B.Com 2nd Year Public Debts Long Notes In Hindi

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B.Com 2nd Year Public Debts Long Notes In Hindi
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प्रश्न 11 – भारतीय बजट किस प्रकार पारित और क्रियान्वित किया जाता है

How Budget is prepared, passed and executed in India ? 

उत्तर : बजट प्रक्रिया अथवा बजट नियोजन

(Budget Procedure or Budget Planning) प्रत्येक देश में बजट का निर्माण उस देश के संविधान में दी हुई विधि के अनुसार किया जाता है। भारतीय संविधान के अनसार बजट बनाने की विधि को निम्नलिखित खण्डों में बाटा जाता है

(1) बजट की तैयारी। 

(2) बजट को पेश करना। 

(3) बजट पर सामान्य बहस। 

(4) मतदान। 

(5) विनियोग विधेयक। 

(6) बजट का क्रियान्वयन।

(1) बजट की तैयारी (Preparation of Budget)-सामान्य बजट बनाने के लिए वित्त-मंत्रालय सभी मंत्रालयों और उनके अधीन विभागाध्यक्षों को अनुमान-पत्र भेजता है। विभागाध्यक्ष आय और व्यय के अनुमानों को दो भागों में तैयार करते हैं-(अ) वर्तमान आय तथा व्यय से सम्बन्धित अनुमान, (ब) नए कार्यों अथवा योजना से सम्बन्धित आय तथा व्यय के अनुमान। इन अनुमानों में निम्नलिखित सूचनाएँ संकलित रहती हैं

(i) पिछले वर्ष के वास्तविक आय एवं व्यय के आँकड़े। 

(ii) चालू वर्ष के आय तथा व्यय के स्वीकृत अनुमान। 

(iii) चालू वर्ष के संशोधित आय तथा व्यय के अनुमान। 

(iv) आगामी वर्ष के बजट अनुमान। ( चाल तथा पिछले वर्ष के वास्तविक आय-व्यय सम्बन्धी अनुमान। 

प्रत्येक विभाग से सम्बन्धित स्थानीय अधिकारी इन अनुमानों को तैयार करके उन्हें अपने विभागाध्यक्षों के पास भेज देते हैं। इसके बाद विभागाध्यक्ष सम्पूर्ण विभाग के लिए संयुक्त एवं शोधित अनमान की तीन प्रतियाँ तैयार करते हैं। इनमें से एक प्रति प्रशासन विभाग को व एक पति विन विभाग को भेज दी जाती है। तीसरी प्रति सम्बन्धित विभाग द्वारा अपने रिकॉर्ड के लिए रख ली जाती है। यह कार्य अक्टूबर माह तक पूरा कर लिया जाता है।

अब बजट की तैयारी का दूसरा चरण आरम्भ होता है। प्रशासकीय मंत्रालय अपने अधीन विभागों से जो अनुमान प्राप्त होते हैं, उन पर विचार करता है और दिसम्बर के अन्त तक उन अनमानों के आधार पर सामूहिक अनुमान तैयार करके वित्त मंत्रालय को भेज देता है। वित्त-मंत्रालय सामूहिक अनुमान प्राप्त होने पर उन पर विचार करता है। वह व्ययों के

साथ-साथ आयों का अनुमान लगाता है। यदि व्यय के अनुमाना स आय क अनुमान कम हैं तो वह पुराने करों में वृद्धि करने तथा नए कर लगाने के सम्बन्ध में सुझाव देता है। इसके पश्चात वित्तमंत्री अपना बजट भाषण तैयार करता है।

(2) बजट को पेश करना (Presentation of the Budget)-वित्तमंत्री स्वयं बजट को फरवरी के अन्तिम दिन पहले लोकसभा में प्रस्तुत करता है। उसी दिन वित्त-मंत्रालय का कोई अन्य मंत्री बजट को राज्य सभा में भी प्रस्तुत करता है। बजट प्रस्तुत करने के साथ ही वित्तमंत्री बजट भाषण देता है जिसमें देश एवं विदेश की महत्त्वपूर्ण आर्थिक, राजनीतिक तथा वित्तीय घटनाओं का विवरण रहता है। इसके अतिरिक्त, वित्तमंत्री पिछले वर्ष का लेखा-जोखा. नए वित्तीय प्रस्ताव, पूँजी निर्माण, विकास योजनाओं सम्बन्धी जानकारी सदन के सामने रखता है। वह नए करों व पूँजीगत व्ययों के प्रस्ताव भी रखता है। यदि बजट में घाटा दिखाया गया है तो उसको पूरा करने के उपाय और बजट में आधिक्य होने पर करारोपण सम्बन्धी छुटे बताई जाती हैं। बजट के साथ-साथ वित्त-विधेयक भी प्रस्तुत किया जाता है जिसमें कर सम्बन्धी प्रस्ताव होते हैं।

(3) बजट पर सामान्य बहस (General Discussion on the Budget)वित्तमंत्री द्वारा लोकसभा में बजट प्रस्तुत करने के बाद उस पर निर्धारित तिथि को विचार-विमर्श आरम्भ होता है, जो दो से चार दिन तक चलता है। विपक्षी दल द्वारा बजट तथा सरकार की आर्थिक नीति की खुलकर आलोचना की जाती है। बहस की समाप्ति पर वित्तमंत्री द्वारा सभी आलोचनाओं के उत्तर दिए जाते हैं और शंकाओं का समाधान किया जाता है। इस प्रकार सामान्य बहस का चरण पूरा हो जाता है।

(4) मतदान (Voting)-सामान्य विचार-विमर्श के बाद बजट पर मतदान होता है। मतदान की दृष्टि से बजट में दो प्रकार की व्यय मदें होती हैं-(अ) मतदान अयोग्य मदे, (ब) मतदान योग्य मदें।

(अ) मतदान अयोग्य पदें अथवा गैर – मत योग्य मदें-मतदान अयोग्य मदें निम्न प्रकार हैं –

(i) राष्टपति का वेतन, भत्ता एवं उसका कार्यालय व्यय।

(ii) संसद के अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष के वेतन और भत्ते। 

(iii) सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशो के भत्ते।

(iii) भारत के नियन्त्रक और महालेखा परीक्षक का वेतन एवं भत्ते। 

(v) भारत सरकार के ऋण सम्बन्धी भुगतान। 

(vi) किसी न्यायालय के निर्णयानुसार सरकार पर डिक्री सम्बन्धी देनदारिया।

(vii)  ऐसा कोई भी अन्य व्यय जिसे संसद ने मतदान के अयोग्य घोषित किया हो। इन मदों पर सदन में कोई बहस नहीं होती।

(ब) मतदान योग्य मदें – इन व्यय की मदों पर स्वीकति के लिए मतदान आवश्यकता होती है। प्रत्येक मंत्री अपने विभाग के लिए अनुदान की माँग रखता है और अपनी मॉग के सम्बन्ध में तर्क प्रस्तुत करता है। प्रत्येक अनुदान की माँग पर बहस के लिए कुछ समय निश्चित कर दिया जाता है। यदि निश्चित समय में बहस पूर्ण न हो तो अध्यक्ष बहस को बन्द करने का आदेश देता है। लोक सभा माँगों के लिए अपना मत तीन प्रकार से दे सकती है(i) माग का पूर्णतया स्वीकार कर लिया जाए. (ii) पर्णतया अस्वीकार कर दिया जाए, (iii) माँग कटाता क साथ स्वीकार की जाए। लोकसभा माँग में वृद्धि का अधिकार नहीं रखती, परन्त कटौती कर सकती है।

(5) विनियोग विधेयक (Appropriation Bill)-अनुदान माँगों की स्वीकृति के बाद वित्तमंत्री एक विनियोग विधेयक प्रस्तुत करता है जिसमें मत अयोग्य मदें तथा स्वीकृत मत योग्य मदें सम्मिलित होती हैं। इस विधेयक के पास हो जाने पर सरकार को बजट राशि के व्यय करने का अधिकार प्राप्त हो जाता है। विनियोग विधेयक सरकार को संचित निधि में से धन निकालने का अधिकार देता है, परन्तु सरकार को धन संग्रह करने का अधिकार नहीं देता। अत: लोकसभा में वित्त विधेयक पेश किया जाता है। इसके पारित हो जाने पर यह अधिनियम का रूप ले लेता है और सरकार को कराधान द्वारा धन संग्रह करने का अधिकार प्राप्त हो जाता है। राष्ट्रपति की स्वीकृति मिलते ही बजट अन्तिम रूप से स्वीकृत मान लिया जाता है।

पूरक बजट (Supplementary Budget)-कभी-कभी सरकार के कुछ विभागों का स्वीकृत रकम से काम नहीं चलता। इस स्थिति में पूरक बजट प्रस्तुत किया जाता है। अतिरिक्त माँगों की लोकसभा अथवा विधानसभा से स्वीकृति ले ली जाती है।

लेखा अनुदान (Account grants)-यदि बजट 1 अप्रैल से पूर्व पारित नहीं होता तो 1 अप्रैल से लेकर बजट के पारित होने की तिथि तक की अवधि में सरकार अपने व्ययों के लिए – लेखा अनुदान (Vote on Account) के आधार पर व्यय की अनुमति प्राप्त कर लेती है।

