B.Com 2nd Year Public Expenditure Long Notes In Hindi

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Public Expenditure Long Notes In Hindi
Public Expenditure Long Notes In Hindi

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न 

प्रश्न – अधिकतम सामाजिक लाभ के सिद्धान्त को स्पष्ट करें। Explain the principle of Maximum Social Advantage. 

उत्तर – अधिकतम सामाजिक लाभ का सिद्धान्त

(Principle of Maximum Social Advantage) 

यह निर्विवाद है कि वर्तमान समय में राज्य की वित्तीय क्रियाएँ (Financial Operations) ही समाज को सर्वाधिक प्रभावित करती हैं। इन्हीं के परिणामस्वरूप उत्पादन की मात्रा तथा गुण में परिवर्तन होते हैं। ये क्रियाएँ समाज की वितरण व्यवस्था को भी प्रभावित करती हैं। यदि ये परिवर्तन सामाजिक दृष्टि से लाभप्रद हैं तो लोक वित्त के कार्यों का नियमन करने हेतु किसी मूल सिद्धान्त का होना अत्यन्त आवश्यक है। मार्गदर्शक सिद्धान्त की आवश्यकता पर प्रकाश डालते हुए डॉ० डाल्टन ने लिखा है कि “लोक वित्त के मूल में एक बुनियादी सिद्धान्त होना चाहिए। इसे हम अधिकतम सामाजिक लाभ का सिद्धान्त कह सकते हैं। यह सिद्धान्त ही लोक वित्त का आधार है।”

लोक वित्त के क्षेत्र में आधुनिक युग में, अधिकतम सामाजिक लाभ के सिद्धान्त को ही व्यापक मान्यता प्राप्त है क्योंकि कल्याणकारी राज्य की धारणा के इस युग में सरकार तथा अन्य लोक संस्थाओं का एकमात्र उद्देश्य समाज को अधिक-से-अधिक सुख-सुविधाएँ पहुँचाना स्वीकार किया गया है। विभिन्न अर्थशास्त्री इस सिद्धान्त को विभिन्न नामों से पुकारते हैं। प्रो० पीगू ने इस सिद्धान्त को अधिकतम सामूहिक कल्याण का नियम (Law of Maximum Aggregate Welfare) कहा है। उनके शब्दों में-“जहाँ तक राजनीतिक सिद्धान्त का सम्बन्ध है, अधिकतम सामूहिक कल्याण प्रत्येक स्थान पर राज्य का सही उद्देश्य स्वीकार किया जाता है।” डॉ० आर० एन० भार्गव ने इस सिद्धान्त को लोक वित्त के सिद्धान्त (Principle of Public Finance) की संज्ञा दी है।

सिद्धान्त की व्याख्या – डॉ० डाल्टन ने इस सिद्धान्त की व्याख्या करते हुए लिखा है कि “लोक वित्त की समस्त क्रियाएँ एक प्रकार से समाज के एक वर्ग से दूसरे वर्ग को क्रय शक्ति का हस्तान्तरण है। इस क्रय-शक्ति के हस्तान्तरण का मुख्य उद्देश्य अधिकतम सामाजिक लाभ को प्राप्त करना है।”

अब प्रश्न उठता है कि अधिकतम सामाजिक लाभ की प्राप्ति कैसे हो? इस प्रश्न का उत्तर जानने के लिए हमें अधिकतम सामाजिक लाभ के सन्दर्भ में अग्रलिखित प्रश्नों पर विचार करना होगा, तभी हम इस सिद्धान्त के व्यावहारिक स्वरूप को समझ सकेंगे-

(1) कराधान तथा लोक व्यय की क्या सीमाएँ होनी चाहिए,

(2) लोक व्यय को विभिन्न उपयोगों एवं मदों पर किस प्रकार वितरित किया जाना चाहिए,

(3) कर भार का समाज के विभिन्न अंगों पर किस प्रकार नियन्त्रण हो।

(1) कराधान तथा लोक व्यय की सीमाएँ (Limits of Taxation and Public Expenditure)-प्रथम प्रश्न का उत्तर देते हुए डाल्टन ने लिखा है कि “सार्वजनिक व्यय प्रत्येक दशा में ठीक उस सीमा तक किया जाना चाहिए जहाँ तक कि किसी भी क्षेत्र में इस व्यय की थोड़ी-सी भी वृद्धि के द्वारा समाज को प्राप्त होने वाले लाभ से, कराधान अथवा सरकारी आय के किसी साधन में की जाने वाली थोड़ी-सी वृद्धि के द्वारा होने वाली हानि को प्रति-सन्तुलित (Counter-balance) किया जा सके। ऐसा करने से सार्वजनिक व्यय एवं आय का आदर्श आकार निर्धारित हो जाता है।”

लोक वित्त की क्रियाओं के द्वारा क्रय-शक्ति का हस्तान्तरण होता है क्योंकि एक ओर जब व्यक्ति कर आदि के द्वारा सरकार को भुगतान करते हैं तो उनका उपभोग व बचत पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है अर्थात् इनमें कमी होती है, किन्तु दूसरी ओर सरकार अपनी वित्तीय क्रियाओं (सार्वजनिक व्यय) के द्वारा अपने नागरिकों का अधिकतम कल्याण करने के उद्देश्य से जब कर द्वारा प्राप्त धन को विभिन्न मदों पर व्यय करती है तो कुछ लोगों की आय में वृद्धि हो जाती है।

सीमान्त उपयोगिता ह्रास नियम का प्रभाव (Effect of Law of Diminishing Marginal Utility) – लोक वित्त के क्षेत्र में सीमान्त उपयोगिता ह्रास नियम (Law of Diminishing Marginal Utility) के क्रियाशील होने के परिणामस्वरूप जैसे-जैसे सार्वजनिक व्यय की मात्रा में वृद्धि होती है, उत्तरोत्तर इकाइयों से प्राप्त होने वाली उपयोगिता क्रमशः घटती चली जाती है। इसी प्रकार जैसे-जैसे राज्य अधिक आय प्राप्त करता है उसके नागरिकों की क्रय-शक्ति (Purchasing Power) घटती जाती है, अर्थात् हर उत्तरोत्तर इकाई से उन्हें पहले की तुलना में अधिक असन्तोष अथवा अनुपयोगिता मिलती है। इस प्रकार एक

ओर लोक व्यय से प्राप्त होने वाली उपयोगिता क्रमश: घटती जाती है और दूसरी ओर लोक *आगम की मात्रा में वृद्धि होने से अनुपयोगिता (त्याग) की मात्रा निरन्तर बढ़ती जाती है। ऐसी दशा में लोक हित को अधिकतम करने के लिए यह आवश्यक हो जाता है कि लोक व्यय का सीमान्त इकाई से उत्पन्न लाभ की मात्रा लोक आगम की सीमान्त इकाई से उत्पन्न त्याग का मात्रा के बराबर हो जबकि आय तथा व्यय की राशियाँ समान हों।

आदर्श बिन्दु (Optimum Point)-अन्य शब्दों में, व्यय की सीमान्त उपयोगिता (Marginal Utility of Expenditure) आगम की अनपयोगिता अथवा त्याग (Marginal Disutility of Sacrifice from Revenue) के बराबर होनी चाहिए। बिन्दु आदर्श बिन्दु होगा। यदि लोक व्यय तथा लोक आगम की मात्रा को इस बिन्दु स अ बढ़ा दिया जाए तो लोगों को उनके त्याग की तुलना में कम लाभ प्राप्त होगा आर यादव, जितना कि अन्यथा प्राप्त हो सकता था। आगम की मात्रा को इस साम्य बिन्दु से कम रखा जाए तो समाज को इतना लाभ प्राप्त हो सकता हैं।

प्रश्न – 2 “लोक वित्त न केवल मात्रा में वरन् स्वरूप में भी निजी वित्त स भिन्न है।क्या आप इस कथन से सहमत हैं? स्पष्ट रूप से समझाइए।

“Public Finance differs from Private Finance not only in degree but also in form.” Do you agree ? Explain clearly. 

अथवा सार्वजनिक वित्त क्या है? सार्वजनिक वित्त एवं निजी वित्त में क्या अन्तर है।

What is Public Finance ? What is difference betwe Public Finance and Private Finance ?

