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B.Com 1st Year Business Communication Hindi Short Notes

B.Com 1st Year Business Communication Hindi Short Notes :-

खण्ड ‘अ’ : 

लघु उत्तरीय प्रश्न 

प्रश्न – गैर-क्रिया सम्प्रेषण क्या है? 

What is Non-verbal Communication?

उत्तर – मानवशास्त्रियों का यह विचार है कि जब से मानव जाति ने परस्पर वार्तालाप प्रारम्भ किया होगा तब सर्वप्रथम उसने अपने शरीर के विभिन्न अंगों के माध्यम से इशारों में सन्देश दिए होंगे। धीरे-धीरे वे इशारे किसी प्रकार से एक-एक शब्द में बदल गए 1 परिणामस्वरूप एक भाषा का निर्माण हुआ होगा। उदाहरण के लिए, जब व्यक्ति, यहाँ तक कि जानवर को भी जब क्रोध आता है तब उस क्रोध की अभिव्यक्ति वह दांत पीसकर करता है। इसके विपरीत, स्नेह प्रकट करने की स्थिति में वह दूसरे को स्पर्श करना पसन्द करता है।

सम्प्रेषण प्रक्रिया में सन्देशों का आदान-प्रदान होता है। प्रेषक तथा प्राप्तकर्ता सन्देश एवं विचार को समान अर्थ में समझते हैं। इस प्रक्रिया में सन्देश जब शब्दों में व्यक्त किया जाए तो उसको शाब्दिक सम्प्रेषण (Verbal communication) कहते हैं। इसके विपरीत, जब सन्देश शब्दों के अतिरिक्त चिह्नों (Signs), लक्षणों (Symptoms) अथवा संकेतों (Signals) तथा सूचित चिह्नों के द्वारा सम्प्रेषित हो तो उसे अशाब्दिक सम्प्रेषण (Non-verbal Communication) कहते हैं।प्राचीन समय में जब मानव ने भाषा की खोज नहीं की थी, उस समय भी वह अपने सन्देशों का आदान-प्रदान संकेतों एवं चिह्नों के माध्यम से करता था। आज इक्कीसवीं शताब्दी में जब मानव सभ्यता काफी विकसित हो गई है तो सूचना सम्प्रेषण के अनेकों आधुनिक साधन एवं तन्त्र मानव के पास उपलब्ध हैं। लेकिन इसके बावजूद आज भी अशाब्दिक सम्प्रेषण मानव के लिए प्रासंगिक एवं महत्त्वपूर्ण है। वह विचार, भाव अथवा सन्देश जो हजारों शब्दों में भी सम्प्रेषित नहीं हो पाता, वह मात्र संकेत, चित्र, हाव-भाव, भाव-भंगिमा द्वारा कुछ सेकण्डों में ही सम्प्रेषित किया जा सकता है क्योंकि मानव की ज्ञानेन्द्रियों का बोध एवं उनका प्रभाव मानव-जीवन के अस्तित्व का प्रमाण है। इस प्रकार अशाब्दिक सम्प्रेषण, सम्प्रेषण का एक प्राकतिक, स्वाभाविक एवं शक्तिशाली माध्यम है। इसको संकेत सम्प्रेषण भी कहते हैं। अशाब्दिक सम्प्रेषण के संकेत, ज्ञान, विचार, दृष्टिकोण, विश्वास एवं भावनाओं के प्रतीक होते हैं, जिनका सामयिक ढंग से वातावरण के अनुरूप सम्प्रेषण हेतु चयन किया जाता है।

प्रश्न – आन्तरिक सम्प्रेषण से क्या आशय है? 

What is meant by Internal Communication ?

उत्तर – सामान्यता आन्तरिक सम्प्रेषण से आशय संगठन के मध्य विभिन्न व्यक्ति समूहों, विभागों, शाखाओं के मध्य सन्देशों के आदान-प्रदान से है जिससे संगठन के सभी लोग समान लक्ष्यों के लिए कार्य कर सकें। बड़े आकार वाली संस्थाओं में जहाँ अनेक विभाग शाखाएं एवं अधिक संख्या में कर्मचारी कार्यरत हैं, वहाँ आन्तरिक सन्देशों का शोक परिशुद्धता, गोपनीयता से आदान-प्रदान कर विभिन्न विभागों की गतिविधियों में समन्वय तथा कार्य एवं कर्मचारियों पर प्रभावी नियन्त्रण रखा जा सकता है। जार्ज आर० टैरी के अनसार “सम्प्रेषण वह ऊर्जा है जो कि प्रबन्ध प्रक्रिया के सफल संचालन को उत्साहित करती है।” आन्तरिक सम्प्रेषण की प्रक्रिया में सन्देश भेजने वाले का सन्देश प्रेषण के साथ-साथ यह दायित्व भी है कि वह इस बात की पुष्टि करे कि सन्देश का तात्पर्य प्राप्तकर्ता द्वारा सम्बन्धित अर्थ में समझा गया है। सन्देश प्राप्तकर्ता का दायित्व है कि वह न केवल सन्देश को प्राप्त करे वरन् उसे समझकर स्वीकृत करे बल्कि सम्बन्धित कार्य को प्रतिपुष्टि प्रदान करे। वर्तमान समय में संगठित व्यावसायिक उपक्रम का प्रत्येक व्यक्ति संवहन के लिए उत्तरदायी होता है।

प्रश्न – प्रतिपुष्टि के महत्त्व पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए। 

Write short note on Importance of Feedback. 

उत्तर – प्रतिपुष्टि का महत्त्व (Importance of Feedback) प्रतिपुष्टि सूचना के आदान-प्रदान तथा सन्देश-प्रेषक व सन्देशग्राही के मध्य समझ की – पुष्टि करती है। जब सन्देश-प्रेषक द्वारा सन्देशग्राही को सन्देश सम्प्रेषित किया जाता है तो। सन्देश-प्रेषक उस सन्देश की प्रतिपुष्टि चाहता है, भले ही वह सन्देश के अनुकूल हो या प्रतिकूल। केवल जे० कुमार के अनुसार

“Feedback is the receiver’s reaction to the message whether favourable or hostile.

प्रतिपुष्टि एक ऐसा दिशा-निर्देश होती है, जिसके द्वारा सन्देश-प्रेषक अपने सन्देश को अत्यन्त प्रभावशाली ढंग से सम्प्रेषित करने का प्रयास करता है। जब सन्देशग्राही गहीत सन्देश – का अनुकूल या प्रतिकूल उत्तर देता है, तब प्रतिपुष्टि की प्रक्रिया पूर्ण हो जाती है।

सम्प्रेषण-प्रक्रिया को सफल बनाने में प्रतिपुष्टि अत्यन्त महत्वपर्ण है। सन्देश भेजने के बाद यह जानना आवश्यक हो जाता है कि संग्राहकों ने उसे ग्रहण किया या नहीं। वास्तव प्रतिपुष्टि द्विमार्गी पद्धति है

(1) सम्प्रेषक से संग्राहक तक, (2) संग्राहक से सम्प्रेषक तक।प्रतिपुष्टि दो प्रकार की होती है-पहली धनात्मक तथा दूसरी ऋणात्मका स सन्देश उपयोगी सिद्ध हो रहा है या नहीं, सम्प्रेषण प्रक्रिया में यदि कोई कमी रह गई हता कहाँ और कैसे सुधारा जा सकता है-इन सभी आशंकाओं का उत्तर प्रतिपुष्टि से प्राप्त सम्प्रेषण का एकमार्गी होना सम्प्रेषण की सबसे बड़ी बाधा है। प्रतिपुष्टि सन्देश को श्रोता आवश्यकतानुसार लयबद्ध बनाती है। सम्प्रेषण की साख के लिए प्रतिपुष्टि अपरिहार्य

प्रश्न – ओता विश्लेषण क्या है? 

What is Audience Analysis ?

उत्तर – श्रोता विश्लेषण

(Audience Analysis) 

श्रोताओं का समूह सम्प्रेषण का दूसरा किनारा एवं महत्त्वपूर्ण पक्ष होता है। श्रोताओं की प्रतिक्रिया, प्रतिपुष्टि अथवा प्रत्युत्तर सम्प्रेषण प्रक्रिया का महत्त्वपूर्ण घटक है। सम्प्रेषण प्रक्रिया में श्रोताओं की भूमिका निम्नांकित चित्र द्वारा प्रदर्शित की जा सकती है –

व्यावसायिक सम्प्रेषण प्रक्रिया में सन्देश एवं प्रत्युत्तर क्रमश: Input तथा Output . होते हैं। सन्देश एवं उनके प्रत्युत्तर द्वारा आन्तरिक एवं बाह्य दोनों पक्षों को प्रभावित/प्रेरित (Influence) कर संगठनात्मक छवि (Organisational Image) का निर्माण किया जाता है। सम्प्रेषण द्वारा सहयोगियों, वैयक्तिक, प्रबन्धकीय, संगठनात्मक एवं व्यावहारिक । क्षमताओं को विकसित करने के लिए प्रेरित करना तथा साथ-साथ बाह्य पक्षों के मध्य संगठन, उत्पाद, कार्यप्रणाली की स्वच्छ छवि को निर्मित करना प्रमुख ध्येय होता है। इस लक्ष्य पूर्ति के लिए सम्प्रेषण के प्रभावों का परीक्षण एवं उनका अध्ययन ही श्रोता विश्लेषण कहा जाता है।

प्रश्न – सम्प्रेषण के मुख्य उद्देश्य क्या हैं? 

What are the main objectives of communication ? 