(6) बजट का क्रियान्वयन (Execution of the Budget)-बजट के क्रियान्वयन के अन्तर्गत आय को एकत्रित करना, प्राप्त आय को व्यय करना तथा वित्तीय लेखों का अंकेक्षण करना सम्मिलित होते हैं। वित्त मंत्रालय के अन्तर्गत दो परिषदें हैं–(अ) केन्द्रीय प्रत्यक्ष कर-परिषद (ब) केन्द्रीय उत्पाद शुल्क एवं सीमा शुल्क परिषद्। प्रत्येक परिषद के पाँच-पाँच सदस्य होते हैं जिन्हें केन्द्रीय सरकार नियुक्त करती है। ये परिषदें अपने-अपने क्षेत्र में कर निर्धारण और कर-एकत्रीकरण के लिए आवश्यक व्यवस्था करती हैं। एकत्रित कोषों की अभिरक्षा का कार्य सरकारी खजानों, उप-खजानों के साथ रिजर्व बैंक तथा स्टेट बैंक द्वारा भी किया जाता है।

कोषों का वितरण (Distribution of the Funds)-विनियोग विधेयक पारित हो जाने के पश्चात विभिन्न मंत्रालयों और विभागों को उनके लिए स्वीकृत राशि-सम्बन्धी सूचना भेज दी जाती है। प्रत्येक मंत्रालय तथा विभाग स्वीकृत राशि से अधिक व्यय नहीं कर सकता। प्रत्येक विभाग द्वारा व्यय सम्बन्धी लेखे रखे जाते हैं और लेखों के तैयार होने पर महालेखा अंकेक्षक उनकी जाँच करता है तथा अपनी रिपोर्ट देता है, जिसे संसद में प्रस्तुत किया जाता है। रिपोर्ट में आय प्राप्ति, व्यय और ऋण आदि से सम्बन्धित सभी अनियमितताओं की ओर ध्यान आकर्षित किया जाता है।

प्रश्न 12 – शून्य आधार बजटन क्या है? यह परम्परागत बजटन से कैसे भिन्न है? इसके क्या लाभ हैं?

What is Zero Base Budgeting ? How is it different from traditional budgeting? What are its advantages ? 

अथवा शून्य आधार बजटन पर विस्तृत लेख लिखिए।

Write a detailed note on Zero Base Budgeting. 

अथवा शून्य आधार बजटन क्या है? शून्य आधार दृष्टिकोण के परम्परागत दृष्टिकोण पर क्या लाभ हैं

What is Zero Base Budgeting ? What are the advantages of Zero Base approach over the traditional approach ? 

उत्तर – शून्य आधार बजटन

Zero Base Budgeting) 

भावी क्रियाओं के नियोजन के लिए शून्य आधार बजटन एक क्रान्तिकारी विचार है तथा यह परम्परागत बजटन से काफी भिन्न भी है। परम्परागत बजटन के अन्तर्गत एक बजट अवधि में किसी क्रिया पर किया गया व्यय अगली बजट अवधि के अनुमानों का आधार बनता है। इसमें चालू कार्यों एवं नई क्रियाओं में प्रत्याशित परिवर्तनों के लिए बजट राशि में संशोधन किए जाते हैं। बजटन के क्षेत्र में शून्य आधार बजटन (ZBB) एक नया विचार है जो सर्वप्रथम सन् 1969 ई० में अमेरिका में टैक्सास इन्स्ट्रमेन्ट्स में लागू किया गया था। सन् 1977 ई० में अमेरिका के प्रेसीडेन्ट जिमी कार्टर द्वारा इसे संघीय सरकार में लागू किया गया।

ZBB एक ऐसी व्यय नियन्त्रक युक्ति है जिसमें पिछली बजट उपलब्धियों के सन्दर्भ के बिना प्रत्येक विभागीय प्रमुख को व्यय की प्रत्येक मद के लिए कोषों की आवश्यकता का औचित्य बताना पड़ता है तथा उसके अनुरूप ही बजट तैयार करना पड़ता है। उपक्रम की क्रियाओं के लिए बजटन की यह एक ऐसी औपचारिक प्रणाली है जिसके अनुसार प्रत्येक क्रिया पहली बार सम्पादित की जा रही है, अर्थात् शून्य आधार से। प्रत्येक क्रिया चाहे वह नई हो या मौजूदा व्यय का औचित्य व मूल्यांकन, उसके अपने गुणों के आधार पर किया जाता है। अतः क्रिया के प्रस्तावक प्रबन्धक को यह सिद्ध करना होता है कि यह क्रिया आवश्यक है तथा उत्पादन मात्रा या परिणामों या विचारित क्रिया की मात्रा को ध्यान में रखते हुए माँगी गई राशि उचित है। शून्य आधार बजटन के अनुसार प्रत्येक प्रबन्धक अपने अधिकार क्षेत्र की बजट अवधि में प्रस्तावित प्रत्येक क्रिया के लिए लागत-लाभ विश्लेषण करेगा। किसी क्रिया का केवल इस आधार पर स्वाकृत नही किया जाएगा कि भूतकाल में भी इसे स्वीकृति मिली थी। इस पणाली के अन्तर्गत प्रत्येक क्रिया के बहुत से विकल्पों की पहचान की जाती है, उनकी लागत निकाली जाती है और सम्भावित लाभ के सन्दर्भ में उन दभ में उनका मूल्यांकन किया जाता है। वास्तव में,  शून्य आधार बजटन निगमित नियोजन और बजटन के क्षेत्र में लागत-लाभ विश्लेषण पद्धति का विस्तार मात्र ही है।

शून्य आधार बजटन की तकनीक मौजूदा नियोजन, बजटन एवं पुनर्विचार की प्रक्रिया को जोड़ती है एवं उसे पूरा करती है। यह तकनीक चयनित लाभों को प्राप्त करने में प्रयुक्त सीमित संसाधनों को विधियों एवं विकल्पों की पहचान करती है। इस तकनीक का उचित उपयोग उन क्षेत्रों में किया जाता है जहाँ व्यय, निर्माण गतिविधियों से अधिक प्रभावित नहीं होते हैं अर्थात् यह तकनीक उन क्षेत्रों के लिए उपयोगी है जहाँ प्रबन्धक को प्रत्यक्ष लागतों और लाभों वाली विभिन्न क्रियाओं के बीच चयन का अवसर प्राप्त होता है। ये क्षेत्र हैं-वित्त, उत्पादन नियोजन, गुण नियन्त्रण, विपणन, अनुरक्षण, सेविवर्गीय, शोध एवं विकास, समंक विधायन आदि। 

शून्य आधार बजटन की विधि और कदम 

(ZBB Methodology and Steps)

इस विधि को लागू करने के लिए निम्नलिखित कदम उठाने आवश्यक हैं

(1) निर्णय इकाइयों को परिभाषित करना (Defining the Decision Units)एक निर्णय इकाई एक मूर्तमान क्रिया या क्रियाओं का एक समूह है जिसके सफल उत्पादन के लिए एक अकेला प्रबन्धक उत्तरदायी होता है। परम्परागत रूप से एक परियोजना अथवा व्यक्तियों का एक समूह, एक लागत केन्द्र, एक निर्णय इकाई हो सकती है। अतः इस विधि का प्रथम कदम निर्णय इकाइयों का विकास है, जिनके सम्बन्ध में लागत-लाभ विश्लेषण करके उनको चालू रखने या छोड़ देने पर निर्णय करना होता है।

(2) प्रत्येक निर्णय इकाई के उद्देश्य परिभाषित करना (Defining Objectives of each Decision Unit)-प्रत्येक निर्णय इकाई के उद्देश्यों की विशिष्ट शब्दों में स्पष्ट एवं उपक्रम उद्देश्यों और लक्ष्यों के अनुरूप परिभाषा की जानी चाहिए। .

(3) निर्णय पैकेजों के रूप में क्रियाओं को पहचानना (Identifying Activities in the form of Decision Packages)-प्रत्येक निर्णय इकाई या क्रिया के लिए एक निर्णय पैकेज बनाना चाहिए। निर्णय पैकेज एक बजट प्रार्थना होती है जिसमें निम्नलिखित बातें दी जाती हैं

(i) प्रकार्य या क्रिया के उद्देश्य या लक्ष्य, 

(ii) प्रकार्य या क्रिया का वर्णन, 

(iii) क्रिया के लिए कोष उपलब्ध न कराने और उसके सम्पादित न किए जाने के परिणाम, 

(iv) क्रिया के वित्तीयन से होने वाले लाभ, 

(v) उसी क्रिया को सम्पादित करने के वैकल्पिक तरीके 

(vi) क्रिया के लिए आवश्यक कर्मचारी,

(vii) यदि परियोजना या क्रिया छोड़ दी जाती है तो क्या निर्णय इकाई को एक बाह्य एजेन्सी से प्रतिस्थापित किया जा सकता है या उसे पूर्णतया छोड़ देना होगा। किसी दी गई क्रिया के लिए कई वैकल्पिक निर्णय पैकेज हो सकते हैं। निर्णय पैकेज भी दो प्रकार के होते हैं—परस्पर अपवर्जी निर्णय पैकेज और वृद्धिशील पैकेज। 

(4) वैकल्पिक निर्णय पैकेजों का श्रेणीयन (Ranking of Alternative Decision Packages)-लागत-लाभ तकनीक का प्रयोग करते हुए विभिन्न प्रकार के वैकल्पिक निर्णय पैकेजों को घटते लाभ के क्रम में रखा जाता है। –

