Environmental Laws B.Com 3rd Year Hindi Study Material Notes

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पर्यावरणीय सन्नियम

(Environmental Laws)

भारतीय संविधान में न सिर्फ पर्यावरण को बचाने की अवधारणा निहित है, बल्कि पर्यावरण असंतुलन से होने वाले दुष्प्रभावों से रक्षा की तरफ भी ध्यान दिया गया है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद-21 में कहा गया है कि प्रत्येक व्यक्ति को उन गतिविधियों से बचाया जाना चाहिए, जो उसके जीवन, स्वास्थ्य और शरीर को हानि पहुंचाती हों। स्टॉकहोम सम्मेलन के बाद पर्यावरण को बचाने के वैश्विक आह्वान को ध्यान में रखते हुए वर्ष 1976 में भारतीय संविधान में 42वें संशोधन के माध्यम से पर्यावरण संरक्षण की दिशा में कुछ महत्वपूर्ण प्रावधान किये गये। इस संशोधन के द्वारा भारतीय संविधान में अनुच्छेद 51-क जोड़कर पर्यावरण के महत्व को रेखांकित किया गया। इस प्रकार जहां पर्यावरण की सुरक्षा को नागरिकों के मौलिक कर्तव्यों में शामिल किया गया, वहीं इन्हें राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों में भी जगह दी गई। पर्यावरण की दृष्टि से भारतीय संविधान के अनुच्छेदों-252 व 253 को काफी महत्वपूर्ण माना गया है, क्योंकि ये पर्यावरण को ध्यान में रखकर कानून बनाने के लिए अधिकृत करते हैं। भोपाल गैस त्रासदी ने पर्यावरण और लोगों की सुरक्षा के लिए पर्यावरणीय सन्नियम की तात्कालिक आवश्यकता उत्पन्न की।

पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986

(The Environment Protection Act, 1986) 

संयुक्त राष्ट्र के मानवीय पर्यावरण सम्मेलन में, जो जून, 1972 में स्टाकहोम में आयोजित हुआ था और जिसमें भारत ने भाग लिया था, यह निश्चय किया गया था कि मानवीय पर्यावरण के संरक्षण और सुधार के लिए समुचित कदम उठाए जाएँ। इसी से प्रभावित होकर भारत ने पर्यावरण के संरक्षण लिए पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 पास किया। यह एक व्यापक अधिनियम है जो पर्यावरण के समस्त विषयों को ध्यान में रखकर बनाया गया है। यह पर्यावरण संरक्षण से सम्बन्धित एक सामान्य अधिनियम है, जो कि न सिर्फ पर्यावरण से जुड़े आकस्मिक खतरों से निपटने की व्यवस्था करता है, बल्कि पर्यावरण सुरक्षा की दीर्घकालिक आवश्यकताओं का अध्ययन, नियोजन व क्रियान्वयन भी करता है। पर्यावरण संरक्षण से सम्बन्धित यह एक व्यापक कानून हैं, जो कि 19 नवंबर, 1986 से लागू किया गया। इस अधिनिय भारत पर होगा। इस अधिनियम में यह प्रावधान किया गया है कि कोई भी उद्योग प्रद अनुमति के बगैर शुरू नहीं किया जा सकेगा। यदि वह ऐसा करता है, तो कारावास व जुर्माना हो सकता है। इस अधिनियम के उद्देश्य व्यापक हैं जैसे-पयोवरण का संरक्षण एवं सधार पर्यावरण के स्टॉकहोम सम्मेलन के नियमों को कार्यान्वित करना, मानव, प्राणियों, जीवों पार से चाना. पर्यावरण संरक्षण हेतु सामान्य एवं व्यापक विधि निर्मित करना, विद्यमान कानूनों के अन्तर्गत पर्यावरण संरक्षण प्राधिकरणों का गठन करना तथा उनके क्रियाकलापों के बीच समन्वय करना, मानवीय पयावरण संरक्षण प्राधिकरणों का गठन करना तथा उनके क्रियाकलापों के बीच समन्वय पर्यावरण सुरक्षा एवं स्वास्थ्य को खतरा उत्पन्न करने वालों के लिए दण्ड की व्यवस्था करना आदि। इस अधिनियम के प्रावधान पर्यावरण प्रदूषण पर अंकुश लगाने, हानिकारक दष्प्रभाग दूर करने तथा पर्यावरण संरक्षण हेतु कार्य करने वाले प्राधिकारी या प्राधिकारियों को अनेक अधिकार प्रदान करते हैं।

अधिनियम में प्रयुक्त विशिष्ट शब्दों की परिभाषाएँ 

पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम 1986 में कुछ विशिष्ट शब्दों का प्रयोग किया गया है जिनके अक्ष को स्पष्ट करने के उद्देश्य से इस अधिनियम में उनकी परिभाषा दी गई है जिनमें मुख्य निम्न प्रकार हैं-

  1. पर्यावरण (Environment) पर्यावरण संरक्षण अधिनियम की धारा 2 (a) के अनसार ‘पर्यावरण’ में जल, वायु, भूमि तथा उनके बीच में विद्यमान अंत: सम्बन्ध तथा मनुष्य जाति, जीवित प्राणी, पेड़, सूक्ष्म जीवाणु तथा सम्पत्ति शामिल हैं।

इस प्रकार धारा 2 (a) के अन्तर्गत पर्यावरण में निम्नलिखित को शामिल माना गया है-(i) जल, वायु तथा भूमि, (ii) जल, वायु तथा भूमि में मौजूद आपसी सम्बन्ध, (iii) मानव जाति, (iv) जीवित प्राणी, पेड़-पौधे, सूक्ष्म जीव-जन्तु तथा सम्पत्ति।

