B.Com 2nd Year Organizing Long Notes In Hindi

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विस्तृत उत्तरीय प्रश्न 

प्रश्न 1 – व्यावसायिक संगठन के विभागीकरण की आवश्यकता क्यों पड़ती है? विभागों का निर्माण करते समय किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?

Why is there need of department in business organization? Which factors should be considered at the time of formation of departments. 

उत्तर – व्यावसायिक संगठन के विभागीकरण की आवश्यकता एवं महत्त्व 

(Need and importance of Department in Business Organization)

एक संगठन के सदस्यों में कार्य विभाजन की आवश्यकता चिरकाल से चली आ रही है। उदाहरण के लिए, अरस्तू (Aristotle) ने ‘ट्रीटाइज ऑन पॉलिटिक्स’ में सैकड़ों वर्ष पहले ये विचार प्रकट किए थे कि “जहाँ राज्य बड़ा है, यह संवैधानिक एवं प्रजातान्त्रिक सिद्धान्तों के

अधिक अनुरूप है कि पदों (कार्यों) को ….. विभिन्न व्यक्तियों में बाँट दिया जाए ….. क्योंकि कोई भी पुनरावृत्ति की प्रकृति का कार्य तभी अच्छा और शीघ्र पूरा किया जा सकता है।”

यह बात एक फर्म, कम्पनी या व्यावसायिक उपक्रम पर भी लागू होती है कि मुख्य प्रबन्धक को कार्य के प्रभावपूर्ण एवं दक्षतापूर्वक संचालन के लिए फर्म का कार्य विभिन्न विभागों, उपविभागों, संभागों तथा व्यक्तियों में बाँट देना चाहिए और उसी के अनुरूप विभागीय प्रबन्धकों, संभाग प्रभारियों तथा पर्यवेक्षकों को दायित्व व अधिकार प्रदान कर दिए जाने चाहिए। यही विभागीकरण है और इस विभागीकरण के दम पर ही यह सम्भव है कि फर्म का आकार चाहे जितना भी बड़ा क्यों न हो जाए, उसकी प्रबन्धकीय क्षमता में ह्रास नहीं होगा। आज विभागीकरण के द्वारा ही बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ अपने लाखों कर्मचारियों को नियन्त्रित कर पाने में तथा करोड़ों ग्राहकों को सन्तुष्ट कर पाने में सफल सिद्ध हुई हैं।

विभागीकरण के सिद्धान्त

(Principles of Departmentation

विभागीकरण के विभिन्न प्रारूपों का अध्ययन करने के पश्चात् स्वाभाविक रूप से यह प्रश्न उठता है कि उन सभी प्रारूपों में कौन-सा प्रारूप सर्वोत्तम है। वास्तव में, इस प्रश्न का कोई सीधा उत्तर नहीं दिया जा सकता क्योंकि एक फर्म के लिए विभागीकरण प्रारूप की उपयुक्तता फर्म के आकार, संसाधन, प्रयुक्त टेक्नोलॉजी, कार्यक्षेत्र, उत्पाद की प्रकृति आदि तथ्यों पर निर्भर करती है। फिर भी एक उपक्रम द्वारा विभागीकरण प्रारूप का चयन करते समय निम्नलिखित तथ्यों या सिद्धान्तों को ध्यान में रखना चाहिए

1. स्थानीय घटक (Local Factors)-विभागीकरण प्रारूप का चयन करते समय इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि फर्म को स्थानीय संसाधनों का लाभ भी प्राप्त हो जाए तथा स्थानीय लोगों की सद्भावनाएँ भी फर्म के प्रति बनी रहें।

2. विशिष्टीकरण (Specialization)-उपक्रम का विभागीकरण करते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि विभाग और उपविभागों की संरचना इस प्रकार की हो जो विशेषज्ञों की सेवाओं का सदुपयोग कर सकें और फर्म को विशिष्टीकरण के लाभ प्राप्त हो सकें।

3. समन्वय एवं नियन्त्रण (Co-ordination and Control)-विभागीकरण करते समय इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि फर्म की क्रियाओं पर सर्वोच्च प्रबन्ध का नियन्त्रण भी बना रहे तथा विभिन्न विभागों के कार्य में तालमेल भी बना रहे। विभागीकरण के अन्तर्गत विभिन्न प्रबन्धकों, उपप्रबन्धकों तथा अन्य अधिकारियों के कार्यों के मूल्यांकन की भी व्यवस्था रहनी चाहिए।

4. लागतों पर नियन्त्रण (Control on Costs)-कुछ विभागीकरण प्रारूप एक भी हैं जिनमें प्रबन्धकों एवं उपप्रबन्धकों की संख्या में वृद्धि करनी होती है। ऐसे प्रारूप का चय करत समय यह आकलन कर लेना चाहिए कि क्या इस प्रारूप से फर्म को प्राप्त होने वाला लागत वृद्धि से अधिक हो सकेगा।

प्रश्न – 2 विकेन्द्रीकरण से क्या आशय है? इसके लाभ-दोषों की विवेचना कीजिए।

What is meant by Decentralization ? Discuss its advantages and disadvantages. 

उत्तर – विकेन्द्रीकरण

(Decentralization) 

विकेन्द्रीकरण से तात्पर्य निर्णयन अधिकारों का संगठन में प्रबन्ध के निम्नतम स्तर तक फैलाव से है।

हेनरी फेयोल के अनुसार, “प्रत्येक कार्य जो अधीनस्थों की भूमिका के महत्त्व में वृद्धि करता है, विकेन्द्रीकरण कहा जाता है।”

लुईस ए० एलन के अनुसार, “उन अधिकारों के अतिरिक्त जिनका प्रयोग केवल केन्द्रीय बिन्दु पर ही किया जा सकता है, समस्त अधिकारों को निम्नतम स्तर तक प्रत्यायोजन करने का क्रमबद्ध प्रयास ही विकेन्द्रीकरण कहा जाता है।”

गैरी डैसलर के अनुसार, “विकेन्द्रीकरण से आशय अधीनस्थों को विभिन्न मामलों में निर्णयन अधिकार के ऐसे प्रत्यायोजन से है जिसमें कुछ निश्चित अत्यावश्यक मामलों में नियन्त्रण बनाए रखा जाता है।”

विकेन्द्रीकरण के लाभ

(Advantages of Decentralization) 

विकेन्द्रीकरण के निम्नलिखित लाभ हैं

(1) इससे उच्च अधिकारियों के कार्यभार में कमी और युवा अधिकारियों को प्रेरणा प्राप्त होती है।