(5) श्रेणीकृत निर्णय पैकेजों का अग्रसारण (Forwarding the Ranked Decision Packages)-अगली उच्च संगठनात्मक इकाइयों को पुनर्विचार, अन्य तुल्य निर्णय पैकेजों के साथ विलय करने और पुनः श्रेणीयन के लिए श्रेणीकृत निर्णय पैकेज को अग्रसारित किया जाता है। निर्णय पैकेजों का समूहीकरण और पुनः श्रेणीयन एक समिति द्वारा किया जाना चाहिए जिसमें विचारित निर्णय पैकेजों के रखने वाले सभी प्रबन्धक सम्मिलित हों तथा अगले उच्च संगठनात्मक स्तर से चयनित अधिकारी को इस समिति का चेयरमैन बनाया जाए।

(6) बजट को अन्तिम रूप देना तथा चुने गए पैकेजों को संसाधनों का बँटवारा (Finalization of Budget and Allocation of Resources to Chosen Packages)-संसाधनों के आवंटन में सर्वोच्च प्रबन्ध चूँकि लाभ-लागत अनुपातों और व्यय वहन करने की क्षमता से निर्देशित होता है। अत: प्रत्येक निर्णय इकाई के लिए बजट का अन्तिम अनुमोदन सर्वोच्च प्रबन्ध द्वारा किया जाना चाहिए। 

शून्य आधार बजटन और परम्परागत बजटन में अन्तर 

(Differences between ZBB and Conventional Budgeting)

शुन्य आधार बजटन निम्नलिखित बातों में परम्परागत बजटन से भिन्न है– 

(1) शून्य आधार बजटन का दृष्टिकोण निर्णयोन्मुखी होता है जबकि परम्परागत बजटन

लेखोन्मुखी (accounting oriented) है। परम्परागत बजटन में मुख्य जोर व्यय के गत स्तर पर रहता है।

(2) शून्य आधार बजटन नई या पुरानी सभी क्रियाओं के लिए शून्य से प्रारम्भ होता है जबकि परम्परागत बजटन में गत व्यय के सन्दर्भ में तथा नवीन कार्यक्रमों के लिए व्यय की राशि के विस्तार की माँग की जाती है। 

(3) शन्य आधार बजटन में विभिन्न निर्णय पैकेजों का लागत-लाभ विश्लेषण किया जाता है तथा उनका उनकी महत्ता के अनुसार श्रेणीयन किया जाता है जिससे सर्वोच्च प्रबन्ध केवल प्राथमिकता वाले पैकेजों पर ही ध्यान दे सकते हैं जबकि परम्परागत बजटन में व्यय की राशियाँ दर्शायी जाती हैं। विभिन्न बजटों में श्रेणीयन नहीं किया जाता है।

(4) शून्य आधार बजटन में मौजूदा कार्यक्रमों के नियोजन के लिए प्रत्येक वर्ष के बजट में व्यय का औचित्य बतलाना आवश्यक है जबकि परम्परागत बजटन में बजट तैयार करते समय चालू क्रियाओं पर सामान्यतया पुनर्विचार नहीं किया जाता है। 

(5) शून्य आधार बजटन में यह उत्तरदायित्व सर्वोच्च प्रबन्ध से शिफ्ट होकर निर्णय इकाई के प्रबन्धक को चला जाता है जबकि परम्परागत बजटन में सर्वोच्च प्रबन्ध ही निर्णय लेता है कि किसी अवशेष निर्णय इकाई पर क्यों एक विशेष राशि व्यय की जानी चाहिए। 

(6) शून्य आधार बजटन का दष्टिकोण स्पष्ट और सीधा है। इसमें प्राथमिकता वाले निर्णयो पैकेजों की पहचान स्पष्ट नहीं है जबकि परम्परागत बजटन बजट तैयार करने में नैत्यिक दृष्टिकोण रखता है। 

(7) शून्य आधार बजटन में प्रत्येक प्रस्ताव का वस्तुनिष्ठ और तार्किक विश्लेषण किया जाता है, जबकि परम्परागत बजटन में वस्तुनिष्ठता का अभाव रहता है तथा व्यय के सम्बन्ध में पूर्व से चली आ रही अकुशलता का क्षेत्र बना रहता है।

शून्य आधार बजटन के लाभ या उपयोग 

(Advantages, Benefits or Uses of ZBB) 

(1) चूँकि शून्य आधार बजटन वृद्धिशील दृष्टिकोण पर आधारित नहीं है, अत: लागतों के सम्बन्ध में भूतकालीन अकुशलताओं के चलते रहने की सम्भावना नहीं रहती। शून्य आधार बजटन व्यर्थ के व्ययों को पहचानने और समाप्त करने में सहायता प्रदान करता है। यह परिचालनात्मक कुशलता में वृद्धि लाता है। शून्य आधार बजटन में प्रबन्धको को अपने नए प्रस्तावों के साथ-साथ चालू क्रियाओं पर भी पुनर्विचार करना होता है एवं उनका औचित्य बतलाना होता है। इस प्रकार यह कार्यक्रमों को उनकी सम्पूर्णता में पुनर्विचार का अवसर प्रदान करता है। 

(2) शन्य आधार बजटन अकुशलता को दूर करने के साथ-साथ संस्था में कुशलता और लागतों में बचत की संस्कृति को भी विकसित करता है। शून्य आधार बजटन प्रबन्धकों में लागत जागरूकता लाता है क्योंकि प्रत्येक प्रस्ताव का मल्यांकन लागत-लाभ विश्लेषण के आधार पर किया जाता है। इस प्रकार इसमें मनमानी कटौती और वृद्धि के अवसर नहीं रहते हैं। 

(3) शून्य आधार बजटन सभी सम्बन्धित कर्मचारियों की सहभागिता को आश्वस्त करने के कारण सभी प्रबन्धकों के बीच सहयोग और टीम की भावना को विकसित करता है। यह नियोजन और नियन्त्रण में समन्वय को सुगम बनाता है। 

(4) शन्य आधार बजटन आगमों में वृहत उच्चावचन वाली अवधियों में, शीघ्र बजट समायोजन को सम्भव बनाता है। 

(5) शन्य आधार बजटन प्राथमिकताओं, उद्देश्यों और आवश्यकताओं पर ध्यान केन्द्रित करके बजटन प्रक्रिया में सुधार लाता है। इस प्रकार यह बजटों को निगमित उद्देश्यों

के साथ जोड़ता है। उद्देश्यों द्वारा प्रबन्ध प्रणाली प्रारम्भ करने में भी शून्य आधार बजटन का प्रयोग किया जा सकता है। 

के साथ जोड़ता है। उद्देश्यों द्वारा प्रबन्ध प्रणाली प्रारम्भ करने में भी शून्य आधार बजटन का प्रयोग किया जा सकता है। 

(6) शून्य आधार बजटन अनुपयोगी कार्यक्रमों को रोकने में मदद करता है और उच्च प्रभाव वाले कार्यक्रमों के विस्तार के लिए आधार प्रदान करता है। 

(7) शून्य आधार बजटन के द्वारा उत्तरदायित्व लेखांकन प्रणाली अधिक प्रभावी बन कर सकती है। 

(8) शून्य आधार बजटन दुर्लभ संसाधनों के अनुकूलतम बँटवारे में प्रबन्ध की सहायता करता है क्योंकि इस प्रणाली का अनुपम पहलू चालू और प्रस्तावित दोनों प्रकार के व्ययों का मूल्यांकन करके इन्हें प्राथमिकता के आधार पर प्रबन्ध के समक्ष प्रस्तुत करना है। इस प्रकार शून्य आधार बजटन की यह तकनीक प्रबन्ध के लिए कार्यक्रमों की प्राथमिकता के आधार पर संसाधनों के बँटवारे में सहायक होती है। 

(9) शून्य आधार बजटन की यह पद्धति तुलनात्मक रूप से लोचपूर्ण है क्योंकि प्रत्येक वर्ष बजट शून्य आधार पर तैयार किए जाते हैं। शून्य आधार बजटन की यह पद्धति वित्तीय नियोजन और प्रबन्ध सूचना प्रणाली को विकसित करती है। 

(10) बजट उद्देश्य के लिए व्यवसाय के प्रत्येक पहलू पर पुनर्विचार करने में और इसके मूल्यांकन से परिणामपरक निगरानी प्रक्रियाओं को सहायता मिलती है। 

शून्य आधार बजटन की सीमाएँ या आलोचनाएँ 

(Litbitations or Criticisms of ZBB)

(1) इस तकनीक में निर्णय इकाइयों और निर्णय पैकेजों को परिभाषित करना कठिन है। 

(2) इसमें पुनर्विचार प्रक्रिया में बहुत समय लगता है। इसके अतिरिक्त निर्णय पैकेजों का श्रेणीयन भी एक दूसरी समस्या है, विशेषकर तब जब लाभों का संख्यात्मक माप सम्भव न हो। 

(3) शन्य आधार बजटन लागू करने के लिए प्रबन्धकों का पर्याप्त प्रशिक्षण तथा संचालनात्मक ढाँचा विकसित करना आवश्यक होता है। 

