Company Audit B.Com 3rd Year Study Material Notes

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अंकेक्षक को कम्पनी का अंकेक्षण कार्य प्रारम्भ करने से पूर्व निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिये
  1. नियुक्ति की वैधता की जाँच – अंकेक्षण कार्य प्रारम्भ करने के पूर्व अंकेक्षक को इस बात की जाँच कर लेनी चाहिये कि उसकी नियुक्ति कम्पनी अधिनियम, 2013 की धारा 139 के प्रावधानों के अनुसार की गयी है या नहीं। यदि उसकी नियुक्ति विधिवत् की गई है तो उसे अपनी नियुक्ति को स्वीकार करने या मना करने की सूचना नियुक्ति की तिथि से एक माह के अन्दर कम्पनी रजिस्ट्रार को लिखित रूप में दे देनी चाहिए।
यदि अंकेक्षक की नियुक्ति किसी दूसरे अंकेक्षक के स्थान पर हुई है तो उसे अपनी नियुक्ति का सूचना पूर्व अंकेक्षक को भी देनी चाहिए। यदि वह ऐसा नहीं करता तो वह व्यावसायिक दुराचरण का दोषी माना जायेगा।
  1. व्यवसाय की प्रकृति – अंकेक्षण प्रारम्भ करने से पूर्व अंकेक्षक को व्यवसाय की प्रकृति व अन्य बातों से भली-भाँति परिचित होना चाहिए जैसे किस वस्तु का व्यापार होता है ? वस्तु का क्रय-१ कहाँ से होता है ? व्यवसाय की सम्पत्तियों का क्या स्वभाव है? व्यवसाय की आय-व्यय का मदर तथा व्यवसाय की अन्य तकनीकी बातों का ज्ञान।
  2. वैधानिक प्रलेखों का निरीक्षण – अंकेक्षक को अपना कार्य प्रारम्भ करने से पूर्व कम्पना समस्त महत्वपूर्व प्रलेख जैसे—पार्षद सीमानियम, पार्षद अन्तर्नियम तथा प्रविवरण आदि का अध्ययन लेना चाहिए।
पार्षद सीमानियम (Memorandion of Association [धारा 4D: यह कम्पनी का एक मा. प्रलेख है। इसे कम्पनी का चार्टर भी कहा जाता है क्योंकि इसमें वर्णित सीमाओं तथा प्रावधा कम्पनी उल्लंघन नहीं कर सकती। पार्षद सीमानियम में परिवर्तन करने के लिए विशेष प्रस्ताव करना होगा और इसकी केन्द्र सरकार से स्वीकृति लेनी पड़ती है। पार्षद सीमा नियम में प्रत्येक को आदेश के एक माह के अन्दर रजिस्ट्री कराना आवश्यक है। पार्षद अन्तर्नियम (Articles of Association): कम्पनी अधिनियम, 2013 की धारा 5 , अनुसार प्रत्येक कम्पनी के लिये पार्षद अन्तर्नियम आवश्यक हैं। अन्तर्नियम कम्पनी के वे निय जो कम्पनी की आन्तरिक व्यवस्था को नियन्त्रित करने के लिए बनाये जाते हैं। यदि कम अन्तर्नियम न बनाना चाहे तो सारणी F (Table F) को अपनाया/ लागू किया जायेगा। पार्षद अन्न परिवर्तन धारा 14 व सीमानियम में वर्णित शर्तों के अनुरूप विशेष प्रस्ताव पारित करके किया जा सकता प्रविवरण [धारा 26] से आशय उस प्रलेख से होता है जिसके द्वारा जनता को कम्पनी द्वारा अंशों तथा ऋणपत्रों को क्रय करने के लिए आमन्त्रित किया जाता है। यह बहुत महत्वपूर्ण प्रपत्र होता है, क्योंकि जनता इसके आधार पर ही अंश खरीदती है. अतः को दसे सावधानी से अध्ययन करके उसमें निम्नलिखित बातें नोट करनी चाहिए (i) अभिदान (Subscription) के लिए अर्पित पूंजी की राशि, विभिन्न प्रकार के अंश और उनके अधिकार। (ii) निर्गमन की शर्ते, प्रार्थना और आबन्टन पर देय राशियाँ और भविष्य की याचनाओं (Calls) पर दी जाने वाली राशि। (iii) न्यूनतम अभिदान (Minimum Subscription) की धनराशि।  (vi) विक्रेताओं (Vendors) के साथ प्रविष्ट होते हुए किसी अनुबन्ध के विवरण।  (v) अंशों पर कमीशन के लिए देय धनराशि।  (vi) प्रारम्भिक व्ययों (Preliminary Expenses) की राशि या अनुमानित राशि।  (vii) संचालकों की योग्यता, पारिश्रमिक तथा कर्त्तव्य।  (viii) सैक्रेटीज एवं ट्रेजरार्स की नियुक्ति एवं पारिश्रमिक।  (ix) कम्पनी द्वारा किसी विशेष अनुबन्ध (Material Contract) के विवरण। (4) लेखा-पुस्तकों एवं वैधानिक रजिस्टरों का निरीक्षण – कम्पनी अंकेक्षक को कम्पनी द्वारा रखी जाने वाली समस्त लेखा-पुस्तकों एंव वैधानिक रजिस्टरों की सूची प्राप्त कर लेनी चाहिए। कम्पनी अधिनियम, 2013 की धारा 128 के अनुसार कम्पनी के पंजीकृत कार्यालय में निम्नलिखित तथ्यों से सम्बन्धित लेखे रखे जाने चाहिए – (i) कम्पनी की प्राप्तियाँ एवं भुगतान तथा ऐसे तथ्य जिनके सम्बन्ध में भुगतान पाना है या देना है।  (ii) कम्पनी के समस्त क्रय-विक्रय।  (iii) कम्पनी की समस्त सम्पत्तियाँ एवं दायित्व।  (iv) सामग्री, मजदूरी या अन्य लागत के लेखे जो उत्पादन, निर्माण या खनन कार्य में लगी हुई हों। अंकेक्षक को इन कार्यों के लिए कम्पनी द्वारा रखी गई पुस्तकों की सूची प्राप्त कर लेनी चाहिए। अचानक पुस्तकों से आशय ऐसी पुस्तकों से है जिन्हें वैधानिक रूप से रखना आवश्यक होता है। ___ (5) महत्वपूर्ण अनुबन्धों का निरीक्षण – अंकेक्षक को उन समस्त अनुबन्धों का भी निरीक्षण करना ९ जा कम्पनी एवं व्यक्तियों या संस्थाओं के मध्य किए गए हों। अंकेक्षक का यह कर्त्तव्य है कि वह तया के क्रय के सम्बन्ध में विक्रेताओं से किए गए समस्त अनुबन्धों की जाँच करें। कमीशन के ” अथवा प्रारम्भिक व्ययों को सत्यापित कर यह देखना होगा कि वे प्रविवरण में उचित रूप से किए गए हैं। यदि वैधानिक रिपोर्ट है तो प्रस्तावित अनुबंधों में संशोधनों के लिए उससे सन्दर्भ लिया जा सकता है। (6) पिछले वर्ष के स्थिति विवरण व अंकेक्षक रिपोर्ट का निरीक्षण करना- (i) पिछले वर्ष के स्थिति विवरण का निरीक्षण करके अंकेक्षक को यह देखना चाहिए कि सभी अक प्रकार से चाल वर्ष की पुस्तकों में लाए गए हैं या नहीं।  (ii) पिछले वर्ष की अंकेक्षक रिपोर्ट का निरीक्षण करके यह देखना चाहिए कि रिपोर्ट में खत संस्तुतियों (Recommendations) का पालन किया गया है या नहीं। (iii), इसी प्रकार पिछले वर्ष की संचालक रिपोर्ट के निरीक्षण से यह देखना चाहिए कि लाभ का जन किस प्रकार किया गया था। आधकारियों एवं पुस्तकों की सूची प्राप्त करना-अंकेक्षण के दौरान इस सूची के आधार पर (7) अधिकारियों एंव पुस्तकों की सूची प्राप्त करना – अंकेक्षण के दौरान इस सूची के आधार पर अधिकारियों से आवश्यक जानकारी/स्पष्टीकरण प्राप्त किए जा सकते हैं।  (8) आन्तरिक जाँच विषयक विवरण – (i) अंकेक्षण को प्रचलित आन्तरिक जाँच प्रणाली, आन्तरिक अंकेक्षण प्रणाली, लेखा-विधि, आदि के सम्बन्ध में कम्पनी के प्रबन्ध संचालक/संचालकों से एक लिखित विवरण प्राप्त कर लेना चाहिए जिससे वह उनकी विश्वसनीयता का अनुमान लगा सके।  (ii) अंकेक्षक को कम्पनी के प्रमुख अधिकारियों के हस्ताक्षर के नमूने भी प्राप्त कर लेना चाहिए। इससे उसे कार्य में उत्पन्न बाधाओं में निवारणार्थ अधिक परेशान नहीं होना पड़ेगा. वरन अधिकारी को बुलाकर आवश्यक सूचना या स्पष्टीकरण प्राप्त कर सकता है। कम्पनियों के सम्बन्ध में महत्वपूर्ण जानकारी 
  1. निजी कम्पनी के लिए कम से कम 2 सदस्यों का होना अनिवार्य है, परन्त अधिक सदस्य हो सकते हैं।
  2. सार्वजनिक कम्पनी के लिए न्यूनतम 7 सदस्यों का होना आवश्यक है जबकि इसके सटी अधिकतम संख्या पर कोई प्रतिबन्ध नहीं है।
  3. एक व्यक्ति कम्पनी को छोड़कर, प्रत्येक निजी कम्पनी में कम से कम 2 संचालक आवश्यक हैं, परन्तु सार्वजनिक कम्पनी की दशा में कम से कम 3 संचालक होने आवश्यक है। व्यक्ति कम्पनी की दशा में, कम से कम 1 संचालक होना आवश्यक है।
  4. सेबी दिशा-निर्देशों के अनुसार न्यूनतम अभिदान की राशि कुल निर्गमन का 90% निर्धारित गई है।
  5. कम्पनी अधिनियम, 2013 की धारा 39(2) के अनुसार प्रत्येक प्रतिभूति (अंश/ऋणपत्र प्रार्थनापत्र (आवेदन) पर भुगतान की जाने वाली राशि प्रतिभूति के अंकित मूल्य के 5% या इस सम्बन्ध में सेबी (SEBI) द्वारा निर्धारित अन्य किसी प्रतिशत से कम नहीं होगी।
  6. अंशों का प्रीमियम पर निर्गमन (Issue of Shares at Premium)-जब कम्पनी अपने अंशों को अंकित मूल्य (Face Value) से अधिक मूल्य पर जारी करती है तो अंकित मूल्य से जो राशि अधिक ली जाती है उसे प्रीमियम कहते हैं। यदि 10 रू. का अंश 12 रू. में निर्गमित किया जाए तो 2 रू. प्रीमियम कहलाएगा। जिन कम्पनियों की साख अच्छी होती है वह अपने अंशों को जितना चाहें उतने प्रीमियम पर बेच सकती हैं। कम्पनी अधिनियम के अनुसार इस पर कोई प्रतिबन्ध नहीं है।
अंश प्रीमियम की राशि को ‘प्रतिभूति प्रीमियम’ ‘Securities Premium A/c’ में क्रेडिट करते हैं। यह नाममात्र का खाता है। यह कम्पनी का सामान्य लाभ नहीं है बल्कि पूँजीगत लाभ होता है अत: इसे लाभ-हानि विवरण में नहीं ले जाते हैं बल्कि चिट्ठे के समता एवं दायित्व पक्ष में ‘संचय एवं आधिक्य (Reserves and Surplus) शीर्षक के अन्तर्गत दिखाते हैं। प्रतिभूति प्रीमियम की राशि का प्रयोग अंशधारियों को लाभांश बाँटने के लिए भी नहीं किया जा सकता। कम्पनी अधिनियम 