(2) संस्था में समन्वय, निरीक्षण, नियन्त्रण, उत्पादों की विविधता, शोध, नवीन परिवर्तन आदि को प्रोत्साहन विकेन्द्रीकरण से मिलता है।

(3) इसमें अनावश्यक लालफीताशाही और राजनीति को निरुत्साहित किया जाता है। (4) प्रबन्ध में अनौपचारिकता और लोकतन्त्र पनपता है।

(5) विकेन्द्रीकरण से उच्च प्रबन्ध तथा उसके विभागों के मध्य टकराव की सम्भावना नहीं रहती है।

(6) योग्य एवं अनुभवी प्रबन्धकों की कमी नहीं रहती, अपितु वे स्वयं संगठन में उपलब्ध होते रहते हैं।

(7) इसमें विभागों के मध्य स्वस्थ प्रतिस्पर्धा होने से उनकी कमजोरियों का तुरन्त ज्ञान हा जाने से सुधारात्मक कदम उठाये जा सकते हैं।

(8) इससे अधीनस्थों में रुचि, मौलिकता, उत्तरदायित्व और मनोबल को बढ़ावा मिलता है। 

(9) यह अधिकारी प्रशिक्षण और विकास का एक श्रेष्ठ माध्यम है। 

(10) इसमें निर्णयन में सुविधा व सरलता रहती है। 

(11) इसमें उच्च प्रबन्ध व अधीनस्थों के मध्य अनावश्यक भेदभाव नहीं रहता है।

विकेन्द्रीकरण के दोष एवं कठिनाइयाँ 

(Demerits and Difficulties of Decentralization) 

विकेन्द्रीकरण के निम्नलिखित दोष (कठिनाइयाँ) हैं-

(1) इससे उच्च प्रबन्धकों की स्थिति और अधिकार सत्ता में कमी आती है तो वे विरोध करते हैं।

(2) निम्न स्तर पर भी योग्य कार्यकारी अधिकारियों की नियुक्ति करनी पड़ती है। 

(3) संकटकालीन परिस्थितियों में शीघ्र निर्णयन सम्भव नहीं होता है।

(4) विशिष्ट सेवाओं; जैसे-लेखाकार्य और सांख्यिकी विभाग में विकेन्द्रीकरण लाग नहीं किया जा सकता है।

(5) विकेन्द्रित इकाइयों और प्रबन्धकों में साम्राज्य निर्माण की भावना पनप सकती है जो समग्र व्यवसाय के उत्थान में बाधक सिद्ध हो सकती है। परिवर्तित परिस्थितियों में समायोजन करना कठिन होता है।

(6) दोबारगी और अतिव्यापन (Duplication and Overlapping) की सम्भावनाएँ बढ़ जाती हैं।

(7) प्रबन्ध व्ययों में बढ़ोतरी होती है, क्योंकि विकेन्द्रित इकाइयों में अलग से कर्मचारी सुविधाओं का प्रावधान करना नितान्त आवश्यक हो जाता है।

(8) विकेन्द्रीकरण की दशा में उचित समन्वय के अभाव के कारण उपक्रम की नीतियों एवं विधियों में विभिन्नता पायी जाती है। ___ 

अत: अधिकारों का विकेन्द्रीकरण तभी उपयुक्त सिद्ध होता है जहाँ पर कार्य प्रमापित व पुनरावृत्ति स्वभाव का हो, संगठन विशाल व जटिल हो, प्रबन्धक अनुभवी व कुशल हों, नियन्त्रण का विस्तार व्यापक हो और प्रबन्ध के स्तर कम हों। वास्तव में केन्द्रीकरण और विकेन्द्रीकरण के अपने-अपने गुण-दोष हैं। पूर्णतया किसी को भी लागू नहीं किया जा सकता है। पूर्ण केन्द्रीकरण से संस्था के अधिकार मुट्ठी भर लोगों के हाथों में केन्द्रित हो जाते हैं, जबकि पूर्ण विकेन्द्रीकरण से सर्वोच्च सत्ता के पास कुछ भी नहीं बचता है। अतः प्रत्येक संस्था के लिए वही स्थिति उत्तम कही जा सकती है कि बिना बाधा के प्रबन्धकीय कार्य का निष्पादन सम्भव हो सके, भले ही वहा अंशत: केन्द्रीकरण और अंशतः विकेन्द्रीकरण का उपयोग किया जाता हो। 

विकेन्द्रीकरण की विशेषताएँ या लक्षण (Characteristics of Decentralization)

उक्त परिभाषाओं के आधार पर विकेन्द्रीकरण के निम्नलिखित लक्षण होते हैं-

(1) यह प्रबन्ध के निम्नतम स्तर तक अधिकारों के प्रत्यायोजन का व्यवस्थित प्रयास है। 

(2) यह अधीनस्थों की भूमिका को महत्त्व प्रदान करता है।

(3) यह अधीनस्थों को स्वायत्तता तथा परिणाम प्रदर्शित करने का अवसर प्रदान करता है।

(4) अत्यावश्यक मामलों में विकेन्द्रीकरण में भी केन्द्रीकृत निर्णयन बनाए रखना सम्भव होता है।

(5) यह भारार्पण या प्रत्यायोजन का प्रथम चरण है।

प्रश्न 3 – रेखीय व कर्मचारी संगठन क्या है? इसके गुण व दोषों की व्याख्या कीजिए।

What is line and staff organization ? Discuss its merits and demerits.

उत्तर – यह संगठन पद्धति रेखा संगठन पद्धति का सुधरा हुआ रूप है। इसमें भी कार्य का विभाजन स्वतन्त्र विभागों में किया जाता है और उत्तरदायित्व का विभाजन भी लम्ब रूप में ही होता है, परन्तु विभागीय प्रमुखों के साथ यान्त्रिक विशेषज्ञ भी नियुक्ति किए जाते हैं, जिनका कार्य परामर्श देना होता है। कर्मचारियों को आदेश देने का कार्य विभागाध्यक्ष ही करता है और यह आदेश ऊपर से नीचे लम्बवत् रूप में ही संचालित होते हैं। इस प्रणाली की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें सोचना एवं परामर्श देने तथा करने के कार्य दोनों अलग-अलग हो जाते हैं। इनकी प्रमुख परिभाषाएँ निम्नवत् हैं

किम्बाल एवं किम्बाल के अनुसार, “रेखा व कर्मचारी संगठन वह है जिसमें विशेषज्ञों को सलाहकार की स्थिति में नियुक्त किया जाता है, लेकिन उनको स्पष्ट अधिकार प्राप्त नहीं होते।”