(4) शन्य आधार बजटन तकनीक के लागू करने में विभिन्न संचालनात्मक समस्याओं का सामना करना पड़ता है। इसमें परम्परागत बजटन की तुलना में कागजी कार्य अधिक होता है, विशेषकर किसी संगठन में इस प्रणाली के लागू करने की प्रारम्भिक अवधियों में। अत: इसकी सफलता के लिए सर्वोच्च प्रबन्ध का पूर्ण समर्थन होना आवश्यक है। 

(5) यह प्रणाली श्रमसाध्य और खर्चीली है। इस प्रणाली को लाग करने और बनाए रखने के लिए आवश्यक समय और प्रयत्न इससे प्राप्त होने वाले लाभों से अधिक हो जाते हैं। अत: अधिक मात्रा में समक विधायन के कारण इसके लिए कम्प्यूटर सुविधाओं की आवश्यकता होती है।

(6) प्रबन्धकों के लिए यह एक धमकी भरी प्रक्रिया है क्योंकि उन्हें प्रत्येक वर्ष अपने बजट प्रस्तावों के अनुमोदन के लिए विस्तृत विवरण देना होता है। समुचित सूचना 7 के अभाव में उनके प्रस्ताव अस्वीकार भी किए जा सकते हैं। (7) इस तकनीक को शोध और विकास क्रियाओं पर लाग नहीं किया जा सकता है क्योंकि इसमें लक्ष्यों और उद्देश्य को परिभाषित करना कठिन होता है। 

प्रश्न 13 – संघीय वित्त-व्यवस्था से क्या आशय है? इसके सिद्धान्तों का वर्णन कीजिए।

What do you mean by federal finance? Discuss its Principles. 

उत्तर – संघीय वित्त-व्यवस्था का अर्थ

(Meaning of Federal Finance) 

संघीय वित्त-व्यवस्था का अर्थ उस व्यवस्था से है जिसके अन्तर्गत आय तथा व्यय की सम्पूर्ण मदों को केन्द्रीय या संघ सरकार, राज्य सरकारों तथा स्थानीय निकायों (Local bodies) के बीच विभाजित कर दिया जाता है। इस व्यवस्था के अन्तर्गत तीनों इकाइयों को अपने-अपने क्षेत्र में आय अर्जित करने और उसे व्यय करने की पूर्ण स्वतन्त्रता प्राप्त होती है। 

संघीय वित्त की समस्याएँ (Problems of Federal Finance)

संघीय वित्त व्यवस्था के सम्मुख निम्नांकित समस्याएँ उपस्थित रहती हैं

(1) कार्यों के अनुसार वित्तीय साधनों का होना – केन्द्र और राज्य सरकारों के कार्य पृथक्-पृथक् होते हैं; अत: संघीय वित्त के सम्मुख पहली समस्या यह है कि दोनों प्रकार की सरकारों के बीच आय के साधनों का बँटवारा किस आधार पर किया जाए जिससे कि वे अपने कार्यों को भली-भाँति सम्पन्न कर सकें।

(2) बदलती हई परिस्थितियों के अनुसार साधनों का समायोजन – संघीय वित्त की दसरी समस्या यह है कि तेजी से बदलती हुई परिस्थितियों के अनुसार केन्द्र व राज्यों के बीच साधनों का बँटवारा तथा समायोजन किस प्रकार किया जाए।

(3) सापेक्षिक साधन की आवश्यकता की समस्या – देश के कुछ राज्य, दूसरे राज्यों की तलना में आर्थिक दृष्टि से कमजोर तथा पिछड़े हुए हैं; अत: संघीय वित्त की तीसरी समस्या यह है कि किस आधार पर पिछड़े राज्यों को अधिक वित्तीय अनुदान उपलब्ध कराए जाएँ।

संघीय वित्त के सिद्धान्त

(Principles of Federal Finance) 

केन्द्र सरकार, राज्य व स्थानीय सरकारों के बीच वित्तीय साधनों के बँटवारे के सम्बन्ध में कुछ सिद्धान्तों का प्रतिपादन किया गया है। ये सिद्धान्त निम्नलिखित हैं-

(1) स्वतन्त्रता का सिद्धान्त (Principle of Independence)-संघीय शासन व्यवस्था में प्रत्येक इकाई को आन्तरिक वित्तीय मामलों में पूर्ण स्वतन्त्रता प्राप्त होनी चाहिए। केन्द्रीय सरकार राज्य सरकारों तथा स्थानीय सरकारों के आय के साधन पृथक-पृथक होने चाहिए तथा उन्हें अपने-अपने क्षेत्र में कर लगाने तथा ऋण लेने की पूर्ण स्वतन्त्रता प्राप्त होनी चाहिए। स्वतन्त्रता से यह भी तात्पर्य है कि केन्द्र और राज्य अपने द्वारा एकत्रित आय को अपनी इच्छानुसार व्यय करने में भी पूर्ण स्वतन्त्रता प्राप्त होनी चाहिए। अन्य शब्दों में, राज्य अपने राज्य की वित्तीय आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए आत्मनिर्भर होना चाहिए।

भारतीय संविधान द्वारा केन्द्र तथा राज्यों के बीच कार्यों का विभाजन तथा आय-व्यय की मदों का भी विभाजन किया गया है। कुछ कर केन्द्र सरकार द्वारा लगाए जाते हैं; जैसेआय-कर, पूँजी-कर जबकि कुछ कर राज्य सरकारों द्वारा लगाए जाते हैं; जैसे-बिक्री कर, मालगुजारी आदि। किन्तु यह बँटवारा न्यायोचित नहीं है, क्योंकि केन्द्र सरकार की आय के मद लोचदार तथा राज्य सरकारों की आय के मद बेलोचदार हैं; अत: राज्य सरकारों को आर्थिक दृष्टि से कमजोर बनाकर रखा गया है। उनके व्यय के मद निरन्तर बढ़ते जा रहे हैं और उन्हें अपने दायित्वों का निर्वहन करने के लिए केन्द्र से आर्थिक सहायता और अनुदान की माँग करनी पड़ती है।

व्यवहार में पूर्ण स्वतन्त्रता प्राप्त न होना – राज्य सरकारों को व्यवहार में पूर्ण स्वतन्त्रता प्राप्त नहीं होती और राज्य सरकारों को संघ सरकार पर निर्भर रहना पड़ता है। इसके निम्नलिखित कारण हैं

(i) सभी महत्त्वपूर्ण एवं लोचपूर्ण आय के साधन केन्द्र सरकार के पास हैं।

(ii) आय के कुछ ऐसे साधनों को संघ सरकार अपने पास रख लेती है जिनकी आय का एक निश्चित प्रतिशत भाग राज्य को दे दिया जाता है। उदाहरण के लिए, भारत में आय-कर, निगम-कर ऐसे ही आय के साधन हैं।

(iii) केन्द्र सरकार राज्यों को समय-समय पर आवश्यकतानुसार अनुदान भी देती है।

(2) एकरूपता का सिद्धान्त (Principle of Uniformity)-एकरूपता शब्द का दो अर्थों में प्रयोग किया जाता है; प्रथम, यह कि केन्द्र सरकार जब राज्य सरकारों को अनुदान दे तो उस सम्बन्ध में एकरूपता की नीति का पालन करें। दूसरे, यह कि राज्य सरकारों को चाहिए कि वे संघ सरकार को समानता के आधार पर अपना-अपना अंशदान उपलब्ध कराए। अन्य शब्दों में, यह भी कहा जा सकता है कि संघ सरकार को करों का भार सभी राज्यों पर समान रूप से डालना चाहिए, अर्थात् उनको दी जाने वाली राहतों या कटौतियों में कोई भेदभाव नहीं करना चाहिए, ताकि सभी राज्य समान रूप से वित्तीय भार को उठा सकें।

किन्तु व्यवहार में इस प्रकार की समानता लाना सम्भव नहीं हो सकता, क्योंकि प्रथम, प्रत्येक राज्य के साधन तथा व्यय पृथक्-पृथक् होते हैं। दूसरे, सभी राज्यों की जनसंख्या तथा आर्थिक स्थिति भी समान नहीं होती। तीसरे, आर्थिक दृष्टि से कुछ राज्य विकसित होते हैं, कुछ सशील तथा कछ अविकसित होते हैं। चौथे, विभिन्न राज्यों के निवासियों की कर दान पक-पथक होती है। उदाहरण के लिए, झारखण्ड राज्य, उत्तर प्रदेश के समान केन्द्रीय सरकार को अंशदान कभी नहीं दे सकता।

(3) पर्याप्तता एवं लोच का सिद्धान्त (Principle of Adequacy and Ticity-पर्याप्तता से आशय यह है कि प्रत्येक सरकार के अधिकार में इतने वित्तीय साधन हों कि वे न केवल वतमान की आवश्यकताओं वरन अतियार बाली आवश्यकताओं को भी पूरा कर सके। सर जॉन लाथम फोरमर के मतानुसार, “यदि एक संघीय व्यवस्था पूर्ण स्वतन्त्रता के साथ जीवित रहना चाहती है तो राज्यों के पास इतने साधन उपलब्ध होने चाहिए जो उसके दायित्वों के निर्वहन के लिए पर्याप्त हों।”

राज्यों का उपलब्ध वित्तीय साधन लोचपर्ण भी होने चाहिए अर्थात् भविष्य में आवश्यकताआ क बढ़ने के साथ-साथ उन साधनों से अधिक आय प्राप्त की जा सके। 

