B.Com 2nd Year Promotion Of A Venture Long Notes In Hindi

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विस्तृत उत्तरीय प्रश्न 

प्रश्न एक उद्यमी के प्रमुख कार्यात्मक क्षेत्र क्या हैं? प्रत्येक का विस्तार से वर्णन कीजिए।

What are the main functional areas of an entrepreneur ? Describe each in detail. 

अथवा उद्यमी से क्या आशय है? उसकी प्रमुख विशेषताओं की विवेचना कीजिए तथा उद्यमी के प्रमुख कार्य बताइए।

What is meant by Entrepreneur ? Discuss his main characteristics and describe his main functions.

उत्तर – ‘उद्यमी’ शब्द; फ्रेंच भाषा के ‘एण्ट्रीपेण्ड्री’ (entrependre) से लिया गया है जिसका अर्थ है ‘एकाकी व्यक्ति’-वह व्यक्ति जो किसी नवीन उपक्रम की स्थापना का जोखिम उठाता है। सर्वप्रथम, फ्रांसीसी अर्थशास्त्री रिचर्ड केण्टीलोन ने ‘उद्यमी’ शब्द का प्रयोग लिए किया था जो किसी उत्पाद को बेचने के लिए उसके मूल्य को भी, संसाधनों के उपयोग के लिए सदैव श्रेष्ठ अवसरों की खोज में रहता है। सुप्रासद्ध अर्थशास्त्री मार्शल के अनुसार, उद्यमी उद्योग का कप्तान होता है क्योंकि वह जोखिम एवं अनिश्चितता का केवल वाहक हा प्रबन्धक, भविष्यद्रष्टा, नवीनतम उत्पादन विधियों का आविष्कारक तथा आर्थिक ढाँचे का निर्माता भी होता है।

उद्यमी–अर्थ एवं परिभाषा

(Entrepreneur : Meaning and Definition) 

उद्धमी उपक्रम का सर्वोच्च अधिकारी एवं समाज का अभिन्न अंग होता है। एक ओर तो वह अपने उपक्रम की आन्तरिक व्यवस्था का प्रहरी होता है तथा दूसरी ओर अपने प्रतिस्पद्धियों का गातावधियों पर पूर्ण रूप से ध्यान केन्द्रित करते हए. सभी परिस्थितियों में नवीन अवसरों का सजन करता है। उद्यमी को विभिन्न नामों से जाना जाता रहा है-जोखिम वहन करन वाला (Risk-bearer), प्रवर्तक (Promoter), उपक्रम की स्थापना करने वाला (Undertaker), स्वामी (Owner), प्रबन्धक (Manager), संगठनकर्ता (Organizer), समन्वयकर्ता (Co-ordinator), संस्थापक (Founder) एवं नवप्रवर्तक (Innovator) आदि।

उद्यमी की प्रमुख परिभाषाएँ निम्नलिखित हैं___

(i) रिचर्ड केण्टीलोन के अनुसार, “उद्यमी वह व्यक्ति है जो किसी उत्पाद को अनिश्चित मूल्य पर बेचने के लिए निश्चित धनराशि देता है और तदनुसार उसे प्राप्त करने एवं साधनों का उपयोग करने का निर्णय लेता है।’

(ii) एफ० एच० नाइट के अनुसार, “उद्यमी विशिष्ट व्यक्तियों का वह समूह है जो जोखिम उठाता है और अनिश्चितता का सामना करता है।”

(iii) गेराल्ड ए० सिल्वर के शब्दों में, “उद्यमी वह व्यक्ति है जो किसी नई वस्तु या सेवा के विचार की कल्पना करता है और फिर उस वस्तु या सेवा का उत्पादन करने के लिए एक व्यवसाय की स्थापना हेतु पूँजी प्राप्ति के स्रोत की खोज करता है।”

ऑक्सफोर्ड आंग्ल शब्दकोश’ के अनुसार, “उद्यमी वह व्यक्ति अथवा विशेषत: अनुबन्धकर्ता है जो किसी उपक्रम की स्थापना करता है तथा जो पँजी व श्रमबीन मध्यस्थ का कार्य करता है।”

(iV)  आर०टी० इली के अनुसार, “उद्यमी वह व्यक्ति है जो उत्पादक घटक को संगठित एवं निर्देशित करता है।”

(vi) वालरस के अनुसार, “उद्यमी वह व्यक्ति है जो दूसरे व्यवसायियों से कच्चा माल, नियों से भमि, श्रमिकों से व्यक्तिगत अभिरुचियाँ, पूँजीपति से पूँजीगत माल खरीदता है तथा इनकी सेवाओं से निर्मित वस्तुओं को बेचता है।”

(vii) आर्थर डेविंग के मतानुसार, “उद्यमी वह व्यक्ति है जो विचारों को लाभदायक व्यवसाय में रूपान्तरित करता है।”

(viii) मार्शल के अनुसार, “उद्यमी विशेषज्ञ सेवा नियोजकों का वह समूह है जो जोखिम उठाता है, कार्य के लिए वांछित श्रम एवं पूँजी जुटाता है, अपनी सामान्य योजना का निर्माण एवं प्रबन्ध करता है और उसकी छोटी-छोटी बातों का निरीक्षण करता है।”

(ix) फ्रेन्ज के अनुसार, “उद्यमी प्रबन्धक से अधिक है। वह एक नवप्रवर्तक एवं प्रवर्तक दोनों है।”

(x) पीटर एफ० ड्रकर के अनुसार, “उद्यमी वह है जो सदैव परिवर्तन हेतु खोज करता है, उसका प्रत्युत्तर देता है और उसे एक अवसर मानते हुए उसका लाभ उठाता है।

(xi) जे० ए० शुम्पीटर के अनुसार, “उद्यमी एक ऐसा व्यक्ति है जो नवप्रवर्तन करता है, धन उठाता है, आदाओं को एकत्र करता है, निपुणता को संगठित करता है, नेतृत्व प्रदान करता है तथा संगठन की रचना करता है।”

(xii) हर्बटन ईवान्स के अनुसार, “उद्यमी वह व्यक्ति अथवा व्यक्तियों का समूह है जो संचालित किए जाने वाले व्यवसाय के निर्धारण का कार्य करता है।”

उपर्युक्त परिभाषाओं के आधार उद्यमी की एक उपयुक्त परिभाषा निम्न प्रकार दी जा सकती है__

उद्यमी वह व्यक्ति है जो व्यवसाय के लाभप्रद अवसरों की खोज करता है, संसाधनों (मानव-शक्ति), तकनीक, सामग्री एवं पूँजी आदि को एकत्रित करता है, नवप्रवर्तन को जन्म देता है तथा अपने चातुर्य एवं तीक्ष्ण दृष्टि से असाधारण परिस्थितियों का सामना करता है और लाभ कमाता है।

उद्यमी (साहसी) की विशेषताएँ

(Characteristics of Entrepreneur) 

उद्यमी की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

(1) उद्यमी नवप्रवर्तन का कार्य करता है। वह नए उपक्रम की स्थापना करता है, नए उत्पादों की खोज करता है, उत्पादन की पुरानी तकनीक के स्थान पर नई तकनीक अपनाता है तथा नए-नए बाजारों की खोज करता है।

(2) उद्यमी व्यवसाय की अनिश्चितताओं से उत्पन्न जोखिम उठाता है, यद्यपि उसका प्रयास इस जोखिम को न्यूनतम करना होता है।

(3) उद्यमी उत्पादन कार्य के लिए आवश्यक साधन (जैसे- भूमि, पूँजी, श्रम) आदि की व्यवस्था करता है।

(4) उद्यमी कार्य संस्कृति (Work Culture) में विश्वास करता है। वह स्वयं कठोर परिश्रम करता है और कर्मचारियों से भी कठोर परिश्रम की आशा करता है।

(5) उद्यमी स्वतन्त्र प्रकृति का होता है और वह अपना व्यवसाय करने में ही विश्वास रखता है।

(6) लघु व्यवसाय में उद्यमी ही व्यवसाय का संचालन एवं प्रबन्ध कार्य देखता है।

(7) उद्यमी सदैव अवसर की तलाश में रहता है। वह आर्थिक एवं व्यावसायिक अवसरों की खोज करके इनसे लाभ प्राप्त करने में सदैव तत्पर रहता है।

8. उधमी अपने व्यवसाय का संचालन एवं प्रबन्ध व्यावहारिकता के आधार पर करता है। यही कारण है कि आधनिक यग में उद्यम एक ‘पेशे’ (Profession) के रूप में विकसित हो रहा है। 

9. उधमी की एक प्रमुख विशेषता उसकी व्यावसायिक गतिशीलता

और व्यवसाय को rofessional Mobility) है। वह समाज को नई दिशा देता है आधुनिकता की ओर ले जाता है। 

(10) उद्यमी एक व्यक्ति अथवा व्यक्तियों का समह है। एक व्यक्ति भी व्यवसाय का प्रबन्ध कर सकता है और कछ व्यक्ति मिलकर (संयक्त उद्यमी) भा व्यवसाय को संचालित कर सकते हैं।

(11) उद्यमी स्वयं में एक संस्था है। वर्तमान समय में सरकार भी उद्यमी के रूप में एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रही है।

(12) उद्यमी की क्रियाएँ, उसकी क्षमता व रुचि सभी; उसके आस-पास के आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक व सांस्कृतिक वातावरण से प्रभावित होती हैं।

(13) उद्यम व्यक्ति की आन्तरिक क्षमता व योग्यता है। व्यवहारकुशलता, पहलपन, धैर्य, जोखिम उठाने की प्रवृत्ति, निर्णय लेने की क्षमता, नेतृत्व आदि गुण ही उद्यमीय क्षमता को विकसित करने में सहायक होते हैं।

(14) उद्यमी नवप्रवर्तक व प्रवर्तक दोनों होता है।

(15) उद्यमी का प्रतिफल लाभ होता है जो अनिश्चितता व जोखिम उठाने के फलस्वरूप उसे प्राप्त होता है।

(16) उद्यमी उद्योग का कप्तान होता है। उसकी सफलता का मूलमन्त्र कुशल नेतृत्व है।

(17) उद्यमिता एक सार्वभौमिक क्रिया है। आर्थिक व गैर-आर्थिक सभी क्षेत्रों में इसका प्रयोग होता है।

(18) उद्यमी सदैव नए-नए अवसरों की तलाश में रहता है और उनका इष्टतम विदोहन करने में सजग रहता है।

(19) उद्यमी परिवर्तन एवं शोध पर सर्वाधिक बल देता है।

(20) उद्यमी भविष्यद्रष्टा व समन्वयक होता है और उसका दष्टिकोण सदैव सकारात्मक होता है।

उद्यमी के प्रमुख कार्य

(Main Functions of Entrepreneur) 

वह व्यक्ति, जो उद्यमिता का कार्य सम्पादित करता है, उद्यमी कहलाता है। विभिन्न विटानों ने उद्यमी के भिन्न-भिन्न कार्यों को महत्त्व दिया है जिनमें से कछ का वर्णन निम्नवत् है

(1) एडम स्मिथ-(i) पूजा उपलब्ध कराना और (ii) प्रबन्ध करना।

(2) केण्टीलोन-(i) निश्चित मूल्य पर माल क्रय करना, (ii) परिवर्तित मूल्यों पर माल का विक्रय करना तथा (iii) जोखिम उठाना।

(3) जे० बी० से (1) उत्पादन के विभिन्न साधनों (भूमि, श्रम व पूँजी) को एकत्र करना. (ii) प्रबन्ध करना तथा (iii) जोखिम उठाना।

(4) जेम्स बनी – (i) व्यवसाय का प्रवर्तन करना, (ii) पूँजी की व्यवस्था करना, (ii) जोखिम उठाना, (iv) नवप्रवर्तन करना तथा (v) व्यवसाय का प्रबन्ध करना।

(5) शुम्पीटर – नवप्रवर्तन करना—यह नवप्रवर्तन निम्नलिखित में से किसी भी क्षेत्र में किया जा सकता है

(i) नई वस्तु का उत्पादन, (ii) उत्पादन की नई विधि का उपयोग, (iii) नवीन बाजारों का विकास, (iv) कच्चे व अर्द्ध-निर्मित माल की खोज तथा (v) नए संगठन का संचालन।

(6) बी० एफ० हॉसलिज – (i) अनिश्चितताओं को वहन करना, (ii) उत्पादन के साधनों में समन्वय (Co-ordination) स्थापित करना, (iii) नवप्रवर्तनों (Innovations) को लागू करना तथा (iv) पूँजी की व्यवस्था करना।

उपर्युक्त विवरण के आधार पर संक्षेप में, उद्यमी के कार्यों को निम्न प्रकार वर्णित किया जा सकता है

1. पहल एवं जोखिम वहन करना (Initiation and Risk-taking)-उद्यमी का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण कार्य व्यावसायिक क्रियाओं के प्रारम्भ करने में पहल करना तथा व्यावसायिक क्रियाओं में अनिश्चितताओं के चलते व्यावसायिक क्रियाओं की जोखिम उठाना है। यह जोखिम स्वयं की पूँजी एवं शक्ति के विनियोजन से उत्पन्न होती है।’

2. व्यावसायिक एवं आर्थिक क्षेत्रों में अवसरों की खोज करना (Search for the Economic and Business Opportunities)-समाज का प्रत्येक क्षेत्र भिन्न-भिन्न अवसरों से भरा-पूरा है। एक उद्यमी इन विभिन्न क्षेत्रों में व्याप्त अवसरों की खोज करता है, इनके बारे में आवश्यक ज्ञान प्राप्त करता है और अवसर आते ही इन अवसरों का भरपूर विदोहन करता है।

3. परियोजना नियोजन, प्रतिवेदन एवं अनुमोदन (Project Planning, Report and Approval)-किसी भी नई व्यावसायिक इकाई की स्थापना से पूर्व एक व्यवस्थित अभ्यास आवश्यक है। इसे ही परियोजना नियोजन कहते हैं। इसमें किसी भी नए प्रयोग को आरम्भ करने से पूर्व प्रारम्भिक शोध किए जाते हैं, आवश्यक सूचनाएँ तथा तथ्य एकत्रित किए जाते हैं और विभिन्न विकल्पों में से सर्वश्रेष्ठ विकल्प का चयन किया जाता है। उद्यमी चयनित विकल्प को प्रतिवेदन के रूप में तैयार कराता है जिसमें उत्पादित की जाने वाली वस्तु, वस्त के उत्पादन में आने वाली लागत, साधनों का एकत्रण, पूँजी विनियोजन आदि के बारे में विस्तत विवरण होता है। तत्पश्चात् वह उपक्रम का पंजीयन (Registration) कराने, आवश्यक सभी सुविधाएँ प्राप्त करने, बैंक एवं वित्तीय संस्थाओं से वित्त प्राप्त करने आदि के लिए इस प्रतिवेदन को विभिन्न विभागों में प्रस्तुत करता है।

4.उपक्रम की स्थापना एवं प्रबन्ध (Establishment and the Management of the Enterprise)-विभिन्न स्रोतों एवं सुविधाओं को देखते हुए उद्यमी अपनी पूर्व-निर्धारित योजना के अनुसार, उपक्रम को स्थापित करता है तथा कुशलतापूर्वक इसका प्रबन्ध करता है। बड़े उपक्रमों में उपक्रम के संचालन एवं प्रबन्ध का कार्य पेशेवर प्रबन्धकों द्वारा किया जाता हैं। जबकि लघु उपक्रमों में यह कार्य उद्यमी द्वारा स्वयं किया जाता है। उपक्रम की सफलता उचित प्रबन्धकीय प्रशिक्षण पर निर्भर करती है।

5. नववतन (Innovation)-नवप्रवर्तन उद्यमी का आधारभत कार्य है। वह शोध कास द्वारा तकनीकी एवं व्यावसायिक नवप्रवर्तन करता है और इस प्रकार समाज में पारवतन एवं नवीनता को जन्म देता है। इससे उत्पादों में नवीनता एवं विविधता आती है।

6. उद्यमिता विकास कार्यक्रमों में भाग लेना (Participation in Entrepreneurship Development Programmes)-विभिन्न वित्तीय एवं प्रबन्ध संस्थान उधामता विकास हेतु समय-समय पर संगोष्ठियाँ आयोजित करते हैं। उद्यमी इनमें भाग लेकर नवीन तकनीकी ज्ञान अर्जित करता है और व्यवसाय में इन्हें लागू करता है।

7. वितरणात्मक कार्य (Distributional Functions)-उत्पादन कार्य के लिए जुटाए गए संसाधनों को उद्यमी उनकी सेवाओं के बदले प्रतिफल प्रदान करता है। इस प्रकार उद्यमी ही उपक्रम की आय को विभिन्न साधनों में वितरित करता है।

8. सामाजिक विकास में योगदान (Contribution to Social Develpment)-समाज, जिसमें वह जन्मा, पला व बड़ा हुआ है, के प्रति भी उद्यमी अपने उत्तरदायित्व का निर्वहन करता है। अत: वह समाज के कल्याण में वृद्धि के लिए निरन्तर प्रयास करता है।

प्रश्न उद्यमशील व्यक्तित्व के मनोवैज्ञानिक लक्षणों का विश्लेषण कीजिए।

Analyse the Psychological Attributes of Entrepreneurial Personality. 

