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BCom 1st Year Financial Accounting Hindi Long Notes

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“लेखांकन की प्रथाएँ एवं अवधारणाएँ लेखांकन सिद्धान्त की नींव हैं।” इस कथन को स्पष्ट करते हुए विभिन्न अवधारणाओं का वर्णन कीजिए।

“Accounting conventions and concepts are foundation of accounting principles.” Describe various concepts while explaining this statement. 

अथवा “लेखांकन को साधारणतया व्यवसाय की भाषा कहा जाता है।” इस कथन की व्याख्या कीजिए तथा लेखाविधि की आधारभूत अवधारणाएँ बताइए। उनका क्या विशेष महत्त्व है?

“Accounting is commonly referred to as language of business”. Comment and discuss the basic concepts of financial accounting. What are their fundamental importances ?

अथवा लेखांकन की अवधारणाएँ क्या हैं? 

What are the Concepts of Accounting? 

लेखाविधि व्यवसाय की भाषा का

(Accounting as a Language of the Business

 लेखाविधि को साधारणतः व्यवसाय की भाषा कहा जाता है।

की भाषा कहा जाता है। एक भाषा का प्रमख की सवहन के साधन के रूप में सेवा प्रदान करना होता है। इस सन्दर्भ में लेखाविधि का उद्देश्य व्यवसाय के क्रियाकलापों और इसके विभिन्न पहलुओं के परिणामा क सादा का कमबद्ध अभिलेखन किया जाता है।

रूप म यह एक संस्था के वित्तीय परिणामों को वित्तीय विवरणों के माध्यम से दस क्रियाकलापो में हित रखने वाले विभिन्न पक्षों को संवहन करता है। वित्तीय विवरण व्यवसाय के क्रिया-कलापों का ‘सही एवं सच्चा’ चित्र प्रस्तुत करें, इसके लिए लेखाविधि में कुछ निश्चित नियमों व परिपाटियों का पालन किया जाता है। ये नियम और परिपाटियाँ लेखा करने योग्य लेन-देन तथा घटनाओं को पहचानने, उनको आँकने, लेखा-पुस्तकों में उनका अभिलेखन करने, सार-संक्षेप तैयार करने तथा इच्छुक पक्षों के लिए रिपोर्ट तैयार करने में हमारा मार्गदर्शन करती हैं। इन नियमों तथा परिपाटियों को ही लेखाविधि के सिद्धान्त कहा जाता है। किन्तु लेखाविधि के सिद्धान्त प्राकृतिक विज्ञानों के सिद्धान्तों की भाँति पूर्णतया सही, निश्चित, कठोर व स्वत: सिद्ध नहीं होते। वस्तुतः इन सिद्धान्तों को एक संस्था की विशिष्ट परिस्थितियों और आर्थिक वातावरण में परिवर्तनों, सामाजिक आवश्यकताओं, वैधानिक अनिवार्यताओं और प्रावैधिक विकास के अनुरूप समुचित लोच के साथ प्रयोग में लाया जाता है।

लेखाशास्त्र की अवधारणाएँ

(Conventions of Accounting) 

1. रूढ़िवादिता की अवधारणा (The Conservatism Concepts)-लेखाकार्य करते समय सभी अनिश्चितताओं और जोखिमों को ध्यान में रखते हुए इनकी व्यवस्था करने के लिए लेखापाल को रूढ़िवादी होना चाहिए। सभी सम्भावित हानियों की व्यवस्था करनी चाहिए, परन्त सभी सम्भावित लाभों पर ध्यान नहीं रखना चाहिए। स्टॉक तथा विनियोगों का मूल्यांकन, लागत एवं बाजार मूल्य में जो कम हो, पर करना चाहिए। अब बदलते हुए विचारों के अनुसार रूढ़िवादी सिद्धान्तों को गलत एवं भ्रमात्मक समझा जाने लगा है।

2. एकरूपता की अवधारणा -(The Consistency Concept)-लेखाकर्म के सिद्धान्तो नों में पर्याप्त लोच पायी जाती है। स्टॉक का मूल्यांकन, ह्रास कटौती की विधि एवं संदिग्ध ऋणा का व्यवस्था आदि करने की बहुत-सी विधिया है, लेकिन इस सम्बन्ध में एक बार जो विधि अपना ली जाती है, उसे सरलता से पर के अन्दर एकरूपता का सिद्धान्त अपनाया जाता है।3. भौतिकता की अवधारणा ( ही तथ्यों एवं घटनाओं का लेखा किया जाता हैं। जो व्यापार की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है, लेकिन इसमें सारहीन व कम महत्त्व की बातों का लेखा नहीं किया जाता है; जैसे-कम्पनी या किसी बड़े व्यापार के चिठे (Balance Sheet) में पेंसिल, निब, पिनों के अन्तिम स्टॉक का हवाला नहीं दिया जाता है। ऐसे कार्यों में समय लगाना एक प्रकार का अपव्यय ही है।

4. लागत की अवधारणा (The Cost Concept)-व्यापारिक सम्पत्तियों के लागत मूल्य में से ह्रास घटाकर दिखाया जाता है तथा चिठे की तिथि पर इनका बाजार मूल्य क्या है, इस पर विचार नहीं किया जाता है। कभी-कभी तो ऐसा करना आलोचना का विषय बन जाता है। इसी प्रकार व्यापार की ख्याति भले ही ₹ 2 लाख क्यों न हो, यदि उसका भुगतान नहीं किया गया तो अब सम्पत्तियों में ख्याति नहीं दिखाई जाएगी।

5. विश्वसनीयता की अवधारणा (The Reliable Concept)-लेखों में विश्वसनीयता का एक महत्त्वपूर्ण सिद्धान्त है। प्राय: यह माना जाता है कि लाभ-हानि खाता एवं आर्थिक चिट्ठा व्यापार की वास्तविक स्थिति प्रदर्शित करता है।

6. ऐतिहासिक अभिलेख अवधारणा (The Historical Concept)-इस अवधारणा के अनुसार लेखा पुस्तकों में प्राय: उन्हीं लेन-देनों का रिकॉर्ड रखा जाता है, जो वास्तव में घटित हो चुके हैं न कि सम्भावित लेन-देनों का।

7. शुद्ध लाभ की गणना की अवधारणा (The Net Profit Concept)-व्यापार में शुद्ध लाभ को ही महत्त्व दिया जाता है, अत: इसकी गणना इस प्रकार से की जाती है जिससे कि इसमें किसी भी प्रकार की शंका न रहे और न ही बाद में कोई संशोधन करना पड़े। . 

