Audit Report B.Com 3rd Year Study Material Notes

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अंकेक्षण रिपोर्ट (Audit Report)

किसी भी संस्था के खातों का अंकेक्षण कार्य समाप्त करने के पश्चात अंकेक्षक जाँच काय परिणामों और अपने निष्कर्षों का सारांश रूप में एक विवरण देता है जिस पर उसके हस्ताक्षर हात इसी विवरण को अंकेक्षक का प्रतिवेदन या रिपोर्ट कहते हैं। इस प्रकार अंकेक्षण रिपोर्ट अंकेक्षण काय अन्तिम उपलब्धि होती है। यह वह माध्यम है जिसके आधार पर अंकेक्षक वित्तीय खातों एवं विवरणा सम्बन्ध में अपने विचार व्यक्त करता है। जोसेफे लंकास्टर के अनुसार, “एक रिपोर्ट एकत्रित एवं विचार किए हुए तथ्यों की एक सची है जो उन व्यक्तियों को स्पष्ट एवं संक्षिप्त सूचना देने के लिए बनाई जाती है, जिन्हें प्रतिवदन विषय सामग्री से सम्बन्धित पूर्ण तथ्यों की जानकारी नहीं होती है।” कम्पनी अधिनियम, 2013 की धारा 143 (2) के अनुसार, “अंकेक्षक को स्वयं द्वारा जाँच गये हिसाब-किताब और प्रत्येक में चिट्ठे, लाभ हानि खाता एवं उसके साथ संलग्न किए गए प्रलेखों के सम्बन्ध साधारण सभा में प्रस्तुत किए जाते हैं अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करनी होती है।” यह रिपोर्ट अंकेक्षक की रिपोर्ट/प्रतिवेदन कहलाती है। उपरोक्त परिभाषाओं से अंकेक्षक-प्रतिवेदन की निम्नांकित विशेषतायें सामने आती हैं –
  1. प्रतिवेदन अंकेक्षक द्वारा किये गये जाँच-कार्यों का संक्षिप्त विवरण (Summary) है। 
  2. प्रतिवेदन, अंकेक्षक के उन निष्कर्षों को भी स्पष्ट करता है जिन पर जाँच-कार्य के उपरान्त अंकेक्षक पहुँचता है।
  3. प्रतिवेदन में तथ्यों के साथ-साथ अंकेक्षक अपना सुझाव भी देता है, यदि माँगा गया हो। 
  4. प्रतिवेदन पर अंकेक्षक के हस्ताक्षर होना आवश्यक है। 
  5. प्रतिवेदन से ठोस एवं संक्षिप्त सूचनाएँ प्राप्त होती हैं।
एक अंकेक्षक कम्पनी के अंशधारियों/सदस्यों द्वारा कम्पनी के हिसाब-किताब की जाँच करने के मा नियक्त किया जाता है, अत: अंकेक्षक अपनी अंकेक्षण रिपोर्ट कम्पनी के सदस्यों/अंशधारियों को ही देता है। कभी-कभी अंकेक्षक की नियुक्ति संचालकों के द्वारा की जाती है, परन्तु फिर भी अंकेक्षक अपनी रिपोर्ट संचालकों को न देकर अंशधारियों को ही देता है। सरकारी कम्पनियों की दशा में भारत का कम्पट्रोलर व ऑडिटर जनरल अंकेक्षक की नियुक्ति करता है तथा अंकेक्षक को निर्देश देता है कि कम्पनी के खातों का अंकेक्षण किस प्रकार से