उपर्युक्त परिभाषा से स्पष्ट है कि संगठन का वह प्रारूप जिसमें कार्य का वितरण स्वतन्त्र रूप से किया जाता है, उत्तरदायित्व रेखीय होता है तथा प्रत्येक विभाग में विशेषज्ञ होते हैं जो विभागाध्यक्षों को आवश्यकतानुसार परामर्श देते हैं, रेखा कर्मचारी संगठन कहलाता है। इस संगठन की मुख्य विशेषता यह होती है कि ‘सोचने’ और ‘करने’ में स्पष्ट भेद होता है। सोचने का काम ‘स्टाफ’ और करने का कार्य ‘लाइन’ द्वारा किया जाता है।

रेखा व कर्मचारी संगठन की विशेषताएँ 

(Characteristics of Line and Staff Organization) 

इसकी प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-

(1) इसमें लाइन अधिकारी स्टाफ कर्मचारियों की राय मानने के लिए बाध्य नहीं होते। 

(2) विशेषज्ञ रेखा अधिकारियों के कार्य में किसी प्रकार का हस्तक्षेप नहीं कर सकते। 

(3) इसमें अधिकार एवं उत्तरदायित्व ऊपर से नीचे की ओर सीधी रेखा में प्रवाहित होता है। 

(4) विशेषज्ञों का परामर्श वैज्ञानिक तथ्यों, यथार्थता तथा व्यावहारिकता पर आधारित होता है। 

(5) इसमें रेखा अधिकारियों के कार्य का बोझ हल्का हो जाता है।

रेखा व कर्मचारी संगठन के गुण 

(Advantages of Line and Staff Organization) 

रेखा व कर्मचारी संगठन के प्रमुख लाभ निम्नलिखित हैं

1. कुशल कर्मचारियों के लिए सुअवसर – कुशल कर्मचारियों के लिए यह प्रणाली प्रेरक का काम करती है। विशेषज्ञों के सहयोग से उन्हें अपनी प्रतिभा को विकसित करने का अवसर मिलता है।

2. अनुसन्धान को प्रोत्साहन – विशेषज्ञों की नियुक्ति के कारण अनुसन्धान को प्रोत्साहन मिलता है।

3. नियन्त्रण और समन्वय कार्य स्पष्ट रूप से परिभाषित – इस संगठन में रेखा अधिकारियों और विशेषज्ञों के कार्य स्पष्ट रूप से परिभाषित होते हैं, अर्थात् आदेश रेखा अधिकारियों द्वारा दिए जाते हैं और विशेषज्ञ केवल सलाह देते हैं। अत: नियन्त्रण और समन्वय का कार्य सुगम हो जाता है।

4.मितव्ययिता – यह पद्धति विशिष्टीकरण के सिद्धान्तों का पालन करती है अर्थात विशिष्ट कार्य विशिष्ट व्यक्ति को ही मिलता है। इसमें कर्मचारियों की कार्यक्षमता में वृद्धि होती है और अपव्यय रुक जाता है।

5. सही निर्णय लेने में सहायता – विशेषज्ञों से परामर्श प्राप्त हो जाने के कारण रेखा अधिकारियों को सही निर्णय लेने में सहायता मिलती है।

6. रेखा अधिकारी भी लाभान्वित प्राय: विशेषज्ञों की सेवा एवं सम्पर्क से रेखा अधिकारियों को भी एक प्रकार का प्रशिक्षण मिल जाता है, जिससे वे तकनीकी बातों को सरलता से समझ जाते हैं।

7. आधुनिक व्यवसाय के लिए उपयुक्त – आधुनिक व्यवसाय बहुत बड़े और जटिल होते हैं, जिनमें प्रशासनिक और आर्थिक अनेक प्रकार की समस्याएँ होती हैं जो इस संगठन द्वारा सरलता से सुलझायी जा सकती हैं।

8. सोचने और करने में स्पष्ट भेद – इसमें सोचने और करने की क्रियाओं को एक-दूसरे से अलग-अलग कर दिया गया है। सोचने वाले होते हैं विशेषज्ञ तथा करने वाले होते हैं कर्मचारी। अत: कार्य अधिक सुचारु रूप से सम्पन्न होता है।

9. विशेषज्ञों की नियुक्ति – इसमें उच्च अधिकारियों को परामर्श देने हेतु विशेषज्ञों की नियक्ति की जाती है जिससे कार्य में गलती होने की सम्भावना कम हो जाती है तथा उत्पादन लागत कम करके लाभ में वृद्धि की जा सकती है।

10. लोच – उद्योग के आकार में वृद्धि होने पर अधिक कर्मचारियों के कार्यों पर आसानी से नियन्त्रण किया जा सकता है, अत: यह प्रणाली लोचदार है।

रेखा व कर्मचारी संगठन के दोष 

(Disadvantages of Line and Staff Organization)  

रेखा एव कर्मचारी संगठन के प्रमुख दोष निम्नलिखित हैं

1. भ्रम की आशंका – कर्मचारियों के कर्तव्यों के स्पष्ट विभाजन न होने के कारण भ्रम उत्पन्न होने की आशंका रहती है।

2. संघर्ष की सम्भावना – जब विशेषज्ञों की राय कर्मचारी नहीं समझ पाते तब इन दोनों में संघर्ष उत्पन्न हो जाता है जिससे संस्था में शान्ति एवं अनशासन में कमी आती है।

3. छोटी इकाइयों के लिए अनुपयुक्त – विशेषज्ञों को दिए जाने वाले पारिश्रमिक तथा अनुसंधान पर होने वाले व्यय के रूप में उपक्रम पर अतिरिक्त व्यय का भार पड़ता है। इसाल छोटी इकाइयों के लिए यह पद्धति अनार्थिक सिद्ध होती है।

4. खर्चीली पद्धति—इसमें अधिक संख्या में विशेषज्ञों की नियुक्ति किए जाने के कारण यह प्रणाली अपेक्षाकृत अधिक खर्चीली है।

5. नीरसताइस प्रणाली के अन्तर्गत अत्यधिक विशिष्टीकरण पाया जाता है, जिसके फलस्वरूप एक ही कार्य को एक व्यक्ति वर्षों तक करते रहने से उकता जाता है। निरन्तर एक ही कार्य करते रहने तथा कार्य परिवर्तन न होने के कारण सम्बन्धित कर्मचारी उस कार्य से ऊब जाता है तो उसका जीवन नीरस बन जाता है।