  1. पर्यावरण सम्बन्धी प्रदूषक (Environmental Pollutant)-धारा 2 (b) के अनुसार, पर्यावरण सम्बन्धी प्रदूषक से अभिप्राय किसी ठोस, द्रव या गैसीय पदार्थों के ऐसे केन्द्रिकरण से है, जो पर्यावरण के लिए हानिकारक हों या उसकी ऐसी प्रवृत्ति हो। इस प्रकार ‘पर्यावरणीय प्रदूषण’ का अर्थ किसी ऐसे ठोस, द्रव या गैसीय पदार्थ से है जो केन्द्रित (Concentrate) होकर पर्यावरण को क्षति पहुँचाता है।
  2. पर्यावरण सम्बन्धी प्रदूषण (Environment Pollution) धारा 2 (c) के अनुसार, पर्यावरण सम्बन्धी प्रदूषण से अभिप्राय पर्यावरण सम्बन्धी प्रदूषकों का पर्यावरण में निहित होना है।
  3. उपयोग करना (Handling)–धारा 2 (d) के अनुसार किसी वस्तु के सम्बन्ध में उपयोग करने से अभिप्राय निर्माण, तैयारी की प्रक्रिया, निरूपण (Treatment), पैकेजिंग (Package), भण्डारण (Storage), परिवहन (Transportation), उपयोग, एकत्र, विनाश, रुपान्तरण (Conversion), विक्रय लिए प्रस्ताव, स्थानान्तरण या ऐसा ही कुछ और उस वस्तु के सम्बन्ध में करने से है।
  4. हानिकारक पदार्थ (Hazardous Substance) धारा 2(e) के अनुसार, हानिकारक पवार अभिप्राय किसी ऐसी वस्तु का तैयार करना या प्रयुक्त करना जो उसके रासायनिक या भौतिक रास विशेषताओं के कारण, मानव जाति, अन्य जीव-जन्तु, पेड़, सूक्ष्म-जीवाण, सम्पत्ति या पयावरण पहुँचाने के लिए उत्तरदायी हो।
  5. अधिभोगी (Occupier)-धारा 2 (f) के अनुसार, “किसी कारखाना या परिसर के सम्बन्ध ‘अधिभोगी’ से अभिप्राय ऐसे व्यक्ति से है जिसका कारखाना या स्थान के कार्यकलापों पर पूर्ण नियन्त्रण तथा किसी वस्तु के सम्बन्ध में उस व्यक्ति का उस वस्तु पर कब्जा हो।”

केन्द्रीय सरकार की पर्यावरण संरक्षण एवं सुधार सम्बन्धित शक्तियाँ

यह अधिनियम केन्द्र सरकार को पर्यावरणीय गुणवत्ता की रक्षा करने और सुधारने, सभा प्रदूषण नियंत्रण का नियंत्रण और कम करने और पर्यावरणीय आधार पर किसी औद्योगिक सुविधा स्थापना करना/संचालन करना निषेध या प्रतिबंधित करने का अधिकार देता है। (1) यह अधिनियम जहाँ केन्द्र सरकार को खतरनाक पदार्थों के प्रयोग से होने वाली दुघटन रोकने की जिम्मेदारी प्रदान करता है, वहीं इस अधिनियम की धारा 3 केन्द्रीय सरकार को प की सुरक्षा, सुधार व पर्यावरणीय प्रदूषण के निवारण, नियंत्रण व रोकथाम के प्रयोजन से सभी एवं समुचित उपाय करने का अधिकार प्रदान करता है। (2) अधिनियम की धारा 5 विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, जो कि यह निर्देशित करती है कि केंद्र सरकार किसी भी उद्योग या औद्योगिक प्रक्रिया को बंद करने. रोक लगाने या विनियमित करने की दृष्टि स सख्त निदश द सकती हैं। इतना ही नहीं, सरकार बिना न्यायालय के आदेश के जल, विद्यत या किसा अन्य सेवा को रोकने अथवा विनियमित करने के निर्देश भी दे सकती है। केन्द्र सरकार पर्यावरण के अनुकूल भूमि का उपयोग करने के बारे में निर्देश दे सकती है या पर्यावरण की दृष्टि से आवश्यक अन्य नियमों का निर्धारण कर सकती है। (3) इस अधिनियम की धारा 6 में सरकार को यह शक्ति प्रदान की गई है कि वह जल व भूमि की गुणवत्ता के मानकों के निर्धारण हेतु नियम बना सके। ऐसा करते हुए वह जहां विभिन्न क्षेत्रों के पर्यावरणीय प्रदूषकों, जिसमें ध्वनि प्रदूषण भी शामिल है, के लिये अधिकतम सीमा निर्धारित कर सकती है वहीं विभिन्न क्षेत्रों में उद्योगों की स्थापना और औद्योगिक प्रक्रियाओं के बारे में निषेध व सीमाओं का निर्धारण कर सकती है। धारा 6 के अन्तर्गत सरकार न सिर्फ घातक पदार्थों के प्रबंधन हेतु कार्य विधि तथा बचाव के उपाय निर्धारित कर सकी है, बल्कि ऐसी दुर्घटनाएं, जिनसे पर्यावरणीय प्रदूषण हो सकता है, की कार्यविधि व बचाव तथा दुर्घटनाओं की रोकथाम के उपाय कर सकती है। उद्योग, संक्रिया आदि एवं हानिकारक पदार्थों द्वारा व्यवहार करने वाले व्यक्तियों के कर्तव्य एवं दायित्व  एम० सी० मेहता बनाम् यूनियन ऑफ इण्डिया, A.I.R. 1988, S.C. 1037 में यह निर्णय दिया गया है कि देश के प्रत्येक व्यक्ति का यह कर्त्तव्य है कि वह पर्यावरणीय प्रदूषण को रोकने का प्रयास करे। सरकार का भी यह सर्वोच्च दायित्व है कि वह पर्यावरण प्रदूषण को रोकने की कोशिश करे। इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए धारा 7 से 9 तक ऐसे व्यक्तियों पर कुछ कर्त्तव्य एवं दायित्व आरोपित किये गये हैं जो उद्योग संक्रिया आदि तथा हानिकारक पदार्थों से व्यवहार करते हैं या जिनकी देख-रेख में पर्यावरणीय प्रदूषण करने वाली दुर्घटना घटे अर्थात् जो उस स्थान विशेष का प्रभारी हो अर्थात्

