B.Com 2nd Year Industrial Disputes Act Long Notes Question Answer

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विस्तृत उत्तरीय प्रश्न 

प्रश्न 1- हड़ताल तथा तालाबन्दी में अन्तर कीजिए। औद्योगिक विकार अधिनियम, 1947 के अन्तर्गत हड़ताल तथा तालाबन्दियों पर क्या प्रतिबन्ध लाल गए हैं?

Distinguish between a Strike and a Lockout. What restriction have been imposed on strike and lock-out under the Industrial Disputes Act, 1947? 

उत्तर – हड़ताल (Strike) 

औद्योगिक संघर्ष अधिनियम की धारा 2 (q) के अनुसार, हड़ताल का अभिप्राय किसी उद्योग में कार्य करने वाले जिन्हें काम करने के लिए नियुक्त किया गया हो या काम के लिए आमंत्रित किया गया हो दोबारा काम पर न आने से है अथवा साधारणत: काम करने से पना करने से है। इस प्रकार हड़ताल का अभिप्राय-(a) सम्पूर्ण रूप से काम को बन्द करना (b) उद्योग में नियुक्त किए गए कार्य करने वालों द्वारा अथवा आमंत्रित व्यक्तियों के समूह द्वारा कार्य करने के लिए मना करना (c) सामान्य व्यक्तियों की समझ के अनुसार कार्य के लिए मना करने से है। हड़ताल की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

(i) केवल उपस्थित रहना हड़ताल नहीं है, (ii) सभी व्यक्तियों द्वारा निरन्तर कार्य पर न आना हड़ताल की कसौटी होगी, (iii) जब तक हड़ताल अवैध न हो नियोक्ता और कर्मचारी का सम्बन्ध समाप्त नहीं होता है, (iv) हड़ताल उचित अथवा अनुचित भी हो सकती है, हड़ताल को उस समय तक अनुचित नहीं माना जाता है जब तक कि इसके कारण पूर्ण रूप से अवाह्यनीय (Unsustainable) न हो, (v) अनुचित हड़ताल आवश्यक रूप से अवैध हड़ताल नहीं माना जाएगी, (vi) नियोक्ता के अधिकार का खण्डन करके आधा घण्टे भी श्रमिकों का कार्य पर न जाना हड़ताल माना जाएगा, (vii) प्रदर्शन में भाग लेने के लिए 15 मिनट तक काम पर न जाना हड़ताल नहीं मानी जाएगी, (viii) श्रमिकों को हड़ताल के समय केवल एकत्रित हो जाना हड़ताल नहीं होगी, (ix) समय का अधिक महत्त्व नहीं, हड़ताल के लिए कार्य न करने का प्रकृति महत्त्वपूर्ण है, (x) हड़ताल का रूप आवश्यक रूप से श्रम-संघर्ष होना ही नहीं, (xi) हड़ताल के लिए उद्देश्य महत्त्वपूर्ण नहीं, (xii) हड़ताल करना एक अधिकार नहीं तथा (xiii) धीरे काम करना हड़ताल नहीं मानी जाएगी।

तालाबन्दी (Lock-out) 

हड़ताल स हा सम्बन्धित तालाबन्दी है। हड़ताल के उपरान्त तालाबन्दी एक आवश्यक तथ्य है। धारा 2 (1) के अनुसार तालाबन्दी का अभिप्राय कार्य करने के स्थान को बन्द करना कार्य को स्थगित करना (Suspension of work) अथवा किसी नियोक्ता द्वारा नियुक्तक हए व्यक्तियों को काम देने के लिए मना करना है। तालाबन्दी में तालाबन्दी का उ६ महत्त्वपर्ण नहीं है, इसका उद्देश्य कार्य को रोक देना तथा श्रमिकों को कार्य के लिए मना करना है। तालाबन्दी उचित अथवा अनुचित, वैधानिक अथवा अवैधानिक हो सकती है। इसकी मुख्य विशेषताएँ निम्नवत् हैं

(i) थोड़े समय के लिए भी उद्योग को बन्द करना तालाबन्दी होगी लेकिन व्यापारिक कारणों से थोड़े दिन बन्द करना तालाबन्दी नहीं होगी, (ii) यदि सुरक्षा की दृष्टि से उद्योग बन्द किया गया है तो वह तालाबन्दी नहीं होगी, (iii) अवैधानिक तालाबन्दी की दशा में श्रमिकों को उद्योग तक आना आवश्यक नहीं है, (iv) यह आवश्यक नहीं है कि तालाबन्दी के सम्बन्ध में स्पष्ट रूप से न्यायालय द्वारा सूचना (Declaration) हो, (v) तालाबन्दी में स्पष्ट रूप से कार्य देने के लिए मना तथा नियुक्ति करने के लिए मना किया जाता है, (vi) केवल कुछ ही श्रमिकों का कार्य से निरस्त करना तालाबन्दी नहीं है, (vii) श्रमिकों की छंटनी करना तालाबन्दी नहीं है, (vii) उद्योग का हस्तान्तरण तालाबन्दी नहीं है, (ix) श्रमिकों को समय की नियमितता तालाबन्दी नहीं है, (x) कुछ समय के लिए कार्य बन्द करना तालाबन्दी नहीं है, (xi) कुछ समय के लिए कार्य स्थगित करना तालाबन्दी नहीं है, (xii) कार्य को समाप्त (Discontinuance) अथवा बन्द (Closure) करना तालाबन्दी नहीं है।