8. वैध पक्ष अवधारणा (The Lawful Object Concept)-इस अवधारणा के अनुसार जहाँ तक सम्भव हो सके पुस्तकों में उन समस्त लेन-देनों को लिखा जाना चाहिए, जो . व्यवसाय की कानूनी स्थिति को ठीक प्रकार से प्रदर्शित कर सकें।

9. मुद्रा-मापन की अवधारणा (The Money Measurement Concept)इस अवधारणा के अनुसार लेखाविधि का सम्बन्ध उन्हीं व्यवहारों एवं घटनाओं से होता है, जिनको मुद्रा में मापा या अभिव्यक्त किया जा सकता है। कुछ घटनाएँ व व्यवहार व्यापार के लिए अति महत्त्वपूर्ण होते हैं, परन्तु यदि इन्हें मुद्रा में अभिव्यक्त नहीं किया जा सकता हो तो इनका लेखा नहीं किया जाएगा।

एन्थोनी के शब्दों में यह अवधारणा और अधिक स्पष्ट हो जाती है

“यदि कम्पनी का प्रमुख संचालक किसी दुर्घटना में मर जाए तो व्यापार के लिए यह एक बहुत महत्त्वपूर्ण घटना है, लेकिन इसका मुद्रा में मापन न होने के कारण लेखाविधि में इसका लेखा नहीं किया जाएगा।”

10.पँजीगत तथा आयगत व्यवहारों की अवधारणा (The Capital and Revenue Concept)-लेखाविधि में लेखा करने से पूर्व यह देखा जाता है कि अमक आय या व्यय आयगत हैं या पूँजीगत। लाभ-हानि खाते में केवल आयगत व्यवहारों का ही लेखा किया जाता है, जबकि पूँजीगत व्यवहारों का लेखा आर्थिक चिटठे में किया जाता है।11. द्वि-पहलू या दोहरा संयोग की अवधारणा (The Dual Aspect Concept)-लेखाविधि दोहरा लेखा पद्धति’ पर आधारित है। व्यापार का प्रत्येक लेन-देन दो खातों को प्रभावित करता है, किसी एक खाते को धना अभावत करता है, किसी एक खाते को धनी (Cr.) किया जाता है तो दूसरे खाते को ऋणी (Dr.) किया जाता है। इस प्रकार व्यापार में जितनी सम्पत्तिया जितनी सम्पत्तियाँ होती हैं, उतना ही योग पर एवं देनदारियों का होता है।

12. पृथक् व्यवसाय सत्त्व की अवधारणा (Separate Business substance Concept)-इस अवधारणा के अनसार लेखाविधि में व्यापार का अस्तित्व तथा निजी अस्तित्व अलग-अलग रखे जाते हैं। यही वह अवधारणा है, जिसके अनुसार व्यापार का उसके स्वामियों से स्वतन्त्र एवं पृथक् अस्तित्व होता है। यदि निजी व्यापारी भी व्यापार में से कर लता है तो उसका पकवा किया जाता है जिससे व्यापार अपना उचित सहा त्यात प्रदर्शित करे।

13. वसूली या प्राप्ति की अवधारणा (The Realization Concept)-यह एक महत्वपूर्ण समस्या है कि आय को वसल हआ कब माना जाए। रूढ़िवादी विचारधारा वालों की यह मान्यता है कि जितना धन नकद प्राप्त हो जाए उसे ही आय या बिक्री मानना चाहिए। दूसरी ओर, यदि माल की शीघ्र बिक्री हो जाती है तो जितना माल उत्पादित हो उसे आय मान लेना चाहिए, लेकिन ये दोनों ही विचारधाराएँ अमान्य हैं। इन दोनों के मध्य की विचारधारा उपयुक्त है अर्थात् जितनी राशि का माल बेचा जा चुका है, उसे ‘वसूल हुई प्राप्ति’ मान लेना चाहिए और यदि इसमें से कुछ हानि होने की सम्भावना हो तो उसके लिए सम्भावित डूबत ऋण कोष’ बना लेना चाहिए।

14. चालू व्यवसाय की अवधारणा (The Going Concern Concept)लेखाशास्त्र की यह अवधारणा इस मान्यता पर आधारित है कि व्यवसाय अनन्त समय तक निरन्तर चलता रहेगा। इसी अवधारणा के आधार पर लेखे किए जाने चाहिए। यही कारण है कि वर्ष के अन्त में अन्तिम खाते बनाते समय पुस्तकों में अदत्त एवं पूर्वदत्त व्ययों तथा उपार्जित एवं अनुपार्जित आय आदि का लेखा किया जाता है जो कि भविष्य में समायोजित किए जाएंगे। इसी प्रकार स्थायी सम्पत्तियों पर ह्रास उनके कुल जीवन के आधार पर अपलिखित किया जाता है। स्थायी सम्पत्तियों को लागत मूल्य पर दिखाया जाना चाहिए न कि बाजार मूल्य पर। लेकिन यदि व्यवसाय को समाप्त किया जा रहा है तो उनके बाजार मूल्य या प्राप्य मल्य को ध्यान में रखा जाएगा न कि लागत मूल्य को।

15. लेखांकन अवधि की अवधारणा (Accounting Period Concept)प्रत्येक व्यवसाय में एक निर्धारित लेखा अवधि होती है, जिसकी समाप्ति पर अन्तिम खाते बनाए जाते हैं जिससे व्यवसाय से हुआ लाभ या हानि तथा व्यवसाय की वित्तीय स्थिति ज्ञात की जा सके। यह लेखा अवधि 12 माह की होती है, लेकिन यह तिमाही या छमाही भी हो सकती है, शिन्त वास्तव में यह अवधि व्यवसाय का प्रकृति, लेन-देनों की संख्या आदि पर निर्भर

करती है। अलग से होना चाहिए तथा विभिन्न वा समायोजित किया जाना चाहिए। एका अन्तरित करके दिखाया जाता है, जबकि जाता है।16. पुँजी की अवधारणा (The Capital Concept)-व्यवसाय में पूँजी का लेखा मी चाहिए तथा विभिन्न वर्षों के लाभ-हानि को भी पृथक रूप से दिखाकर पूजी में समायोजित किया जाना चाहिए। एकाकी व साझेदारी व्यवसाय में लाभ को पँजी खाते म के दिखाया जाता है, जबकि कम्पनी, व्यवसाय में इसे चिटठे में अलग से दर्शाया जाता हैं।

17. प्रमाण या सत्यापन की अवधारणा (The Verifiable Objective Evidence Concept)-लेखा पुस्तकों में भी लेखे किए जाते हैं, उनकी वैधता सिद्ध करने के लिए यह अत्यन्त आवश्यक है कि उनके पीछे पर्याप्त प्रमाण हों। बिना प्रमाणों के लेखे का कोई औचित्य नहीं होता और न ही उस पर कोई विश्वास ही करता है। जहाँ लेन-देनों की संख्या कम होती है, व्यवसायी स्वयं व्यवसाय के समस्त कार्यों को सम्पन्न करता है, वहाँ इन प्रमाणकों का अधिक महत्त्व नहीं होता, लेकिन बड़े पैमाने के व्यवसाय या व्यवहारों की दशा में, वहाँ अप्रत्यक्ष प्रबन्ध होता है, इन प्रमाणकों का महत्त्व बहुत बढ़ जाता है। वैधानिक दृष्टिकोण से प्रमाण का महत्त्व लेखांकन में और भी अधिक हो जाता है।