अथवा उद्यमी के मनोवैज्ञानिक लक्षणों को समझाइए। साथ ही उद्यमशील व्यवहार की मनोवैज्ञानिक विचारधाराओं का वर्णन कीजिए।

Explain the Psychological characteristics of an Entrepreneur. Also discuss the Psycho-theories of Entrepreneurial Behaviour. 

अथवा उद्यमी व्यवहारपर एक निबन्ध लिखिए।

Write an essay on Entrepreneurial Behaviour. 

उत्तर – उद्यमिता आर्थिक अवसरों एवं प्रेरणाओं का परिणाम होने के साथ-साथ एक

गानिक प्रक्रिया भी है। उद्यमिता के विकास में मूल रूप से व्यक्ति की स्वयं की मनोवत्ति. दष्टिकोण, चिन्तन, अभिप्रेरणा, आकांक्षा आदि का विशेष प्रभाव होता है, किन्तु इनके साथ-साथ समाज के मूल्यों, विश्वासो एवं व्यवहारों का भी उद्यमिता प्रवत्तियों के निर्माण में महत्त्वपूर्ण योगदान होता है।

उद्यमिता के मनोवैज्ञानिक घटक एवं लक्षण 

(Psychological Factors and Characteristics of Entrepreneurship) 

उद्यमिता के प्रमुख मनोवैज्ञानिक घटक एवं लक्षण निम्नलिखित हैं. 

1. नवप्रवर्तन (Innovation) – उद्यमिता का प्रमुख मनोवैज्ञानिक लक्षण नवप्रवर्तन से आशय कुछ नया कर दिखाने से है। उद्यमी भी अपनी सोच एव मनोभावों के कारण सदैव कुछ अलग तरीके से करने की तथा नया कार्य करने की सोचता रहता है। वह पुराने विचारों को नया रूप देता है तथा ‘अज्ञात’ को ‘ज्ञात’ बनाने का प्रयास करते उसे कार्य-रूप में परिणत करता है। वह सदैव नवप्रवर्तन हेतु प्रयत्नशील रहता है।

2. संगठन निर्माण (Organization Building)-उद्यमी उपक्रम के प्रवर्तन एवं नवप्रवर्तन का कार्य करता है, संगठन का निर्माण करता है तथा आवश्यक सुविधाओं को जटाता है। इससे विकास को गति मिलती है।

3. उच्च उपलब्धि का कार्य (Function of High Achievement)-उद्यमी अपने कार्य-क्षेत्र में उच्च उपलब्धि प्राप्त करने या श्रेष्ठता (Excellence) हासिल करने में विश्वास रखता है। वह जीवन में सदैव उच्च लक्ष्य प्राप्त करने, चुनौतीपूर्ण कार्य करने, अग्रणी बने रहने एवं संघर्षरत रहने के लिए नित नए प्रयोग करता है।

4. प्रभावशील बने रहने की इच्छा (Sense of Efficacy)—यह एक महत्त्वपूर्ण मनोवैज्ञानिक आयाम है जो उद्यमिता की भावना को सुदृढ़ बनाता है। प्रभावशीलता का बोध उसे आत्मविश्वास, पहलपन, सृजनात्मकता, समस्या निवारण तथा क्रिया-अभिमुखत्व की ओर प्रेरित किए रहता है। वह समस्या को टालने की बजाय उसे हल करने में विश्वास रखता है।

5. दूसरों को प्रभावित करने की इच्छा (Desire to influence Others)-उद्यमी उपक्रम में अनेक व्यक्तियों के साथ व्यवहार करता है। वह सदैव अपनी प्रबन्धकीय क्षमता तथा नेतृत्व गुण के द्वारा अन्य व्यक्तियों को प्रभावित करने की इच्छा रखता है।

6. स्वतन्त्रता की इच्छा (Need for Independence)-उद्यमी अपने कार्य में स्वतन्त्रता चाहता है। वह नौकरी करने की बजाय व्यवसाय प्रारम्भ करने के लिए अधिक प्रेरित होता है। यह इच्छा उसे सदैव विशिष्ट बने रहने के लिए अभिप्रेरित करती है।

7. समूह-स्तरीय क्रिया (Group-level Activity)-उद्यमिता समूह-स्तरीय क्रिया है इसीलिए उद्यमी समूह को साथ लेकर चलने में विश्वास करता है। अपने कुशल व्यवहार द्वारा वह अपने विचारों को दूसरों पर थोप देने में सफल हो जाता है।

8. सफलता की आशा (Hope for Success)-उद्यमी सदैव सफलता की आशा रखता है। वह असफलता से निराशा होने की बजाय उसे सकारात्मक रूप से स्वीकार करता है और निरन्तर सफलता के लिए प्रयास करता रहता है।

9. लोचशीलता (Flexibility)–एक उद्यमी के प्रयास सदैव लोचपूर्ण होते हैं। वह विभिन्न शेलियों का समय एवं परिस्थिति के अनुसार प्रयोग करता है। उसकी शैली एवं व्यवहार का उपक्रम के क्रिया-कलापों पर प्रत्यक्ष प्रभाव होता है। वह चाहता है कि सभी के साथ उसके मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध बने रहें।

10. संयमित जोखिम वहन करना (Calculated Risk-taking)-उद्यमी जोखिम एव निश्चितता से नहीं घबराता, वरन ऐसे निर्णयों में वह संयमित जोखिम का मार्ग चनता है। एस जोखिम में सफलता की व्यापक सम्भावना अन्तर्निहित होती है।

11. निरन्तर सुधार करते रहने की इच्छा (Desire for Continuous Improvement)-एक उद्यमी अपने कार्यों की प्रगति का लगातार मूल्यांकन करता रहता है आर कमियों को दूर कर उनमें आवश्यक सुधार करता रहता है। साथ ही वह तथ्यों एवं

सूचनाओं के आधार पर अपने लक्ष्यों में निरन्तर सुधार करता र भी उनमें सुधार करता रहता है।

12. कर्म में विश्वास (Belief in Work)-उद्यमी, सर्वसत्ता में विश्वास रखते हुए म म विश्वास रखता है। ‘कार्य ही पजा है’ (Work is worship) उसका नारा होता है। अपने भाग्य को स्वयं निर्मित करने में उसका विश्वास होता है। वह अपनी उपलब्धियों को ‘भाग्य की देन’ के साथ-साथ अपने अथक प्रयासों का परिणाम’ भी मानता है।

13. प्रतिस्पर्द्धा एवं सहयोग (Competition and Collaboration)-उद्यमी का दृष्टिकोण सदैव प्रतिस्पर्धात्मक होता है और वह सदैव ‘जीत और जीत’ (Win and Win) शैली को ही अपने कार्यों का आधार बनाता है। यदि वह सहयोग चाहता है अथवा सहयोग करता है तो केवल अपनी शर्तों पर।

14. विस्तार अभिप्रेरणा (Extensive Motive)-उद्यमी अपने लक्ष्य के प्रति पूर्णतया समर्पित होते हैं और पूर्ण तन्मयता के साथ अपने कार्यों को सम्पन्न करते हैं। वे सदव अपने उद्यम के विकास व विस्तार के लिए प्रयत्नशील रहते हैं।

15. सामाजिक जागरूकता (Social Consciousness)-उद्यमी एक सामाजिक प्राणी है। अत: वह समाज के प्रति सदैव जागरूक रहता है। वह उद्योगों की स्थापना करता है, रोजगार के अधिकाधिक अवसर उपलब्ध कराता है, सामाजिक संसाधनों का सदुपयोग करता है, भौतिक पूँजी के साथ-साथ मानवीय पूँजी निर्माण में वृद्धि करता है और इस प्रकार सामाजिक विकास की प्रक्रिया को सुदृढ़ करता है।

उद्यमिता व्यवहार की मनोवैज्ञानिक विचारधाराएँ

(Psycho-theories of Entrepreneurial Behaviour) 

उद्यमशील व्यवहार की प्रमुख मनोवैज्ञानिक विचारधाराएँ निम्नलिखित हैं-

1. शम्पीटर की नवप्रवर्तन विचारधारा (The Schumpeter’s Innovation Theory)-उद्यमिता की इस विचारधारा का विकास शुम्पीटर (1949 ई०) ने किया है। इनका मत है कि उद्यमी मूलत: एक नवप्रवर्तक होता है और एक ‘नवप्रवर्तक’ वह होता है जो नए संयोजनों (New Combinations) को प्रस्तुत करता है। नए संयोजन में निम्नलिखित कार्य सम्मिलित होते हैं

(i) नई किस्म के माल का प्रस्तुतीकरण। 

(ii) उत्पादन की नई तकनीक का प्रस्तुतीकरण। 

(iii) नए बाजार की खोज। 

(iv) कच्चे माल की पूर्ति के नए स्रोतों की खोज। 

(v) नए संगठन का निर्माण।

2. मैक-क्लीलैण्ड की उपलब्धि विचारधारा (Achievement Theory of M.Cielland)-यद्यपि मैक्-क्लीलैण्ड ने उद्यमशील भूमिका में नवप्रवर्तन की विशेषता को महत्त्वपर्ण माना है, तथापि उन्होंने स्पष्ट किया है कि उद्यमी का उपलब्धि की आवश्यकता से सम्बन्ध होता है। उन्होंने उद्यमी की दो विशेषताओं पर बल दिया है-(i) कार्य को अधिक

अच्छे ढंग से करना तथा (ii) अनिश्चितता में निर्णय लेना। उनके अनुसार, आर्थिक व्यवहार का मूल कारण ‘उपलब्धि की इच्छा’ है।

3. एवरेट हेगन की उपेक्षित अल्प-समूह विचारधारा (Disadvantaged Minority Group Theory of Everett Hegen)–एवरेट हेगन के अनुसार, जब किसी समूह के सदस्य सामूहिक रूप से यह महसूस करते हैं कि उनके मूल्य एवं प्रस्थिति को समाज द्वारा सम्मान नहीं दिया जा रहा है तो वे समाज में सम्मान पाने हेतु नवप्रवर्तन की ओर अग्रसर होते हैं। हेगन का मत है कि “पद व सम्मान घट जाने की दशा में वह व्यक्ति या समूह पुन: उस प्रतिष्ठा को प्राप्त करने के लिए सृजनात्मक व्यवहार करता है जिसके फलस्वरूप उद्यमिता का ,विकास होता है।”

4. कुनकेल की व्यवहारवादी विचारधारा (Kunkel’s Behaviouristic Theory)-कुनकेल के अनुसार, उद्यमिता का विकास किसी भी समाज की विगत एवं वर्तमान सामाजिक संरचना तथा भौतिक दशाओं पर निर्भर करता है और यह विकास सामाजिक तथा आर्थिक प्रेरणाओं से प्रभावित होता है। यह विचारधारा उद्यमिता पूर्ति के निर्धारक घटकों में मनोवैज्ञानिक प्रयोग पर बल देती है।

प्रश्न भारत में वित्त के वर्तमान स्त्रोतों का वर्णन कीजिए। 

Discuss the recent finance sources in India.

उत्तर – ‘वित्त व्यवसाय ( उद्यम ) का जीवन रक्त है।’ [Finance is a life blood of business (enterprise)] उद्यमी का एक अनिवार्य कार्य प्रवर्तन अथवा पूर्व में स्थापित उद्योगों की वित्त व्यवस्था का प्रबन्धन करना है। उद्यमी की कोई भी नवप्रवर्तन योजना अथवा उसका विस्तार वित्त के अभाव में सम्भव नहीं हो पाता। वित्त प्रबन्धन के स्रोतों को प्रतिष्ठित अर्थशास्त्रियों द्वारा ऋण पूँजी एवं स्वामित्व पूँजी के रूप में बाँटा गया था। भारत में वित्त के वर्तमान स्रोतों को निम्न प्रकार वर्गीकृत किया जा सकता है

1. अंशों एवं ऋण-पत्रों का निर्गमन (Issue of Debentures & Shares)स्थायी पूँजी प्राप्त करने का सबसे उत्तम एवं सरल साधन अंशों एवं ऋणपत्रों का निर्गमन है। अंश मुख्यत: दो प्रकार के होते हैं

(i) समता अंश (Equity Share)-फर्म के वित्तीय ढाँचे का आधारस्तम्भ समता अंश होते हैं। इन अंशों के धारकों को पूर्वाधिकार अंशधारियों के बाद लाभांश का भुगतान किया जाता है। समता अंशधारियों को कम्पनी के समापन की दशा में पूँजी की वापसी पूर्वाधिकार अंशधारियों के बाद की जाती है। कम्पनी के स्वामी होने के नाते अंशधारियों की सामान्य सभा में इन्हें उपस्थित होने तथा मत देने का अधिकार रहता है।

(ii) पूर्वाधिकार अंश (Preference Share)-पूर्वाधिकार अंशधारियों को लाभांश का भुगतान एक निश्चित दर पर किया जाता है तथा कम्पनी के समापन की दशा में समता अंशधारियों से पहले इन्हें पूँजी प्राप्ति का अधिकार होता है, परन्तु ऐसे अंशधारियों को न तो सामान्य सभा में भाग लेने का अधिकार होता है और न ही मत देने का।