हड़ताल और तालाबन्दी के सम्बन्ध में प्रावधान धारा 22 से 25 तक उल्लिखित हैं। धारा 22 में हड़ताल एवं तालाबन्दी पर रोक (Prohibits) लगती है। धारा 23 में हड़ताल एवं तालाबन्दी को सामान्य रूप से रोकने के तरीके बताए गए हैं, धारा 24 में अवैधानिक हड़ताल और तालाबन्दी के सम्बन्ध में प्रावधान है तथा धारा 25 में अवैधानिक हड़ताल तथा तालाबन्दी को आर्थिक सहायता प्रदान करने में रोक लगती है।

अवैधानिक हड़ताल तथा तालाबन्दी को आर्थिक सहायता प्रदान करने में रोक लगती है।

(Illegal Strikes and Lockouts) 

अवैध हड़ताल एवं तालाबन्दियों के सम्बन्ध में धारा 24 में प्रावधान है जिसके अनुसार, निम्न हड़ताल एवं तालाबन्दी स्पष्ट रूप से अवैध मानी गई हैं

(i) जब ये धारा 22 या धारा 23 के विपरीत हो, धारा 22 और धारा 23 हड़ताल और तालाबन्दियों को रोकने के लिए हैं, अथवा

(ii) जब ये धारा 10 (3) या धारा 10-A-iv (a) के विपरीत हो। इस धारा में औद्योगिक संघर्षों को समाधानकर्ता, समाधानकर्त्ता-गण, श्रम न्यायालय तथा ट्रिब्यूनल आदि को सौंपने की व्यवस्था है।

परन्तु धारा 24 (2) के अनुसार जब औद्योगिक संघर्ष के फलस्वरूप हड़ताल और तालाबन्दी हुई हो और उस संघर्ष को समाधानकर्ता-गण, श्रम न्यायालय, ट्रिब्यूनल अथवा राष्ट्रीय ट्रिब्यूनल को सौंप दिया गया हो तो इस प्रकार की हड़ताल एवं तालाबन्दी की निरन्तरता अवैध नहीं होगी तथा धारा 24 (3) के अनुसार, यदि तालाबन्दी अवैध हड़ताल के कारण अथवा हड़ताल अवैध तालाबन्दी के कारण हुई है तो वह हड़ताल एवं तालाबन्दी अवैध नहीं मानी जाएगी।

हड़ताल एवं तालाबन्दी को रोकने के उपाय

(Steps to Prohibit Strikes and Lockouts) 

हड़ताल एवं तालाबन्दी को रोकने के लिए धारा 22, धारा 23 तथा धारा निम्नलिखित प्रावधान हैं

I. लोकोपयोगी उद्योग की दशा में 

(For Public Utility Services)

1. हड़ताल के सम्बन्ध में प्रतिबन्ध (Prohibition against Strike)-धारा 22 (1) के अनुसार यदि कोई व्यक्ति जो लोकोपयोगी उद्योगों में कार्य कर रहा है, वह जब तक इस प्रकार की सूचना न दे हड़ताल नहीं करेगा–(i) हड़ताल से कम-से-कम 6 सप्ताह पूर्व के समय के अन्तर्गत हड़ताल का नोटिस दे, या (ii) इस प्रकार के नोटिस देने से कम-से-कम 14 दिन तक हड़ताल नहीं कर सकता, या (iii) जब तक का नोटिस का समय दिया है वह समाप्त न हो जाए, या (iv) जब समाधानकर्ता इस मामले में जाँच कर रहा है तो जाँच के बाद कम-से-कम 7 दिन समाप्त न हो गए हों।

2. तालाबन्दी के सम्बन्ध में प्रतिबन्ध (Prohibition against Lockout)-धारा 22 (2) के अनुसार यदि कोई नियोक्ता जनोपयोगी उद्योग चला रहा है, तो जब तक वह इस प्रकार की सूचना न दे दे तालाबन्दी नहीं करेगा-(i) तालाबन्दी से कम-से-कम 6 सप्ताह पूर्व तालाबन्दी को नोटिस दे, (ii) इस प्रकार का नोटिस देने से कम-से-कम 14 दिन तक तालाबन्दी नहीं कर पाएगा, (iii) जब तक का नोटिस में समय दिया गया है वह समाप्त न हो जाए, (iv) यदि समाधानकर्ता इस मामले की जाँच कर रहे हैं तो जाँच के बाद कम-से-कम 7 दिन समाप्त न हो गए हों।