6. विशेषज्ञों पर अत्यधिक निर्भरता – इसमें प्रत्येक क्रिया विशेषज्ञों की सलाह द्वारा सम्पन्न होती है, जिससे कार्य करने वाले की बुद्धि मन्द पड़ जाती है तथा यह सोचने योग्य नहीं रहता।

7. उत्तरदायित्व का निश्चित होना कठिन – विशेषज्ञों द्वारा दी गई राय से यदि उपक्रम को हानि होती है तो इसके लिए विशेषज्ञों को उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता और कभी-कभी तो यह निश्चित करना कठिन हो जाता है कि हानि विशेषज्ञों की गलत सलाह के कारण हुई है अथवा उस सलाह के व्यवहार में लाने में कोई त्रुटि रह जाने से हुई है।

8. निर्बल रेखा नेतृत्व – इस प्रणाली में रेखा अधिकारियों की सहायता एवं सलाह के लिए विशेषज्ञ लोग होते हैं, इसलिए प्रायः देखा गया है कि अधिकारी आरामपसन्द हो जाते हैं और अपना सारा काम विशेषज्ञों के सुपुर्द कर आराम करने लगते हैं, फलत: अधिकारियों में नेतृत्व के गुणों की कमी हो जाती है और व्यवसाय में ह्रास होने लगता है।

प्रश्न 4 – औपचारिक एवं अनौपचारिक संगठन से आप क्या समझते हैं? दोनों में अन्तर स्पष्ट कीजिए तथा संगठन के सिद्धान्तों की व्याख्या कीजिए।

What do you understand by Formal and Informal Organization ? Differentiate between the two and explain the principles of organization. 

उत्तर – औपचारिक एवं अनौपचारिक संगठन

(Formal and Informal Organization) 

सम्बन्धों के आधार पर संगठन को निम्नलिखित दो भागों में विभाजित किया जा सकता है—

(1) औपचारिक संगठन तथा (2) अनौपचारिक संगठन।

इनका विस्तृत विवेचन निम्नलिखित शीर्षकों के अन्तर्गत किया जा सकता है

1. औपचारिक संगठन (Formal Organization)-प्रबन्ध द्वारा संगठन के लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए स्वेच्छा से निर्मित संगठन संरचना ही औपचारिक संगठन कहलाता है। लुईस ए० एलन के अनुसार, “औपचारिक संगठन सुपरिभाषित कार्यों की एक ऐसी प्रणाली है जिसमें प्रत्येक कार्य के लिए अधिकार, जिम्मेदारी तथा हिसाबदेयता का निश्चित मापदण्ड होता है तथा सम्पूर्ण संरचना सोच-समझकर इस प्रकार की जाती है कि उपक्रम के व्यक्ति अपने उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए एकसाथ मिलकर अधिक प्रभावपूर्ण ढंग से कार्य कर सकें।” अधिकृत रूप से उपक्रम के लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए एक औपचारिक संगठन बनाया जाता है जिसमें सभी व्यक्तियों की संगठनात्मक स्थिति, अधिकार-दायित्व, सम्बन्ध, सम्प्रेषण प्रवाह पूर्व निश्चित तथा स्पष्टतया परिभाषित होता है। संगठन चार्ट द्वारा यह सम्बन्ध लिखित में प्रदर्शित किया जाता है। औपचारिक संगठन में बॉस अपने अधीनस्थों को आवश्यक आदेश व निर्देश देने का अधिकार रखता है और अधीनस्थों से उन आदेश व निर्देशों के पास करने की अपेक्षा की जाती है।

2. अनौपचारिक संगठन (Informal Organization)-कार्य-स्थल पर कार्यरत व्यक्तियों के मध्य आकस्मिक पैदा हुए मनोवैज्ञानिक व सामाजिक सम्बन्धों से जो क्रियाएँ तथा आपसी समझ विकसित हो जाती है वह अनौपचारिक संगठन का रूप धारण कर लेती है। कार्य कर रहे लोग साथ ही साथ भाषा, धर्म, स्वभाव, कार्य-प्रकृति आदि के आधार पर समूहों में बँट जाते हैं, परन्तु व्यक्तिगत रूप से या भावनात्मक रूप से प्रत्येक समूह के लोग एकजुट होते हैं। कीथ डेविस के अनुसार, “प्रत्येक संस्था में औपचारिक सम्बन्धों को अनौपचारिक संगठन के नाम से जाना जाता है। यह अनौपचारिक संगठन का पूरक होता है तथा प्रबन्ध के सभी स्तरों पर पाया जाता है। अनौपचारिक संगठन नितान्त व्यक्तिगत होता है जो नियम व विधियों की अपेक्षा मानवीय व्यवहार तथा रुचि से प्रेरित होता है।’ इस संगठन को अंगूरीलता (grapewine) की | संज्ञा भी दी जाती है क्योंकि मौखिक रूप से इसमें अफवाहें बड़ी तीव्र गति से फैलती हैं जो कभी-कभी औपचारिक संगठन के लिए बड़ी चुनौती साबित होती हैं।

प्रश्न 5 – विभागीकरण से आप क्या समझते हैं? इसके विभिन्न प्रारूपों की उनके सापेक्षित गुण-दोष बतलाते हुए व्याख्या कीजिए।

What do you mean from departmentation ? Explain its different forms stating their comparative merits-demerits. 

उत्तर – विभागीकरण की अवधारणा एवं परिभाषा

(Concept and Definition of Departmentation) 

विभागीय संगठन कार्य प्रक्रिया का एक मत्त्वपूर्ण अंग है। इस प्रक्रिया में सर्वप्रथम एक संस्था के समस्त कार्यों को व्यक्तिगत जॉब के रूप में व्यवस्थित किया जाता है। जैसे एक फर्नीचर निर्माण करने वाली कम्पनी में लकड़ी की चिराई, उसमें से मेज अथवा कुर्सी अथवा अन्य प्रकार का फर्नीचर बनाने के लिए सही आकार की लकड़ी की कटाई, फिर उन कटे हुए

टुकडों की घिसाई. संयोजन (assembling) पॉलिशिंग आदि भिन्न-भिन्न कार्य हैं। इन को व्यक्ति विशेष के अनसार जॉब में व्यवस्थित किया जा सकता है; जैसे कुर्सी तथा मेजो” पैर तैयार करने का काम ‘अ’ व्यक्ति को दिया जाए; कुर्सी, मेज व अन्य फर्नीचर पर पॉलिशिंग का कार्य ‘ब’ व्यक्ति को दिया जाए आदि।