(iii) ऋणपत्र (Debentures)-औद्योगिक पूँजी प्राप्त करने का दूसरा महत्त्वपूर्ण साधन अंशों के अतिरिक्त ऋणपत्रों का निर्गमन है। ऋणपत्र रक्षित तथा अरक्षित दोनों ही प्रकार के हो सकते हैं। कम्पनी का ऋणदाता ऋणपत्रधारक होता है और इस प्रकार उनके भुगतान का उत्तरदायित्व कम्पनी पर होता है। शोधन होने तक ऋणपत्रों पर एक निश्चित दर से ब्याज का भुगतान किया जाता है।

(iv) समतायुक्त ऋणपत्र (Debenture-cum-equity)-समतायुक्त ऋणपत्र पूर्णतया परिवर्तनीय होते हैं। ऋणपत्र निर्गमन के नियमानसार एवं ऋणपत्रधारियों की इच्छानुसार, इन ऋणपत्रों को पूर्णरूप से शोधित करने के साथ-साथ समता अंशों में भी परिवर्तित किया जा सकता है। इसलिए ऐसे ऋणपत्रों को समतायुक्त ऋणपत्र कहा जाता है।

(v) अन्य प्रतिभूतियाँ (Other Securities)-उपर्युक्त के अलावा विभिन्न प्रकार की अन्य प्रतिभूतियों के द्वारा भी कोषों की प्राप्ति की जा सकती है; जैसे-सी०सी०पी० बॉण्ड्स आदि।

2. विकास बैंकों एवं वित्तीय संस्थाओं से ऋण (Loan from Development Bank and Financial Institution)-सन् 1998 ई० में प्रथम औद्योगिक विकास बैंक की स्थापना आई०एफ०सी०आई० के रूप में भारत में हुई। विकास बैंकों का प्रमुख उद्देश्य पुराने उद्योगों की सहायता करने के साथ-साथ नए उद्योगों के विकास को बढ़ावा देना है।

(i) भारतीय औद्योगिक वित्त निगम (Industrial Finance Corporation of India-IFCI)-IFCI देश का प्रथम विकास बैंक है। यह केवल मध्यकालीन या दीर्घकालीन ऋण प्रदान करता है। इसका मुख्य उद्देश्य भारत में कुछ विशिष्ट क्षेत्रों में कार्यरत समामेलित लिमिटेड कम्पनियों और सहकारी समितियों को वित्तीय सुविधाएँ प्रदान करना है।

(ii) राज्य वित्त निगम (State Financial Corporations-SFCs)-लघु और मध्य स्तरीय उद्योगों को अल्प एवं मध्यकालीन वित्त प्रदान करने के लिए राज्य स्तर पर, राज्य वित्त निगमों की स्थापना की गई। लघु स्तरीय उद्योगों को ऋण प्रदान करने में ये निगम विशिष्ट भूमिका निभाते हैं।

3. विनियोग संस्थाओं से ऋण (Loan from Investment Institutions)एक उद्यम उपर्युक्त संस्थाओं के अतिरिक्त कुछ ऐसी संस्थाओं से भी ऋण ले सकता है जो . अपना धन विनियोग करना चाहती हों। ऐसी प्रमुख संस्थाएँ निम्नलिखित हैं

(i) भारतीय जीवन बीमा निगम (Life Insurance Corporation of India)भारतीय जीवन बीमा निगम ने सन् 1956 ई० से अपना व्यवसाय प्रारम्भ किया। इस निगम का जीवन बीमा व्यवसाय पर एकाधिकार प्राप्त है। यह निगम केवल जीवन बीमा व्यवसाय तक ही सीमित न रहकर औद्योगिक संस्थाओं के अंशों एवं ऋणपत्रों का क्रय करके उन्हें दीर्घकालान और मध्यकालीन ऋण भी प्रदान करता है। इसके अतिरिक्त, निगम अंशों एवं ऋणपत्रों के अभिगोपन का भी कार्य करता है। यद्यपि निगम को नियमानुसार अपने कोषों का 50% सरकारा प्रतिभूतियों में, 35% स्वीकृत प्रतिभूतियों में तथा शेष 15% अन्य प्रतिभूतियों में विनियोजि करना पड़ता है, तथापि निगम किसी भी कम्पनी की 40% से अधिक की अंश पूँजी कम कर सकता।

(ii) भारतीय साधारण बीमा निगम (General Insurance Corporation of India-GIC)-GIC की स्थापना सन् 1972 ई० में की गई। इस निगम का प्रमुख कार्य सामान्य बीमा करना है, जिसमें जीवन बीमा के अतिरिक्त सभी प्रकार के बीमे आ जाते हैं, जैसे—सामूहिक बीमा, अग्नि बीमा एवं वाहन बीमा आदि।

4. अन्य स्रोत – निम्नलिखित वित्तीय संस्थान अन्य स्रोतों के अन्तर्गत सम्मिलित किए जाते हैं

(i) भारतीय लघु उद्योग विकास बैंक से ऋण (Loan from State Industrial Development Bank of India-SIDBI)-SIDBI की स्थापना सन् 1990 ई० में की गई। इसकी स्थापना का प्रमुख उद्देश्य लघु उद्योगों के प्रवर्तन, वित्तपोषण एवं विकास तथा इन गतिविधियों में संलग्न संस्थाओं के कार्यों को समन्वित करना है। देशभर में स्थापित वाणिज्य बैंकों, ग्रामीण बैंकों, राज्य वित्त निगमों, राज्य औद्योगिक विकास निगमों, राज्य औद्योगिक निवेश निगमों एवं सहकारी बैंकों के माध्यम से यह बैंक पुनर्वित्त के रूप में वित्तीय सहायता उपलब्ध कराता है।

(ii) व्यापारिक बैंकों से ऋण (Loan from Commercial Banks)-व्यापारिक बैंकों से आशय उन बैंकिंग संस्थाओं से है जो व्यापार के लिए अल्पकालीन ऋण प्रदान करती हैं। इन बैंकों को आधुनिक वित्त प्रणाली की आधारशिला भी कहा जाता है। प्रारम्भ से ही व्यापारिक बैंकों ने भारतीय उद्योगों के अर्थ प्रबन्धन में उदासीनता की नीति अपनायी है। केवल व्यापारिक कार्यों के लिए ही ये बैंक अल्पकालीन ऋण सुविधाएँ प्रदान करते हैं, जबकि दीर्घकालीन ऋण देना ये व्यापार की दृष्टि से अनुचित समझते हैं। वर्तमान समय में सरकार व्यापारिक बैंकों पर, पेशेवर व्यक्तियों एवं छोटे उद्योगों को ऋण देने के लिए अधिक जोर दे रही है।

प्रश्न अवसर विश्लेषण क्या है? अवसर विश्लेषण के लिए आवश्यक चरणों का उल्लेख कीजिए।

What is Opportunity Analysis ? Discuss the steps necessary for opportunity analysis. 

उत्तर – अवसर विश्लेषण से आशय

(Meaning of Opportunity Analysis) 

अवसरों के विश्लेषण से आशय ऐसे विस्तृत मूल्यांकन से है जो परियोजना के विचार के गुण-दोषों, जोखिम-बाधाओं, संशोधनों एवं सीमाओं के सम्बन्ध में होता है। किसी भी उद्यम को कार्यरूप देने से पूर्व उद्यमी नए विचारों, नए अवसरों, नई खोजों एवं नई अवधारणाओं को परखता है और विभिन्न विषयों के बारे में विस्तृत जानकारी उपलब्ध करता है। जैसे—उपक्रम के निर्माण में क्या-क्या बाधाएँ एवं रुकावटें आ सकती हैं, जोखिम की मात्रा कितनी है, बाजार का स्वरूप कैसा है, भौतिक व वित्तीय संसाधनों की प्राप्ति कैसे और कहाँ से होगी, तकनीकी ज्ञान कहाँ से उपलब्ध होगा, सरकार की नीति क्या है, उपक्रम की स्थापना किस स्थान पर लाभप्रद रहेगी व उपक्रम का आकार कैसा होगा आदि।

अवसर विश्लेषण के लिए आवश्यक चरण

(Steps Necessary for Opportunity Analysis) 

1. बाजार एवं माँग विश्लेषण (Market and Demand Analysis)-किसी भी उद्यम की सफलता उसमें उत्पादित वस्तुओं की बाजार माँग पर निर्भर करती है। उत्पाद की बाजार में माँग जितनी तीव्र होगी, वह उद्यम उतनी ही तीव्रता से प्रगति करेगा और उसका लाभ भी अधिक होगा। इसलिए उपक्रम की स्थापना से पूर्व बाजार एवं माँग का विश्लेषण करना अनिवार्य है। बाजार एवं माँग विश्लेषण में निम्नलिखित सूचनाओं का संकलन एवं विश्लेषण किया जाता है

(i) गत वर्षों में व चालू वर्ष में उत्पादन की मात्रा। 

(ii) विपणन माध्यमों द्वारा वितरण प्रक्रिया। 

(iii) वस्तु के विभिन्न उत्पादन स्रोत तथा बाजार में प्रतिस्पर्धा का विश्लेषण। 

(iv) अतीत, वर्तमान एवं भावी माँगों का विश्लेषण।

(v) उपभोक्ताओं की रुचि, अधिमानों (Preferences) एवं आवश्यकताओं में होने वाले परिवर्तन एवं उनका माँग पर तात्कालिक प्रभाव।

(vi) वस्तु में निहित निर्यात की सम्भावनाएँ।

(vii) सरकारी नीति (राजकोषीय, मौद्रिक एवं तटकर नीति), मूल्यों में उच्चावचन व सामाजिक एवं आर्थिक घटकों का माँग पर प्रभाव।

(vii) माँग में होने वाले परिवर्तन की सम्भावनाएँ।

2. संसाधन विश्लेषण (Resources Analysis)-किसी व्यावसायिक इकाई की स्थापना से पूर्व उसके लिए पर्याप्त मात्रा में संसाधनों की उपलब्धता सुनिश्चित की जाती है। संसाधनों की उपलब्धता सुनिश्चित हो जाने के पश्चात् उनकी प्राप्ति का उपागम किया जाता है। प्रमुख संसाधन हैं-(i) भूमि व भवन, (ii) कच्चा माल व अर्द्ध-निर्मित माल, (iii) यन्त्र, औजार एवं प्रौद्योगिकी, (iv) उपक्रम में प्रयुक्त होने वाली सामग्री, (v) जनशक्ति, (vi) वित्तीय साधन, (vii) संयन्त्र की स्थापना के लिए स्थान एवं अभिन्यास।

3. तकनाका विश्लेषण (Technical Analysis)-इसके द्वारा परियोजना को स्थापित करने के लिए तकनीकी सम्भावनाओं का पता लगाया जाता है। यदि तकनीकी दृष्टि स किसी परियोजना को स्थापित करना सम्भव न हो तो उस विचार को त्याग दिया जाता है। इसलिए यह आवश्यक है कि परियोजना की स्थापना से पूर्व किसी विशेषज्ञ से ‘तकनीकी क्रियान्विती प्रतिवेदन‘ तैयार करा लिया जाए जिसमें विभिन्न तकनीकी विकल्पों, यन्त्र का किस्म एवं आकार, परियोजना का आकार व उत्पादन प्रविधि पर व्यापक सूचना दी हुई हो। सामान्यत: तकनीकी विश्लेषण में निम्नलिखित बिन्दुओं को सम्मिलित किया जाता है

(i) संयन्त्र का आकार, अभिन्यास एवं उत्पाद की अनुसूची। 

(ii) उत्पादन तकनीक, प्रौद्योगिकी, प्रक्रिया एवं क्रियाविधि। 

(iii) यन्त्र, उपकरण एवं औजार का आकार-प्रकार। 

(iv) तकनीकी, कुशल व अकुशल श्रमशक्ति की उपलब्धता।

(v) शक्ति के प्रकार, उपयोग व उपलब्धता। 

(vi) संयन्त्र क्षमता, परियोजना तालिकाएँ एवं कार्य अनुसूचियाँ।

(vii) अवशिष्ट पदार्थों का निष्कासन एवं पुन: उपयोग। 

(viii) निर्माण प्रक्रिया से सम्बन्धित अन्य कोई महत्त्वपूर्ण पहलू।

4. वित्तीय विश्लेषण (Financial Analysis)-आधुनिक युग में वित्त समस्त उद्योग एवं व्यवसाय की आधारशिला है। इसके माध्यम से ही आर्थिक विश्व गतिशील रहता है। वित्त के अभाव में आर्थिक क्रियाकलापों की कल्पना भी नहीं की जा सकती। अत: किसी भी परियोजना का प्रारम्भ करने से पूर्व वित्तीय विश्लेषण अनिवार्य है। वित्तीय विश्लेषण के अन्तर्गत किसी योजना की लाभकारी स्थिति एवं वित्तीय संसाधनों की उपलब्धता का अनुमान लगाय जाता है। सामान्यत: वित्तीय विश्लेषण में निम्नलिखित बिन्दुओं को सम्मिलित किया जाता है

(i) परियोजना की सकल लागत भूमि, भवन, कच्चा माल व अर्द्ध-निर्मित माल, यन्त्र व उपकरण, नकद प्रवाह आदि पर किया जाने वाला व्यय।

(ii) स्थायी एवं कार्यशील पूँजी (Fixed and Working Capital) की आवश्यकता व स्रोत।

(iii) सामाजिक लागत-लाभ विश्लेषण।

(iv) अनुमानित बिक्री, साख की मात्रा एवं अवधि, ब्याज, आय, लाभ एवं निवेशों पर प्रतिफल।

(v) वित्तीय रियायतें, उपदान एवं अनुदान।

5. व्यावसायिक पर्यावरण विश्लेषण (Business Environment Analysis)-किसी भी नए उपक्रम की स्थापना से पूर्व उस क्षेत्र के व्यावसायिक पर्यावरण का विश्लेषण किया जाना अति आवश्यक हो जाता जिससे ज्ञात होता है कि वह प्रस्तुत उपक्रम की स्थापना एवं विस्तार के अनुकूल है। व्यावसायिक पर्यावरण विश्लेषण को प्रभावित करने वाले प्रमुख घटक निम्नलिखित हैं

(i) सरकारी नीति – औद्योगिक, लाइसेन्सिंग, न्यूनतम मजदूरी का प्रावधान एवं तटकर नीति।

(ii) पारित अधिनियम – औद्योगिक (विकास एवं नियमन) अधिनियम, पूँजी निर्गमन (नियन्त्रण) अधिनियम, आवश्यक वस्तु अधिनियम, फेमा अथवा फेरा, एकाधिकार एवं प्रतिबन्धात्मक व्यापार व्यवहार अधिनियम अथवा प्रतिस्पर्धा अधिनियम।

(iii) राजकोषीय नीति : बजट, सार्वजनिक व्यय एवं प्रचलित कर नीति। 

(iv) किस्म नियन्त्रण एवं प्रेरणाएँ। 

(v) सुविधाएँ, रियायतें, उपदान एवं अनुदान। 

(vi) वितरण प्रणाली, उपलब्ध वितरण वाहिकाएँ। 

(vii) नवप्रवर्तन, आर्थिक एवं सामाजिक प्रवृत्तियाँ व सरकारी मार्गदर्शिकाएँ।

6. संयन्त्र स्थान एवं अभिन्यास विश्लेषण (Plant Local and Layout Analysis)-संयन्त्र स्थान विश्लेषण के अन्तर्गत संयन्त्र की स्थापना के स्थान का निर्धारण किया जाता है। संयन्त्र स्थान के निर्धारण का निर्णय अनेक घटकों पर निर्भर करता है. जस-कच्चे माल, श्रम व शक्ति की उपलब्धता, बाजार की निकटता, परिवहन व संचार सुविधाएँ, बैंक व अन्य वित्तीय संस्थान, सहायक उद्योगों की स्थिति आदि। इसके अन्तर्गत सरकार द्वारा प्रदत्त छूटों एवं रियायतों का भी आकलन किया जाता है; जैसे-सस्ती भूमि, सस्ती बिजली, कर-छूटे, उत्पाद क्रय की गारण्टी, प्रशिक्षण सुविधाएँ, आयात सुविधाएँ, वित्तीय अनुदान आदि। स्थान का चयन करते समय उद्यमी उक्त सभी बातों पर ध्यान देता है।

संयन्त्र अभिन्यास विश्लेषण के अन्तर्गत संयन्त्र अभिन्यास यन्त्रों, प्रविधियों, प्रक्रियाओं व अन्य सेवाओं को सम्मिलित किया जाता है। ध्यान देने योग्य प्रमुख लक्ष्य हैंन्यूनतम लागत पर अधिकतम एवं श्रेष्ठ उत्पादन, अपव्ययों पर प्रभावी नियन्त्रण आदि।

7.मूल्यांकन विश्लेषण (Evaluation Analysis)-इसके अन्तर्गत परियोजना के विभिन्न पहलुओं का मूल्यांकन किया जाता है। यह मूल्यांकन निम्नलिखित रूपों में किया जाता है

(अ) तकनीकी मूल्यांकन (Evaluation from the Technical Point of View)-परियोजना का तकनीकी मूल्यांकन निम्नलिखित तत्त्वों के आधार पर किया जाता है

(i) क्या चयनित तकनीक उपयुक्त एवं नवीनतम है? कितनी अन्य फर्मे इस तकनीक का प्रयोग कर रही हैं तथा इससे उन्हें कैसे प्रतिफल मिले हैं? इस तकनीक के सम्बन्ध में जानकारी प्राप्त करने के स्रोत क्या हैं?