उत्तर – सार्वजनिक वित्त से आशय – राजस्व अथवा सार्वजनिक वित्त राज्य का और व्यय तथा इनके एक-दूसरे के साथ समायोजन से सम्बन्धित है। एडम स्मिथ क राज्य के व्यय और राज्य की आय के स्वभाव एवं सिद्धान्तों की छानबीन को राज सार्वजनिक वित्त कहते हैं।

निजी वित्त एवं लोक वित्त में तुलना 

(Comparison between Private Finance and Public Finance)

सामान्यत: लोक वित्त तथा निजी वित्त पर एक सरसरी दृष्टि डालने से तो ऐसा प्रतीत होता है कि इन दोनों के मध्य कोई मौलिक अन्तर नहीं है और ये दोनों व्यवस्थाएँ समान सिद्धान्तों पर आधारित हैं, परन्तु वास्तविकता यह है कि लोक वित्त और निजी वित्त के कार्यों में जहाँ कुछ समानताएँ हैं, वहाँ कुछ मौलिक विभिन्नताएँ भी पायी जाती हैं, जिनकी उपेक्षा नहीं की जा सकती। 

(अ) समानताएँ (Similarities) 

निजी वित्त एवं लोक वित्त में निम्नलिखित समानताएँ पायी जाती हैं

(1) सम-सीमान्त उपयोगिता के नियम का पालन (Follow up of Law of Equi-marginal Utility) लोक वित्त तथा निजी वित्त दोनों ही व्यवस्थाएँ सम-सीमान्त उपयोगिता सिद्धान्त (Principle of Equi-marginal Utility) से निर्देशित होती हैं। दोनों ही व्यवस्थाओं का मुख्य उद्देश्य अधिकतम लाभ या उपयोगिता प्राप्त करना होता है, जिसे निजी वित्त के अन्तर्गत अधिकतम सन्तुष्टि (Maximum Satisfaction) तथा लोक वित्त के अन्तर्गत अधिकतम सामाजिक लाभ (Maximum Social Advantage) कहकर पुकारा जाता है।

(2) प्राप्तियों और व्ययों में सन्तुलन रखना (Balance between Receipts and Expenditure)-दीर्घकाल में राज्य तथा व्यक्ति दोनों ही अपनी प्राप्तियों तथा व्ययों में सामंजस्य या सन्तुलन स्थापित करते हैं।

(3) आय की अपेक्षा व्ययों की अधिकता (Excess of Expenditure over Income)-कुछ विशेष परिस्थितियों में लोक वित्त तथा निजी वित्त दोनों ही व्यवस्थाओं के अन्तर्गत व्यय अधिक तथा आय कम हो सकती है। ऐसी दशा में दोनों व्यवस्थाओं के अन्तर्गत अभावों की पूर्ति ऋणों के द्वारा की जाती है।

(4) आय के स्रोत सीमित होना (Limited Resources of Revenue)-दोनों ही व्यवस्थाओं में आय के स्रोत सीमित होते हैं। राज्य करों आदि के माध्यम से एक सीमा तक ही आगम प्राप्त कर सकता है।

(5) उच्चावचनों का प्रभाव (Effect of Fluctuations)-आर्थिक उच्चावचनों का प्रभाव राज्य तथा व्यक्ति दोनों के अर्थ प्रबन्ध पर समान रूप से पड़ता है। 

(ब) असमानताएँ (Dissimilarities)

उपर्युक्त समानताओं के बावजूद लोक वित्त व निजी वित्त में कुछ मौलिक भेद भी पाए जाते हैं। कीन्स के शब्दों में, “एक व्यक्ति की स्थिति में जो सत्य होता है वह सम्पूर्ण रूप से एक राज्य के लिए भी सत्य हो सकता है और नहीं भी।” डाल्टन के अनुसार, “व्यक्तिगत वित्त

तथा लोक वित्त में आय और व्यय दोनों ही दृष्टियों से अन्तर है।” प्रमुख अन्ना निम्नलिखित हैं।

(1) उद्देश्यों में अन्तर (Difference in Objectives)-यद्यपि निजी वित्त तथा लोक वित्त दोनों का ध्येय अपने व्यय से अधिकतम लाभ या सामाजिक सन्तुष्टि प्राप्त करना है तशाल उनके मूल उद्देश्यों में व्यापक अन्तर पाया जाता है; जैसे –

प्रथम, व्यक्ति का ध्यान केवल व्यक्तिगत अथवा पारिवारिक कल्याण तक ही सीमित रहता है जबकि राज्य के क्रियाकलापों में लोक-कल्याण की भावना पायी जाती है।

द्वितीय, व्यक्ति के निर्णय अथवा कार्य सामान्यत: उसकी आर्थिक एवं सामाजिक स्थिति से प्रभावित होते हैं, जबकि राज्य के निर्णयों तथा कार्यों पर राजनीति का व्यापक प्रभाव पड़ता है।

तृतीय, व्यक्ति सामान्यत: अल्पकालीन हितों पर ध्यान केन्द्रित रखता है, लेकिन राज्य अल्प दृष्टि वाला नहीं होता। राज्य का दृष्टिकोण उदार तथा दूरदर्शी होता है और वह ऐसी मदों पर भी व्यय करता है जिनकी वित्तीय आय अनिश्चित एवं/या दीर्घकालीन होती है। सामाजिक उपरिव्यय पूँजी (Social Overhead Capital) या आधारभूत ढाँचे (Infra-structure) पर होने वाले व्यय (जैसे-शिक्षा, स्वास्थ्य एवं परिवहन व संचार आदि पर होने वाले व्यय) इसी श्रेणी में आते हैं।

(2) आय-व्यय के समायोजन में अन्तर (Difference in Adjustment between Income and Expenditure)-लोक तथा निजी दोनों वित्त व्यवस्थाओं के मध्य एक महत्त्वपूर्ण अन्तर यह है कि व्यक्ति सामान्यतः अपने साधनों के अनुसार व्यय करता है, जबकि सरकार अपने व्यय के अनुसार साधनों को जुटाती है। डॉ० डाल्टन के अनुसार, “एक व्यक्ति अपनी आय के अनुसार व्यय करता है जबकि सरकार अपने व्ययों को देखकर आय की व्यवस्था करती है।” इस तथ्य को प्रो० फिण्डले शिराज ने इस प्रकार व्यक्त किया है- “बहधा कहा जाता है कि व्यक्तिगत व्यय का निर्धारण आय से होता है, जबकि सार्वजनिक वित्त में व्यय को पूरा करने हेतु आवश्यक आय जटाई जाती है।” परन्तु यह कम अक्षरशः सत्य नहीं है। दोनों ही वित्त व्यवस्थाएँ कछ व्यावहारिक कठिनाइयों के कारण सय ऐसा नहीं कर पातीं। कभी-कभी, विशेष परिस्थितियों में व्यक्ति को अपनी आय को व्यय के समायोजित करने के लिए विवश होना पड़ता है जबकि राज्य अपने व्ययों को आया सीमा में रखने के लिए प्रयत्न करता है। इस प्रकार सत्य तो यह है कि व्यक्तिगत वित्त तथा वित्त व्यवस्था में केवल मात्रा अथवा अंश का अन्तर होता है प्रकति का नहीं।

( 3) आय की प्रकृति में अन्तर (Difference in the Nature of Income) 

लोक वित्त तथा निजी वित्त व्यवस्थाओं में एक प्रकृति की होती है, जबकि व्यक्तिगत आय की

लभूत अन्तर यह है कि राजकीय आय अनिवाय प्रकृति अनिवार्य नहीं होती क्योंकि व्यक्ति राज्य

की भाँति अपनी आय में मनमाने ढंग से वृद्धि नहीं कर सकता। इसके विपरीत, राज्य सार्वभौम एवं सत्ता-सम्पन्न होने के कारण प्रत्येक व्यक्ति को कर देने के लिए बाध्य कर सकता है।

लेकिन इस तथ्य में कितना सत्य है यह एक विवादास्पद प्रश्न है। कुछ अर्थशास्त्रियों का मत है कि सरकार भी सदा मनचाही आय प्राप्त नहीं कर सकती। उसकी भी कुछ सीमाएँ होती है। आज के प्रजातान्त्रिक युग में सरकार मनमानी नहीं कर सकती। प्रो० शिराज के शब्दों में-“यदि सरकार अधिक कर लगाएगी तो उसका देश के उत्पादन पर विपरीत प्रभाव पड़ेगा और इस प्रकार जब वह व्यक्तियों की सम्पत्ति छीन लेगी तो सम्पत्ति का एकत्रीकरण ही रुक जाएगा। अतः राज्य सदैव मनमानी नहीं कर सकता। इतना होने पर भी हम इस तथ्य को अस्वीकार नहीं कर सकते कि लोक आगम में अनिवार्य प्रकृति का तत्त्व होता है।”