  1. उद्योग संक्रिया आदि चलाने वाले व्यक्तियों को मानक से अधिक मात्रा में पर्यावरणीय प्रदूषण के उत्सर्जन की इजाजत नहीं होगी – धारा 7 के अनुसार कोई भी उद्योग, संक्रिया या प्रक्रिया चलाने वाला व्यक्ति ऐसे मानक से अधिक मात्रा में, जो निर्धारित किये जायें, पर्यावरणीय प्रदूषक का न तो बहाव कर सकेगा और न उत्सर्जन और न उसे ऐसा करने की अनुमति दी जा सकेगी। – इस प्रकार स्पष्ट है कि धारा 7 नियमों द्वारा निर्धारित मानक से अधिक मात्रा में पर्यावरणीय प्रदूषक के उन्मोचन और उत्सर्जन को मना करती है।
  2. हानिकारक पदार्थों से व्यवहार करने वाले व्यक्ति प्रक्रियात्मक रक्षा के उपायों का पालन करेंगे – धारा 8 के अनुसार कोई भी व्यक्ति किसी भी हानिकारक पदार्थ के सम्बन्ध में निर्धारित प्रक्रिया का अनुसरण तथा रक्षा के उपायों का पालन किये बिना व्यवहार नहीं करेगा। धारा 8 प्रत्येक व्यक्ति पर यह कर्त्तव्य आरोपित करती है कि हानिकारक पदार्थों के सम्बन्ध में इस प्रकार व्यवहार किया जाना चाहिए कि उससे पर्यावरणीय प्रदूषण न हो। यद्यपि यह सही है कि आज के औद्योगिक युग में उद्योगों का विकास एवं उत्थान आवश्यक है, लेकिन साथ-ही-साथ यह भी उतना ही आवश्यक है कि ऐसे उद्योगों से मानव जीवन को संकट उत्पन्न न हो। अत: प्रयास यह किया जाना चाहिए कि पर्यावरणीय प्रदूषण या तो बिल्कुल न हो या फिर कम-से-कम हो।

3.कुछ मामलों में प्राधिकारियों और अभिकरणों को सूचनाएँ देना-धारा 9 के अनुसार, 1. जहाँ किसी घटना, दुर्घटना या आकस्मिक कार्य के कारण, निर्धारित मानकों से अधिक मात्रा में पर्यावरणीय प्रदूषणकारी का निस्सरण हुआ हो या होने की आशंका हो, वहाँ ऐसे निस्सरण के लिए उत्तरदायी व्यक्ति तथा उस स्थान का जहाँ ऐसे निस्सरण हुआ है या होने की आशंका है, प्रभारी व्यक्ति, ऐसे निस्सरण से उत्पन्न पर्यावरणीय प्रदूषक को रोकने या कम करने के लिए बाध्य होगा तथा इसके साथ ही वह निर्धारित प्राधिकारी या अभिकरण को–(i) ऐसी घटना की सूचना देगा, तथा (ii) माँग किये जाने पर उसे सभी प्रकार की सहायता देगा। धारा 9 किसी ऐसे प्राधिकारी, प्राधिकरण या अभिकरण पर, यह कर्त्तव्य आरोपित करती है कि जब भी उसे कोई प्रदूषण उत्पन्न करने वाली दुर्घटना की सूचना प्राप्त हो, वह उसे निपटाने का भरसक प्रयत्न करे। यह दायित्व प्रत्येक ऐसे व्यक्ति का है जो घटनास्थल का प्रभारी हो। प्रत्येक व्यक्ति परिवाद दायर करने का अधिकारी – इस अधिनियम की एक मुख्य विशेषता यह है कि यह प्रत्येक व्यक्ति को परिवाद दायर करने का अधिकार देता है। धारा 19 अपराधों के संज्ञान के बारे में प्रावधान करते हुए कहती है कि इस अधिनियम के द्वारा अपराध के लिए परिवाद निम्नलिखित व्यक्तियों में से किसी के भी द्वारा दायर किया जा सकता है, अर्थात (i) केन्द्रीय सरकार द्धारा (ii) केन्द्रीय सरकार द्वारा इस वास्ते प्राधिकृत किसी व्यक्ति द्वारा, या (iii) कम से कम साठ दिन पूर्व केन्द्रीय सरकार को सूचना देकर किसी भी अन्य व्यक्ति द्वारा। इस सरक स्पष्ट है कि कोई निजी व्यक्ति भी केन्द्र सरकार को 60 दिन का नोटिस देकर परिवार है। न्यायालय अन्यथा किसी भी प्रकार से संज्ञान नहीं ले सकेगा। अधिनियम के उपबन्धों, नियमों, आदेशों और निर्देशों का उल्लंघन करने 15 – अधिनियम के उल्लंघन पर सख्त सजा और जुर्माने का प्रावधान है। पहली बार जहां 5 वर्ष तक की कैद हो सकती है, वहीं एक लाख रूपये तक अर्थदण्ड भी चकर तथा दोनों सजाएं एक साथ भी हो सकती हैं। अपराध की पुनरावृत्ति होने पर कैदी रहेगी, किन्तु अर्थदण्ड प्रतिदिन 5,000 ₹ तक हो सकता है। यदि आदेशों की अनदेखी एक की जाती है, तो कैद की सजा सात वर्ष तक हो सकती है।