किया जाएगा। इस प्रकार से नियुक्त किया हुआ अंकेक्षक अपनी रिपोर्ट भारतीय कम्पट्रोलर व ऑडिटर जनरल (CAG) को देता है। रिपोर्ट की मुख्य बातें (Contents of the Report) कम्पनी अधिनियम, 2013 की धारा 143 (3) के अनुसार अंकेक्षक की रिपोर्ट में निम्नलिखित बातें होनी चाहिए (1) “उसकी सम्मति (राय) में उसको प्राप्त सूचना व स्पष्टीकरण के अनुसार कम्पनी के खाते कम्पनी अधिनियम, 2013 के द्वारा वांछित सूचना देते हैं, तथा (क) कम्पनी का चिट्टा उसके वित्तीय वर्ष (Financial year) के अन्त की आर्थिक स्थिति का, एवं (ख) लाभ-हानि खाता, वित्तीय वर्ष के लाभ और हानि का ‘सच्चा और उचित’ (true and fair) चित्र प्रस्तुत करता है, अथवा नहीं।” (2) उसने वे सभी सूचनायें और स्पष्टीकरण प्राप्त कर लिए हैं या नहीं जो उसकी जानकारी एवं विश्वास के लिए अंकेक्षण कार्य में आवश्यक हैं।  (3) उसकी राय में कम्पनी ने कम्पनी अधिनियम, 2013 के अनुसार उचित पुस्तकें रखी हैं या कम्पनी की जिन शाखाओं का उसने निरीक्षण नहीं किया है, उनसे उसे उचित विवरण प्राप्त हो गये हैं या नहीं। (4) शाखा के हिसाब-किताब सम्बन्धी रिपोर्ट जिसे धारा 143(8) के अनुसार कम्पनी अंकेक्षक के सा अन्य अंकेक्षक द्वारा अंकेक्षित किया गया है उनको प्राप्त हुई है अथवा नहीं और “अपना रिपोर्ट तैयार करते समय किस प्रकार उनका प्रयोग किया है।
  1. कम्पनी का चिट्ठा तथा लाभ-हानि खाता उसकी पुस्तकों, खातों एवं विवरणों के अनुरूप हैं या नहीं। 
  2. अंकेक्षक को अपनी रिपोर्ट में बताना होता है कि क्या लाभ-हानि विवरण व चिट्ठा लेखाकर्म Accounting Standards) के अनुरूप हैं।
  3. वित्तीय व्यवहार जिनका कम्पनी पर दुष्प्रभाव पड़ सकता है, अंकेक्षक को रिपोर्ट में उनकी चर्चा करनी होती है।
  4. अंकेक्षक को अपनी रिपोर्ट में यह भी बताना होता है कि कोई निदेशक (संचालक) नियुक्ति के अयोग्य तो नहीं है।
(9) अंकेक्षक को अपनी रिपोर्ट में यह भी बतलाना होता है कि क्या कम्पनी में आन्तरिक वित्तीय प्रणाली प्रभावी ढंग से कार्यरत है या नही। (10) रिपोर्ट में अन्य निर्धारित मामलों के विषय में भी चर्चा की जानी चाहिए। रिपोर्ट पर हस्ताक्षर-धारा 145 के अनुसार वह व्यक्ति जो कम्पनी का अंकेक्षक नियुक्त किया गया है और यदि एक साझेदारी फर्म नियुक्त की गयी है, तो भारत में प्रैक्टिस (Practice) करने वाला साझेदार ही अंकेक्षक की रिपोर्ट एवं किसी अन्य प्रलेख (document) पर हस्ताक्षर कर सकता है या उसे प्रमाणित कर सकता है।