उत्तर – सम्प्रेषण के मुख्य उद्देश्य

(Main Objectives of Communication) 

सम्प्रेषण का प्रमुख उद्देश्य है कि हम जिस बात का सम्प्रेषण करते हैं, वह इच्छित व्यक्ति तक सुगमतापूर्वक तथा मूल रूप से पहुँच सके। अध्ययन की सुविधा हेतु सम्प्रेषण के उद्देश्यों का वर्गीकरण निम्न प्रकार किया जा सकता है

1, उचित सन्देश देना – यह सम्प्रेषण का मुख्य उद्देश्य है। इसमें उचित सन्देश, उचित समय पर, उचित व्यक्ति को सम्प्रेषित करना होता है। जो सूचना सम्प्रेषणकर्ता द्वारा सूचनाग्राही को प्रेषित की जा रही है उसको सूचनाग्राही भी सही अर्थों में प्राप्त करे, इस हेतु सचना-प्रेषणकर्ता को उचित माध्यम का प्रयोग करना अनिवार्य होता है।

2. प्रबन्धन कुशलता को बढ़ाना – सम्प्रेषण के माध्यम से एक मानवीय व्यवसाय की गतिविधियों को अच्छी तरह से समझा जा सकता है। सम्प्रेषण द्वारा संगठन में घटित होने वाली घटनाओं, विचारों, शिकायतों एवं सुझावों को एक निम्नस्तरीय प्रबन्धन द्वारा अपने अधिकारी को अवगत कराना सम्भव एवं सुगम होता है।

3. कार्यों में समन्वय – सम्प्रेषण का मुख्य उद्देश्य संवेगों को निश्चित व्यक्ति तक सही रूप में पहुँचाना होता है। इसमें सूचना, आदेश तथा सलाह आदि को प्रेषित किया जाता है. जिसके लिए समस्त कार्यों में समन्वय होना आवश्यक होता है।

4. नीतियों का क्रियान्वयन – व्यावसायिक नीतियों को इस प्रकार से क्रियान्वित किया जाता है कि सम्प्रेषण के उद्देश्यों का क्षय न हो पाए। शीघ्र निर्णय लेने के लिए समंकों का संकलन आवश्यक क्रिया है, अतः सम्बन्धित सूचनाओं का उचित संकलन किया जाता है।

प्रश्न – प्रतिपुष्टि से क्या आशय है? 

What is meant by Feedback? 

उत्तर – प्रतिपुष्टि का आशय (Meaning of Feedback) प्रतिपुष्टि एक प्रत्यार्पित सन्देश होता है, जो सन्देश प्राप्तकर्ता सम्प्रेषक को देता है। जब सम्प्रेषक सूचनाग्राही अथवा प्राप्तकर्ता को सन्देश भेजता है तो उस भेजे गए सन्देश की प्रतिक्रिया चाहता है। सन्देश प्राप्त कर लेने के बाद सन्देश प्राप्तकर्ता द्वारा उस सन्देश को उचित प्रकार से समझा जाता है, तत्पश्चात् सन्देश पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की जाती है। इस प्रतिक्रिया का स्वरूप अनुकूल भी हो सकता है और प्रतिकूल भी। यही प्रतिक्रिया प्रतिपुष्टि कहलाती है। प्रतिपुष्टि सन्देश प्रक्रिया का अन्तिम महत्त्वपूर्ण तत्त्व है। प्रतिपुष्टि के अभाव में कोई भी सम्प्रेषण प्रक्रिया पूर्ण नहीं हो सकती। प्रतिपुष्टि के आधार पर ही सम्प्रेषक पूर्व सन्देश में परिवर्तन, सुधार अथवा संशोधन करके उसे प्रभावी स्वरूप प्रदान करता है।

प्रश्न – सम्प्रेषण की बाधाओं को दूर करने के लिए सुझाव दीजिए। 

Give suggestions to remove the barriers of communication. 

उत्तर- सम्प्रेषण की बाधाओं को दूर करने के लिए सुझाव 

(Suggestions to Remove the Barriers of Communication) 

सम्प्रेषण की बाधाओं को दूर करने के लिए निम्नलिखित सुझाव प्रस्तुत हैं

(1) सम्प्रेषक को सम्प्रेषण में सरल व स्पष्ट भाषा का प्रयोग करना चाहिए।

(2) सम्प्रेषक द्वारा प्रसारित किए जाने वाले सम्प्रेषण का समय उचित रूप से निर्धारित होना चाहिए।

(3) परिस्थितियों के अनुगामी सम्प्रेषण के दिशा-निर्देश तय कर लेने चाहिए।

(4) सम्प्रेषक व प्राप्तकर्ता के बीच सही अनुकूलन होना आवश्यक है। दोनों के मध्य एकरूपता का होना भी अति महत्त्वपूर्ण है।

(5) यदि सम्प्रेषण की क्रिया आमने-सामने हो रही है तो आशंका का निवारण तत्क किया जाना सम्प्रेषण की बाधा को विकसित होने से रोक देता है।

(6) सम्प्रेषण की अभिव्यक्ति तथा भाषा सम्प्रेषणग्राही के व्यक्तित्व को ध्यान में रख अपनाई जानी चाहिए।

(7) सन्देश के पश्चात् यदि आवश्यकतानुसार उसकी प्रतिपुष्टि की जा सके तो सम्म चाहि की बाधा का सम्यक् निराकरण हो सकता है।

(8) सम्प्रेषण की सम्पूर्ण क्रिया में श्रवणता का अति महत्त्वपूर्ण अवदान होता है, अत: सम्प्रेषण की बाधा से बचने के लिए श्रवणता के तत्त्व का उचित पालन किया जाना चाहिए।

(9) प्रत्यक्ष सम्प्रेषण करते समय अन्य पक्ष के शारीरिक हाव-भाव का महत्त्व बढ़ जाता है। ऐसा करने से सम्प्रेषण में आने वाली बाधा को दूर किया जा सकता है अथवा बाधा के विकसित होने से पूर्व ही उसका निराकरण हो सकता है।

प्रश्न – एक प्रभावी श्रवणता के अवरोधक कौन हैं? श्रवणता को प्रभावी बनाने के तरीके बताइए।

What are the barriers to effective listening ? Explain the tools to make listening effective. 

उत्तर- प्रभावी श्रवण में आने वाली बाधाएँ

(Barriers to Effective Listening) 

प्रभावी श्रवण में आने वाली प्रमुख बाधाएँ निम्नलिखित हैं-

(1) सम्प्रेषण की रफ्तार या गति प्रभावी श्रवण की एक प्रमुख बाधा है। 

(2) सांस्कृतिक विविधताएँ प्रभावी श्रवण की मुख्य बाधा है। 

(3) प्रशिक्षण की कमी प्रभावी श्रवण की मुख्य बाधा है।

(4) सम्प्रेषक तथा सन्देश प्राप्तकर्ता की विचारधारा समान न होना प्रभावी श्रवण की। प्रमुख बाधा है।

(5) सम्प्रेषक में अहंकार की भावना प्रभावी श्रवण में बाधा उत्पन्न करती है। 

(6) बड़ा सन्देश होने पर समझने में कठिनाई होती है। 

(7) अनुभूति का चयनित न होना व असीमित होना प्रभावी श्रवण की मुख्य बाधा है।

श्रवणता को प्रभावी बनाने के तरीके

(Tools to Make Listening Effective) 

श्रवणता को प्रभावी बनाने के प्रमुख तरीके निम्नलिखित हैं-

1) पूर्ण संयम बरतना चाहिए।

(2) श्रवणता के समाप्त होने के पश्चात् ही अपने प्रश्नों का उत्तर सम्प्रेषक से लेना चाहिए।

(3) श्रवणता के समय बोलना नहीं चाहिए। 

(4) सम्प्रेषक को ध्यान से सुनना चाहिए, बीच में अपने फैसले नहीं देने चाहिए। 

(5) सम्प्रेषण स्वतन्त्र होना चाहिए। 

(6) स्वयं को सम्प्रेषक की स्थिति में रखकर व्यवहार करना चाहिए। 

(7) श्रवण करने की इच्छा तथा एकाग्रता लानी चाहिए।

(8) श्रवणता के समय हिचकिचाहट, अवरोध तत्त्वों, बातचीत आदि की उपेक्षा करनी चाहिए।

प्रश्न – शारीरिक स्पर्श से क्या आशय है तथा इसकी विभिन्न श्रेणियाँ क्या हैं?

What is meant by Body Contact ? What are different classes of body contact? 

उत्तर – शारीरिक स्पर्श (Body Contact) 

स्पर्श सम्प्रेषण का प्राथमिक स्वरूप है। शरीर के विभिन्न हिस्सों में स्पर्श विभिन्न प्रकार के सम्प्रेषण को सम्प्रेषित करते हैं, साथ ही स्पर्श क्रिया पर स्थान का भी प्रभाव पड़ता है। इसके अन्तर्गत टक्कर मारना, भिड़ जाना, धक्का देना, पकड़ना/धारण करना, थपथपाना/टहोकना, हाथ मिलाना, आलिंगन करना इत्यादि क्रियाएँ सम्मिलित हैं। इनका प्रयोग कई प्रकार के सम्बन्धों व स्थितियों को व्यक्त करता है जैसे विभिन्न व्यक्तियों का सार्वजनिक या निजी स्थानों पर स्पर्श करना, कौन व्यक्ति किसको स्पर्श कर रहा है व उनके बीच क्या सम्बन्ध है आदि बातें भी शारीरिक स्पर्श के विभिन्न पहलुओं को जन्म देती हैं। डॉक्टर व मरीज के बीच शारीरिक स्पर्श, पति-पत्नी के बीच शारीरिक स्पर्श, आशीर्वाद के रूप में दिया गया शारीरिक स्पर्श इत्यादि में शारीरिक स्पर्श के विभिन्न पहलू विद्यमान हैं।

शारीरिक स्पर्श की श्रेणियाँ

(Classes of Body Contact) 

जॉन्स व मार्वग ने शारीरिक स्पर्श क्रियाओं के विश्लेषण के आधार पर शारीरिक स्पर्श की निम्नलिखित पाँच श्रेणियाँ बताई हैं

1. नियन्त्रण – सावधान व अनुपालन। 

2. सजीवता – परिहास व प्रसन्नता/जिन्दादिली।

3. अनुष्ठानिक – संस्कार, विधि या धार्मिक आवश्यकताओं के लिए; जैसेशुभकामनाएँ व मृत्यु/प्रयाण सम्बन्धी।

4. अनुकूल प्रभाव – सम्मान, प्रशंसा, लगाव, आश्वासन, प्रशिक्षण या मौन रुचि। 

5. कार्य सम्बन्धी नियमित कार्य से सम्बन्धित; जैसे-नर्स द्वारा नब्ज का देखा जाना।

इसके अतिरिक्त प्रतिकूल प्रभावी व आक्रमणशील स्पर्श भी होते हैं जैसे–क्रोधवश है हाथ उठाना, धक्का देना, मुक्का मारना इत्यादि।

प्रश्न – प्रभावशाली लेखन के लिए कौन-कौन सी बातों का होना। आवश्यक है?