जल (प्रदूषण निवारण एवं नियन्त्रण) अधिनियम, 1974

Water (Prevention and Control of Pollution) Act, 1974 

जल की मात्रा एवं गणवत्ता की गम्भीर समस्याओं को ध्यान में रखकर भारत का जल-प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण अधिनियम, 1974 को अधिनियमित किया जो 23 मार्च 1974 किया गया। इस अधिनियम के प्रावधानों के कार्यान्वयन के लिए सरकार ने इनमें समय-समय पर विभि संशोधन किए हैं जैसे जल प्रदूषण निवारण एवं नियन्त्रण अधिनियम 1975, उपकरण अधिनियम 1977 तथा जल प्रदूषण नियंत्रण संशोधन अधिनियम 1988! इस अधिनियम में प्रदूषण को व्यापक रूप से परिभाषित किया गया है। इस परिभाषा के अनुसार जल के भौतिक, रासायनिक अथवा जैविक गुणों से छेड़-छाड़ या जल स्रोतों में मल अथवा उद्योगों के स्त्राव को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से मिलाना अथवा बहाना, जिससे जल हानिकारक एवं प्राणघातक बन जाये, जल प्रदूषण कहलाता है। मल-जल या उद्योगों के बहिस्राव के जल में मिलने से यदि लोक स्वास्थ्य या सुरक्षा को खतरा उत्पन्न हो जाये अथवा जल घरेलू, वाणिज्यिक, कृषिक या औद्योगिक उपयोग के लायक नहीं रह जाये तथा वनस्पतियों, पशुओं और जलीय जीवों के जीवन और स्वास्थ्य पर उनका प्रतिकूल असर पड़े तो इसे भी जल का प्रदूषण कहा जाएगा। इस अधिनियम का मूलभूत-उद्देश्य जल की गुणवत्ता को फिर से लौटाना तथा उसे स्वास्थ्यवर्द्धक बनाना है। अधिनियम के तीन प्रमुख उद्देश्य हैं, प्रथम, जल प्रदूषण का निवारण एवं नियंत्रण। दूसरा, जल की स्वास्थ्यवर्द्धक गुणवत्ता को बनाये रखना अथवा उसे पुन:स्थापित करना तथा तीसरा, जल प्रदूषण के निवारण और नियंत्रण के उद्देश्य से केन्द्रीय एवं राज्य बोर्डों का गठन करना। यह अधिनियम जल प्रदूषण का निरोध, नियंत्रण, हतोत्साहन, जल की स्वच्छता का सुरक्षा सुनिश्चित करता है। यह जहाँ प्रदूषण के स्तर को नापने का बंदोबस्त करता है, वहीं प्रदूषको कल दण्ड का भी प्रावधान करता है। प्रदूषकों के लिये तीन माह की कैद या 10,000 रू. का जुर्माना हो है। दोनों दण्ड एक साथ भी दिये जा सकते हैं। इस अधिनियम के अन्तर्गत केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण तथा राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों को स्वायत्तशासी संस्था का दर्जा प्रदान किया गया है। ये जल जपून लिए योजनाएं बनाकर उन्हें लागू करते हैं। मानकों का उल्लंघन होने पर बोर्ड को न्यायिक करने की भी शक्ति प्राप्त है।

अधिनियम की मुख्य विशेषताएँ

(Salient features of this Act) 

(i) प्रदूषण नियंत्रण के लिए केन्द्र और राज्य बोर्ड की स्थापना।  (ii) प्रदूषण के निपटान के लिए नदियों और कुओं के उपयोग पर निषेध। (iii) नदियों और कुओं में नए निर्गम (Outlet) और निर्वहन खोलने के लिए प्रदूषण नि की सहमति होना। (iv) केन्द्र और राज्य प्रदूषण बोर्ड नियंत्रण के लिए फण्ड, बजट खातों और बोड परीक्षा (Audit) के लिए प्रावधान। (v) यह अधिनियम विभिन्न बकायेदारों (Defaulters) के लिए दण्ड की प्रक्रिया का प्र करता है।

अधिनियम में प्रयुक्त विशिष्ट शब्दों की परिभाषाएँ 

इस अधिनियम में कुछ विशिष्ट प्रकार के शब्द प्रयक्त किये गये हैं जिनके अर्थ को स्पष्ट करने के उद्देश्य से अधिनियम में उनकी परिभाषा दी गई हैं जिनमें कछ प्रमुख निम्नलिखित प्रकार हैं-

(i) बोर्ड-इस अधिनियम की धारा 2 के अनसार, ‘बोर्ड’ से अभिप्राय केन्द्रीय बोर्ड या राज्य बोर्ड से है। अधिनियम की धारा 3 में केन्द्रीय बोर्ड तथा धारा 4 में राज्य बोर्ड के गठन के बारे में प्रावधान किया गया है।

(ii) केन्द्रीय बोर्ड – केन्द्रीय बोर्ड’ से आशय इस अधिनियम की धारा 3 के अधीन गठित ‘केन्द्रीय प्रदूषण नियन्त्रण बोर्ड’ से है। यह परिभाषा सन् 1988 के संशोधन अधिनियम द्वारा संशोधित परिभाषा है। इससे पूर्व केन्द्रीय बोर्ड से अभिप्राय केन्द्रीय जल प्रदूषण निवारण तथा नियन्त्रण बोर्ड’ से था। इस परिभाषा से ‘जल’ तथा ‘निवारण’ शब्द हटा दिये गये हैं क्योंकि जल, वायु तथा अन्य प्रदूषणों के नियन्त्रण के लिए एक ही बोर्ड का गठन किया जाना उचित समझा गया है। सन् 1974 में जब यह अधिनियम बना था तब अन्य प्रदूषणों के लिए और कोई अधिनियम नहीं था। तत्पश्चात् सन् 1981 में वायु (प्रदूषण निवारण तथा नियन्त्रण) अधिनियम तथा सन् 1986 में पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम पारित किये गये। इसलिए यह उचित समझा गया कि इन सभी प्रदूषणों के नियन्त्रण के लिए एक ही बोर्ड रहे।

