B.Com 3rd Year Issue Forfeiture And Re-Issue Of Shares Notes

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कम्पनी का आशय (Meaning of Company) 

कम्पनी विधान द्वारा निर्मित एक कृत्रिम व्यक्ति है। वह एक पृथक् वैधानिक अस्तित्व रखती है। इसे अविच्छिन्न उत्तराधिकार प्राप्त है और इसकी एक सार्वमुद्रा होती है। कम्पनी के सदस्यों का दायित्व सीमित होता है। कम्पनी अधिनियम, 2013 की धारा 2(20) के अनुसार, “कम्पनी उसे कहते हैं जिसका समामेलन इस अधिनियम के अधीन अथवा इसके पूर्व के किसी कम्पनी अधिनियम के अधीन हुआ है।” निजी/प्राइवेट कम्पनी (Private Company) कम्पनी अधिनियम, 2013 की धारा 2(68) के अनुसार “प्राइवेट कम्पनी का आशय एक ऐसी कम्पनी से है जो अपने अन्तर्नियमों द्वारा (अ) अपने अंशों के (यदि कोई हों) हस्तान्तरण पर प्रतिबन्ध लगाती है। (ब) अपने सदस्यों की संख्या को 200 (इससे पूर्व यह संख्या 50 थी) तक सीमित रखती है। और (स) कम्पनी के अंशों और ऋणपत्रों के लिए जनता को निमन्त्रण नहीं देती है।” निजी कम्पनी की स्थापना केवल दो सदस्यों से हो सकती है। कम्पनी अधिनियम, 2013 के अनुसार निजी कम्पनी ‘एक व्यक्ति कम्पनी’ (One Person Company) के रूप में भी समामेलित करायी जा सकती है। सार्वजनिक कम्पनी (Public Company) कम्पनी अधिनियम, 2013 की धारा 2(71) के अनुसार, पब्लिक कम्पनी से आशय एक ऐसी कम्पनी से है, जो एक प्राइवेट कम्पनी नहीं है एवं जो निर्धारित की गई न्यूनतम चुकता पूँजी (Minimum Paid-up Capital) रखती है। सार्वजनिक कम्पनी में कम-से-कम 7 सदस्यों का होना अनिवार्य है। सदस्यों की अधिकतम संख्या पर कोई प्रतिबन्ध नहीं है।

अंश पूंजी (Share Capital) 