What are the guidelines for effective writing? 

उत्तर- प्रभावशाली लेखन के लिए आवश्यक बातें

(Guidelines for Effective Writing) 

प्रभावशाली लेखन के लिए आवश्यक बातें निम्नलिखित हैं

(1) लेखन की शैली विषय के अनुरूप तथा बोधगम्य होनी चाहिए। 

(2) व्यावसायिक लेखन में लेखन-सामग्री को विवरणात्मक रूप दिया जाना चाहिए

(3) लेखन में सामान्य बोलचाल की भाषा का प्रयोग अधिक उचित तथा कारगर । रहता है।

(4) शब्दों का चयन विषय के अनुरूप होना चाहिए। व्यावसायिक लेखन में साहित्यिक भाषा के मोह से बचना चाहिए तथा विषयपरक बात ही लिखी जानी चाहिए।

(5) अव्यावहारिक शब्दों के प्रयोग से यथासम्भव बचना चाहिए।

(6) लेखन में आवश्यकता होने पर भी कठोर शब्दों का प्रयोग नहीं करना चाहिए। जहाँ तक हो सके भाषा व शैली को मधुर रखना चाहिए। मृदुलता प्रत्येक ग्राही-पक्ष को अच्छी लगती है।

प्रश्न – श्रोता से क्या आशय है? श्रोता कितने प्रकार के होते हैं?

What is meant by Audience ? What are different types of audience? 

उत्तर – श्रोता से आशय

(Meaning of Audience) 

एक सम्प्रेषणग्राही ही श्रोता कहलाता है। किसी सन्देश के सफल सम्प्रेषण हेतु श्रोता का विश्लेषण अत्यन्त आवश्यक है क्योंकि श्रोता की प्रकृति सम्प्रेषक के उद्देश्य/लक्ष्य को प्रत्यक्षतः प्रभावित करती है। अत: यह जानना आवश्यक है कि सन्देश प्राप्तकर्ता अथवा श्रोता कौन है।

श्रोता के प्रकार

(Types of Audience) 

एक संगठन में किसी सन्देश/वक्तव्य से सम्बन्धित श्रोताओं को निम्नलिखित वर्गों में विभाजित किया जाता है

1. प्राथमिक श्रोता – प्राथमिक श्रोता से अभिप्राय उस श्रोता से है, जो सम्प्रेषण के उद्देश्य को अनिवार्य रूप से पूर्ण कर सकता है। यह सदैव सन्देश के अनुरूप क्रियाशील होता है।

2. द्वितीयक श्रोता – द्वितीयक श्रोता उसे कहते हैं, जो सन्देश की पुष्टि के उपरान्त ही उसे क्रियान्वित करता है।3. निरीक्षक हितप्रहरी श्रोता – निरीक्षक (हितप्रहरी) श्रोता केवल सम्प्रेषण व प्राथमिक श्रोता के मध्य सन्देश के आदान की क्रिया पर गुप्त निगाह रखता है और भविष्य में सन्देश के मूल्यांकन के आधार पर प्रतिक्रिया करता है। इसके पास न तो सन्देश को रोकने का और न ही सन्देश की प्रत्यक्ष क्रिया करने का अधिकार होता है, परन्तु सन्देश का विश्लेषण कर वह उसे अपनी भविष्य की कार्यवाही का आधार बना सकता है। श्रोता के विश्लेषण में श्रोता का आयु-समूह (वर्ग) एक महत्त्वपूर्ण वर्ग है।

प्रश्न – प्रतिवेदन से क्या आशय है? 

What is meant by a report? 

उत्तर – प्रतिवेदन (Report) 

किसी समस्या का पूर्ण अध्ययन कर सारे तथ्यों व सूचनाओं को एकत्रित करके तथा उनकी जाँच व छानबीन करके उपयुक्त निष्कर्ष निकालना तथा उस जाँच के सम्बन्ध में सुझावों को वैज्ञानिक ढंग से प्रस्तुत करना प्रतिवेदन या रिपोर्ट का उद्देश्य होता है। प्रतिवेदन के माध्यम से पाठकों को एक विषय से सम्बन्धित सभी पहलुओं पर, एक ही स्थान पर पूर्ण जानकारी प्रदान की जाती है। अन्य शब्दों में कह सकते हैं कि प्रतिवेदन एक ऐसी प्रक्रिया का अंश है. जिसके माध्यम से विस्तृत सूचना या ज्ञान को उन व्यक्तियों तक पहुँचाया जाता है, जिन्हें इसकी आवश्यकता होती है। आधुनिक समय में शायद ही कोई ऐसा व्यावसायिक क्षेत्र होगा, जहाँ प्रतिवेदन का प्रचलन न हो। व्यावसायिक प्रक्रिया में कई अवसरों पर प्रतिवेदन लेखन की आवश्यकता होती है। एक कनिष्ठ अधिकारी अपने उच्च अधिकारी को, निजी सचिव अपने अधिकारी को समय-समय पर प्रतिवेदन प्रेषित करता है। प्रतिवेदन एक समस्या या विषय को परिभाषित करता है। यह तथ्यों को क्रमवार सम्भावित सीमा तक प्रस्तुत करने का प्रयास है।

प्रमुख विद्वानों ने प्रतिवेदन को निम्नलिखित रूप में परिभाषित किया है

मर्फी व चार्लीस के अनुसार, “व्यावसायिक प्रतिवेदन एक निश्चित, महत्त्वपूर्ण, व्यावसायिक उद्देश्य से एक या अधिक व्यक्तियों द्वारा किया गया तथ्यों का निष्पक्ष योजनाबद्ध प्रस्तुतीकरण है।”

डॉक्टर व डॉक्टर के अनुसार, “प्रतिवेदन एक ऐसा प्रलेख है, जिसमें सूचना देने के उद्देश्य से किसी विशेष सूचना की जाँच की जाती है और उस सम्बन्ध में निष्कर्ष, विचार एवं : कभी-कभी सिफारिशें भी प्रस्तुत की जाती हैं।”

प्रश्न – क्या सम्प्रेषण द्वारा आत्मविकास में सुधार किया जा सकता है? 

Is improvement possible in self-development by communication? 

उत्तर- सम्प्रेषण द्वारा आत्मविकास में सुधार 

(Improvement in Self-development by Communication)

सम्प्रेषण एवं आत्मविकास के अन्तर्सम्बन्ध में आत्मविश्वास महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा – करता है, क्योंकि प्रभावी सम्प्रेषण तभी सम्भव है जब सम्प्रेषक पर्ण आत्मविश्वास के साथ सन्देश सम्प्रेषित करे। आत्मविश्वास आत्मविकास का एक महत्त्वपूर्ण एवं अभिन्न अंग है। एक प्रभावी व्यावसायिक सम्प्रेषण आत्मविकास में निम्नलिखित रूपों में सुधार कर सकता है।

1. मौखिक सम्प्रेषण (भाषण) व आत्मविकास – मौखिक सम्प्रेषण के वि स्वरूप; यथा- भाषण, वाद-विवाद आदि आत्मविकास में वृद्धि के महत्त्वपूर्ण उपकरण यदि एक वक्ता अपने विषय में गहन अध्ययन कर वक्तव्य में तर्को व तथ्यों को समाहित भाषण देता है तो वह अधिक प्रभावशाली होता है।

2. अभाषित सम्प्रेषण (शारीरिक भाषा) व आत्मविकास – अभाषित सम्प्रेषण विभिन्न स्वरूप; यथा-भाव-भंगिमा, मुद्रा व आसन आदि आत्मविकास को बढ़ाते है।

अभाषित सम्प्रेषण का निरन्तर प्रयोग व समझ, व्यक्ति की बौद्धिक क्षमता को बढ़ाते हैं। अभाषित सम्प्रेषण के ये स्वरूप केवल रुचिकर ही नहीं, अपितु निर्देशात्मक भी हैं तथा ये आत्मविकास को बढ़ाने में सहायक हैं।

3,लिखित सम्प्रेषण (लेखन) व आत्मविकास – किसी भी प्रकार के लेखन का प्रारम्भ एक विचार से होता है। इस विचार की उत्पत्ति मस्तिष्क में होती है। लेखन ही व्यक्ति की सरचनात्मक कल्पनाशीलता में वृद्धि करता है। ये बातें ही आत्मविकास को बढ़ाती हैं।

4. श्रवण की ग्रहणशीलता व आत्मविकास – प्रभावी सम्प्रेषण विधा के लिए आवश्यक है कि उसको हम सही परिप्रेक्ष्य में श्रवण कर ग्रहण करें। किसी अन्य द्वारा प्रेषित सम्प्रेषण को सही रूप में ग्रहण करना ही आत्मविकास के लक्षणों का द्योतक माना गया है। इसी में सन्देश-ग्राहक की सन्तुष्टि भी परिलक्षित होती है।

प्रश्न – मौखिक सम्प्रेषण से आप क्या समझते हैं? मौखिक सम्प्रेषण की सीमाओं को समझाइए।

What do you understand by Oral Communication ? Describe the limitations of oral communication. 

