Physical Distribution B.Com 3rd Year Notes – Principles Of Marketing Notes

Physical Distribution B.Com 3rd Year Notes Principles Of Marketing Notes :- This Post has Study Notes Of All Subject of BCOM 1st 2nd 3rd Year Study Material Notes Sample Model Practice Question Answer Mock Test Paper Examination Papers Notes Download Online Free PDF This Post Contains All Subjects Like BCOM 3rd Year Corporate Accounting, Auditing, Money and financial System, Information Technology and its Application in Business, Financial Management, Principle of Marketing, E-Commerce, Economic Laws, Unit Wise Chapter Wise Syllabus B.COM Question Answer Solved Question Answer papers Notes Knowledge Boosters To illuminate The learning.


भौतिक वितरण का अर्थ एवं परिभाषाएँ

(Meaning and Definitions of Physical Distribution)

भौतिक वितरण से आशय सही समय पर, सही स्थान पर एवं सही मात्रा में वस्तुओं को पहुचार से है। यह विपणन मिश्रण का प्रमुख तत्व है। वस्तुओं का उत्पादन होने के पश्चात जब एक निमात वितरण के माध्यम का चयन कर लेता है एवं विक्रेताओं की नियुक्ति कर लेता है तो उसके सामन समस्या आती है कि किस प्रकार आदेशित माल कम से कम यातायात लागत पर भेजा जाए। इसा को विपणन प्रबन्ध में भौतिक वितरण प्रबन्ध कहते हैं। भौतिक वितरण के सम्बन्ध में प्रमुख विद्वाना परिभाषाएँ निम्नलिखित हैं- 1.मैकार्थी के अनुसार, “वैयक्तिक फर्मों के भीतर एवं वितरण प्रणालियों के साथ-साथ माल वास्तविक उठाना, धरना एवं संचालन भौतिक वितरण है।”
  1. प्रो० कण्डिफ व स्टिल के अनुसार, “वस्तुओं की उत्पत्ति के बाद लेकिन उपभोग से उसका वास्तविक रूप में एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाना व संग्रह करना भौतिक वितरण में लेकिन उपभोग से पहले भातिक वितरण में आता।
  1. प्रो० स्टेण्टन के अनुसार, “वस्तुओं के भौतिक बहाव का प्रबन्ध और बहाव प्रणा स्थापना एवं उसका संचालन भौतिक वितरण में शामिल है।”
भौतिक वितरण प्रणाली के कार्यों में भण्डारण, परिवहन एवं स्टॉक निर्णय सम्मिलित होते हैं।

भौतिक वितरण प्रणाली का महत्व

(Importance of Physical Distribution System) 

आधुनिक औद्योगिक एवं प्रतिस्पर्धा के युग में वस्तुओं के भौतिक वितरण का महत्व बहुत अधिक वितरण प्रणाली के महत्त्व का अध्ययन निम्नलिखित शीर्षकों के अन्तर्गत किया जा सकता हैं।
  1. वितरण लागत में कमी (Reduction in Distribution Cost) यदि कोई व्यवसायी भौतिक वितरण प्रणाली का उपयोग करे तो उसकी वितरण लागत में पर्याप्त कमी आ सकती लिए व्यवसायी को अपनी वस्तुओं का भण्डारण क्षेत्रीय आधार पर कछ ही स्थानों पर, जहाँ पर विस्तृत हो तथा ग्राहकों की संख्या/घनत्व अधिक हो वस्तुओं को समान आकार के मजबूत पैकिंग में पैक करके करना चाहिए।
  2. क्रय पर प्रभाव (Influence on Buying)-भण्डार सविधाओं का प्रभाव क्रय पर पड़ता है। यदि प्रबन्ध के पास भण्डार सुविधाएं पर्याप्त मात्रा में हैं, तो उनके द्वारा बड़ी मात्रा में क्रय करके लाभों को प्राप्त किया जा सकता है।
  3. मूल्यों के स्थिरीकरण में सहायता (Helpful in Stabilization of Prices)-भौतिक वितरण सविधाएँ मूल्य स्थिरीकरण में सहायता प्रदान करती है। एक निर्माता अपने माल को उस समय तक अपने गोदाम में रखकर प्रतीक्षा कर सकता है जब तक मूल्य उसके हित में नहीं आ जाते और एक बार मल्य उसके हित में आ जाने पर वह उनका स्थिरीकरण भी कर सकता है।
4.स्टॉक का आकार (Size of Inventory)-भौतिक वितरण सुविधाएँ स्टॉक के आकार को प्रभावित करती हैं। यदि सुविधाएँ उपलब्ध हैं, तो स्टॉक एक बड़ी मात्रा में रखा जा सकता है। निर्माता ) के पास बड़ी मात्रा में स्टॉक विक्रेता को यह सुविधा प्रदान करता है कि वे अपनी सुविधानुसार क्रय E) कर सकते हैं।
  1. उत्पाद नियोजन पर प्रभाव (Effect on Product Planning)—किसी भी वस्तु नियोजन पर उसके भौतिक वितरण का प्रभाव पड़ता है, माल जिस परिवहन साधन से भेजा जाता है उसका पैकिंग भी उसी के अनुरूप करना पड़ता है।
  2. उत्पाद नियोजन में सहायक (Helpful in Product Planning) भौतिक वितरण की परिवहन एवं भण्डारण क्रियाएँ उत्पाद नियोजन को अधिक प्रभावित करती हैं। वस्तु के आकार, पैकिंग तथा वजन आदि का निर्णय लेते समय भण्डार तथा परिवहन सुविधाओं को ध्यान में रखा जाता है।