डॉ० भार्गव (R. N. Bhargave) के शब्दों में, “आर्थिक साधनों का विभाजन लोचपूर्ण होना चाहिए, क्याक का भी योजना, चाहे वह कितनी भी अच्छी क्यों न हो. आने वाले समय के लिए उपयुक्त नहा हो सकती; अत: विभाजन की योजना में इस प्रकार के परिवर्तनों के लिए प्रबन्ध रखा जाना चाहिए जो राष्ट्रीय हित के लिए आवश्यक हों।”

व्यवहार में इस सिद्धान्त के विपरीत स्थिति पायी जाती है। राज्य सरकारों को व्यय के ऐसे मद दिए जाते हैं जिन पर व्यय की मात्रा प्रतिवर्ष निरन्तर बढ़ती जाती है, किन्तु उस अनुपात में आय की मात्रा में वृद्धि नहीं होती। उदाहरणार्थ-भारतवर्ष में राज्य सरकारों का शिक्षा, स्वास्थ्य, पुलिस तथा न्याय आदि पर व्यय तेजी से बढ़ता जा रहा है, किन्तु आय के साधनों से आवश्यक मात्रा में आय प्राप्त नहीं हो रही है। इसके ठीक विपरीत, केन्द्र सरकार के साधन लोचदार हैं जिनसे आवश्यकता पड़ने पर अधिक मात्रा में आय अर्जित की जा सकती है।

विभिन्न राज्यों के बीच आय के साधनों का बँटवारा करने में निम्नलिखित बातों पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए-

(i) विभिन्न सरकारों को (केन्द्रीय, राज्य व स्थानीय सरकारों) को अपना व्यय चलाने के लिए आय के ऐसे साधन दिए जाने चाहिए कि वर्तमान आवश्यकताओं की पूर्ति के बाद भविष्य के लिए कुछ बचाकर रखा जा सके। 

(ii) वित्तीय ढाँचा ऐसा होना चाहिए कि आवश्यकता पड़ने पर साधनों का पुनर्वितरण किया जा सके।

(4) प्रशासन की कुशलता का सिद्धान्त (Principle of Administrative Efficiency)-प्रशासनिक कुशलता का अर्थ यह है कि वित्तीय प्रशासन ऐसा होना चाहिए जिसमें करदाताओं का कल्याण निहित व सुरक्षित रहे, कर-वंचन की कोई भी सम्भावना न हो, करों का दोहराव न हो, करारोपण से व्यापार तथा उद्योग विपरीत रूप से प्रभावित न हों तथा करों को वसूल करने की प्रणाली प्रभावी एवं मितव्ययी हो।

प्रो० अदारकर (Prof. Adarkar) ने प्रशासकीय मितव्ययिता के सिद्धान्त को सर्वाधिक महत्त्व दिया है, जबकि डॉ० भार्गव (Dr. Bhargava) ने इसी सिद्धान्त को कार्यकशलता का सिद्धान्त कहकर सम्बोधित किया है। प्रो० सेलिगमैन (Prof. Seligman) के “चाहे कोई भी योजना कितनी भी ठीक प्रकार से क्यों न बनाई गई है या न्याय के अमर्त सिद्धान्तों से कितने ही तालमेल वाली क्यों न हो, यदि वह प्रणाली प्रशासनिक दृष्टि से कार्यकुशल नहीं है तो वह अवश्य ही असफल सिद्ध होगी।”

संघीय शासन में प्रशासनिक कुशलता एवं मितव्ययिता प्राप्त करने में निम्नलिखित बाधाएँ सामान्यत: सामने आती हैं-

(i) विभिन्न सरकारों के बीच कार्यों एवं वित्तीय साधनों का स्पष्ट व उचित बँटवारा न होना।

(ii) करारोपण के नियम तथा सिद्धान्तों का एक जैसा न होना। 

(iii) केन्द्र व राज्य सरकारों के बीच परस्पर सहयोग न होना।

प्रशासन की कुशलता के लिए यह अतिआवश्यक है कि प्रथम, एक राज्य में जो कर आरोपित किए जाएँ उनका प्रभाव अन्य राज्यों की जनता पर न पड़े। दूसरे, जो कर अन्तर्राज्य क्षेत्र के हों उन्हें केन्द्र सरकार लगाए तथा राज्य या स्थानीय महत्त्व के करों की व्यवस्था स्वयं राज्य सरकार करे। इसी आधार पर भारत में आय-कर, उत्पादन-कर तथा सीमा-कर लगाने का अधिकार केन्द्र सरकार को सौंपा गया है, जबकि बिक्री-कर, मनोरंजन-कर, मालगुजारी आदि कर लगाने का अधिकार राज्यों को प्राप्त है।

(5) हस्तान्तरण का सिद्धान्त (Principle of Transference)-संघीय वित्तव्यवस्था के सफल संचालन के लिए डॉ०बी०आर० मिश्रा के मतानुसार, “संघ तथा राज्य सरकारों में साधनों का बँटवारा विभिन्न राज्यों में निवास कर रहे व्यक्तियों के राष्ट्रीय न्यूनतम सिद्धान्त के अनुसार होना चाहिए। संघीय राज्य में यह कार्य सम्पन्न क्षेत्रों से निर्धन क्षेत्रों को वित्तीय साधनों के हस्तान्तरण द्वारा किया जा सकता है।” संघ के विभिन्न राज्यों में अनेक असमानताएँ पाई जाती हैं; जैसे-भौगोलिक स्थिति की भिन्नता, आर्थिक स्थिति की भिन्नता आदि। अन्य शब्दों में, यह भी कहा जा सकता है कि कुछ राज्य सम्पन्न होते हैं, कुछ गरीब होते हैं, कुछ राज्य विकसित होते हैं और कुछ अविकसित होते हैं।

अत: केन्द्र सरकार का यह दायित्व है कि वह प्रथम, सम्पन्न राज्यों से अधिक कर वसूल करके वित्तीय साधनों का हस्तान्तरण निर्धन राज्यों की ओर करे। दूसरे, निर्धन राज्यों को अपेक्षाकृत अधिक अनुदान प्राप्त होना चाहिए। इस व्यवस्था से प्रत्येक राज्य के निवासी अपना जीवन एक न्यूनतम स्तर पर ला सकने में समर्थ हो सकेंगे। भारत में इसको निर्धारित करने के लिए वित्त आयोग नियुक्त करने की व्यवस्था की गई है।

परन्तु इस सिद्धान्त के अनुसरण करने में एक व्यावहारिक कठिनाई यह सामने आती है कि प्रान्तीय भावना से प्रभावित होकर सम्पन्न राज्यों के राजनेता इस हस्तान्तरण का कड़ा विरोध करते हैं जो राष्ट्रीय हित के अनुकूल नहीं है।

(6) संघीय नियन्त्रण तथा निरीक्षण का सिद्धान्त (Principle of Federal Control and Supervision)-देश की एकता को सुदृढ़ बनाए रखने के लिए यह अतिआवश्यक है कि केन्द्र एवं राज्य की सरकारें राजस्व के समान सिद्धान्तों का पालन करें सदसकी देखभाल एवं नियन्त्रण का कार्य केन्द्र सरकार को सौंप दिया जाए। केन्द्र एक ऐसी राजकोषीय नीति बनाए जिसका वह स्वयं भी पालन करे तथा सभी राज्यों से पालन करवाए। इसके साथ ही यह भी व्यवस्था की जानी चाहिए कि जो भी राज्य इस राजकोषीय नीति का उल्लंघन करेगा उसके विरुद्ध कठोर कार्यवाही की जाएगी।

केन्द्र सरकार को यह भी देखना चाहिए कि वह जो अनुदान या सहायता, जिस कार्य के लिए राज्यों को उपलब्ध करा रहा है, उनका प्रयोग उसी कार्य में किया जा रहा है अन्यथा नहीं; क्योंकि राज्य द्वारा इस अनुदान तथा सहायता का दुरुपयोग किया जा सकता है। 

(7) समन्वय का सिद्धान्त (Principle of Co-ordination)-पाल स्टूडैन्क के और “संघ तथा राज्यों में समन्वय का सिद्धान्त केवल कर लगाने तक ही सीमित नहीं रखा  जाना चाहिए। संघ तथा राज्यों के बजट, पूँजीगत व्यय तथा साख सम्बन्धी क्रियाओं में भी समन्वय रखा जाना चाहिए तथा समन्वय प्रबन्ध क्रियाओं के साथ भी होना चाहिए।”

(8) समानता का सिद्धान्त (Principle of Equity)-एडम स्मिथ (Adam Smth) द्वारा प्रतिपादित करारोपण में समानता के सिद्धान्त को संघीय वित्त-व्यवस्था में भी लागू किया जाना चाहिए। केन्द्र व राज्यों के बीच करों का बँटवारा इस प्रकार किया जाना चाहिए कि दाना प्रकार के करों का भार प्रत्येक करदाता पर समान रूप से पडे अर्थात दोनों प्रकार के करों के कारण प्रत्येक करदाता का सीमान्त त्याग लगभग बराबर हो।

प्रश्न 14 – बजट के सिद्धान्त की व्याख्या कीजिए। आदर्श बजट के गुण एवं बजट का महत्त्व बताइए।

Explain the principle of budget. Explain the merits of an ideal budget and give the importance of budget. 