उत्तर – मौखिक सम्प्रेषण से आशय

(Meaning of Oral Communication) 

जब कोई संवाद एवं सूचना मौखिक उच्चारण द्वारा प्रेषित की जाए तो इसे मौखिक सम्प्रेषण कहते हैं। इसमें दो पक्ष होते हैं-प्रेषक एवं सन्देश प्राप्तकर्ता। भाषा प्रथम रूप से मौखिक होती है। मौखिक सम्प्रेषण ही वह सूत्र है, जो मानवीय सम्बन्धों की स्थापना करता है। घर. सार्वजनिक स्थान अथवा संगठन इन सभी में मौखिक सम्प्रेषण ही व्यक्तियों को आपस में एक सूत्र में जोड़ते हैं। संगठन में अनेक औपचारिक एवं अनौपचारिक सम्प्रेषण का माध्यम मौखिक ही होता है।

मौखिक सम्प्रेषण की सीमाएँ

(Limitations of Oral Communication) 

1,विस्तृत सन्देशों की दशा में अनुपयुक्त – जब मौखिक सन्देश विस्तृत एवं लम्बा हो तो सन्देश प्राप्तकर्ता को सन्देश का अर्थ समझाने में कठिनाई होती है एवं वह बार-बार स्पष्टीकरण चाहता है। विस्तृत मौखिक सम्प्रेषण में महत्त्वपूर्ण अंशों के भूल जाने की सम्भावना बनी रहती है।

2. विपरीत अर्थ – मौखिक सम्प्रेषण में यदि सन्देश प्राप्तकर्ता उच्चारण को सही नहीं समझे पाया तो उसको अन्य अर्थ में भी समझ सकता है। मौखिक सम्प्रेषण के यान्त्रिक साधनों में यह सम्भावना और भी बढ़ जाती है। कभी-कभी मौखिक सम्प्रेषण समय बरबाद करने वाला होता है। सभाएँ, सम्मेलन, विचारगोष्ठी, आदि कोई तार्किक निष्कर्ष पर नहीं पहुँचतीं, जबकि इनके आयोजन में काफी समय एवं धन लगता है।

3,सीमित क्षेत्र – मौखिक सम्प्रेषण का क्षेत्र काफी सीमित होता है। यदि सम्प्रेषण करने वाले तथा पाने वाले के बीच प्रत्यक्ष सम्पर्क नहीं है तो मौखिक सम्प्रेषण अनुपयुक्त होता है।

दरस्थ व्यक्तियों की दशा में जहाँ संचार के यान्त्रिक साधन नहीं है वहाँ मौखिक सम्प्रेषण सम्भव नहीं हो पाता।

4. वैधानिक मान्यता का अभाव – मौखिक सम्प्रेषण भविष्य में विवाद की दशा अथवा उत्तरदायित्व निर्धारण के समय प्रमाणस्वरूप प्रस्तुत नहीं किया जा सकता है, अतः मौखिक सम्प्रेषण का कोई स्थायी महत्त्व नहीं होता और इसकी कोई वैधानिक मान्यता भी नहीं होती। मौखिक सम्प्रेषण दीर्घकाल के लिए उपयोगी नहीं होता क्योंकि इसको लम्बे समय तक स्मति में नहीं रखा जा सकता।

प्रश्न – वेस्टले और मैक्लीन के सम्प्रेषण से सम्बन्धित विकास मॉडल पर संक्षिप्त ट्रिायणी लिखिए। 

Write short note on developed model of Vastle and Maeleen. 

उत्तर – वेस्टले और मैक्लीन का विकसित मॉडल

(Developed Model of Vastle and Macleen) 

वेस्टले तथा मैक्लीन नामक दो वैज्ञानिकों ने इस मॉडल का विकास किया। इसको उन्होंने सन् 1957 ई० में पूर्णता प्रदान की। इसमें सम्प्रेषण के आदान-प्रदान के तत्त्व लगातार गतिशील रहते हैं। इसमें इच्छित सूचना शीघ्रता से प्राप्तकर्ता तक पहुंच जाती है

सन्देश देने वाला→ सन्देश → सन्देश प्राप्तकर्ता 

सन्देश देने वाला प्रतिक्रिया – सन्देश प्राप्तकर्ता

उपर्युक्त मॉडल से सुस्पष्ट है कि संचार में सम्प्रेषण-स्रोत, सन्देश-सारणी तथा संग्राहक की सक्रियता होती है। प्रोफेसर हेरोल्ड-डी-लॉसवैल ने ठीक ही लिखा है-“Who says that in which channel to whom with what effect? Who, What, Which, Whom के पारस्परिक विचार-विनिमय से सम्प्रेषण-क्रिया सफलता प्राप्त करती है। सन्देश का स्रोत, सन्देश की विषय-वस्तु, उद्दिष्ट श्रोता, दर्शक-पाठक, सन्देश-सम्प्रेषण का माध्यम और सन्देश का प्रभाव-ये छह सम्प्रेषण प्रक्रिया के मुख्य तत्त्व हैं, जिनके समन्वय से सम्प्रेषण सफल होता है। सम्प्रेषण तो विकास का पर्याय है। विकास का अभियान समाज के मन को जीतने का अभियान है, उलझनों में रास्ता खोजने का अभियान है।

प्रश्न – श्रोता समूह के सदस्यों का विश्लेषण कीजिए।

Analyse the members of Group Audience. 

उत्तर – श्रोता समूह के सदस्यो/व्यक्तिगत श्रोता का विश्लेषण 

(Analyse of Members of Group Audience/Personal Audience) 

यद्यपि सन्देश की विषय-वस्तु व सम्प्रेषक के स्तर आवाज का श्रोता की प्रकृति पर अधिक प्रभाव पड़ता है तथापि श्रोता की शैक्षिक, सामाजिक व आर्थिक पृष्ठभूमि भी श्रोता का समय व सहमति को प्रभावित करती है। किसी भी आय का शिक्षित व्यक्ति स्वभावतः आधक प्रवीण या चतुर होता है। धनी व्यक्ति सामाजिक परिवर्तन के इच्छक नहीं होते. जबकि एक निर्धन व्यक्ति ऐसे परिवर्तन के प्रति जिज्ञासु होता है। इसके साथ-साथ अवसर व प्रसंग भी श्राता की प्रकृति को एक सीमा तक विश्लेषित करता है। विभिन्न आय-वर्ग के श्रोताओं के सन्दशक प्रति अपने भिन्न-भिन्न अनुभव व प्रतिक्रियाएँ होती हैं; जैसे –

(1) बच्चे सदैव कहानी सुनना पसन्द करते हैं, इसलिए उन पर नाटक शैली अधिक प्रभाव डालती है। आवेश, खुशी, हर्ष, खेद, शोक आदि को कहानी के माध्यम से व्यक्त किया जाता है। अत: एक पारिवारिक परिवेश के माध्यम से विचारों की उत्पत्ति की जाती है।

(2) हाईस्कूल के बच्चे वयस्क की तरह व्यवहार करते हैं। वे अधिक आज्ञाकारी होते हैं। उनमें विवेचन क्षमता व चतुराई कम होती है। उन पर चाक्षुष उपकरणों (Visual Instruments) का प्रभाव अधिक पड़ता है।

(3) कॉलेज के विद्यार्थी तरुण उम्र के होते हैं। वे सदैव नए विचारों का आदर व सम्मान करते हैं। वे ईमानदारी के प्रशंसक होते हैं। वे सदैव चौकन्ने व चतुर होते हैं। इस वर्ग के श्रोता सीधे, सरल व आदर्शवादी होते हैं।

(4) वयस्क युवा अत्यन्त ही विनम्र होते हैं, उनमें व्यापक रुचि व उन्नतिशील (विकासोन्मुखी) व्यवहार पाया जाता है। वे सदैव नए-नए विचारों व योजनाओं में संलग्न होते हैं। ये अधिक प्रवीण/चतुर होते हैं।

(5) अधिक उम्र के श्रोता या व्यक्ति किसी भी प्रकार के परिवर्तन के प्रति रुचि नहीं रखते हैं। वे सदैव पुरानी यादों व बातों का स्मरण करते हैं। यद्यपि वे वैश्विक परिवर्तन सम्बन्धी सूचनाओं के प्रति अधिक आकृष्ट व उत्साही होते हैं।

प्रश्न – औपचारिक सम्प्रेषण की सीमाएँ एवं अनौपचारिक सम्प्रेषण के लाभ बताइए।

Explain the limitations of formal communication and advantages of informal communication. 

