स्थिति में यदि मुद्रा प्रणाली (भुगतान तन्त्र) कुशलता से संचालित न हो पाए तो विशिष्टीकरण एवं विनिमय की हानि होती है। इस प्रकार मौद्रिक नीति द्वारा मुद्रा प्रणाली की कुशलता को बनाए रखा जाता है।

8. बचत तथा विनियोग में साम्य – मौद्रिक नीति के माध्यम से बचतों तथा विनियोगों में साम्य स्थापित किया जा सकता है। ऐसा करने से पूर्ण रोजगार का लक्ष्य प्राप्त किया जा सकता है। मौद्रिक नीति के द्वारा नागरिकों की आय में वृद्धि करके बाजार की अपूर्णताओं को दूर किया जा सकता है। ऐसा करने से बचत प्रोत्साहित होगी तथा विनियोगों को भी प्रोत्साहन मिलेगा।

प्रश्न –  विश्व व्यापार संगठन के कार्यों तथा उद्देश्यों को समझाइये।

Ezplain the functions and objectives of WTO. 

उत्तर – विश्व व्यापार संगठन के कार्य

(Functions of World Leade Organization) 

दिनापार संगठन क निम्नलिखित कार्य है

(1) WTO के सदस्य देशों के मध्य उत्पन्न विवादों के निपटारे हेतु नियमों तथा प्रक्रियाओं को लागू करना।

(2) विश्व व्यापार समझौता तथा अन्य बहुपक्षीय समझौतों के क्रियान्वयन, प्रशासन एव परिचालन हेतु आवश्यक सुविधाएँ प्रदान करना।

(3) विश्व स्तर पर आर्थिक नीतियों के निर्माण में अधिक सामंजस्य लाने काल अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष, विश्व बैंक एवं अन्य अन्तर्राष्ट्रीय संस्थाओं से सहयोग करना।

(4) व्यापार नीति की समीक्षा एवं प्रक्रिया से सम्बन्धित नियमों एवं प्रावधानों को लागू करना 

(5) प्रशुल्क एवं व्यापार से सम्बन्धित विषयों पर विचार-विमर्श के लिए सदर एक उपयुक्त मंच प्रदान करना।

(6) विश्व संसाधनों का अनुकूलतम उपयोग कराना।

विश्व व्यापार संगठन के उद्देश्य 

(Objectives of World Trade Organization) 

विश्व व्यापार संगठन के प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित हैं

(1) विश्व संसाधनों का अधिकतम मात्रा में विस्तार करना।

(2) व्यापारिक भागीदारों में प्रतियोगिता को बढ़ावा देना ताकि उपभोक्ताओं को लाभान्वित किया जा सके।

(3) व्यापारिक एवं पर्यावरण सम्बन्धी नीतियों को सतत विकास से सम्बद्ध करना। 

(4) विश्व व्यापार में इस प्रकार से बद्धि करना जिससे प्रत्येक सदस्य देश लाभान्वित हो। 

(5) उत्पादन स्तर एवं उत्पादकता में वृद्धि करके विश्व में रोजगार के स्तर में वृद्धि

(6) वस्तुओं एवं सेवाओं के उत्पादन तथा व्यापार में वृद्धि करना।

(7) प्रशुल्क एवं व्यापार सम्बन्धी बाधाओं तथा विदेश व्यापार सम्बन्धों में पक्षपातकारी व्यवहार को समाप्त करना।

(8) बहुपक्षीय व्यापार प्रणाली का विकास करना। 

(9) सदस्य देशों में वास्तविक आय एवं प्रभावी माँग में सतत वृद्धि द्वारा लोगों के जीवन स्तर में सुधार लाना।

(10) विश्व व्यापार की नवीन प्रणाली को लागू करना WTO का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण उद्देश्य है।

प्रश्न गतिहीन मुद्रास्फीति से क्या आशय हैं।

Explain Stagflation.

उत्तर – ‘गतिहीन मुद्रा स्फीति’ अर्थात् ‘Stagflation’ शब्द, दो शब्दों”Step 11stion’ तथा ‘Inflation’ से मिलकर बना है, जो इस बात का प्रतीक है कि अर्थव्यवस्था में एक ओर तो कीमतें बढ़ती है तथा दूसरी ओर आर्थिक विकास अवरुद्ध होकर अर्थव्यवस्था में निष्क्रियता एवं जड़ता की स्थिति आ जाती है। इस स्थिति को ही गतिहीन मदा स्फीति की स्थिति कहते है।

प्रश्न –  विदेशी निवेश से आपका क्या आशय है

What do you mean by foreign investment?

उत्तर – विदेशी विनियोग का तात्पर्य है दूसरे देश में निजी कम्पनियों या व्यक्तियों द्वारा किया गया निवेश जो सरकारी सहायता नहीं है। लेकिन एक दूसरे मत के अनुसार विदेशी निवेश में सरकारी अधिकारी तथा निजी फर्म और व्यक्ति दोनों ही शामिल हैं। जिन देशों में निवेश की माँग की तलना में घरेल बचत कम पड़ती है, वहाँ विदेशी विनियोग तीव्र आर्थिक विकास के लिए सहायक सिद्ध हो सकता है। जिन देशों को भुगतान शेष की समस्या का सामना करना पड़ता है, वहाँ भी विदेशी निवेश समस्या को कम करने में सहायक हो सकता है।