पूँजी का विवरण – प्रत्येक कम्पनी के पार्षद सीमानियम में उसकी पूँजी लिखी जाती है। उसमें यह भी दिखाया जाता है कि पूँजी कितने अंशों में बँटी हुई है और अंश का कितना मूल्य है। कम्पनी की अंश पूँजी के प्रकार – कम्पनी की अंश पूँजी विभिन्न प्रकार की होती है जिसे नीचे समझाया गया है – (1) अधिकत, अंकित (नाममात्र) या पँजीकृत पूँजी (Authorized, Nominal or Registered Capital)-जिस पूँजी से किसी कम्पनी की रजिस्ट्री की जाती है उसे ‘अधिकृत पूँजी’ कहते हैं। इसका उल्लेख पार्षद सीमानियम के पूँजी वाक्य (Capital Clause) में किया जाता है। दूसरे शब्दों में, यह वह पूँजी होती है जो एक कम्पनी अपने पूरे जीवनकाल में अधिक से अधिक एकत्रित कर सकती है। कम्पनी अधिनियम, 2013 की धारा 2(8) के अनुसार, “अधिकृत पूँजी या अंकित पूँजी से आशय ऐसी पूँजी से है जो कम्पनी के पार्षद सीमानियम द्वारा अधिकृत कम्पनी की अंश पूँजी की अधिकतम राशि हो।” (2) निर्गमित पूँजी (Issued Capital)—यह अधिकृत पूँजी का वह भाग है, जो जनता के लेने के लिए निर्गमित किया जाता है। कम्पनी अधिनियम, 2013 की धारा 2(50) के अनुसार, “निर्गमित पूँजी से आशय ऐसी पूँजी से है जिसे कम्पनी द्वारा समय-समय पर अभिदान (Subcription) के लिए निर्गमित किया गया हो।” (3) प्रार्थित या अभिदत्त पूँजी (Subscribed Capital)-यह निर्गमित पूँजी का वह भाग है जिसे लेने के लिए जनता से आवेदन-पत्र/प्रार्थना-पत्र प्राप्त हुए हों। कम्पनी अधिनियम, 2013 की धारा 2(86) के अनुसार, “प्रार्थित या अभिदत्त पूँजी से आशय पूँजी के उस भाग से है जो समय पर (Time being) कम्पनी के सदस्यों द्वारा प्रार्थित या अभिदत्त की गई हो।” (4) माँगी हुई या याचित पूँजी (Called-up Capital)—कम्पनी द्वारा आबंटित अंशों के सम्बन्ध में जितनी राशि माँग ली जाती है, उसे ‘मॉगी हुई पूँजी’ कहा जाता है। __ कम्पनी अधिनियम, 2013 की धारा 2(15) के अनुसार, “माँगी गई पूँजी से आशय पूँजी के उस भाग से है, जिसे भुगतान हेतु माँगा गया हो।” (5) न माँगी हुई या अयाचित पूँजी (Uncalled Capital)-प्रार्थित पूँजी के जिस भाग के लिए कम्पनी द्वारा माँग नहीं की जाती है, उसे ‘न माँगी हुई पूँजी’ कहा जाता है। (6) चकता पूँजी (Paid-up Capital) ‘माँगी हुई पूँजी’ का वह भाग जो अंशधारियों द्वारा भगतात कर दिया जाता है, ‘चुकता पूँजी’ कहलाता है। चुकता पूँजी ही अंश पूँजी की वास्तविक राशि है। माँगी गई पंजी (याचित पूँजी) में से अदत्त/अवशिष्ट याचना की राशि घटा देने पर चुकता पूँजी ज्ञात हो जाती है। (7) संचित पूँजी (Reserve Capital) न माँगी गई पूँजी के उस भाग को जो भविष्य में समापन के समय माँगने के लिए सुरक्षित कर दिया जाता है, संचित पूँजी कहते हैं। कम्पनी अधिनियम, 2013 की धारा 65 के अनुसार यदि एक अंश पूँजी वाली असीमित दायित्व वाली कम्पनी, सीमित दायित्व वाली कम्पनी में परिवर्तित होती है तो वह संचित अंश पूँजी रख सकती है। अंश (Shares)  एक अंश पूँजी वाली कम्पनी की पूँजी को एक निश्चित राशि के जिन हिस्सों में विभाजित किया जाता है. उन्हें ‘अंश’ कहते हैं; जैसे यदि एक कम्पनी की पूँजी 10,000 रू. है और इसे दस-दस रू. के 1,000 हिस्सों में बाँटा गया है, तो दस के इस प्रत्येक हिस्से को ‘अंश’ कहा जायेगा। कम्पनी के अंश चल सम्पत्ति हैं जिन्हें कम्पनी के पार्षद अन्तर्नियमों में वर्णित विधि से हस्तान्तरित किया जा सकता है। अंश क्रय करने वाले को अंशधारी कहते हैं। यह कम्पनी के स्वामी माने जाते हैं एवं इन्हें लाभांश प्राप्त होता है। लाभांश चालू वर्ष के लाभों में से ही दिया जाता है। अंशों के भेद (Kinds of Shares)  (1) पूर्वाधिकार अंश (Preference Shares) कम्पनी अधिनियम, 2013 की धारा 43 के अनुसार, “अंशों द्वारा सीमित किसी कम्पनी की दशा में पूर्वाधिकारी अंश पूँजी कम्पनी द्वारा निर्गमित अंश पूँजी का वह भाग है जिस पर (अ) लाभांश के भुगतान में या/तथा (ब) कम्पनी के समापन पर पूँजी के भुगतान में पूर्वाधिकार होता है।” लाभांश सम्बन्धी पूर्वाधिकार का आशय यह है कि जब किसी कम्पनी का लाभ अंशधारियों में बाँटा जाता है तो इस श्रेणी के अंशधारियों को सर्वप्रथम एक निश्चित दर से लाभांश पाने का अधिकार होता है। पूँजी के पुनर्भुगतान के सम्बन्ध में पूर्वाधिकार का आशय यह है कि जब कम्पनी का विघटन होता है उस समय कम्पनी द्वारा विभिन्न लेनदारों को तथा अन्य बाहरी व्यक्तियों को (जिन्हें कि कम्पनी को भुगतान करना था) भुगतान करने के बाद यदि कोई राशि शेष बचती है, तो अन्य अंशधारियों की तुलना में सर्वप्रथम इन अंशधारियों की पूँजी