B.Com 2nd Year Basic Concepts Long Notes In Hindi

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विस्तृत उत्तरीय प्रश्न –

प्रश्न 1 – मानी गई आयें क्या हैं?

What are Deemed Incomes? 

उत्तर – मानी गई आयें (Deemed Incomes)

कुछ राशियों को आयें न होते हुए भी करदाता की आय माना जाता है और उसकी कुल, आय में सम्मिलित किया जाता है।

वास्तव में, ऐसी राशि या विनियोग करदाता की आय होते हैं, परन्तु कर चोरी के उद्देश्य से वह उन्हें दूसरों के नाम से जमा करता है या उनका कम मूल्य बताता है। अत: ऐसी राशियोय को करदाता की आय मानने का उद्देश्य कर चोरी को रोकना है।

निम्नलिखित आयें मानी जाती हैं

1. नकद साख (Cash Credits)-यदि करदाता की गत वर्ष की पुस्तकों में कोई स् ऐसी रकम जमा हो रही है जिसकी प्रकृति एवं स्रोत के बारे में करदाता कोई सन्तोषजनक उत्तर न दे सके अथवा उसका उत्तर कर-निर्धारण अधिकारी की सम्मति में सन्तोषजनक न हो तो

ऐसी जमा की हुई रकम को करदाता की गत वर्ष की कुल आय में सम्मिलित करके उस पर आयकर लगाया जा सकता है।

निम्नलिखित भी धारा 68 के अन्तर्गत आय मानी जाएँगी

यदि ऐसी कम्पनी जिसमें जनता का सारवान हित नहीं है, अपनी पस्तकों में शेयर आवेदन राशि (application money), अंश पूँजी, शेयर प्रीमियम आदि जमा करती है, तो इसे अस्पष्टीकृत (unexplained) माना जाएगा जब तक) 

(i) निवासी व्यक्ति जिसके नाम राशि जमा की गई है अपनी राशि का स्रोत एवं प्रकृति नक नहीं बताता,

(ii) कर-निर्धारण अधिकारी की सम्मति में उसका स्पष्टीकरण सन्तोषजनक है।

अपवाद (Exception)–यदि राशि जोखिम पूँजी कम्पनी अथवा जोखिम पूँजी निधि के नाम लिखी गई है, तो उपर्युक्त प्रावधान लागू नहीं होगा।

2. पुस्तकों में बिना लिखे तथा बिना स्पष्ट किए गए विनियोग (Unrecorded and Unexplained Investments)-यदि गत वर्ष में करदाता ने कोई ऐसे विनियोग किए हैं, जिन्हें उसने अपने बहीखाते में नहीं लिखा है तथा करदाता उन विनियोगों की प्रकृति एवं

स्रोत का कोई स्पष्टीकरण नहीं देता है या इसका स्पष्टीकरण कर-निर्धारण अधिकारी की ९ सम्मति में सन्तोषजनक नहीं है तो ऐसे विनियोग का मूल्य करदाता की उस वर्ष की आय मान

ली जाती है जिस वर्ष में ये विनियोग किए गए थे और उसे करदाता की कुल आय में सम्मिलित ३चा करके उस पर आयकर लगाया जाता है।

3. पुस्तकों में बिना लिखा तथा बिना स्पष्ट किया गया धन आदि (Unrecorded and Unexplained Money etc.)-यदि किसी वित्तीय वर्ष में करदाता के पास ऐसा धन, जेवर, सोना, चाँदी या अन्य कोई कीमती वस्तु पायी जाती है जिसका उल्लेख उसने अपने बहीखाते में नहीं किया है तथा करदाता उसके स्रोत एवं प्रकृति का कोई सन्तोषजनक उत्तर नहीं देता है अथवा कर-निर्धारण अधिकारी की सम्मति में स्पष्टीकरण सन्तोषजनक नहीं है तो ऐसे धन अथवा जेवर का मूल्य करदाता की उस वर्ष की आय मान ली जाएगी जिस वर्ष में यह उसके पास पायी जाती है तथा उसे करदाता की कुल आय में सम्मिलित करके उस पर आयकर लगाया जाता है।

4. विनियोग आदि की रकम जो बहीखाते में पूर्णतया नहीं दिखायी गई है (Amount of Investments etc. not fully disclosed in books of account) – यदि किसी वित्तीय वर्ष में करदाता ने कोई विनियोग किए हैं अथवा वह किसी सोना चाँदी जेवर या अन्य किसी कीमती वस्तु का स्वामी पाया जाता है और कर निर्धारण अधिकारी को यह पता चलता है कि इन विनियोगों में जो रकम लगी हुई है अथवा इस सोना, चाँदी. जेवर या अन्य कीमती वस्तु को प्राप्त करने में जो व्यय किया गया है, वह करदाता द्वारा अपने बहीखाते में इस मद में दिखायी गई रकम से अधिक है तथा करदाता इस आधिक्य का सन्तोषजनक काई स्पष्टीकरण नहीं दे पाया है या उसका स्पष्टीकरण सन्तोषजनक नहीं है तो वह अधिकार त्तर करदाता की उस वित्तीय वर्ष की आय मानी जा सकती है जिस वर्ष में वह विनियोग किया तो गया है।