(4) आय की लोच में अन्तर (Difference in Elasticity of Income)-साधनों की प्रकृति की दृष्टि से भी लोक वित्त तथा निजी वित्त में अन्तर पाया जाता है। प्राय: लोक वित्त में आवश्यकतानुसार परिवर्तन करना सरल होता है, जबकि निजी वित्त-व्यवस्था में आय के साधन प्राय: बेलोचदार होते हैं। डाल्टन भी इसे स्वीकार करते हैं, परन्तु, कुछ आधुनिक अर्थशास्त्री यह नहीं मानते। उनका कहना है कि लोक वित्त व्यवस्था केवल अल्पकाल (जैसे—युद्ध आदि) में ही लोचदार हो सकती है, सामान्य दशाओं में नहीं। इसके अतिरिक्त, कुछ अर्थशास्त्रियों का यह भी मानना है कि राज्य अपनी क्रियाओं से केवल वितरण को प्रभावित कर सकता है इससे अधिक कुछ नहीं। श्रीमती हिक्स के शब्दों में—“व्यक्ति अपनी आय का एक भाग अपनी इच्छा से व्यय करता है और दूसरे भाग को वह सामूहिक आवश्यकताओं की सन्तुष्टि पर व्यय करता है। यदि वह सामूहिक आवश्यकताओं की सन्तुष्टि पर अधिक व्यय करेगा तो उसकी व्यक्तिगत आय कम होगी।”

इतना होने पर भी यह स्वीकार करना पड़ेगा कि राज्य की आय के साधन निजी आय की तुलना में अवश्य ही कुछ अधिक लोचदार होते हैं।

(5) अवधि में अन्तर (Difference in Duration)-सामान्यत: लोक वित्त का आयोजन दीर्घकाल के लिए किया जाता है, जबकि व्यक्ति प्राय: अल्पकालीन आयोजन किया करता है। कारण राज्य तो अमर है, जबकि व्यक्ति की जीवन-अवधि सीमित होती है।

(6) ऋणों की प्रकृति में अन्तर (Difference in Nature of Debt)-व्यवस्थाओं में ऋण का विशेष महत्त्व है। निजी ऋण की तुलना में लोक ऋण का क्षेत्र अधिक व्यापक पाया जाता है क्योंकि व्यक्ति की तुलना में राज्य का प्रभुत्व अधिक होता है। इसके अतिरिक्त, राज्य को आन्तरिक तथा बाह्य दोनों प्रकार के ऋण प्राप्त हो सकते हैं, जबकि व्यक्ति को केवल बाह्य ऋण ही प्राप्त हो सकते हैं। राज्य के सम्बन्ध में एक तथ्य यह भी उल्लेखनीय है. कि राज्य चाहे तो अपने नागरिकों को ऋण देने के लिए विवश कर सकता है, जबकि व्यक्ति ऐसा नहीं कर सकता। किन्तु इस कथन में केवल आंशिक सत्यता है क्योंकि आज के प्रजातान्त्रिक युग में कोई भी सरकार अपने नागरिकों को ऋण देने के लिए बाध्य नहीं कर पाती। यदि करे, तो उसका तख्ता भी पलटने का डर रहता है। इसके अतिरिक्त, इस सन्दर्भ में यह भी कहा जा सकता है कि राज्य को दीर्घकालीन ऋण सरलता से एवं कम ब्याज की दर पर प्राप्त हो जाते हैं, जबकि व्यक्ति प्राय: उच्च दर पर अल्पकालीन ऋण ही प्राप्त कर पाते हैं।

(7) व्यय की प्रकृति में अन्तर (Difference in Nature of Expenditure) लोक वित्त तथा निजी वित्त में व्यय के स्वभाव की दृष्टि से भी मौलिक अन्तर पाया जाता है। लोक व्यय एक निश्चित आर्थिक नीति पर आधारित होता है जैसे विकासशील देशों में लोक व्यय का प्रमुख उद्देश्य उत्पादन तथा रोजगार के स्तर में वृद्धि करना होता है, जबकि विकसित देशों में लोक व्यय का प्रमुख उद्देश्य आर्थिक स्थायित्व प्राप्त करना होता है। इसके विपरीत. निजी व्यय की मात्रा मुख्यत: व्यक्ति विशेष की आदतों, रीति-रिवाजों व उसके आर्थिक व सामाजिक स्तर पर निर्भर रहती है। इसी प्रकार यह भी कहा जा सकता है कि सार्वजनिक व्यय पर अर्थव्यवस्था को वांछनीय दिशा देने का दायित्व रहता है, जबकि निजी व्यय पर ऐसा कोई दायित्व नहीं होता।

एक अन्य दृष्टि से लोक व्ययों तथा निजी व्ययों में अन्तर स्पष्ट करते हुए प्रो० सिल्वरमैन ने लिखा है, “व्यक्ति सदैव इस प्रकार से कार्य करता है कि उसे अधिकतम लाभ हो और इसलिए व्यय को कम करने का प्रयत्न करता है, जबकि दूसरी ओर सरकारी व्यय में कुछ निहित उद्देश्य किसी प्रकार की कमी होने नहीं देते। वे उद्देश्य हैं-राजनीतिक दबाव, दलगत नीति, विभागीय हित आदि जो राज्य को व्यय करने हेतु निरन्तर बाध्य करते रहते हैं और प्रत्येक बचत का विरोध करते हैं।”

(8) नियोजन के आकार में अन्तर (Difference in Size of Planning)-राज्य तथा व्यक्ति दोनों ही अपनी-अपनी आय-व्यय का नियोजन किया करते हैं, लेकिन फिर भी दोनों व्यवस्थाओं में नियोजन की प्रकृति तथा आकार में व्यापक अन्तर होता है। राज्य नियोजन सम्बन्धी क्रियाएँ अत्यन्त विस्तृत होती हैं जबकि व्यक्ति की योजनाएँ अत्यन्त लघु इसका मुख्य कारण यह है कि राज्य एक स्थायी संगठन तथा भावी पीढी का संरक्षक होने के

नाते अपने नागरिकों के व्यापक, आर्थिक एवं सामाजिक हितों को ध्यान में रखकर आ किया करता है, जबकि व्यक्ति अपने अनिश्चित भविष्य के कारण दीर्घकालीन योजना नहीं ले पाता।

हाँ. राज्य की तुलना में व्यक्ति के लिए आयोजन करना अधिक सरल तथा सुगम क्योंकि राज्य के आयोजन में नित नयी बाधाएँ (जैसे राशीय राजनीतिक एवं आर्थिक स अकाल, महामारी, सूखा तथा बाढ़ आदि) आती रहती हैं जो पर्व निर्धारित कायक्र अनुमानों को अस्त-व्यस्त कर देती हैं।

यह भी उल्लेखनीय है कि जहाँ व्यक्ति के लिए आयोजन केवल वांछनीय होता है, वहाँ राज्य के लिए आवश्यक होता है।

(9) संगठन एवं सुरक्षा सम्बन्धी अन्तर (Difference Relating to Management and Security)-यह सर्वविदित है कि व्यक्ति की तुलना में राज्य का दायित्व तथा कार्य-क्षेत्र अत्यन्त व्यापक होता है। अत: राज्य के वित्तीय क्रियाकलापों के संचालन हेतु एक ऐसे संगठन का निर्माण करना पड़ता है जो अत्यन्त दक्ष, साधन-सम्पन्न तथा शक्तिशाली हो, जबकि निजी व्यवस्था के लिए किसी विशिष्ट संगठन की आवश्यकता नहीं पड़ती।

राज्य के सम्बन्ध में एक महत्त्वपूर्ण बात यह भी है कि राज्य पर नागरिकों की सुरक्षा का पूरा दायित्व होता है। अत: राज्य को विदेशी आक्रमण तथा आन्तरिक उपद्रवों से देश को मुक्त रखने के लिए शक्तिशाली सुरक्षा की व्यवस्था करनी पड़ती है, जबकि व्यक्ति इस दायित्व से मुक्त रहता है।

(10) साधनों की प्रचुरता में अन्तर (Difference in Abundance of Resources)-लोक तथा निजी वित्त व्यवस्था में एक मौलिक अन्तर यह है कि व्यक्ति की अपेक्षा राज्य अत्यधिक साधन-सम्पन्न होता है। राज्य को कितनी प्रचुर मात्रा में साधन उपलब्ध होते हैं इस सत्य का आभास इस विवेचन से स्वतः हो जाता है

(i) राज्य को आन्तरिक तथा बाह्य दोनों ही क्षेत्रों से ऋण प्राप्त हो सकता है, जबकि व्यक्ति का ऋण लेने का क्षेत्र अत्यन्त सीमित होता है। 

(ii) व्यक्ति अपनी सीमित साख के कारण प्राय: सरल एवं सुविधाजनक शर्तों पर ऋण नहीं प्राप्त कर सकता जबकि, राज्य प्राय: बड़ी मात्रा में सरलता से दीर्घकालीन

ऋण प्राप्त कर लेता है। 

(iii) राज्य तथा लोक संस्थाएँ अपनी विशिष्ट स्थिति का लाभ उठाकर ऋण-पत्रों का निर्गमन करके भी साधनों को जुटा लेती हैं, जबकि व्यक्ति ऐसा नहीं कर पाता। 

(iv) राज्य हीनार्थ प्रबन्धन के द्वारा भी साधनों को जुटा लेता है, जबकि व्यक्ति को यह अधिकार प्राप्त नहीं है। 