परन्तु उपर्युक्त दोनों नियमों [ धारा 22 (1) तथा धारा 22 (2) में उल्लिखित अपवाद भी हैं। जब स्वत: ही हड़ताल या तालाबन्दी पूर्व से ही चल रही है तो इस प्रकार के नोटिस की कोई आवश्यकता नहीं है, लेकिन उद्योगपति उस तिथि के. जिस दिन हड़ताल या तालाबन्दी घोषित की गई है, सम्बन्ध में सरकार को लिखित सूचना दे देगा।

3. नोटिस के पक्षकार (Parties of Notice)-धारा 22 (4) तथा धारा 22(5) * अनुसार नोटिस उस व्यक्ति अथवा व्यक्तियों द्वारा उस व्यक्ति अथवा व्यक्तियों को दिया जाएगा जो नोटिस प्राप्त करने के अधिकारी हैं तथा उन्हें अधिकृत विधि द्वारा नोटिस दिया जा सकेगा।

4. सरकार को सूचना (Report to the Government)-धारा 22 (6) अनुसार यदि नियोक्ता अथवा श्रमिकों को इस प्रकार का नोटिस मिलता है तो उसकी सूचना 5 दिन के अन्दर सरकार को देनी होगी तथा इस सचना में

गा तथा इस सूचना में यह उल्लेख करना होगा कि अमुक दिन कितने नोटिस प्राप्त हुए या दिए गए।

II. सामान्य उद्योग की दशा में 

(For General Industrial Establishments)

धारा 23 के अनुसार, कोई श्रमिक जो किसी औद्योगिक संस्थान में कार्य कर रहा है या कोई नियोक्ता जो औद्योगिक संस्थान का स्वामी है निम्न स्थिति में हड़ताल अथवा तालाबन्दी नहीं कर सकता

1. जब मामला समाधानकर्ता के पास हो (During Pendency of Conciliation Proceedings before a Board)-जब मामला समाधानकर्ता गण को सौंपा गया हो और जाँच समाप्त होने के उपरान्त कम-से-कम 7 दिन व्यतीत न हो गए हों।

2. जब मामला श्रम-न्यायालय, ट्रिब्यूनल अथवा राष्ट्रीय ट्रिब्यूनल के पास हो (During Pendency of Conciliation Proceedings before National Court, Tribunal of National Tribunal)-जब मामला न्याय के लिए श्रम न्यायालय, ट्रिब्यूनल अथवा राष्ट्रीय ट्रिब्यूनल को सौंपा गया हो तो और इस प्रकार की कार्यवाही के बाद कम-से-कम 2 माह न गुजर गए हों।

3. जब मामला पंच के पास हो (During the Pendency before an Arbitrator)-जब मामला पंच के समक्ष पंच निर्णय के लिए सौंपा गया हो और इस प्रकार की कार्यवाही के उपरान्त कम-से-कम 2 माह व्यतीत न हो गए हों।

4. जब समझौता या निर्णय हो चुका हो (When Settlement or Award is in Operation)-जब किसी तथ्य के सम्बन्ध में समझौता अथवा निर्णय हो चुका हो तो उस समझौते अथवा निर्णय के मामलात के सम्बन्ध में हड़ताल अथवा तालाबन्दी न हो सकेगी। 

III. अवैध हड़ताल अथवा तालाबन्दी की दशा में आर्थिक सहायता देने से रोक

(Prohibition of Financial Aid to Illegal Strikes and Lockouts)

धारा 25 के अनुसार कोई व्यक्ति जानबूझकर अवैध हड़ताल अथवा तालाबन्दी को बढ़ाने के लिए कोई राशि व्यय नहीं करेगा।

प्रश्न 2 – “औद्योगिक कानून श्रमिक विरोधी हैं” इस पर लेख लिखिए।

Write a note on “Industrial Laws are against the interest of workers”.