(ii) क्या निर्माण प्रक्रिया कुशल एवं मितव्ययी है? उत्पाद-निर्माण में कितना समय लगेगा?

(iii) यदि परियोजना के लिए विदेशी तकनीक की आवश्यकता है तो ऐसी परियोजना अधिक अच्छी नहीं मानी जाती क्योंकि इससे देश के विदेशी मुद्रा कोष पर भार पड़ता है। इसके विपरीत, यदि देशी तकनीक से काम चल जाता है तो ऐसी परियोजना उत्तम मानी जाती है।

(ब) आर्थिक मूल्यांकन (Evaluation from the Economic Point of View)-सदैव लाभकारी परियोजना का ही चयन किया जाता है। अधिक शुद्ध लाभकारी परियोजना का चयन उद्यमी द्वारा किया जाता है। इसके अतिरिक्त, निम्न बिन्दुओं पर विशेष जोर दिया जाता है

(i) परियोजना से कितने अतिरिक्त लोगों को रोजगार मिल सकेगा?

(ii) परियोजना के फलस्वरूप कितने अन्य सहायक उद्योग उस क्षेत्र में स्थापित हो सकेंगे?

(iii) परियोजना स्थापित करने पर कितनी मात्रा में स्थानीय संसाधनों का उपयोग हो सकेगा, क्या इससे उस क्षेत्र की सम्पन्नता बढ़ेगी?

(iv) क्या परियोजना लगाने से उस क्षेत्र का विविध रूपों में विकास हो सकेगा?

(स) वित्तीय मूल्यांकन (Evaluation from the Financial Point or View)-इसमें कुल लागत तथा प्रति इकाई लागत की गणना की जाती है। इसके बाद अग्रलिखित तथ्यों के आधार पर लाभ की गणना की जाती है

(i) शुद्ध परियोजना मूल्य (Net Project Value) 

(ii) आन्तरिक प्रतिफल की दर (Internal Rate of Return) 

(iii) वापसी-भुगतान की अवधि (Pay-back Period) 

(iv) साधारण प्रतिफल की दर (Simple Rate of Return) 

(v) समविच्छेद बिन्दु विश्लेषण (Break-even Point Analysis)।

प्रश्न – “उद्यमिता जोखिम उठाने की क्षमता के साथ-साथ योग्यता भी है।समझाइए। उद्यमिता की आवश्यकता एवं महत्त्व की विवेचना कीजिए।

“Entrepreneurship is a risk-bearing capacity as well as capacity to innovate.” Elucidate. Discuss the need and importance of entrepreneurship. 

अथवाउद्यमिता एक प्रवर्तनकारी कार्य है, यह स्वामित्व की अपेक्षा एक नेतृत्व कार्य है।“-जोसेफ शम्पीटर। इस कथन की व्याख्या करते हुए उद्यमिता के विभिन्न स्वरूपों का वर्णन कीजिए।

“Entrepreneurship is an innovative function. It is a leadership rather than an ownership”—Joseph Schumpeter. Discuss this statement and describe the various forms of entrepreneurship. 

अथवा उद्यमिता का अर्थ एवं विशेषताएँ बताइए। एक विकासशील अर्थव्यवस्था में उद्यमिता के महत्त्व की विवेचना कीजिए।

Give the meaning and characteristic features of Entrepreneurship. Examine the role of entrepreneurship in a developing economy.

उत्तर – उद्यमिता जीवन का एक आधारभूत एवं आवश्यक अंग है। इसके माध्यम से ही व्यक्ति का सम्पूर्ण सामाजिक एवं आर्थिक विकास सम्भव होता है। यह पराश्रित समाज को

आत्मनिर्भर बनाती है, कर्म के लिए अभिप्रेरणाएँ प्रदान करती है। यह आय, रोजगार सृजन, पूँजी निर्माण, उत्पादन एवं उत्पादकता बढ़ाने में सहायक है और देश के दीर्घकालीन, स्थायी एवं न्यायपूर्ण आर्थिक विकास के लिए मार्ग प्रशस्त करती है।

उद्यमिता-अर्थ एवं परिभाषा 

(Entrepreneurship : Meaning and Definitions) 

साधारण शब्दों में, “उद्यमिता से आशय उस प्रवृत्ति, योग्यता अथवा क्षमता से है, . जिसके द्वारा व्यवसायी व्यवसाय में निहित विभिन्न प्रकार की अनिश्चितताओं एवं जोखिमों को वहन करते हुए अपने व्यवसाय का संचालन करता है। दूसरे शब्दों में, “उद्यमिता उद्यमी की वह क्षमता है जिसके द्वारा वह उत्पादन के विभिन्न साधनों-भूमि, श्रम, पूँजी आदि को संयोजित करता है तथा उनका अनुकूलतम अनुपात में उत्पादन हेतु प्रयोग करता है।”

उद्यमिता की प्रमुख परिभाषाएँ निम्नलिखित हैं

(1) प्रो० राव व मेहता के अनुसार, “उद्यमिता वातावरण का सृजनात्मक एवं नवप्रवर्तनशील प्रत्युत्तर है।”

(2) जे०ई० स्टेपनेक के अनुसार, “उद्यमिता किसी उपक्रम में जोकि क्षमता, सगठन की योग्यता तथा विविधीकरण एवं नवप्रवर्तनों को जन्म देने की

(3) हिगिन्स के अनुसार, “उद्यमिता निवेश एवं उत्पादन के अवसरों को उत्पादन क्रिया को प्रारम्भ करने हेत साधनों को संगठित करने, पूंजी लाने श्रम करन, कच्चे माल की व्यवस्था करने. संयन्त्र का स्थान ढूँढने, नई वस्तओं व अपनान, कच्ची सामग्री के नए स्रोतों का पता लगाने तथा उपक्रम के दैनिक संचालन प्रबन्धकों का चयन करने का कार्य है।”

(4) एच० डब्ल्यू० जॉनसन के अनुसार, “उद्यमिता तीन आधारभत तत्वों योग है-अन्वेषण, नवप्रवर्तन एवं अनुकूलन।”

(5) एफ० एच० फ्रेंज के अनुसार, “उद्यमिता उत्पत्ति के विभिन्न साधनों का उत्पादक इकाई के रूप में संगठन एवं संयोजन है।”

(6) ए० एच० कोल के अनुसार, “उद्यमिता एक व्यक्ति अथवा व्यक्तियों के समह की एक उद्देश्यपूर्ण क्रिया है, जिसमें निर्णयों की एक एकीकृत श्रृंखला सम्मिलित होती है। यह आर्थिक वस्तुओं एवं सेवाओं के उत्पादन अथवा वितरण के लिए एक लाभप्रद व्यावसायिक इकाई का निर्माण, संचालन एवं विकास करती है।”

(7) रिचमैन तथा कोपेन के अनुसार, “उद्यमिता किसी सृजनात्मक, बाह्य अथवा खुली प्रणाली की ओर संकेत करती है। इसमें नवप्रवर्तन, जोखिम को वहन करने की क्षमता तथा गतिशील नेतृत्व सम्मिलित हैं।” :

(8) प्रो० पारीक एवं नादकर्णी के अनुसार, “उद्यमिता का अर्थ समाज में नए उपक्रम को स्थापित करने की साधारण प्रकृति से है।”

_संक्षेप में, उद्यमिता उद्यमीय क्षमताओं का प्रयोग कर नवप्रवर्तन करने, व्यावसायिक उपक्रम स्थापित करने, व्यूह-रचनात्मक योग्यता को दर्शाने तथा अवसरों का अधिक अच्छा और अर्थपूर्ण उपयोग करने की क्रिया है।

उद्यमिता की प्रमुख विशेषताएँ (प्रकृति) 

[Characteristic Features (Nature) of Entrepreneurship]

उपर्युक्त परिभाषाओं के आधार पर उद्यमिता की प्रकृति अथवा प्रमुख विशषत निम्नलिखित हैं

(1) उद्यमिता एक आर्थिक क्रिया है। इसका सम्बन्ध व्यवसाय के लिए निमा संचालन से है। इसमें वस्तुओं एवं सेवाओं का उत्पादन, विनिमय और वितरण सम्मिलित हो

(2) उद्यमिता एक उद्देश्यपूर्ण क्रिया है। आर्थिक क्रिया का उद्देश्य अधिकतम ला कमाना होता है।

(3) उद्यमिता एक सृजनात्मक क्रिया है। उद्यमी अपने चिन्तन एवं खोजा का नए-नए विचारों का सृजन करता है तथा इन्हें बाजार में लाग करता है।

(4) उद्यमिता एक सार्वभौमिक क्रिया है। किसी भी व्यवसाय के लिए उद्यान आवश्यक है। उद्यमिता ही प्रत्येक व्यवसाय के अस्तित्व एवं विकास का आधार हैं।

(5) उद्यमिता एक जोखिमपूर्ण क्रिया है। एक उत्पादक का उद्देश्य अधिकतम लाभ प्राप्त करना होता है। इसके लिए वह सभी स्थिर एवं परिवर्तनशील लागतों को वहन करता है, किन्तु लाभ व्यवसाय का एक अनिवार्य अवयव नहीं है, इसमें हानि भी हो सकती है।

(6) उद्यमिता में संगठन कार्य निहित है। एक उद्यमी अपने व्यवसाय में विभिन्न साधनों को अनुकूलतम अनुपात में जुटाता है।

(7) उद्यमिता नवप्रवर्तन करने की योग्यता है। इसके अन्तर्गत नवधारणाओं की खोज एवं उन्हें व्यवसाय में लागू करना सम्मिलित है।

(8) उद्यमिता व्यावसायिक प्रवृत्ति की अभिव्यक्ति है। यह व्यक्ति को व्यावसायिक चिन्तन करने, व्यावसायिक योजना बनाने एवं व्यावसायिक उपक्रम स्थापित करने के लिए प्रेरित करती है।

(9) उद्यमिता देश के आर्थिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक वातावरण से प्रभावित होती है। अनुकूल व्यावसायिक वातावरण में उद्यमीय क्षमता का विकास होता है।

(10) उद्यमिता भाग्य के स्थान पर कर्म में विश्वास करती है। इस प्रकार यह उद्यमी को कार्य करने की प्रेरणा देती है।

(11) आधुनिक युग में उद्यमिता एक पेशेवर क्रिया के रूप में विकसित हो रही है। आज विभिन्न देशों में उद्यमशीलता विकसित करने के लिए विभिन्न शिक्षण-प्रशिक्षण कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है।

(12) उद्यमिता सही पूर्वानुमान करने की योग्यता है। सही पूर्वानुमान न होने पर जोखिम बढ़ जाती है।

(13) उद्यमिता एक अन्त:प्रेरणा है। साधन न होने पर भी उद्यमी, जीवन में सफलता प्राप्त कर लेते हैं।

(14) उद्यमिता ज्ञान पर आधारित व्यवहार है। एक उद्यमी अपने ज्ञान एवं अनुभव के आधार पर ही व्यवसाय में सफलता प्राप्त करता है।

(15) यह व्यक्तिगत लक्षण न होकर एक व्यवहार है। एक उद्यमी में निर्णयन क्षमता का गुण होना आवश्यक है।

(16) यह एक निश्चित सिद्धान्तों पर आधारित व्यवहार है। यह केवल भावना नहीं है।

(17) उद्यमिता एक प्रबन्धकीय गुण है। इसी के माध्यम से निर्णय लिए जाते हैं एवं योजनाओं को क्रियान्वित किया जाता है।

(18) उद्यमिता एक बहुआयामी (Multidimensional) विचारधारा है। यह विज्ञान भी है और कला भी तथापि यह विज्ञान की तुलना में कला अधिक है। यह व्यावसायिक कार्य करने का सर्वोत्तम ढंग प्रस्तुत करती है।

एक विकासशील अर्थव्यवस्था में उद्यमिता का महत्त्व 

(Importance of Entrepreneurship in a Developing Economy)

किसी भी देश के नियोजित एवं सन्तुलित आर्थिक विकास के लिए उद्यमिता का होना आवश्यक है। उद्यमीय क्षमता के विकास से व्यापार, वाणिज्य एवं उद्योगों का विकास, विस्तार

एवं विविधीकरण होता है, जिससे बेरोजगारी, निर्धनता एवं निम्न उत्पादकता और समस्याओं का समाधान किया जा सकता है। एक विकासशील अर्थव्यवस्था में उद्यमिता महत्त्व को निम्न प्रकार स्पष्ट किया जा सकता है-

1. उद्यमीय प्रवृत्तियों का विकास (Growth of Entrepreneurial Tendencies)-उद्यमिता व्यवसायियों में उद्यमशील मनोवृत्तियों तथा प्रवृत्तियों का करता है। यह लोगों को कुछ प्राप्त करना, स्वतन्त्र जीवन जीना तथा रचनात्मक क्रिया व्यस्त रहना सिखाती है। इसके द्वारा न्यायपूर्ण सामाजिक एवं आर्थिक विकास के लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकता है।

2. नवप्रवर्तनों के कारण उत्पादन का विस्तार (Expansion of Production due to Innovations)-उद्यमिता विकास के समय ‘शोध एवं विकास’ (Research and Development) पर अत्यधिक व्यय किया जाता है। इसके फलस्वरूप सम्बद्ध कर्मचारियों के वैज्ञानिक एवं तार्किक चिन्तन को प्रोत्साहन मिलता है, तकनीकी ज्ञान में वृद्धि होती है और नवप्रवर्तनों (Innovations) का विस्तार होता है। नई-नई विधियों के प्रयोग एवं उत्पाद विविधीकरण के कारण व्यावसायिक संगठनों का विस्तार होता है।