इस प्रकार राज्य अपनी विशिष्ट स्थिति के कारण अधिक साधन-सम्पन्न होता है, जबकि व्यक्ति के आय के साधन सदैव ही अत्यन्त सीमित तथा बेलोचदार होते हैं।

(11) बजट सम्बन्धी अन्तर (Difference Relating to Budget)-निजी वित्त व्यवस्था में बचत का बजट बुद्धिमानी का प्रतीक है तथा दूरदर्शिता की दृष्टि से भी लाभकारी है, परन्तु लोक वित्त के अन्तर्गत बचत के बजट को सामान्यत: उचित नहीं समझा जाता। बजट में आधिक्य होने परं यह समझा जाता है कि सरकार ने जनता पर अनावश्यक कर भार डाला हुआ है अथवा सरकार साधनों के होते हुए भी राष्ट्र निर्माण तथा विकास कार्यों में रुचि नहीं ले रही है। निजी वित्त में घाटे के बजट को कभी भी उचित नहीं समझा जाता, जबकि लोक वित्त में कुछ विशेष परिस्थितियाँ हैं-मन्दी अथवा मुद्रा संकुचन की दशाएँ, परन्तु इनका अभिप्राय नहीं है कि राज्य को सदैव ही घाटे के बजट (deficit budgets) बनाने चाहिए। निरन्तर घाले के बजटों से प्राय: मुद्रास्फीति की स्थिति उत्पन्न हो जाती है, जिससे वस्तुओं तथा सेवाओं मूल्य-स्तर में निरन्तर वृद्धि होती जाती है और मुद्रा का मूल्य तेजी से गिरने लगता है। अतः राज्य भी हीनार्थ प्रबन्धन को अनियमित रूप से नहीं अपना सकता। दीर्घकाल में सन्तुलित बजट ही सर्वोत्तम समझे जाते हैं। प्रो० शिराज ने भी इसकी पुष्टि की है।

(12) गोपनीयता तथा प्रचार (Secrecy and Advertisement)-सामान्यतः निजी वित्त को गोपनीय रखा जाता है, जबकि लोक वित्त के अन्तर्गत अर्थ-नीति तथा साधनों का व्यापक प्रचार किया जाता है। इतना ही नहीं, लोक वित्त के खातों की जाँच तथा निरीक्षण का कार्य लोक प्रतिनिधियों द्वारा कराया जाता है और उनके लेखा प्रतिवेदनों पर संसद अथवा विधानमण्डलों द्वारा विचार किया जाता है, जबकि निजी वित्त इन सभी बन्धनों से मुक्त है। लेकिन इन सब क्रियाकलापों में राज्य की साख पर कोई आँच नहीं आती। लोक वित्त की कुछ मदों को ही कभी-कभी राष्ट्रीय संकट अथवा युद्ध के समय अपवाद के रूप में गुप्त रखा जाता है। इस प्रकार निजी वित्त सदैव ही रहस्य के आवरण में लिपटा रहता है, जबकि लोक वित्त का अधिकतम प्रचार एवं प्रसार किया जाता है। 

(13) सम-सीमान्त उपयोगिता नियम के पालन में अन्तर –

(Difference in Following Law of Equi-marginal Utility)–

यद्यपि व्यक्ति यह चेष्टा रहती है कि वे अपने-अपने व्यय द्वारा अधिकतम सन्तुष्टि अथवा सामाजिक लाभ प्राप्त करें, तथापि अनेक व्यावहारिक कठिनाइयों के कारण राज्य सम-सीमान्त उपयोगिता नियम (Law of Equi-marginal Utility) का परिपालन नहीं कर पाता क्योंकि राज्य की क्रियाए आर्थिक तत्त्वों के अतिरिक्त राजनीतिक तथा सामाजिक तत्त्वों से प्रभावित होती हैं। दूसर, प्रायः लोक व्यय की प्रकृति बहुत कुछ अनिवार्य होती है। उसमें सरलता से परिवर्तन करना सम्भव नहीं होता। तीसरे, लोक व्यय से सम्बद्ध निर्णय एक व्यक्ति न लेकर बहत-से व्याक्त जिससे उनके निर्णयों में पूर्ण एकीकरण नहीं पाया जाता।

इसके विपरीत कुछ विचारकों का मत है कि राजकीय आय-व्यय में आधा के कारण राज्य के लिए सम-सीमान्त उपयोगिता नियम का पालन करना अधिक सरल हा

(14) अन्य असमानताए (Other Dissimilarities)-(i) लोक वित्त नि की तलना में अधिक शक्ति-सम्पन्न तथा प्रभुत्वशाली होता है। व्यक्ति राज्य की तुल अधिक सरलता से भावी स्थिति का अनुमान लगा पति के लिए कुछ असाधारण उपाय (जैसे मुद्रा स्फीति)। 

(iii) राज्य अपनी आवश्यकताओं का नहीं। 

(iv) राज्य को अपनी आय-व्यय से सा स्फीति) अपना सकता है, परन्तु व्यक्ति 

(Budget) को एक निश्चित पद्धति द्वारा संसद आदि से पारित कराना पड़ता है, जबकि व्यक्तिगत बजट के सम्बन्ध में ऐसी कोई प्रक्रिया नहीं अपनानी पड़ती।

उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि लोक वित्त तथा निजी वित्त के मध्य साधनों की प्रकृति, आय-व्यय के समायोजन, बजट के निर्माण तथा उद्देश्यों आदि के सन्दर्भ में कुछ मौलिक तथा उल्लेखनीय अन्तर पाए जाते हैं, जिनकी उपेक्षा नहीं की जा सकती। आज के प्रगतिशील प्रजातान्त्रिक युग में राज्य का दायित्व निरन्तर असीमित होता जा रहा है। आज राज्य का दायित्व केवल कानून व्यवस्था, सुरक्षा तथा न्याय तक ही सीमित नहीं रह गया है, अपितु सम्पूर्ण राष्ट्र के सर्वांगीण आर्थिक तथा सामाजिक विकास का दायित्व भी राज्य के कंधों पर है। यही कारण है कि लोक वित्त आज एक पृथक् शास्त्र के रूप में विकसित हो रहा है।

प्रश्न 3 – कर बचाव एवं कर नियोजन से आप क्या समझते हैं? कर नियोजन एवं कर बचाव में अन्तर बताइए। कर बचाव एवं कर अपवंचन में अन्तर बताइए।

What do mean by Tax avoidance and Tax planning ? Differentiate between Tax planning and Tax avoidance. Differentiate between Tax avoidance and Tax evasion. 

अथवा कर वंचना से आप क्या समझते हैं? कर बचाव को भी स्पष्ट कीजिए। कर नियोजन एवं कर अपवंचन में अन्तर स्पष्ट कीजिए।

What do you undertstand by Tax Evasion ? Clarify Tax planning also. Differentiate between Tax planning and Tax evasion. 

उत्तर – कर वंचना

(Tax Evasion

कर वंचना में करारोपण के विधान का स्पष्ट उल्लंघन होता है। इसे कर चोरी कह सकते हैं। इसके अन्तर्गत एक व्यक्ति झूठे खर्चे दिखाकर अपनी कुल आय कम करता है अथवा अपनी वास्तविक आय घोषित नहीं करता और अपना कर-दायित्व कम कर लेता है। कर वंचना अवैधानिक ही नहीं, अनैतिक एवं राष्ट्र विरोधी भी है। अत: प्रत्यक्ष कर अधिनियमों में कर चना करने वाले व्यक्तियों पर भारी अर्थदण्ड लगाने एवं सजा देने के प्रावधान बनाए गए हैं।

कर वंचना करने वाला व्यक्ति निम्नलिखित में से एक या अनेक तरीके अपनाकर कर चोरी करता है- (1) बिक्री कम दिखाकर, 

(2) झूठे खर्चे एवं हानियाँ दिखाकर,

(3) निजी खर्चे व्यापारिक खर्चों में दिखाकर, 

(4) पुण्यार्थ संस्थाओं के दान की झूठी रसीदें दिखाकर, 

(5) अपने पूँजीगत लाभों को जो सम्पत्तियों के अन्तरण पर हुए, न दिखाकर, 

(6) बेनामी व्यवहार की आय छिपाकर, 

(7) निकट के रिश्तेदारों को अधिक या कृत्रिम वेतन एवं ब्याज का भुगतान दिखाकर, 

(8) कर-योग्य आय को आय कर रिटर्न में न दिखाकर आदि।

संक्षेप में, आय छिपाकर, झूठे खर्चे बढ़ाकर, बिक्री कम दिखाकर, बनावटी हानि दर्शाकर, झूठी कटौतियों की माँग करके आय कम की जाती है और कर बचाया जाता है।

यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि कोई व्यक्ति कर वंचना क्यों करता है? इसके कुछ प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं

(1) लगातार जीवन मूल्यों का ह्रास होना; 