अथवा बजट क्या है? बजट के सिद्धान्तों को समझाइए। आदर्श बजट के गुणों को भी समझाइए।

What is Budget ? Explain the principles of budget. Also explain the merits of an ideal budget. 

उत्तर – बजट से आशय एवं परिभाषा

(Meaning and Definition of Budget) 

अंग्रेजी का ‘Budget’ शब्द, फ्रैंच भाषा के ‘bougetee’ शब्द से बना है जिसका अर्थ है-‘चमड़े का एक छोटा-सा थैला।’ सर्वप्रथम इस शब्द का प्रयोग इंग्लैण्ड के उस सफेद चमड़े के थैले के लिए किया जाता था जिसमें मध्यकालीन कोर्ट के खजाने की मुहर रखी जाती थी। बाद में वित्तमंत्री उस थैले को, जिसमें वे सरकारी व्ययों को पूरा करने के लिए प्रस्ताव रखते थे, ‘बजट’ कहा जाने लगा। वर्तमान समय में इस थैले पर ध्यान नहीं दिया जाता है बल्कि इसके भीतर की वस्तु पर अधिक ध्यान दिया जाता है। ये वस्तु आर्थिक प्रस्ताव होते हैं जिन्हें वित्तमंत्री प्रतिवर्ष व्यवस्थापिका सभा के समक्ष प्रस्तुत करता है।

वित्तीय प्रशासन में बजट की महत्त्वपूर्ण भूमिका है। यह वित्तीय प्रशासन की धुरी है तथा इसके आधार पर ही सरकार द्वारा वित्तीय प्रशासन के सिद्धान्तों को कार्यान्वित किया जाता है। बजट के माध्यम से ही आय, व्यय तथा ऋण से सम्बन्धित नीतियों को व्यवहार में लाग किया जाता है।

विभिन्न विद्वानों ने बजट को विभिन्न प्रकार से परिभाषित किया है। प्रमुख परिभाषाएँ निम्नलिखित हैं –

(1) प्रो० फिण्डले शिराज के अनुसार, “बजट आय और व्यय का एक वार्षिक विवरण है जिसे प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा अनुमानित व्यय को पूरा करने के लिए बनाया जाता है।” 

(2) प्रो० रैने स्टोर्न के अनुसार, “बजट एक ऐसा प्रपत्र है जिसमें सार्वजनिक व्यय तथा सार्वजनिक आय की एक प्रारम्भिक स्वीकृत योजना होती है।”

(3) गेस्टन गेज के अनुसार, “एक आधुनिक राज्य में बजट एक भविष्यवाणी तथा समस्त सार्वजनिक प्राप्तियों एवं व्ययों का एक अनुमान है तथा कुछ विशेष व्ययों एवं प्राप्तियों के लिए धन व्यय करने तथा प्राप्तियों को एकत्र करने का एक आदर्श जरिया (माध्यम) है।” 

(4) डॉ० बी० एन० गुप्ता के अनुसार, “बजट कार्यान्वयन के लिए तैयार किया गया एक विस्तृत कार्यक्रम है जिसमें एक निश्चित अवधि, प्राय: एक वर्ष के लिए व्यय का अनुमान होता है और जो कार्यकारिणी द्वारा तैयार कर विधानसभा के समक्ष मतदान के लिए प्रस्तुत किया जाता है।” 

उपर्युक्त परिभाषाओं का अध्ययन करने के पश्चात् निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि “बजट एक ऐसा पारिभाषिक एवं वित्तीय विवरण है जो एक निश्चित समय के पूर्व बनाया जाता है और जिसमें निश्चित उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए अपनायी गई नीति सम्मिलित रहती है।”

बजट के सिद्धान्त

(Principles of Budget) 

बजट के सम्बन्ध में मुख्य रूप से दो सिद्धान्त प्रचलित हैं-

(i) प्रतिष्ठित सिद्धान्त तथा 

(ii) आधुनिक सिद्धान्त।

प्रतिष्ठित अर्थशास्त्री सन्तुलित बजट के समर्थक थे, अर्थात् उनके अनुसार सार्वजनिक व्यय एवं आय में समानता होनी चाहिए। किन्तु आधुनिक दृष्टिकोण इस सिद्धान्त में विश्वास नहीं करता। प्रो० कीन्स द्वारा प्रतिपादित आधुनिक दृष्टिकोण के अनुसार सार्वजनिक व्यय एवं सरकारी दायित्वों में वृद्धि को देखते हुए सन्तुलित बजट की कल्पना समयातीत हो चुकी है। पूर्ण रोजगार एवं विनियोग का उच्च स्तर बनाए रखने के लिए वर्तमान समय में सरकारों को घाटे के बजट पर निर्भर रहना पड़ता है। वर्तमान समय में आर्थिक स्थायित्व लाने के लिए बजट की भूमिका महत्त्वपूर्ण है।

उपर्यक्त के अतिरिक्त बजट सिद्धान्त में निम्नलिखित तत्त्वों का समावेश होता है

(1) बजट को कार्यान्वित करना (Procedure to pass the Budget)-वित्तमंत्री दारा बजट प्रस्तुत करने तथा उसे संसद से पारित कराने के बाद, सरकार का यह दायित्व है कि उसे कार्यान्वित करे। सरकार के विभिन्न मंत्रालय स्वीकृत बजट के अनुसार मितव्ययिता के साथ व्यय करते हैं।

(2) बजट में लोच का सिद्धान्त (Principle of Elasticity in Budget)-बजट में इस प्रकार की लोच होनी चाहिए कि परिस्थितियों के अनुसार उसमें परिवर्तन किया जा सके। विशेष रूप से स्वीकृत व्यय की कमी होने पर उसी बजट वर्ष में परक बजट को स्वीकत किया जा सके।

(3) बजट की रिपोटिंग (Reporting of Budget)-बजट के सम्बन्ध में जिन-जिन कार्यों का निष्पादन किया जाता है, उनकी सम्पूर्ण जानकारी मुख्य अधिकारी के पास पहुँचना आवश्यक है ताकि बजट सम्बन्धी नीतियों का मूल्यांकन किया जा सकें।

(4) विविध कार्यों का निष्पादन (To Workout various Deeds)-बजट में विविध मदों का समावेश होने के कारण विविध कार्यों का निष्पादन एक साथ ही करना पड़ता है तथा इन सभी कार्यों के सामूहिक प्रभाव के कारण ही देश में आर्थिक विकास होता है।

(5) प्रशासनिक उपकरण (Administrative Machinery)-बजट को कार्यान्वित करने के लिए सरकार के पास पर्याप्त एवं सक्षम मशीनरी होने के साथ-साथ प्रशिक्षित अधिकारी एवं कर्मचारी भी होने चाहिए।

(6) समुचित निर्देश (Accurate Guidelines)-बजट का समुचित क्रियान्वयन किस प्रकार किया जाए इस सम्बन्ध में स्पष्ट निर्देश होने चाहिए। इसके अतिरिक्त इसके बारे में संसद को भी सम्पूर्ण जानकारी उपलब्ध करानी चाहिए।

आदर्श बजट के गुण

(Merits of An Ideal Budget) 

बजट चूँकि सरकार की आर्थिक नीतियों का प्रतिबिम्ब होता है, अत: यह आवश्यक है कि देश की अर्थव्यवस्था पर बजट का अनुकूल प्रभाव पड़े। यह उसी दशा में सम्भव है जब बजट में निम्नलिखित आवश्यक गुण विद्यमान हों

(1) बजट का कल्याणकारी पक्ष (Welfare Aspect of the Budget)-यहाँ कल्याणकारी पक्ष से आशय आर्थिक कल्याण से है अर्थात् बजट में सार्वजनिक व्यय एवं आय की ऐसी नीतियों का समावेश होना चाहिए जिससे वितरण में समानता होने के साथ-साथ उत्पादन एवं रोजगार में भी वृद्धि हो। इन सब नीतियों के समग्र प्रभाव के कारण देश में आर्थिक विकास को गति मिलनी चाहिए।

(2) बजट अनुमान वास्तविकता के निकट हों (Budget Estimates Closer to Realitv)-बजट में प्रस्तुत आय एवं व्यय के सम्बन्ध में अगले वर्ष के अनुमान वास्तविकता के निकट होने चाहिए अन्यथा बजट की प्रक्रिया असन्तुलित हो जाएगी। इसका अर्थ यह है कि बजट गहन चिन्तन-मनन एवं परीक्षण के बाद तैयार किया जाना चाहिए तथा इसमें केवल विश्वसनीय आँकड़ों का ही प्रयोग किया जाना चाहिए।

(3) मितव्ययिता (Economy)-जनता पर प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष करों के माध्यम से सरकार राजस्व प्राप्त करती है, अत: इसको मितव्ययिता से व्यय किया जाना चाहिए। सरकार का यह दष्टिकोण नहीं होना चाहिए कि जनता का पैसा बिना किसी नियन्त्रण के लापरवाही से खर्च किया जाए। यही कारण है कि सरकारी व्यय पर सरकार द्वारा कई प्रकार के नियन्त्रण लगाए जाते हैं।