विदेशी विनियोग दो प्रकार का होता है

1. विदेशी प्रत्यक्ष विनियोग 

2. पोर्टफोलियो विनियोग।

प्रश्न –  उदारीकरण के लाभों की टिप्पणी कीजिए। 

Explain the advantages of liberalization, 

उत्तर – उदारीकरण के लाभ

(Advantages of Liberalization) 

उदारीकरण से निम्नलिखित लाभ हुए है

1. उदारीकरण के दौर में कर-प्रणाली का सरलीकरण – सरकार द्वारा दीर्घकालिक राजकोषीय नीति की घोषणा के द्वारा कर प्रणाली को सरलीकृत कर यक्तिसंगत बनाया गया है। आयकर की अधिकतम सीमा को 30% कर दिया गया है। उत्पाद कर में कमी कर दी गई है। विदेशी कम्पनियों के लाभ-कर को कम कर दिया गया है।

2. व्याज-दरों का स्वतन्त्र निर्धारण – उदारीकरण के दौर में अब व्याज दरों का निर्धारण रिजर्व बैंक द्वारा नहीं, अपितु इनका निर्धारण बाजार शक्तियों द्वारा पूर्ण स्वतन्त्रतापूर्वक किया जाएगा।

3. नए उद्यमी वर्ग का प्रादुर्भाव – उदारीकरण के परिणामस्वरूप देश में एक नए उद्यमी वर्ग का प्रादुर्भाव हुआ है, जो औद्योगिक गतिशीलता को बढ़ाते हुए अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर ‘ भारतीय उत्पादों की गुणवत्ता के नए कीर्तिमान स्थापित कर रहा है।

4. प्रतिस्पर्धी उद्यमिता का प्रारम्भ – उदारीकरण के नए दौर में नई तकनीक के आगमन तथा विदेशी कम्पनियों द्वारा भारत में निवेश करने के कारण भारतीय उद्यमियों में नई चेतना का संचार हुआ है तथा स्वस्थ प्रतिस्पर्धा के कारण मात्रात्मक ही नहीं, गुणात्मक सुधार भी हुआ जिसका सीधा लाभ उद्योग जगत को प्राप्त हो रहा है।

5. उत्पादन में वृद्धि – नियन्त्रणों की समाप्ति से देश में औद्योगिक उत्पादन में वृद्धि हुई है। उदारीकरण से पूर्व देश में अनेक औद्योगिक एवं उपभोक्ता वस्तुओं की कमी थी। लेकिन कुछेक वर्षों में ही स्थिति बदल गई है।

6. विकास-दर में वृद्धि – विकास-दर किसी भी देश की प्रगति का मापदण्ड है। केन्द्रीय सांख्यिकी संगठन (सीएसओ) ने 31 अगस्त को चालू वित्त वर्ष 2015-16 की पहली तिमाही (अप्रैल-जून 2015) के आँकड़े जारी कर दिए हैं। इसके अनुसार इस दौरान आर्थिक विकास दर घटकर 7% पर आ गई है। जनवरी-मार्च 2015 में यह 7.5% थी। टैक्स मामला। में सलाह देने वाली प्रमुख बहुराष्ट्रीय कम्पनी अन्र्ट एण्ड यंग (ईवार्ड) ने अक्टबर 2015 में जारी अपनी रिपोर्ट में भारत को निवेश के लिहाज से विश्व के सबसे आकर्षक स्थल के तौर पर चिह्नित किया है। उसके अनुसार भारत में कम्पनियों के लिए काम करना अब पहले से ज्यादा आसान हो गया है। आने वाले दो-तीन वर्षों तक भारत में होने वाले विदेशी निवशमा वृद्धि होगी। इस निवेश का बड़ा हिस्सा मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र में आ सकता है। रिपोर्ट में पहले स्थान पर है, जबकि उसके बाद चीन, दक्षिण-पूर्वी एशिया ब्राजील और उत्तर अमेरिका

का नम्बर है। दुनिया की 500 बड़ी कम्पनियों के बीच किए गए इस प्रतिष्ठित सर्वेक्षण को 15 अक्टूबर 2015 को नई दिल्ली में औद्योगिक नीति व संवर्धन विभाग (डीआइपीपी) के सचिव अमिताभ कांत ने जारी किया।

7. एफ डी आई का अन्तर्ग्रवाह।

8. विदेशी मुद्रा भण्डार में वृद्धि – 1990 ई० से पूर्व देश का विदेशी मुद्रा भण्डार रिक्त होने लगा था, लेकिन 1990 ई० के पश्चात् सकारात्मक उपायों के लागू होने पर इस कमी को दूर किया जा सका। 2000 ई० में इसमें तेजी से सुधार होने लगा। मार्च 2011 के अन्त में भारत में विदेशी मुद्रा भण्डार संतोषजनक थे।

9.बाजार उन्मुख अर्थव्यवस्था का प्रादुर्भाव – उदारीकरण के कारण बाजार उन्मुख व्यवस्था अस्तित्व में आ चुकी है। उदारीकरण की व्यवस्था के अन्तर्गत आर्थिक प्रणाली में सरकार की भूमिका नगण्य होती जा रही है। बाजार शक्तियों की भूमिका बढ़ने के कारण व्यवसाय जगत को सीधा लाभ पहुँचेगा।

प्रश्न –  भारत में विश्वव्यापीकरण को प्रभावित करने वाले घटकों का वर्णन कीजिए।

Describe the factors fostering globalization in India. 