(2) समाज में कर वंचक निन्दनीय नहीं अपितु आर्थिक रूप से सम्पन्न होने के कारण आदरणीय;

(3) सरकार द्वारा समय-समय पर स्वैच्छिक आय घोषणाओं से कर वंचन को प्रोत्साहन (करदाता जानता है कि वह स्वैच्छिक आय घोषणा के अन्तर्गत आय घोषित कर कम दर से कर दे सकता है तथा ब्याज देने एवं सजा भुगतने से बच सकता है); 

(4) यह जानते हुए भी कि कर वंचना बढ़ती जा रही है कर प्रबन्धन को जवाबदेय

(Accountable) नहीं बनाया जाना; 

(5) कर प्रबन्धन एवं कर विशेषज्ञों का कर वंचन में सहयोग; 

(6) सरकार एवं सरकारी कर्मचारियों द्वारा राजकोष का दुरुपयोग; (7) कर भुगतान करने के लाभ तथा कर भुगतान न करने से होने वाली सामाजिक हानियों के विषय में सर्वसाधारण को शिक्षित न करना।

कर बचाव

(Tax Avoidance) 

कर बचाव का अर्थ है किसी भी प्रकार करारोपण के विधान के आयोजनों का उल्लघन किए बिना विधान की कमजोरियों (Loopholes) को पकड़कर उनका लाभ उठाक कर-दायित्व कम करना। यह विधान की भावनाओं तथा उद्देश्यों के प्रतिकल होता है। जैसे हा सरकार को विधान की किसी कमजोरी का ज्ञान होना

हा जाता है, वह इस विधान में संशोधन करके इस कमजोरी को दूर कर देती है। कभी-कभी सरकार इस कमजोरी को दूर करने का संशोधन

भूतकाल से प्रभावी कर देती है और तब करदाता द्वारा इस कमजोरी के कारण बचाया हुआ कर व्यर्थ हो जाता है क्योंकि उसे अब वह चुकाना पड़ता है।

पहले न्यायालयों के दृष्टिकोण से कर बचाव न तो अवैधानिक था और न ही अनैतिक। उनका मत था कि प्रत्येक करदाता का यह अधिकार है कि वह अपने वित्तीय व्यवहार इस प्रकार संचालित कर सकता है, जिससे उसका कर-दायित्व न्यूनतम हो सके, परन्तु अब सर्वोच्च न्यायालय का मत है कि न्यायालयों को कर बचाव के उपायों को प्रोत्साहित नहीं करना चाहिए और ऐसे व्यक्तियों को उजागर (expose) करना चाहिए जो कर बचाव करते हैं क्योंकि कर बचाव के अनेक सामाजिक दुष्परिणाम होते हैं; यथा

1. राजकीय आय में काफी कमी जिसकी आर्थिक कार्यक्रमों के लिए आवश्यकता है; 

2. समाज में आर्थिक असमानता में वृद्धि; 

3. समाज के बुद्धिमान सदस्यों का समय इस कार्य के लिए बर्बाद करना कि कर कैसे बचाया जा सकता है अन्यथा इस समय का सदुपयोग अन्य उत्पादक कार्यों में किया जा सकता है; 

4. चतुर धोखेबाज (Artful dodgers) लोगों का कर-दायित्व भले लोगों पर __ हस्तान्तरित होना; 

5. ऐसे व्यक्तियों में, जो कर बचाव नहीं करना चाहते अथवा ऐसा करने में असमर्थ हैं, ऐसी भावना पैदा होना कि उनके साथ अन्याय हो रहा है। 

विधानमण्डल ने प्रत्यक्ष कर अधिनियमों में कर बचाव को रोकने के सम्बन्ध में प्रावधान बनाए हैं, परन्तु जब तक प्रावधानों में कमजोरियाँ हैं न्यायालयों द्वारा कर बचाव रोकना सम्भव नहीं है क्योंकि भारत में न्यायालयों का कार्य विधायी नहीं है। इनका कार्य विधानमण्डल द्वारा बनाए गए कानूनों की व्याख्या करना (interpreting) है। यदि कानून में कुछ कमजोरियाँ हैं

और करदाता उन कमजोरियों का लाभ उठाकर अपना कर-दायित्व कम कर लेता है तो न्यायालय कानून के बाहर जाकर करदाता के विरुद्ध निर्णय नहीं दे सकते।

कर नियोजन

(Tax Planning) 

कर नियोजन का अभिप्राय करारोपण के विधान का पूर्ण तथा गहन अध्ययन करके उसके द्वारा दी गई छटों, कटौतियों, रियायतों आदि का पूर्ण लाभ उठाकर कर-भार को न्यनतम करना है। कर नियोजन एक सकारात्मक विधि है जिसमें विधान के आयोजनों का उल्लंघन किए बिना तथा विधान की भावनाओं तथा उद्देश्यों के अनुकूल छूटों, रियायतों तथा कटौतियों का पूर्ण लाभ उठाते हुए कर-भार को कम किया जाता है।

इस प्रकार से कर-भार को कम करने का प्रत्येक करदाता को पूर्ण अधिकार है तथा दो सरकार, समाज तथा न्यायालय हीन दृष्टि से नहीं देखता है।

वास्तव में छूटे, कटौतियाँ, रियायतें आदि विधानमण्डल ने कुछ सामाजिक एवं आर्थिक उद्देश्यों की पूर्ति के विचार से दी हैं। उदाहरणार्थ, आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 80-IB में उन नए औद्योगिक उपक्रमों को कटौती दी गई है जो औद्योगिक रूप से पिछड़े हा राज्यों अथवा जिलों में स्थापित किए जाते हैं। इस कटौती का उद्देश्य स्पष्ट है औद्योगिक रूप से पिछड़े हुए जिलों एवं राज्यों का आर्थिक विकास। इसी प्रकार धारा 80C के अन्तर्गत सकल ‘ आय में से कटौती का उद्देश्य एक व्यक्ति एवं हिन्दू अविभाजित परिवार को बचत करके निर्धारित योजनाओं में राशि जमा करने के लिए प्रोत्साहित करना है ताकि देश के आर्थिक विकास के लिए पूँजी प्राप्त हो सके। यदि एक व्यक्ति उपर्युक्त कटौतियों का लाभ लेता है तो वह न केवल अपना कर-दायित्व कम करता है बल्कि विधानमण्डल के उद्देश्यों की पूर्ति में भी सहायता करता है।

कर नियोजन एवं कर अपवंचन में अन्तर 

(Difference between Tax Planning and Tax Evasion) 

(1) कर नियोजन में वैधानिक प्रावधानों का पालन किया जाता है, जबकि कर अपवंचन में विधान का उल्लंघन किया जाता है। 

(2) कर नियोजन वैधानिक अधिकार एवं सामाजिक दायित्व है। कर नियोजन द्वारा कुछ सामाजिक एवं आर्थिक उद्देश्यों की पूर्ति की जाती है, जबकि कर अपवंचन एक वैधानिक अपराध है जिसके करने पर आर्थिक दण्ड एवं सजा मिलती है। 

(3) कर नियोजन के लिए सम्बन्धित अधिनियमों, देश की सामाजिक, आर्थिक एव राजनीतिक स्थिति का ज्ञान आवश्यक है, परन्तु कर अपवंचन के लिए दुस्साहस (Boldness) की आवश्यकता है।

(4) कर नियोजन से देश का आर्थिक विकास होता है, जबकि कर अपवंचन से कार धन पैदा होता है जो तस्करी, जमाखोरी, रिश्वत एवं अन्य गलत कार्यों पर किया जाता है।

(5) कर नियोजन करने वाला व्यक्ति अपनी कमाई का स्वतन्त्रतापूर्वक उपभोग करता हैं, जबकि कर-वंचक सदेव छापे एवं सम्पत्ति जल दोने (Search and Seizure के भय से पीड़ित रहता है।

लोक वित्तकर नियोजन एवं कर बचाव में अन्तर 

(Difference between Tax Planning and Tax Avoidance) 

(1) कर नियोजन में विधान के प्रावधानों का पालन होता है, जबकि कर बचाव में विधान की कमजोरियों को पकड़कर उसका लाभ उठाया जाता है। 

(2) कर नियोजन स्थायी है, जबकि कर बचाव अस्थायी होता है, परन्तु कर नियोजन अथवा कर बचाव में करदाता को किसी प्रकार की सजा नहीं दी जा सकती।

कर बचाव एवं कर अपवंचन में अन्तर 

(Difference between Tax Avoidance and Tax Evasion) 

(1) कर बचाव अवैधानिक नहीं है, जबकि कर अपवंचन अवैधानिक है। 

(2) कर बचाव में विधान की भावना तथा उद्देश्यों का उल्लंघन होता है, जबकि कर अपवंचन में विधान का सीधा उल्लंघन होता है। 

(3) कर बचाव करने वाले को किसी प्रकार की सजा नहीं दी जा सकती, जबकि कर अपवंचन करने वाला सदैव ही अर्थदण्ड एवं सजा का भागीदार होता है। 

(4) कर बचाव से काले धन की उत्पत्ति नहीं होती। अत: समाज के लिए यह उतना अहितकारी नहीं है जितना कर अपवंचन। कर अपवंचन से काले धन की उत्पत्ति होती है जो अधिकतम अनुत्पादक कार्यों में व्यय की जाती है।

वास्तव में कर बचाव एवं कर अपवंचन में बेईमानी की नीयत झलकती है, परन्तु कर नियोजन में वास्तविक योग्यता की झलक होती है।

प्रश्न 4 – “सार्वजनिक व्यय के सिद्धान्तोंको विस्तार से समझाइए।1XHOnkal

Explain in detail : “Canons of Public expenditure”. अथवा सार्वजनिक व्यय किन नियमों पर आधारित होना चाहिए? फिण्डले शिराज तथा अन्य अर्थशास्त्रियों द्वारा दिए गए व्यय के सिद्धान्तों का वर्णन कीजिए।

On what principles should the public expenditure be hased? Give various canons of expenditure as given by Findlay Shirras and other economists ?

