B.Com 2nd Year Management Of Change Long Notes In Hindi

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B.Com 2nd Year Management Of Change Long Notes In Hindi
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विस्तृत उत्तरीय प्रश्न 

प्रश्न 1 – परिवर्तन प्रतिरोध के कौन-कौन से कारण हैं? परिवर्तन प्रतिरोध को कम करने के उपायों पर प्रकाश डालिए।

What are the causes for resistance to change ? Elaborate the measures to overcome the resistance to change. 

उत्तर – परिवर्तन प्रतिरोध के कारण

(Causes for Resistance to Change) 

जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में लगातार परिवर्तन होता रहता है। भौतिक व अभौतिक सभी क्षेत्र परिवर्तन की क्रिया से प्रभावित हैं। जहाँ एक ओर कुछ व्यक्ति परिवर्तन को आत्मसात् कर लेते हैं तथा परिवर्तित स्थिति के साथ स्वयं को समायोजित कर लेते हैं, वहीं दसरी ओर अनेक व्यक्ति परिवर्तन का प्रतिरोध करत ह। परिवर्तन के प्रतिरोध के कारणों को निम्नलिखित प्रकार से व्यक्त किया जा सकता है

I. संगठनात्मक कारण 

(Organizational Causes)

छोटे – छोटे कार्य-समूहों से मिलकर संगठन बनता है और इन्हीं संगठनों का विस्तृत रूप के रूप में हमारे सम्मुख उपस्थित होता है। कई बार परिवर्तनों को ये समूह, संगठन या

समाज स्वीकार नहीं करते वरन् उनका प्रतिरोध करते हैं। यह प्रतिरोध स्वाभाविक, सहज अथवा तीव्र हो सकता है। इसके विभिन्न प्रतिरोधक कारण निम्नलिखित हो सकते हैं

1. संघ व्यवहार (Union Behaviour)-कर्मचारियों के हितों के विरुद्ध होने वाले परिवर्तनों का संघ स्तर पर विरोध किया जाता है। विरोध के ऐसे स्वर अधिक कारगर असर दिखाते हैं।

2. सहभागिता में कमी (Lack of Participation)-जब कभी परिवर्तन के कारण श्रमिकों की सहभागिता में कमी होती है, तब ऐसे परिवर्तन का विरोध किया जाता है।

3. सामाजिक समायोजन में कमी (Decrease in Social Adjustment)कभी-कभी सामाजिक परिवर्तन के नए रूप को अंगीकार करना कठिन हो जाता है, ऐसी अवस्था में सामाजिक समायोजन करना एक समस्या का रूप धारण कर लेता है या इसमें कमी आ जाती है, तब ऐसे परिवर्तनों का सामाजिक स्तर पर विरोध किया जाता है।

4. आदर्श समूह (Ideal Group)—प्रत्येक समूह/संगठन या समाज के कुछ दैव आदर्श/कठिन नियम या विश्वास होते हैं। जब भी कोई परिवर्तन इन आदर्शों से सम्बन्धित होता है, तब उस समूह/संगठन या समाज में उसका विरोध किया जाता है। ऐसी स्थिति में परिवर्तन को आत्मसात् करने वाले व्यक्तियों का समूह या समाज से बहिष्कार भी किया जा सकता है।

5.पारस्परिक सम्बन्ध (Interpersonal Relations)-प्रत्येक समूह या संगठन में प्रत्येक स्तर पर सामाजिक सम्बन्ध बन जाते हैं जो नेतृत्व-अनुयायी, अधिकारी-अधीनस्थ, छोटे-बड़े या समान स्तर के हो सकते हैं। संगठन में परिवर्तन के कारण पद-क्रम भी परिवर्तित होते हैं जिससे पारस्परिक सम्बन्ध प्रभावित होते हैं। इसी कारण अनेक व्यक्ति परिवर्तनों का विरोध करते हैं।

6. पारस्परिक संगति (Mutual Coherence)-कभी-कभी ऐसा भी होता है जब विभिन्न प्रकार के परिवर्तनों के कारण पारस्परिक संगति में व्यवधान उत्पन्न हो जाता है, तब

समूह या समाज के किसी एक अंग में परिवर्तन से दूसरा अंग स्वत: ही प्रभावित होने लगता है, |जिसका पूरे समूह या समाज द्वारा विरोध किया जाता है।

7. पारस्परिक विश्वास (Mutual Faith)-यदि परिवर्तन के कारण पारस्परिक अविश्वास होने लगता है, तब ऐसे परिवर्तनों का विस्तृत रूप से विरोध किया जाना प्रारम्भ हो जाता है। टूटा हुआ धागा जुड़ सकता है, परन्तु टूटा हुआ विश्वास जुड़ने की सम्भावना न के बराबर ही होती है।

8. सामूहिक हित (Group Interest)-कई बार परिवर्तन के कारण सामूहिक हित पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। कभी-कभी तो समूह की प्रतिष्ठा तक दाँव पर लग जाती है। ऐसी स्थिति में परिवर्तन का प्रतिरोध होता है।