उत्तर- भारत में विश्वव्यापीकरण को प्रभावित करने वाले घटक

(Factors Fostering Globalization in India) 

भारत में विश्वव्यापीकरण को निम्नलिखित तत्त्व प्रभावित करते हैं

1.प्रतिस्पर्धा-पूँजीवादी अर्थव्यवस्था का एक महत्त्वपूर्ण अंग प्रतिस्पर्धा के कारण ही कम्पनियों को विदेशों में नए बाजार ढूँढ़ने की आवश्यकता हुई इसी के परिणामस्वरूप उत्पादन तथा विक्रय की नई विधियों का विकास हुआ है। विदेशी कम्पनी की प्रतिस्पर्धा के डर से ही घरेल कम्पनियाँ भी विश्व परिप्रेक्ष्य में अपने को स्थापित करने लगी हैं।

2. उदारवादी नीतियाँ-विश्वव्यापीकरण के विकास का मुख्य कारण ही पुनर्रचना की प्रक्रिया लागू होना है।

3. विभिन्न देशों में उपलब्ध उपरि ढाँचा, वितरण प्रणाली एवं विपणन दृष्टिकोण एक समान रूप वाले होते जाते हैं।

4. पूँजी बाजारों का सार्वभौमीकरण होता जा रहा है। प्रवाह करने वाली पूँजी की राशि में तेज गति से वृद्धि होती जा रही है जिसके कारण राष्ट्रीय स्तर के पूँजी बाजार विश्व स्तर के स्वरूप धारण करते जा रहे हैं।

भारत में भी विश्वव्यापीकरण की प्रक्रिया धीरे-धीरे गति पकड़ रही है। भारत में विश्वव्यापीकरण की प्रक्रिया 1991 में प्रारम्भ हुई।

प्रश्न – भूमण्डलीकरण से आप क्या समझते हैंसमझाइये

What do you mean by Globalization ?

उत्तर – भूमण्डलीकरण या वैश्वीकरण का अर्थ है विश्व में चारों ओर अर्थव्यवस्थाओं का बढ़ता हुआ एकीकरण। यह एकीकरण मुख्य रूप से व्यापार तथा वित्तीय प्रवाहों के माध्यम से होता है। व्यापार तथा वित्तीय प्रभाव अर्थात निवेश के साथ-साथ श्रमिकों तथा टेक्नोलोजी का भी आगमन अन्तर्राष्ट्रीय सीमाओं के आर-पार होता है। भूमण्डलीकरण के सांस्कृतिक, राजनीतिक एवं परिदृश्य सम्बन्धी आयाम भी है। किन्तु यहाँ हमने केवल आर्थिक बिन्दु पर ही केन्द्रीकरण किया है।

अत: विश्वव्यापीकरण वह प्रक्रिया है जिसमें विश्व बाजारों के मध्य पारस्परिक निर्भरता उत्पन्न होती है और व्यापार देश की सीमाओं में प्रतिबन्धित न रहकर विश्व व्यापार में निहित तुलनात्मक लागत लाभ दशाओं का विदोहन करने की दशा में अग्रसर होता है।

प्रश्न –  भूमण्डलीकरण अथवा विश्वव्यापीकरण की विशेषताएँ लिखिए। 

Write characteristics of globalization 

उत्तर – विश्वव्यापीकरण अथवा भूमण्डलीकरण की विशेषताएँ

(Characteristics of Globalization) 

विश्वव्यापीकरण अथवा भूमण्डलीकरण की निम्नलिखित विशेषताएँ हैं

1. वस्तुओं, सेवाओं, पूँजी, तकनीकी तथा श्रम सम्बन्धी अन्तर्राष्ट्रीय बाजारों का एकीकरण हो जाता है अर्थात् इसके आवागमन पर सभी रुकावटें हटा ली जाती हैं।

2. सरकार की राष्ट्रीय मैक्रो आर्थिक नीतियाँ विभिन्न देशों द्वारा अपनायी गई उदारवादी नीतियाँ हैं। इनके परिणामस्वरूप आर्थिक लेन-देन पर लगी रोकों को हटा लिया गया है। विश्व अर्थव्यवस्था में कई तरह की रुकावटें दूर होने से वैश्वीकरण की प्रक्रिया के लिए रास्ता साफ हो गया है। सबसे पहले व्यापार के क्षेत्र में खुलापन आया। इसके बाद विदेशी निवेश के प्रति उदारता बढ़ी है।

3. तकनीकी परिवर्तन-विश्वव्यापीकरण को प्रोत्साहित करने में तकनीकी परिवर्तन की मुख्य भूमिका रही है। वस्तुओं को कम लागत पर तैयार करना साथ ही उन्नत किस्म का उत्पादन तकनीकी परिवर्तन से ही सम्भव हो सका है।

4.विकासशील अर्थव्यवस्थाओं के अनुभव-जिन देशों ने वैश्वीकरण की प्रक्रिया को अपनाया, वह आर्थिक दृष्टि से बहुत सफल रहे; जैसे-कोरिया, थाईलैण्ड, ताइवान, हाँगकाँग, सिंगापुर आदि। वैश्वीकरण के इस सफल अनुभव ने भारत जैसे देशों को अपना अर्थव्यवस्थाओं का वैश्वीकरण करने को प्रोत्साहित किया।

5. अन्य कारण-माइक्रो इलेक्ट्रॉनिक्स अर्थात् कम्प्यूटर एवं सम्बद्ध त विस्तार के परिणामस्वरूप सभी देशों में तकनीकी की पनर्रचना का क्षेत्र कम हो जाता

6. देश की अर्थव्यवस्था को विश्व की अर्थव्यवस्था के साथ एकीकत किया जा अर्थात् आर्थिक क्रियाओं का राष्ट्रीय सीमा से आगे विस्तार किया जाता है।

7. बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का विस्तार होता है।

संक्षेप में, विश्वव्यापीकरण राष्ट्रों की राजनीतिक सीमाओं के आर-पार आर्थिक लेन-देन, प्रक्रियाओं और उनके प्रबन्धन का प्रवाह है।

प्रश्न –  निजीकरण से क्या आशय हैटिप्पणी

What is meant by Privatization ? 