(4) दीर्घकाल में बजट में असन्तुलन न हो (Balanced Budget in Long Run)-प्राचीनकाल में बजट का सन्तुलित रहना उसका प्रमुख गुण माना जाता था किन्तु वर्तमान परिस्थितियों में यह सम्भव नहीं है क्योंकि जनसामान्य की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए सरकार को राजस्व से अधिक व्यय करने के कारण घाटे का बजट बनाना होता है। किन्त सदैव घाटे का बजट बनाना भी उचित नीति नहीं मानी जाती है। अत: इस दृष्टिकोण से यह आवश्यक है कि दीर्घकाल में बजट सन्तुलित रहना चाहिए।

(5) बजट निष्पक्ष एवं स्वतन्त्र होना चाहिए (Budget should be fair and free)-देश की आर्थिक स्थिति ही बजट बनाते समय प्रमुख लक्ष्य होना चाहिए। बजट को किसी दबाव में आकर नहीं बनाया जाना चाहिए तथा बजट किसी भी प्रकार के राजनीतिक प्रभाव से मुक्त रहना चाहिए।

बजट का महत्त्व

(Importance of the Budget) 

किसी भी देश के विकास के लिए बजट का स्थान काफी महत्त्वपूर्ण होता है। प्रो० फिण्डले शिराज का यह कथन उचित है कि नि:सन्देह बजट प्रशासन की धुरी है तथा । सुदृढ़ सिद्धान्तों पर आधारित बजट के अभाव में वित्तीय अव्यवस्था फैल जाती है। देश की प्रगति का सही मूल्यांकन वहाँ के बजट के द्वारा ही किया जा सकता है। बजट के महत्त्व को निम्न बिन्दुओं द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है

(1) आर्थिक नियन्त्रण का साधन (Instrument of Economic Control)बजट में सरकार की आय-व्यय का स्पष्ट ब्योरा होता है। चूंकि संसद द्वारा पारित बजट को सरकार द्वारा क्रियान्वित किया जाता है। अत: संसद का सरकार के ऊपर नियन्त्रण रहता है। समस्त विभागों के व्यय पर बजट के माध्यम से ही नियन्त्रण रखा जाता है। यदि सरकार बजट को न बनाए तो आय-व्यय की सम्पूर्ण प्रक्रिया अनियन्त्रित हो जाएगी।

(2) आर्थिक स्थिरता (Economic Stability)-वर्तमान समय में बजट देश में आर्थिक स्थिरता लाने का एक सशक्त माध्यम है। मुद्रा-स्फीति की स्थिति में सरकार अधिक करों का प्रावधान करके अर्थव्यवस्था में अतिरिक्त क्रय-शक्ति को वापस ला सकती है। इसके विपरीत आर्थिक मन्दी की स्थिति में सरकार व्यय में वृद्धि करके उत्पादन और रोजगार में वृद्धि कर सकती है। इस प्रकार देश में आर्थिक स्थिरता लायी जा सकती है।

(3) आर्थिक और सामाजिक प्रगति का माध्यम (Mean of Economic and Social Progress)-बजट में कृषि एवं उद्योगों आदि के लिए आर्थिक सहायता का प्रावधान कर देश में आर्थिक विकास का सूत्रपात किया जा सकता है। बजट में उचित प्रावधानों के द्वारा आर्थिक समानता भी लायी जा सकती है। यदि सरकार धनी व्यक्तियों पर कर लगाकर वसूल किए गए राजस्व को सार्वजनिक व्यय के माध्यम से गरीबों पर व्यय करती है तो इससे आर्थिक असमानता को दूर करने के साथ-साथ सामाजिक प्रगति भी की जा सकती है।

(4) नीति के उपकरण के रूप में बजट (Budget as a means of Policy)बजट को पूर्व में मात्र लेखा और अनुमानों का विवरण माना जाता था। किन्तु वर्तमान समय में राजकोषीय नीति की बढ़ती हुई भूमिका के कारण बजट, सरकारी नीति का एक महत्त्वपूर्ण उपकरण बन गया है। अर्थव्यवस्था में वांछनीय परिणामों को प्राप्त करने के लिए करारोपण, सार्वजनिक व्यय एव ऋणा का बजट का अभिन्न अंग माना जाता

वर्तमान समय में, आर्थिक जीवन में राज्य की भमिका अति महत्त्वपर्ण होती है तथा इस मिका का निर्वाह करने एवं उसकी पूर्ति की दिशा में बजट का महत्त्व निर्विवाद है।

सभी अर्थव्यवस्थाओं में बजट का महत्त्व 

(Budget’s Utility in all Economic Deeds)

उपर्युक्त शीर्षकों में बजट का जो महत्त्व प्रतिपादित किया गया है, वह सभी अर्थव्यवस्थाओं में लागू होता है चाहे वह पूँजीवादी अर्थव्यवस्था हो अथवा समाजवादी अथवा मिश्रित अर्थव्यवस्था। यद्यपि पूँजीवादी प्रणाली में सरकार का हस्तक्षेप अधिक नहीं होता फिर भी उसे अनेक प्रकार के लोक-कल्याणकारी कार्य करने पड़ते हैं जिनके क्रियान्वयन के लिए उसे सार्वजनिक आय, व्यय एवं लोक ऋणों की नीतियों का प्रयोग करना पड़ता है जो बजट के माध्यम से ही सम्भव है।

समाजवादी अर्थव्यवस्था में राज्य का क्षेत्र अधिक विस्तृत होने के कारण राज्य के आर्थिक विकास के लिए आर्थिक नियोजन को अपनाया जाता है। ऐसी अर्थव्यवस्था में बजट की भूमिका ज्यादा महत्त्वपूर्ण होती है। मिश्रित अर्थव्यवस्था में सरकार विभिन्न क्षेत्रों-सरकारी क्षेत्र, निजी क्षेत्र, संयुक्त क्षेत्र तथा सहकारी क्षेत्र के आर्थिक विकास का प्रयत्न करती है। सरकार द्वारा इन सभी क्षेत्रों में समन्वय स्थापित किया जाता है जो बजट के माध्यम से ही सम्भव है।

बजट के उपर्युक्त महत्त्व को दृष्टि में रखते हुए ही प्रो० टेलर बजट को ‘सरकार की वित्त की वृहद् योजना‘ कहते हैं।

प्रश्न 15 – “पिछले लगभग सौ वर्षों में विश्व के सभी देशों में लोक व्ययों में अत्यधिक वृद्धि हुई है।लोक व्यय की इस वृद्धि के कारण बताइए।

“Public Expenditure has enourmously increased during last hundred years or so in every country of the world.” Give reasons for this increasement in Public Expenditure. 

अथवा सार्वजनिक व्यय की मात्रा में उत्तरोत्तर वृद्धि होने के क्या कारण हैं? सार्वजनिक व्यय के घट जाने के दुष्परिणाम बताइए।

What are the causes of progressive rise in the volume of Public Expenditure? State the evil consequences of the decline in Public Expenditure. 

अथवा वर्तमान काल में सार्वजनिक व्यय के बढ़ने के कारणों पर प्रकाश डालिए। क्या यह प्रवृत्ति समाजवाद की ओर संकेत है?

Give account for the growth of Public Expenditure in recent years. Does it indicate a step towards Socialism ? अथवा विगत वर्षों में लोक व्यय में वृद्धि के क्या कारण रहे हैं?

What are the increasing causes in Public Expenditure during recent years? 

उत्तर- सार्वजनिक व्यय में वृद्धि के कारण

(Causes of Increase in Public Expenditure) 

स्वतन्त्रता. के पश्चात् भारत में सार्वजनिक व्यय में आश्चर्यजनक वृद्धि हुई है। प्रो० वैगनर (Prof. Wagner) के अनुसार, “सार्वजनिक कार्यों में गहन एवं विस्तृत (Intensive and Extensive) वृद्धि हुई है। गहन वृद्धि से अभिप्राय है कि अब पूर्व के कार्यों का स्वरूप परिवर्तित हुआ है और उन पर अधिक व्यय करना पड़ता है। विस्तृत वृद्धि का आशय है कि अब सरकार का कार्यक्षेत्र बढ़ गया है अर्थात् जो कार्य पहले निजी क्षेत्र में सम्पन्न किए जाते थे अब उन कार्यों का समावेश सरकारी कार्यों में हो गया है; जैसे-उद्योगों की स्थापना एवं संचालन, विद्युत की व्यवस्था इत्यादि। आजकल सरकार कृषि, उद्योग, सामाजिक सुरक्षा, सामाजिक कल्याण, शिक्षा एवं यातायात के क्षेत्र में कार्य करती है।

भारत में सार्वजनिक व्यय में वृद्धि के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं

(1) कल्याणकारी राज्य की स्थापना (Formation of Welfare State)व्यक्तिवादी भावना के प्रचलन के समय नागरिक स्वतन्त्र तथा सरकार के नियन्त्रण से मुक्त रहना ही अच्छा समझते थे। ऐसे समय में राज्य के कार्यों को सीमित रखा जाता था तथा सार्वजनिक व्यय न्यूनतम रूप में होना अच्छा माना जाता था। परन्तु आज समाजवादी तथा कल्याणकारी राज्य की भावना के विकास के कारण राज्य को देश में स्वास्थ्य बीमा, वृद्धावस्था पेंशन, प्रसूति लाभ, बीमारी तथा अन्य कल्याणकारी कार्यों पर व्यय करना पड़ता है अत: इन कार्यों को सम्पन्न करने हेतु सार्वजनिक व्यय में वृद्धि स्वाभाविक ही है।