(iii) सदस्य – ‘सदस्य’ में बोर्ड के अध्यक्ष एवं सदस्य दोनों को सम्मिलित किया गया है। यह परिभाषा केन्द्रीय बोर्ड तथा राज्य बोर्ड दोनों पर लागू होती है।

(iv) प्रदूषण [(धारा 2(e)]-प्रदूषण से आशय है जल का ऐसा-(i)संदूषण, या (ii) जल के भौतिक, रासायनिक या जैविक गुणों का ऐसा परिवर्तन, या (iii) किसी मल या व्यावसायिक बहिस्त्राव, या (iv) किसी अन्य द्रव्य, गैसीय या ठोस पदार्थ का जल में प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से ऐसा निस्सरण, जो-(i) न्यूसेंस उत्पन्न करे, या (ii) जिससे न्यूसेंस उत्पन्न होना सम्भाव्य हो, या (iii) जो ऐसे जल को लोक स्वास्थ्य या सुरक्षा या घरेलू, वाणिज्यिक, औद्योगिक, कृषि या अन्य वैधानिक उपयोगों के लिए, या (iv) जीव जन्तुओं या पौधों या जलीय जीवों के जीवन और स्वास्थ्य के लिए हानिकारक बनाता है या बनाना सम्भाव्य करता है।

इस परिभाषा से यह आशय है कि जल सम्बन्धी ऐसा कोई कार्य या प्रयोग जिससे बाधा (Nuisance) पैदा हो या जो मानव जीवन, पशु-पक्षी, पाधा या जलीय जीवों के जीवन और स्वास्थ्य को हानिकारक बना दे, ‘जल प्रदूषण’ है।

इस परिभाषा में शब्द ‘न्यूसेंस’ बड़ा महत्वपूर्ण है। भारतीय दण्ड संहिता, 1860 की धारा 268 में न्यूसेंस को एक दण्डनीय अपराध माना गया है।

इसी प्रकार लोक जल-स्त्रोत या जलाशय का जल कलुषित करना धारा 277 के अन्तर्गत एक दण्डनीय अपराध है।

(v) राज्य बोर्ड (State Board) राज्य बोर्ड से आशय इस अधिनियम की धारा 4 के अन्तर्गत गठित ‘राज्य प्रदूषण नियन्त्रण बोर्ड’ से है। यह परिभाषा सन् 1988 के संशोधन अधिनियम द्वारा संशोधित परिभाषा है। इससे पूर्व इस शब्द से अभिप्राय ‘राज्य जल प्रदूषण निवारण तथा नियन्त्रण बोर्ड’ से था।

(vi) सरिता (Stream) शब्द ‘सरिता’ में निम्नलिखित सम्मिलित हैं-(i) नदी, (ii) कुल्या (चाहे बहती हो या उस समय सूखी हो), (iii) अन्तर्देशीय जल (चाहे प्राकृतिक हो या कृत्रिम), (iv) भूमिगत जल, तथा (e) समुद्र या ज्वारीय जल, यथास्थिति उस विस्तार तक या उस बिन्दु तक जो राज्य सरकार राजपत्र में अधिसूचना द्वारा इस सन्दर्भ में विनिर्दिष्ट करे।

(vii) व्यावसायिक बहिस्राव (Trade Effulent) (धारा 2k)-व्यावसायिक बहिस्राव से आशय घरेलू मल से भिन्न, किसी उद्योग, संक्रिया, प्रक्रिया या निरुपण और निपटान प्रणाली को चलाने के लिए प्रयुक्त किसी परिसर से किसी द्रव, गैसीय या ठोस पदार्थ का प्रवाह है। इस परिभाषा के संदर्भ में किसी व्यावसायिक बहिस्त्राव का प्रवाह होने पर वह या तो अन्तर्देशीय जल में मिलेगा या भूमिगत जल में मिलेगा या वह किसी सरिता या नदी में जा मिलेगा। यदि ऐसे बहिस्त्राव को रोका जाता है तो वह भूमिगत जल में मिलेगा और ऐसी दशा में वह सरिता की परिभाषा में आ जायेगा। 

इस प्रकार उक्त वर्णन से स्पष्ट है कि जल प्रदूषण को रोकना इस अधिनियम का प्रमुख लक्ष्य है। जल प्रदूषण वास्तव में एक न्यूसेंस है तथा इसका रोका जाना जनहित में है।

केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड

(Central Pollution Control Board) 

भारत के केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (Central Pollution Control Board) का ग. सांविधिक संगठन के रूप में जल (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम 100 सितम्बर, 1974 में किया गया था। इसके पश्चात् केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को वाय (प एवं नियंत्रण) अधिनियम, 1981 के अन्तर्गत शक्तियाँ व कार्य सौंपे गये। बोर्ड का नेतत्व द्वारा किया जाता है जिसे केन्द्र सरकार द्वारा मनोनीत किया जाता है। इसका मुख्यालय नई दिल्ली में स्थित है।।

इस अधिनियम के अन्तर्गत केन्द्रीय प्रदूषण नियन्त्रण बोर्ड (Central Pollution Board) एवं राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों का गठन किया गया है। दो राज्य सरकारों के बोर्डों का गठन भी किया जा सकता है।

अधिनियम के विभन्न प्रावधानों के प्रभावी कार्यान्वयन हेतु बोर्ड आवश्यकतानुरूप एका अधिक समितियों का गठन कर सकता है। अधिनियम की धारा 8 के अनुसार तीन महीनों के अंतराल बोर्ड की बैठक अनिवार्य है।

केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के प्रमुख कार्य जल (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम 1974 तथा वायु (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम, 1981 में व्यक्त किये गये हैं। 

केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के कार्य-

केन्द्रीय प्रदूषण नियन्त्रण बोर्ड का मुख्य कार्य अधिनियम के उद्देश्यों को लागू करना और उसके उद्देश्यों को पूरा करने का प्रयत्न करना है। इस सम्बन्ध में अधिनियम की धारा 16 के अनुसार केन्द्रीय प्रदूषण नियन्त्रण बोर्ड के निम्नलिखित कार्य हैं-

(i) जल तथा वायु प्रदूषण की रोकथाम अथवा निवारण एवं नियंत्रण के लिए एक राष्ट्रव्यापी कार्यक्रम की योजना तैयार करना तथा उसे निष्पादित कराना।

(ii) राज्य बोर्डों की गतिविधियों का समन्वय करना तथा उनके बीच उत्पन्न विवादों को सुलझाना।

(iii) राज्य बोर्डों को तकनीकी सहायता व मार्गदर्शन उपलब्ध कराना, वायु प्रदूषण से सम्बन्धित समस्याओं तथा उसके निवारण, नियंत्रण अथवा उपशमन के लिए अनुसंधान और उसके उत्तरदायी कारणों की खोज करना।

(iv) जल तथा वायु प्रदूषण के निवारण तथा नियंत्रण अथवा उपशमन के कार्यक्रम में संलग्न व्यक्तियों के लिए प्रशिक्षण आयोजित करना तथा योजनाएं तैयार करना।

(v) जल तथा वायु प्रदूषण की रोकथाम अथवा नियंत्रण, निवारण पर एक विस्तृत जन-जागरुकता कार्यक्रम आयोजित करना।

(vi) जल तथा वायु प्रदूषण और उसके प्रभावी निवारण, नियंत्रण अथवा रोकथाम के लिए किय गये उपायों के सम्बन्ध में तकनीकी तथा सांख्यिकीय आंकड़ों को संग्रहित. संकलित कर प्रकाशित करना,

(vii) मल-जल तथा व्यावसायिक बहिस्त्रावों के विसर्जन तथा शोधन के सम्बन्ध में नियमावला, आचार संहिता और दिशा-निर्देश तैयार करना।

(viii) जल तथा वायु प्रदूषण तथा उनके निवारण तथा नियंत्रण से सम्बन्धित मामलों में सूचना प्रसार करना।

(ix) सम्बन्धित राज्य सरकारों के परामर्श से नदियों अथवा कओं के लिए मानकों का मन करना तथा वायु गुणवत्ता के लिए मानक तैयार करना, निर्धारित करना. संशोधित करना अथवा रद्द करना 

(x) भारत सरकार द्वारा निर्धारित किये गये अन्य कार्य निष्पादित करना।

राज्य प्रदूषण नियन्त्रण बोर्ड का गठन, कार्य एवं शक्तियों 

राज्य प्रदूषण नियन्त्रण बोडों का गठन-धारा 4 में राज्य प्रदूषण नियन्त्रण बोर्ड के प्रावधान किया गया है। इस धारा के अनुसार-राज्य सरकार ऐसी तारीख से जो वह राज अधिसूचना द्वारा नियत करे, एक राज्य प्रदूषण नियन्त्रण बोर्ड गठित करेगी जिसका वह नाम ह अधिसूचना में वर्णित किया जाए और वह इस अधिनियम के अधीन उस बोर्ड को सौंपी गई शक्ति प्रयोग और सौंपे गये कार्यों का पालन करेगा।

राज्य प्रदूषण नियन्त्रण बोर्ड के कार्य – धारा 17 के अनुसार राज्य प्रदूषण नियन्त्रण बोर्ड के निम्नलिखित कार्य हैं-

  1. राज्य में सरिताओं और कुओं के प्रदषण के निवारण, नियन्त्रण या कम करने के लिए व्यापक कार्यक्रम की योजना बनाना तथा उसके निष्पादन को सुनिश्चित करना,
  2. जल प्रदूषण के निवारण, नियन्त्रण या कम करने से जड़े किसी विषय पर राज्य सरकार को सलाह देना,
  3. जल प्रदूषण और उसके निवारण, नियन्त्रण या उपशमन से सम्बन्धित जानकारी एकत्रित करना और उसका प्रसार करना,
  4. जल प्रदूषण तथा जल प्रदूषण के निवारण, नियंत्रण या कम करने की समस्याओं से सम्बन्धित अन्वेषण और अनुसंधान को बढ़ावा देना, उनका संचालन करना और उसमें भाग लेना,
  5. जल प्रदूषण के निवारण, नियंत्रण या उपशमन से सम्बन्धित कार्यक्रम में लगे हुए या लगाये जाने वाली व्यक्तियों के प्रशिक्षण को संगठित करने में केन्द्रीय बोर्ड के साथ सहयोग करना और उससे सम्बन्धित सार्वजनिक शिक्षा के कार्यक्रम बनाना,
  6. मल या व्यावसायिक बहिस्राव (outflow) की क्रिया के लिए संकर्म एवं संयंत्रों का निरीक्षण करना,
  7. बहिस्त्रावों के बहाव के परिणामस्वरूप प्राप्त हो रहे जल की क्वालिटी के लिए बहिस्त्राव मानक निर्धारित करना, उनमें परिवर्तन करना या उन्हें खत्म करना,
  8. मल एवं व्यावसायिक बहिस्त्राव की अभिक्रिया की मितव्ययी और विश्वसनीय पद्धतियाँ निकालना,
  9. कृषि में मल और उपयुक्त व्यावसायिक बहिस्रावों के उपयोग की पद्धतियाँ विकसित करना, __
  10. सरिता या कुएँ से जल के नमूनों का या मल या व्यावसायिक बहिस्त्राव के नमूनों का विश्लेषण कराने के लिए प्रयोगशालाएँ स्थापित करना, एवं 
  11. अन्य ऐसे कार्य का पालन करना जो निर्धारित किये जायें।