को लौटाया जायेगा। इनके भुगतान के बाद बची हुई रकम में से ही अन्य प्रकार के अंशधारियों का भुगतान किया जायेगा। पूर्वाधिकार अंशाधारियों को कम्पनी के प्रबन्ध संचालन में भाग लेने का अधिकार नहीं होता है एवं केवल विशेष स्थिति में मत देने का अधिकार है। पूर्वाधिकार अंशों का निर्गमन (Issue of PreferenceShares)-कम्पनी अधिनियम, 2013 की धारा 55 के अनुसार, (1) इस अधिनियम के लागू होने के पश्चात् अंशों द्वारा सीमित कोई कम्पनी ऐसे पूर्वाधिकार अंशों का निर्गमन नहीं कर सकती जो अशोध्य हों अर्थात् अब केवल शोध्य पूर्वाधिकार अंश ही निर्गमित किए जा सकते हैं। (2) अंशों द्वारा सीमित कम्पनी, यदि इसका पार्षद अन्तर्नियम अधिकृत करता है, ऐसे पूर्वाधिकार अंश निर्गत कर सकती है जो निर्गमन की तिथि से अधिकतम 20 वर्ष की अवधि के अन्तर्गत शोध्य हों। आधारभूत अवसंरचना परियोजनाओं की दशा में कम्पनी 20 वर्ष से अधिक अवधि में शोध्य पूर्वाधिकार अंश निर्गमित कर सकती है, परन्तु यह अवधि 30 वर्ष से अधिक नहीं हो सकती। इसमें भी 20 वर्ष के पश्चात् अर्थात् 21 वें वर्ष से प्रतिवर्ष ऐसे अंशों के कम-से-कम 10% का पूर्वाधिकार अंशधारियों के विकल्प पर आनुपातिक आधार पर शोधन किया जायेगा। पूर्वाधिकार अंशों के भेद (Types of Preference Shares)-(i) असंचयी पूर्वाधिकार अंश-इन अंशों पर अन्य अंशों की अपेक्षा सर्वप्रथम एक निर्धारित दर से लाभांश दिया जाता है, परन्तु यह लाभांश उसी वर्ष दिया जायेगा जिस वर्ष कम्पनी को पर्याप्त लाभ होगा। जिस वर्ष कम्पनी को लाभ नहीं होगा उस वर्ष उन्हें कोई लाभांश नहीं दिया जायेगा। (ii) संचयी पूर्वाधिकार अंश – इन्हें यह अधिकार है कि यदि कम्पनी को किसी वर्ष लाभ न हो तो वे उस वर्ष वाले बकाया लाभ को अगले वर्ष वाले लाभांश में से प्राप्त कर सकते हैं। जब तक कम्पनी के अन्तर्नियमों में अन्यथा न कहा गया हो पूर्वाधिकार अंशों को संचयी पूर्वाधिकार अंश ही माना जाता है। (iii) परिवर्तनीय पूर्वाधिकार अंश – जिन पूर्वाधिकार अंशधारियों को यह अधिकार दिया जाता है कि वे (यदि चाहें) अपने अंशों को एक निश्चित समय के अन्दर या एक निश्चित तारीख तक समता अंशों में बदल सकते हैं, उन्हें ‘परिवर्तनीय पूर्वाधिकार अंश’ कहा जाता है। (iv) अपरिवर्तनीय पूर्वाधिकार अंश – जिन पूर्वाधिकार अंशधारियों को यह अधिकार नहीं दिया जाता है कि वे अपने अंशों को समता अंशों में बदल लें, उन्हें ‘अपरिवर्तनीय पूर्वाधिकार अंश’ कहा जाता है। (v) विमोचनशील या शोध्य पूर्वाधिकार अंश – एक अंश सीमित कम्पनी (यदि अन्तर्नियमों से अधिकृत हो) ऐसे पूर्वाधिकार अंश निर्गमित कर सकती है जिसका धन कुछ शर्तों के अनुसार लौटाया जा सके। (vi) अविमोचनशील या अशोध्य पूर्वाधिकार अंश – कम्पनी के वे अंश जिनका विमोचन नहीं किया जाता है, ‘अविमोचनशील पूर्वाधिकार अंश’ कहे जाते हैं। (vii) भागयुक्त पूर्वाधिकार अंश – इन अंशों को निर्धारित दर से लाभांश मिलने के बाद कम्पनी को अतिरिक्त लाभ (यदि हो) में से हिस्सा बाँटने का अधिकार होता है। (viii) अभागयुक्त पूर्वाधिकार अंश – इन अंशधारियों को केवल निश्चित दर पर ही कम्पनी के विभाजन योग्य लाभ में से लाभांश मिलता है। कम्पनी के अतिरिक्त लाभ में इन्हें कोई भाग नहीं मिलता है। (2) समता अंश (Equity Shares) समता अंश का आशय कम्पनी के उन अंशों से है जो पूर्वाधिकार अंश नहीं हैं। इन्हें लाभांश कम्पनी के विभाजन योग्य लाभ में से पूर्वाधिकार अंशधारियों को लाभांश बाँटने के बाद ही मिलता है और यदि पूर्वाधिकार अंशधारियों को लाभांश बाँटने के बाद कोई लाभ नहीं बचता है तो इन्हें कुछ भी लाभांश के रूप में नहीं मिलता। इन्हें किस दर पर लाभांश देना चाहिए, यह संचालकों द्वारा तय किया जाता है। कम्पनी के विघटन पर पूर्वाधिकार अंशधारियों की पूँजी वापस करने के बाद यदि राशि बचे तभी इन अंशधारियों की पूँजी लौटायी जायेगी। समता अंशधारी कम्पनी के प्रबन्ध में सक्रिय भाग लेते हैं, मताधिकार के द्वारा संचालक मण्डल चुनते हैं और वार्षिक सामान्य सभा के द्वारा कम्पनी पर नियन्त्रण रखते हैं। वस्तुत: समता अंशधारी कम्पनी के वास्तविक स्वामी होते हैं। अंश निर्गमन की प्रक्रिया (Procedure for Issue of Shares)  किसी भी कम्पनी को अंशों का निर्गमन करने हेतु भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (Securities and Exchange Board of India)/सेबी (SEBI) द्वारा इस सम्बन्ध में जारी दिशा-निर्देशों का पालन करना पड़ता है। एक सार्वजनिक कम्पनी द्वारा अंशों के निर्गमन के सम्बन्ध में निम्नलिखित प्रक्रिया अपनाई जाती है –