(1) डब्ल्यू. जैक डंकन के अनुसार, “विभागीकरण संगठनों का क्षैतिक (horizontal) डिजायन है और यह विशिष्टीकरण एवं विकेन्द्रीकरण से घनिष्ट रूप से सम्बन्धित है।”

(2) मोंडी, होल्म्स एवं फ्लिप्पो के अनुसार, “संगठन संसाधनों के अधिक प्रभावपूर्ण एवं दक्षतापूर्ण समन्वय हेतु सम्बन्धित कार्यों अथवा वृहत् क्रियाओं को समूहबद्ध करना ही विभागीकरण कहलाता है।”

(3) लियोनार्ड जे० काजमीर के अनुसार, “संगठन में किसी भी स्तर पर, न कि केवल विभागीय स्तर पर, क्रियाओं का समूहीकरण, विभागीकरण कहलाता है।”

विभागीकरण के प्रारूप, प्रकार या आधार 

(Patterns, Types or Bases of Departmentation) 

आदिकाल में जब व्यवसाय कुटीर उद्योग के रूप में था, विभागीकरण की आवश्यकता न थी क्योंकि उद्योगपति स्वयं सारे कार्यों की देखभाल व प्रबन्ध कर लेता था। आज भी कुटीर उद्योगों अथवा लघुस्तरीय फर्मों में फर्म का स्वामी सभी कर्मचारियों से प्रत्यक्ष सम्बन्ध रखने में समर्थ है और वह विभिन्न विभागों की रचना करके वेतन व्ययों में अनावश्यक वृद्धि नहीं करना चाहता। इस संगठन संरचना को आदिकालीन संगठन (Primitive organization) के नाम से जाना जाता है।

आधुनिक समय में विभागीकरण के निम्नलिखित प्रमुख आधार या प्रारूप प्रचलित हैं

I. कार्यानुसार विभागीकरण; 

II. उत्पादानुसार विभागीकरण; 

III. क्षेत्रानुसार विभागीकरण; 

IV. ग्राहकों के अनुसार विभागीकरण;

V. मिश्रित विभागीकरण। 

I. कार्यानुसार विभागीकरण (Departmentation by Enterprise Function)

उपक्रम के कार्यों के अनुसार क्रियाओं को समूहबद्ध करके विभागीकरण करने की विधि सर्वाधिक प्रचलित विधि है। इस विधि में उपक्रम के सम्पूर्ण कार्यों को विभिन्न विभागों में इस तरह समूहबद्ध किया जाता है कि प्रत्येक विभाग अपने से सम्बन्धित कुछ विशिष्ट कार्यों को करने का दायित्व ले लेता है। ये विभाग एक निर्माणी उपक्रम में उत्पादन विभाग, विक्रय विभाग, वित्त एवं लेखा विभाग आदि हो सकते हैं। इसी प्रकार एक व्यापारिक संगठन में ये विभाग क्रय विभाग, विक्रय विभाग तथा वित्त एवं लेखा विभाग हो सकते हैं। सेवा संगठनों जैसे अस्पतालों, विश्वविद्यालयों में विभागों के नाम औद्योगिक उपक्रम से भिन्न हो सकते हैं। एक विश्वविद्यालय में परीक्षा विभाग, कॉलेज सम्बद्ध विभाग, सामान्य प्रशासन विभाग, लेखा एवं वित्त विभाग हा सकते हैं।

वृहतस्तरीय फर्मों में इन विभागों के अन्तर्गत ही कुछ उपविभागों का सृजन कर लिया जाता है जो क्रियाओं के एक समूह विशेष से ही सम्बन्ध रखता है।

गुण या लाभ (Merits or Advantages)-उपक्रम के कार्यानुसार विभागीकरण के निम्नलिखित लाभ या गुण हैं

(1) इस वर्गीकरण के अन्तर्गत प्रत्येक विभाग में क्रियाओं के विशिष्टीकरण द्वारा अधिकारियों को अच्छा प्रशिक्षण प्राप्त होता है।

(2) इस वर्गीकरण के अन्तर्गत सर्वोच्च प्रबन्ध का कम्पनी पर नियन्त्रण बना रहना सम्भव होता है।

(3) इस वर्गीकरण के अन्तर्गत प्रत्येक विभाग का अपना महत्त्व होता है तथा प्रबन्ध संचालक के लिए सभी विभागों का समान महत्त्व रहता है। प्रत्येक विभागीय प्रबन्धक अपने विभाग के कार्य के लिए उत्तरदायी होने के कारण कम्पनी का कार्य-संचालन दक्षतापूर्ण तरीके से करता रहता है।

(4) कार्य के अनुसार वर्गीकरण तार्किक (logic) दृष्टि से सर्वोत्तम है।

(5) यह वर्गीकरण व्यावसायिक विशिष्टता पर आधारित है। प्रत्येक विभाग तथा उप-विभाग का प्रबन्धक अपने कार्य का विशेषज्ञ होता है।

दोष या हानियाँ (Demerits or Disadvantages)-उपक्रम के कार्यानुसार विभागीकरण के निम्नलिखित दोष या हानियाँ हैं-

(1) चूँकि कार्यानुसार विभागीकरण के अन्तर्गत फर्म के सभी उत्पादों के विक्रय का कार्य अकेला विक्रय विभाग ही देखता है, अत: ग्राहकों की पूर्ण सन्तुष्टि कर पाना सम्भव नहीं होता।

(2) चूँकि विभागीकरण में प्रबन्धक मात्र एक विभाग से सम्बन्धित कार्यों से संलग्न रहता है, अत: सर्वोच्च प्रबन्धक के पदों के लिए चतुर्मुखी अनुभव रखने वाले प्रबन्धकों का अभाव हो जाता है।

(3) विभागीकरण के कारण प्रत्येक विभाग के कर्मचारियों व प्रबन्धकों की वफादारी विभाग के प्रति हो जाती है। अत: वे विभागीय लक्ष्यों को पूरा करने पर ध्यान देते हैं और सम्पूर्ण उपक्रम के लक्ष्य नज़रअंदाज़ कर दिए जाते हैं।

(4) विभिन्न विभागों के मध्य आन्तरिक दुश्मनी व संघर्ष उत्पन्न हो जाते हैं जिनका फर्म की कार्यक्षमता पर विपरीत प्रभाव पड़ता है।

(5) विभागीकृत संगठन के अन्तर्गत लाभों की जिम्मेदारी विभागीय प्रबन्धकों की न होकर प्रबन्ध संचालक या मुख्य प्रबन्धक की होती है। एक बड़े आकार वाली फर्म में अकेले व्यक्ति पर लाभों का पूर्ण दायित्व डाला जाना असहनीय बन जाता है।

