B.Com 2nd Year Public Goods Vs Private Goods Notes

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Public Goods Vs Private Goods Notes
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प्रश्न 27- लोक वित्त क्या है? टिप्पणी कीजिए

What is Public Finance ? 

उत्तर- लोकवित्त (राजस्व) का अर्थ एवं परिभाषाएँ (Meaning and Definitions of Public Finance)  ‘राजस्व’ शब्द, ‘राजन् + स्व’ के योग से बना है जिसका अर्थ ‘राजा का धन’ से लगाया जाता है अर्थात् राजा राज-काज सम्बन्धी कार्यों का निष्पादन करने हेतु धन की व्यवस्था किस प्रकार करता है एवं किस प्रकार उस धन का व्यय किया जाता है। आज के युग में राजा से अभिप्राय सरकार (केन्द्रीय, राज्य, स्थानीय) से लगाया जाता है। अत: राजस्व के अन्तर्गत सरकार की वित्त सम्बन्धी क्रियाओं का अध्ययन किया जाता है, जिसमें मुख्य रूप से लोक व्यय, लोक आय, लोक ऋण और वित्तीय प्रशासन को सम्मिलित किया जाता है। प्रमुख अर्थशास्त्रियों ने राजस्व को निम्न प्रकार परिभाषित किया है(1) प्रो० डाल्टन के अनुसार, “राजस्व, राज्य की आय और व्यय तथा इनके एक-दूसरे के साथ समायोजन से सम्बन्धित है।” (2) फिण्डले शिराज के अनुसार, “राजस्व सार्वजनिक संस्थाओं की आय और व्यय से सम्बन्धित सिद्धान्तों का अध्ययन है।” (3) एडम स्मिथ के अनुसार, “राज्य के व्यय और राज्य की आय के स्वभाव एवं __सिद्धान्तों की छानबीन को राजस्व कहते हैं।” निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि “राजस्व अर्थशास्त्र की वह शाखा है जो सरकारों की वित्त व्यवस्था जैसे आय, व्यय, ऋण आदि से सम्बन्धित सिद्धान्तों, नीतियों एवं समस्याओं का अध्ययन करती है।

प्रश्न 28 – प्रगतिशील कर पर टिप्पणी लिखिए। 

Write short note on Progressive tax. 

उत्तर – प्रगतिशील कर (Progressive Tax)  प्रगतिशील कर से अभिप्राय उस कर से है जिसकी दर आय अथवा सम्पत्ति में वृद्धि के साथ-साथ बढ़ती है। इस पद्धति में जिस व्यक्ति की आय जितनी अधिक होगी उससे उतना ही अधिक कर वसूल किया जा सकता है अर्थात् इस कर का भार धनी वर्ग पर अधिक तथा निर्धन वर्ग पर कम पड़ता है। प्रसिद्ध विद्वान् एफ० डब्ल्यू टेलर के शब्दों में, “प्रगतिशील कर वह कर है जिसकी दर में, जैसे-जैसे कर योग्य आय में वृद्धि होती जाती है, भी वृद्धि होती जाती है।” उदाहरणार्थ-सरकार यदि यह घोषित कर दे कि व्यक्ति की आय रू. 50,000 होगी तो कर की दर 10% होगी, आय = रू. 75,000 तक होगी तो कर की दर 15% एवं रू. 1,00,000 तक होगी तो कर की दर 20% होगी। इस प्रकार की संरचना वाले कर को प्रगतिशील कर कहेंगे। वर्तमान समय में प्रगतिशील करों को उचित एवं न्यायपूर्ण माना जाता है।

प्रश्न 29 – ऋण शोधन के लिए पूँजी कर के पक्ष में तर्क दीजिए।

Explain the method of capital levy as a method of debt redemptions.