3. अधिकाधिक सफल व्यावसायिक इकाइयों की स्थापना (Establishment of more and more Successful Commercial Units)-उद्यमिता के विकास से उद्यमियों के लिए प्रशिक्षण सुविधाओं का विस्तार होता है। व्यावसायिक इकाइयाँ नवीनतम उपकरणों से सुसज्जित होती हैं तथा राष्ट्रीय संसाधनों का सर्वोत्तम उपयोग सम्भव होता है। इसके फलस्वरूप उपक्रम के असफल होने की सम्भावना कम हो जाती है।

4. साधनों का सर्वोत्तम उपयोग (Optimum Utilization of Resources)विकासशील देशों में संसाधनों की पर्याप्त उपलब्धता होते हुए भी उनका सर्वोत्तम उपयोग नहीं हो पाता। उद्यमिता के विकास से उपलब्ध प्राकृतिक एवं मानवीय संसाधनों जैसे प्राकृतिक सम्पदा, कच्चा माल, ऊर्जा स्रोत, मानवीय कौशल आदि का सर्वोत्तम उपयोग सम्भव होता है। उद्यमी बेकार पड़े संसाधनों का सदुपयोग करने में सफल होते हैं, उत्पादन क्षमता में वृद्धि करते हैं और उपलब्ध संसाधनों का सर्वोत्तम विदोहन करते हैं।

5. रोजगार के अवसरों में वृद्धि (Increase in Employment Opport nities)-उद्यमिता के विकास से नए-नए व्यावसायिक उपक्रमों की स्थापना होती है। इस फलस्वरूप अधिकाधिक व्यक्तियों को रोजगार मिलता है। नए-नए विकास कार्यक्रम चल जाते हैं जिससे लोगों को स्वरोजगार के अवसर उपलब्ध होते हैं। नवप्रवर्तनों के विर उपक्रमों का विस्तार होता है और नए रोजगार के अवसरों का सजन होता है।

6.सन्तुलित आर्थिक विकास (Balanced Economic Development विकासशील देशों में आर्थिक विकास के सन्दर्भ में स्थानीय व क्षेत्रीय विषमताए पायी जाती हैं। अल्पविकसित क्षेत्र विकसित क्षेत्रों की तुलना में तकनीकी एवं व्यावसायिक दृष्टि स. पिलटे होते हैं। यह अन्तर आर्थिक विकास के साथ-साथ बढ़ता जाता है। उद्यमिता द्वारा इन क्षेत्रीय विषमताओं को कम किया जा सकता है।

7. आत्मनिर्भर समाज की स्थापना (Establishment of Self-reliant Society)-दूसरे देशों पर आर्थिक व सामाजिक निर्भरता एक समाज के लिए अभिशाप होती है। आत्मनिर्भरता की प्राप्ति के लिए उत्पाद-विविधीकरण तथा क्षेत्र-विविधीकरण के साथ-साथ उत्पादन में तीव्र वृद्धि होनी आवश्यक है। ऐसा विभिन्न स्थानों पर व्यावसायिक उपक्रमों की स्थापना द्वारा ही सम्भव है। ये उपक्रम स्थानीय आवश्यकताओं के अनुरूप, स्थानीय संसाधनों की मदद से उत्पादन में वृद्धि करेंगे, जिससे स्थानीय लोगों को रोजगार मिलेगा, उनकी आय एवं उपभोग स्तर में वृद्धि होगी, बचत एवं पूँजी निर्माण की दर में वृद्धि होगी, निर्यात बढ़ेंगे तथा आयात कम होंगे और तभी एक आत्मनिर्भर समाज की स्थापना हो सकेगी।

8. आर्थिक एवं सामाजिक समस्याओं का समाधान (Solution to the Economic and Social Problems)-उद्यमिता के विकास से देश के विभिन्न भागों में व्यावसायिक उपक्रमों की स्थापना होगी। इससे खाली बैठे लोगों को काम मिलेगा, वे काम में व्यस्त रहेंगे। इससे अनेक आर्थिक एवं सामाजिक समस्याओं (जैसे-वर्ग-संघर्ष, मादक प्रवृत्तियाँ, सामाजिक अपराध एवं नैतिक पतन आदि) में कमी आएगी। ___संक्षेप में, किसी भी देश के आर्थिक एवं सामाजिक विकास में उद्यमिता का महत्त्वपूर्ण योगदान होता है। जे० शुम्पीटर (J. Schumpeter) के शब्दों में, “किसी भी देश का आर्थिक विकास उसके द्वारा की गई खोजों पर निर्भर करता है, जो जनसंख्या में बिखरी हुई उद्यमीय योग्यताओं द्वारा किया जाता है। केवल तकनीकी विकास आर्थिक विकास में परिवर्तित नहीं हो सकता जब तक कि उस तकनीक को उद्यमियों द्वारा क्रियात्मक रूप से बाजार में नहीं लाया जाता।”

उद्यमिता के स्वरूप या प्रकार 

(Patterns or Types of Entrepreneurship) 

प्रत्येक राष्ट्र की दशाएँ तथा विकास का स्तर भिन्न-भिन्न होता है। फलस्वरूप उद्यमिता के स्वरूप में भी भिन्नता पायी जाती है। विभिन्न आधारों पर उद्यमिता के स्वरूपों का वर्णन निम्न प्रकार है

1. पँजी स्वामित्व के आधार पर (On the Basis of Capital ownership) – 

पूँजी के स्वामित्व के आधार पर उद्यमिता के निम्न स्वरूप हो सकते हैं

1. निजी उद्यमिता (Private Entrepreneurship)-जब व्यक्तियों द्वारा निजी स्वामित्व के अन्तर्गत व्यवसाय प्रारम्भ किया जाता है तो यह ‘निजी उद्यमिता’ कहलाती है। 

2.राज्य अथवा सार्वजनिक उद्यमिता (State or Public Entrepreneurship)-आधुनिक सरकारें भी अब उद्यमी के रूप में कार्य करने लगी हैं। जब सरकार जनकल्याण की भावना से व्यावसायिक उपक्रम प्रारम्भ करती है तो यह ‘सार्वजनिक उद्यमिता’ कहलाती है।

3. संयुक्त उद्यमिता (Joint Entrepreneurship)-संयुक्त उद्यमिता निजी व सरकारी स्वामित्व की साझेदारी का स्वरूप है। इस दशा में सरकार निजी उद्यमियों व जनता के साथ मिलकर एक निश्चित अनपात में धन का विनियोजन करती है। इसमें सरकार की अधिक प्रभावी होती है। 

4. सहकारी स्वामित्व (Co-operative Entrepreneurship)-सहकारी उद्यमिता + अन्तगत कई व्यक्ति मिलकर सहकारिता के आधार पर उपक्रम प्रारम्भ करते हैं। भारत लव कुटार उद्योग. चीनी उद्योग आदि सहकारी उद्यमिता के अन्तर्गत स्थापित किए जा रहै हैं।

॥. स्थानीकरण के आधार पर 

(On the Basis of Centralization)

स्थानीकरण के आधार पर उद्यमिता के निम्नलिखित दो प्रकार हैं___ 

1. केन्द्रीय उद्यमिता (Centralized Entrepreneurship)-जब कुछ विशेष सुविधाओं के कारण अधिकांश उपक्रम एक ही क्षेत्र या स्थान पर स्थापित होने की प्रवृत्ति रखते हैं तो यह ‘केन्द्रीकृत उद्यमिता’ कहलाती है।

2. विकेन्द्रित उद्यमिता (Decentralized Entrepreneurship)-जब उद्यमियों द्वारा देश के विभिन्न भागों में उपक्रमों की स्थापना की जाती है तो यह विकेन्द्रित उद्यमिता’ कहलाती है। 

III. विकास या परिवर्तन के प्रति दृष्टिकोण के आधार पर 

(On the Basis of Attitude towards Changes or Development)

विकास या परिवर्तन के प्रति दृष्टिकोण के आधार पर व्यावसायिक उद्यमिता के दो प्रमुख स्वरूप निम्नलिखित हैं

1. परम्परागत या विकासात्मक उद्यमिता (Traditional or Evolutionary Entrepreneurship)-जब उपक्रम में परिवर्तनों की गति बहुत धीमी होती है, उत्पादन की प्रणाली परम्परागत होती है तथा अनुसंधान कार्यों पर बहुत कम व्यय किया जाता है तो यह ‘परम्परागत या विकासात्मक उद्यमिता’ कहलाती है।

2. आधुनिक या क्रान्तिकारी उद्यमिता (Modern or Revolutionary Entrepreneurship)-जब उद्यमी व्यवसाय में उत्पादन की नवीन विधियों का प्रयोग करते हैं, जोखिमपर्ण योजनाएं शुरू करते हैं तथा तीव्र गति से उपक्रम का विस्तार करते हैं तो व क्रान्तिकारी उद्यमी होते हैं और इस प्रकार की उद्यमिता ‘क्रान्तिकारी उद्यमिता’ कहलाती है। 

IV. आकार के आधार पर (On the Basis of Size)

इस आधार पर उद्यमिता के प्रमुख स्वरूप निम्नलिखित हैं

1. वृहत् उद्यमिता (Big Entrepreneurship)-जब व्यवसाय में अत्यधिक पूजा का विनियोग होता है, उत्पादन का पैमाना वृहत् होता है, यन्त्रों व मशीनों का अधिक प्रयाग होता है. उत्पादन की प्रणाली जटिल होती है तथा पेशेवर प्रबन्धकों द्वारा व्यवसाय का सचा किया जाता है तो वह वृहत् उद्यमिता का स्वरूप होता है।

2.लघु उद्यमिता (Small Entrepreneurship)-लघ साहस के अन्तर्गत उप का आकार छोटा होता है, पूजा विनियोग अपेक्षाकृत कम होता है श्रमिकों की संख्या १ होती है तथा उत्पादन प्रणाली सरल होती है।

v. नेतृत्व के आधार पर (On the Basis of Leadership)

उद्यमिता का जन्म वैयक्तिक नेतृत्व अथवा सामूहिक या सहकारी नेतृत्व के परिणामस्वरूप हो सकता है। इस आधार पर उद्यमिता के निम्न दो स्वरूप होते हैं

1. वैयक्तिक उद्यमिता (Individualistic Entrepreneurship)-वैयक्तिक उद्यमिता में व्यवसाय के प्रबन्ध एवं संचालन के समस्त कार्य एक ही व्यक्ति द्वारा तैयार किए जाते हैं।

2. समूह उद्यमिता (Group Entrepreneurship)-यह उद्यमिता समाज की तकनाका संरचना (Techno Structure) पर आधारित होती है। यह वृहत् स्तरीय उत्पादन तथा अन्य व्यावसायिक जटिलताओं के परिणामस्वरूप उत्पन्न होती है। 

VI. साहसिक कार्य के आधार पर (On the Basis of Entrepreneurial Function)

लीबेन्सटीन (Liebenstein) ने साहसिक कार्य के आधार पर उद्यमिता के दो प्रमुख स्वरूप बताए हैं

1. नैत्यिक उद्यमिता (Routine Entrepreneurship)-नैत्यिक उद्यमिता व्यवसाय के प्रबन्धकीय कार्य से सम्बन्धित होती है। इसमें उद्यमी का मुख्य कार्य उपयुक्त योजनाओं, निर्णयों एवं कार्यक्रमों द्वारा उपक्रम का सफल प्रबन्ध करना है।

2. नवीन उद्यमिता (New Entrepreneurship)-नवीन उद्यमिता से आशय नवप्रवर्तनकारी एवं सृजनशील साहस से है। 

VII. अन्य आधार (Other Basis)

– उपर्युक्त विभिन्न स्वरूपों के अतिरिक्त उद्यमिता को कुछ अन्य आधारों पर भी विभाजित किया जा सकता है। ये निम्नलिखित हैं

1.शहरी तथा ग्रामीण उद्यमिता (Urban and Rural Entrepreneurship)शहरी साहस का विकास केवल बड़े शहरों (जैसे—मुम्बई, अहमदाबाद, कानपुर, कोलकाता आदि) तक ही सीमित होता है। ग्रामीण उद्यमिता में लघु तथा कुटीर उद्योग-धन्धे आते हैं।

2. व्यवस्थित उद्यमिता (Systematic Entrepreneurship)-पीटर एफ० डकर ने सामान्य साहस के विपरीत ‘व्यवस्थित’ उद्यमिता का वर्णन किया है। इसमें साहसी व्यवस्थित अनुसंधान प्रविधि एवं सिद्धान्तों का पालन करते हैं। यह उद्यमिता ‘उद्देश्यपूर्ण नवप्रवर्तन’ पर आधारित होती है। यह नए बाजार, नए ग्राहक तथा नए अवसरों की खोज पर बल देती है।

प्रश्न –“निर्णय करना प्रबन्धक का मुख्य कार्य है।इसकी विवेचना कीजिए और प्रबन्ध में निर्णयन के महत्त्व को समझाइए।

“Decision-making is the primary task of a manager.” Discuss and explain the importance of Decision-making in Management. 

अथवा निर्णय लेने से आप क्या समझते हैं? इसके मूल तत्त्व कौन-कौन से हैं?

What do you understand by Decision-making ? What are its basic elements?

उत्तर – प्रबन्धकों को प्रशासन द्वारा निर्धारित योजनाओं के कार्यान्वयन के लिए अनेक महत्त्वपूर्ण निर्णय लेने पड़ते हैं। यह उनका सर्वप्रथम कार्य है। व्यवसाय में प्रारम्भ से अन्त तक अनेक कार्यों के सम्बन्ध में निरन्तर निर्णय लेने की आवश्यकता होती है। किसी नए उद्योग की स्थापना के समय प्रवर्तकों को व्यवसाय के नाम, स्थान, प्रकृति, उद्देश्य आदि के सम्बन्ध में निर्णय लेने होते हैं, जबकि व्यवसाय के संचालन में पूँजी, उत्पादन, क्रय-विक्रय, कर्मचारियों की भर्ती आदि के सम्बन्ध में अनेक निर्णय लिए जाते हैं। अतः कहा जा सकता है कि किसी कार्य के सम्बन्ध में उपलब्ध अनेक विकल्पों में से सर्वश्रेष्ठ का चुनाव करना ही निर्णयन है।

निर्णयन की परिभाषाएँ

(Definitions of Decision-making) 

निर्णयन को प्रबन्ध विज्ञान के प्रमुख विद्वानों ने निम्नलिखित प्रकार से परिभाषित किया है

(1) जी० एल० एस० शेकल के अनुसार, “निर्णय लेना रचनात्मक मानसिक क्रिया का वह केन्द्रबिन्दु होता है जहाँ ज्ञान, विचार, भावना तथा कल्पना कार्य-पूर्ति के लिए संयुक्त हो

जाते हैं।”

(2) अर्नेस्ट डेल के अनुसार, “प्रबन्धकीय निर्णय प्रबन्धकीय क्रियाओं, नियोजन, संगठन, कर्मचारियों की भर्ती, निर्देशन, नियन्त्रण, नवप्रवर्तन (Innovation) तथा प्रतिनिधित्व के दौरान सदा ही लेने होते हैं।”

(3) कण्ट्ज ओडोनेल के अनुसार, “निर्णय किसी कार्य को करने के विभिन्न विकल्पों में से सर्वश्रेष्ठ का चयन करना है।” .