2013 की धारा 52(2) के अनुसार प्रीमियम की राशि का प्रयोग केवल निम्नलिखित उद्देश्यों (Objects) के लिए ही किया जा सकता है : (i) कम्पनी के प्रारम्भिक व्ययों (Preliminary Expenses) को अपलिखित (समाप्त) करने के लिए। (ii) कम्पनी के अंशों या ऋणपत्रों के निर्गमन पर किए गए व्ययों, कमीशन या कटोती का अपलिखित करने के लिए। (iii) अंशधारियों को पूर्णदत्त बोनस अंशों के निर्गमन के लिए। (iv) कम्पनी के पूर्वाधिकार अंशों या ऋणपत्रों के भुगतान के समय दिए जाने वाले प्रीमियम की अपलिखित करने के लिए। (v) धारा 68 के अनुसार अपनी ही कम्पनी के अंशों अथवा अन्य प्रतिभूतियों के वापस (Buy-back) के लिए।
  1. अंशों का कटौती पर निर्गमन (Issue of Shares at Discount)-अंशों को उनक मूल्य से भी कम पर निर्गमित करना ‘कटौती पर अंशों का निर्गमन’ कहलाता है। उदाहरण के लिए, एक 100 रू. अंकित मूल्य वाला अंश 95 रू. पर निर्गमित किया जाए तो यह 5% कटौती पर निगामा हुआ कहा जाएगा। 
अंशों के कटौती पर निर्गमन पर प्रतिबन्ध (Prohibition on issue of shares at a discount): कम्पनी अधिनियम 2013 की धारा 53 के अनुसार कम्पनियों को अपने अंशों का क निर्गमन करने की अनुमति प्रदान नहीं की जाएगी। केवल स्वीट समता अंशों (Sweat Equity: को ही कटौती पर निर्गमित किया जा सकता है जिन्हें की कम्पनी अधिनियम 2013 का घार अनुसार कम्पनी अपने कर्मचारियों अथवा संचालकों को उनकी सेवाओं के बदले निर्गमित करती हैं। 8. अंशों का अपहरण (जब्त करना) (Forfeiture of Shares) यदि कोई अंशधारी आंबटन (Allotment) या किसी याचना की राशि का भुगतान नहीं करता है तो कम्पनी को ऐसे अशधारी के अंशों का अधिकार होता है। अंशों को जब्त करने से पूर्व कम्पनी उस अंशधारी को एक नोटिस भेजती है कि वह अपने अंशो पर बकाया राशि एक निश्चित समय के अन्दर ब्याज सहित भगतान कर दे। इस सूचना में यह भी स्पष्ट लिखा होना चाहिए कि निर्धारित तिथि तक भुगतान न करने पर उसके अंशो का हिरण कर लिया जाएगा। भुगतान करने के लिए सूचना में जो तिथि निर्धारित की जाए वह अंशधारी को सचना मिलने के कम से कम 14 दिन बाद की होनी चाहिए। यदि नोटिस में निर्धारित तिथि भी भगतान प्राप्त नहीं होता है तो उसके अंशों का हरण कर लिया जाता है।  अंशों का हरण करते समय कम्पनी को अपने अन्तर्नियमों में वर्णित नियमों का ठीक-ठीक पालन चाहिए। यदि अन्तर्नियमों में हरण के सम्बन्ध में नियम नहीं दिए हुए हैं तो कम्पनी अधिनियम की Schedule I की Table F में दिए हुए नियमों का पालन किया जाना चाहिए। अंशों का हरण होने पर अंशधारी द्वारा उन अंशों पर अब तक चुकाई गई राशि कम्पनी जब्त कर होती है और इसे अंश अपहरित खाते (Share Forfeiture A/c) में क्रेडिट कर देती है।