भौतिक वितरण प्रणाली का क्षेत्र एवं उसके अंग 

(The Scope of Physical Distribution System and Its Components) 

समस्त भौतिक वितरण क्रियाओं का उद्देश्य अधिकतम ग्राहक सेवा न्यूनतम लागतों पर सम्भव करना होता है। इस दृष्टि से भौतिक वितरण क्षेत्र में निम्नलिखित निर्णय लेने होते हैं
  1. आदेश प्रसंस्करण सम्बन्धी निर्णय, 
  2. माल के परिवहन सम्बन्धी निर्णय,
III. माल के भण्डारण सम्बन्धी निर्णय, 
  1. माल के उतारने-चढ़ाने सम्बन्धी निर्णय,
  2. स्कन्ध/स्टॉक सम्बन्धी निर्णय। 

आदेश प्रसंस्करण सम्बन्धी निर्णय 

(Order Processing Decisions)

एक कम्पनी के प्रबन्ध को निर्णय लेना पड़ता है कि माल/उत्पादों के सम्बन्ध में प्राप्त आदेशों को किस प्रकार परा करेगी ? यदि माल के आदेशों को एक निश्चित समय के भीतर पूरा कर दिया “ता माल के संचरण एवं प्रवाह की गति बढ़ती है, माल के संग्रहण की लागत सीमित हो जाती है, “” का ख्याति बढ़ती है एवं कम्पनी के लाभों में वृद्धि होती है। अत: माल के भौतिक वितरण के सम्बन्ध में कम्पनी के द्वारा तुरन्त निर्णय लिया जाना चाहिए।  कम्पनी के वितरण प्रबन्धकों को आदेश प्रसंस्करण के सम्बन्ध में ये निर्णय लेने होते हैं-
  1. माल के आदेश का न्यनतम एवं अधिकतम आकार क्या होगा? 
  2. माल के आदेश की प्राप्ति के लिए कोई आदेश प्रारूप निर्धारित किया जायेगा या नहीं? 
  3. आदेश प्राप्ति में कम्पनी के विक्रेताओं की भूमिका क्या होगी? 
  4. आदेश प्राप्ति के बाद उसके प्रसंस्करण प्रक्रिया में कौन-कौन से कदम होंगे एवं उन्हें किस प्रकार सम्पन्न किया जायेगा?
  1. माल के परिवहन सम्बन्धी निर्णय (Transport Decisions of Goods) 
माल के भौतिक वितरण में परिवहन सेवाओं का विशेष महत्व है क्योंकि इनकी सहायता से, को उत्पादक/निर्माता से उपभोक्ता या प्रयोक्ताओं तक पहुँचाया जाता है। इसलिए कम्पनी के वित विभाग को माल के परिवहन सम्बन्धी निर्णय लेना आवश्यक है। परिवहन से सम्बन्धित निर्णय स्टॉक एवं भण्डारण सम्बन्धी निर्णय से सम्बन्धित है। माल ग्राहकों तक कई परिवहन साधनों के माध्यम से पहुँचाया जाता है, जैसे-सड़क, रेल, हवाई जहाज नाव, मोटर ट्रक एवं पाइप लाइन आदि। ये सभी साधन वस्तुओं की स्थान उपयोगिता (place utili’ को उत्पन्न करते हैं। इन परिवहन साधनों पर किया गया व्यय वस्तु की कुल लागत में वृद्धि करता है। यदि किसी साधन की परिवहन लागत अधिक है तो अन्य साधन का चुनाव किया जा सकता इसी प्रकार किसी साधन से माल देरी से पहुँचता है तो उसमें परिवर्तन करने का निर्णय किया सकता है।  III. माल के भण्डारण सम्बन्धी निर्णय (Warehousing Decision of Goods) भौतिक वितरण के लिए माल के भण्डारण सम्बन्धी निर्णय करना आवश्यक है, ताकि आवश्यकता के समय आदेशों को पूरा किया जा सके। इस सम्बन्ध में मुख्यतया तीन निर्णय लिये जाते
  1. भण्डारण कहाँ पर किया जाए? 
  2. भण्डारण कितना एवं किस स्थान पर किया जाए ?
  3. भण्डार संस्था के अपने हों अथवा किराये के। 
  4. माल को उतारने-चढ़ाने सम्बन्धी निर्णय (Goods Handling Decisions)
माल को एक स्थान से दूसरे स्थान पर भेजने के लिए परिवहन के साधनों में माल को चढ़ाया जाता है एवं फिर वहाँ पहुँचकर उन्हें उतारा जाता है। वितरण प्रबन्धक को माल के उतारने एवं चढ़ाने सम्बन्धी ये निर्णय लेने होते हैं-
  1. माल को उतारने-चढ़ाने के लिए मानव शक्ति का उपयोग किस रूप में एवं किस सीमा तक होगा? 
  2. माल को उतारने-चढ़ाने के लिए यन्त्रों एवं ऊर्जाओं का प्रयोग किस रूप में एवं किस सीमा तक होगा? 
  3. माल को उतारने-चढ़ाने के लिए कन्टेनर्स का उपयोग किस सीमा तक होगा?
यहाँ यह भी स्मरणीय है कि माल को उतारने-चढ़ाने की विधि को माल की प्रकृति, भार, पैकेजिंग, वित्तीय स्थिति, लागत, मात्रा, लम्बाई-चौड़ाई एवं सुरक्षा आदि घटक प्रभावित करते हैं। 
  1. स्कन्ध या स्टॉक सम्बन्धी निर्णय (Inventory Decision)
माल के भौतिक वितरण में वितरण प्रबन्धक को यह निर्णय लेना होता है कि माल के उचित प्रवाह के लिए कितना स्टॉक रखा जाये ? इसके दो आकार हो सकते हैं-
  1. अधिकतम आकार (Maximum Size)-अधिकतम आकार का आशय किसी निर्धारित सीमा तक माल का स्टॉक रखे जाने से है।
  2. न्यूनतम आकार (Minimum Size)-न्यूनतम आकार से तात्पर्य किसी भी समय उस वस्तु का स्टॉक निर्धारित सीमा से कम नहीं होना चाहिए, से है।
कम्पनी द्वारा किया गया विक्रय पूर्वानुमान जितना सही होगा, उतने ही अवसर व्यवसाय के लाभ को बढ़ाने के होंगे। अत: स्टॉक को भौतिक वितरण करने के लिए उस पर व्यय करना होगा, जैसे—उसमें विनियोजित पूँजी पर ब्याज देना होगा और उसका बीमा कराना होगा। इस प्रकार स्टॉक के आकार का निर्णय करते समय वितरण प्रबन्धक को इन व्ययों का भी उचित ध्यान रखना चाहिए।

स्कन्ध नियन्त्रण

(Inventory Control) 

स्कन्ध नियन्त्रण का अर्थ एवं परिभाषाएँ 

(Meaning and Definitions of Inventory Control)