उत्तर – विधेयक में औद्योगिक विवाद अधिनियम 1947, ठेका मजदूर (नियमन और उन्मूलन) 1970, ट्रेड यूनियन कानून 1926 सहित अन्य सम्बन्धित बिल शामिल हैं। इन सभी में संशोधन कर इन्हें कॉरपोरेट हितों के मुताबिक ढीला और लचीला बनाने की योजना है।

श्रमिक हितों पर चोट 

औद्योगिक विवाद अधिनियम 1947 में प्रस्तावित संशोधन से श्रमिकों के हित प्रभावित होंगे। जिन कम्पनियों में कर्मचारियों की संख्या 300 तक होगी, वे बड़ी आसानी से मजदूरों को निकाल सकेंगी। पहले छंटनी के लिए सरकार से अनुमति लेनी होती थी लेकिन अब सा दखल नहीं होगा। नए कानून में न्यूनतम वेतन अधिनियम में भी बदलाव की तैयारी अधिनियम के अनुसार सरकार अनुसूचित उद्योगों में श्रमिकों के न्यूनतम वेतन का कि शासकीय राजपत्र में अधिसूचना प्रकाशित करके करती है। परन्तु उद्योगों को इस परेशानी है। वे इस कानून में ऐसा संशोधन चाहते थे जिसके बाद न्यूनतम वेतन दिए जाने मजबूरी न हो। बल्कि वे स्वयं यह निर्णय करें कि उनके संस्थान में वेतन की दरें क्या हो संशोधन लागू होने के बाद लगभग ऐसे ही अधिकार कम्पनियों को मिलेंगे।

पहले कारखाना अधिनियम सिर्फ उन्हीं संस्थानों पर लागू होता था, जिनमें 10 कर्मचारी बिजली की मदद से या 20 कर्मचारी बिना बिजली के चलने वाली मशीनों से काम करते हो संशोधन के बाद यह कानून क्रमश: 20 और 40 मजदूरों वाले संस्थानों पर लागू होगा। ओवरटाइम की सीमा को भी 50 घण्टे से बढ़ाकर 100 घण्टे कर दिया गया है और वेतन सहित वार्षिक अवकाश की पात्रता को 240 दिनों से घटाकर 90 दिन पर ला दिया गया है। ऐसे कदमों से छोटे कारखाना मालिकों की बड़ी संख्या कारखाना अधिनियम के दायरे से बाहर हो जाएगी और मजदूरों को इस कानून के तहत मिलने वाली सुविधाएँ प्रदान करने की जिम्मेदारी से उन्हें कानूनी तौर पर छुट्टी मिल जाएगी। ऐसे ही स्मॉल फैक्ट्रीज एक्ट में बदलाव के बाद प्रत्येक कारखानेदार को श्रमिक पहचान संख्या देने का प्रावधान किया गया है। यानी अब हर कारखानेदार खुद ही एक अनुपालन रिपोर्ट दाखिल करके सत्यापन करेगा कि उसके प्रतिष्ठान में सभी कानूनों का अनुपालन किया जा रहा है या नहीं।

कानूनों में बदलाव का सबसे ज्यादा असर ट्रेड यूनियनों पर पड़ने वाला है। नए मसौदे के बाद यूनियनें कमजोर पड़ेंगी और उनके अधिकार सीमित होंगे। श्रमिक संघों के गठन के लिए कम-से-कम दस प्रतिशत या फिर 100 कर्मचारियों की जरूरत होगी, जबकि पहले किसी कम्पनी में कम-से-कम सात लोग मिलकर यूनियन बना सकते थे। नए कानून के तहत इण्डस्ट्रियल डिस्प्यूट एक्ट 1947, ट्रेड यूनियन एक्ट 1926 और इण्डस्ट्रियल एम्प्लॉयमेट एक्ट 1946 को एक ही कानून के अन्तर्गत मिला दिया जाएगा। अभी कारखानों में महिला श्रमिकों और किशारों को जोखिम भरे कामों पर नहीं लगाया जा सकता, परन्तु प्रस्तावित संशोधन में केवल गर्भवती महिला अथवा विकलांग व्यक्ति को जोखिम भरे कामों से दूर रखा जाएगा। ठेका मजदूरों के संरक्षण के लिए बनाया गया कानून अब 20 या इससे अधिक मजदूरा वाली फैक्ट्री पर लागू होने की जगह 50 या इससे अधिक मजदूरों वाली फैक्टरी पर लागू होगा। मतलब यह कि ठेका मजदूरों की बर्बर लूट पर कानूनी तौर पर भी कोई रोक नहीं होगी। सरकार अप्रैटिसशिप एक्ट में भी बदलाव करने जा रही है। यह कानन लाग होने के बाद विवाद दर्घटना की स्थिति में कम्पनी मालिक या जिम्मेदार व्यक्ति को पलिस गिरफ्तार नहीं की सकेगी। इसके अलावा सरकार कर्मचारी भविष्य निधि में भी विकल्प देने की तैयारी है। इसका में कर्मचारियों को ईपीएफओ और नई पेन्शन योजना, दोनों में चनाव का विकल्प दिया जाएगा मतलब यही कि अब और बड़ी संख्या में श्रमिकों को  श्रम कानूनों के तहत मिलने वाले फायदे