  1. प्रविवरण का निर्गमन (Issue of Prospectus), 
  2. अंशों के लिए आवेदन-पत्र प्राप्त करना (Receipt of Applications for Shares), 
  3. अंशों का आबंटन करना (Allotment of Shares), तथा 
  4. अंशों पर मॉग/याचना राशि प्राप्त करना (Receipt of Call Money)|

अंशों का निजी विक्रय (Private Placement of Shares)-कम्पनी अधिनियम, 2013 की धारा 42 के अनुसार कोई भी कम्पनी निजी रूप से भी अंशों का विक्रय कर सकती है। अंशों के निजी विक्रय की दशा में इन अंशों का धारक व्यक्ति इन अंशों को आबंटन की तिथि से कम से कम 3 वर्ष तक नहीं बेच सकता। इस अवधि को प्रतिबन्धित अवधि (Lock-in Period) कहा जाता है। अंशों का आबंटन (Allotment of Shares)  जनता से अंशों को लेने के लिए आवेदन-पत्र प्राप्त हो जाने के बाद संचालक अंशों का आबंटन करते हैं। एक निजी कम्पनी के लिए अंशों के आबंटन से सम्बन्धित कोई प्रतिबन्ध नहीं है जबकि प्रत्येक सार्वजनिक कम्पनी को अंशों के आबंटन के पूर्व प्रविवरण में उल्लेखित न्यूनतम अभिदान (Minimum Subscription) राशि अवश्य प्राप्त कर लेनी चाहिए। कम्पनी अधिनियम, 2013 की धारा 39(2) के अनुसार प्रत्येक अंश के प्रार्थना-पत्र/आवेदन पर देय राशि अंश के अंकित मूल्य के 5% से कम नहीं होनी चाहिए, परन्तु सेबी (SEBI) के निर्देशों के अनुसार यह राशि अंश के निर्गमित मूल्य के 25% से कम नहीं हो सकती है। न्यूनतम अभिदान (Minimum Subscription)-कम्पनी अधिनियम, 2013 की धारा 39(1) के अनुसार कोई भी कम्पनी जनता को अपनी प्रतिभूतियों (अंशों) का आबंटन उस समय तक नहीं कर सकती है जब तक कि उसे प्रविवरण में लिखी गई न्यूनतम अभिदान की राशि प्राप्त न हो जाये। सेबी (SEBI) के दिशा-निर्देशों के अनुसार न्यूनतम अभिदान की राशि कुल निर्गमन राशि की 90% निर्धारित की गई है एवं एक सार्वजनिक कम्पनी के सम-मूल्य पर निर्गमन की स्थिति में एक आवेदक द्वारा आवेदित अंशों की न्यूनतम संख्या 200 अंश होगी जबकि अंशों का अंकित मूल्य 10 रू. हो। धारा 39(3) के अनुसार कम्पनी को न्यूनतम अभिदान राशि प्रविवरण के निर्गमन की तिथि के 30 दिन के अन्दर ही प्राप्त कर लेनी चाहिए। यदि कम्पनी इस अवधि में न्यूनतम अभिदान राशि प्राप्त नहीं कर पाती है तो कम्पनी अंशों का आबंटन नहीं कर सकती है और अगले 15 दिन के अन्दर ही सम्पूर्ण आवेदन राशि वापिस कर देनी चाहिए अन्यथा 15 दिन की समाप्ति के पश्चात् दोषी संचालकों व अधिकारियों को विलम्ब अवधि हेतु 15% वार्षिक दर से ब्याज देना होगा। याचनाएँ (Calls)  वर्तमान काल में कम्पनियाँ अपनी पूंजी की सारी रकम साधारणतया एक साथ प्राप्त नहीं करती हैं. वरन कळ रकम आवेदन-पत्र के साथ, कुछ आबंटन के समय और शेष रकम आवश्यकता पड़ने पर माँगती रहती है। आबंटन के बाद पूँजी की जो रकम अंशधारियों से मांगी जाती है, उसे याचना (Call) करना कहते हैं। यदि पार्षद अन्तर्नियमों में प्रतिबन्ध न हो तो कम्पनी के संचालक पूँजी की सम्पूर्ण राशि अंशधारियों से एक साथ वसल कर सकते हैं। याचनाएँ करते समय कम्पनी के अन्तर्नियमों (Articles of Association) का पालन अवश्य ही करना चाहिये। अन्तर्नियमों के अभाव में कम्पनी अधिनियम 2013 में दी गई SecheduleI की Table F के प्रावधान लागू हो जाएँगे जो निम्नलिखित हैं –