भवा शिप्त टिप्पणी लिखिए-फिण्डले शिराज के सार्वजनिक व्यय के सिद्धान्त।

write short note on: Findlay Shirras’s Canons of Public Expenditure.

सार्वजनिक व्यय के सिद्धान्त 

उत्तर – (Canons of Public Expenditure). 

वर्तमान समय में राज्य के दायित्वों में निरन्तर वृद्धि होने के परिणामस्वरूप लोक व्यय में भी निरन्तर वृद्धि हो रही है। कुछ व्यक्ति इसे वरदान समझते हैं, जबकि कुछ इसे अभिशाप। सामान्य रूप से व्यक्तिवादी तथा अराजकतावादी लोक व्यय में होने वाली वृद्धि का विरोध

करते हैं। आर्थिक, सामाजिक तथा राजनीतिक सभी क्षेत्रों में होने वाली आलोचनाओं से बचने के लिए लोक व्यय के कुछ मान्य सिद्धान्तों का परिपालन करना प्रत्येक दृष्टि से उचित तथा वांछनीय है। लेकिन लोक व्यय के सिद्धान्तों का अभी तक भी पूर्ण विकास नहीं हो सका है। जैसा कि प्रो० ब्यहलर ने लिखा है-“यद्यपि करारोपण के सिद्धान्तों की तरह लोक व्यय के सिद्धान्तों का अभी तक विकास नहीं हुआ है तथापि कुछ स्पष्ट और मौलिक सिद्धान्तों का विवेचन किया जा सकता है जो व्यवस्थापिका के सदस्यों और जनसाधारण का उस समय तक पथ-प्रदर्शन कर सकते हैं, जब तक कि अच्छे सिद्धान्तों का विकास न हो जाए।”

‘The Science of Public Finance’ के प्रसिद्ध लेखक प्रो० फिण्डले शिराज ने ” लोक व्यय के चार सिद्धान्तों का प्रतिपादन किया है-

I. लाभ का सिद्धान्त, II. मितव्ययिता का सिद्धान्त, III. स्वीकृति का सिद्धान्त, IV. बचत .. अथवा आधिक्य का सिद्धान्त।

आधुनिक अर्थशास्त्री लोक व्यय के चार अन्य सिद्धान्तों का प्रतिपादन करते हैं

(1) लोच का सिद्धान्त, (2) उत्पादकता का सिद्धान्त, (3) सम-वितरण का सिद्धान्त, (4) समन्वय का सिद्धान्त। 

I. लाभ का सिद्धान्त (Canon of Benefit)

लोक व्यय का यह सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण सिद्धान्त है। विभिन्न अर्थशास्त्रियों ने इस सिद्धान्त की व्याख्या भिन्न-भिन्न शब्दों में की है। इस सिद्धान्त के मुख्य प्रतिपादक प्रो० फिण्डले शिराज के शब्दों में, “अन्य बातें समान रहने पर लोक व्यय इस प्रकार होना चाहिए कि इससे समाज को महत्त्वपूर्ण लाभ प्राप्त हो; यथा-उत्पादन में वृद्धि हो, समस्त समाज विदेशी आक्रमण और आन्तरिक अव्यवस्था से सुरक्षित रहे तथा जहाँ तक सम्भव हो आय की असमानताएँ कम हो जाए।’ संक्षेप में, “सार्वजनिक कोषों का उपयोग उन दिशाओं में किया जाना चाहिए जो सार्वजनिक हित के लिए श्रेष्ठ हों अर्थात सार्वजनिक व्यय से अधिकतम उपयोगिता प्राप्त हो।” प्रो० डाल्टन ने लिखा है कि “सार्वजनिक व्यय प्रत्येक दिशा में इस प्रकार होना चाहिए कि किसी एक दिशा में तनिक भी वृद्धि होने से समाज को प्राप्त होने वाला , लाभ उस हानि के बराबर हो जाए।”

प्रो० निकल्सन के शब्दों में, “लाभ के सिद्धान्त के आधार पर लोक व्यय का आदश तभी प्राप्त किया जा सकता है जब प्रत्येक मद पर होने वाले सीमान्त व्यय से प्राप्त सामाजिक सन्तुष्टि लगभग बराबर हो।”

संक्षेप में, लोक व्यय का उद्देश्य किसी वर्ग विशेष को लाभ प्रदान न करके सम्पूर्ण समाज को लाभ प्रदान करना होना चाहिए।

यह जानने के लिए कि लोक व्यय से सम्पर्ण सा बटालों ने कछ कसौटियाँ निश्चित की हैं; जैसे

(i) प्राथमिक व्यय और फिर गौण व्यय करने चाहिए।

(ii) लोक व्यय से देश के उत्पादन व राष्ट्रीय आय में वृद्धि होनी चाहिए। 

(iii) राष्ट्रीय आय का न्यायोचित वितरण होना चाहिए। 

(iv) लोक व्यय से आर्थिक स्थायित्व को बनाए रखने में सहायता मिलनी चाहिए ताकि अर्थव्यवस्था में मुद्रा-स्फीति तथा मुद्रा-विस्फीति की दशाएँ पैदा न हों और पूर्ण

रोजगार की स्थिति बनी रहे। – 

(v) लोक व्यय भावी पीढ़ी के हितार्थ भी किया जाना चाहिए। 

II. मितव्ययिता का सिद्धान्त 

(Canon of Economy)

लोक व्यय का दूसरा महत्त्वपूर्ण सिद्धान्त यह है कि सरकार को आवश्यक तथा उपयोगी कार्यों पर ही धन व्यय करना चाहिए, अनावश्यक कार्यों पर नहीं। मितव्ययिता का अर्थ अपव्ययता को रोकना है। अत: अधिकारियों से यह आशा की जाती है कि वे लोक व्यय करते समय यह अवश्य देखें कि लोक व्यय

(i) आवश्यकता से अधिक न हो। 

(ii) इससे देश की उत्पादन-क्षमता में वृद्धि हो। 

(iii) इससे देश के साधनों का अपव्यय न हो। 

(iv) इसका देश की अर्थव्यवस्था पर प्रतिकूल तथा अवांछनीय प्रभाव नहीं पड़ना चाहिए।

इस प्रकार हम देखते हैं कि मितव्ययिता का सिद्धान्त ‘लाभ सिद्धान्त’ का ही पूरक है और इस सिद्धान्त के परिपालन का उद्देश्य भी अधिकतम लाभ की प्राप्ति ही है। 

III. स्वीकृति का सिद्धान्त 

(Canon of Sanction)

इस सिद्धान्त का अभिप्राय यह है कि बिना पूर्व स्वीकृति के लोक साधनों को व्यय नहीं करना चाहिए। अन्य शब्दों में, इस सिद्धान्त के परिपालन में निम्नलिखित बातों का समावेश किया जाता है

(i) केवल स्वीकृत मात्रा में ही धन व्यय करना चाहिए। 

(ii) व्यय केवल उन्हीं मदों पर होना चाहिए जो स्वीकृत हों। 

(iii) व्यय का उचित अंकेक्षण (Audit) होना चाहिए। 

(iv) लोक ऋण द्वारा प्राप्त धन केवल उन्हीं कार्यों पर व्यय होना चाहिए, जिन कार्यों हेतु वे ऋण प्राप्त किए गए हों। 

(v) ऋणों के प्रतिपादन हेतु उचित व्यवस्था होनी चाहिए।

इस प्रकार, जैसा कि प्रो० शिराज ने लिखा है, “इस सिद्धान्त के अनुसार व्यय किसी अधिकारी की उचित स्वीकृति के बिना नहीं किया जाना चाहिए।”