5. न स्पष्ट किया गया व्यय (Unexplained Expenditure)-जब किसी स्पष्ट न किए गए व्यय को करदाता की आय मान लिया जाता है तो इस व्यय को आय के किसी भी शीर्षक से नहीं घटाया जाएगा।

6. हुण्डी पर लिए हुए ऋण अथवा उनका भुगतान (Amount Borrowed or Repaid or Hundi)-जब ऐसा धन हुण्डी पर ऋण लेते समय करदाता की आय में सम्मिलित कर लिया जाता है, तो उसका भुगतान करते समय वह धन उसकी आय में सम्मिलित

नहीं किया जाएगा।

प्रश्न 2 – ‘कृषि आयका क्या अर्थ है? ये कितने प्रकार की होती हैं? किन्हीं दस आय की व्याख्या कीजिए जो जमीन से सम्बन्धित हों, किन्तु कृषि आय न हों।

What is the meaning of Agricultural Income ? What are its types ? Explain any ten incomes which are related to land but not agricultural income.  

उत्तर – कृषि आय का अर्थ

(Meaning of Agricultural Income) 

भारत में कृषि आय प्रारम्भ से ही आयकर से मुक्त रही है। इसका औचित्य यह है कि कृषि भूमि पर मालगुजारी (Land Revenue) लगती है और संविधान के अन्तर्गत कृषि राज्य विषय होने के कारण राज्य सरकारें ही कृषि आय पर कर लगा सकती हैं। कुछ राज्य सरकारों ने इस प्रकार की आय पर कर लगाए भी हैं। कर-निर्धारण वर्ष 1973-74 तक कृषि आय पूर्णतया कर-मुक्त थी, परन्तु कर-निर्धारण वर्ष 1974-75 से आयकर अधिनियम में एक महत्त्वपूर्ण संशोधन के अनुसार कृषि आय को करदाता की अन्य गैर-कृषि आय पर लगने

वाली कर की दरों को निर्धारित करने के लिए उसकी कुल आय में जोड़ा तो जाता है, लेकिन कृषि आय पर आयकर नहीं लगाया जाता। इसका स्पष्टीकरण ‘कर प्रयोजन के लिए कृषि आय का एकीकरण’ शीर्षक में दिया गया है। यद्यपि अब भारतीय आयकर अधिनियम की धारा 10 (1) के अन्तर्गत कृषि आय, आयकर से मुक्त है, लेकिन करदाता की गैर-कृषि आय में कृषि आय जोड़ देने से करदाता की आयकर की औसत दर बढ़ जाती है।

कृषि आय के प्रकार

(Kinds of Agricultural Income) 

आयकर अधिनियम की धारा 2 (1-A) के अनुसार कृषि आय के प्रकार से आ निम्नवर्णित आय से है

(1) ऐसी भूमि से प्राप्त कोई किराया या आय जो भारत में स्थित है और कृषि प्र के लिए प्रयोग में लायी जाती है।

(2) भूमि से प्राप्त हुई आय जिसका प्रयोग कृषि प्रयोजनों के लिए किया जाता हो और निम्नलिखित क्रिया करने से उत्पन्न हुई हो

(अ) कृषि क्रिया अर्थात् खेती करने से अथवा

(ब) किसी ऐसी क्रिया करने से हुई आय जिसे कृषक द्वारा उगायी गई उपज अथवा किराया प्राप्तकर्ता द्वारा प्राप्त की गई उपज को बिक्री योग्य बनाने में उसके द्वारा आमतौर से की जाती हो, अथवा

(स) कृषक या वस्तु रूप में किराये के प्राप्तकर्ता द्वारा उगायी या प्राप्त की गई किसी ऐसी उपज के विक्रय से आय जिसके सम्बन्ध में उपर्युक्त (ब) में वर्णित क्रिया से भिन्न कोई क्रिया नहीं की गई हो।

(3) किसी ऐसे मकान से प्राप्त आय जो कृषक या भूमि के लगान के प्राप्तकर्ता के अधिकार एवं स्वामित्व में हो तथा जो ऐसी भूमि पर स्थित हो जिसकी उपज के सम्बन्ध में उपर्युक्त उपधारा (2) के अनुच्छेद (ब) तथा (स) में वर्णित क्रियाएँ सम्पन्न की जाती हों, परन्तु इस सम्बन्ध में निम्नलिखित शर्ते पूरी होनी आवश्यक हैं

(अ) यह मकान उस भूमि पर या उसके निकट स्थित हो और यह मकान कृषक अथवा लगान प्राप्त करने वाले के रहने के लिए अथवा भण्डार-गृह अथवा भूमि के सम्बन्ध में बाहरी मकान के रूप में प्रयोग करने के लिए हो,