  1. कोई भी याचना अंश के अंकित मूल्य के 25% से अधिक नहीं होनी चाहिए।
  2. यदि निर्गमन 500 करोड़ रू. से कम का है तो अंशों पर सभी राशियाँ आबंटन की तिथि के 12 महीने के अन्दर ही माँग लेनी चाहिये।
  3. प्रत्येक याचना के मध्य कम से कम एक माह का अन्तर अवश्य होना चाहिए। 
  4. अंशधारी को याचना चुकाने के लिए कम से कम 14 दिन का नोटिस अवश्य दिया जाना चाहिए। 
  5. एक ही वर्ग के सभी अंशों पर समान रूप से याचना की जानी चाहिए।
  6. अंशधारी को याचना चुकाने के लिए दिए गए नोटिस में याचना की राशि, भुगतान की विधि, याचना राशि भेजने का पता और याचना भेजने की अन्तिम तिथि स्पष्ट रूप से दी होनी चाहिए।

अंशों का निर्गमन (Issue of Shares)  अंशों के निर्गमन और आबंटन के सम्बन्ध में निम्नांकित लेखे किये जाते हैं- नोट – अंश आवेदन खाता (Share Application A/c), अंश आबंटन खाता (Share Allotment A/C) एवं अंश प्रथम/द्वितीय/अन्तिम याचना खाता व्यक्तिगत खाते (Personal Account) की प्रकृति के हैं क्योंकि यह खाते अंशधारियों से रकम माँगने एवं प्राप्त करने के लिए ही खोले जाते हैं। एक प्रकार से यह खाते अंशधारियों की ही अभिव्यक्ति करते हैं। अंशों का निर्गमन – अंशों का निर्गमन निम्नांकित प्रकार से हो सकता है – (1) सम-मूल्य पर निर्गमन (Issue at Par)-एक अंश का इसके अंकित मूल्य पर निर्गमन; जैसे-10 रू. के अंश का 10 रू. पर निर्गमन। (2) अंशों का प्रीमियम पर निर्गमन (Issue of Shares at a Premium)-जब अंश इसके अंकित मूल्य से अधिक पर निर्गमित किये जाते हैं तो इस आधिक्य की राशि को प्रीमियम कहा जाता है। जैसे, 10 रुपये के अंश को 12 रू. पर निर्गमित करना है तो 2 रू. प्रीमियम है। कम्पनी अधिनियम, 2013 की अनुसूची III के अनुसार प्रीमियम को प्रतिभूति प्रीमियम संचय (Securities Premium Reserve) खाते में क्रेडिट किया जायेगा। यह नाममात्र का खाता (Nominal Account) है। प्रीमियम की राशि आयगत प्राप्ति (Revenue receipt) नहीं है बल्कि यह कम्पनी का पूँजीगत लाभ (Capital Profit) है। इसे लाभांश की तरह नहीं बाँटा जा सकता है। इसे लाभ-हानि खाते में क्रेडिट नहीं किया जाता है। यह राशि कम्पनी अधिनियम, 1956 की धारा 78 एवं कम्पनी अधिनियम, 2013 का धारा 52(2) के अनुसार अग्रलिखित कार्यों के लिए ही प्रयोग की जा सकती है – (i) कम्पनी के अनिर्गमित अंशों को कम्पनी के सदस्यों में चुकता बोनस अंशों के रूप में निर्गमित करने के लिए। (ii) कम्पनी के प्रारम्भिक व्ययों को अपलिखित करने के लिए।  (iii) कम्पनी के अंशों या ऋणपत्रों के निर्गमन पर किये हुए व्ययों, कमीशन या छूट को अपलिखित करने के लिए। (iv) कम्पनी के विमोचनशील पूर्वाधिकार अंशों या ऋणपत्रों के शोधन पर दिये जाने वाले प्रीमियम का प्रबन्ध करने के लिए। (v) अपने स्वयं के अंशों या प्रतिभूतियों को क्रय करने के लिए। अंशों का प्रीमियम पर निर्गमन नकदी के लिए या अन्य प्रतिफल के रूप में भी हो सकता है। सेबी के दिशा-निर्देश के अन्तर्गत अनुमत कम्पनियाँ ही अपने अंश प्रीमियम पर निर्गमित कर सकती हैं। अंश प्रीमियम की राशि का निर्धारण अंश निर्गमित करने वाली कम्पनी के द्वारा ही किया जाता है, इस सम्बन्ध में कोई वैधानिक प्रतिबन्ध नहीं है। प्रतिभूति प्रीमियम खाते’ की राशि कम्पनी के चिढे में दायित्व पक्ष की ओर’ संचय एवं आधिक्य’ (Reserve and Surplus) शीर्षक के अन्तर्गत दिखलाते हैं। अंश प्रीमियम की राशि का लेखा – अंश प्रीमियम की राशि के लेखा के लिए आबंटन खाता या याचना खाता (यदि प्रीमियम याचना के साथ लिया जाता है।) डेबिट किया जाता है और प्रतिभूति प्रीमियम संचय खाता क्रेडिट किया जायेगा।  Share Allotment/Call A/c Dr. To Share Capital A/C To Security Premium Reserve A/C  (3) अंशों का कटौती पर निर्गमन (Issue of Shares ata Discount)-यदि अंश को उसके अंकित मूल्य से कम पर निर्गमित किया जाता है तो उसे अंशों का कटौती पर निर्गमन कहते हैं, जैसे 10 रू. के अंश का 8 रू. पर निर्गमन। यहाँ 2 रू. कटौती है। कम्पनी अधिनियम, 2013 की धारा 53 (जो 1.4.2014 से लागू की गई है) में अंशों के बट्टे कटौती पर निर्गमन के सम्बन्ध में प्रतिबन्ध लगा दिया है। केवल स्वीट/श्रम-साध्य समता अंशों (Sweat Equity Shares) को ही कटौती पर निर्गमित किया जा सकता है जिन्हें कि कम्पनी अधिनियम 2013 की धारा 54 के अनुसार कम्पनी अपने कर्मचारियों अथवा संचालकों को उनकी सेवाओं के बदले निर्गमित करती है। किसी कम्पनी द्वारा अंशों का कटौती पर निर्गमन व्यर्थ माना जाएगा। धारा 53(3) के अनुसार जहाँ कोई कम्पनी इस धारा के प्रावधानों का उल्लंघन करती है तो कम्पनी पर न्यूनतम 1 लाख से अधिकतम 5 लाख तक जुर्माना लगाया जा सकता है और कम्पनी के प्रत्येक दोषी अधिकारी को 6 माह तक की कारावास की सजा अथवा 1 लाख से 5 लाख ₹ तक का जुर्माना अथवा दोनों दण्ड दिए जा सकते हैं। अंशों की कटौती के सम्बन्ध में लेखा – अंश कटौती खाता डेबिट और अंश पूँजी खाता क्रेडिट किया जाता है। यह लेखा अधिकतर आबंटन (Allotment) के साथ होता है। Share Allotment/Call A/c Dr. Discount on issue of Shares A/C Dr. Dr. To Share Capital A/C  नोट – अंशों के निर्गमन पर बट्टा/कटौती एक पूँजीगत हानि है। इसे कम्पनी के पूँजीगत लाभों अथवा समामेलन से पूर्व के लाभों में से अपलिखित किया जा सकता है। अंशों के निर्गमन पर दिया गया बट्टा जब तक अपलिखित नहीं कर दिया जाता तब तक चिढे में अन्य गैर चालू सम्पत्ति (Other Non-current Assets) शीर्षक के अन्तर्गत दिखाया जायेगा। स्वैट समता अंशों का निर्गमन (Issue of Sweat Equity Shares) – स्वैट समता अंशों का आशय उन समता अंशों से होता है, जो कम्पनी अपने कर्मचारियों को या संचालकों को कटौती पर अथवा नकदी के अतिरिक्त अन्य प्रतिफल के बदले [जैसे, तकनीकी ज्ञान (Know-how) के बदले में या बौद्धिक सम्पत्ति का अधिकार उपलब्ध कराने के बदले में निर्गमित करती है। कम्पनी अधिनियम, 2013 कीधारा 54 के अनुसार निम्नलिखित शर्तों के पूरा होने पर ही स्वैट समता अंश निर्गमित किये जा सकते हैं (i) कम्पनी द्वारा विशेष प्रस्ताव पारित कर स्वैट समता अंश निर्गमित करने का अधिकार प्राप्त कर लिया गया हो।  (ii) प्रस्ताव में अंशों की संख्या, वर्तमान बाजार मूल्य, प्रतिफल यदि कोई है और जिन संचालकों या कर्मचारियों को इन अंशों का निर्गमन किया जाना है उनकी श्रेणी या श्रेणियों का स्पष्ट उल्लेख हो। (iii) कम्पनी को व्यापार प्रारम्भ करने का अधिकार प्राप्त किए हुए एक वर्ष पूरा हो चुका हो।  (iv) स्वैट समता अंशों को SEBI के नियमों के अनुसार निर्गमित किया जा रहा हो। सेबी (SEBI) के अनुसार स्वैट समता अंशों को निर्गमित करने की तिथि से 3 वर्ष के अन्दर बेचा नहीं जा सकता है। तीन वर्ष की इस अवधि को बन्द अवधि (Lock-in-Period) कहते हैं। अवशिष्ट याचना (Calls in Arrears)-जब कुछ अंशधारी याचना किया हुआ धन कम्पनी को नहीं देते हैं तो जो रकम उनके द्वारा भुगतान होने से रह जाती है उसे अवशिष्ट याचना कहा जाता है। इस खाते की बाकी चिट्ठ में दायित्व की ओर पूँजी में से घटाकर दिखायी जाती है। अवशिष्ट याचना की राशि पर लाभांश नहीं दिया जाता है। अवशिष्ट याचना की राशि पर ब्याज (Interest on the Amount of Calls in Arrears)-कम्पनी को अदत्त/अवशिष्ट याचना पर याचना की देय तिथि से वास्तविक भुगतान की तिथि तक की अवधि का अन्तर्नियमों में वर्णित दर से ब्याज चार्ज करने का अधिकार है। परन्तु यदि अन्तर्नियमों में वर्णित नहीं है तो कम्पनी अधिनियम 2013 की Schedule I की Table F लागू हो जाएगी जिसके अनुसार अधिकतम 10% वार्षिक दर से ब्याज चार्ज किया जाएगा। परन्तु संचालकों को अधिकार है कि वह अदत्त याचनाओं पर ब्याज से पूर्णतया अथवा आंशिक छूट दे सकते हैं। अवशिष्ट याचना की राशि पर ब्याज आयगत लाभ है अत: इसे लाभ-हानि विवरण में हस्तान्तरित किया जाता है। अग्रिम याचना का भुगतान (Calls Paid in Advance) _ जब कोई अंशधारी अपने धारित अंशों पर किसी याचना का, कम्पनी द्वारा माँग करने से पूर्व ही भुगतान कर देता है तो कम्पनी द्वारा अग्रिम में प्राप्त याचना की राशि अग्रिम याचना कहलाती है। कम्पनी अधिनियम 2013 की धारा 50 के अनुसार कम्पनी के अन्तर्नियमों में व्यवस्था होने पर ही कम्पनी अग्रिम याचनाओं की राशि स्वीकार कर सकती है। अग्रिम याचना राशि पर लाभांश (Dividend) नहीं दिया जाता है क्योंकि यह राशि अंश पूँजी का हिस्सा नहीं होती है। अग्रिम याचना के सम्बन्ध में निम्नलिखित जर्नल प्रविष्टियाँ की जाती हैं-