प्रो० मेहता ने लिखा है, “यह सिद्धान्त अबद्धिमत्ता एवं दुस्साहसपूर्ण व्ययों पर नियन्त्रण रखता है। सार्वजनिक विभागों में धन को विवेकरहित ढंग से व्यय करने का प्रलोभन रहता है. परन्तु स्वीकृति लेने की अनिवार्यता इस प्रलोभन को नियन्त्रण में रखती है। 

IV. बचत अथवा आधिक्य का सिद्धान्त 

(Canon of Surplus)

प्रो० फिण्डले शिराज के शब्दों में, “सार्वजनिक अधिकारियों को अपनी आय की प्राप्ति तथा उसका व्यय सामान्य नागरिकों के समान करना चाहिए। व्यक्तिगत व्यय के समान सन्तुलित बजट की सामान्य नीति होनी चाहिए।” वस्तुतः प्रो० शिराज का विचार था कि लोक व्यय में घाटे की अर्थव्यवस्था से बचना चाहिए। सन् 1920 ई० के अन्तर्राष्ट्रीय मौद्रिक सम्मेलन में उन्होंने स्पष्ट घोषणा की थी “जो देश घाटे के बजट की नीति को स्वीकार करता है, वह उस फिसलने वाले मार्ग पर चल रहा है, जो सामान्य विनाश की ओर ले जाता है और उस मार्ग से बचने हेतु कोई भी बलिदान बड़ा नहीं है।” इसके अतिरिक्त, उनका यह भी विचार था कि “यदि सरकार बचत का बजट नहीं बनाती तो जनता पर ऋण भार बढ़ जाता है तथा सरकार का विश्वास केवल देश में ही कम नहीं हो जाता, अपितु विदेशों में भी उसकी साख गिर जाती है।” परन्तु आधुनिक अर्थशास्त्री सन्तुलित बजट को सदैव अच्छा नहीं समझते। मुद्रा-स्फीति की दशा में बचत के बजट’ (Surplus Budget) को अच्छा माना जाता है। इस प्रकार, केवल सामान्य दिनों में ही ‘सन्तुलित बजट’ (Balanced Budget) को वांछनीय माना जा सकता है। 

अन्य सिद्धान्त (Other Canons)

प्रो० फिण्डले शिराज द्वारा प्रस्तुत उपर्युक्त चार सिद्धान्तों के अतिरिक्त आधुनिक अर्थशास्त्रियों ने कुछ अन्य सिद्धान्त भी प्रतिपादित किए हैं; यथा

(1) लोच का सिद्धान्त (Canon of Elasticity)-इस सिद्धान्त के अनुसार लोक व्यय ऐसा होना चाहिए, जिसमें समय तथा आवश्यकतानुसार परिवर्तन किया जा सके, साथ ही सामाजिक हितों को कोई आँच न पहुँचे। सामान्यत: लोक व्यय में वृद्धि करना तो बहुत सरल होता है, परन्तु कमी करना कठिन हो जाता है।

(2) उत्पादकता का सिद्धान्त (Canon of Productivity)-इस सिद्धान्त का अभिपाय यह है कि लोक व्यय क फलस्वरूप देश की उत्पादन क्षमता तथा रोजगार के अवसरों में वृद्धि होनी चाहीए। अन्य शब्दों में, लोक व्यय पूँजी निर्माण की गति में वृद्धि करने वाला, मोक्ता पदार्थों का उत्पादन बढ़ाने वाला तथा सामाजिक दृष्टि से कल्याणकारी होना चाहिए।

यहाँ यह उल्लेखनीय है कि गत शताब्दी में सुरक्षा, शान्ति और सामाजिक सेवाओं पर मा जाने वाले व्यय को अनुत्पादक माना जाता था, परन्तु अब इस धारणा का परित्याग कर दिया गया है और अब सभी यह मानने लगे हैं कि बिना शान्ति व सरक्षा के कोई भी क्रिया दिया गया है और अब सभी यह मानने लगे हैं कि बिना शान्ति व सुरक्षा पर होने वाला व्यय उत्पादक व्यय माना जाता है।

(3) सम-वितरण का सिद्धान्त (Canon of Equitable Distribution)-लोक व्यय के परिणामस्वरूप समाज में वितरित धन-सम्पत्ति की विषमता में यथासम्भव न्यूनता आनी चाहिए क्योंकि तभी देश का सर्वतोन्मुखी विकास सम्भव है और अधिकतम सामाजिक लाभ की प्राप्ति हो सकती है। इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए राज्य को एक ओर समृद्ध वर्ग पर प्रगतिशील दर से कर लगाने चाहिए और निर्धन वर्गों को नि:शुल्क शिक्षा, चिकित्सा, आवास तथा मनोरंजन आदि की सुविधाएँ प्रदान करनी चाहिए।

(4) समन्वय का सिद्धान्त (Canon of Co-ordination)-इस सिद्धान्त का अभिप्राय यह है कि लोक व्यय निर्धारित करने से पूर्व विभिन्न स्तरीय सरकारों से परामर्श करना चाहिए। सामान्य रूप से संघीय व्यवस्था के अन्तर्गत तीन स्तर पर सरकारें होती हैं—केन्द्र, राज्य तथा स्थानीय सरकारें। इन सरकारों द्वारा किए गए व्यय से अधिकतम लाभ की प्राप्ति केवल उसी अवस्था में हो सकती है, जबकि इनके व्ययों में समन्वय तथा सामंजस्य बना रहे, उनके परिणामों में परस्पर विरोध और पुनरावृत्ति की आशंका न हो।

निष्कर्ष रूप में यह कहा जा सकता है कि यदि सरकार पूर्ववर्णित सिद्धान्तों का यथासम्भव पालन करे तो अवश्य ही अर्थव्यवस्था पर लोक व्यय के वांछनीय प्रभाव पड़ेंगे। वस्तुत: सामाजिक कल्याण के निर्धारण पर लोक व्यय का निर्णायक प्रभाव पड़ता है। प्रो० जे० के० मेहता के शब्दों में, “सार्वजनिक व्यय एक दो धार वाला अस्त्र (Double-edged Weapon) है। यह समुदाय की बहुत अधिक भलाई भी कर सकता है, परन्तु यदि इसका प्रयोग मूर्खतापूर्वक किया गया तो यह बहुत हानि भी कर सकता है। प्रत्येक चीज का दुरुपयोग सम्भव है। व्यक्ति अच्छे उद्देश्य के लिए भी लिख सकते हैं और बुरे के लिए भी।”

ब्यूहलर के शब्दों में—“यद्यपि सार्वजनिक व्यय के सिद्धान्त बहुत प्रामाणिक नहीं हैं क्योंकि करारोपण के सिद्धान्तों के समान व्यय के सिद्धान्तों का विकास नहीं हुआ है, तथापि कछ स्पष्ट साथ ही कुछ मौलिक, सिद्धान्तों का वर्णन किया जा सकता है जो संसद के सदस्यों तथा जनता का तब तक पथ प्रदर्शन कर सकते हैं जब तक कि अधिक अच्छे सिद्धान्तों का विकास न किया जाए।”

क्या भारत में सार्वजनिक व्यय इन सिद्धान्तों के आधार पर होता है 

(ls Public Expenditure in India based on these Principles)

जब हम भारत के सार्वजनिक व्यय को लोक व्यय के उपर्युक्त सिद्धान्तों की कसौटी पर कसते हैं तो हम पाते हैं कि भारत में सार्वजनिक व्यय कुछ सिद्धान्तों के अनुकूल है। स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात देश में भारी उद्योगों की स्थापना, आर्थिक एवं सामाजिक पूँजी निर्माण की वृद्धि, सामाजिक कल्याण एवं सुरक्षा योजनाओं में वृद्धि आदि कार्यों पर सरकारी व्यय में भारी वृद्धि हुई है जिसके फलस्वरूप गत दो दशकों से भारतीय अर्थव्यवस्था में आर्थिक सुदृढ़ता आयी है। योजनाओं के अन्तर्गत अपनायी गई क्षेत्रीय विकास की नीति ‘लाभ के सिद्धान्त’ के अनुरूप है क्योंकि इससे अल्पविकसित क्षेत्रों को विशेष रूप से ग्रामीण जनसंख्या को काफी लाभ पहुंचा है। इसके विपरीत, प्रशासनिक शिथिलता के कारण ‘मितव्ययिता’ एवं ‘स्वीकृति’ क सिद्धान्तो का पूरी तरह पालन नहीं हुआ है। सरकार ने पूर्व के सभी बजटों में ‘घाटे की वित्त व्यवस्था (Deficit Financing) की नीति को अपनाया है। अब तो स्थिति यहाँ तक पहुँच गई है कि न केवल केन्द्र सरकार ही अपना अर्थ-प्रबन्ध घाटे के बजट से पूर्ण करती है, अपितु राज्य सरकारों की भी यह एक आदत बन गई है। आज लोगों की करदान क्षमता लगभग समाप्त हो चुकी है और सार्वजनिक व्यय में निरन्तर वृद्धि होती जा रही है। इस प्रकार सार्वजनिक व्यय में ‘लोच की अनुपस्थिति हो गई है। साथ ही करदान क्षमता कम हो जाने के कारण नए नोटों को निर्गमित करने की प्रवृत्ति भी बढ़ी है, फलस्वरूप देश मुद्रा-स्फीति के चंगुल में फँसकर रह गया है। गत दशक में यह स्थिति और भी गम्भीर हो गई है।

यह सच है कि ‘सार्वजनिक व्यय नीति’ उत्पादकता एवं न्यायपूर्ण वितरण के सिद्धान्तों को अपनाने में काफी सफल रही है, फिर भी सार्वजनिक व्यय नीति में सुधार की काफी गुंजाइश है।

प्रश्न 5 – प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष करों में अन्तर कीजिए। इनके सापेक्षित लाभों की व्याख्या कीजिए।

Differentiate between direct and indirect taxes. Discuss their relative advantages. 