(6) विभिन्न विभागों के मध्य समन्वय करना कठिन हो जाता है।

इस प्रकार हम देखते हैं कि कार्यानुसार विभागीकरण में गुण और दोष दोनों ही विद्यमान हैं और जब एक फर्म में कार्यानुसार विभागीकरण के दोष स्पष्ट होकर सामने आ जाते हैं तो फर्म बहुधा उत्पादानुसार विभागीकरण को अपनाने लगती है। 

II. उत्पादानुसार विभागीकरण (Departmentation by Product)

क्रियाओं का उत्पाद या उत्पाद श्रृंखला के अनुसार विभागीकरण वृहतस्तरीय एवं बहुसंख्यक उत्पादन वाले उपक्रमों के लिए महत्त्वपूर्ण माना जाता है। इसीलिए सन् 1920 के

दशक में इस विभागीकरण की विधि को सर्वप्रथम यू०एस०ए० की दो ख्याति प्राप्त कम्पनियों का पोट (Du Pont) तथा जनरल मोटर्स (General Motors) ने अपनाया। इस विधि को अपना वाली अधिकांश कम्पनियाँ प्रारम्भ में कार्यानुसार विभागीकरण पर ही आधारित रही थीं, परन्त फी के विकास के परिणामस्वरूप जब विभिन्न विभागीय प्रबन्धकों को कठिनाई का अनुभव हआ तशा प्रबन्ध कार्य जटिल होने लगा तो फर्म का उत्पादानुसार विभागीकरण किया गया।

उत्पादानुसार विभागीकरण के अन्तर्गत प्रत्येक उत्पाद श्रृंखला के आधार पर स्वशासी विभागों का सृजन किया जाता है; जैसे एक इलेक्ट्रॉनिक कम्पनी में रेडियो विभाग, टेलीविजन विभाग, टेप रिकॉर्डर विभाग, कम्प्यूटर विभाग बनाए जा सकते हैं। इनमें से प्रत्येक विभाग. लगभग एक पृथक् फर्म की तरह कार्य करता है। प्रत्येक विभाग में उत्पादन, विक्रय, इंजीनियरी, शोध आदि कार्यों के लिए उप-विभाग बना दिए जाते हैं। इस प्रकार प्रत्येक विभाग अपनी प्रगति तथा लाभ-हानि के लिए उत्तरदायी हो जाता है। सेवा उपक्रमों में तो उत्पाद विभागीकरण विधि आवश्यक ही हो गई है; जैसे सामान्य बीमा कम्पनी में स्वास्थ्य बीमा, दुर्घटना बीमा, अग्नि बीमा, फसल बीमा आदि सेवानुसार विभाग हो सकते हैं।

गुण या लाभ (Merits or Advantages)-उत्पादानुसार विभागीकरण के निम्नलिखित लाभ हैं –

(1) उत्पाद विभागीकरण में एक विभाग पूर्णतया एक उत्पाद के निर्माण, विक्रय, शोध आदि सभी पहलुओं पर ध्यान केन्द्रित करता है जिससे उत्पाद में नवीनता व सुधार को प्रोत्साहन मिलता है।

(2) उत्पाद विभागीकरण विधि में मुख्य जोर ग्राहकों की आवश्यकता की सन्तुष्टि पर रहता है जो उपक्रम के तीव्र विभाग के लिए आवश्यक है।

(3) उत्पादन विभागीकरण विधि में पर्याप्त मात्रा में संगठनात्मक लोच पायी जाती है। फर्म की आवश्यकतानुसार किसी भी उत्पादन विभाग को बन्द किया जा सकता है, दूसर उत्पादन विभाग के साथ मिलाया जा सकता है तथा नया उत्पाद विभाग आसानी से स्थापित किया जा सकता है।

(4) उत्पाद विभागीकरण में विभागीय प्रबन्धक को अपने विभाग के सभी कार्यो; जत उत्पादन, विक्रय, इंजीनियरी आदि को देखना होता है। अत: वह चतुर्मुखी प्रतिभा व अनुभव वाला प्रबन्धक बन जाता है जिससे उपक्रम में सर्वोच्च प्रबन्धक के पदों को भरने का निरन्तर व्यक्ति प्राप्त होते रहते हैं।

(5) उत्पाद विभागीकरण में प्रत्येक उत्पाद या विभाग के लाभ-हानि का अनुमान से लगाया जा सकता है, जिससे कि सर्वोच्च प्रबन्ध द्वारा विभागीय मूल्यांकन करना आसान हो जाता है।

दोष या हानियाँ (Demerits or Disadvantages)-उत्पाद विभागा में अनलिखित दोष पाए जाते हैं

(1) उत्पाद विभागीकरण में कार्यात्मक विशेषज्ञों के मध्य आपसी विचार-विमर्श का अभाव हो जाता है क्योंकि वे पृथक् रूप से केवल अपने-अपने विभाग के कार्यों से सम्बन्ध रखने लगते हैं।

(2) उत्पाद विभागीकरण के अन्तर्गत चूँकि प्रत्येक विभाग लगभग स्वतन्त्र होता है, अत: शीर्ष प्रबन्धक का नियन्त्रण कम हो जाता है और विभागीय समन्वय की समस्या उत्पन्न हो जाती है।

(3) उत्पाद विभागीकरण विधि में प्रत्येक विभाग के लिए समान कार्य; जैसे क्रय, इंजीनियरी, कर्मचारी नियुक्ति अलग-अलग करने होते हैं। इससे स्टाफ लागतों में वृद्धि हो जाती है। 

III. क्षेत्रानुसार विभागीकरण 

(Departmentation by Territories or Geographical Area)

क्षेत्रानुसार विभागीकरण से आशय ऐसे विभागीकरण से है जिसमें राष्ट्र, प्रान्त या अन्य किसी भौगोलिक क्षेत्रों के आधार पर विभागों का सृजन किया जाता है। विभागीकरण की यह विधि उन वृहतस्तरीय उपक्रमों के लिए उपयुक्त मानी जाती है जो एक विस्तृत क्षेत्र में आवश्यक सेवाएँ प्रदान करते हों; जैसे—विद्युत आपूर्ति, टेलीफोन सेवा, पोस्टल सेवा, बैंकिंग एवं बीमा सेवाएँ आदि। इसके अतिरिक्त यह विभागीकरण बहुराष्ट्रीय कम्पनियों (Multinational Corporations) के लिए भी उपयुक्त माना जाता है क्योंकि उनका कार्यक्षेत्र एक से अधिक देशों तक फैला होता है जिनमें कार्य का वातावरण, औद्योगिक कानून, परम्पराएँ तथा संस्कृति भिन्न-भिन्न प्रकृति की होती हैं।