वायु (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम, 1981

(Air Pollution and Control Act, 1981) 

इस अधिनियम के पारित होने के पीछे जून, 1972 में संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा स्टाकहोम (स्वीडन) में मानव पर्यावरण सम्मेलन की भूमिका रही है। इसकी प्रस्तावना में कहा गया है कि इसका मुख्य उद्देश्य पृथ्वी पर प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण हेतु समुचित कदम उठाना है। बढ़ते औद्योगिकरण के कारण पर्यावरण में निरंतर हो रहे वायु प्रदूषण तथा इसकी रोकथाम के लिए वायु प्रदूषण एवं नियंत्रण अधिनियम 1981 पारित किया गया। इसका विस्तार सम्पूर्ण भारत पर है। यह 29 मार्च, 1981 को लागू किया गया।

इस अधिनियम में मुख्यत: मोटर-गाड़ियों और अन्य कारखानों से निकलने वाले धुएं और गंदगी का स्तर निर्धारित करने तथा उसे नियंत्रित करने का प्रावधान है। 1987 में इस अधिनियम में ध्वनि प्रदूषण को भी शामिल किया गया है।

वायु (प्रदूषण निवारण एवं नियन्त्रण) अधिनियम की धारा 2(a) के अनुसार, वायु प्रदूषकों से तात्पर्य वायुमण्डल में उपस्थित उन ठोस, तरल या गैसीय पदार्थों से है जिसमें शोर भी शामिल है, जिनके कारण मानव या अन्य जीवधारी या पेड़-पौधों या सम्पत्ति या पर्यावरण को क्षति पहुँच सकती है।

इस अधिनियम की धारा 2(b) के अनुसार, किसी प्रकार का वातावरण में फैला हुआ वायु प्रदूषक तत्व वायु प्रदूषण कहलाता है।

केन्द्रीय प्रदूषण बोर्ड, जिसका गठन जल (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम, 1974 के तहत किया गया था, को ही वायु प्रदूषण अधिनियम लागू करने का अधिकार दिया गया है।

केन्द्रीय बोर्ड, राज्यों के बोडों से परामर्श करके सम्बन्धित राज्य सरकार के किसी भी क्षेत्र को वायु प्रदूषण नियंत्रण क्षेत्र घोषित कर सकता है और वहाँ स्वीकृत ईंधन के अतिरिक्त, अन्य किसी भी प्रकार के प्रदूषण फैलाने वाले ईंधन के प्रयोग पर रोक लगा सकता है।

इस अधिनियम में यह प्रावधान है कि कोई भी व्यक्ति राज्य बोर्ड की पूर्व अनुमति के बिना वायु प्रदूषण नियंत्रण क्षेत्र में ऐसी कोई भी औद्योगिक इकाई नहीं खोल सकता जो प्रतिबंधित हो।

इस अधिनियम में केंद्र व राज्य सरकार दोनों को वायु प्रदूषण से होने वाले प्रभावों का सामना

करने के लिए अनेक शक्तियाँ प्रदान की गई हैं जैसे राज्य के किसी भी क्षेत्र को वायु प्रदूषित क्षेत्र घोषित करना, प्रदषण नियंत्रित क्षेत्रों में औद्योगिक क्रियाओं को रोकना, औद्योगिक इकाई बोर्ड से अनापत्ति प्रमाण-पत्र लेना, वायु प्रदूषकों के सैंपल इकट्ठा करना, अधिनियम में के अनुपालन की जाँच के लिए किसी भी औद्योगिक इकाई में प्रवेश का अधिकार प्रावधानों का उल्लंघन करने वालों के विरूद्ध मुकदमा चलाने का अधिकार, प्रदषित कर करने का अधिकार आदि।

इस अधिनियम में तय मानकों की अवहेलना करने पर जुर्माना लगाने का भी पाल कम्पनियाँ, उनके मालिक, संचालक और यहाँ तक कि सरकारी विभाग भी इसके दायरे में आ नागरिक बोर्ड में अपनी शिकायत दर्ज करा सकते हैं। 

राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण (National Green Tribunal) 

पर्यावरण सम्बन्धी विवादों के शीघ्र निपटारे तथा पर्यावरण से सम्बन्धित काननों के प्रभावी क्रियान्वयन को ध्यान में रख कर सरकार द्वारा एक राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण (National Tribunal- NGT) की स्थापना 18 अक्टूबर, 2010 में ‘एनजीटी अधिनियम, 2010’ के अन्तर्गत

क अन्तर्गत की गई। राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण की प्रधान पीठ दिल्ली में स्थित है, जबकि क्षेत्रीय पीठे भोपाल, चेन्नई – एवं कोलकाता में स्थित हैं। ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के बाद इस प्रकार के न्यायाधिकरण का करने वाला भारत विश्व का तीसरा देश है।

यह भारत के संवैधानिक प्रावधान के अनुच्छेद 21 से प्रेरणा प्राप्त है, जो भारत के नागरिकों के लिए स्वस्थ वातावरण का अधिकार सुनिश्चित करता है।

यह न्यायाधिकरण उन पर्यावरण सम्बन्धी मामलों का निपटारा करेगा, जो देश की विभिन्न अदालतों में विचाराधीन हैं। प्रदूषित पर्यावरण से बीमारी, विकलांगता, मृत्यु होने, व्यवसाय या सम्पत्ति को क्षति पहुंचने पर कोई भी व्यक्ति इस न्यायाधिकरण में मुआवजे का दावा कर सकेगा। पर्यावरण सम्बन्धी हादसे के कारण जानमाल के नुकसान के बदले में फास्ट ट्रैक प्रणाली के तहत भी मुआवजे का दावा किया जा सकेगा। न्यायाधिकरण ऐसे प्रकरणों में पीड़ित पक्षकार की सहायता एवं क्षतिपूर्ति राशि (मुआवजा) प्रदान करने का आदेश जारी करने के लिए अधिकृत होगा। इस न्यायाधिकरण के निर्णय के विरुद्ध सर्वोच्च न्यायालय में ही अपील की जा सकेगी।