(4) जॉर्ज आर० टेरी के अनुसार, “निर्णयन किसी कसौटी पर आधारित दो या दो से अधिक सम्भावित विकल्पों में से एक का चयन है।”

(5) डी० ई० मैक्फारलैण्ड के अनुसार, “निर्णय लेना चुनने की एक क्रिया है, जिसके द्वारा अधिशासी ‘एक दी हुई परिस्थिति में क्या किया जाना चाहिए’ के सम्बन्ध में निष्कर्ष पर पहँचता है। निर्णय किसी व्यवहार का प्रतिनिधित्व करता है, जिसका चयन अनेक सम्भावित विकल्पों में से किया जाता है।”

6) आर० एस० डावर के अनुसार, “निर्णय लेना एक ऐसा चयन है जो. दो या दो से अधिक सम्भावित विकल्पों में से किसी एक व्यवहार के विकल्प पर आधारित होता है। निर्णय लेने से आशय ‘काट देना’ अथवा व्यावहारिक रूप से किसी निष्कर्ष पर आना’ से है।” __

(7) हरबर्ट साइमन के अनुसार, “निर्णय लेने में तीन प्रमख अवस्थाएँ सम्मिलित हैं-(i) निर्णय लेने से अवसरों का पता लगाना, (ii) कार्य करने के सम्भावित क्रमों का पता लगाना तथा (iii) कार्य करने के क्रमों का चयन करना।” – 

उपर्युक्त परिभाषाओं का अध्ययन करने के पश्चात् निर्णयन की संक्षेप में परिभाषा इस प्रकार दी जा सकती है-“निर्णय लेना किसी कार्य को करने के विभिन्न विकल्पों में से किसा एक सर्वश्रेष्ठ विकल्प का चयन करना है।”

निर्णयन की विशेषताएँ

(Characteristics of Decision-making) 

निर्णयन की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

(1) सामान्यत: तर्कपूर्ण वैज्ञानिक विचार-विमर्श के उपरान्त ही निर्णय लिए जाते हैं।

(2) कुछ परिस्थितियों में निर्णय लेने को स्थगित किया जा सकता है। इस प्रकार के निर्णय को ऋणात्मक निर्णय (Negative Decision) की संज्ञा दी जाती है।

(3) निर्णय लेने की प्रक्रिया के अन्तर्गत अनेक विकल्पों में से सर्वोत्तम विकल्प का ही चुनाव किया जाता है।

(4) निर्णय लक्ष्य प्राप्त करने का साधन-मात्र है।

(5) निर्णय समस्या से सम्बन्धित प्रबन्ध अधिकारी अथवा निर्णय लेने के लिए नियुक्त समिति द्वारा भी लिए जा सकते हैं।

(6) निर्णय लेने से पूर्व यदि आवश्यक हो तो उपयुक्त अथवा योग्य विशेषज्ञ से परामर्श भी लिया जा सकता है।

(7) निर्णय उद्देश्ययुक्त होता है। दूसरे शब्दों में, किसी-न-किसी उद्देश्य अथवा उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए ही निर्णय लिए जाते हैं।

(8) निर्णय दृढ़ एवं स्पष्ट होने चाहिए, लचीले नहीं। 

(9) निर्णय नियोजन का ही एक अंग हैं। 

(10) निर्णयन की प्रक्रिया परिस्थितियों से प्रभावित होती है। 

(11) निर्णयन के लिए ज्ञान, विवेक एवं अनुभव आवश्यक तत्त्व हैं। 

(12) निर्णयन में वचनबद्धता निहित होती है।

(13) निर्णय केवल सम्बन्धित अधिकारी अथवा उस कार्य के लिए नियुक्त अधिकारियों द्वारा ही लिए जाते हैं।

निर्णयन की प्रकृति

(Nature of Decision-making) 

निर्णयन की प्रकृति के सम्बन्ध में निम्नलिखित बातें उल्लेखनीय हैं

(1) निर्णयन एक सतत प्रक्रिया (Continuous Process) है। यह भूत, वर्तमान एवं भावी सम्भावनाओं से किसी-न-किसी रूप में अवश्य ही प्रभावित होती है।

(2) निर्णयन का समस्त कार्य नियोजन के अनुरूप ही किया जाता है।

(3) चूँकि निर्णयन उपलब्ध विकल्पों में से सर्वश्रेष्ठ विकल्प का चयन है। अत: निर्णय लेने की प्रत्येक प्रक्रिया में मूल्यांकन करना आवश्यक होता है।

(4) मानवीय निर्णय विवेक पर आधारित होते हैं। 

(5) निर्णय लेने का कार्य प्रबन्ध के सभी स्तरों पर सम्पन्न किया जाता है। 

(6) निर्णयन एक सोद्देश्य (Purposive) क्रिया है।

(7) निर्णयन पूर्वानुमान का ही एक अंग है।

(8) निर्णयन प्रबन्ध का महत्त्वपर्ण उपकरण है। नियोजन, संगठन, संचालन व नियम निर्णयन के बिना सम्भव नहीं हैं।

निर्णयन के मूल तत्त्व

(Basic Elements of Decision-making) 

निर्णयन के मूल तत्त्वों में निम्नलिखित का समावेश किया जा सकता है

1. मनोवैज्ञानिक तत्त्व (Psychological Factors)–निर्णय चाहे कैसा भी क्यों न हो उस पर निर्णयकर्ता के व्यक्तिगत गुणों का प्रभाव अवश्य ही पड़ता है। निर्णयकर्त्ता के व्यक्तिगत गुणों में उसका मानसिक स्तर, शैक्षणिक स्तर, स्वभाव, आर्थिक एवं सामाजिक स्तर आदि का समावेश होता है।

2.निर्णय का समय (Decision Time)-प्रबन्धकों के द्वारा जो भी निर्णय लिए जाएँ उनमें समय जैसे महत्त्वपूर्ण तत्त्व का अवश्य ध्यान रखा जाना चाहिए क्योंकि उचित समय पर लिए गए निर्णय संस्था के लिए वरदान सिद्ध होते हैं और समय से पूर्व तथा समय निकल जाने के पश्चात् लिए गए निर्णयों का कोई महत्त्व नहीं रह जाता।

3. श्रेष्ठ निर्णय की कल्पना (Imagination of Best Decision)-प्रबन्धकों को कोई भी निर्णय लेते समय सदैव सर्वश्रेष्ठ विकल्प के चयन की कल्पना करनी चाहिए ताकि वह संस्था के मूल उद्देश्यों की प्राप्ति में सहायक सिद्ध हो सके।

4. निर्णय का वातावरण (Decision Atmosphere)-वातावरण को दो भागों में बाँटा जा सकता है-आन्तरिक वातावरण तथा बाह्य वातावरण। आन्तरिक वातावरण में श्रम-प्रबन्ध सम्बन्ध, स्वामी-श्रम सम्बन्ध, संगठन संरचना, अधिकारों का केन्द्रीकरण एवं विकेन्द्रीकरण सम्मिलित होते हैं। प्रभावपूर्ण निर्णय लेने के लिए इन सभी आन्तरिक वातावरण के तत्त्वों को ध्यान में रखा जाना चाहिए। बाह्य वातावरण के अन्तर्गत वे सब परिस्थितिया आती हैं जो संस्था के नियन्त्रण से बाहर होती हैं; जैसे-राजनीतिक स्थिति, सामाजिक परिस्थितियाँ, व्यापार-चक्र तथा राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था आदि। निर्णय के सम्बन्ध में इन बाह्य तत्त्वा का भी कम महत्त्व नहीं है। अत: इनका भी ध्यान रखा जाना आवश्यक है।

5. कर्मचारियों का सहयोग (Employee’s Co-operation)-कोई भी निर्णय उस समय तक प्रभावकारी नहीं हो सकता जब तक कि सम्बन्धित कर्मचारी उससे सन्तष्ट न हों; अतः किसी भी महत्त्वपूर्ण निर्णय के समय अधिकारियों एवं कर्मचारियों को अपने विचार व्यक्त करने का अवसर प्रदान किया जाना चाहिए।

6. नर्णय का सम्प्रेषण (Decision Communication)-किसी निणय प्रभावशाली बनाने के लिए उसका प्रभावपूर्ण सम्प्रेषण भी आवश्यक है। अतः किसी भी निर्णय की सचना सम्बन्धित अधिकारियों को उचित समय पर प्रेषित की जानी चाहिए ताकि वे उस अपने अधीनस्थों को बता सकें तथा उसे कार्यरूप में परिणत कर सकें।

निर्णयन का महत्त्व

(Importance of Decision-making) 

डॉ० एस० एन० घोषाल के इस कथन से निर्णय लेने का महत्त्व परिलक्षित होता है”प्रबन्ध एक विशिष्ट प्रक्रिया है तथा निर्णय लेना उसकी आत्मा है।’ जॉन मैक्डोनाल्ड के अनुसार, “व्यावसायिक प्रबन्धक पेशेवर निर्णय लेने वाला व्यक्ति होता है।” किसी व्यवसाय के सफल संचालन के लिए प्रबन्ध अधिकारियों को प्रारम्भ से अन्त तक निर्णय ही लेने पड़ते हैं। अत: यह सत्य है कि व्यावसायिक नियोजन, संगठन, नियन्त्रण, समन्वय एवं उत्पादन के हर क्षेत्र में निर्णय लेने की कदम-कदम पर आवश्यकता पड़ती है। मेलविन टी० कापलण्ड क मतानुसार, “प्रशासन मुख्यतः निर्णय लेने की ही प्रक्रिया है तथा प्राधिकार (Authority) निर्णय लेने तथा यह देखने कि उसके अनुसार कार्य का निष्पादन हो रहा है अथवा नहीं, का उत्तरदायित्व है। व्यवसाय में चाहे उपक्रम बड़ा हो या छोटा, स्थिति में परिवर्तन होता रहता है, कर्मचारी बदलते रहते हैं तथा अनेक आकस्मिक घटनाएँ होती रहती हैं, परन्तु व्यवसाय के पहियों को चालू-मात्र करने तथा उनकी क्रिया जारी रखने के लिए निर्णय लेना अनिवार्य होता है।”

संक्षेप में निर्णय लेने का महत्त्व निम्नलिखित बिन्दुओं से स्पष्ट होता है

1. व्यवसाय की नीतियों का निर्धारण (Determination of Business Policies)-व्यवसाय सम्बन्धी नीति-निर्धारण में प्रबन्धक अनेक निर्णय लेते हैं। वे व्यवसाय की नीतियों के विस्तृत विवरण तैयार करते हैं। इन विवरणों में विभागों एवं उपविभागों के उद्देश्यों एवं कार्यों का उल्लेख किया जाता है। यह सब बिना निर्णय लिए करना असम्भव है।

2. व्यवसाय का कुशल संचालन (Efficient Management of the Business)—बिना निर्णय लिए व्यवसाय का कुशल संचालन असम्भव है। अत: जिस संस्था में अच्छे निर्णय लिए जाएँगे, उस व्यवसायी संस्था का निर्बाध कुशल संचालन होगा। निर्णय द्वारा संस्था सीमित साधनों का कुशलतापूर्वक उपयोग कर सकती है।

3. प्रबन्धकीय कार्यों का सम्पादन (Execution of Managerial Functions)प्रबन्धकीय कार्यों अर्थात् नियोजन, संगठन, उत्प्रेरण एवं नियन्त्रण में निर्णय लेने की आवश्यकता होती है। नियोजन में ढेर सारे विकल्पों में से सर्वोत्तम विकल्प चुनने के लिए भी निर्णय लेना पड़ता है। संगठन में व्यक्तियों के आपसी सम्बन्ध निश्चित करने में भी निर्णय लेना पड़ता है।

4. प्रबन्धकों की कार्यक्षमता की जाँच (Test of the Efficiency of Managers)-अच्छे प्रबन्धकों के निर्णय भी अच्छे होते हैं और बुरे या अकुशल प्रबन्धकों के निर्णय व्यर्थ हो जाते हैं। निर्णय लेने से अच्छे या बुरे प्रबन्धक का अनुमान सरलता से लगाया जा सकता है। अंशधारी प्रबन्धकों को उनके निर्णयों के आधार पर ही नियन्त्रित करते हैं।

5. व्यवसाय में प्रबन्धन व निर्णयन पृथक् नहीं (Management and Decisionmaking are Inseparable in Business)-व्यवसाय में प्रबन्धन व निर्णयन के कार्य समान ही हैं, उन्हें पृथक् नहीं किया जा सकता। व्यवसाय का प्रबन्ध करते समय निर्णय लेने ही

होगे। चाहे नई व्यावसायिक इकाई की स्थापना करनी हो, उत्पादन की मात्रा निर्धारित करनी हो अथवा विक्रय-नीति का निर्धारण करना हो. प्रबन्ध को कदम-कदम पर निर्णय लेने होते है

6. निर्णयन साध्य भी है और साधन भी (Decision-making is both Enda and Means)-व्यवसाय में किसी साध्य (End) का निर्धारण करने से पर्व और सर प्राप्ति हेतु साधनों (Means) के चयन हेत भी निर्णय लेने होते हैं।

7. निर्णयन का क्षेत्र सर्वव्यापी है (The Scope of Decision-making is universal)-निर्णयन का क्षेत्र सार्वभौमिक एवं सर्वव्यापी है। आज व्यावसायिक व और व्यावसायिक सभी क्षेत्रों में निर्णय लिए जाते हैं।

प्रश्न उद्यमिता विकास की मनोवैज्ञानिक एवं समाजशास्त्रीय विचारधाराओं की संक्षेप में व्याख्या कीजिए।

Explain the Psychological and Sociological Theories of Entrepreneurship Development in brief.

अथवा उद्यमिता विकास की विभिन्न विचारधाराओं का विस्तार से वर्णन कीजिए।

Discuss in detail the various theories of Entrepreneurship Development. 

अथवा उद्यमिता विकास की आर्थिक, मनोवैज्ञानिक एवं समाजशास्त्रीय विचारधाराओं को संक्षेप में समझाइए।

Explain in brief the Economic, Psychological and Sociological Theories of Entrepreneurship Development. 