उत्तर – औपचारिक सम्प्रेषण की सीमाएँ 

(Limitations of Formal Communication) 

औपचारिक सम्प्रेषण की प्रमुख सीमाएँ निम्नलिखित हैं

(1) लम्बवत् सम्प्रेषण भिन्न-भिन्न स्तरों से होता हुआ नीचे की ओर आता है, जिसमें किसी भी स्तर पर आवश्यक कारणों से सन्देश को संशोधित तथा परिवर्तित किया जा सकता है। लेकिन कई बार ऐसा करने से सन्देश का भाव तथा अर्थ बदल जाता है।

(2) लम्बवत् सम्प्रेषण के निर्णयन तथा नीतियों में अधीनस्थों की कोई महत्त्वपूर्ण भूमिका नहीं होती।

(3) इस सम्प्रेषण में आदेश तथा निर्देश विभिन्न स्तरों से होकर ऊपर से नीचे की ओर आते हैं, जिसके कारण सन्देश, आदेश तथा निर्देश के पहुंचने में देरी हो जाती है।

(4) इस सम्प्रेषण में गोपनीयता भंग होने तथा अनावश्यक विवरण के कारण सन्देश का वास्तविक स्वरूप ही बदल जाता है।

(5) उच्चाधिकारी द्वारा पूर्ण आदेश अथवा सन्देश दिए जाने के कारण कार्यपरिणाम सन्तोषजनक नहीं रहता।

अनौपचारिक सम्प्रेषण के लाभ 

(Advantages of Informal Communication) 

अनौपचारिक सम्प्रेषण के प्रमुख लाभ निम्नलिखित हैं

(1) अनौपचारिक सम्प्रेषण अधिक शीघ्रता से फैलता है। 

(2) कर्मचारियों की समस्याओं का समाधान करने में सहायक है। (3) रचनात्मक सुझावों को प्राप्त करने में सहायक है। 

(4) अनौपचारिक सम्प्रेषण आसानी से किसी भी दिशा में प्रसारित हो सकता है। 

(5) उच्च प्रबन्ध तथा अधीनस्थों के मध्य मधुर मानवीय सम्बन्धों का सृजन होता है। 

(6) संस्था में काम करने वाले कर्मचारियों में मेल-जोल बढ़ता है।

(7) अनौपचारिक सम्प्रेषण द्वारा प्रतिस्पर्धा, ग्राहकों की अभिरुचि तथा बाजार की स्थिति पता लगती है।

प्रश्न – समूह चर्चा से क्या आशय है? इसके क्या उद्देश्य हैं? What is Group Discussion ? What are its objectives ? 

उत्तर – समूह चर्चा

(Group Discussion) 

प्रबन्धन संस्थान नौकरियों की तलाश कर रहे विद्यार्थियों की सम्प्रेषणशीलता या कम्युनिकेटिव जाँच करने के लिए सामूहिक परिचर्चा के सशक्त माध्यम हैं। आज के प्रतियोगितात्मक एवं प्रतिस्पर्धात्मक युग में विभिन्न सहयोगियों के बीच सम्प्रेषण के महत्त्व को स समझते हुए विभिन्न प्रबन्धन संस्थान तथा प्रयत्नकर्ता लिखित परीक्षा और व्यक्तिगत साक्षात्कार । के अलावा सामूहिक परिचर्चा परीक्षण का सहारा लेकर योग्य आवेदनकर्ताओं का चयन करते हैं। अतः स्पष्ट है कि समूह चर्चा में एक समस्या या नीतियों पर मौखिक चर्चा करके निष्कर्ष प्राप्त किया जाता है।

समूह चर्चा के मूल उद्देश्य 

(Fundamental Objectives of the Group Discussion) 

दो व्यक्तियों के मध्य जो वार्तालाप का संचार होता है, उसमें विशिष्ट कौशल के तत्त्वों का समावेश कर वार्ता को तर्कसंगत रूप प्रदान किया जा सकता है। इसी को संचरण-कौशल कहा गया है। आदिकाल से ही मानव का दूसरे मानव के साथ यह वार्ता-कौशल जारी है। सभ्यता के दौर में इस कौशल ने नए आयामों का स्पर्श किया है। मित्र-मित्र, गरु-शिष्य, पति-पत्नी, मालिक-नौकर के बीच विचार-विमर्श ही वार्तालाप है। यह साझे का सौदा है, वक्ता-श्रोता के बीच सहमति है। वक्ता सदैव श्रोता की मन:स्थिति. अभिरुचि और इच्छा के अनरूप ही अपनी बातें रखता है। श्रोता उठने लगे, कतराने लगे, अनायास चटकी लेने लगे ता वक्ता असफल है। श्रोता से तालमेल बैठाकर ही विचार-विनिमय के मल उद्देश्य की प्राप्ति हा सकती है। अध्ययन की दृष्टि से समूह-चर्चा के निम्नलिखित उद्देश्य हैं

(1) समूह चर्चा का लक्ष्य विचारों/आदर्शों की प्रस्तति व इस सम्बन्ध में प्रतिक्रियाओं का प्राप्त करना होता है जिससे आगे की जिज्ञासा प्रकट होती है, जो पनः प्रश्न और प्रतिप्रश्न पूछने का निमित्त बनती है।

(2) समूह चर्चा में विभिन्न रचनात्मक विचारों के द्वारा समस्या का सम्यक निदान का जाता है।

(3) निर्णय प्रक्रिया में विशिष्ट प्रकार के व्यक्ति सम्मिलित होते हैं, अत: समूह चर्चा में इन विशिष्ट व्यक्तियों के द्वारा निर्णय दिए जाते है। इस प्रकार की समूह चर्चा के लिए स्पष्ट व रचनात्मक भाषा होती है।

प्रश्न – एक प्रभावशाली व्यावसायिक प्रतिवेदन के कौन-कौन से मुख्य लक्षण होते हैं?

What main features are there in an effective business report? 

उत्तर-प्रभावशाली व्यावसायिक प्रतिवेदन के मुख्य लक्षण

(Main features of an Effective Business Report)

1. स्पष्टता – व्यावसायिक प्रतिवेदन में तथ्यों में सारगर्भिता होनी चाहिए तथा भाषा ऐसी हो कि स्पष्टता सहज रूप में ही परिलक्षित हो जाए।

2. छोटे-छोटे खण्डों में विभाजन – प्रत्येक नई बात को नए अनुच्छेद स प्रारम्भ करना चाहिए। इस प्रकार एक प्रतिवेदन में अनेक खण्ड हो सकते हैं। खण्डों का छोटा होना विषय की ग्राह्यता के लिए लाभदायक रहता है।

3. संक्षिप्तता – प्रतिवेदन संक्षिप्त व प्रासंगिक होना चाहिए। अनावश्यक बातों का उल्लेख प्रतिवेदन में कदापि नहीं करना चाहिए। मूल विषय से हटकर किसी अन्य विषय का . समावेश किया जाना प्रतिवेदन के मूल उद्देश्य में रुकावट पैदा कर सकता है। प्रतिवेदन में विषयगत प्रासंगिक बिन्दुओं का ही समावेश किया जाना उचित रहता है।

4. रोचकता – प्रतिवेदन का यह पक्ष अभिव्यक्ति से सम्बन्धित है। अभिव्यक्ति का एकमात्र उद्देश्य अन्य का ध्यान आकृष्ट ना होता है। इस हेतु निम्नलिखित बातों का समावेश आवश्यक है

(i) प्रतिवेदन के सम्बन्ध में अध्ययनकर्ता की जानकारी का स्तर,

(ii) प्रतिवेदन में अध्ययनकर्ता के समझने में सहायक सामग्री का समावेश, 

(iii) अध्ययनकर्ता के अनुसार भाषा का चयन, 

(iv) पुनरावृत्ति कम-से-कम हो, 

(v) भाषा में सुबोधता, सरलता व प्रवाह होना।

5. शुद्धता एवं विश्वसनीयता – प्रतिवेदन निश्चित सूचनाओं पर आधारित होता है, अतः सूचनाओं का स्रोत विश्वसनीय होना चाहिए। सूचनाओं के विस्तृत संकलन पर ही भविष्य में आँकड़ों की व्यावहारिक स्वरूप प्रदान किया जाता है। अत: तथ्य व समंकों में शुद्धता का होना एक आवश्यक तत्व है। काल्पनिक तथ्यों के समावेश से यथासम्भव बचना चाहिए।6. सम्पूर्णता का दिग्दर्शन – प्रतिवेदन का पूरा स्वरूप इस ढाँचे में होना चाहिए कि ग्राह्यपक्ष का कलेवर की पूर्ण जानकारी सहज व स्वाभाविक रूप में उपलब्ध हो जाए। उसके मस्तिष्क में आपके विचारों का प्रस्फुटन त्वरित गति से होना आवश्यक है। प्रतिवेदन की सम्पूर्णता के कारण ही प्राप्तकर्ता उस प्रतिवेदन के अनुगामी तीव्र व शीघ्र निर्णय लेने में स्वयं को सक्षम पाता है। विषय व विवरण की तारतम्यता प्रतिवेदन को सम्पूर्णता प्रदान करते हैं।

प्रश्न – ई-मेल से आप क्या समझते हैं? 

What do you understand by e-mail? 

उत्तर – ई-मेल

(Electronic Mail) 

ई-मेल के द्वारा एक सन्देश को सम्प्रेषण के अन्य साधनों की अपेक्षा अधिक तीवता एक स्थान से दूसरे स्थान पर सम्प्रेषित किया जा सकता है।

जिस प्रकार डाक द्वारा एक पत्र को एक स्थान से दूसरे स्थान को प्रेषित किया जाता उसी प्रकार आज कम्प्यूटर के द्वारा पत्र एक स्थान से दूसरे स्थान पर भेजे जाते हैं। उसे ‘ई-मेल’ कहा जाता है। इसमें न तो कागज कलम-दवात का खर्चा आता है और न ही स्टेप की आवश्यकता होती है। केवल कम्प्युटर के द्वारा आप अपने सन्देश को घर बैठे विश्व के किसी भी हिस्से से सम्बन्धित व्यक्ति को सम्प्रेषित कर सकते हैं। आपका सन्देश कुछ सेकण्डों/मिनटों में पम्बन्धित व्यक्ति तक जाता है, सन्देश प्राप्तकर्ता चाहे कितनी ही दूर क्यों न हो।

ई-मेल के द्वारा जिस सन्देश या पत्र को प्रेषित करना होता है, उसकी सामग्री ‘वर्ड प्रोसेसर’ (Word Processor) द्वारा तैयार की जाती है तत्पश्चात् जिस पते पर यह पत्र प्रेषित करना होता है, वहाँ तक इसे टेलीफोन/ केबिल नेटवर्क द्वारा प्रेषित किया जाता है। पत्र या सन्देश की समस्त जानकारी सम्बन्धित व्यक्ति की कम्प्यूटर स्क्रीन/टी०वी० स्क्रीन पर प्रदर्शित हो जाती है। आवश्यकता होने पर सन्देश/पत्र कम्प्यूटर की स्मृति में संचित हो जाता है। सम्बन्धित व्यक्ति के लौटते ही कम्प्यूटर से सम्बन्धित एक घण्टी सूचना देगी कि कोई पत्र उसकी प्रतीक्षा । में है।

ई-मेल के द्वारा व्यक्ति अपने कम्प्यूटर पर सन्देश को टाइप करके किसी दूसरे कम्प्यूटर तक प्रेषित कर सकता है। शर्त यह है कि दोनों कम्प्यूटर इण्टरनेट से जुड़े हों।

प्रश्न – शारीरिक भाषा से क्या आशय है? What is meant by Body Language ? 