उत्तर – इसके लिए निम्नलिखित तर्क दिए जा सकते हैं (1) इससे युद्धकालीन लोक ऋणों का सरलता से भुगतान किया जा सकता है। (2) पूँजी कर न्यायपूर्ण है क्योंकि निर्धन वर्ग युद्ध में अपने प्राणों का बलिदान करता है। अत: जिस समृद्ध वर्ग ने युद्धकाल में अत्यधिक लाभ कमाया है, उसे भी कुछ त्याग करना चाहिए। (3) यह कर देय क्षमता के सर्वथा अनुकूल है क्योंकि समृद्ध वर्ग की करदान क्षमता में युद्धकाल में अवश्य ही वृद्धि होती है। (4) पूँजी कर के द्वारा लोक ऋणों के भुगतान का अभिप्राय यह होगा कि अतिरिक्त क्रय-शक्ति प्रचलन में नहीं आएगी, जिससे मुद्रा प्रसार पर रोक लगेगी। (5) इस विधि के परिपालन से एक ओर तो सरकार ऋण मुक्त हो जाएगी वहीं दूसरी ओर आर्थिक विकास तथा समाज कल्याण के कार्यक्रमों में कोई बाधा नहीं आएगी। (6) पूँजी कर का समाज में आय के वितरण पर अनुकल प्रभाव पड़ता है क्योकि इससे आर्थिक विषमताओं में कमी आती है। (7) इस पद्धति के परिपालन से सरकार ऋण-भार से तुरन्त मुक्त हो जाएगी।

प्रश्न 30 – “सार्वजनिक व्यय अपव्यय है।स्पष्ट कीजिए। 

“Public Expenditure is an Extravagance”.

Explain. सार्वजनिक व्यय अपव्यय है”  (Public Expenditure is an Extravagabce)

उतर – पिछली शताब्दी में सार्वजनिक व्यय को महत्त्व नहीं दिया गया क्योंकि उस समय में भ्रामक विचार था कि प्रत्येक सार्वजनिक व्यय एक बरबादी है। प्रसिद्ध विद्वान् एडम स्मिथ का विचार था कि सरकार को अपने कार्य केवल ‘न्याय, पुलिस और सेना’ तक ही सीमित रखने चाहिए तथा यदि वह धन, जो जनता से सरकार के पास आया है, जनता के पास ही रहता तो अधिक उपयोगी सिद्ध होता। उस समय के अर्थशास्त्रियों तथा राजनीतिज्ञों को सार्वजनिक व्ययों की प्रकृति से सम्बन्धित मूल तथ्यों के बारे में भ्रम था, परन्तु इस भ्रम के लिए आज कोई स्थान नहीं है क्योंकि• (1) सार्वजनिक व्यय का एक बड़ा भाग व्यक्तियों के एक समूह से दूसरे समूह को केवल धन का हस्तान्तरण ही है जैसे आन्तरिक ऋणों पर चुकाया गया ब्याज तथा वृद्धावस्था की पेंशन इत्यादि। (2) शिक्षा, स्वास्थ्य इत्यादि पर किया गया व्यय अपव्यय नहीं है वरन् यह तो व्यक्तियों की प्रत्यक्ष रूप से कार्यकुशलता में वृद्धि करता है। (3) सरकार द्वारा किए गए कुछ व्यय जैसे रेलों तथा डाकघरों इत्यादि पर व्यय, देश की सम्पत्ति अर्जन क्षमता को बढ़ाते हैं। (4) सार्वजनिक व्यय प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से उत्पादक हो सकते हैं। कृषि, सिंचाई, रेलवे पर व्यय प्रत्यक्ष रूप से उत्पादक हैं, जबकि शिक्षा, स्वास्थ्य और चिकित्सा पर व्यय अप्रत्यक्ष रूप से उत्पादक होते हैं जबकि प्रतिरक्षा पर व्यय प्रायः अपव्यय कहा जाता है। इस सम्बन्ध में डाल्टन का कथन है, “व्यक्ति बन्दूकों और विस्फोटक पदार्थों को नहीं खा सकते तथा युद्धपोतों की संख्या में वृद्धि आवास समस्या का हल नहीं है।’ परन्तु यह भी सत्य है कि प्रतिरक्षा पर व्यय उस हानि से सुरक्षा प्रदान करता है जो आक्रमण अथवा पराजय के बाद होती है।

प्रश्न 31 – शून्य आधार बजटन क्या है

What is Zero Base Budgeting ? 