नेशनल ग्रीन ट्रीब्यूनल एक संवैधानिक संस्था है। इसके दायरे में देश में लागू पर्यावरण, जल, जंगल, वायु और जैव विविधता के सभी नियम-कानून आते हैं। यह एक विशिष्ट निकाय है जो बहु-अनुशासनात्मक समस्याओं वाले पर्यावरणीय विवादों को संभालने के लिए आवश्यक विशेषज्ञता द्वारा सुसज्जित है।

न्यायाधिकरण, सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 के अंतर्गत निर्धारित प्रक्रिया द्वारा बाध्य नहीं होगा, बल्कि नैसर्गिक न्याय के सिद्धान्तों द्वारा निर्देशित किया जाएगा। पर्यावरण सम्बन्धी मामलों में आधकरण का समर्पित क्षेत्राधिकार तीव्र पर्यावरणीय न्याय प्रदान करेगा तथा उच्च न्यायालयों में मुकदमेबाजा कमा को कम करने में सहायता करेगा। न्यायाधिकरण को आवेदनों या अपीलों के प्राप्त होने के 6 महान अंदर उनके निपटान का प्रयास करने का कार्य सौंपा गया है।

इस न्यायाधिकरण ने राष्ट्रीय पर्यावरण न्यायाधिकरण अधिनियम, 1995 और राष्ट्रीय पक्ष अपीलीय प्राधिकरण, 1997 की जगह ली है साथ ही इससे पहले के सभी लंबित माम न्यायाधिकरण को हस्तांतरित कर दिये गये हैं। न्यायाधिकरण में सदस्यों की स्वीकृत संख्या वर्तमान विशेषज्ञ सदस्यों और 10 न्यायिक सदस्यों की है। हालांकि अधिनियम प्रत्येक के लिए 20 की देता है। न्यायाधिकरण का अध्यक्ष, जो न्यायाधिकरण का प्रशासनिक प्रमुख है, भी न्यायिक सय रूप में कार्य करता है। न्यायाधिकरण की हर बेंच कम से कम एक विशेषज्ञ सदस्य और एक सदस्य से मिलकर बना होनी चाहिए। न्यायाधिकरण का अध्यक्ष होने के लिए आवश्यक है कि १९ सेवारत या सेवानिवृत्त, उच्च न्यायालय या उच्चतम न्यायालय का मख्य न्यायाधीश होना चाहिए।

सदस्यों को चयन समिति (भारत के सर्वोच्च न्यायालय के एक मौजदा न्यायाधीश के न रा चना जाता है जो उनके आवेदनों की समीक्षा करता है और साक्षात्कार (इंटरव्यू) आया है। न्यायिक सदस्यों को उन आवेदकों में से चुना जाता है, जो उच्च न्यायालयों में सेवारत या न्यायाधीश हैं। विशेषज्ञ सदस्यों को उन आवेदकों में से चुना जाता है जो या तो सेवारत हैं या सेवानिवृत्त

नौकरशाह हैं, तथा भारत सरकार के अतिरिक्त सचिव के पद से नीचे नहीं हैं।

न्यायाधिकरण के पास पर्यावरण से सम्बन्धित मुद्दों पर और ‘विशिष्ट गतिविधि के कारण पर्यावरण को नुकसान’ जैसे प्रदूषण के मामलों पर मूल क्षेत्राधिकार है।

न्यायाधिकरण के पास नागरिक न्यायालय के बराबर शक्तियाँ हैं। हालांकि, न्यायाधिकरण को नागरिक प्रक्रिया संहिता का पालन करने की आवश्यकता नहीं है। अधिनियम निर्दिष्ट करता है कि पर्यावरण से सम्बन्धित विवाद के लिए आवेदन पहली बार विवाद उठने के समय से छह महीने के भीतर दायर किया जा सकता है (बशर्ते न्यायाधिकरण इस बात से संतुष्ट है कि अपीलकर्ता आवेदन दाखिल करने के लिए पर्याप्त कारणों से रुका था, तो न्यायाधिकरण छह महीने के बाद भी आवेदन स्वीकार कर सकता है)।

कोई व्यक्ति किसी आदेश या पुरस्कार की अपील उच्चतम न्यायालय में आदेश के 90 दिनों के भीतर कर सकता है लेकिन उच्चतम न्यायालय इस अपील के लिए 90 दिन के समय को बढ़ा सकता है अगर अपीलार्थी उच्चतम न्यायालय को पर्याप्त कारण देकर संतुष्ट कर दे।

यह अधिनियम दीवानी मामलों पर लागू होता है, जिसमें आपराधिक मामले शामिल नहीं हैं। न्यायाधिकरण द्वारा दिए गए सुझावों या भुगतान के आदेश में यह पर्यावरण राहत कोष (2008) में जमा किया जायेगा जिसे सार्वजनिक देयता बीमा अधिनियम 1991 के तहत स्थापित किया गया था।

यह अधिनियम अधिकरण के आदेशों का अनुपालन न करने के लिए तीन वर्ष तक की जेल की सजा और अर्थदण्ड के रूप में व्यक्ति के लिए दस करोड़ रुपये तक और कंपनी के लिए पच्चीस करोड़ रुपये तक जुर्माने का प्रावधान करता है। ऐसे मामलों में कम्पनी के निदेशकों के अभियोजन के लिए अलग प्रावधान हैं।


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