  1. अग्रिम याचना की राशि प्राप्त होने पर

Bank A/C                                          Dr. To Calls-in-Advance A/C 

  1. अग्रिम याचना की राशि को सम्बन्धित याचना की प्राप्ति की प्रविष्टि के साथ समायोजित करने पर-

Calls-in-Advance A/C                       Dr. To Relevant Share Call Alc  आर्थिक चिठे में प्रदर्शन (Presentation in Balance Sheet)-अग्रिम याचना खाते के शेष को कम्पनी के आर्थिक चिट्ठे के “समता और दायित्व” पक्ष में ‘चालू दायित्व’ (Current Liabilities) शीर्षक के उप-शीर्षक ‘अन्य चालू दायित्व’ के अन्तर्गत दिखाया जाता है। अग्रिम याचना की भुगतान राशि पर ब्याज (Interest on Calls paid in Advance)-कम्पनी अंशधारियों से याचना की राशि अग्रिम (Advance) के रूप में प्राप्त कर सकती है, यदि पार्षद अन्तर्नियम इसका उल्लंघन न करते हों। याचना की अग्रिम प्राप्त राशि पर प्राप्ति की तिथि से याचना के माँगे जाने की तिथि तक का ब्याज भुगतान करना पड़ता है। प्राय: अन्तर्नियमों में अग्रिम याचना पर दिए जाने वाले ब्याज की दर वर्णित होती है। परन्तु यदि अन्तर्नियमों में दर वर्णित नहीं है तो कम्पनी अधिनियम 2013 की Schedule I की Table F लागू हो जाएगी जिसके अनुसार संचालकों को ऐसी दर निश्चित करने का अधिकार दिया गया है परन्तु यह दर 12% वार्षिक से अधिक नहीं होगी। यह नोट करना आवश्यक है कि अग्रिम याचनाओं पर ब्याज कम्पनी के लाभों पर प्रभार (Charge against profit) होता है, अत: कम्पनी में लाभ न होने की दशा में भी ब्याज देना पड़ता है। अंशों का हरण या जब्तीकरण (Forfeiture of shares)  अंशों के हरण का आशय अंशधारियों के द्वारा अंशों के आबंटन एवं याचनाओं पर माँगी गई राशियों को समय पर भुगतान नहीं किये जाने पर आवश्यक औपचारिकताओं को पूरा करने के बाद सदस्यों के रजिस्टर से सम्बन्धित अंशधारियों का नाम हटा/काट देने से है अर्थात् अंशों के आबंटन को रद्द कर देने से है। हरण किय गये अंशों के सम्बन्ध में सम्बन्धित अंशधारियों के द्वारा भुगतान की जा चुकी राशि कम्पनी द्वारा जब्त कर ला जाती है। अंशों के हरण के सम्बन्ध में कम्पनी अधिनियम, 2013 की Table F के 28 से 34 तक के प्रावधानों के अनुसार अग्रलिखित व्यवस्थाएँ हैं –

  1. यदि कोई सदस्य अंशों पर किसी निर्धारित तिथि पर किसी याचना या याचना की किस्त का भुगतान करने में असफल रहता है तो उसके पश्चात् संचालक मण्डल उसे एक नोटिस दे सकता है, जिसमें न चुकायी गई याचना के भुगतान करने के लिए कहा जाता है तथा इस पर अर्जित ब्याज के भुगतान को भी जोड़ा जाता है।
  2. नोटिस में एक तिथि दी जाती है (जो नोटिस तामील होने के 14 दिन की समाप्ति से पहले नहीं हो सकती) और यह कहा जाता है कि इस तिथि तक भुगतान न होने पर सम्बन्धित अंशों का हरण किया जा सकता है।

3.इस नोटिस का अनुपालन न होने पर संचालक मण्डल के प्रस्ताव द्वारा अंशों का हरण किया जाएगा।

  1. हरण किए गए अंशों को संचालक मण्डल द्वारा समझी जाने वाली उपयुक्त शर्तों के आधार पर बेचा या निपटारा किया जा सकता है। विक्रय से पूर्व संचालक मण्डल उन शर्तों पर हरण को निरस्त कर सकता है, जिन्हें वह उपयुक्त समझे।
  2. उस व्यक्ति, जिसके अंश हरण किए जाते हैं, की हरण किए गए अंशों के सम्बन्ध में कम्पनी की सदस्यता समाप्त हो जाती है, लेकिन हरण किए गए अंशों पर बकाया राशि के सम्बन्ध में उसका दायित्व उस समय तक बना रहता है, जब तक कम्पनी को वह राशि प्राप्त न हो जाए।