उत्तर – निजीकरण से आशय

(Meaning of Privatization) 

निजीकरण एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके अन्तर्गत सार्वजनिक उपक्रमों के स्वामित्व तथा प्रबन्ध में निजी क्षेत्र को सहभागिता प्रदान की जाती है अथवा स्वामित्व एवं प्रबन्ध का निजी क्षेत्र को हस्तान्तरण किया जाता है तथा आर्थिक क्रियाकलापों पर सरकारी नियन्त्रण को घटाकर देश में आर्थिक प्रजातन्त्र स्थापित किया जाता है। ____ संकुचित अर्थ में निजीकरण का आशय उस नीति से है जिसके अन्तर्गत सार्वजनिक उपक्रम का निजी क्षेत्र को हस्तान्तरण कर दिया जाता है। इस प्रक्रिया को ‘विराष्ट्रीयकरण’ (Denationalization) भी कहा जाता है।

निजीकरण की प्रमुख परिभाषाएँ निम्नलिखित हैं

जिबान के मुखोपाध्याय के अनुसार, “निजीकरण वह प्रक्रिया है जिसमें किसी राष्ट्र के आर्थिक कार्यकलापों में सरकारी प्रभुत्व को कम किया जाता है।”

वीरेन जे० शाह के अनुसार, “निजीकरण का अर्थ प्रजातन्त्र है।”

अन्तर्राष्ट्रीय मुद्राकोष के अर्थशास्त्री सुसान के जोन्स (Susan K. Jones) के शब्दों में, “निजीकरण शब्द से तात्पर्य किसी भी कार्यकलाप को सार्वजनिक क्षेत्र से निजी क्षेत्र को हस्तान्तरित करना है। इसमें सार्वजनिक क्षेत्र के कार्यकलापों में केवल पूँजी अथवा प्रबन्ध विशेषज्ञों का प्रवेश ही हो सकता है, किन्तु अधिकांश मामलों में, इसमें सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों का निजी क्षेत्र में हस्तान्तरण होता है।”

उक्त परिभाषाओं के आधार पर निजीकरण की निम्नलिखित विशेषताएँ स्पष्ट होती हैं

(1) यह विचारधारा विश्व-स्तर पर लागू की जा रही है। 

(2) यह एक नई विचारधारा तथा नई व्यूह-रचना (Strategy) है।

(3) यह व्यापक विचारधारा है। इसका उद्देश्य सरकारी प्रभुत्व को कम करके निजी क्षेत्र को बढ़ावा देना है।

(4) यह विचारधारा आर्थिक प्रजातन्त्र (Economic Democracy) की स्थापना करती है।

(5) यह सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन (Socio-Economic Changes) का उपकरण अथवा यन्त्र (Tool) है।

(6) इसका विस्तृत क्षेत्र (Wide Scope) है। इसमें विराष्ट्रीयकरण (Denationa आर्थिक अविनियमन (Deregulation), lization), विनियन्त्रण (Decontrol), उदारीकरण (Economic Liberalization) आदि क्रियाएँ शामिल की जाती है।

(7) निजी क्षेत्र सार्वजनिक क्षेत्र की तुलना में प्रबन्ध एवं नियन्त्रण की दृष्टि से अधिक कुशल होता है।

प्रश्न –  अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष की कार्यविधि का संक्षिप्त वर्णन कीजिए। 

Discuss briefly the working of IMF. 

उत्तर – मुद्रा कोष का संगठन तथा प्रबन्ध

(Organisation and Management of the IMF) 

अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष का प्रबन्ध एवं संगठन निम्न प्रकार है

1. प्रशासक मण्डल 2. कार्यकारी संचालक मण्डल 3. प्रबन्ध संचालक।

1. प्रशासक मण्डल – कोष के सभी सदस्य देश अपना-अपना एक प्रतिनिधि मुद्रा कोश के प्रशासक मण्डल में नियुक्त करते हैं। प्रशासक मण्डल में एक गवर्नर तथा एक स्थानापन्न गवर्नर होता है। प्रत्येक प्रशासक का कार्यकाल 5 वर्ष होता है, इसकी पुनर्नियुक्ति भी की जा सकती है। प्रशासक मण्डल की एक वार्षिक सभा सितम्बर या अक्टूबर में होती है जिसमें कोष का 30 अप्रैल तक स्थिति विवरण और ब्योरा प्रस्तुत किया जाता है। वार्षिक सभा के अतिरिक्त मुद्रा कोष के कोई 5 सदस्य अथवा जिन सदस्यों को कुल मताधिकार का 25% प्राप्त है, प्रशासक मण्डल की सभा बुला सकते हैं।

प्रशासक मण्डल मुद्रा कोष की सर्वोच्च संस्था है और कोष की सम्पूर्ण शक्तियाँ इसी मण्डल के अधीन हैं।