(ब) उस भूमि पर भारत में लगान लगता हो अथवा कोई स्थानीय कर लगता हो, जो सरकारी अधिकारियों द्वारा निर्धारित तथा वसूल किया जाता हो। यदि उस भूमि पर लगान अथवा स्थानीय कर नहीं लगता है तो वह निम्नलिखित क्षेत्र में स्थित होनी चाहिए

(i) 10,000 से कम आबादी वाले नगरपालिका अथवा छावनी बोर्ड के क्षेत्र में, अथवा

(ii) नगरपालिका या छावनी बोर्ड की स्थानीय सीमाओं से 8 किलोमीटर से अधिक दूर के क्षेत्र में, अर्थात् वह भूमि नगरीय क्षेत्र (Urban Area) से बाहर होनी चाहिए। केन्द्रीय सरकार एक अधिसूचना (Notification) द्वारा नगरपालिका या छावनी बोर्ड की सीमाओं को इस आशय के लिए 8 किलोमीटर से अधिक की सीमा निश्चित कर सकती है। यदि इस सम्बन्ध में सरकार द्वारा कोई ऐसी अधिसूचना जारी की गई हो तो वह भूमि उस निर्धारित सीमा से बाहर स्थित होनी चाहिए।

कृषि आय के लक्षण या विशेषताएँ

(Characteristics of Agricultural Income) 

कृषि आय के प्रमुख लक्षण निम्नलिखित हैं-

(1) ऐसी आय जो भूमि से प्राप्त होती हो। 

(2) भूमि कृषि-कार्यों के लिए प्रयोग में लायी जाती हो। 

(3) कृषि आय के लिए यह आवश्यक है कि भूमि भारत में ही स्थित हो। 

(4) भूमि म करदाता का हित हो।

कर-प्रयोजन के लिए कृषि आय का एकीकरण 

(Integration of Agricultural Income for Tax Purpose)

कर-प्रयोजन के लिए कृषि आय का एकीकरण व्यक्तियों, हिन्दू अविभाजित परिवारों, अपंजीकृत फर्मों एवं व्यक्तियों के समुदाय पर लागू होता है। करदाता की गैर-कृषि आय में कृषि आय का एकीकरण तब ही किया जाता है, जबकि करदाता की गैर-कृषि आय रू 2,50,000 तथा वरिष्ठ नागरिक रू. 3,00,000 अतिविशिष्ट नागरिक ₹ 5,00,000 (जो कि कर-निर्धारण वर्ष 2014-15 के लिए छुट की अधिकतम सीमा है) से अधिक हो और शुद्ध कृषि आय रू. 5,000 से अधिक हो।

उदाहरण–यदि किसी करदाता की गैर-कृषि आय रू. 15,000 और कृषि आय रू. 20,000 हो तो उसे कोई कर नहीं देना पड़ेगा क्योंकि उसकी गैर-कृषि आय रू. 2.00,000 से कम है। यदि किसी करदाता की गैर-कृषि आय रू. 55,000 है और कृषि आय रू. 4.500 हो तो भी कृषि आय को गैर-कृषि आय में नहीं जोड़ा जाएगा क्योंकि कृषि आय रू. 5,000 से कम है परन्तु यदि किसी करदाता की गैर-कृषि आय रू. 1,95,000 है और कृषि आय रू. 8,000 हो तो कृषि आय के रू. 8,000 कर-निर्धारण के लिए गैर-कृषि आय रू. 1,95,000 में जोड़ दिए जाएंगे।

कृषि आय के एकीकरण के सन्दर्भ में आयकर की गणना की प्रक्रिया निम्नलिखित है

(1) गैर-कृषि आय में शुद्ध कृषि आय को जोड़कर कुल राशि पर चालू दर के हिसाब से आयकर की गणना कीजिए।

(2) रू. 1,60,000 में शुद्ध कृषि आय को जोड़कर कुल राशि पर चालू दर के हिसाब से आयकर की गणना कीजिए।

(3) क्रम संख्या (1) में गणना की हुई आयकर की राशि में से क्रम संख्या (2) में गणना की हुई आयकर की राशि घटाकर करदाता की आयकर के सम्बन्ध में कुल देनदारी ज्ञात हो जाएगी।

जमीन से सम्बन्धित दस गैर-कृषि आय 

(Ten Incomes which are related to Land but not Agricultural Income)

जमीन से सम्बन्धित दस गैर-कृषि आय निम्न प्रकार हैं-

(1) हाट बाजारों से होने वाली आय। 

(2) पत्थरों की खानों से होने वाली आय। 

(3) खानों की रॉयल्टी से आय।

(4) कृषि उपज को संगृहीत करने के लिए भण्डार के रूप में प्रयुक्त भूमि से आय। 

(5) सिंचाई के लिए पानी देने से आय। 

(6) स्वयं उग आयी घास, पेड़ अथवा बाँस से आय। 

(7) मिट्टी की आय जो ईंट बनाने के लिए बेच दी गई है। 

(8) मछली क्षेत्रों से होने वाली आय। 

(9) खड़ी फसल के क्रेता को आय। 

(10) डेरी फार्म, मुर्गीपालन आदि से आय।

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