जैसे सफाई, पीने का पानी, सुरक्षा, बाल श्रमिकों का नियोजन, काम के घण्टे, साप्ताहिक अवकाश, छुट्टियाँ, ओवरटाइम, सामाजिक सुरक्षा आदि सुविधाओं से वंचित होना पड़ेगा या सरकार पर निर्भर होना पड़ेगा। उपर्युक्त ‘सुधारों’ के विरोध में देश की सभी ट्रेड यूनियनों और संगठनों ने संयुक्त रूप से प्रदर्शन किया।

सवाल नीयत का है 

सरकार भारत को मैन्युफैक्चरिंग हब बनाना चाहती है। वह मेक इन इण्डिया को मजबूत करना और देश में निवेश तथा रोजगार बढ़ाना चाहती है। इसलिए उपयोगिता खो चुके पुराने नियम-कानूनों में बदलाव होना चाहिए। लेकिन अगर मौजूदा कानून वंचित तबके के अधिकारों को संरक्षण प्रदान करते हैं तो इनमें परिवर्तन का कोई औचित्य नहीं है। उद्योगपति संगठित होकर अपनी बातें मनवाते हैं और छूट व सुविधाएँ पाते हैं। लेकिन जब श्रमिक वर्ग अपने अधिकारों और छोटी-मोटी राहत के लिए संगठित होता है तो इसे विकास में बाधा माना जाता है। नियम-कानून पहले भी बदले गए हैं। असली मुद्दा इन्हें बदलने या समाप्त करने का नहीं बल्कि इसके पीछे छिपे मकसद व नीयत का है।

प्रश्न 3 – ‘औद्योगिक संघर्ष’ से आप क्या समझते हैं? औद्योगिक संघर्ष के क्या कारण हैं?

What do you understand by the term ‘Industrial Dispute’? What are the causes of industrial disputes? 

उत्तर – औद्योगिक संघर्ष से आशय

(Meaning of Industrial Dispute) 

औद्योगिक संघर्ष अधिनियम, 1947 की धारा 2 (k) के अनुसार, औद्योगिक संघर्षों का अभिप्राय नियोक्ताओं के बीच, नियोक्ता और श्रमिकों के बीच, श्रमिकों और श्रमिकों के बीच संघर्ष अथवा मतभेद से है जो किसी व्यक्ति की नियुक्ति अथवा उसके क्रम के सम्बन्ध में हो या प्रतिबन्धों या शर्तों के सम्बन्ध में हो। औद्योगिक संघर्ष औद्योगिक जगत के लिए एक अभिशाप बन गया, जिसमें उद्योगपति, श्रमिक और राज्य आदि सभी को हानि उठानी पड़ती है। यहाँ जो नियोक्ता एवं श्रमिक की व्याख्या है, किसी उद्योग या श्रमिक, जिनको अधिनियम में परिभाषित तथा उद्योग में सम्मिलित नहीं किया गया है, उनमें उत्पन्न विवाद को औद्योगिक विवाद नहीं कहेंगे जैसे विश्वविद्यालय, महाविद्यालय, धार्मिक संस्थाओं के नियोक्ता एवं नियुक्त कर्मचारी शिक्षक इसमें सम्मिलित नहीं किए जा सकते हैं। विश्वविद्यालय अथवा महाविद्यालय के शिक्षकों की महँगाई भत्ते की माँगों को औद्योगिक विवाद में नहीं गिना जाएगा। ‘विवाद’ का अभिप्राय दोनों पक्षों की एक बात पर असहमति है, अर्थात् जब दोनों एक-दूसरे से सहमत न हों तो इसे दोनों में विवाद कहा जाएगा। औद्योगिक संघर्ष में – अग्रलिखित तीन तत्त्व होने चाहिए –

(i) संघर्ष या विवाद होना चाहिए,

(i) संघर्ष या विवाद नियोक्ता व नियोक्ता के बीच, नियोक्ता व श्रमिक श्रमिकों व श्रमिकों के बीच हो सकता है।

(iii) संघर्ष या विवाद का सम्बन्ध रोजगार या बेरोजगारी, रोजगार की शर्तो अन्य व्यक्ति के काम की दशा से होना चाहिए।

विभिन्न न्यायालयों के निर्णयों के आधार पर यह कहा जा सकता है कि औद्योगिक से अभिप्राय विद्यमान उद्योग से सम्बन्धित संघर्ष या विवाद से ही है। जब कोई विवाद निर्णय संदर्भित किया जाए तो, उसे औद्योगिक संघर्ष माना जाएगा। ऐसे व्यक्ति द्वारा भी किया विवाद जो संस्थान (unit) को छोड़ चुका है औद्योगिक संषर्ष माना जाएगा।