2. कार्यकारी संचालक मण्डल –  इस मण्डल का प्रमुख कार्य सामान्य प्रशासन तथा दिन-प्रतिदिन का कार्य करना है। मुद्रा कोष के प्रबन्धक मण्डल में इस समय 22 सदस्य हैं। इनमें से.6 स्थायी सदस्य सबसे अधिक कोटा वाले देशों द्वारा, 5 सदस्य सुदूरपूर्व और प्रशान्त महासागर के देशों द्वारा, 5 सदस्य मध्यपूर्व के देशों द्वारा एवं शेष सदस्य क्रमश: अफ्रीका, लैटिन अमेरिकी और यूरोपीय देशों द्वारा मनोनीत किए जाते हैं। प्रबन्धक मण्डल का प्रत्येक मनोनीत या चुना हुआ सदरस्य एक स्थानापन्न सदस्य की नियुक्ति कर सकता है। ये सदस्य कोष के नियमित कार्य संचालन के लिए उत्तरदायी होते हैं। प्रबन्धक मण्डल के सदस्यों को मुद्रा कोष में वेतन मिलता है।

3. प्रबन्ध संचालक – मुद्रा कोष के दैनिक कार्य संचालन के लिए एक प्रबन्ध संचालक की नियुक्ति कार्यकारी संचालक मण्डल द्वारा की जाती है। प्रबन्ध संचालक प्रब मण्डल की सभाओं की अध्यक्षता करता है, किन्तु वह अपना मत केवल निर्णायक मत क में ही दे सकता है।

मताधिकार – मुद्रा कोष के सामान्य निर्णय बहुमत के आधार पर होते हैं। बहुमत सदस्य संख्या द्वारा न होकर कुल मताधिकार द्वारा निर्धारित होता है। मताधिकार के अन्तर्गत प्रत्येक सदस्य को 250+ 1 मत प्रति लाख SDRS (अभ्यंश) का अधिकार प्राप्त होता है। भारत का मताधिकार उसके 30,555 लाख SDR. अभ्यंश के अनुसार 250+ 30,555 = 30,805 (मत) था।

प्रश्न –  उदारीकरण की क्या आलोचनाएँ हैंसमझाइये

What are the criticism of liberalization ?

उत्तर – यद्यपि उदारीकरण की नीति का भारत में व्यापक स्वागत हुआ है, लेकिन उसकी आलोचना भी की जाने लगी है, जो निम्नवत् है

(i) स्वदेशी एवं लघु उद्योगों को हानि, (ii) वास्तविक विदेशी निवेश कम, (iii) निर्यात में वृद्धि नहीं, (iv) सार्वजनिक क्षेत्र को हतोत्साहन, (v) औद्योगिक क्षेत्र में कठोर प्रतिस्पर्धा, (vi) बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का आगमन, (vii) मजदूर संघों द्वारा विरोध, (viii) विदेशी हस्तक्षेप, (ix) बेरोजगारी में वृद्धि।

प्रश्न –  विभागीय उपक्रम अथवा विभागीय संगठन का अर्थ बताइए। 

Explain departmental form of public undertaking.

उत्तर – राजकीय उपक्रम का वह स्वरूप जिस पर राज्य का पूर्णतया स्वामित्व होता है तथा राजकीय विभाग द्वारा संचालित होता है, ‘राजकीय विभाग द्वारा प्रबन्धित राजकीय । उपक्रम’ अथवा ‘विभागीय उपक्रम’ कहलाता है। इसमें प्रबन्धकों की नियुक्ति सरकार द्वारा , आई०ए०एस० अधिकारियों से की जाती है।

सरन –  अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष की स्थापना कब और कहाँ हुई टिप्पणी

When and where was IMF established ?

उत्तर – जुलाई 1944 में ब्रटेनवुड नामक स्थान पर 44. राष्ट्रों के प्रतिनिधियों का एक सम्मेलन बुलाया गया तथा अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष की स्थापना का निर्णय लिया गया। इस प्रकार, अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष की स्थापना 27 दिसम्बर, 1945 ई० को हुई और इस संस्था ने अपना विधिवत् कार्य 1 मार्च, 1947 ई० से आरम्भ कर दिया। आज साम्यवादी देशों के अतिरिक्त विश्व के लगभग सभी राष्ट्र इस संस्था के सदस्य हैं। स्वाधीन होने वाले नए देशों के सहयोग से इसकी सदस्यता में तीव्र गति से निरन्तर विस्तार हो रहा है।

प्रश्न –  रुग्ण इकाई की परिभाषा दीजिए। 

Explain Sick Unit.

उत्तर – रिजर्व बैंक द्वारा दी गयी परिभाषा के अनसार, “बीमार औद्योगिक इकाई वह होगी जिसे वर्तमान वर्ष में नकद-हानि (Cash loss) सहन करनी पड़ी है और आने वाले दा वर्षों में उसकी दशा में निरन्तर ऐसे घाटे की स्पष्ट सम्भावनाएँ परिलक्षित होती हैं।” अन्य शब्दो में यह कहा जा सकता है कि यदि किसी कम्पनी की चल सम्पत्तियाँ उसकी चल देनदारिया से

कम रहें तथा विशुद्ध स्वामी-हित (Net Equity Worth) उसकी कुल देनदारियों (Total liabilities) से कम रहें तथा यह स्थिति निरन्तर बनी रहे तो यह समझना चाहिए कि वह कम्पनी औद्योगिक रुग्णता की शिकार है।

प्रश्न –  प्रतिकूल व्यापार सन्तुलन के प्रभावों को बताइए। 

Give effects of unfavourable trade balance.