उत्तर – शून्य आधार बजटन (Zero Base Budgeting)  शून्य आधार बजटन भावी क्रियाओं के नियोजन के लिए एक क्रान्तिकारी विचार है तथा यह परम्परागत बजटन से काफी भिन्न भी है। परम्परागत बजटन के अन्तर्गत एक बजट अवधि में किसी क्रिया पर किया गया व्यय अगली बजट अवधि के अनुमानों का आधार बनता है। शून्य आधार बजटन में चालू कार्यों एवं नई क्रियाओं में प्रत्याशित परिवर्तनों के लिए बजट राशि में संशोधन किए जाते हैं। शून्य आधार बजटन (ZBB) बजटन के क्षेत्र में एक नया विचार है जो सर्वप्रथम सन् 1969 में टैक्सास इन्स्ट्रमेन्ट्स, अमेरिका में लागू किया गया था। सन् 1977 में अमेरिका के प्रेसीडेन्ट जिमी कार्टर द्वारा इसे संघीय सरकार में लागू किया गया था। ZBB एक ऐसी व्यय नियन्त्रक युक्ति है जिसमें पिछली बजट उपलब्धियों के सन्दर्भ के बिना प्रत्येक विभागीय प्रमुख को व्यय की प्रत्येक मद के लिए कोषों की आवश्यकता का औचित्य बताना पड़ता है तथा उसके अनुरूप ही बजट तैयार करना पड़ता है। उपक्रम की क्रियाओं के लिए बजटन की यह एक ऐसी औपचारिक प्रणाली है जिसके अनुसार प्रत्येक क्रिया पहली बार सम्पादित की जा रही है, अर्थात शन्य आधार से। प्रत्येक क्रिया चाहे वह नई हो या मौजूदा व्यय का औचित्य व मूल्यांकन, उसके अपने गुणों के आधार पर किया जाता है। अत: क्रिया के प्रस्तावक प्रबन्धक को यह सिद्ध करना होता है कि यह क्रिया आवश्यक है तथा उत्पादन मात्रा या परिणामों या विचारित क्रिया की मात्रा को ध्यान में रखते हुए माँगी गई राशि उचित है। शून्य आधार बजटन के अनुसार प्रत्येक प्रबन्धक अपने अधिकार क्षेत्र की बजट अवधि में प्रस्तावित प्रत्येक क्रिया के लिए लागत-लाभ विश्लेषण करेगा। किसी क्रिया को केवल इस आधार पर स्वीकृत नहीं किया जाएगा कि भूतकाल में भी इसे स्वीकृति मिली थी। इस प्रणाली के अन्तर्गत प्रत्येक क्रिया के बहुत से विकल्पों की पहचान की जाती है, उनकी लागत निकाली जाती है और सम्भावित लाभ के सन्दर्भ में उनका मूल्यांकन किया जाता है। वास्तव में शून्य आधार बजटन निगमित नियोजन और बजटन के क्षेत्र में लागत-लाभ विश्लेषण पद्धति का केवल विस्तार मात्र ही है।

प्रश्न 32 – सार्वजनिक आगम के कौन-कौन से स्त्रोत हैं

What are the sources of Public Revenue ? 