औद्योगिक संघर्षों के कारण (Causes of Industrial Disputes)-औद्योगिक संघर्ष के इतिहास से यह स्पष्ट हो जाता है कि इसका मुख्य कारण उद्योगपतियों और श्रमिकों के बीच पाए जाने वाले आपसी मतभेद हैं। इन मतभेदों के अनेक कारण हैं, जिनमें से अधिकांश आर्थिक हैं, कुछ सामाजिक, कुछ मनोवैज्ञानिक तथा अधिकांश राजनैतिक हैं। औद्योगिक संघर्ष के मुख्य कारण निम्न प्रकार हैं –

1. कम मजदूरी (Less Wages)-कुछ उद्योग आज भी ऐसे हैं जिनमें श्रमिकों की मजदूरी की दर इतनी कम होती है, कि वे अपने भरण-पोषण की सामग्री भी नहीं जुटा पाते, वे अपनी न्यूनतम आवश्यकताओं की पूर्ति में असमर्थ रहते हैं, अपनी मजदूरी की दर बढ़वाने के लिए वे हड़ताल करते हैं, यही उनके पास एक महत्त्वपूर्ण हथियार है। .

2. बोनस तथा महँगाई भत्ते (Bonus and Dearness Allowances)-बहुत से औद्योगिक संघर्ष बोनस तथा महँगाई भत्ते आदि से सम्बन्धित होते हैं। श्रम तथा पूँजी के सम्बन्ध में बोनस के रूप में सदैव से विवाद रहा है। श्रमिक जो कि उत्पादन के सबसे अधिक क्रियाशील तत्त्व हैं, उनका कथन है कि लाभ की मात्रा उनके अथक परिश्रम का ही फलह, अतः श्रमिक इसकी मांग करते हैं तथा माँगों की पूर्ति न होने पर श्रमिक हड़ताल कर बैठत है, इसी प्रकार महँगाई आदि के बढ़ने पर भी आम हड़तालें होती रहती हैं।

3. कार्य करने की अनुपयुक्त दशाएँ (Unreasonable Working Conce tions)-अधिकांश औद्योगिक संघर्ष कार्य करने की दशा से सम्बन्धित होते हैं। सामान्यतः । देखने में आता है कि कारखाने के अन्दर और बाहर इतनी गन्दगी और घुटन होती है कि निरन्तर कार्य करना बहुत कठिन होता है, श्रमिकों का स्वास्थ्य खराब होता है। कारख आधारभूत सुविधाओं-कैंटीन, शौचालय, मंत्रालय आदि का भी अभाव है जिसके लिए उचित मॉग करते हैं, और उन्हें यह माँग हड़तालों की सहायता से करनी पड़ता है।4. कार्य के अधिक घण्टे (More Working Hours)-औद्योगिक संघ प्रमख कारण श्रमिकों के अधिक कार्य के घण्टे हैं। उद्योगपतियों की यह धारणा हो घण्टों तक कार्य लेने से काम की मात्रा बढ़ती है। अत: वह श्रमिक से अधिक-से-अधिक) घण्टे तक काम लेने का प्रयत्न करते हैं, लाभ का होना अथवा न होना पूर्णत: दूसरा ही प्रश्न है लेकिन श्रमिकों में असन्तोष फैलता है और वे भी कम कार्य के घण्टों के लिए हड़ताल करते हैं।

5. श्रमिकों की भर्ती की दोषपूर्ण पद्धति (Defective Policy of Recruitment of Labourers)-औद्योगिक संघर्ष का एक अन्य मुख्य कारण कारखानों तथा अन्य उद्योगों में श्रमिकों की भर्ती करने की अत्यन्त दोषपूर्ण पद्धति है। श्रमिकों की भर्ती भाई-भतीजेवाद के आधार पर होती है तथा उनकी भर्ती ठेकेदारों, मिस्त्रियों या अन्य मध्यस्थों के आधार पर होती है, ये श्रमिकों से घूस लेते हैं, इनके दुर्व्यवहारों तथा शोषण की पद्धति से परेशान होकर श्रमिक हड़ताल करते हैं और औद्योगिक शान्ति भंग हो जाती है।

6. श्रमिकों की छंटनी (Retrenchment of Labourers)—विवेकीकरण या वैज्ञानिक या प्रबन्ध या अन्य कारणों से प्रभावित होकर जब कभी उद्योगपति श्रमिकों की छंटनी करने लगते हैं तो इससे बेरोजगारी बढ़ती है, श्रमिकों को अपनी रक्षा के हेतु हड़ताल रूपी अस्त्र को ग्रहण करना पड़ता है।

7. श्रमिकों की अशिक्षा एवं अज्ञानता (Illiteracy and Ignorance of Workers)- श्रमिक अशिक्षित तथा अनभिज्ञ होते हैं। अपनी बुराई भलाई नहीं सोच पाते, दूसरों द्वारा बताए गए मार्ग को ही अपना लेते हैं, उनकी इस अज्ञानता का लाभ उठाकर उद्योगपति उनमें कटुता एवं वैमनस्य की भावना जागृत कर देते हैं जिससे औद्योगिक संघर्षों को बढ़ावा मिलता है।