लेखाविधि के सिद्धान्तों का महत्त्व

(Significance of Accounting Principles) 

किसी भी विषय के व्यवस्थित अध्ययन में उसके सिद्धान्तों का बहुत महत्त्व होता है तथा इन सिद्धान्तों के पूर्ण, निश्चित, विषयपरक और विश्वसनीय होने पर ही उस विषय को विज्ञान की श्रेणी में रखा जाता है। लेखाविधि भी एक विज्ञान है। इसके भी कुछ सिद्धान्त हैं। यद्यपि ये सिद्धान्त प्राकृतिक विज्ञानों के नियमों की भाँति निश्चित और पूर्ण नहीं है, फिर भी इससे इन सिद्धान्तों की महत्ता कम नहीं हो पाती। इन सिद्धान्तों के कुछ प्रमुख लाभ इस प्रकार हैं

(1) ये सिद्धान्त ही लेखों को तुल्य बनाते हैं। लेखाविधि के निश्चित सिद्धान्तों के कारण ही एक व्यवसायी अपने वर्तमान वर्ष के परिणामों की गत वर्षों से अथवा उसी प्रकार के व्यवसाय में लगी अन्य व्यावसायिक इकाइयों के परिणामों से तुलना कर सकता है।

(2) ये सिद्धान्त व्यावसायिक क्रियाओं के अभिलेखन का व्यवस्थित आधार प्रदान करते हैं। इन सिद्धान्तों के कारण ही व्यावसायिक लेखे शुद्ध व रीतिबद्ध रहते हैं जिसके परिणामस्वरूप इनसे व्यवसाय की स्थिति और लाभार्जन-शक्ति का सही एवं सच्चा चित्र प्रकट होता है तथा सूचनाओं के छिपाए जाने की सम्भावनाएँ घटती हैं।

(3) ये सिद्धान्त ही लेखों को निश्चित, विषयपरक तथा विश्वसनीय बनाते हैं और लेखापाल को पक्षपातपूर्ण व मनमाने परिणाम निकालने से रोकते हैं।

प्रश्न 2 – लेखाविधि के सिद्धान्तों की अवधारणा क्या है? इसकी प्रकृति तथा सिद्धान्तों के महत्त्व का वर्णन कीजिए।

What is the concept of accounting principles? Describe its nature and importance. 

अथवा “सामान्यतः प्रबन्धकारी स्वीकृत एकाउन्टिंग के सिद्धान्तों से एकाउण्टस में अपनी इच्छानुसार जोड़-तोड़ कर सकते हैं।” क्या आप इस कथन से सहमत हैं? कारण दीजिए।

“Generally accepted accounting principles provide good scope to management for manipulating accounts according to their wishes.” Do you agree with this statement ? Give reasons. 

अथवा विभिन्न लेखाविधि (लेखांकन) सिद्धान्तों का वर्णन कीजिए और उनकी सीमाएँ बताइए।

Describe the various accounting principles and point out their limitations.

उत्तर- लेखाविधि के सिद्धान्तों की अवधारणा

(Concept of Accounting Principles) 

लेखाविधि को व्यवसाय की भाषा (Language of Business) के नाम स अलकत किया जाता है। जिस प्रकार प्रत्येक भाषा का अध्ययन करने का मान्यताओं या अवधारणाओं प्रथाओं और सीमाओं का अध्ययन करना आवश्यक है, ठीक उसी प्रकार लेखाविधि के अध्ययन के लिए इसके सिद्धान्तों. अवधारणाओं, प्रथाओं और सीमाओं का अध्ययन करना भी आवश्यक है। लेखाविधि के सिद्धान्तों से आशय उन सिद्धान्तों से है जिनको ध्यान में रखकर किसी व्यावसायिक या निर्माणी संस्था के व्यवहारों का लेखा रखा जाता है और ११ का समाप्ति के पश्चात उन लेखों की सहायता से तलपट तैयार किया जाता है और व्यापारिक एवं लाभ-हानि खाता तथा आर्थिक चिट्ठा तैयार किया जाता है और महत्त्वपूर्ण निष्कर्ष ज्ञात किए जाते हैं।

लेखाविधि के सिद्धान्तों की प्रकृति

(Nature of Accounting Principles) 

लेखाविधि के सिद्धान्त मानव-निर्मित (Man-made) हैं। लेखाविधि के सिद्धान्त अन्य प्राकृतिक विज्ञानों की भाँति निश्चित एवं स्वयंसिद्ध नहीं हैं और न ही लेखाविधि के सिद्धान्तों की प्रामाणिकता की जाँच प्रयोगशाला (Laboratory) में निरीक्षण या प्रयोग द्वारा की जा सकती है। लेखाविधि के सिद्धान्तों का रूप शाश्वत नहीं है, अपितु इनका वर्तमान स्वरूप कालान्तर का क्रमिक विकास है अर्थात् इनमें समय एवं परिस्थितियों के अनुसार परिवर्तन होते रहते हैं। प्रारम्भ में लेखों को सुचारु रूप से लिखने के लिए विभिन्न नियमों को अपनाया जाने लगा और जब ये नियम उपयोगी सिद्ध हुए तो इन्हें व्यापक रूप में अपनाया जाने लगा। बाद में इन नियमों को ही लेखाविधि के सिद्धान्तों की संज्ञा दी गई।

लेखाविधि के प्रमुख सिद्धान्त

(Broad Accounting Principles) 

लेखाविधि के सिद्धान्तों के सम्बन्ध में लेखापालकों की विचारधारा में काफी मतभेद हैं, परन्त निम्नलिखित प्रमुख सिद्धान्तों पर सभी लेखापालक एकमत हैं

1. मुद्रा-मापन का सिद्धान्त (Principle of Money Measurement)लेखाविधि का सम्बन्ध मुद्रा से होता है, अत: उन्हीं व्यवहारों एवं घटनाओं का लेखा लेखाविधि में किया जाता है जिनको मुद्रा में मापा जा सकता है।

2. प्रथक व्यवसाय का सिद्धान्त (Principle of Business Entity)-प्रत्येक व्यवसायी का लेखाकर्म रखने का यह उद्देश्य होता है कि उसे यह मालूम हो सके कि उसक पावसाय में कितना लाभ हुआ तथा व्यवसाय की कितनी सम्पत्तियाँ एवं दायित्व हैं। ऐसा तब ही सम्भव है, जबकि व्यवसाय का अस्तित्व तथा व्यवसायी का निजी अस्तित्व शक-पथक रख जाए अपार व्यवसाय क लेखे केवल व्यवसाय की दष्टि से ही रखे जाए।