उत्तर – लोक आगम के साधन (स्रोत) (Sources of Public Revenue)  सामान्य रूप से सरकार जिन स्रोतों से आय प्राप्त करती हैं, उन्हें दो मुख्य उपविभागों में विभाजित किया जा सकता है

  1. आगम के कर स्रोत (Tax Sources of Revenue) तथा II. आगम के अ-कर स्रोत (Non-tax Sources of Revenue)।
  2. आगम के कर स्रोत (Tax Sources of Revenue)

राज्य की आय का सबसे महत्त्वपूर्ण साधन कर (Tax) है। यह आगम के अन्य सभी स्रोतों में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है। प्रो० सेलिगमैन ने ‘कर’ को इन शब्दों में परिभाषित किया है, “कर एक व्यक्ति का सरकार को अनिवार्य अशदान (Compulsory Contribution) है जो सबके समान हित के लिए किए जाने वाले व्ययों के भुगतान में दिया जाता है और जिसके बदले में कोर्ट विशेष लाभ प्रदान नहीं किया जाता है।” इस परिभाषा के विश्लेषण से स्पष्ट है कि (1) कर राज्य द्वारा लिया जाने वाला एक अनिवार्य अंशदान है. (2) यह सभी नागरिकों मायान्य हितों की रक्षा हेतु किए जाने वाले व्ययों का भगतान है तथा (3) कर का प्राप्त लाभ से कोई प्रत्यक्ष सम्बन्ध नहीं होता। यद्दपि वर्तमान समय में अधिकांश अर्थशास्त्री कर का उद्देश्य केवल आय में वद्धि करना भी कर लोक आगम का एक प्रमुख स्रोत है। यद्यपि वर्तमान समय में अधिकांश अ. नहीं मानते फिर भी कर लोक आगम का एक प्रमुख स्त्रोत हैं।

  1. आगम के अ-कर स्रोत (Non-tax Sources of Revenue) 

अ-कर आय (Non-tax Revenue) के प्रमुख स्रोतों को मुख्यत: चार समूहों में बाँटा जा सकता है (1) व्यावसायिक आय, (2) प्रशासनिक आय, (3) अनुदान एवं उपहार, (4) अन्य साधन।

प्रश्न 33 – एक उदाहरण द्वारा वैट को स्पष्ट कीजिए। 

Explain VAT’ by an illustration. 

उत्तर – वैट का अर्थ (Meaning of VAT)  मूल्य वर्धित कर (VAT) एक ऐसी कर पद्धति है जिसके अनुसार कर केवल उत्पादनप्रक्रिया में की गई मूल्य वृद्धि पर ही लगाया जाता है। उत्पादक व विक्रेता द्वारा ही यह मूल्यवृद्धि की जाती है।

श्री एल० के० झा समिति के अनुसार, “मूल्य वर्धित कर व्यापक रूप से समस्त वस्तुओं एवं सेवाओं पर एक कर है, जिसमें निर्यात वस्तुओं एवं शासकीय सेवाओं को पृथक् कर दिया जाता है। यह कर प्रत्येक स्तर पर व्यवसाय की मूल्य वृद्धि पर जोड़ा जाता है। अतः इसे मूल्य वर्धित कर (VAT) कहते हैं।’ सूत्र रूप में इसे निम्न प्रकार से व्यक्त किया जा सकता है

वर्धित मूल्य = वस्तु का कुल मूल्य – क्रय की गयी कच्ची सामग्री एवं उपर्युक्त में जो कर वर्धित मूल्य में लगाया जाता है, उसे ही मूल्य वर्धित कर (VAT) कहते हैं। उदाहरणार्थ-बाजार में जो डबलरोटी बिकती है, वह गेहूँ के मैदे से तैयार की जाती है। इसके बनने की तीन अवस्थाएँ हैं-गेहूँ, गेहूँ से मैदा तैयार करना और फिर इसे गूंथकर एवं सेककर डबलरोटी तैयार करना। अगर पहले गेहूँ पर कर लगेगा, उसके बाद मैदे पर और फिर डबलरोटी पर तो तीन बार कर के ऊपर कर लगेगा और डबलरोटी के दाम बहुत बढ़ जाएँगे। मूल्य वर्धित कर प्रणाली के अन्तर्गत मैदे पर इसकी कुल कीमत पर कर न लगाकर केवल उस भाग पर कर लगता है जिससे मैदे की कीमत में वृद्धि हुई है। माना गेहूँ रू. 20 प्रति किलो है और मैदा रू. 35 प्रति किलो तो पहले मैदे पर रू. 35 पर कर लगता था पर वैट ‘(VAT) के लाग करने के बाद केवल रू. 15 पर कर लगने लगेगा।