स्कन्ध नियन्त्रण या सामग्री तालिका नियन्त्रण का अर्थ चल माल/वस्तओं की विवरण सूचा करना एवं उनकी गणना करने स है। अन्य शब्दों में, सामग्री की मात्रा का नियमन करने के आता स्कन्ध नियन्त्रण का सम्बन्ध स्कन्ध को इस प्रकार व्यवस्थित ढंग से प्राप्त करने, स्टोर करने, निर्गमन करने और अभिलेख रखने से है ताकि कार्य संचालन विभागों को उचित समय पर उचित मात्रा में एवं तम सेवा लागत पर उपलब्ध हो सके। स्कन्ध नियन्त्रण की मुख्य-मुख्य परिभाषाएँ निम्नलिखित हैं- प्रो. क्रीटनर के शब्दों में, “स्कन्ध नियन्त्रण माल के भण्डारण के समुचित स्तरों को निर्धारित जाने एवं बनाये रखने की प्रक्रिया है। “गॉर्डन बी० कारसन के अनुसार, “स्कन्ध नियन्त्रण ऐसी प्रक्रिया है जिसमें स्कन्ध में रखी सामग्री कानों में विनियोग का प्रबन्ध द्वारा स्थापित स्कन्ध नीति के अनुसार पूर्व निर्धारित सीमाओं में नियमन किया जाता है।” स्कन्ध नियन्त्रण के उद्देश्य (Objectives of Inventory Control) सार्वजनिक उपक्रमों के ब्यूरों के अनुसार, स्कन्ध नियन्त्रण के चार उद्देश्य होते हैं-1. व्यवसाय अवरूद्ध (Locked-up) पूँजी में कमी करना, 2. इस बात के प्रति आश्वस्त होना कि उत्पादन बिना किसी बाधा के निर्बाध गति से होता रहे, 3. इस बात को निश्चित करना कि निर्मित माल की बिक्री मारू रूप से होती रहे, एवं 4. उत्पादन में भारी उतार-चढ़ाव को रोकना। 

कन्ध नियन्त्रण की तकनीकें/विधियाँ 

(Techniques or Methods of Inventory Control)