II. व्यक्तिगत कारण (Individual Causes)

1. अनुभव (Experience)-नवप्रवर्तन का अनुभव नहीं होता है। इसके अभाव विरोध की प्रक्रिया का प्रारम्भ हो जाता है।

2. अहभाव (Egoism)-कुछ व्यक्ति अत्यधिक अहंवादी (Egoist होते हैं। यदि नवप्रवर्तन के कारण उनके अहं पर कोई चोट लगती है, तब वे उस परिवर्तन प्रतिरोध करने लगते हैं।

3. पहलपन का अभाव (Lack of Imitation)-कुछ व्यक्तियों का स्वभाव होगा होता है कि वे पहल करने से डरते हैं। अन्यों के द्वारा कार्य करने पर उसी कार्य को ऐसे लोग बाद में करने के लिए तैयार हो जाते हैं।

4. अधिक परिश्रम (More Work)-यदि नवप्रवर्तन के कारण व्यक्ति का कार्यभार बढ़ता है, तब भी व्यक्ति ऐसे परिवर्तनों का विरोध शुरू कर देता है।

5. शिक्षा व कौशल (Education and Skills)-नवीन तकनीकों को तेजी के साथ औद्योगिक क्षेत्रों में लागू किया जाता है परन्तु ऐसे कर्मचारी, जो उस तकनीक या कौशल के जानकार नहीं हैं, ऐसे परिवर्तनों का विरोध करते हैं, अत: शिक्षा व कौशल की कमी भी विरोध का कारण बन जाती है।

6. मानसिक जड़ता (Stagnancy)-अनेक बार व्यक्ति अपनी आयु, मानसिक स्तर तथा पुरानेपन के साथ लगाव आदि के कारण परिवर्तन का विरोध करता है। ऐसी स्थिति में उसकी कुछ भी नया सीखने की इच्छा मृतप्राय हो जाती है, जिसे मानसिक जड़ता के कारण प्रतिरोध करना कहा जाता है।

7. हानि का डर (Fear of Loss)-स्वयं को किसी प्रकार की क्षति होने की आशंका के कारण भी विरोध का प्रारम्भ हो जाता है, अत: ऐसे परिवर्तनों, जिनके कारण व्यक्ति को कुछ खोने जैसे पद, प्रतिष्ठा, सम्मान, बोनस आदि का डर हो, सदैव विरोध किया जाता है।

8.जीवन-शैली की अभ्यस्तता (Set Life Style)-यदि परिवर्तन के कारण व्यक्ति की जीवन-शैली में कोई बदलाव आता है तो ऐसी जीवन-शैली का विरोध किया जाना स्वाभाविक है क्योकि वह एक जैसी जीवन-शैली का अभ्यस्त हो चुका होता है।

9.असरक्षा (Unsafe)-यदि नए परिवर्तन के कारण व्यक्ति स्वयं को असुराका समझने लगे, तब वह ऐसे परिवर्तनों का विरोध करता है। यह असुरक्षा नए परिवतन । आत्मसात् न कर पाने के कारण शारीरिक, पारिवारिक या मानसिक स्तर पर हो सकती है। 

III. कार्यगत कारण (Task Causes)

(1) बेरोजगारी के बढ़ने का भय, 

(2) कार्य स्वतन्त्रता छिन जाने का भय, 

(3) कार्य सुरक्षा घटने का भय,

(4) कार्य के कठिन होने का भय, 

(5) आर्थिक लाभ में कटौती का भय, 

(6) कार्य में परिवर्तन होने के कारण पद के विलुप्त होने की आशंका, 

(7) कार्य स्थिति में परिवर्तन होना जो व्यक्ति के अनुकूल न हो, (8) कार्य दायित्व में वृद्धि होने का भय, 

(9) कार्य-स्थल से अन्यत्र स्थानान्तरण किए जाने का भय, 

(10) परिवर्तित कार्य में पूर्व कार्य के वातावरण की उपलब्धता का अभाव खटकना।

ऊपर बताए गए बिन्दुओं में ऐसे कारणों को प्रकट किया गया है, जिनके कारण व्यक्ति को अपने कार्य में परिवर्तन किया जाना उचित नहीं लगता है।

परिवर्तन प्रतिरोध को कम करने के उपाय

(Measures to overcome Resistance to Change) __

यदि संगठनात्मक परिवर्तन सफलतापूर्वक क्रियान्वित कर दिया जाता है तथा कर्मचारियों द्वारा इस परिवर्तन को स्वीकार कर लिया जाता है, तब यह प्रबन्ध की सफलता मानी जाती है। परिवर्तन प्रतिरोध को कम करने के उपाय निम्नलिखित हैं