3. द्वि-पहलू का सिद्धान्त (Principle of Double Aspect)-लेखाविधि के अन्तर्गत दोहरी लेखाविधि (Double Entry System) को अपनाया जाता है, जिसके अन्तर्गत प्रत्येक व्यावसायिक व्यवहार दो खातों को प्रभावित करता है अर्थात् एक खाता डेबिट (Dr.) होता है, तो दूसरा खाता क्रेडिट (Cr.) होता है; जैसे—माल क्रय करने पर क्रय खाते को डेबिट और रोकड़ खाते को क्रेडिट किया जाता है तथा माल का विक्रय करने पर रोकड़ खाते को डेबिट और विक्रय खाते को क्रेडिट किया जाता है।

4. कानून के पालन का सिद्धान्त (Principle of Observation of Law)-प्रत्येक देश में लेखाकर्म रखने के सम्बन्ध में विशिष्ट कानून होते हैं; जैसे- भारतीय कम्पनियों को भारतीय कम्पनी अधिनियम, 1956′ के प्रावधानों का पालन करना चाहिए।

5. स्पष्टीकरण का सिद्धान्त (Principle of Clarity)-इस सिद्धान्त के अनुसार लेखांकन इस प्रकार किया जाना चाहिए जिससे व्यवसाय से सम्बन्धित आवश्यक सूचनाओं का ज्ञान लेखाविधि के द्वारा तैयार किए गए वित्तीय विवरणों से आसानी से हो सके।

6. लेखाकर्म अवधि का सिद्धान्त (Principle of Accounting Period)प्रत्येक व्यवसाय में एक निर्धारित लेखावधि होती है, जिसके समाप्त होने पर अन्तिम खाते तैयार होते हैं और लेखावधि में क्या लाभ-हानि हुआ है, इसका पता लगाया जाता है। लेखावधि प्रायः कैलेण्डर वर्ष (Calendar Year) अर्थात् 31 दिसम्बर या वित्तीय वर्ष (Financial Year) अर्थात् 31 मार्च को समाप्त होती है।

7. भौतिकता का सिद्धान्त (Principle of Materiality)-भौतिकता के सिद्धान्त से यह आशय है कि लेखापालक को केवल उन्हीं तथ्यों एवं घटनाओं का लेखा करना चाहिए जो कि व्यवसाय एवं लेखाविधि की दृष्टि से उपयोगी एवं महत्त्वपूर्ण हैं। उदाहरणार्थ-यदि किसी संस्थान के अन्तिम खातों में आधी या चौथाई पेंसिल, दो या तीन कार्बन, 20-25 आलपिन, आधा दस्ता कागज आदि को अन्तिम स्कन्ध के रूप में दर्शाया जाए तो इस प्रकार का लेखा महत्त्वपूर्ण नहीं है। यदि इनके स्कन्ध का लेखा किया जाए या लेखा न किया जाए तो व्यवसाय की आर्थिक स्थिति पर कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ेगा। इसके विपरीत, व्यापार चिह्न (Trade Mark), पेटेण्ट (Patent) आदि का व्यवसाय के लिए महत्त्व होता है, अतः इनका लेखा रखना आवश्यक है।

8. आय-निर्धारण का सिद्धान्त (Principle of Income Determination)इस सिद्धान्त से आशय उस अतिरेक (Surplus) से है जो कि हम व्यवसाय के सम्पूर्ण व्ययों को वसूल करने के बाद प्रस्तुत करते हैं। इस सम्बन्ध में स्मरणीय तथ्य यह है कि आय और व्यय एक ही लेखावधि से सम्बन्धित होने चाहिए, अर्थात् अर्जित आय (Accrued Income), पेशगी प्राप्त आय (Income Received in Advance), पूर्वदत्त व्यय (Prepaid Expenses) और अदत्त व्यय (Outstanding Expenses) का समायोजन करके ही चालू वर्ष की आय का निर्धारण करना चाहिए।

9. लागत का सिद्धान्त (Principle of Cost)-इस सिद्धान्त के अनुसार स्थायी सम्पत्तियों को उनके लागत मूल्य (Cost Value) पर दर्शाया जाता है, बाजार मूल्य (Market Value) पर नहीं, लेकिन सम्पत्तियों के लागत मूल्य में से ह्रास (Depreciation) अवश्य घर दिया जाता है।10. पूँजीगत तथा आयगत व्यवहारों का सिद्धान्त (Principle of Capital and Revenue Transactions)-लेखे करते समय पूँजीगत एवं आयगत व्यवहारों को अवश्य ध्यान में रखना चाहिए। पँजीगत व्यय ऐसे होते हैं जिनसे कि व्यवसाय का व्यवसाय का लाभार्जन क्षमता में वद्धि होती है जबकि आयगत व्यय ऐसे व्यय होते हैं, जो व्यापार को सचारु रूप से चलाने के लिए दिन-प्रतिदिन करन हात ।

11. एकरूपता का सिद्धान्त (Principle of Consistency)-इस सिद्धान्त क अनुसार संस्थान में जिस पद्धति को एक बार अपनाने का निर्णय ले लिया जाता है, आने वाले समें सीपीआय नामों के लिए वही पद्धति अपनाया जाना चार 

उदाहरणाथ-याद स्थायी सम्पत्तियों पर हास काटने के लिए क्रमागत शेष पर निश्चित दर पधात का अपनाने का निर्णय लिया गया है तो आगामी वर्षों में इसी आधार पर स्थायी सम्पत्तियों पर ह्रास काटा जाना चाहिए।

12. रूढ़िवादिता का सिद्धान्त (Principle of Conservatism)-प्राचीनकाल से लखाविधि के विद्वानों का यह मत रहा है कि व्यवसाय की आर्थिक स्थिति को रूढ़िवादिता के आधार पर दर्शाया जाना चाहिए, अर्थात् भावी लाभों की चिन्ता न करके सम्भावित हानियों के लिए व्यवस्था कर लेनी चाहिए, जिससे संस्था की आर्थिक स्थिति सुदृढ़ रह सके। उदाहरणार्थ-अन्तिम स्कन्ध और विनियोगों का मूल्यांकन उस मूल्य जो कि लागत मूल्य (Cost Value) और बाजार मूल्य (Market Value) दोनों में जो भी कम हो, पर किया जाना चाहिए।

लेखाविधि के सिद्धान्तों का महत्त्व

(Importance of Accounting Principles) 