अंकेक्षक की रिपोर्ट के भेद

(Kinds of Auditor’s Report) 

अंकेक्षक रिपोर्ट निम्नलिखित दो प्रकार की होती है-
  1. स्वच्छ रिपोर्ट (Clean Report)—यदि अंकेक्षक को अपने कार्य के लिए कम्पनी से सभी आवश्यक सूचनाएँ एवं स्पष्टीकरण प्राप्त करने के बाद एवं लेखा पुस्तकों की जाँच करने के पश्चात् उसे कोई भी त्रुटि या कपट नहीं मिलती है एवं उसकी राय में चिट्ठा एवं लाभ-हानि विवरण कम्पनी की सच्ची तथा उचित स्थिति प्रकट करते हैं, तो वह एक स्वच्छ रिपोर्ट देता है। स्वच्छ प्रतिवेदन को अमर्यादित प्रतिवेदन (Unqualified) भी कहते हैं। दूसरे शब्दों में, ऐसा प्रतिवेदन जिसमें अंकेक्षक किसी अनियमितता, अशुद्धि, कमी या अन्य प्रकार की शिकायत का उल्लेख नहीं करता, स्वच्छ प्रतिवेदन कहलाता है।
  2. मर्यादित रिपोर्ट (Qualified Report) यदि अंकेक्षक अंकेक्षण-कार्य के दौरान लेखा पुस्तकों में कुछ अशुद्धियाँ, अनियमिततायें अथवा अन्य प्रकार की कमी पाता है तो उसे चाहिए कि इसका उल्लेख वह अपनी रिपोर्ट में कर दे। ऐसी अशुद्धि, अनियमितता, कमी या शिकायतों का उल्लेख करने वाली रिपोर्ट मर्यादित रिपोर्ट कहलाती है। इसे विशेष रिपोर्ट भी कहते हैं। ___
मर्यादित रिपोर्ट के कारण (Reasons for Qualified Report)—एक अंकेक्षक के द्वारा अंकेक्षक रिपोर्ट को मर्यादित करने के निम्नलिखित कारण हो सकते हैं: (i) अंकेक्षण करने में सामान्य तौर पर मान्य अंकेक्षण सिद्धान्तों या मानकों (Standards) का अनुसरण नहीं किया गया है। (ii) कम्पनी अधिनियम की संस्तुतियों एवं लेखाकर्म के सिद्धान्तों के अनुसार वित्तीय विवरण तैयार नहीं किए गए हैं। (iii) लेखाकर्म सूचना तथा मूल्यांकन के सिद्धान्तों (Principles of Valuation) के प्रस्तुतीकरण में समरूपता (Consistency) का अभाव रहा है। (iv) चिट्टे तथा लाभ-हानि खाते में सारपूर्ण (Material) तथ्यों तथा अंकों के उचित प्रकटीकरण का अभाव होने पर अंकेक्षक स्वच्छ रिपोर्ट नहीं दे सकता है।

स्वच्छ रिपोर्ट एवं मर्यादित रिपोर्ट में अन्तर

(Difference between Clean and Qualified Report) 

  1. स्वच्छ रिपोर्ट यह प्रदर्शित करती है कि पुस्तकों में कोई त्रुटि या छल-कपट नहीं है जबकि मर्यादित रिपोर्ट द्वारा यह पता चलता है कि पुस्तकों में त्रुटियाँ और छल-कपट विद्यमान हैं।
  2. स्वच्छ रिपोर्ट द्वारा यह पता चलता है कि चिट्ठा एवं लाभ-हानि खाता व्यापार की ‘सच्ची एवं उचित’ स्थिति प्रकट करते हैं, परन्तु मर्यादित रिपोर्ट यह दर्शाती है कि ‘चिट्ठा’ एवं ‘लाभ-हानि खाता व्यापार की ‘सच्ची एवं उचित’ स्थिति प्रकट नहीं करते।
  3. स्वच्छ रिपोर्ट में किसी भी प्रकार की मर्यादा का उल्लेख नहीं किया जाता जबकि मर्यादित रिपोर्ट में मर्यादा/मर्यादाओं का उल्लेख किया जाता है।
  4. स्वच्छ रिपोर्ट से ज्ञात होता है कि अंकेक्षक जाँची गई पुस्तकों की शुद्धता से सन्तुष्ट है परन्तु मर्यादित रिपोर्ट में वह जाँचे गए हिसाब-किताब से सन्तुष्ट नहीं होता।
  5. स्वच्छ रिपोर्ट व्यापार की ख्याति को बढ़ाती है और मर्यादित रिपोर्ट व्यापार की ख्याति को कम करती है।

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