8. प्रबन्धकों का दोषपूर्ण व्यवहार (Undue Behaviour of Organizers)अनेक प्रबन्धक जिसमें निरीक्षक आदि सम्मिलित हैं श्रमिकों को सदैव निम्न स्तर का समझते हैं उनके साथ सम्मान से बातें करना, सहृदयता के साथ किसी प्रकार से सुझाव देना अपना अपमान समझते हैं, छोटी-छोटी बातों पर श्रमिकों को परेशान करना, बुरे शब्दों का प्रयोग करना, उनके साथ दुर्व्यवहार करना, उनके ऊपर जुर्माना करना उनकी आदत बन गई है जिससे परेशान होकर श्रमिक हड़ताल रूपी अस्त्र अपनाते हैं।

9. श्रम संघ (Trade Unions) औद्योगिक अशान्ति का एक मुख्य कारण श्रम संघों की स्थापना एवं उनका विकास है, श्रम संघर्षों का रूप रचनात्मक न होकर विध्वंसात्मक होता है। श्रम संघों के बनने से पूर्व औद्योगिक संघर्ष नाममात्र के थे अत: उद्योगपति इनको अपने अधिकारों के प्रति चुनौती समझते हैं और इनके विकास में बाधा डालने का प्रयत्न करते हैं, परिणामस्वरूप संघर्ष होता है।

10. असन्तोषजनक भावना (Unsatisfactory Concepts) कम अवकाश तथा विश्राम के कम अवसर मिलने के कारण श्रमिकों में असन्तोष की भावना उत्पन्न होती है, इस असन्तोष की भावना को प्रबन्धकों का व्यवहार और भी अधिक बढ़ा देता है जिससे श्रमिक हड़ताल करते हैं।11. साम्यवादी विचारधारा (Communistic Concept)-श्रमिक वर्ग पूँजीपतियों को अपना पैदायशी दुश्मन मानते हैं और श्रमिक प्रबन्ध में अपना भाग माँगते हैं,

लाभ में अपना हिस्सा माँगते हैं, दूसरी ओर प्रबन्धक अपने को शासक तथा इन्हें जो मानते हैं। इन सब भावनाओं से प्रेरित होकर श्रमिक हड़ताल कर बैठते हैं तथा औद्योगिक भंग होती है।

12. राजनीतिक कारण (Political Reasons) औद्योगिक संघर्ष का एक का राजनीति भी है। भारतवर्ष में इसके अनेक उदाहरण मिलते हैं। सन् 1908 में बम्बई में हुई की हड़ताल राजनीतिक हड़ताल थी। असहयोग एवं नागरिक हड़तालें भी निरन्तर देखने में आती है कुछ राजनीतिक दल भी देश में अशान्ति, अनुशासनहीनता एवं अव्यवस्था फैलाने के लिए श्रमिक वर्ग को हड़ताल के लिए उकसाते हैं। वे अधिनियम की परिधि में नहीं आते उनके विवाद को औद्योगिक विवाद नहीं कहा जा सकता जैसे विश्वविद्यालय अथवा कॉलिज के कर्मचारी के विवाद। विवाद शब्द स्वयं इस बात को स्पष्ट करता है कि नियोक्ता या श्रमिक एक बात पर सहमत नहीं है। उदाहरण के लिए, यदि श्रमिकों द्वारा नियोक्ता के समक्ष एक माँग प्रस्तुत की जाए जिसके सम्बन्ध में नियोक्ता सहमत न हो तो कहा जाएगा कि श्रमिक एवं नियोक्ताओं के मध्य विवाद है।

प्रश्न 4 – निम्न अपराधों के लिए क्या दण्ड-व्यवस्था है-

(i) अवैध हड़ताल एवं तालाबन्दी। 

(ii) अवैध हड़ताल एवं तालाबन्दी को आर्थिक सहायता देना। 

(iii) गोपनीय सूचनाओं को प्रकट करना। 

What penalties have been prescribed for the following offences ?

(i) Illegal strikes and lockout. 

(ii) Giving financial aid to illegal strikes and lockout. 

(iii) Disclosure of confidential information.