उत्तर – प्रत्यक्ष कर एवं अप्रत्यक्ष कर में अन्तर

(Differences between Direct Tax and Indirect Tax) 

प्रत्यक्ष कर तथा अप्रत्यक्ष कर में निम्नलिखित अन्तर हैं-

(1) प्रत्यक्ष कर प्रायः धनी वर्ग पर लगाए जाते हैं, जबकि अप्रत्यक्ष करों का भार

अपेक्षाकृत मध्यम वर्ग पर अधिक पड़ता है।

(2) अप्रत्यक्ष करों का भार दूसरों पर हस्तान्तरित (Transfer) किया जा सकता है,

लेकिन प्रत्यक्ष कर के भार को हस्तान्तरित अथवा विवर्तित (Shift) नहीं किया जा सकता है।

(3) आय व सम्पत्ति पर लगाए गए कर प्रत्यक्ष कर माने जाते हैं, जबकि व्यय

(Expenses) पर लगाए गए कर अप्रत्यक्ष कर माने जाते हैं। 

(4) प्रत्यक्ष कर का कराघात एवं करापात एक ही व्यक्ति पर पड़ता है, जबकि परोक्ष कर का करापात अलग-अलग व्यक्तियों पर पड़ता है। प्रत्यक्ष कर असुविधाजनक होते हैं, जबकि अप्रत्यक्ष कर सविधाजनक होते हैं।

प्रत्यक्ष करों के गुण

(Merits of Direct Taxes) 

प्रत्यक्ष करों के गुण (Merits of Direct Taxes)-प्रत्यक्ष करों के अग्रलिखित गुण हैं-

(1) उत्पादकता (Productivity)-इन करों में उत्पादकता का गुण पाया जाता है क्योंकि देश में आय और सम्पत्ति में वृद्धि होने के साथ-साथ इन करों से प्राप्त आय में भी वृद्धि हो जाती है। इन करों को उत्पादक इस आधार पर भी कहा जा सकता है कि अनेक अप्रत्यक्ष करों के स्थान पर कुछ ही प्रत्यक्ष करों से पर्याप्त आय हो जाती है।

(2) मितव्ययिता (Economy)-प्रत्यक्ष कर मितव्ययी होता है क्योंकि प्रत्यक्ष कर में आय का एक बड़ा अंश स्रोत पर ही प्राप्त कर लिया जाता है। इस कर की राशि प्रत्यक्ष रूप से सरकार को चुकाई जाती है, अत: सरकार का कर-संग्रह व्यय न्यूनतम होता है।

(3) लोच (Elasticity)-सरकार आवश्यकतानुसार प्रत्यक्ष कर की दरों में वृद्धि करके अपनी आय में वृद्धि कर सकती है तथा कर की दरों में कमी करके अपनी आय को कम कर सकती है। इस प्रकार स्पष्ट है कि प्रत्यक्ष कर में लोच का गुण विद्यमान रहता है।

(4) करदेय योग्यता एवं न्यायशीलता (Ability to Pay and Equity)-प्रत्यक्ष कर आय और सम्पत्ति पर आधारित होते हैं, अत: करदेय योग्यता के सिद्धान्त की पूर्ति करते हैं। इनकी दर को प्रगतिशील बनाकर धनी वर्ग से तुलनात्मक रूप से अधिक कर (Tax) लिया जाता है, जिससे न्यायशीलता के सिद्धान्त की पूर्ति होती है।

(5) निश्चितता (Certainty)-प्रत्यक्ष कर निश्चितता के सिद्धान्त का पालन करते हैं। करदाता को यह ज्ञान होता है कि उसे अमुक राशि का अमुक समय पर कर के रूप में भुगतान करना है। दूसरी ओर सरकार को भी कर से प्राप्त होने वाली धनराशि की जानकारी होती है।

(6) सामाजिक जागरूकता (Social Consciousness)-प्रत्यक्ष करों की दर तथा शर्तों आदि से नागरिक परिचित होते हैं। उनका कर-अधिकारियों से प्रत्यक्ष सम्पर्क होता है। उन्हें ज्ञान होता है कि वे कर चुकाकर सरकार की आय में अपना योगदान कर रहे हैं। इस प्रकार करदाता के मन में सामाजिक जागरूकता बढ़ती है।

अप्रत्यक्ष करों के गुण

(Merits of Indirect Taxes) 

अपत्यक्ष करों के गुण (Merits of Indirect Taxes)-अप्रत्यक्ष करों में निम्नलिखित गुण पाए जाते हैं-

प्रत्येक नागरिक द्वारा इन करों में योगदान (Contribution by Everyone in – अप्रत्यक्ष कर प्रत्येक नागरिक से वसूल किए जाते हैं क्योंकि वस्तुओं का उपयोग और धनी दोनों ही वर्गों द्वारा किया जाता है। जो व्यक्ति वस्तु का उपभोग कम करते हैं उन्हें कम कर देना पड़ता है एवं जो व्यक्ति अधिक उपयोग करते हैं उन्हें अधिक कर देना पडता है। इस प्रकार थोड़ा-बहुत सभी व्यक्तियों पर इन करों का भार पड़ता है।

(2) सामाजिक कल्याण के साधक (Encourage Social Welfare)-अप्रत्यक्ष करों द्वारा हानिकारक व नशीली वस्तुओं, जो कि समाज के नैतिक पतन में सहायक होती हैं, के प्रयोग को कम किया जा सकता है जैसे शराब, तम्बाकू, अफीम आदि पर भारी मात्रा में कर लगाकर सरकार इनके प्रयोग को कम करने के लिए बाध्य कर सकती है। अत: अप्रत्यक्ष कर सामाजिक कल्याण के साधक होते हैं।

(3) सुविधाजनक (Convenient)-अप्रत्यक्ष करों की वसूली सरल व सुगम होती है क्योंकि करदाताओं को अप्रत्यक्ष कर की अदायगी का ज्ञान ही नहीं हो पाता जैसे बिक्रीकर वस्तुओं के मूल्य के साथ ही वसूल कर लिया जाता है। सरकार के लिए भी यह कर सुविधाजनक होता है क्योंकि कर की रकम उत्पादकों से सरकार को एक साथ प्राप्त हो जाती है।

(4) लोचदार (Elastic)-कुछ वस्तुएँ ऐसी होती हैं जिनका मूल्य बढ़ जाने पर भी माँग अप्रभावित रहती है, अत: ऐसी वस्तुओं पर सरकार अपनी आवश्यकतानुसार कर को बढ़ाकर या घटाकर अपनी आय को समायोजित कर लेती है। अत: ये कर लोचदार होते हैं। जैसे-नमक अथवा चीनी पर लगाया गया कर।

(5) कर से बचना कठिन (Tax evasion is not easy)-अप्रत्यक्ष करों से बचना अत्यन्त कठिन है क्योंकि प्रत्यक्ष कर की भाँति अप्रत्यक्ष कर अलग से नहीं लिए जाते वरन् ये वस्तु को खरीदते समय वस्तु विक्रेता द्वारा उपभोक्ता से वसूल कर लिए जाते हैं, जिसके कारण प्रत्येक व्यक्ति द्वारा ये कर अवश्य चुकाए जाते हैं। अत: स्पष्ट है कि कोई भी व्यक्ति इन करों से नहीं बच सकता है।

(6) कर प्रणाली के विस्तृत आधार (Broad Basis of Taxation)-किसी एक मद पर भारी कर देश की आर्थिक, राजनीतिक एवं सामाजिक व्यवस्था को प्रभावित कर सकता है, परन्तु अप्रत्यक्ष कर का आधार विस्तृत होने अथवा कर के अनेक साधनों से प्राप्त होने से कर भार किसी एक मद पर नहीं पड़ता, जिसके कारण देश की अर्थव्यवस्था पर बुरा प्रभाव नहीं पड़ता है।

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