उत्तर – शारीरिक भाषा

(Body Language) 

शारीरिक भाषा से आशय शरीर के विभिन्न हिस्सों की गतिशीलता के द्वारा अपनी भावनाओं/संवेदनाओं के माध्यम से सन्देश/सूचना के सम्प्रेषण से है। शारीरिक भाषा के अन्तर्गत आँखों को घुमाना/चलाना, होंठों को चबाना/चलाना, ताली बजाना इत्यादि सम्मिलित हा इस KINESICS’ भी कहा जाता है। इससे व्यक्ति अपने सन्देश को अन्तवयाक्तक क्रियाकलापों/गतिविधियों द्वारा अन्य व्यक्तियों या समूहों तक पहुंचाता है। यद्यपि शारीरिक भाषा भाषिक/शाब्दिक सम्प्रेषण की पूरक कहलाती है क्योंकि जब यह शाब्दिक भाषा के पूरक कार्य करती है, तब ही सम्प्रेषक के सन्देश का अर्थ स्पष्ट होता है और वह शाब्दिक भाषा साथ जड़ जाती है। अधिकांश विद्वानों का मत है कि किसी सम्प्रेषण क्रिया में शब्द उस सन के 10% अंश को प्रभावित करते हैं, जबकि 40% अंश तक आवाज वलय प्रभावित करत और लगभग 50% अंश शारीरिक भाषा प्रभावित करती है, अर्थात किसी भी सम्प्रेषण प्रक्रिया में

लगभग 50% शारीरिक भाषा के प्रभाव की अनुपस्थिति, सम्पूर्ण सम्प्रेषण प्रक्रिया को अपूर्ण कर देती है।

जे० फास्ट के अनुसार, “अविश्वास के लिए हमारे द्वारा अपनी भौंहों को ऊपर चढ़ाना, घबराहट, परेशानी के लिए नाक को रगड़ना/मलना, स्वयं को संरक्षित करने के लिए अपने हाथों को बाँधना, स्वयं को पृथक् बताने के लिए कन्धों को उचकाना, घनिष्ठता बताने के लिए आँख मारना/पलक झपकाना, घबराहट के लिए उँगलियों को थपथपाना, विस्मरण के लिए स्वयं के माथे को थप्पड़/चॉटा मारना इत्यादि क्रियाएँ शारीरिक भाषा कहलाती हैं।”

प्रश्न – आत्मविकास का क्या आशय है? 

What is meant by Self-development?

 उत्तर – आत्मविकास का आशय

(Meaning of Self-development) 

आत्मविकास से आशय एक व्यक्ति में गुणों की समग्रता अर्थात् शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक विकास तथा भौतिकवादिता व आध्यात्मिकता के मिलन से है। वास्तव में, उपर्युक्त गुणों के सन्तुलित शैली में सम्यक् विकास का नाम ही आत्मविकास है।

एक समाज में व्यक्तियों के बीच वार्तालाप केवल सम्प्रेषण के द्वारा ही सम्भव है। आत्मविकास व सम्प्रेषण एक-दूसरे पर निर्भर होते हैं। अधिक स्पष्ट शब्दों में ‘आत्म’ शब्द से आशय एक व्यक्ति की समग्रता से है, जो उसके निजी गुणों व लक्षणों से सम्बन्धित होती है। गुणों की समग्रता से आशय शारीरिक शक्ति, बौद्धिक प्रतिमान, भौतिकवादिता, आध्यात्मिकता आदि गुणों से है। आत्मविकास बहुआयामी भी हो सकता है।

आधुनिकीकरण के साथ ही विकास की परिभाषा भी बदलती जा रही है। आत्मविकास अब बहुआयामी के साथ ही साथ तीव्रगामी भी होता जा रहा है। आत्मविकास के द्वारा सम्प्रेषण की विधा पर भी प्रभाव पड़ता है तथा बदलती हुई परिस्थिति में सम्प्रेषण के प्रकारों में भी तीव्र परिवर्तन परिलक्षित होता है। आत्मविकास सम्प्रेषण के स्रोतों को परिमार्जित भी करता है।

प्रश्न – एक अच्छी श्रवणता के मुख्य तत्त्व बताइए। 

Explain the Key Factors of a Good Listening. 

उत्तर- एक अच्छी श्रवणता के मुख्य तत्त्व

(Key Factors of a Good Listening) 

एक अच्छी श्रवणता के मुख्य तत्त्व निम्नलिखित हैं1. केन्द्रित करने की क्षमता – एक अच्छे श्रोता में केन्द्रित करने की क्षमता होना अनिवार्य है। मस्तिष्क में अधिक दिशाओं में सोचने व समझने की अद्भुत क्षमता होती है। एक व्यक्ति के बोलने की क्षमता लगभग 180 से 250 शब्द प्रति मिनट होती है व ग्रहण क्षमता लगभग 400 से 600 शब्द प्रति मिनट होती है। श्रवण प्रक्रिया में सम्प्रेषक का प्राप्तकर्ता को ओर थोड़ा-सा भी विचलन, श्रवणता में विभ्रम पैदा करता है। इस स्थिति को ‘Miscommunication’ कहा जाता है। यदि श्रोता में अनुशासन व एकाग्रता है तो वह इसके द्वारा सम्प्रेषण में विभ्रम को न्यून कर सकता है।

2. अनुकूल व्यवहार – प्रत्येक व्यक्ति एक अच्छा श्रोता नहीं होता है। एक अच्छी प्रभावी श्रवणता के लिए अनुकूल व्यवहार का होना अति आवश्यक है। यदि श्रवण क्रिया में श्रोता प्रतिकूल व्यवहार दर्शाता है तो श्रवणता का उद्देश्य पूर्ण नहीं होता है।

3. सहायक शारीरिक मुद्रा – श्रवणता के समय शारीरिक भाषा सम्प्रेषण प्रक्रिया में सहायक होती है। पीछे होकर बैठना इस बात को दर्शाता है कि श्रोता स्वयं को सम्प्रेषक से दर रखना चाहता है।

4. प्रश्नोत्तर काल में ( सहभागिता) प्रवेश – जब मस्तिष्क व मन की एकाग्रता भंग नि होने लगती है तो ऐसी स्थिति में प्रश्नोत्तर काल में प्रवेश करना उचित होता है। प्राप्तकर्ता (सुनने वाला) या श्रोता प्रश्न पूछता है। इस स्थिति में सम्प्रेषक या वक्ता प्रश्नकर्ता की ओर देखता है और उसका उत्तर देता है। सम्प्रेषक के लगातार घूरने से मस्तिष्क को विचलित होने से नहीं रोका जा सकता। यदि सम्प्रेषक के द्वारा श्रोता पर बराबर दृष्टि रखी जाती है तो श्रोता के लिए विचलित होना आसान नहीं होता है और न ही वह धोखाधड़ी कर पाता है।

प्रश्न – सम्प्रेषण की स्पष्टता से क्या आशय है? 

What is meant by Clarity in Communication ? 

उत्तर – सम्प्रेषण की स्पष्टता का आशय

(Meaning of Clarity in Communication) 

सम्प्रेषण व्यवस्था का प्रत्येक अंग पूर्ण रूप से स्पष्ट होना चाहिए, जिससे सम्बन्धित व्यक्ति सन्देश को उसी रूप व अर्थ में समझे जिस रूप व अर्थ में सन्देश को प्रसारित किया 8 गया है। स्पष्टता के अन्तर्गत सम्प्रेषण व्यवस्था में निम्नलिखित बातें आवश्यक होती हैं

1. अभिव्यक्ति की स्पष्टता – सन्देशग्राही को स्पष्ट होना चाहिए कि सन्देश प्रेषक से। किस प्रकार सन्देश लिया जाए। सेना में ‘कोड’ शब्द प्रचलित होते हैं, अत: दोनों पक्षों का कोड स्पष्ट होना चाहिए। शब्दों के चयन में निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए

(i) स्पष्ट एवं निश्चित अभिव्यक्ति का प्रयोग होना चाहिए। 

(ii) सरल शब्दों का प्रयोग करना चाहिए। 

(iii) निवारक रूपों को प्राथमिकता देनी चाहिए।

2. विचारों की स्पष्टता – सन्देश देने वाले के मस्तिष्क में जब विचार आता है, उस स्थिति में सन्देशकर्ता को स्वयं सुनिश्चित कर लेना चाहिए कि –

(i) सम्प्रेषण की सामग्री क्या है। 

(ii) सम्प्रेषण का उद्देश्य क्या है।

(iii) सम्प्रेषण के उद्देश्य को पूर्ण करने के लिए संचार का कौन-सा माध्यम उपयुका होगा।

प्रश्न – व्यावसायिक पत्र के सम्बन्ध में रिकॉर्ड एवं सन्दर्भ से क्या आशय है?

What is meant by Record and Reference in reference to a business letter? 