प्रश्न 34 – अप्रत्यक्ष कर क्या है What is Indirect Tax

उत्तर – अप्रत्यक्ष कर से आशय एवं परिभाषा (Meaning and Definitions of Indirect Tax)  अप्रत्यक्ष कर से आशय उन करों से है जिनकी करदेयता (Impact) एक व्यक्ति पर तथा उसका भार दूसरे व्यक्ति पर पड़ता है। अन्य शब्दों में, अप्रत्यक्ष कर को सरकार एक व्यक्ति से वसल करती है परन्तु वह व्यक्ति कर का भार पूर्ण रूप से या आंशिक रूप स दूसरे व्यक्ति अथवा व्यक्तियों पर हस्तान्तरित कर देता है। सामान्यतया अप्रत्यक्ष कर उत्पादकों तथा विक्रेताओं पर लगाए जाते हैं। उत्पादन कर, बिक्रीकर आदि, अप्रत्यक्ष करों के उदाहरण हैं। इन्हें ‘परोक्ष कर’ भी कहा जाता है। अप्रत्यक्ष करों को विभिन्न विद्वानों ने निम्न प्रकार परिभाषित किया है

(1) प्रो० बैस्टेबिल के अनुसार, “अप्रत्यक्ष कर वह है जो कि कभी-कभी उत्पन्न होने वाले विशेष अवसरों पर लगाया जाता है।” (2) जे० एस० मिल के अनुसार, “अप्रत्यक्ष कर वह कर है जो एक व्यक्ति से इस इच्छा और आशा से माँगा जाता है कि वह अपनी क्षतिपूर्ति दूसरे से कर लेगा।

(3) डाल्टन के अनुसार, “अप्रत्यक्ष कर एक व्यक्ति पर लगाया जाता है परन्तु इसका भुगतान पूर्णतया या अंशतया दूसरे व्यक्ति द्वारा किया जाता है।” (4) प्रो० जे० के मेहता के अनुसार, “अप्रत्यक्ष कर वह कर है जिसको भुगतान करने वाला व्यक्ति पूर्णतया या अंशतया अन्य व्यक्तियों पर टाल देता है।

प्रश्न 35 – बजट नियोजन के आधारभूत सिद्धान्त बताइए। 

Give the Fundamental Principles of Budget Planning. 