लेखाविधि के सिद्धान्तों की सीमाओं का अध्ययन करने के पश्चात् यह निष्कर्ष निकालना उचित नहीं है कि लेखाविधि के सिद्धान्तों की कोई महत्ता ही नहीं है। वास्तव में सीमाएँ तो प्रत्येक विज्ञान की होती हैं जिनको उस विज्ञान का प्रयोग करते समय ध्यान में रखना ही चाहिए। लेखाविधि के सिद्धान्तों का महत्त्व निम्नलिखित तथ्यों से स्पष्ट हो जाता है

1. लेखाविधि एक विज्ञान है (Accounting is a Science)-लेखाविधि के सिद्धान्तों के कारण ही लेखाविधि विषय को विज्ञान की संज्ञा दी जाती है।

2. व्यवसाय की लाभ-हानि एवं आर्थिक स्थिति का ज्ञान होना (Ascertaining the Profit or Loss and Financial Position of the Business)-लेखाविधि के सिद्धान्तों के आधार पर व्यवसाय के व्यवहारों का लेखा रखकर व्यवसाय की लाभ-हानि एवं आर्थिक स्थिति की जानकारी प्राप्त की जाती है।3. लेखाविधि के सिद्धान्तों के आधार पर गत वर्षों से तुलना सम्भव है (Comparison from previous years is possible with Application of inting Principles)-लेखाविधि के सिद्धान्तों का पालन करते हुए गत वर्षों क तलना वर्तमान वर्ष के परिणामों से की जाती है और यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि व्यवसाय प्रगति की ओर अग्रसर है या पतनोन्मुख है।

4. महत्त्वपूर्ण निर्णय लेने के लिए उपयोगी (Useful for Important Decision Making)-लेखाविधि के सिद्धान्तों का व्यापक प्रयोग होने के कारण व्यवसायी अपने प्रतिस्पर्धियों के व्यवसायों की गतिविधियों और उनके परिणामों से अपने व्यवसाय के परिणामों की तुलना कर सकता है और अपने व्यवसाय के लिए अनेक महत्त्वपूर्ण निर्णय ले सकता है।

लेखाविधि के सिद्धान्तों की सीमाएँ

(Limitations of Accounting Principles) 

लेखाविधि के सिद्धान्त मानव-निर्मित हैं। इनमें परिस्थितियों के अनुसार समय-समय पर परिवर्तन होते रहते हैं। वर्तमान में अपनाए जाने वाले सिद्धान्तों की अनेक सीमाएँ हैं जिनमें से मुख्य निम्नलिखित हैं

1. सिद्धान्तों के सम्बन्ध में एकमत स्वीकृति का अभाव (Lack of Agreement on Principles)-लेखाविधि के सिद्धान्तों को व्यापक रूप से अपनाया जाता है, न कि पूर्ण रूप से। इसका प्रमुख कारण यह है कि सभी व्यवसायी अपनी इच्छानुसार लेखाविधि के सिद्धान्तों का पालन करते हैं, इन सिद्धान्तों का पालन करने के लिए किसी व्यवसायी को बाध्य नहीं किया जा सकता है। उदाहरणार्थ-अन्तिम स्कन्ध (Closing Stock) का मूल्यांकन लागत मूल्य या बाजार मूल्य पर या इन दोनों में से जो भी मूल्य कम हो उस पर किया जा सकता है। स्कन्ध मूल्यांकन की प्रत्येक विधि के सम्बन्ध में सही एवं उचित तर्क दिए जा सकते हैं। 

2. सिद्धान्तों की पूर्ण सूची का अभाव (Lack of Complete list of Accounting Principles)-लेखाविधि के सिद्धान्तों की एक महत्त्वपूर्ण सीमा यह भी है कि इन सिद्धान्तों की पूर्ण सूची उपलब्ध नहीं है, जिसके परिणामस्वरूप एक से ही व्यवसायों में लेखाविधि में विभिन्नता पायी जाती है और सिद्धान्तों की पूर्ण सूची के अभाव में कुछ परिस्थितियों में लेखापालकों को स्वयं ही निर्णय लेने पड़ते हैं।

3. सिद्धान्तों के प्रयोग में अन्तर (Difference in the Application of Accounting Principles)-लेखाविधि के सिद्धान्तों के सम्बन्ध में लेखापालकों में मत की भिन्नता के साथ-साथ कुछ सिद्धान्तों के प्रयोग में अन्तर भी पाया जाता है। उदाहरणार्थ-यदि अन्तिम स्कन्ध के मूल्यांकन की समस्या है और इस सम्बन्ध में यह भी निश्चित कर लिया जाता है कि अन्तिम स्कन्ध का मूल्यांकन लागत मूल्य पर किया जाएगा तो इस सम्बन्ध में अब यह प्रश्न उत्पन्न होता है कि अन्तिम स्कन्ध का मूल्यांकन लागत मूल्य की कौन-सी विधि से किया जाए क्योकि अन्तिम स्कन्ध का लागत मूल्य पर मूल्यांकन करने की भी अनेक विधियाँ हैं-(i) पहले आया, पहले गया (First In First Out or FIFO), (ii) बाद में आया, पहले गया (Last In First Out or LIFO), (iii) सरल औसत विधि (Simple Average Method), (iv) भारित औसत विधि (Weighted Average Method), (v) प्रमाप लागत विधि (Standard Cost Method) आदि। इन सब विधियों के अनुसार अन्तिम स्कन्ध का मूल्यांकन अलग-अलग आएगा। वैसे सभी विधियों के पक्ष में उचित तर्क दिए जा सकते हैं।

4. लेखाविधि में लेखे केवल मौद्रिक रूप में ही रखे जाते है (Accounting  Records are kept in Monetary Terms only) —लेखाविधि के द्वारा केवल ऐसे व्यवहारों का लेखा रखा जाता है जिनको मुद्रा के रूप में मापा जा सकता हैं। अर्थात् लेखाविधि के द्धारा ऐसे तथ्यों एंव घटनाओं का लेखा नहीं रखा जाता जो कि अमौद्रिक प्रकृति की होती है। यद्याप एस अमौद्रिक व्यवहार व्यवसाय के लिए महत्त्वपर्ण हो सकते हैं; उदाहरणार्थ-अच्छे प्रबन्धक एवं कर्मचारी संस्था की सम्पत्ति हैं. फिर भी इन्हें आर्थिक चिठ्ठा दर्शाया जाता।

5. लेखों पर भविष्य के अनुमानों का प्रभाव (Effect of Future Estimates on Ecoras)-लखाविधि के लेखों पर भावी अनमानों का भी पर्याप्त प्रभाव पड़ता है. उदाहरणार्थ-स्थायी सम्पत्ति के जीवनकाल और उसके अवशेष मल्य का अनुमान ह्रास की राशि का प्रभावित करता है। ये अनमान गलत भी हो सकते हैं। ऐसी स्थिति में ह्रास की राशि ठाक प्रकार से निर्धारित नहीं हो सकेगी और लाभ-हानि खाता और आर्थिक चिदा सही परिणाम प्रस्तुत नहीं करेगा।

प्रश्न 3 – लेखांकन प्रमाप से आप क्या समझते हैं?