उत्तर – रिकॉर्ड एवं सन्दर्भ

(Record and Reference) 

सम्प्रेषण के भावी उपयोग को दृष्टिगत रखते हुए, इसे रिकॉर्ड में रखने के लिए इसका लिखित में होना आवश्यक है। लिखित सम्प्रेषण को चाहे जब रिकॉर्ड से निकालकर सम्बन्धित व्यक्तियों व विभागों तक सरलता से पहुंचाया जा सकता है। दूसरी ओर यदि मौखिक संचार को अपनाया जाता है तो लिखित सम्प्रेषण की भांति इसके मूल रूप को एक-दूसरे तक नहीं पहुँचाया जा सकता और इसे रिकॉर्ड में रखना भी सम्भव नहीं है। लिखित पत्रों को भविष्य के -सन्दर्भ के लिए सरलता से रिकॉर्ड में रखा जा सकता है। व्यावसायिक सम्प्रेषण में केवल चालू सन्दर्भो की ही नहीं वरन् पिछले सन्दर्भो की भी आवश्यकता पड़ती है। लिखित पत्रों के रिकॉर्ड में होने से पिछले व्यवहारों, अनुबन्धों का ज्ञान, ग्राहकों व विक्रेताओं से किए गए पत्र-व्यवहारों की जानकारी सरलता, शीघ्रता व शुद्धता से हो जाती है।

प्रश्न – मेरठ कॉलेज, मेरठ द्वारा वाणिज्य सायंकालीन प्रवक्ता का पद विज्ञापित कराया गया है। अपनी नियुक्ति हेतु एक आवेदन-पत्र लिखिए।

A post of lecturer for evening has been advertised by Meerut College, Meerut. Draft an application for your appointment for the same.

उत्तर –

सेवा में,

प्रबन्धक महोदय, 

मेरठ कॉलेज, मेरठा

विषय : वाणिज्य प्रवक्ता पद हेतु आवेदन 

आदरणीय महोदय,

‘दैनिक जागरण’ दिनांक 29 जुलाई, 2014 में वाणिज्य विभाग की सायंकालीन कक्षाओं के लिए एक वाणिज्य प्रवक्ता’ की रिक्ति का विज्ञापन पढ़ा। इस पद के लिए मैं स्वयं को प्रस्तुत करने के लिए यह प्रार्थना-पत्र भेज रहा हूँ। मेरा संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है

(1) प्रार्थी का नाम – विवेक कुमार 

(2) पिता का नाम – श्री पूरनमल 

(3) स्थायी पता – 40, देवपुरी, मेरठ। 

(4) घर का पता – 14, डालमपाड़ा, मेरठ। 

(5) जन्म-तिथि – 10 जुलाई, 1988 

(6) आयु – 26 वर्ष

1. सही शब्दों के लिए सम्पादन (Editing for right words)-शब्दों के चयन के दो महत्त्वपूर्ण पहलू है–शुद्धता एवं प्रभावपूर्णता। सम्पादन (Editing) करते समय इस बात की जाँच कर लेनी चाहिए कि सर्वत्र सरल, लघु तथा प्रचलित शब्दों का प्रयोग किया गया है। ये सब सन्देश को प्रभावशाली बनाते है।

2. उचित वाक्यों के लिए सम्पादन (Editing for proper sentence) सबसे प्रभावपूर्ण लेखन में तीन प्रकार के वाक्यों (सरल, संयुक्त व जटिल) का सन्तुलन पाया जाता है। वाक्यों में अप्रचलित, शब्दाडम्बर तथा अत्यधिक उत्साही भाषा का प्रयोग कदापि न करें। वे वाक्य अधिक प्रभावशाली होते हैं जो छोटे हों एवं जिनमें कर्तृवाच्य (Active Voice) का प्रयोग किया गया हो। अनुपयुक्त सूचकों का प्रयोग कदापि नहीं करना चाहिए।

3. पैराग्राफ के लिए सम्पादन (Editing for Paragraph)-प्रत्येक पैराग्राफ समग्र सन्देश का एक महत्त्वपूर्ण भाग होता है, अत: पत्र का सम्पादन करते समय पैराग्राफों तथा उनमें पारस्परिक सम्बन्धों पर ध्यान रखना चाहिए। पैराग्राफों में सुसंगति होनी चाहिए। पैराग्राफ आदर्श आकार का होना चाहिए।

प्रश्न – ज्ञापन पर एक टिप्पणी लिखिए। 

Write a note on Memorandum. 

उत्तर – ज्ञापन (Memorandum) – जब कोई प्राइवेट व्यक्ति या अधिकारी प्रेषित होता है और विषय-सामग्री विशेष महत्त्वपूर्ण नहीं होती, तब सामान्य ज्ञान का प्रयोग किया जाता है। भारत सरकार के दो मंत्रालयों के बीच पत्र-व्यवहार के लिए कार्यालय ज्ञापन का उपयोग होता है, अर्थात् जब भारत सरकार के किसी एक मंत्रालय को किसी अन्य मंत्रालय के लिए कोई ज्ञापन भेजना हो, तो वह कार्यालय ज्ञापन कहलाता है। -मैं सरकारी पत्र-व्यवहार के इस प्रारूप का प्रयोग निम्नलिखित कार्यों के लिए किया नयाँ जाता है

(i) भारत सरकार के विभिन्न मंत्रालयों के मध्य होने वाले पत्र-व्यवहार के सम्बन्ध में। 

(ii) पत्रों की प्राप्ति स्वीकार करने के लिए। 

(iii) प्रार्थना-पत्रों, नियुक्ति के लिए दिए गए आवेदनों इत्यादि का उत्तर देने के लिए तथा

(iv) अधीनस्थ अधिकारियों को वह सूचना भेजने के लिए जो पूर्णत: सरकारी आदेश .. नहीं कही जा सकती।

ज्ञापन के लिखने में निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए।

(i) कार्यालय ज्ञापन में वाक्यों की रचना अन्य पुरुष में की जाती है। 

(ii) इनमें न तो कोई सम्बोधन होता है और न ही पत्र के अन्त में कोई स्वनिर्देश होता है।

(iii) जिस प्रकार मंत्रालय का नाम नीचे पृष्ठ के दायीं ओर लिख देना चाहिए, उसी प्रकार अन्य ज्ञापनों में पाने वाले का नाम, पद व पता बायीं ओर दिया जाता है।

(iv) ज्ञापन में प्राय: एक ही पैराग्राफ होता है। 

(v) ज्ञापन अधिकतर जूनियर अधिकारी एवं प्रधान लिपिक द्वारा हस्ताक्षरित किए जाते हैं। 

(vi) अन्त में दायीं ओर प्रेक्षक के हस्ताक्षर तथा उसके पत्र का उल्लेख किया जाता है।

प्रश्न – कृत्रिम साक्षात्कार से क्या आशय है?

cant by Artificial Interview (moul or mock interview)

उत्तर  – कृत्रिम साक्षात्कार से आशय साक्षात्कार सम्बन्धी परिस्थितियों का उत्पन्न कर है। यह वास्तविक साक्षात्कार का एक प्रारूप अथवा नमूना है। कृत्रिम साक्षात्कार के माध्या से यह पता लगता है कि वास्तविक साक्षात्कार किस प्रकार किया जाता है।

प्रश्न – अंगूरलता सम्प्रेषण क्या है? 

What is Grapevine Communication ?

उत्तर – अंगुरलता सम्प्रेषण अनौपचारिक सम्प्रेषण का ही रूप है। अधिकांशतः व्यक्ति सामूहिक रूप से मिलने एवं बातचीत करने के अवसरों को नहीं खोना चाहता है। इस प्रकार के सम्प्रेषण में जहाँ एक ओर तथ्यपूर्ण एवं सार्थक विषयों पर चर्चाएँ होती हैं, वहीं दूसरी ओ.. गप्पबाजी तथा अफवाहों का बाजार गर्म होता है।

प्रश्न – भावभंगिमा से क्या आशय है? 

What is meant by KINESICS ?

उत्तर – व्यक्ति की आन्तरिक भावनाओं का बाहारूप में प्रकटन भावभंगिमा कहलाता है इसको प्रकट करने हेतु हाथ, पैर, भौंह, सिर आदि की क्रियाओं का विशिष्ट स्थान होता है।

प्रश्न – सम्प्रेषण के लिए आवश्यक चार शर्तों को लिखिए। 

Write four essential conditions of communication. 

उत्तर – सम्प्रेषण के लिए चार आवश्यक शर्ते निम्नलिखित हैं

(1) सूचना प्रेषणकर्ता में सूचित करने की इच्छा का होना। 

(2) सूचनाग्राही की उपस्थिति।

(3) सूचनामाही में सूचना ग्रहण करने की अनुकलन क्षमता का होना।

(4) सूचनामाही में सन्देश के प्रत्युत्तर की क्षमता का होना। 

प्रश्न – सम्प्रेषण के सम्बन्ध में स्पष्टता से क्या आशय है?

 What is meant by Clarity in Communication? 

उत्तर – सम्प्रेषण के सम्बन्ध में स्पष्टता के अन्तर्गत निम्नलिखित बातों का होना।

निरर्थक शब्दों का प्रयोग न करना तथा ( सन्देहास्पद शब्दों का प्रयोग न करना। 

प्रश्न – सार्वजनिक प्रप्तुति क्या है? 

What is Publie Presentation ?

उत्तर – उद्योग, व्यापार एवं वाणिज्य जगत में सार्वजनिक प्रस्तुतीकरण को सार्वजाना मौखिक अभिव्यक्ति अथवा सार्वजनिक बाकशक्ति के सन्दर्भ में प्रयोग किया जाता व्यावसायिक जगत में अनेक ऐसे अवसर आते हैं, जिसमें सार्वजनिक प्रस्तुतीकरण कि जाता है। प्रमुख अवसर अनलिखित है –

(1) नवीन उत्पाद अथवा सेवा के प्रारम्भ करने पर। 

(2) प्रशिक्षण कार्यक्रम शुरू करने पर। 

(3) नवीन व्यावसायिक रूपरेखा की व्याख्या। 

(4) विपणन अथवा विक्रय लक्ष्यों के प्रस्ताव। 

(5) विचारगोष्ठी, सेमिनार अथवा कान्फ्रेंस। 

(6) व्यवसाय क्रियाओं के परिवर्तन की जानकारी। 

प्रश्न – रिपोर्ट का प्रस्तुतीकरण क्या है? 