त्तर – बजट नियोजन के आधारभूत सिद्धान्त निम्नलिखित हैं (1) व्यापकता का सिद्धान्त (Principle of Comprehensiveness)-बजट व्यापक होना चाहिए, अर्थात् बजट में सरकारी आय-व्यय का पूर्ण एवं विस्तृत विवरण होना चाहिए। बजट ऐसा होना चाहिए जिसके द्वारा सरकार की सम्पूर्ण आर्थिक स्थिति की जानकारी प्राप्त हो जाए। (2) एकता का सिद्धान्त (Principle of Unity)-बजट का स्वरूप एकीकृत होना चाहिए अर्थात् (i) सरकार की सभी आय एक सामान्य कोष में रखी जाए, (ii) बजट को सकल आय व व्यय के रूप में दिखाया जाए तथा (iii) बजट की विभिन्न मदों को एक तार्किक, क्रमबद्ध तथा एकीकृत ढंग से प्रस्तुत किया जाए। (3) अनन्यता का सिद्धान्त (Principle of Exclusiveness)-बजट सरकार का वित्तीय लेखा-जोखा है। अत: बजट में केवल वित्तीय पहलू ही सम्मिलित किया जाना चाहिए। (4) विशिष्टता का सिद्धान्त (Principle of Specification)-इस सिद्धान्त से आशय है कि बजट में आय और व्यय की सभी मदें पृथक-पृथक. किन्त स्पष्ट रूप से उल्लिखित हों। (5) यथार्थता का सिद्धान्त (Principle of Reality)-बजट वास्तविक वस्त-स्थिति पर आधारित होना चाहिए अर्थात् बजट के अनुमान काल्पनिक न होकर शुद्ध समंकों व तथ्यों पर आधारित होने चाहिए। (6) वार्षिकता का सिद्धान्त (Principle of Annuality) – बजट सामान्यतः एक वर्ष की अवधि के लिए तैयार किया जाना चाहिए। आज प्रत्येक देश में बजट एक वर्ष के लिए ही बनाया जाता है। (7) लोचता का सिद्धान्त (Principle of Flexibility)-बजट नियोजन में वा होनी चाहिए ताकि बदलती हुई परिस्थितियों एवं आवश्यकताओं के अनुरूप बजट व्यवस्थाओं को संशोधित किया जा सके। (8) कार्यात्मक श्रेष्ठता का सिद्धान्त (Principle of Operational Adequacy)-बजट सरकार की आर्थिक नीतियों एवं योजनाओं के अनुरूप होना चाहिए। बजट में सरकार की विभिन्न आर्थिक समस्याओं के समाधान की क्षमता होनी चाहिए। (9) सन्तुलित बजट का सिद्धान्त (Principle of Balanced Budget)परम्परागत अर्थशास्त्रियों का मत था कि बजट सन्तुलित होने चाहिए। दूसरे शब्दों में, सरकार के आय-व्यय बराबर होने चाहिए, किन्तु आधुनिक समय में इस सिद्धान्त को अधिक महत्त्व नहीं दिया जाता। आज बजट आर्थिक क्षेत्र में वांछित उद्देश्यों की आपूर्ति का सशक्त साधन है। अत: बजट आर्थिक उद्देश्यों की प्राप्ति में समर्थ होना चाहिए।

प्रश्न 36 – संघीय वित्त से क्या तात्पर्य है

What is meant by Federal Finance ?

उत्तर – संघीय वित्त-व्यवस्था से आशय एक ऐसी व्यवस्था से है जिसके अन्तर्गत आय तथा व्यय की सम्पूर्ण मदों को संघ सरकार, राज्य सरकारों तथा स्थानीय निकायों (Local Bodies) के बीच बाँट दिया जाता है। इस व्यवस्था के अन्तर्गत तीनों इकाइयों को अपने-अपने क्षेत्र में आय प्राप्त करने और व्यय करने की पूर्ण स्वतन्त्रता होती है। डॉ० आर०एम० भार्गव के अनुसार, “संघीय वित्त से आशय केन्द्र तथा राज्य सरकारों के वित्तीय सम्बन्धों तथा उन दोनों के बीच समन्वय से लगाया जाता है।”

प्रश्न 37 – निरपेक्ष करदान क्षमता से आप क्या समझते हैं

What do you understand by Absolute Taxable Capacity?

उत्तर – निरपेक्ष करदान क्षमता (Absolute Taxable Capacity)-निरपेक्ष करदान क्षमता से आशय राष्ट्रीय आय के उस भाग से है जो किसी देश की सरकार उत्पादन और कार्यकुशलता पर अनुचित प्रभाव डाले बिना कर के रूप में ले सकती है। अन्य शब्दों में, निरपेक्ष करदान क्षमता करारोपण की अधिकतम सीमा की ओर संकेत करती है परन्तु यह ध्यान रहे कि नागरिकों द्वारा कर चुकाने के बाद उनके द्वारा संचालित आर्थिक क्रियाओं तथा उनकी कार्यकुशलता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ना चाहिए। यदि प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है तो समझना चाहिए कि करदान क्षमता की सीमा समाप्त हो चुकी है। निरपेक्ष करदान क्षमता को पूर्ण करदान क्षमता’ भी कहा जाता है। कुछ विद्वानों ने इसे ‘करारोपण की आर्थिक सीमा’ (Economic Limit of Taxation) अथवा ‘मोड़ क्षमता’ (Diversion Capacity) का नाम भी दिया।