What do you mean by Accounting Standard ?

अथवा भारत में लेखांकन मानदण्ड किस प्रकार विकसित किए जाते हैं? अब तक भारत में विकसित लेखांकन मानदण्डों की सूची दीजिए।

How Accounting Standards are developed in India ? Give a list of Accounting Standards Developed in India so far. 

अथवा लेखांकन मानदण्ड क्या हैं? उनका क्या उद्देश्य है? उनकी उपयोगिता का भी वर्णन कीजिए।

What are Accounting Standards ? What are their objectives ? Describe their utility also. 

उत्तर – लेखांकन मानदण्ड का आशय और परिभाषा

(Meaning and Definition of Accounting Standards) सामान्यतया स्वीकृत लेखांकन सिद्धान्तों को विधिबद्ध करते हैं। वस्तुत: इन्हें लेखांकन भाषा की व्याकरण कहा जा सकता है क्योंकि ये विभिन्न लेखांकन सौदों के लेखांकन व्यवहार लिए वित्तीय विवरणों में प्रस्तुतीकरण के नियम निर्दिष्ट करते हैं। ध्यान रहे कि लेखांकन बाट देश के कानून से असंगत नहीं हो सकते। यदि किसी अधिनियम में संशोधन के कारण कोई मानदण्ड अधिनियम के असंगत हो जाता है तो अधिनियम मानदण्ड के प्रावधान को कर देगा, अत: इसमें तुरन्त संशोधन आवश्यक हो जाता है।

टी० पी० घोष के शब्दों में, “लेखांकन प्रमाप वह नीतिगत प्रपत्र है जो मान्य लेखांकन निकाय द्धारा निर्गमित किया जाता है, जिसमें लेखांकन व्यवहार घटनाओं के विभिन्न पहलू; पन प्रबन्ध एवं प्रकटीकरण से सम्बन्धित होते हैं।गुप्ता-गुप्ता के अनुसार, “लेखांकन मानदण्ड किसी विशेष मान्यता प्राप्त लेखांकन संस्था अथवा सरकार या अन्य किसी व्यवस्थापिका संस्था द्वारा निर्गमित नियम या नाति

प्रलेख हैं जिसमें लेखांकन लेन-देनों की मान्यता, मापन व्यवहार, प्रस्तुतीकरण और अभिव्यक्ति के पहलुओं को सम्मिलित किया जाता है।”

पूरे विश्व के लिए लेखांकन मानदण्ड निर्गमन का कार्य अन्तर्राष्ट्रीय लेखांकन HEGUE als (International Accounting Standard Board—IASB) ART सम्पादित किया जाता रहा है। भारत में लेखांकन मानदण्ड इन्स्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउण्टेण्ट्स ऑफ इण्डिया (ICAI) द्वारा 21 अप्रैल, 1977 में स्थापित लेखांकन प्रमाप बोर्ड (ASB) द्वारा निर्गमित किए जाते हैं। IASB द्वारा अभी तक 41 अन्तर्राष्टीय लेखांकन मानदण्ड (IAS) जारी किए जा चुके हैं तथा भारत में अभी तक 28 लेखांकन मानदण्ड निर्गमित किए गए हैं जिनमें से 27 लेखांकन मानदण्ड अब प्रचलन में हैं।

लेखांकन मानदण्डों के उद्देश्य

(Objectives of Accounting Standards) 

लेखांकन मानदण्डों के प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित हैं

1. लेखांकन नीतियों और व्यवहारों में एकरूपता लाना (To Standardize Accounting Policies and Practices)-लेखांकन मानदण्डों का प्रमुख उद्देश्य विभिन्न लेखांकन नीतियों और व्यवहारों को प्रमापित करना है जिससे जहाँ तक सम्भव हो, वित्तीय विवरणों की अतुल्यता समाप्त की जाए और उन्हें विश्वसनीय एवं तुल्य बनाया जा सके।

2. वित्तीय विवरणों में अभिव्यक्ति की सीमा निर्धारित करना (To Determine the Extent of Disclosure in Financial Statements)-वित्तीय विवरणों और सम्बन्धित अंकेक्षक प्रतिवेदनों में विभिन्न मामलों की अभिव्यक्ति या प्रकटीकरण की सीमा भी लेखांकन मानदण्ड ही निर्धारित करते हैं। इस प्रकार का प्रकटीकरण वित्तीय विवरणों के बाद समुचित टिप्पणियाँ देकर किया जा सकता है जिसमें किसी विशिष्ट मद के लेखांकन व्यवहार की व्याख्या की जा सकती है।

लेखांकन मानदण्डों की उपयोगिता

(Utility of Accounting Standards) 

वित्तीय सूचना में लेखांकन मानदण्डों की एक अति महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। ये उपभोक्ता को लेखों की तैयारी के आधार स्पष्ट करते हैं। ये विभिन्न व्यावसायिक इकाइयों अथवा एक ही व्यावसायिक इकाई के वित्तीय विवरणों को तुल्य बनाते हैं। इसके अतिरिक्त, वित्तीय सूचना में मान्यताओं, नियमों और नीतियों में एकरूपता के कारण समचित समंकों में हेराफेरी की मात्रा में महत्त्वपूर्ण कमी आती है तथा वित्तीय विवरणों की विश्वसनीयता बढ़ती है और वे तुल्य हो जाते हैं, अत: ये प्रबन्धकों, अंशधारकों, विनियोक्ताओं, लेनदारों, कर्मचारियों, सरकार, शोधकर्ताओं आदि सभी के लिए उपयोगी हैं। इस प्रकार लेखांकन मानदण्ड लेखांकन समंकों के प्रयोगकर्ताओं के बीच वित्तीय समंकों को विश्वसनीयता और पारदर्शिता प्रदान करते हैं।

भारत में लेखांकन मानदण्ड

(Accounting Standards in India) 

भारत में लेखांकन मानदण्डों को तैयार करने और निर्गमित करने का दायित्व इन्स्टीट्यूट माफ चार्टर्ड एकाउण्टेण्ट्स ऑफ इण्डिया (ICAL) का है जिससे भारतीय कम्पनियों के वित्तीय विवरण अन्तर्राष्ट्रीय लेखांकन मानदण्डों के अनुरूप तैयार हो। इस दाय इन्स्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउण्टेण्टस ऑफ इण्डिया ने 21 अप्रैल, 1977 को लेखाकन मानदण्ड बोर्ड की रचना की। तब से यह बोर्ड इस कार्य में लगा हआ है और अब तक 28 लेखांकन प्रमाप जारी कर चुका है।