नोट – अंशों का हरण केवल अंशों पर माँगों (Calls) की राशि का भुगतान न करने पर ही किया जा सकता है, अन्य कारणों से नहीं। यदि कम्पनी द्वारा किसी व्यापारिक ऋण का भुगतान न करने के कारण किसी अंशधारी के अंशों का हरण किया गया है तो यह हरण अवैध माना जायेगा। अंशों के हरण पर लेखांकन व्यवहार (Accounting Treatment on Forfeiture of Shares)  अंशों की जब्ती के कारण अंश पूँजी कम हो जाती है, इसलिए अंश पूँजी खाता उतनी रकम से डेबिट किया जाता है जितनी कि जब्त किये जाने वाले अंशों की रकम पूँजी खाते में क्रेडिट की जा चुकी है और उन याचनाओं के खाते को क्रेडिट किया जाता है जिन पर राशि प्राप्त नहीं हो पायी है। साथ ही जो राशि प्राप्त हो चुकी है, उसे ‘जब्त अंश खाते’ (Forfeited Shares A/c) या अंश अपहरित खाते’ (Shares Forfeited Account) में क्रेडिट कर दिया जाता है। 1. सम मूल्य पर निर्गमित अंशों के हरण करने का लेखा- Share Capital Ac (जब्त अंशx मांगी गयी राशि प्रति अंश) Dr.  To Share Allotment A/c (आबंटन पर बकाया राशि)  To Share First Call A/c (प्रथम याचना पर बकाया राशि)  To Share Final Call A/c (अन्तिम याचना पर बकाया राशि) To Forfeited Shares A/c हरण किये गये अंशों पर अब तक प्राप्त राशि)  नोट – (i) यदि अंश की पूरी राशि मांगी जा चुकी हो तो अंश पूँजी खाता (Shares Capital Nc) की पूरी राशि (Shares Forfeitedx Rate per Share) से डेबिट करेंगे। अगर पूरी राशि न माँगी गयी हो तो जब्त अंशों की संख्या – प्रति अंश याचित रकम (Shares Forfeitedx Amounts called per share) की राशि से डेबिट करेंगे। (ii) Forfeited Shares A/c को चिट्ठे के “समता एवं दायित्व” (Equity and Liabilities) पक्ष में ‘अंश पूँजी’ शीर्षक के अन्तर्गत ‘प्रदत्त पूँजी’ (Paid up Capital) के बाद एक पृथक मद की तरह तब तक दिखाया जाता रहेगा जब तक कि हरण किये गये अंशों को पुन: निर्गमित नहीं कर दिया जाता है। प्रार्थित पूँजी (Subscribed Capital) एवं याचित पूँजी (Called up Capital) की अंश संख्या हरण किये गये अंशों की संख्या से कम कर दी जाती है।

  1. प्रीमियम पर निर्गमित अंशों को हरण करने का लेखा

(A) यदि हरण किये जाने वाले अंशों पर प्रीमियम की राशि प्राप्त हो गयी हो तो हरण करते समय प्रीमियम की कोई प्रविष्टि नहीं होगी। उपर्युक्त प्रविष्टि (1) ही की जायेगी। अन्तर्नियमों में जब्ती के बारे में कोई नियम न दिये हों तो तालिका ‘अ’ के नियम लागू होते हैं। (B) यदि हरण (जब्त ) किये जाने वाले अंशों पर प्रीमियम की राशि बकाया या अदत्त हो – ऐसी स्थिति में अवशिष्ट या बकाया प्रीमियम खाता (Unpaid Premium A/c) डेबिट तथा आबंटन खाता क्रेडिट किया जायेगा और चिट्ठे में प्रीमियम की राशि घटाकर दिखायी जाती है। जर्नल प्रविष्टिShare Capital A/C Dr. Security Premium Reserve A/c (माँगी गयी प्रीमियम की राशि) Dr. To Forfeited Shares A/C  To Share Allotment A/c )  To Share First Call A/c बकाया राशि To Share Final Call A/c  नोट – कम्पनी अधिनियम 2013 की धारा 53 में अंशों के कटौती पर निर्गमन पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया है। अतः कटौती पर निर्गमित अंशों के हरण का प्रश्न ही उत्पन्न नहीं होता। हरण किये हुए अंशों का पुनर्निर्गमन (Reissue of Forfeited Shares)-हरण किये हुए अंशों की संचालक मण्डल द्वारा पुन: बिक्री की जा सकती है या उन्हें निरस्त किया जा सकता है। __ हरण किये गये अंशों को उस रकम से कम पर पुन: नहीं बेचा जा सकता है जो उन पर बकाया थी अर्थात् कम्पनी द्वारा जितनी राशि का हरण किया गया है अधिक-से-अधिक उतनी ही राशि पुनर्निर्गमन पर कटौती के रूप में दी जा सकती है। –  हरण किये हुए अंशों के पुनर्निर्गमन पर निम्नलिखित जर्नल प्रविष्टि की जाती है-

Bank A/C …… ….. …..Dr The amount actually received
Forfeited Shares A/c …. …..Dr. The amount transferred from forfeited Shares A/c to Capital A/c
To Share Capital A/c The same amount with which share capital account was debited at the time of forfeiture

हरण खाते की बाकी का पूँजी संचय में हस्तान्तरण (Transfer of Forfeiture Balance to Capital Reserve)-हरण वाले अंशों के पुनर्निर्गमन के बाद जो बाकी हरण खाते में बचती है उसे पूँजी संचय खाते में हस्तान्तरित किया जाता है, परन्तु हरण किये हुए जिन अंशों का पुनर्निर्गमन नहीं किया जाता है उनसे सम्बन्धित हरण की बाकी को पूँजी संचय खाते में हस्तान्तरित नहीं किया जाता है।  Illustration 1. B के 100 रू. वाले 100 अंश जो 50 रू. की प्रथम एवं अन्तिम याचना का भुगतान नहीं होने के कारण हरण कर लिए गए थे, C को 70 रू. प्रति अंश पूर्णत: चुकता मानते हुए निर्गमित किए गए हैं। हरण और पुन:निर्गमन हेतु जर्नल प्रविष्टियाँ दीजिए।  Solution : Journal Entries  Illustration 2. विभव लिमिटेड ने 10 रू. वाले 500 अंश का हरण किया जिन पर 7.50 रू. प्राप्त हो चुके हैं लाकर अन्तिम याचना के 2.50 रू. प्रति अंश प्राप्त नहीं हए। इनमें से 400 अंशों का 67 प्रति अंश से पुनःनिगम दिया गया था। आवश्यक जर्नल प्रविष्टियाँ कीजिए। नोट – अंशों का निर्गमन 10 + 5 = रू. 15 प्रति अंश पर किया गया है। 3 रू. की प्रथम याचना अभी नहीं की गयी है अर्थात् अभी तक 15-3 = कुल 12 रू. माँगे गए हैं जिनमें प्रीमियम सहित 9 रू. आबंटन पर देय थे। अत: आवेदन पर देय रकम रू. 12- रू. 9 रू. 3 होगी। उक्त हरण किये गये अंशों पर केवल आवेदन पर देय 3 रू. ही प्राप्त हुए हैं।

अधिकार अंशों का निर्गमन

(Issue of Right Shares) 