गुण या लाभ (Merits or Advantages)-क्षेत्रानुसार विभागीकरण के निम्नलिखित लाभ हैं

(1) इसमें विभिन्न क्षेत्रीय विभागों में कार्यरत प्रबन्धकों को, जो कुल संगठन संरचना के मध्यम स्तर वाले प्रबन्धक कहे जा सकते हैं, पर दायित्व डालना सम्भव होता है। इस प्रकार वे उत्तरदायी प्रबन्धक बन जाते हैं।

(2) इस विधि में एक उपक्रम क्षेत्रीय विभागों द्वारा क्षेत्रों की कानूनी, राजनीतिक तथा सांस्कृतिक प्रथाओं का लाभ उठा सकता है। वहाँ के स्थानीय, प्राकृतिक एवं मानवीय संसाधनों का उपयोग कर सकता है।

(3) विभिन्न क्षेत्रीय विभागों में कार्यरत प्रबन्धक सामान्य की दृष्टि से पूर्णरूपेण प्रशिक्षित हो जाते हैं और इस प्रकार एक उपक्रम को केन्द्रीय स्तर पर सर्वोच्च प्रबन्ध के पदों के लिए अनुभवी व प्रशिक्षित प्रबन्धक सुलभ हो जाते हैं।

(4) इसमें क्षेत्रीय विभाग वहाँ की स्थानीय दशाओं में ढाला जा सकता है जिससे कि वहाँ के निवासियों को यह अनुभव न हो कि यह उपक्रम विदेशी है।

दोष या हानियाँ (Demerits or Disadvantages) क्षेत्रानुसार विभागीकरण के निम्नलिखित दोष (हानियाँ) हैं

(1) इसमें अधिक प्रबन्धकीय स्टाफ की आवश्यकता पड़ती है क्योंकि प्रत्येक क्षेत्रीय विभाग में पृथक् संगठन निर्मित करना होता है। इससे स्टाफ लागत बढ़ जाती है।

(2) चकि विभिन्न क्षेत्रीय विभाग पर्ण संगठन के साथ लगभग स्वतन्त्र स्थिति विकसित होते हैं अत: इन विभागों पर केन्द्रीय नियन्त्रण बनाए रखने में कठिनाई होती है और विभिन्न विभागों के मध्य समन्वय की समस्या पैदा हो जाती है। 

IV. ग्राहकों के अनुसार विभागीकरण (Departmentation by Customers) __ 

ग्राहकों के अनुसार विभागीकरण सामान्यतया उन उपक्रमों द्वारा अपनाया जाता है जिनके कि ग्राहक भिन्न-भिन्न श्रेणी के होते हैं और कम्पनी यह अनुभव करती है कि बेहतर सेवा के लिए उसे अपने विभिन्न ग्राहक समूहों की विशिष्ट आवश्यकताओं को ध्यान में रखना होगा; जैसे कि एक बैंक औद्योगिक ऋण, कृषि ऋण, आवास ऋण, उपभोक्ता ऋण के लिए पृथक्-पृथक् विभागों का सृजन करती है, उसी प्रकार एक विद्युत ट्रांसफार्मर निर्माण करने के लिए कम्पनी के ग्राहक विद्युत बोर्ड, थोक व्यापारी व विदेशी ग्राहक हो सकते हैं। इन तीनों प्रकार के ग्राहकों की विशिष्ट आवश्यकताएँ हैं; जैसे विद्युत बोर्ड, ट्रांसफार्मर लगाने तथा मरम्मत करने की इच्छा कम्पनी से रखेंगे जबकि एक थोक विक्रेता छोटे ट्रांसफार्मरों का ग्राहक होगा और वह अच्छी क्वालिटी तथा सुन्दर वस्तु की कम्पनी से अपेक्षा करेगा ताकि वह ट्रांसफार्मरों को फुटकर व्यापारियों व उपभोक्ताओं को आसानी से विक्रय कर सके।

गुण या लाभ (Merits or Advantages)-ग्राहकों के अनुसार विभागीकरण के निम्नलिखित लाभ हैं

(1) यह विभागीकरण ग्राहकों की आवश्यकताओं को सन्तुष्ट करता है, अत: विक्रय में वृद्धि सम्भव होती है।

(2) इसके अन्तर्गत प्रत्येक विभाग का मूल्यांकन पृथक्-पृथक् ग्राहक समूहों को किए गए विक्रय के आधार पर किया जा सकता है।

(3) इस विभागीकरण के अन्तर्गत प्रत्येक विभाग लगभग स्वतन्त्र होने के कारण मध्यस्तरीय प्रबन्धकों को चतुर्मुखी अनुभव व प्रशिक्षण प्राप्त हो जाता है और सर्वोच्च प्रबन्ध के पदों के लिए नियमित पूर्ति बनी रहती है।

दोष या हानियाँ (Demerits or Disadvantages)-ग्राहकों के अनुसार विभागीकरण की निम्नलिखित हानियाँ हैं

(1) इसमें प्रत्येक विभाग में कार्यात्मक आधार पर पूर्ण संगठन संरचना करनी होती है अत: स्टाफ लागत बढ़ जाती है।

(2) प्रत्येक ग्राहक समूह अपने लिए विशिष्ट सुविधाएँ या छूटें प्राप्त करने के लिए दबाव डालता है।

(3) लगभग स्वतन्त्र विभाग होने के कारण इनमें समन्वय बनाए रखना कठिन हो जाता है।

(4) चूँकि प्रत्येक ग्राहक समूह की माँग में बराबर वृद्धि होती है अतः उन विभागों में जिनमें माँग में वृद्धि कम रही है, संसाधनों का पूर्ण प्रयोग नहीं हो पाता।

v. मिश्रित विभागीकरण (Mixed or Combined Departmentation) ___

इसमें पूर्व वर्णित विभागीकरण की विभिन्न विधियों को मिलाकर मिश्रित विभागीकरण बनता है। यह मिश्रित विभागीकरण वृहतस्तरीय उन उपक्रमों के लिए उपयुक्त है जिनका कार्य किसी एक विभागीकरण प्रारूप के अपनाने से नहीं चल पाता। आज भी अधिकांश बड़ी-बड़ी कम्पनियाँ, विशेषकर बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ मिश्रित विभागीकरण को प्राथमिकता देती हैं।