1. नेतृत्व (Leadership)–संगठन के नेतृत्व की जितनी प्रतिष्ठा व प्रभाव होगा, वह कर्मचारियों की परिवर्तन से सम्बद्धता उतनी ही अधिक कर पाएगा परिणामस्वरूप परिवर्तन प्रतिरोध उतना ही कम होगा। यदि संगठन में अधिकृत प्रबन्धक के अतिरिक्त कोई और अधिक सशक्त नेतृत्व है, तब वह अपने भावनात्मक प्रभाव से परिवर्तन प्रतिरोध को कम कर सकता है। वह अपने प्रभाव के कारण परिवर्तन प्रतिरोध को पूर्णतः समाप्त भी कर सकता है। उसका प्रभाव कर्मियों पर जितना अधिक होगा उतना ही परिवर्तन प्रतिरोध को न्यून किया जा सकेगा।

2. शिक्षा (Education)-नई टेक्नोलॉजी का समावेश किए जाने पर होने वाला प्रतिरोध, कर्मियों को तत्सम्बन्धित शिक्षा देकर कम किया जा सकता है।

3. प्रोत्साहन (Persuasion)-कर्मचारियों की विभिन्न शंकाओं का सही निवारण करके भी परिवर्तन के प्रति उनके दृष्टिकोण को सुधारा जा सकता है, तब वे स्वत: परिवर्तन को स्वीकारने को प्रोत्साहित होते हैं।

4.सम्प्रेषण (Communication)-सूचना के अभाव में अथवा सूचना के पूर्ण न होने की अवस्था में भी परिवर्तन प्रतिरोध बल पकड़ने लगता है, परन्तु द्विमार्गी कुशल सम्प्रेषण व्यवस्था परिवर्तन प्रतिरोध को काफी सीमा तक घटा देती है।

5. कर्मचारी सहभागिता तथा सम्बद्धता (Employees Participation and Involvement)-परिवर्तन की क्रिया के समय कर्मियों को आंशिक या पूर्ण भागीदारी देकर उनके प्रतिरोध को काफी कम किया जा सकता है। सहभागिता परिवर्तन को क्रियान्वित करने के लिए कर्मचारियों की वचनबद्धता का कार्य करती है।

6. प्रतियोगी भावना का विकास (Development of Competi Spirit)-संगठन के विभिन्न विभागों, शाखाओं या कर्मचारियों में परिवर्तन के प्रति प्रति भावना का यदि सम्प्रेषण किया जा सके तो प्रबन्धक इच्छित परिवर्तन को सामान्यत: लाग की में सफल होते हैं।

7. समय तत्त्व (Time Factor)-समयानुकूल ही कार्य करना प्रबन्धन के लि लाभकारी रहता है। इसी प्रकार संगठनात्मक परिवर्तन का भी एक समय होता है। प्रबन्धक को ऐसे समय को पहचानना चाहिए। गलत समय में किए गए संगठनात्मक परिवर्तन का तीव्र विरो होता है, परन्तु यदि परिवर्तन ठीक समय पर किए गए हैं, तब स्वत: ही परिवर्तन प्रतिरोध कम हो जाता है।

8. समूह से जुड़ाव (Group Cohesiveness)-समूह द्वारा परिवर्तन स्वीकार करने पर सदस्य प्राय: कम प्रतिरोध के साथ ही परिवर्तन को स्वीकार कर लेते हैं। ऐसा तभी हो सकता है जब सदस्य मौद्रिक, मनोवैज्ञानिक, सामाजिक या अन्य किसी रूप में समूह से जडे हुए हों।

9. छल-कौशल (Manipulation)-कोई भी परिवर्तन अपने साथ अच्छे व बुरे दोनों प्रकार के परिणाम लेकर आता है। परिवर्तन कुछ व्यक्तियों के लिए लाभप्रद व अच्छे परिणामों वाले होते हैं तथा कुछ व्यक्तियों के लिए हानिप्रद व बुरे परिणामों वाले होते हैं। ऐसी स्थिति में संगठन का प्रबन्ध छल-कौशल से हानिप्रद व बुरे परिणामों को कर्मचारियों से छिपा लेता है तथा परिवर्तनों का एक पक्ष ही बताकर परिवर्तन प्रतिरोध कम कर देता है।

10. क्रूर विधि (Coercive Measures)-परिवर्तन के कारणों का ज्ञान होने पर कर्मियों द्वारा तीव्र प्रतिक्रिया की जाती है। ये परिवर्तन संगठन के वृहत् हित में होने के कारण प्रबन्ध क्रूर विधि द्वारा परिवर्तन को लागू कर देता है। कर्मचारियों को धमकी या चेतावनी देकर परिवर्तनों को लागू कराया जाता है। कर्मचारियों को नौकरी से हटाने, पदोन्नति रोकने, वेतन वृद्धि रोकने, सुदूर स्थानान्तरण करने आदि की धमकी देकर परिवर्तनों को लागू किया जाता है।

11. विचार-विमर्श व समझौता (Negotiation and Agreement)-या परिवर्तन की लागत व लाभ समान या लगभग समान होते हैं, तब सम्बद्ध पक्षकार विचार-विमर्श के उपरान्त समझौता किया जाता है। प्रायः इस प्रकार के सटौते के मसविदे का दोनों पक्ष सहर्ष अपनाने को तैयार हो जाते हैं। इस प्रकार स्वतः दी पतिरोध का पहलू दव जाता है।


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