उत्तर – उद्यमिता विकास की विचारधाराएँ

(Theories of Entrepreneurship Development) 

उद्यमिता विकास अनेक घटकों पर निर्भर करता है। इस सम्बन्ध में विभिन्न विद्वानों ने समय-समय पर उद्यमिता के विभिन्न सिद्धान्तों अथवा विचारधाराओं का प्रतिपादन किया है। इन विचारधाराओं को निम्नलिखित चार भागों में विभक्त किया जा सकता है

(1) मनोवैज्ञानिक विचारधारा (Psyhological Theory) 

(II) समाजशास्त्रीय विचारधारा (Sociological Theory) 

(III) आर्थिक विचारधारा (Economic Theory) 

(IV) एकीकृत विचारधारा (Integrated Theory)।

उपर्युक्त सभी विचारधाराओं का संक्षिप्त वर्णन निम्नवत् है

1. मनोवैज्ञानिक विचारधारा 

(Psychological Theory)

यह विचारधारा इस मान्यता पर आधारित है कि उद्यमिता के विकास को प्रभावित करने वाले मूल घटक ‘मनोवैज्ञानिक हैं। दूसरे शब्दों में, उद्यमिता की पर्ति अनेक मनोवैज्ञानिक, अभौतिक तथा आन्तरिक शक्तिया द्वारा प्रभावित होती है। वास्तव में उद्यमिता के विकास पर व्यक्ति की आन्तरिक इच्छाओं, मनोवृत्तियों, आकांक्षाओं, संवेगों व विचारों का गहरा प्रभाव पड़ता है। इस सन्दर्भ में प्रमुख विचारधाराएँ अग्रलिखित हैं-

1. मैक-क्लीलैण्ड की उपलब्धि विचारधारा (McClelland’s Achievement TA )-इस विचारधारा के अनुसार, “उपलब्धि पाने की तीव्र इच्छा व्यक्ति को उद्यमिता की क्रियाओं की ओर आकर्षित करती है।” व्यवसाय एवं उद्योग के क्षेत्र में उत्कृष्टता को छूने तथा प्राप्त करने की भावना ही व्यक्ति में विशिष्ट उपलब्धि या उद्यमिता की भावना का संचार करती है। उपलब्धि की लालसा ही माता-पिता को इस बात के लिए प्रेरित करती है कि वे बच्चों का श्रेष्ठ ढंग से लालन-पालन करें, उन्हें आत्मनिर्भर बनाएँ, उनमें स्वतन्त्रता की भावना विकसित करें और उन पर न्यूनतम अंकुश लगाएँ। मैक-क्लीलैण्ड के अनुसार, “उच्च उपलब्धि वाले व्यक्ति मुद्रा द्वारा अभिप्रेरित नहीं होते, निम्न उपलब्धि वाले व्यक्ति ही मुद्रा द्वारा अभिप्रेरित होते हैं।”

2. शुम्पीटर की नवप्रवर्तन विचारधारा (Schumpeter’s Innovation Theory)-इस विचारधारा के अनुसार उद्यमी मुख्य रूप से नवप्रवर्तन का कार्य करता है और उसका व्यवहार प्रत्येक स्थिति में सृजनात्मक होता है। वह मुख्य रूप से ‘शक्ति पाने की इच्छा, निजी राज्य की स्थापना करने की इच्छा और किसी राज्य पर विजय प्राप्त करने की इच्छा’ से अभिप्रेरित होता है। नवप्रवर्तक के रूप में वह निम्नलिखित कार्य करता है

(i) नव-उत्पाद का प्रस्तुतीकरण, (ii) नई उत्पाद पद्धति का प्रस्तुतीकरण, (iii) नए बाजार खोलना, (iv) कच्चे माल के नए स्रोतों की खोज, (v) नए-नए संगठनों की स्थापना।

उद्यमी एक नवप्रवर्तक है, जो नवप्रवर्तनों के द्वारा अपने लाभ को अधिकतम करने की इच्छा रखता है। उसमें प्रतिरोधों को सहन करने की क्षमता होती है।

3. हेगन की हासित अल्प-समूह विचारधारा (Hegen’s Distressed Minority Group Theory)-यह विचारधारा इस मान्यता पर आधारित है कि किसी सामाजिक समूह की प्रतिष्ठा का ह्रास उद्यमी के व्यक्तित्व के विकास में सहायक होता है। हेगन ने प्रतिष्ठा के ह्रास के लिए उत्तरदायी चार घटनाओं का उल्लेख किया है-(i) जबरन प्रतिष्ठा का ह्रास करना, (ii) प्रतिष्ठा चिह्न से वंचित करना, (iii) आर्थिक शक्ति के कमजोर होने से प्रतिष्ठा चिह्न का ह्रास तथा (iv) नई व्यवस्था के अन्तर्गत भी प्रतिष्ठा प्राप्त न होना।

प्रतिष्ठा का ह्रास होने पर व्यक्ति अथवा समूह उस प्रतिष्ठा को पुन: प्राप्त करने के लिए सृजनात्मक व्यवहार करेगा। इससे उद्यमिता का विकास होगा। इस प्रकार, ‘प्रतिष्ठा की विसंगति’ उद्यमीय क्षमता का विकास करती है।

4. जॉन कुनकेल की व्यवहारवादी विचारधारा (John Kunkel’s Behavioural Theory)-इस विचारधारा के अनुसार उद्यमिता का विकास किसी भी समाज के भूतकालीन एवं वर्तमान सामाजिक ढाँचे पर निर्भर करता है। इसके अतिरिक्त यह आर्थिक एवं सामाजिक

अभिप्रेरणाओं से भी प्रभावित होता है। जॉन कुनकेल के शब्दों में, “उद्यमिता परिस्थितियों के विशेष संयोजन पर निर्भर करती है। इसका सृजन कठिन किन्तु ह्रास सरल होता है।”

5. ड्रकर की ज्ञान विचारधारा (Drucker’s Knowledge Theory)-ड्रकर का मत है कि उद्यमिता एक प्रक्रिया है, कला अथवा विज्ञान नहीं। यह एक व्यवहार है जिसका मूलाधार ज्ञान है। व्यवहार से ज्ञान निर्मित होता है और ज्ञान से निर्धारित लक्ष्यों की प्राप्ति होती है। यह प्रक्रिया निरन्तर चलती रहती है।

समाजशास्त्रीय विचारधारा 

(Sociological Theory)

समाजशास्त्रीय विचारधारा के अनुसार उद्यमिता का उद्भव विशिष्ट सामाजिक संस्कति हाता हा उद्यमीय क्रियाएँ समाज के मल्यों एवं पद स्थिति पदानक्रम व्यवस्था से प्रभावित होता है। अतः सामाजिक अनमोदन, सांस्कृतिक मल्य. स्थापित परम्पराए

कालाए आदि घटक उद्यमिता के उदभव एवं विकास के लिए उत्तरदायी होते हैं। इस सम्बन्ध में प्रमुख समाजशास्त्रीय विचारधाराएँ निम्नवत् हैं

1. यंग की उद्यमशील समह विचारधारा (Young’s Entrepreneurial Group Theory)-इस विचारधारा के अनुसार व्यक्ति नहीं, अपितु साहसी समूह ही उद्यमीय क्रियाओं को प्रोत्साहित करते हैं। वास्तव में, समूहों में ही विशिष्टता के कारण प्रतिक्रिया करने का क्षमता होती है और यह प्रतिक्रिया उद्यमशील व्यवहार को जन्म देती है।

2. वेबर की सामाजिक परिवर्तन की विचारधारा (Weber’s Social Change Theory)-इस विचारधारा के अनुसार व्यक्ति जिस धर्म एवं सम्प्रदाय में जीता है तथा जिन विश्वासों एवं धार्मिक मान्यताओं में विश्वास रखता है, वे मूल्य एवं विश्वास ही उसके व्यावसायिक जीवन एवं उद्यमशीलता को प्रभावित करते हैं। व्यक्ति के ये विश्वास ही उसके दृष्टिकोण एवं चिन्तन शैली को प्रभावित करते हैं। इन्हीं के आधार पर वह अपनी आजीविका का चयन करता है। इस प्रकार उद्यमिता विकास में नैतिक एवं धार्मिक मूल्यों का उल्लेखनीय योगदान होता है।

3. हॉसलिज की सांस्कृतिक विचारधारा (Hoselitz’s Cultural Theory)-इस विचारधारा के अनुसार उद्यमिता का विकास केवल ऐसे समाज में ही सम्भव होता है, जहाँ सामाजिक प्रतिक्रियाएँ परिवर्तनशील होती हैं तथा व्यक्ति के रोजगार के लिए व्यापक अवसर उपलब्ध होते हैं। ये प्रतिक्रियाएँ ही व्यक्ति के उद्यमशील व्यक्तित्व को प्रोत्साहित करती हैं। इसमें सांस्कृतिक दृष्टि से सीमान्त समूहों की भूमिका अत्यधिक महत्त्वपूर्ण होती है क्योंकि ये समह समायोजन की प्रक्रिया के दौरान व्यवहार में नवप्रवर्तन लाने का भरसक प्रयास करते हैं।

4. कोक्रेन की सांस्कृतिक मूल्य विचारधारा (Cochran’s Cultural Values Theory कोक्रेन के अनुसार उद्यमिता के विकास में सांस्कृतिक मूल्यों, भूमिका, आकांक्षाओं तथा सामाजिक अनुमोदन का महत्त्वपूर्ण स्थान है। उनका मत है कि आर्थिक दौर में मनोवैज्ञानिक घटकों की अपेक्षा सामाजिक तथा सांस्कृतिक मुल्य उद्यमिता विकास को अत्यधिक प्रोत्साहित करते हैं। उद्यमी का व्यवहार अपने पेशे, भूमिका, आकांक्षा, आवश्यकता व सामाजिक मूल्यों से अत्यधिक प्रभावित होता है। 

III. आर्थिक विचारधारा

(Economic Theory)

इस विचारधारा के अनुसार उद्यमिता का विकास उन परिस्थितियों में होता है, जबकि आर्थिक अवसर उसके सर्वाधिक अनुकूल होते हैं। वह इन अवसरों का लाभ उठाने के लिए व्यावसायिक क्षेत्र में प्रवेश करता है और आर्थिक उच्चावचनों के दौरान लाभ उठाता है। इस

प्रकार आर्थिक क्रियाएँ ही उद्यमिता क्रियाओं की मुख्य चालक होती हैं। मार्क कैसन (Mark Casson) का मत है कि परिवर्तन के समायोजन की आवश्यकता उद्यमिता की माँग को प्रोत्साहित करती है। 

IV. एकीकृत विचारधारा (Integrated Theory)

यह विचारधारा इस बात पर बल देती है कि उद्यमिता अनेक सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक तथा मनोवैज्ञानिक घटकों द्वारा प्रभावित होती है। इस सम्बन्ध में प्रमुख विचारधाराएं निम्नवत् हैं

1. टी० वी० राव की साहसिक मनोवृत्ति विचारधारा (T. V. Rao’s Entrepreneurial Disposition Theory)-इस विचारधारा के अनुसार उद्यमिता के विकास में ‘उद्यमशील मनोवृत्ति’ एक महत्त्वपूर्ण घटक है। इसके अभाव में उद्यमिता की कल्पना भी नहीं की जा सकती। वास्तव में साहसिक मनोवृत्ति ही व्यक्ति को जोखिम उठाने, आगे बढ़ते जाने व नई-नई इकाइयों की स्थापना के लिए प्रोत्साहित करती है। टी० वी० राव के अनुसार साहसिक मनोवृत्ति के अन्तर्गत निम्नलिखित घटक सम्मिलित किए जाते हैं

(1) गतिशील प्रेरणा, (ii) दीर्घकालीन निष्ठा, (iii) वैयक्तिक, सामाजिक एवं भौतिक संसाधन तथा (iv) सामाजिक एवं राजनीतिक प्रणाली।

2. बी० एस० राव की प्रक्रिया विचारधारा (B. S. Rao’s Process Theory)बी० एस० राव ने उद्यमिता विकास की प्रक्रिया में पाँच महत्त्वपूर्ण चरणों का उल्लेख किया है

(i) उत्प्रेरणा – उद्यमियों के विकास के लिए विभिन्न प्रेरणाएँ प्रदान करके एक उपयुक्त वातावरण का निर्माण करना।

(ii) पहचान – भावी उद्यमियों की पहचान कर, उन्हें रचनात्मक कार्यों की ओर प्रवृत्त करना।

(iii) विकास – उद्यमिता के विकास के लिए प्रबन्धकीय प्रशिक्षण, तकनीकी प्रशिक्षण एवं व्यावसायिक मार्गदर्शन के लिए कार्यक्रमों का संचालन।

(iv) संवर्द्धन – सहायक संगठनों का निर्माण। 

(v) अनुवर्तन – सरकारी कार्यक्रम एवं नीतियों की समीक्षा। 

प्रश्न निर्णयन प्रक्रिया की व्याख्या कीजिए।

Explain the Decision-making Process. 

अथवा निर्णय लेने की कार्यविधि को संक्षेप में समझाइए।

Briefly describe the Technique of Decision-making. 

उत्तर – निर्णयन प्रक्रिया एवं उसके विभिन्न चरण

(Decision-making Process and its Various Steps) निर्णय लेने की विधियों को दो भागों में विभक्त किया जा सकता है

(i) परम्परागत विधि (Traditional Method), 

(ii) वैज्ञानिक विधि (Scientific Method)।

I. परम्परागत विधि (Traditional Method)

ऩिर्णय लेने की परम्परागत विधि लक्षणात्मक निदान विधि पर आधारित है। इस विधि अन्तर्गत व्यावसायिक प्रबन्धक अपने अनुभवों के आधार पर समस्याओं का निदान खोज लेते हैं और उन्हीं के द्वारा समस्याओं को हल करने का प्रयास करते हैं। इसके लिए पर्याप्त ज्ञान. अनुभव एवं विवेक की आवश्यकता होती है। दसरे. इसके पीछे किसी वैज्ञानिक विश्लेषण का आधार एंव विवेक की आधार नही होता और केवल अनुभव के द्वारा प्रत्येक व्यावसायिक समस्या का समाधान नहीं किया जा सकता। अत: आज के वैज्ञानिक युग में इस विधि को नहीं अपनाया जा सकता है। 

II. वैज्ञानिक विधि-निर्णयन के विभिन्न चरण 

(Scientific Method : Various Steps of Decision-making)

यह निर्णयन की एक वैज्ञानिक विधि है। इसे विश्लेषणात्मक विधि (Analytical Method) भी कहते हैं। इसमें समस्या के विभिन्न विकल्पों के समुचित विश्लेषण के बाद ही निर्णय लिए जाते हैं।

इस विधि में व्यावसायिक प्रबन्धक किसी भी कार्य के सम्बन्ध में निर्णय लेने के लिए निम्नलिखित प्रक्रिया अपनाते हैं

1. समस्या को परिभाषित करना (To Define the Problem)-निर्णयन की आवश्यकता किसी समस्या के उत्पन्न होने पर ही होती है। अत: सर्वप्रथम समस्या को स्पष्टत: परिभाषित करना तथा समस्या के स्वरूप एवं गम्भीरता को समझना आवश्यक है। समस्या को स्पष्टत: समझे बिना उसका हल खोजना संस्था के लिए हानिकारक सिद्ध होगा। उदाहरण के लिए, उत्पादन अथवा बिक्री में कमी के कारणों को केवल अनुमान के आधार पर नहीं जाना जा सकता, इसके पीछे ठोस कारणों को जानने के बाद ही उनका निराकरण करके उत्पादन अथवा बिक्री में वृद्धि की जा सकती है। अत: समस्या को सही रूप से समझने के बाद ही इस सम्बन्ध में कोई निर्णय लिया जाना चाहिए।

2. समस्या का विश्लेषण करना (To Analyse the Problem)-समस्या को सही रूप में परिभाषित करने के बाद उसका गहन विश्लेषण किया जाता है। इसके अन्तर्गत समस्या की प्रकृति, उसके कारण और इसके लिए उत्तरदायी घटकों की विस्तृत जानकारी प्राप्त की जाती है। इससे सम्बद्ध विभिन्न प्रकार के तथ्यों को संकलित किया जाता है। चूँकि वास्तविक तथ्यों का संकलन एक कठिन कार्य है। अत: अनुमानित सूचनाओं के आधार पर ही निर्णय ले लिए जाते हैं।