उत्तर – (i) अवैध हड़ताल एवं तालाबन्दी

(Illegal Strikes and Lockout) 

1. हड़ताल तथा तालाबन्दी कब अवैध होगी – निम्नलिखित दशाओं में कोई भी हड़ताल या तालाबन्दी अवैध होगी

(i) यदि वह धारा 22 अथवा धारा 23 के प्रावधानों का उल्लंघन करके प्रारम्भ घोषितं की गई है।

(ii) यदि वह धारा 10 की उपधारा (3) अथवा धारा 10 (ए) की उपधारा(4ए) के अन्तर्गत जारी किए गए आदेश का उल्लंघन करके जारी रखी गई हो।

अर्थात् जब कोई विवाद समझौता बोर्ड, श्रम-न्यायालय, ट्रिब्यूनल या राष्ट्रीय ट्रिब्यून को संदर्भित कर दिया गया हो तो ऐसे विवाद से सम्बन्धित हड़ताल या तालाबन्दी का रखना अवैध माना जाएगा।

2. हड़ताल तथा तालाबन्दी कब अवैध नहीं होगी – जब किसी औद्योगिक बाद के कारण पहले से ही कोई हड़ताल या तालाबन्दी प्रारम्भ की जा चुकी हो तथा विवाद बोर्ड; पंच, श्रम न्यायालय, ट्रिब्यूनल अथवा राष्ट्रीय ट्रिब्यूनल को संदर्भित करने के समय विद्यमान हो तो ऐसी हड़ताल या तालाबन्दी अवैध नहीं होगी, यदि वह इस अधिनियम के प्रावधानों का उल्लंघन करके प्रारम्भ नहीं की गई हो अथवा धारा 10 की उपधारा (3) या धारा 10 (ए) की उपधारा (4ए) के अन्तर्गत उसका जारी रखना निषिद्ध करार नहीं कर दिया गया हो।

3. अवैध हड़ताल के परिणामस्वरूप की गई तालाबन्दी वैध होगी – यदि किसी अवैध हड़ताल के परिणामस्वरूप कोई तालाबन्दी घोषित की जाती है तो वह अवैध नहीं मानी जाएगी। इसी प्रकार, यदि किसी अवैध तालाबन्दी के परिणामस्वरूप कोई हड़ताल घोषित की जाती है तो ऐसी हड़ताल वैध होगी।

धारा 26 के अनुसार, यदि कोई श्रमिक अवैध हड़ताल प्रारम्भ करता है, उसे जारी रखता है या उसे बढ़ाता है तो उसे एक माह की कैद या रू. 50 तक का अर्थदण्ड या दोनों से दण्डित किया जा सकता है। इसी प्रकार कोई नियोक्ता अवैध तालाबन्दी प्रारम्भ करता है, उसे जारी रखता है अथवा बढ़ाता है तो उसे एक माह तक की कैद या रू. 1,000 तक का अर्थदण्ड या दोनों से दण्डित किया जा सकता है।

(ii) अवैध हड़ताल एवं तालाबन्दी को आर्थिक सहायता देना

(Giving Financial Aid to Illegal Strikes and Lockouts)

अवैध हड़ताल या अवैध तालाबन्दी को प्रत्यक्ष रूप से प्रोत्साहन देने या उसका समर्थन करने के लिए कोई भी व्यक्ति जान-बूझकर कोई धनराशि खर्च नहीं करेगा।

हड़तालों के सम्बन्ध में राष्ट्रीय श्रम आयोग की प्रमुख सिफारिशें

राष्ट्रीय श्रम आयोग (गजेन्द्र गडकर आयोग) ने हड़तालों के सम्बन्ध में अपनी रिपोर्ट में निम्नलिखित सिफारिशें की हैं

(1) समस्त उद्योगों को दो वर्गों में विभक्त किया जाए

(a) आधारभूत उद्योग तथा (b) अन्य उद्योग। 

(2) आधारभूत उद्योगों में हड़ताले नहीं की जानी चाहिए। 

(3) अन्य उद्योगों में हड़ताल 1 माह में अनिवार्य रूप से समाप्त कर देनी चाहिए।

(4) देश में दो प्रकार के औद्योगिक सम्बन्ध आयोग (Industrial Relations Commission) बनाए जाएँ–प्रथम तो राष्ट्रीय औद्योगिक सम्बन्ध आयोग तथा दूसरा, राज्य औद्योगिक सम्बन्ध आयोग।धारा 28 के अनुसार, जो व्यक्ति जान-बूझकर हड़ताल या तालाबन्दी को आगे बढ़ाता है या उसका समर्थन करने के लिए वित्तीय सहायता देता है उसे 6 माह की कैद या रू. 1,000 तक का अर्थदण्ड या दोनों से दण्डित किया जा सकता है।

(iii) गोपनीय सूचनाओं को प्रकट करना

(Disclosure of Confidential Information) धारा 30 के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति ऐसी सूचनाओं को जिनको धारा 21 अनुसार, गोपनीय रखा जाना आवश्यक हो, जान-बूझकर प्रकट करता है तो उसे 6 माद का कारावास या रू. 1,000 तक का अर्थदण्ड या दोनों से दण्डित किया जा सकता है।

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