उत्तर – प्रतिकूल व्यापार शेष का अर्थव्यवस्था पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। प्रतिकूल व्यापार शेष के प्रभावों को निम्नांकित बिन्दुओं से देखा जा सकता है

(i) देश की प्रतिष्ठा में कमी, (iii) आर्थिक विकास में बाधा, (iii) कमजोर अर्थव्यवस्था का सूचक, (iv) भुगतान सन्तुलन की असाम्यता, (v) प्रतिकूल विनिमय दर, (vi) विदेशी विनिमय कोषों में कमी।

प्रश्न – ‘सार्कको समझाइए। 

Explain SAARC’.

उत्तर – सार्क का पूरा नाम ‘दक्षिणी एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संस्था’ (South Asian Association for Regional Cooperation) है। सन् 1985 में स्थापित इस संगठन के वर्तमान समय में 8 सदस्य देश हैं। इसमें भारत, पाकिस्तान, नेपाल, भूटान, श्रीलंका, मालदीव, बंगलादेश व अफगानिस्तान सम्मिलित हैं। इसका मुख्यालय काठमांडू (नेपाल) में है। सार्क का मूल उद्देश्य दक्षिणी एशियाई देशों में गरीबी उन्मूलन तथा एक-दूसरे को सहायता प्रदान करना है। इसका अपना घोषणा-पत्र है।

प्रश्न एफ०डी०आई० से आशय है

What is FDI ?

उत्तर – एफ०डी०आई० का पूरा नाम ‘प्रत्यक्ष विदेशी निवेश’ 

(Foreign Direct Investment) है। इसका अभिप्राय है कि कोई विदेशी संस्था अथवा व्यक्ति किसी दूसरे देश में अपनी पूँजी से उत्पादन इकाई स्थापित कर सकता है।

प्रश्न –  विनिवेश क्या है टिप्पणी कीजिए।

What is Disinvestment?

उत्तर – विनिवेश से आशय सार्वजनिक उपक्रमों के अंश जनता में बेचना है। इसका मख्य उद्देश्य सार्वजनिक उपक्रमों के संसाधन जुटाना तथा सार्वजनिक उपक्रमों के प्रबन्धम निजी व्यक्तियों की भागीदारी सुनिश्चित करना है।

प्रश्न –  अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष की असफलताओं को लिखिए। 

Give failures of IMF

उत्तर – (i) कोटे का निर्धारण वैज्ञानिक आधार पर नहीं (i) सीमित कायम (iii) विनिमय नियन्त्रण को हटाने में असमर्थता, (iv) विनिमय दरों में अस्थिरता, (v) का नियम विकासशील देशों के लिए अनुपयुक्त, (vi) डॉलर समस्या हल करने में अ (vii) अमेरिकी प्रभाव की अधिकता, (viii) भेदभावपूर्ण व्यवहार, (ix) अन्य आलाचन सीमित कार्यक्षेत्र के रता, (v) कोष के आ करने में असमर्थ पनि (ix) अन्य आलोचनाएँ।

प्रश्न – भुगतान-सन्तुलन की प्रमुख विशेषताएँ समझाइये। 

Give characteristics of balance of payment.

उत्तर – (i) भुगतान – सन्तुलन एक निश्चित समयावधि के लिए ज्ञात किया जाता है। (ii) भुगतान-सन्तुलन के अन्तर्गत दृश्य तथा अदृश्य दोनों मदों के आयात-निर्यात को सम्मिलित किया जाता है। (iii) यह एक देश की कुल विदेशी विनिमय प्राप्तियों एवं उनके भुगतानों के मध्य सम्बन्ध को दर्शाता है। (iv) भुगतान-सन्तुलन एक विवरण के रूप में प्रदर्शित किया जाता है।

प्रश्न – राजकोषीय नीति क्या है

What is Fiscal Policy ?

उत्तर – राजकोषीय नीति नियन्त्रण का प्रत्यक्ष यन्त्र है। यह आर्थिक नीति का वह भाग है जहाँ करारोपण, लोक व्यय तथा लोक ऋण में परिवर्तन के माध्यम से वांछित आर्थिक उद्देश्यों को प्राप्त करने की कोशिश की जाती है।

प्रश्न  – प्रतिकूल व्यापार सन्तुलन को सुधारने के उपायों की विस्तृत कीजिए। 

Explain the steps to improve unfavourable trade balance.

उत्तर – (i) भुगतान सन्तुलन को अनुकूल बनाना, (ii) आयात नियन्त्रण, (iii) निर्यात संवर्द्धन, (iv) निर्यात साख-सुविधाओं में वृद्धि, (v) अवमूल्यन, (vi) राशिपातन की नीति को अपनाकर।

प्रश्न – अवमूल्यन से आपका क्या आशय है

What do you mean by devaluation.

उत्तर – अवमूल्यन दो मुद्राओं की स्थिर विनिमय दर में गिरावट को कहा जाता है। जब दो करेन्सियों के सापेक्ष मूल्य को सरकार द्वारा स्वीकृत स्तर पर स्थिर कर दिया जाता है तथा एक करेन्सी के मूल्य को इस स्वीकृत स्थिर स्तर पर निर्धारित मूल्य से कम कर दिया जाता है, तो उसे अवमूल्यन कहा जाता है।

प्रश्न – हीनार्थ प्रबन्धन पर टिप्पणी लिखिए। 

Write a short note on Deficit Financing.