3. विभिन्न वैकल्पिक हलों पर विचार करना (To Think on Different Alternative Solutions)-किसी भी समस्या के समाधान के लिए विभिन्न विकल्प उपलब्ध हो सकते हैं। एक व्यावसायिक प्रबन्धक को सभी सम्भावित विकल्पों पर विचार करना होता है। मान लीजिए व्यवसाय में उत्पाद की बिक्री में आशा के अनुकूल वृद्धि नहीं हो पा रही ह आर उसका कारण दोषपूर्ण विक्रय नियोजन हो तो इसके लिए अग्रलिखित विकल्पों पर विचार किया जा सकता हैं।

(i) उत्पाद की पैकिंग एवं पैकेजिंग को आकर्षक बनाया जाए, (ii) विक्रय कर्मचारियों को प्रशिक्षण दिया जाए, (iii) पुराने कर्मचारियों को हटाकर नए कर्मचारियों की नियुक्ति की जाए. (iv) विक्रय कर्मचारियों को कुछ गैर-आर्थिक प्रेरणाएँ दी जाएँ।

– अन्तिम निर्णय लेने से पूर्व उपर्युक्त सभी विकल्पों पर ध्यान देना आवश्यक है क्योंकि ये विकल्प ही सही निर्णय लेने के लिए भूमिका तैयार करते हैं।

4.सीमित करने वाले घटक का सिद्धान्त अपनाना (Following the Principle of Limiting Factors)-जब किसी समस्या से सभी विकल्पों के हलों पर विचार किया जाना व्यावहारिक नहीं होता तो इस सिद्धान्त का प्रयोग करके केवल कुछ महत्त्वपूर्ण घटकों पर ही ध्यान केन्द्रित किया जाता है। इस सिद्धान्त के अन्तर्गत प्रबन्ध समस्या के मूल घटकों पर ही ध्यान केन्द्रित करता है, अन्य गौण एवं कम महत्त्वपूर्ण घटकों को छोड़ दिया जाता है।

5. सर्वश्रेष्ठ विकल्प का चयन (Selection of the Best Alternative)विभिन्न विकल्पों पर विचार करने के पश्चात् सर्वश्रेष्ठ विकल्प का चुनाव किया जाता है। इसके लिए सभी विकल्पों का तुलनात्मक अध्ययन किया जाता है। मूल्यांकन करते समय निम्नलिखित तथ्यों को ध्यान में रखा जाता है

(i) प्रत्येक सम्भावित हल द्वारा प्राप्त होने वाले लाभ एवं हानियों का मूल्यांकन। 

(ii) प्रत्येक विकल्प में लगने वाले प्रयत्नों की मात्रा। 

(iii) वर्तमान परिस्थितियों में प्रत्येक विकल्प की उपयुक्तता।

सर्वश्रेष्ठ विकल्प का चयन करने के लिए निम्नलिखित विधियों को भी अपनाया जाता है

(अ) भूतकालीन अनुभव (Past Experience)-भूतकालीन अनुभव मनुष्य का सबसे बड़ा शिक्षक एवं मार्गदर्शक होता है। इसमें प्रबन्धक अपने तथा अपने पूर्व प्रबन्धकों के अनुभव का लाभ उठा सकता है। इसके लिए यह आवश्यक है कि भूतकालीन अनुभवों को भावी अनुमानों के परिप्रेक्ष्य में ही देखा जाए।

(ब) प्रयोग (Experiments) – विभिन्न विधियों को व्यावहारिक रूप देकर उनके परिणामों का आकलन किया जाता है और जिस विकल्प के परिणाम सर्वश्रेष्ठ होते हैं, उसी का चयन कर लिया जाता है।

(स) वैकल्पिक हलों का विश्लेषण (Analysis of Alternative Solutions)-इस विधि के अन्तर्गत प्रत्येक विकल्प का गहन अध्ययन एवं विश्लेषण किया जाता है और जिस विकल्प के हल सभी दृष्टिकोणों से सर्वश्रेष्ठ होते हैं, उसका चयन कर लिया जाता है। श्रेष्ठतम निर्णय तक पहुँचने हेतु उपयुक्त सांख्यिकीय एवं गणितीय तकनीकों का प्रयोग किया जाता है।

6. (Effective Execution of the Decision)

निर्णय लेने के पश्चात् इसे कार्यरूप दिया जाता है। इसके लिए सभी सम्बद्ध पक्षों का सहयोग आवश्यक है। अत: सभी पक्षों को इसकी सूचना दे दी जाती है।

7. निर्णय में सुधार (Amendment in Decision)-प्रबन्धकीय निर्णय में कुछ हो सकत है अथवा इसमें समय एवं परिस्थितियों के अनुसार सुधार की आवश्यकता पड सकती है। अत: इसमें समयानकल सुधार करते रहना आवश्यक है।

प्रश्न – “उद्यमी जन्मजात नहीं होते बनाए जाते हैंटिप्पणी कीजिए। एक सफल उद्यमी में कौन-कौन से गुण होने चाहिए?

Entrepreneurs are made not born” Comment. What should be the qualities of a successful entrepreneur ? 

उधमी उद्योग का कप्तानतथा समाज का आर्थिक नायकहै।समझाइए।

“Entrepreneur is a ‘Captain of Industry’ and ‘Economic Leader of Society’.” Explain. 

अथवाउद्यमी आर्थिक विकास का उत्प्रेरक तत्त्व है।समझाइए और विकासशील अर्थव्यवस्थाओं में उद्यमी की भूमिका एवं महत्त्व को समझाइए।

“An entrepreneur is a catalytic agent in economic development.” Explain and discuss the role and importance of entrepreneur in a Developing Economy. 

उत्तर – उद्यमी का महत्त्व

(Role and Importance of Entrepreneur) 

किसी भी देश के आर्थिक एवं औद्योगिक विकास में उद्यमी का उल्लेखनीय योगदान होता है। विकसित देशों के आर्थिक एवं औद्योगिक विकास में उद्यमी की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। उद्यमी के महत्त्व पर प्रकाश डालते हुए मार्शल ने लिखा है-“उद्यमी उद्योग का कप्तान होता है। वह केवल जोखिम तथा अनिश्चितता का वाहक ही नहीं होता अपितु एक प्रबन्धक, भविष्यद्रष्टा, नवीन उत्पादन-विधियों का आविष्कारक तथा राष्ट्र के आर्थिक ढाँचे का निर्माता भी होता है।”

संक्षेप में उद्यमी के महत्त्व को निम्न प्रकार स्पष्ट किया जा सकता है

1.आर्थिक विकास की धुरी (Pivot of Economic Development)-आधुनिकता के इस युग में उद्यमी को आर्थिक विकास का कर्णधार माना जाता है। उद्यमियों की महत्त्वपूर्ण क्रियाओं के द्वारा ही राष्ट्र के आर्थिक विकास को गति प्रदान की जाती है। उद्यमी प्रत्येक अर्थव्यवस्था का मख्य चालक होता है। अत: जिस प्रकार बिना चालक के कोई वाहन स्वयं नहीं चल सकता, ठीक उसी प्रकार अर्थव्यवस्था की गाड़ी बिना उद्यमी के गतिमान नहीं हो सकती है।

2. उद्योग का कप्तान (Captain of Industry)-उद्यमी प्रत्येक उद्योग की आधारशिला एवं ढाँचे का प्रमुख स्तम्भ होता है। वह केवल जोखिमों का वहनकर्ता ही नहीं अपितु उद्योग का प्रबन्धक, भविष्यवक्ता, नवीन उत्पादन-विधियों का जन्मदाता तथा राष्ट्र के आर्थिक, सामाजिक एवं राजनीतिक ढाँचे का सृजनकर्ता भी होता है। इस प्रकार उद्यमी सम्पूर्ण उद्योग का कप्तान है जो कि उद्योग को प्रभावी नेतृत्व प्रदान करता है।

3. उत्पादन के साधनों का संगठनकर्ता एवं समन्वयकर्ता (Organiser and Co-ordinator of Production Resources)-उद्यमी उत्पादन के साधनों का

संगठनकर्ता एवं इन साधनों में परस्पर प्रभावकारी समन्वयकर्ता भी है। इसके अथक प्रयासों से ही वास्तव में वस्तुओं में उपयोगिता एवं मूल्यों का सृजन किया जाता है, जिसके आधार पर सामाजिक जीवन स्तर में सुधार होता है। इसके अतिरिक्त समाज के अप्रयुक्त साधनों को उत्पादक कार्यों में लगाने, रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने तथा आधुनिक तकनीकों एवं प्रविधियों का उपयोग करने में उद्यमी अहम भूमिका का निर्वाह करता है।

4. आधुनिक उत्पादन व्यवस्था का अंग (Ingredient of Modern Production System)-आधुनिकता के इस युग में एक ओर वस्तुओं का माँग से पूर्व उत्पादन किया जाता है तथा दूसरी ओर नित्यप्रति बदलती हुई परिस्थितियों के कारण जोखिम एवं अनिश्चितताओं में अप्रत्याशित रूप में वृद्धि होती जाती है। ऐसी परिस्थिति में उद्यमी की भूमिका अति महत्त्वपूर्ण हो जाती है। वह एक ओर तो बढ़ी हुई समस्याओं एवं अनिश्चितताओं से डटकर मुकाबला करता है और दूसरी ओर परिवर्तनों एवं नवप्रवर्तनों को आमन्त्रित करके आर्थिक व्यवस्था में चार चाँद लगाने के लिए सदैव प्रयासरत रहता है।

5. नवप्रवर्तनों को प्रोत्साहन (Promotion to Innovations)-आधुनिकता के इस युग में व्यवसाय का प्रमुख आधार नवप्रवर्तन है जो कि उद्यमी की भूमिका में वृद्धि करता है। उद्यमी इस कार्य की पूर्ति निरन्तर शोध एवं विकास कार्यों को प्राथमिकता देते हुए प्राप्त किए गए निष्कर्षों के माध्यम से सम एवं विषम परिस्थितियों का सामना करते हुए करता है। उद्यमी परिवर्तनों की अनिश्चितताओं का सामना करते हुए अपनी अडिग पूर्व कल्पना-शक्ति के आधार पर नवप्रवर्तनों को प्रोत्साहित करता है तथा उपक्रम को आधुनिकता का चोला (आवरण) प्रदान करता है।

6. व्यवसाय का पैगम्बर (Prophet of Business)-उद्यमी अपनी पूर्व कल्पना-शक्ति एवं अनुभवों के आधार पर जोखिम का पूर्वानुमान लगाता है, समाज के भावी विकास की कामना करता है, नवप्रवर्तनों को प्रोत्साहित करता है एवं उन्हें वस्तुओं का रूप प्रदान करता है। अत: उद्यमी को व्यवसाय का पैगम्बर माना जाता है।

7. सामाजिक परिवर्तनों का संवाहक (Ambassador of Social Changes)उद्यमी के प्रयासों के परिणामस्वरूप ही सामाजिक ढाँचे में रचनात्मक परिवर्तन सम्भव हुए हैं। उद्यमी के कारण ही समाज में नए-नए व्यवसायों की स्थापना होती है, उत्पत्ति के साधनों में प्राण फूंके जाते हैं। उद्यमी ही वह शक्ति है जिसने औद्योगिक क्रियाओं का विस्तार करके विकास की गति में चार चाँद लगाए हैं तथा उपभोक्ताओं को यथासमय आवश्यकतानुसार, यथामूल्यों पर वस्तुओं की उपलब्धि कराकर सामाजिक स्तर को पंख प्रदान किए हैं। अन्य शब्दों में, यदि उद्यमी को औद्योगिक सभ्यता का जन्मदाता’ कहा जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।

8. नवीन व्यावसायिक इकाइयों की स्थापना (Establishment of New Business Units)-उद्यमी के नेतृत्व के अभाव में उत्पत्ति के साधन निष्क्रिय बने रहते हैं, उनसे उत्पादकता का जन्म नहीं हो सकता। उद्यमी ही एक ऐसी शक्ति है जो कि उत्पत्ति के साधनों को उत्पादक कार्यों में प्रयुक्त करके उन्हें सृजनात्मकता प्रदान करता है। इससे नवीन व्यावसायिक इकाइयों की स्थापना की प्रवृत्ति को प्रोत्साहन मिलता है तथा पूर्व-स्थापित इकाइयों का विस्तार सम्भव होता है जिससे औद्योगिक विकास की गति में वृद्धि होती है।

9. शोध एवं विकास को प्रोत्साहन (Encouragement to Research and Development)-एक उद्यमी उपक्रम के प्रवर्तन के साथ-साथ नवप्रवर्तन कार्यों को भी सन करता है। इससे शोध एवं विकास कार्य को प्रोत्साहन मिलता है, फलस्वरूप नवीन उत्पादों का उत्पादन सम्भव होता है। नवीन तकनीकी अपनाने के कारण उत्पादों का विविधीकरण होता है, और समाज को कम मल्य पर विविध गुणवत्ता वाली वस्तुएं उपलब्ध होती हैं।

10. सामाजिक ढाँचे में परिवर्तन (Change in Social Framework)-एक उद्यमी नवीन वस्तुओं, बाजारों, तकनीकों, साधनों तथा नवीन उद्योगों की स्थापना के द्वारा सामाजिक ढाँचे में परिवर्तन लाता है, फलस्वरूप समाज के माँग ढाँचे (Demand Pattern) में भी परिवर्तन हो जाता है।

एक सफल उद्यमी के व्यावसायिक गुण 

(Professional Qualities of a Successful Entrepreneur) 

एक सफल उद्यमी में निम्नलिखित व्यावसायिक गुणों का होना आवश्यक है

1. नेतृत्व क्षमता (Leadership Ability)-उद्यमी में नेतृत्व क्षमता का गुण होने से उपक्रम में अन्य व्यक्तियों से कार्य लिया जा सकता है, उन्हें मार्गदर्शन दिया जा सकता है तथा समूह का उचित नेतृत्व करना भी सम्भव है।

2. साहस क्षमता (Enthusiastic Ability)-उद्यमी में उद्यमिता अर्थात् जोखिम, अनिश्चितता इत्यादि को सहन करने की क्षमता का होना आवश्यक है।

3. नवीन तकनीकों का ज्ञान (Knowledge of New Technologies)आधनिक समय में साहसी को नवीन तकनीकों का ज्ञान होना आवश्यक है, अन्यथा वह बहुत पिछड़ा एवं आलसी उद्यमी पुकारा जाएगा।

4. बाजार की दशाओं का ज्ञान (Knowledge of Market Conditions)उदासी संस्था की स्थापना एवं उत्पादन से लेकर विपणन तक समस्त कार्य करता है। इसके लिए उसे बाजार की दशाओं का ज्ञान होना आवश्यक है।

5. निर्णय क्षमता (Financial Ability)-उद्यमी में विभिन्न कार्यों, विभागों, विभागा नातिया के निधारण एव क्रियान्वयन सम्बन्धी निर्णय लेने की आवश्यक है।

6. प्रबन्ध क्षमता (Management Ability)-साहसी स्वयं ही कार्य नहीं करता, अपित अन्य व्यक्तियों से कार्य भी लेता है। अत: इसमें उत्तम प्रबन्ध क्षमता का होना आवश्यक है।

7.परिवर्तनों को समायोजित करने की क्षमता (Ability of Changed Adjustment)-उद्यमी नवीन तकनीकी के साथ स्वयं को समायोजित करने की भी बेहतर क्षमता रखता है।

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