(2) आर्थिक सहायता (Economic Aid)—विकासशील देशों में सरकारों द्वारा कृषि व औद्योगिक विकास के लिए उद्योगपतियों तथा कृषकों को आर्थिक सहायता के रूप में काफी राशि प्रदान की जाती है तथा ऋण की भी व्यवस्था की जाती है। इसके अतिरिक्त विकसित देशों की सरकारें अल्पविकसित एवं विकसित देशों को अनुदान एवं ऋण के रूप में भी सहायता प्रदान करती हैं। इस प्रकार देश के सार्वजनिक व्यय में वृद्धि हो जाती है।

(3) आर्थिक नियोजन तथा विकास (Economic Planning and Development)–अलग-अलग देशों में प्रमुखत: अर्द्ध-विकसित देशों में आर्थिक विकास हेतु वहाँ की सरकारों ने नियोजन का सहारा लिया है जिससे उनका कार्यक्षेत्र बढ़ गया है, परिणामस्वरूप सार्वजनिक व्यय भी बढ़ गया है। इसका कारण यह है कि आर्थिक नियोजन में जो व्यय किया जाता है वह एक तरफ काफी मात्रा में होता है एवं दूसरी तरफ (Side) दीर्घकालीन परिणाम देने वाला होता है।

(4) शहरीकरण की प्रवृत्ति (Tendency of Urbanization)-शहरीकरण का प्रवत्ति प्राय: सभी देशों में बढ़ रही है। यह भी एक कारण है जिससे लोक व्यय में वृद्धि हा रही है। शहरों में बढ़ती जनसंख्या को देखकर सरकार शिक्षा, परिवहन, चिकित्सालय, जल-आपूर्ति आदि सुविधा उपलब्ध कराती है।

(5) प्रजातान्त्रिक व्यवस्था (Democrative System)-प्रजातन्त्रीय शासन प्रणाला में चुनाव पर सरकार को भारी मात्रा में धन का व्यय करना होता है. जिस कारण सरकार पर विशेष भार पड़ता है। इसके साथ ही मन्त्रिमण्डलों, विधानमण्डलों आदि की व्यवस्था पर भारा मात्रा में धन व्यय किया जाता है। 

(6) दोषपूर्ण नागरिक एवं वित्तीय शासन (Defected Civil and Financial Administration)-विगत वर्षा में देश में लोक व्यय पर नियन्त्रण कमजोर रहा है, शासन सम्बन्धी जटिलताएँ बढ़ती गई हैं, नागरिक शासन का बराबर विस्तार होता गया है तथा वेतन और कर्मचारियों की संख्या दोनों में वृद्धि हुई है। इन सभी बातों के परिणामस्वरूप लोक व्ययों में भी बराबर वृद्धि होती जा रही है।

(7) जनसंख्या में वृद्धि (Increase in Population)-विकासशील देशों में जनसंख्या की वृद्धि एक विकट समस्या है। निरन्तर बढ़ती हुई जनसंख्या के लिए आवश्यक साधन उपलब्ध कराने के लिए सरकार को काफी मात्रा में व्यय करना पड़ता है; जैसेआवास, स्कूल, सफाई, चिकित्सा आदि की व्यवस्था। बढ़ती हुई जनसंख्या के लिए नागरिक तथा सामाजिक सुविधाएँ प्राप्त करने के प्रयास में सरकार को अधिक व्यय करना पड़ रहा है।

(8) मूल्य स्तर में वृद्धि (Increase in Price Level)-सार्वजनिक व्यय में निरन्तर वृद्धि का कारण, मुद्रा प्रसार के कारण उत्पन्न ऊँचा मूल्य स्तर है। मुद्रा-प्रसार की अवस्था में वस्तुओं के मूल्य बढ़ने से सरकार को भी अधिक व्यय करना पड़ता है क्योंकि राज्य अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु तथा कर्मचारियों के वेतन एवं महँगाई भत्ते पर काफी धन व्यय करता है। इस प्रकार मूल्य स्तर की वृद्धि ने सार्वजनिक व्यय को भी बढ़ा दिया है।

(9) व्यापार चक्र (Trade Cycle)-व्यापार चक्र से बचने के लिए सरकार द्वारा सार्वजनिक कार्यों तथा योजनाओं पर बड़ी मात्रा में धन व्यय किया जाता है। इससे लोगों को रोजगार प्राप्त होता है तथा वस्तुओं और सेवाओं की माँग में वृद्धि होती है। सरकार लोक कार्यों पर अधिक व्यय करती है, जिससे सार्वजनिक व्यय बढ़ जाता है।

(10) युद्ध तथा युद्ध से बचाव (War and Defence)-सरकार को युद्ध तथा युद्ध से बचाव के लिए भारी मात्रा में व्यय करना पड़ता है। कोई भी देश कितना ही शान्तिप्रिय क्यों न हो, उसे अपनी स्वतन्त्रता को बनाए रखने हेतु सुरक्षा से सम्बन्धित व्ययों को अनिवार्य रूप से करना पड़ता है जिससे सरकार द्वारा किए जाने वाले व्यय की मात्रा में वृद्धि हो जाती है।

(11) आवश्यकताओं की सामूहिक सन्तुष्टि (Collective Satisfaction of Wants)-व्यक्तिगत व्यय के माध्यम से पूर्व में जिन आवश्यकताओं को सरकारी अथवा निजी क्षेत्र द्वारा सन्तुष्ट किया जाता था, अब उन आवश्यकताओं की सामूहिक सन्तुष्टि की जाती है। जैसे-जल-आपूर्ति, विद्युत-आपूर्ति एवं परिवहन सेवाएँ आदि। क्योंकि निजी क्षेत्र के अनसार प्रतियोगी रूप से इन सेवाओं की पूर्ति न केवल महँगी थी बल्कि असुविधाजनक भी थी। अतः इस कार्य को सरकार ने अपने हाथों में ले लिया है, जिसके परिणामस्रूवरूप सार्वजनिक व्ययों में वृद्धि हुई है।

(12) अन्य कारण (Other Causes)-वर्तमान समय में सार्वजनिक व्यय में वृद्धि हेतु निम्नलिखित कारण भी उत्तरदायी हैं

(i) आवास समस्या के निदान पर किया गया व्यय। 

(ii) प्राकृतिक प्रकोपों (बाढ़, सूखा, भूकम्प आदि) पर अप्रत्याशित व्यय। 

(iii) विदेशों में दूतावास खोलने पर व्यय। 

(iv) अविकसित राष्ट्रों को सहायता। 

(v) पर्यटन विकास पर व्यय। 

(vi) सांस्कृतिक विकास एवं खेलकूद पर व्यय। 

(vii) ऊर्जा विकास पर व्यय।.

उपर्युक्त सभी कारणों से गत वर्षों में भारत में सार्वजनिक व्ययों में बहुत अधिक है हुई है। सार्वजनिक व्ययों में वृद्धि कोई बुरी बात नहीं है, परन्तु सार्वजनिक व्यय का कल्याणकारी व उत्पादक होना आवश्यक है। बेकार की वस्तुओं या अनुपयोगी कार्यक्रमों पर व्यय नहीं किया जाना चाहिए। जनता और समाज के हित के लिए किया गया सार्वजनिक व्या ही उपयोगी होता है। सरकार को सामाजिक व्यय इस प्रकार करना चाहिए ताकि जनता के रहन-सहन के सामाजिक स्तर में सुधार हो सके।

सार्वजनिक व्यय के दुष्परिणाम 

(The Evil Consequences of Public Expenditure) 

सार्वजनिक व्यय के निम्नलिखित दुष्परिणाम हो सकते हैं

(1) सरकार कभी-कभी सार्वजनिक व्यय द्वारा ऐसे उद्योगों को संरक्षण व प्रोत्साहन देने लगती है, जो आगे चलकर सफलता प्राप्त नहीं कर पाते। इस प्रकार सार्वजनिक व्यय का सही उपयोग नहीं हो पाता है। 

(2) सरकार इस प्रकार के उद्योगों को अपने हाथ में ले लेती है जो अधिक लाभ या घाटे में चल रहे होते हैं, जिस कारण प्रेरणा व व्यक्तिगत साहस न्यूनतम हो जाता है तथा प्रत्येक उद्योगपति राष्ट्रीयकरण के भय से औद्योगिक विकास को प्राथमिकता नहीं

देता है। 

(3) सरकार यदि जनता के लिए अधिक व्यय करती है तो इसका श्रमिकों की कार्यक्षमता पर गलत प्रभाव भी पड़ सकता है। इसका मुख्य कारण यह है कि अधिक सुविधा मिलने पर श्रमिक आरामतलब हो जाते हैं और वे अधिक परिश्रम नहीं करते हैं जिसका उत्पादन पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। 

(4) सरकार द्वारा व्यवसायों को सामान्य बीमा से अधिक सहायता देना भी कभी-कभी नुकसानदायक हो जाता है क्योंकि फिर वे स्वयं आगे बढ़ने का प्रयास नहीं करते हैं।

इस प्रकार वे अपनी क्षमता का अधिकतम प्रयोग नहीं कर पाते हैं। (5) सरकार द्वारा अन्य देशों की नकल करके सुरक्षा व्यवस्था पर अधिक व्यय करन;

जैसा कि रूस और अमेरिका की सरकारें कर रही है; से किसी भी प्रकार का सामाजिक लाभ नहीं हो रहा है।

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