उत्तर – हीनार्थ प्रबन्धन – युद्धकाल में या नियोजन युग में प्राय: सरकार का व्यय बहुत अधिक बढ़ जाता है, उसकी पूर्ति कर लगाकर या ऋण लेकर नहीं की जा सकती। अतः सरकार के बजट में घाटा रहता है जिसे आवश्यक मात्रा में नोट छापकर पूरा किया जाता है। इसे आर्थिक भाषा में हीनार्थ प्रबन्धन (Deficit Financing) कहा जाता है आर इसक परिणामस्वरूप बाजार में नोटों की मात्रा में वृद्धि हो जाती है जिससे मुद्रा-स्फीति का स्थिति उत्पन्न हो जाती है।

प्रश्न – औद्योगिक रुग्णता से क्या आशय है

औद्योगिक रुग्णता के बाहरीर कारण है?

What do you mean by industrial sickness ? 

What are main external causes of industrial sickness ?

उत्तर – औद्योगिक रुग्णता से आशय उस स्थिति से है जब औद्योगिक इकाइयों को लाभ के। स्थान पर निरन्तर हानि हो रही हो, चल सम्पत्तियों पर चल दायित्वों का निरन्तर आधिक्य बना रहता हो एवं कुल सम्पत्तियों का विशुद्ध मूल्यांकन कुल देनदारियों से निरन्तर कम रहता हो।

औद्योगिक रुग्णता के बाहरी कारण इस प्रकार हैं

(i) निरन्तर शक्ति संकट, (ii) आर्थिक शिथिलता एवं मन्दी, (iii) सरकारी नीतियों में परिवर्तन, (iv) क्रान्तिकारी तकनीकी परिवर्तन तथा (v) अन्तर्राष्ट्रीय बाजारों में परिवर्तन।

प्रश्न –  भारत की राजकोषीय नीति के प्रमुख दोष क्या हैंसमझाइएँ।

What are the main drawbacks of Indian Fiscal Policy?

उत्तर – (i) विदेशी ऋणों पर अत्यधिक निर्भरता ने हमारी आर्थिक विकास की कैलं योजनाओं में अनिश्चितता पैदा कर दी है। (ii) सरकारी विभागों में व्याप्त अकुशलता और वाल भ्रष्टाचार के कारण सार्वजनिक आय का काफी बड़ी मात्रा में अपव्यय किया जा रहा है। (iii) भारत में राष्ट्रीय आय का कम भाग ही कर के रूप में लिया जाता है। (iv) भारतीय कर प्रणाली अव्यवस्थित है।

प्रश्न – SWOT को समझाइए। 

Explain SWOT.

उत्तर – स्वॉट शब्द का निर्माण अंग्रेजी भाषा के चार शब्दों से हुआ है, जिनका अर्थ है

S= Strengths (शक्तियाँ, क्षमताएँ, ताकतें) 

W= Weaknesses (दुर्बलताएँ, कमजोरियाँ) 

0 = Opportunities (अवसर, मौका)

T = Threats (धमकी, समस्याएँ, चुनौतियाँ) 

प्रश्न –भारत की दरिद्रता का उपाय अधिक रोजगार है।विस्तृत रूप से समझाइएँ।

 “More employment is the remedy to India’s Poverty”, Discuss.

उत्तर – भारतीय विचारकों का ध्यान उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध से ही निर्धनता की आर गया है। दादाभाई नौरोजी ने अपनी पुस्तक ‘Poverty and Un-British Rule in India सन् 1901 ई० में प्रकाशित की। इस पुस्तक में उन्होंने अन्य विषयों के अतिरिक्त भारता निर्धनता का भी विश्लेषण किया था। उनके अनुमान के अनुसार, भारत की प्रति व्याक् ₹ 20 थी, जबकि प्रति व्यक्ति जीवन-निर्वाह (subsistence) की लागत ₹ 34 था। २ प्रकार, अधिकांश भारतीय निर्धन थे। इसका प्रमुख कारण था भारतीय कृषि, व्यापार, उद्योग वाणिज्य का ब्रिटिश सरकार द्वारा दोहन। इस समय अधिकांश भारतीय या तो बेरोजगार थे या अल्प रोजगार में लगे हुए थे।

रोकने से ही निर्धनता की समस्या का समाधान हो सकता था। सन् 1947 ई० में भारत को आजादी मिलने के पश्चात् निर्धनता का यह कारण समाप्त हो गया। इसलिए निर्धनता उन्मूलन के अन्य उपायों की तलाश का कार्य शुरू हुआ।

प्रश्न – गरीबी की रेखा से आपका क्या तात्पर्य है

What do you mean by Poverty line ?

उत्तर – गरीबी रेखा – न्यूनतम आय का वह स्तर जो औसत आकार के परिवार के जीवन-निर्वाह के लिए आवश्यक वस्तुओं को खरीदने की क्षमता रखता है। गरीबी रेखा के रूप में जाना जाता है। 

भारत में गरीबी रेखा का अभिप्राय (Meaning of Poverty Line in India)

आयोग द्वारा गठित विशेषज्ञ दल Task Force of Minimum Needs and Effective Consumption Demand’ के अनुसार, “ग्रामीण क्षेत्र में प्रति व्यक्ति 2,400 कैलोरी प्रतिदिन तथा शहरी क्षेत्र में प्रति व्यक्ति 2,100 कैलोरी प्रतिदिन का पोषण प्राप्त न करने वाला व्यक्ति गरीबी रेखा के नीचे माना जाता है।”

प्रश्न – GATT का पूरा नाम लिखिए। 

Write full name of GATT.