लेखांकन मानदण्ड जारी करने हेतु प्रविधि 

(Procedure for Issuing Accounting Standards) 

लेखांकन मानदण्डों के सजन हेतु निम्नलिखित प्रविधि अपनायी जाती है-

(1) लेखांकन मानदण्ड बोर्ड उन व्यापक क्षेत्रों का निर्धारण करता है जिनमें लेखांकन मानदण्डों के सृजन की आवश्यकता है।

(2) लेखांकन मानदण्ड की रचना में उस विशेष विषय पर विचार के लिए बनाया गया अध्ययन दल, बोर्ड की सहायता करता है।

(3) लेखांकन मानदण्ड बोर्ड सरकार, सार्वजनिक क्षेत्र के संस्थान, उद्योग तथा अन्य संगठनों के प्रतिनिधियों से विचार-विमर्श करके उस विषय पर उनके विचार जानता है।

(4) इसके बाद प्रस्तावित मानदण्ड के प्रारूप का प्रकटन तैयार किया जाता है तथा उसे संस्थान के सदस्यों तथा आम जनता द्वारा टीका-टिप्पणी हेतु निर्गत किया जाता है।

(5) प्राप्त टीका-टिप्पणियों पर विचार करने के पश्चात् प्रस्तावित मानदण्ड के प्रारूप को बोर्ड द्वारा अन्तिम रूप दिया जाता है तथा संस्थान की परिषद् को भेज दिया जाता है।

(6) संस्थान की परिषद् प्रस्तावित मानदण्ड के अन्तिम प्रारूप पर विचार करती है तथा यदि आवश्यक हो तो बोर्ड के साथ विचार-विमर्श करके उसमें संशोधन भी करती है और फिर सम्बद्ध विषय पर परिषद् के अधिकार से लेखांकन मानदण्ड निर्गमित कर दिया जाता है।

लेखांकन मानदण्ड का पालन 

(Compliance with Accounting Standards)

परिषद द्वारा निर्गमित लेखांकन मानदण्ड दो प्रकार के होते हैं-अनिवार्य और पटात्री। यदि मानदण्ड अनिवार्य है तो संस्थान के सदस्यों का यह कर्त्तव्य है कि इसका अनिवार्य रूप से पालन किया जाए। मानदण्डों से किसी विचलन की दशा में अंकेक्षक का

कि अपने प्रतिवेदन में इसे स्पष्ट अभिव्यक्त कर दे ताकि वित्तीय विवरणों का सर्ग ऐसे विचलनों से जागरूक रह सके। यदि मानदण्ड परामर्शदात्री है तो संस्थान मानदण्ड की उपादेयता के प्रति अपने सदस्यों को शिक्षित करता है तथा समय के साथ – साथ इसके पालन के लिए कदम उठाता है। परामर्शदात्री मानदण्ड के उल्लंघन का अंकेक्षक का कोई दायित्व नहीं होता है।

माल बेचने की किराया-क्रय पद्धति एक अन्य पद्धति ‘किस्त भुगतान पद्धति’ के नाम Na। इस पद्धात में क्रेता को माल की पूरी रकम का भुगतान एक साथ न करके किस्तों में करना पड़ता है, किन्तु माल का स्वामित्व क्रेता पर तुरन्त हस्तान्तरित हो जाता है।

किस्त भगतान पद्धति की परिभाषा

(Definition of Instalment Payment System) 

प्रमुख लेखकों द्वारा

(1) ज० आर० बाटलीबॉय के अनसार, “किस्त भगतान पद्धति के अन्तर्गत माल क्रय किए जाने पर माल क्रेता की सम्पत्ति उसी समय हो जाती है जब उसे माल की सपर्दगी मिलती है।”

(2) कार्टर के अनुसार, “किस्त भुगतान पद्धति के अन्तर्गत माल का स्वामित्व तुरन्त क्रेता पर हस्तान्तरित हो जाता है अथवा माल पर उसका वास्तविक स्वामित्व हो जाता है, यद्यपि उसे उस पर भुगतान कई वर्षों में करना पड़ता है। यदि क्रेता द्वारा किस्त का भुगतान नहीं किया जाता है तो विक्रेता माल को वापस नहीं ले सकता है, वह केवल बाकी रकम के लिए दावा कर सकता है।”

सामान्य परिभाषा

(General Difinition) 

किस्त भुगतान पद्धति द्वारा बिक्री का अनुबन्ध एक ऐसा ठहराव है जिसके अन्तर्गत किस्तों की निर्धारित संख्या में क्रय मूल्य का भुगतान निश्चित समयावधि के बाद किया जाता है। जैसे ही क्रेता बिक्री अनुबन्ध पर हस्ताक्षर करके प्रथम किस्त का भुगतान करता है वैसे ही तुरन्त माल का स्वामित्व एवं अधिकार विक्रेता से उस (क्रेता) पर हस्तान्तरित हो जाता है। विक्रेता का फिर माल पर किसी भी प्रकार का कोई अधिकार नहीं रहता, सिवाय इसके कि यदि क्रेता द्वारा किसी किस्त का भुगतान न किया जाए तो विक्रेता उस पर दावा कर सकता है।

आदर्श परिभाषा

(Ideal Definition) 

किस्त भुगतान पद्धति बिक्री की एक ऐसी पद्धति है जिसमें आपसी अनुबन्ध के अनुसार बिक्री के समय ही सम्पत्ति का स्वामित्व क्रेता को हस्तान्तरित हो जाता है तथा सम्पत्ति की पर्दगी भी क्रेता को कर दी जाती है। इस पद्धति में बिक्री की राशि का भुगतान किस्तों द्वारा होता है तथा ब्याज किस्त में शामिल हो सकता है या किस्त के अतिरिक्त भी दिया जा सकता है।

सी भी स्थिति में किस्त भुगतान की त्रुटि की दशा में विक्रेता को माल वापस लेने का अधिकार नहीं होता है। वह केवल अदत्त मूल्य के लिए दावा कर सकता है। इस प्रकार की किसी की विभिन्न शर्ते इसके अनुबन्ध में दी रहती हैं।

किस्त भुगतान प्रणाली के अन्तर्गत लेखा

(Accounting Record Under Instalment System)क्रेत की पुस्तकों में लेखा (Entries in Purchaser’s Books) किस्त भगतान पद्धति के अन्तर्गत क्रेता की पुस्तकों में अग्रलिखित लेखे किए जाते हैं-

(ब) विनिमय-दरों में परिवर्तन होना – यदि मुख्य कार्यालय वाले देश और शाखा वाले देश की मुद्राओं की विनिमय-दर में होने वाले परिवर्तनों में स्थिरता न हो तो शाखा के तलपट की बाकियों का रूपान्तर करने के लिए निम्नलिखित नियम महत्त्वपूर्ण हैं