स्कन्ध नियन्त्रण की एक क्रमबद्ध व्यवस्था में सामग्री की न्यूनतम एवं अधिकतम सीमाओं का निर्धारण, पुन: आदेश बिन्दुओं का निश्चयन एवं मितव्ययी क्रयादेश मात्रा आदि महत्वपूर्ण हैं। स्कन्ध का उचित आकार बनाये रखना भी एक महत्वपूर्ण समस्या है क्योंकि स्कन्ध का आकार बढ़ने पर कुछ लागतें भी बढ़ जाती हैं, जिनके परिणामस्वरूप उत्पादन लागत भी बढ़ती है। अत: उन्हें नियन्त्रित करने के लिए विभिन्न विधियाँ या तकनीकें प्रयुक्त की जाती हैं। स्कन्ध नियन्त्रण की विभिन्न विधियाँ या तकनीकें निम्नलिखित हैं- I.न्यूनतम-अधिकतम तकनीक। 
  1. पुन: आदेश बिन्दु तकनीक। 
III. वेड विश्लेषण तकनीक। 
  1. ए० बी० सी० विश्लेषण तकनीक।
  2. मितव्ययी/आर्थिक आदेश मात्रा तकनीक।
  3. न्यूनतम-अधिकतम तकनीक (Minimum-Maximum or Mini-Maxi Technique) स्कन्ध नियन्त्रण की इस तकनीक में स्कन्ध की प्रत्येक मद हेतु एक अधिकतम एवं न्यूनतम स्तर निर्धारित कर दिया जाता है। इस तकनीक के अन्तर्गत अधिकतम स्कन्ध स्तर का निर्धारण माग या आवश्यकता की तीव्रता के आधार पर किया जाता है। न्यूनतम स्तर उस स्तर पर निर्धारित किया जाता है जिस पर सामग्री क्रय आदेश देने पर आदेश अवधि में उत्पादन रूकने की सम्भावना न हो। इसलिए स्कन्ध के न्यूनतम स्तर पर सामग्री का क्रय आदेश दे दिया जाता है जिससे सामग्री के प्राप्त होने के पश्चात् सामग्री का अधिकतम स्तर प्राप्त हो जाता है। 
  4. पुनः आदेश बिन्दु तकनीक (Re-Order Point Technique)-पुनः आदेश बिन्दु/स्तर से तात्पर्य भण्डार गृह में स्कन्ध की मात्रा के उस स्तर से है जिस पर पहुंचते ही माल के क्रय सम्बन्धी कार्यवाही प्रारम्भ कर दी जानी चाहिए ताकि स्कन्ध के न्यूनतम स्तर तक पहुँचने से पूर्व ही आदेशित माल प्राप्त हो जाये।
पुन: आदेश स्कन्ध स्तर का निर्धारण करते समय इन बातों को ध्यान में रखना चाहिए- (i) आदेश की कार्यवाही का समय,  (ii) संस्था में माल की खपत,  (iii) आदेश देने के पश्चात् माल प्राप्त होने की अवधि आदि। III. वेड विश्लेषण तकनीक (VED Analysis Techique)-वेड से अभिप्राय Vital, Essential and Desirable-अत्यावश्यक, आवश्यक एवं वांछनीय से है। वर्गीकरण की यह तकनीक र पाटस के स्कन्ध के प्रबन्ध एवं नियन्त्रण हेतु सामान्यत: काम में ली जाती है। 
  1. ए० बी० सी० विश्लेषण तकनीक (ABC Analysis Technique)-ए० बी० सी० का ह, Always Better Control -सदैव बेहतर नियन्त्रण। यह स्कन्ध नियन्त्रण तकनीक ‘अपवाद बन्च (ManagementbyException) सिद्धान्त पर आधारित है। 