उत्तर – GATT शब्द का निर्माण अंग्रेजी भाषा के चार शब्दों से मिलकर हुआ है, जिसका विस्तृत रूप इस प्रकार है

G = General 

A = Agreement 

T= Tariff 

T = Trade GATT का पूरा नाम General Agreement on Tariff and Trade है। 

प्रश्नका अदृश्य बेरोजगारी क्या है

What is disguished unemployment ?

उत्तर – जब श्रमिक की सीमान्त उत्पादकता शून्य (0) अथवा ऋणात्मक (-ve) होती है तो ऐसी दशा अदृश्य बेरोजगारी की दशा कहलाती है; उदाहरण-यदि किसी कार्य को 10 व्यक्ति सफलतापूर्वक कर सकते हों, परन्तु वहाँ 15 व्यक्ति काम में संलग्न हों तो स्पष्ट है कि वहाँ 5 व्यक्ति किसी प्रकार का योगदान नहीं दे रहे हैं। यदि इन्हें हटा भी दिया जाए तो कुल उत्पादन में कमी नहीं आएगी। अन्य शब्दों में, इन 5 व्यक्तियों की सीमान्त उत्पादकता शून्य है। यही अदृश्य या प्रच्छन्न बेरोजगारी है। इस प्रकार का अनुमान लगाना बहुत कठिन कार्य है। भारत का कृषि उद्योग इसी अदृश्य बेरोजगारी से पीड़ित है।

प्रश्न  – औद्योगिक लाइसेन्स प्राप्त करने की अनिवार्यता बताइए। 

Explain the essentiality of obtaining industrial licence.

उत्तर – केन्द्रीय सरकार के नियमों के अनुसार निम्नलिखित दशाओं में लाइसेन्स प्राप्त करना अनिवार्य होगा

(i) नए औद्योगिक उपक्रमों की स्थापना के लिए, (1) नई वस्तुओं के उत्पादन के लिए, (iii) इस अधिनियम के लागू होने से पूर्व के उपक्रमों में व्यवसाय चालू रखने के लिए (iv) लाइसेन्स निरस्तीकरण के बाद व्यवसाय चालू रखने के लिए, (v) पंजीकृत स्थान में परिवर्तन के लिए, (vi) विद्यमान उपक्रमों की क्षमता में पर्याप्त विस्तार के लिए, (vii) व्यवसाय को चालू रखने के लिए।

प्रश्न – WTO क्या है

What is WTO?

उत्तर – WTO सरकार के विभिन्न देशों के बीच अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार को प्रोत्साहित करने तथा सीमा शुल्क के बन्धनों को कम करने के लिए किया गया आवश्यक सिद्धान्तों तथा नियमों से सम्बन्धित बहुपक्षीय समझौता और बन्धनमुक्त संगठन है। यह एक बहुपक्षीय सन्धि है जो अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार के नियमों का निर्धारण करती है।

प्रश्न – अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के कार्य लिखिए।

Write the main functions of IMF.

उत्तर – (i) सांख्यिकीय सूचनाओं का संकलन एवं प्रकाशन, (i) अन्य अन्तर्राष्ट्रीय. संगठनों से सम्पर्क, (iii) मुद्रा कोष तथा विनिमय नियन्त्रण, (iv) समता दरों का निर्धारण, (v) मुद्रा कोष ऋण-व्यवस्था, (vi) ऋणों पर शुल्क, (vii) मुद्रा कोष की आय का वितरण, (viii) सदस्यों पर प्रतिबन्ध, (ix) मुद्रा कोष एवं अन्य मुद्राएँ, (x) कोष के साधनों की तरलता, (xi) द्वितीय संशोधन के लागू होने के पूर्व समता दरों का निर्धारण एवं परिवर्तन।

प्रश्न – विश्व बैंक के प्रमुख कार्य बताइए। 

Explain the main functions of World Bank. 

उत्तर – विश्व बैंक के प्रमुख कार्य निम्नलिखित हैं-

(i) सदस्य राष्ट्रों को ऋण देना, (ii) सहायता क्लबों की स्थापना, (iii) अन्तर्राष्ट्रीय वित संस्थाओं की स्थापना में सहयोग करना, (iv) आर्थिक अनुसन्धान एवं अध्ययन, (v) गारण्टी देना, (vi) तकनीकी सहायता, (vii) सहायता कार्यक्रमों में समन्वय, (viii) प्रशिक्षण सुविधाएं (ix) अन्य संस्थाओं से सदस्य राष्ट्रों को ऋण दिलाने में गारण्टी देना. (x) विभिन्न राष्ट्रों के मध्य विवादों में मध्यस्थता करना, (xi) गैर-सरकारी संगठनों की सहायता करना।

प्रश्न – वर्तमान पंचवर्षीय योजना कौन-सी है?

Which is the current five year plan ?

उत्तर – स्वतन्त्र भारत में पंचवर्षीय योजनाओं के माध्यम से निरन्तर विकास सम्भव सका है। वर्तमान समय में बारहवीं पंचवर्षीय योजना चल रही है। यह बारहवीं पंचवर्षीय याजा 2012 से 2017 तक है। इस प्रकार बारहवीं पंचवर्षीय योजना 1 अप्रैल, 2012 से प्रारम्भ हुई हैं।

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