प्रश्न 38 – एक विकासशील अर्थव्यवस्था में सार्वजनिक ऋणों के बढ़ने के क्या कारण हैं?

What are the reasons of increasing debt in developing economy ?

उत्तर – वैश्विक अर्थव्यवस्था में व्यापक आर्थिक विषमताएँ पायी जाती हैं। उपलब्ध आँकड़ों के अनुसार, विश्व की कुल जनसंख्या का 1/5 भाग विकसित देशों में निवास करता है, जबकि ये देश विश्व की कुल उपज के 4/5 भाग का उपयोग करते हैं। इनकी प्रति व्यक्ति आय बहुत ऊँची है और जनसंख्या वृद्धि की दर कम। इसके विपरीत, जनसंख्या के भारी दबाव के कारण विकासशील देशों में प्रति व्यक्ति आय का स्तर बहुत नीचा है, जबकि उपयोग प्रवृत्ति ऊँची है। कृषि एवं उद्योग क्षेत्र में उत्पादन तकनीकी परम्परागत है, जिसके कारण उत्पादकता का स्तर निम्न है। प्राकृतिक संसाधनों का सही ढंग से विदोहन नहीं हुआ है और पूँजी की कमी आर्थिक विकास के मार्ग में एक बड़ा अवरोध है। आय, बचत एवं पूँजी निर्माण की कम दर के कारण उत्पादन परियोजनाएँ पूरी नहीं हो पाती हैं। निजी क्षेत्र ‘लाभ’ के उद्देश्य से कार्य करता है और ऐसे क्षेत्रों में विनियोजन नहीं करता है, फलतः आधारिक संरचना का विकास नहीं हो पाता है। इसका उत्तरदायित्व सरकार को ही वहन करना पड़ता है, जो अपने ही साधनों से आर्थिक विकास के बड़े दायित्व को ठीक प्रकार नहीं निभा पाती, फलतः इसे ऋण लेना पड़ता है।

प्रश्न 39 – हीनार्थ प्रबन्धन के कुप्रभावों पर नियन्त्रण के उपाय बताइए। 

Measures to check Adverse Effects of Deficit Financing. 

उत्तर – हीनार्थ प्रबन्धन के कुप्रभावों पर नियन्त्रण के उपाय

(Measures to Check Adverse Effects of Deficit Financing) हीनार्थ प्रबन्धन के कुप्रभावों को रोकने के लिए निम्नलिखित उपाय किए जाने चाहिए- (1) देश में साख नियन्त्रण की व्यवस्था को प्रभावशाली बनाया जाए। (2) ऐसी परिस्थितियों को प्राथमिकता दी जाए जो शीघ्र परिणामकारी हों और जिनसे उत्पादन में वृद्धि करके मुद्रा-प्रसार की प्रवृत्ति को नियन्त्रित किया जा सके। (3) हीनार्थ प्रबन्धन से सृजित मुद्रा का अधिकांश प्रयोग उत्पादक उद्देश्यों के लिए किया जाना चाहिए। (4) हीनार्थ प्रबन्धन से चलन में आयी अतिरिक्त मुद्रा को अनिवार्य बचत, लोक ऋण या उचित करारोपण के माध्यम से सरकार को प्राप्त कर लेना चाहिए। का जीवन उपयोगी वस्तुओं की पर्याप्त पूर्ति बनाए रखी जाए जिससे सामान्य जनता पर मुद्रा-प्रसार का अधिक प्रभाव न पड़े।


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