गुण या लाभ (Merits or Advantages)-मिश्रित विभागीकरण के निम्नलिखित लाभ हैं –

(1) इसमें कई विभागीय प्रारूपों की अच्छाइयाँ शामिल हो जाती हैं।

(2) इसमें उपक्रम या संस्था को सामान्य प्रबन्धक व विशेषज्ञ उपलब्ध हो जाते हैं, क्योंकि जहाँ कुछ लोग कार्यानुसार विभागीकरण के अन्तर्गत विशेषज्ञता प्राप्त करते हैं तो कुछ अन्य उत्पाद एवं क्षेत्रीय विभागीकरण के अन्तर्गत सामान्य प्रबन्ध में दक्ष हो जाते हैं।

दोष या हानियाँ (Demerits or Disadvantages)-मिश्रित विभागीकरण के निम्नलिखित दोष हैं

(1) इसमें स्टाफ पर व्यय बहुत बढ़ जाता है यह छोटे या मध्यम आकार वाले उपक्रमों के लिए उपयुक्त नहीं है।

(2) इसमें विभागीकरण इतना विस्तृत हो जाता है कि मुख्य प्रबन्धक के सामने विभिन्न विभागों में समन्वय की समस्या उत्पन्न हो जाती है।

(3) इसमें कभी-कभी ‘आदेश की एकता सिद्धान्त’ का उल्लंघन भी होने लगता है जिससे फर्म को हानि होती है।

प्रश्न 6 – उत्तरदायित्व की परिभाषा दीजिए। क्या यह जवाबदेही से भिन्न है? क्या इसका भारार्पण हो सकता है?

Define responsibility. Is it different from accountability ? Can it be delegated. 

उत्तर – उत्तरदायित्व का अर्थ

(Meaning of Responsibility) 

सामान्यत: उत्तरदायित्व को कर्तव्य अथवा क्रिया के रूप में प्रयोग किया जाता है तथा उत्तरदायित्व एवं जवाबदेही इसके पर्यायवाची माने जाते हैं। उत्तरदायित्व के सम्बन्ध में कहा जा सकता है कि उच्च अधिकारी के आदेशानुसार कार्य करने का भार ही उत्तरदायित्व है। इसके सम्बन्ध में विभिन्न विद्वानों ने अपने विचार निम्नलिखित रूप से व्यक्त किए हैं –

जाज आर० टैरी के शब्दों में, “उत्तरदायित्व किसी व्यक्ति का ऐसा आबन्धन है, जिससे वह सौंपी गई क्रियाओं को अपनी श्रेष्ठतम योग्यता से पूरा करे।’

कुण्ट्ज एवं ओडोनेल के शब्दों में, “उत्तरदायित्व को, किसी कर्मचारी के आबन्धन रूप में जिसे कोई कार्य निष्पादन के लिए सौंपा गया है, परिभाषित किया जा सकता है।

उत्तरदायित्व के प्रकार

(Types of Responsibility) 

उत्तरदायित्व निम्न प्रकार के होते हैं

1. विशिष्ट उत्तरदायित्व – जब किसी अधिकारी की नियुक्ति किसी कार्य विशेष को सम्पादित करने के लिए ही की गई हो तो उस कार्य को करने का भार उस अधिकारी का विशिष्ट उत्तरदायित्व कहलाएगा और उस कार्य के समाप्त हो जाने के पश्चात् विशिष्ट उत्तरदायित्व भी स्वत: ही समाप्त हो जाएगा। उदाहरण के लिए विज्ञापन विशेषज्ञ एवं वित्त विशेषज्ञ के उत्तरदायित्व इसी श्रेणी में आते हैं।

2. चालू उत्तरदायित्व – जब किसी सतत कार्य का भार एक प्रबन्धक द्वारा किसी अन्य प्रबन्धक को सौंपा जाता है, तो इसे चालू उत्तरदायित्व कहते हैं। चालू उत्तरदायित्व कभी समाप्त नहीं होता वरन् इसका हस्तान्तरण एक अधिकारी से दूसरे अधिकारी को होता रहता है। उदाहरण के लिए निर्बाध गति से चलने वाली मशीनों की देख-भाल का उत्तरदायित्व इसी श्रेणी में आता है।

उत्तरदायित्व का भारार्पण नहीं किया जा सकता कोई भी प्रबन्धक यदि अपने अधिकारों का भारार्पण अन्य कर्मचारियों या अधिकारियों को करता है तो यह उसकी कार्यशैली में निखार ला देता है तथा अन्य व्यक्तियों से काम कराना सरल कर देता है, लेकिन प्रबन्धक या शीर्ष नेतृत्व के कुछ उत्तरदायित्व भी होते हैं, जिन्हें वह स्वयं ही पूरे कर सकता है, अन्य व्यक्ति नहीं। उत्तरदायित्व या कर्त्तव्यपालन व्यक्तिगत होता है जिसे अन्यों पर नहीं डाला जा सकता है। उत्तरदायित्व का निर्वाह अधिकारी या प्रबन्धक का स्वयं होना चाहिए उसकी जवाबदेही भी स्वयं की होती है अर्थात् वह अपने दायित्व की जिम्मेदारी अन्य पर हस्तान्तरित करके बेच नहीं सकता है। इसीलिए कहा जाता है कि उत्तरदायित्व का भारार्पण नहीं किया जा सकता है। उत्तरदायित्व के हस्तान्तरण के निम्नलिखित दोष या हानियाँ हैं

1. प्रेरणा का अभाव – यदि श्रेष्ठी वर्ग ने अपने दायित्वों को अन्य व्यक्तियों पर हस्तान्तरित कर दिया है तो उन व्यक्तियों को दायित्वबोध हमेशा सताता रहेगा एवं वे सहज होकर काम नहीं कर पाएंगे, इस तरह उन्हें कार्य करने की प्रेरणा नहीं मिल सकेगी।

2. जवाबदेही का निर्धारण प्रबन्धक यदि अपने उत्तरदायित्व को भी अन्य कर्मचारियों को भारार्पण कर देता है, तब उस निश्चित कार्य की पूर्णता की जवाबदेही किसका हो यह निर्धारण करना मुश्किल हो जाता है? उत्तरदायित्व का निर्वहन करना चाहिए या काय अपूर्ण या गलत हो जाने पर कौन जिम्मेदार हो यह तय करना मुश्किल हो जाता है।

3. उपयोगिता में हास – प्रबन्ध या प्रशासन अपने अधिकारों के साथ दायित्वों का ना हस्तान्तरण कर दें तो उनकी स्वयं की क्या उपयोगिता होगी? इस हस्तान्तरण से प्रबन्धक उपयोगिता में कमी आती है।

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