(1) स्थायी सम्पत्तियाँ (Fixed Assets) – स्थायी सम्पत्तियों के मूल्यों का रूपान्तर उस दर पर किया जाना चाहिए-(i) जो सम्पत्ति प्राप्त करते समय थी, या (ii) इसके लिए प्रसंविदा हुआ था, या (iii) इसके मूल्य भुगतान की तिथि पर थी। यदि इन दरों में से किसी भी दर का पता न चल सके तो स्थायी सम्पत्तियों की राशि को प्रारम्भिक दर पर परिवर्तित किया जाता है।

(2) स्थायी दायित्व (Fixed Liabilities)-ऋणपत्र जैसे स्थायी दायित्वों की राशियों का रूपान्तर उस दर पर किया जाता है जो उस समय थी जब दायित्व किए गए थे। यदि इस दर का पता न चल सके तो प्रारम्भिक दर पर इनकी राशियों का परिवर्तन किया जाता है। () इन दायित्वों का भुगतान लम्बी अवधि के बाद किया जाता है, अत: यदि विनिमय दर में गिरावट आ रही हो और भविष्य में भी इस गिरावट की सम्भावना हो तो इन दायित्वों के भुगतान के लिए सामान्य से अधिक राशि की आवश्यकता पड़ेगी, अत: विनिमय दर की गिरावट के कारण इस आधिक्य राशि के लिए एक संचय बनाया जाना चाहिए। (ii) यदि इन दायित्वों के भुगतान की तिथि पास आ गई है और विनिमय-दर में विपरीत दिशा में परिवर्तन हो रहे हैं तो इन दायित्वों की राशियों का परिवर्तन चालू दायित्वों की तरह किया जा सकता है।

उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट है कि स्थायी सम्पत्तियों और स्थायी दायित्वों का रूपान्तर प्रारम्भिक दर पर होता है। सामान्यत: वर्ष के प्रारम्भ की तिथि की दर प्रारम्भिक दर मानी जाती है।

(3) अस्थायी सम्पत्तियाँ (Floating Assets) – अस्थायी सम्पत्तियों की राशियों का रूपान्तर उस दर पर किया जाता है जो वर्ष के समाप्त होने के दिन प्रचलन में थी। इस दर को अन्तिम दर कहा जाता है।

(4) अस्थायी दायित्व (Floating Liabilities) – अस्थायी दायित्वों की राशियों का भी रूपान्तर उस दर पर किया जाता है जो वर्ष के समाप्त होने के दिन प्रचलन में थी अर्थात अन्तिम दर पर।

उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट है कि अस्थायी सम्पत्तियों और अस्थायी दायित्वों का रूपान्तर अन्तिम दर पर होता है। सामान्यत: वर्ष की अन्तिम तिथि की दर अन्तिम दर मानी जाती है।(5) शाखा खाते की बाकी तथा भेजी हुई राशियाँ (Branch Balance and Remittances) – शाखा खाते की बाकी को किसी भी दर पर नहीं बदला जा सकता है। मुख्य कार्यालय के खाते की बाकी को ही इस खाते की राशि का रूपान्तर माना जाता है। इसी प्रकार, शाखा द्वारा भेजी गई राशियों का रूपान्तर किसी भी दर पर नहीं किया जाता है बाल्क मख्य कार्यालय में, इससे सम्बन्धित राशियाँ ही इसकी रूपान्तर राशियाँ मानी जाता ह। १९ नियम तब लागू होता है जब इस सम्बन्ध में कोई भिन्न सूचना न दी गई हो।

(6) सम्पत्तियाँ एवं दायित्व (Assets and Liabilities) – यदि शाखा की किसी सम्पत्ति एंव दायित्व के रूपान्तरण की राशि मुख्य कार्यालय के खातों में दी हुई हो औ सम्पत्ति एवं दायित्व के रूपान्तर की राशि मुख्य कायालय की सम्पत्ति एवं दायित्व की राशि क सूचना प्रश्न में हो तो शाखा की इस प्रकार की सम्पा सम्पत्तियों एवं दायित्वों के रूपान्तर से सम्बन्धित नियमों के आधार पर नहीं करना मुख्य कार्यालय में, इस सम्बन्ध में लिखी हुई राशि हा रूपान्तर राशि माना जानी चाहि रूपान्तर से सम्बन्धित नियमों के आधार पर आयी हुई राशि इससे भिन्न ही क्यों न हों।

(7) अप्राप्त व संदिग्ध ऋण का संचय (Reserve for Bad and Da Debts)-अप्राप्य एवं संदिग्ध ऋण के संचय की राशि का उस दर पर रूपान्तर कि है जिस दर पर देनदारों का रूपान्तर होता है, अर्थात् अन्तिम दर का प्रयोग किया जा

(8) ह्रास (Depreciation)-ह्रास का रूपान्तर उस दर पर किया जाता है कि पर उसमें, सम्बन्धित सम्पत्ति की राशि का रूपान्तर किया जाता है।

(9) आयगत मदें (Revenue Items)-आयगत मदों का रूपान्तर औसत दर किया जाता है। आयगत मदों में, शाखा द्वारा किए गए विभिन्न प्रकार के आयगत आयक दोनों आते हैं जैसे प्रारम्भिक रहतिया और अन्तिम रहतिया को छोड़कर व्यापारिक खाते और लाभ-हानि खाते में जाने वाली सभी मदें औसत दर पर परिवर्तित की जाती हैं।

(10) प्रारम्भिक तथा अन्तिम रहतिया (Opening and Closing Stock)प्रारम्भिक दर पर प्रारम्भिक रहतिया का रूपान्तर तथा अन्तिम दर पर अन्तिम रहतिया का रूपान्तर किया जाता है।

रूपान्तर के बाद तलपट निकालना 

शाखा खाते के तलपट की समस्त बाकियों के रूपान्तर के बाद, इन रूपान्तर राशियों से एक नया तलपट बनाया जाता है। इस तलपट की डेबिट व क्रेडिट बाकियों के योग का अन्तर बराबर नहीं होता है। इन दोनों के योग के अन्तर को विनिमय की बाकी या विनिमय सन्देह कहा जाता है। यह अन्तर डेबिट अथवा क्रेडिट कुछ भी हो सकता है। यदि इस अन्तर की राशि कम हो तो इसे शाखा के लाभ-हानि खाते में हस्तान्तरित किया जाता है, परन्तु यदि इस अन्तर राशि अधिक हो तो इस अन्तर की राशि को विनिमय उतार-चढाव खाता में हस्तान्तरित कर चिट्टे में ले जाया जाता है।

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