What is Presenting the Report ?

उत्तर – आवश्यकतानुसार रिपोर्ट को टाइप, साइक्लोस्टाइल अथवा छपवाया जा सकता है। रिपोर्ट का प्रारूप इस प्रकार का होना चाहिए कि वह देखने में सुन्दर लगे तथा उसके विभिन्न अनुच्छेदों को आसानी से ढूँढा जा सके। यदि रिपोर्ट काफी बड़ी हो अथवा उसे बार-बार पढ़ा जाना हो तो उसे जिल्दों में बँधवा लिया जाना चाहिए। रिपोर्ट पर प्रस्तुतिकरण की तिथि अंकित होनी चाहिए तथा प्रस्तुतकर्ता के हस्ताक्षर भी होने चाहिए।

प्रश्न – श्रवणता को प्रभावी बनाने के क्या तरीके हैं? 

What are the tools to make listening effective ? 

उत्तर – श्रवणता को प्रभावी बनाने के तरीके

(Tools to make Listening Effective) 

श्रवणता को प्रभावी बनाने के निम्नलिखित तरीके हैं-

(1) श्रवण करने की इच्छा व एकाग्रता लाएँ। 

(2) श्रवणता के समय बोलना बन्द कर दें। 

(3) सम्प्रेषक को स्वतन्त्रता दें। 

(4) श्रवणता के समय बातचीत, अवरोधक तत्त्वों, हिचक इत्यादि की उपेक्षा करें। 

(5) पूर्ण संयम बरतें। 

(6) सम्पूर्ण श्रवणता के उपरान्त अपने प्रश्नों के हल सम्प्रेष्य से लें।

(7) स्वयं को सम्प्रेषक की स्थिति में रखें। 

(8) सप्रेषक को सुनें, अपने फैसले न दें। 

प्रश्न – SWOT विश्लेषण से क्या आशय है? 

What is SWOT Analysis ?

उत्तर – Swot विश्लेषण के द्वारा उद्यमी अपनी विद्यमान शक्तियों एवं कमजोरियों का अवसरों एवं धमकियों के अनुरूप व्यवहार करते हुए व्यूह-रचना का निर्माण कर सकता है। शब्दानुसार,

S = Strength 

W = Weakness

O = Opportunity

T = Threats.

प्रशन – निवेदन-पत्र क्या है? 

What is Request letter?

उत्तर – इनको ‘आग्रह पत्र’ या ‘अनुमति लेने के पत्र भी कहा जाता है। जब प्राप्तक विशेष रूप से प्रेरित किए बिना आपके निवेदन के अनुसार कार्य करने के लिए इच्छक न हो। प्रवर्तक सन्देशो का प्रयोग किया जाता है। प्रवर्तक सन्देश स्पष्ट तथा पारदशी होने चाहि निजा प्रवर्तक सन्देश का गठन इस प्रकार किया जाना चाहिए कि प्राप्तकत्ता यह महसूस करें कि अहुए क्या कहना चाहते हैं तथा प्राप्तकर्ता का ध्यान विशिष्ट रूप से पत्र के मूल विषय पर स्वाभाकि पक्ष रूप से आकर्षित करें। ऐसा करने के लिए आपको पत्र की विषय-वस्त रुचिकर ढंग से प्रस। करनी चाहिए। प्राप्तकर्ता उत्सुक हो तथा आपका मुख्य सन्देश उसके सामने स्पष्ट हो जाए अनुमति लेने के लिए. समायोजन के लिए प्रार्थना, उधार मांगने के लिए विक्रय करने के लि प्रवर्तक पत्रों का प्रयोग करते हैं।

प्रश्न – अशुभ समाचार पत्र क्या हैं? 

What are Bad News letters ? 

उत्तर – प्रतिकूल संवाद वाले पत्र (अशुभ समाचार पत्र)

प्रतिकूल संवाद वाले पत्र को नकारात्मक संवाद वाला पत्र’ भी कहा जाता है। इन काजा: में संवाद प्राप्तकर्ता को प्रतिकूल सूचना इस रूप में दी जाती है कि उसमें नैराश्य की भावर जाग्रत न हो और सद्भावना बनी रहे। प्रतिकूल सूचना पत्र प्राप्तकर्ता की अपेक्षा एवं आकांस के अनुरूप नहीं होता है। प्राप्तकर्ता ऐसे पत्र का स्वागत नहीं करता है। प्रतिकूल संवाद वाले सम्बन्धों में कटता न उत्पन्न करें-ऐसे में हमें प्राप्तकर्ता के दृष्टिकोण को भी ध्यान में रख पाती आवश्यक होता है। प्रतिकूल संवाद वाले पत्र लेखन की दृष्टि से अत्यन्त महत्त्वपूर्ण होते है।

प्रश्न – अधिवेशन से क्या आशय है? 

What is meant by Conference ?

उत्तर – अधिवेशन का अभिप्राय एक-दूसरे से राय अथवा विचार-विमर्श अथवा सलासे है। समूह के व्यक्तियों के विचार, अनुभव, ज्ञान, भावनाओं तथा राय पर सामान्य उद्देश्य लिए सलाह तथा विचार-विमर्श करना अधिवेशन कहलाता है।

प्रश्न – संकेत भाषा से क्या आशय है? 

What is Sign language ?

उत्तर – जब दो व्यक्ति सन्देश को प्रेषित तथा ग्रहण करने के लिए भाषा के स्थान ।। चिहों अथवा प्रतीकों का प्रयोग करते हैं तो ऐसी क्रिया को संकेत भाषा कहते 119 उदाहरणार्थ- आँखों या हाथों के इशारों से अपनी बात की अभिव्यक्ति करना।

प्रश्न – सी-टू-बी से क्या आशय है? 

What is meant by C-to-B ?

उत्तर – सी-टू-बी (Consumer to Business)-ई-कॉमर्स का यह प्रक वेबसाइट व उन पर उपलब्ध सॉफ्टवेयर क्रेता के नजरिये में विभिन्न प्रकार की भुगता विधियाँ उपलब्ध करा देने में सक्षम होता है। इस प्रकार यह टेली शॉपिग मेल ऑर्डर टेलीफ ऑर्डर इत्यादि का विस्तार-मात्र है।

प्रश्न – अर्द्धशासकीय पत्र से आपका क्या आशय है? 

What do you mean by Semi-official letter?

उत्तर – जो पत्र एक सरकारी अधिकारी द्वारा किन्हीं दूसरे सरकारी अधिकारियों को निजी पत्रों के रूप में लिखे जाते हैं वे अर्द्धशासकीय पत्र कहलाते हैं। सरकारी शब्द के पूर्व लगे हए विशेषण ‘अर्द्ध शब्द से यह पता लगता है कि ऐसे पत्र पूर्णत: सरकारी नहीं होते क्योंकि पक्षकारों व घनिष्ठ सम्बन्धों पर आधारित होने के कारण इनको लिखने का ढंग व्यक्तिगत पत्रों | से मेल खाता है।

प्रश्न – सम्प्रेषण में सुनना क्यों महत्त्वपूर्ण है? 

Why is listening important in communication ?

उत्तर – सुनना भाषा-विकास का एक अभिन्न अंग है। सुनना मौखिक सम्प्रेषण का एक | महत्त्वपूर्ण प्रारूप है। हमारी भावभंगिमा, प्रवीणता, आदर्श, आचरण तथा समझने के विकास की क्रिया पर सुनने का गहन प्रभाव पड़ता है। सुनने की क्रिया के अन्तर्गत सन्देश के शक्तिशाली व कमजोर तथ्यो, सन्देश की सार्थक प्रभावशीलता तथा आवश्यक समालोचना का मूल्यांकन किया पजा सकता है। वन प्रश्न 

प्रश्न – भावनात्मक अवरोध की व्याख्या कीजिए। 

Explain Emotional barrier. 

उत्तर – यदि अत्यधिक प्रेम, घृणा, सहानुभूति अथवा ईर्ष्या के फलस्वरूप सम्प्रेषक की खनमानसिक स्थिति ठीक नहीं है अथवा यदि वह घबराया हुआ, उत्तेजित, चिन्तित तथा क्रोधित है हातो अपना सन्देश उचित ढंग से सम्प्रेषित नहीं कर पाएगा। इसी प्रकार, यदि प्राप्तकर्ता का मूड सामान्य नहीं है तो वह सन्देश को प्रभावी ढंग से स्वीकार नहीं कर पाएगा। इससे कभी-कभी प्रभावी सम्प्रेषण के मार्ग में बाधा उत्पन्न हो जाती है।

प्रश्न – दृश्य-श्रव्य भाषा में किन-किन वस्तुओं को सम्मिलित किया जाता है? 

What is included in Audio-visual Communication ? 

उत्तर – दृश्य-श्रव्य भाषा में निम्नलिखित को सम्मिलित किया जाता है

(1) चित्र, (2) चार्ट, (3) रेखाचित्र, (4) खुदाई, (5) कार्टून, (6) साइन बोर्ड, (7) ड्राइंग, (8) पेंटिंग, (9) नक्काशी, (10) प्रतिमा, (11) पोस्टर, (12) फोटोग्राफ्स, (13) चलचित्र, (14) नक्शा ।

प्रश्न – ई-कॉमर्स के कौन-कौन से प्रकार हैं? 

What are the different types of e-commerce ? 

उत्तर – ई-कॉमर्स के मुख्यत: तीन प्रकार हैं

(1) बी-टू-बी (Business to Business), 

(2) सी-टू-बी (Consumer to Business) तथा 

(3) आन्तरिक खरीद (Internal Procurement)।

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