जब कभी अंश पूँजी वाली एक सार्वजनिक कम्पनी अंशों का निर्गमन करके अपनी प्रार्थित पूँजी में (अधिकृत पूँजी की सीमाओं के अन्तर्गत) वृद्धि करना चाहती है तो कम्पनी अधिनियम 2013 की धारा 62(1) के अनुसार उसे अपने इन नये अंशों को – अपने विद्यमान समता अंशधारियों को जहाँ तब सम्भव हो, उनके द्वारा धारित अंशों के अनुपात में क्रय करने के लिये आमन्त्रित करना होगा [धारा 62(1)(a) | समता अंशधारियों का यह अधिकार अंश क्रयाधिकार कहलाता है तथा इस प्रकार अंशों का निर्गमन ‘अधिकार अंशों का निर्गमन’ कहलाता है। ऐसा प्रस्ताव अनलिखित शर्तों के साथ प्रस्ताव पत्र भेजकर किया जाता है (i) इस प्रकार का प्रस्ताव वर्तमान अंशधारियों को एक नोटिस भेजकर किया जायेगा जिसमें प्रस्तावित गों की संख्या तथा वह अवधि जिसके अन्तर्गत प्रस्ताव को स्वीकार करना है, का उल्लेख करना होगा। यह अधि पस्ताव की तिथि से कम से कम 15 दिन किन्तु 30 दिन से अधिक नहीं होनी चाहिए। धारा 6262) के अनसार इस प्रकार का नोटिस निर्गमन खुलने के कम से कम 3 दिन पहले रजिस्टर्ड पोस्ट अथवा स्पीड पोस्ट अथवा इलैक्टोनिक मोड के माध्यम से सभी विद्यमान अंशधारियों को भेजा जायेगा। (ii) जब तक कम्पनी के अन्तर्नियमों में इसके विपरीत प्रावधान न हो, उपरोक्त प्रस्ताव में सम्बन्धित व्यक्ति को प्रस्तावित सभी या इनमें से किसी भी अंशों को किसी अन्य व्यक्ति के पक्ष में त्यागने का अधिकार सम्मिलित हआ माना जायेगा तथा उल्लिखित नोटिस में इस अधिकार का स्पष्ट कथन होना चाहिए। अंशधारी निर्धारित अवधि के अन्तर्गत प्रस्ताव को स्वीकार, अस्वीकार या तृतीय व्यक्ति के पक्ष में त्याग सकता है। (iii) उपरोक्त नोटिस में निर्दिष्ट समय की समाप्ति के पश्चात् अथवा इससे पूर्व सम्बन्धित अंशधारी से प्रस्ताव को अस्वीकार की सूचना प्राप्त होने पर संचालक मण्डल इन अंशों को किसी अन्य व्यक्ति को इस तरह बेचने के लिए स्वतन्त्र होगा जिससे अंशधारियों और कम्पनी का अहित न हो। अधिकार अंशों के निर्गमन पर लेखा प्रविष्टियाँ उसी प्रकार से की जाती हैं जिस प्रकार समता/पूर्वाधिकार अंशों के निर्गमन पर की जाती हैं। अधिकार अंशों के सम्बन्ध में धारा 62 के प्रावधान एक निजी कम्पनी पर लागू नहीं होते। अंशों का समर्पण (Surrender of Shares)-जब कोई अंशधारी स्वेच्छा से कम्पनी को अपने अंश समर्पित करता है अर्थात् अपने सभी अधिकारों को त्यागकर अंशों को कम्पनी के सुपुर्द कर देता है, तो इसे ‘अंशों का समर्पण’ कहा जाता है।  प्रवर्तकों को अंशों का निर्गमन (Issue of Shares to Promoters) कम्पनी के समामेलन के दौरान प्रवर्तकों द्वारा प्रदत्त सेवाओं के बदले में कभी-कभी अंश निर्गमित किए जाते हैं। इन अंशों के निर्गमन मूल्य से ‘ख्याति’ खाता डेबिट किया जाता है। अर्थात्  Goodwill A/C Dr.  To Equity Share Capital A/c or To Preference Share Capital A/C  स्कन्ध (Stock)-स्कन्ध अनेक पूर्ण प्रदत्त अंशों का समेकित (Consolidated) रूप है। अत: स्कन्ध का आशय पूर्ण प्रदत्त अंशों की एकत्रित रकम से है जिसे बाद में किसी भी रकम के छोटे-छोटे टुकड़ों में बाँटा जा सकता है तथा प्रत्येक टुकड़े को स्वतन्त्रतापूर्वक हस्तान्तरित भी किया जा सकता है। स्टॉक एक ऐसी प्रतिभूति है जिसका कोई निश्चित अंकित मूल्य नहीं होता है। एक स्टॉकधारी किसी भी मूल्य के स्टॉक को बेच सकता है एवं किसी भी मूल्य के स्टॉक को खरीद सकता है। अब ये प्रचलन में नहीं है। अब तो केवल आन्तरिक पुनर्निर्माण के समय कम्पनी अपने पूर्णदत्त अंशों को स्टॉक में परिवर्तित कर सकती है परन्तु जनता में निर्गमन नहीं कर सकती। कम्पनी अधिनियम, 2013 की धारा 61(1)(C) के अनुसार जब कम्पनी के सम्पूर्ण अंश पूर्णदत्त हो जाते हैं तो कम्पनी ऐसे पूर्णदत्त अंशों को स्कन्ध में बदल सकती है तथा स्कन्ध को किसी भी मूल्य वर्ग के पूर्णदत्त अंशों में बदला जा सकता है। स्कन्ध की विशेषताएँ (Characteristics of Stock)-(1) कोई कम्पनी प्रारम्भ में स्कन्ध का निर्गमन नहीं कर सकती है। (2) केवल पूर्णदत्त अंशों को ही स्कन्ध में बदला जा सकता है। आंशिक दत्त अंशों का स्कन्ध में परिवर्तन व्यर्थ (Void) माना जाता है। (3) ऐसे परिवर्तन के लिए अन्तर्नियमों द्वारा अधिकार प्राप्त हो।  (4) इस पर क्रम संख्या डालने की आवश्यकता नहीं होती है। (5) इसे समान भागों में विभाजित करने की आवश्यकता नहीं होती बल्कि इसे किसी भी राशि के टुकड़ों में विभक्त किया जा सकता है।

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