इस तकनीक में वस्तुओं की विभिन्न मदों का विश्लेषण उनके मूल्यों के आधार पर तीन वर्गों में विभक्त करके किया जाता है। ये तीन वर्ग A, B एवं C होते हैं अत: इसे ABC Analysis कहते हैं। + अनुसार तीन विभिन्न वर्ग अग्र प्रकार बनाए जाते हैं A वर्ग-सबसे अधिक महत्वपूर्ण एवं मूल्यवान या कीमती वस्तुएँ।  B वर्ग–अपेक्षाकृत कम महत्वपूर्ण एवं कीमती वस्तुएँ।  C वर्ग-सबसे कम महत्वपुर्ण एवं कम कीमती वस्तुएँ। प्रबन्ध, A वर्ग अर्थात महत्वपूर्ण वस्तुओं के नियन्त्रण पर अधिक ध्यान केन्द्रित करते हैं पर वर्ग अर्थात् कम महत्वपूर्ण तथा कम कीमती वस्तुओं पर नियन्त्रण का कार्य लिपिक वर्ग पर छोड दिया जाता है।
  1. मितव्ययी या आर्थिक आदेश मात्रा तकनीक (Economic Order Quantity E.0.0.) मितव्ययी आदेश मात्रा का अर्थ एक ऐसी आदर्श मात्रा से है जो एक बार में मितव्ययितापूर्ण तरीका खरीदी जा सकती है और जिसके लिए आदेश दिया जाना चाहिए। अत: संस्था द्वारा क्रय की जर वाली वस्तु की उस मात्रा को आर्थिक आदेश मात्रा कहते हैं, जिस पर न्यूनतम व्यय हो।
वचन एवं कोइग्सि वर्ग के अनुसार, “मितव्ययी आदेश मात्रा, वह आदेश मात्रा है, जिसस.स स्कन्ध प्रबन्ध को कुल परिवर्तनशील लागते न्यूनतम होती हैं। ” यदि कोई संस्था अपनी वर्ष भर की आवश्यकता का स्कन्ध एक साथ क्रय करती है, तो स्कन्ध रखने की लागत (Carrying Cost) बढ़ जायेगी जबकि आदेश देने की लागत (Ordering Cost) हो जायेगी। दूसरी ओर, यदि संस्था थोड़ी-थोड़ी मात्रा में स्कन्ध का क्रयादेश देती है, तो क्रयादेशों की संख्या बढ़ने से कुल क्रयादेश व्यय बढ़ जायेंगे तथा संस्था पारिमाणिक छूट (Quantity Discount से भी वंचित रह जायेगी। किन्तु, ऐसा करने से स्कन्ध रखने की लागतें (Carrying Costs) कम हो जायेंगी। __  इस प्रकार स्कन्ध रखने की लागतों तथा आदेशों की लागत में ऋणात्मक या परस्पर विरोधी सम्बन्ध होता है। अतः स्कन्ध का क्रयादेश उस मात्रा या आकार के लिए दिया जाना चाहिए, जहाँ पर स्कन्ध रखने की लागतों तथा क्रयादेश देने की लागतों (Carrying Costs and Ordering Costs) में सन्तुलन स्थापित होता हो। क्रयादेश की इस मात्रा पर ही स्कन्ध न्यूनतम व्ययों पर प्राप्त किया जा सकता है। इसीलिए इस मात्रा को ही मितव्ययी या आर्थिक आदेश मात्रा (EOQ) कहते हैं।

Follow Me

Facebook

[PDF] B.Com 1st Year All Subject Notes Question Answer Sample Model Practice Paper In English

Leave a Reply

Your email address will not be published.

*