  1. हरण किए गए अंशों को पुनः निर्गमित करना (Re-issue of Forfeited Shares) हरण किए हए अंशों को संचालक पुनः निर्गमित कर सकते हैं। इन अंशों का पुन: निर्गमन सम-मूल्य पर. पीमियम पर या कटौती पर कर सकते हैं। परन्तु पुनः निर्गमन पर कटौती की राशि उस राशि से अधिक नहीं होनी चाहिए जो पहले अंशधारी से प्राप्त हुई है। उदाहरण के लिए यदि अपहरण किए हुए अंशों पर 3रू. प्रति अंश प्राप्त हुए हैं तो पुन: निर्गमन के समय अधिक से अधिक 3रू. कटौती दी जा सकती है। अर्थात् इन अंशों के पुनः निर्गमन पर कम से कम 7रू. अवश्य लेने होंगे।
अंशों को पुनः निर्गमन करने के बाद ‘अंश अपहरण खाते’ में जो शेष बचता है वह कम्पनी के लिए पूँजीगत लाभ होता है अत: उसे ‘पूँजी संचय खाते’ में हस्तांतरित कर दिया जाता है।
  1. पूर्वाधिकार अंशों का शोधन (Redemption of Preference Shares)—पूर्वाधिकार अंशों के शोधन का अर्थ है इन्हें पूजी वापस लौटाना। कोई भी कम्पनी अशोध्य (Irredeemable) पूर्वाधिकार अंशों का निर्गमन नहीं कर सकती। इसके अतिरिक्त कोई भी कम्पनी ऐसे पूर्वाधिकार अंशों का निर्गमन भी नहीं कर सकती जिनका शोधन 20 वर्षों के बाद करना हो। परन्तु कम्पनी अधिनियम 2013 के अनुसार, इन्फ्रास्ट्रक्चर कम्पनियाँ 20 वर्ष से अधिक अवधि के परन्तु 30 वर्ष से कम के पूर्वाधिकार अंश निर्गमित कर सकती हैं और ऐसी दशा में कम्पनी को अधिक से अधिक 21वें वर्ष से आरम्भ करके कम से कम 10% पूर्वाधिकार अंशों का प्रतिवर्ष शोधन करना होगा। कम्पनी अधिनियम 2013 की धारा 55 के अन्तर्गत कुछ शर्ते हैं जिनका पालन करने के पश्चात् एक कम्पनी अपने शोध्य पूर्वाधिकार अंशों (Redeemable Preference Shares) का रूपया वापस कर सकती है।
  2. अंश पूँजी में कमी करना (Reduction in Share Capital)-अंश पूँजी में कमी कम्पनी अधिनियम 2013 की धारा 66 के अन्तर्गत वर्णित नियमों के अनुसार ही की जा सकती है जो कि निम्नलिखित हैं :
(अ) अंश पूँजी में कमी कम्पनी के अन्तर्नियमों से अधिकृत होनी चाहिये। (ब) इस आशय के लिये कम्पनी को एक विशेष प्रस्ताव पारित करना होगा। (स) विशेष प्रस्ताव का राष्ट्रीय कम्पनी विधि अधिकरण (National Company Law Tribunal) (NCLT) से पुष्टिकरण कराना अनिवार्य है। (द) इस आशय के लिये कम्पनी के प्रस्ताव और अधिकरण के पुष्टिकरण आदेश की प्रतिलिपियाँ रजिस्ट्रार के पास भेजनी होंगी।
  1. प्रबन्धकीय पारिश्रमिक की अधिकतम सीमा-कम्पनी अधिनियम, 2013 की धारा 197 के अनुसार कोई भी सार्वजनिक कम्पनी अपने सभी संचालकों जिनमें प्रबन्ध संचालक, पूर्णकालिक संचालक तथा प्रबन्धक भी सम्मिलित हैं, को किसी वित्तीय वर्ष के सम्बन्ध में उस वित्तीय वर्ष में हुए शुद्ध लाभों +11 प्रतिशत से अधिक का भगतान नहीं कर सकती है।
यह उल्लेखनीय है कि शद्ध लाभ की गणना धारा 198 के प्रावधानों के अनुसार की जायेगी किन्तु ना के लिए संचालकों के पारिश्रमिक को सकल लाभों में से नहीं घटाया जायेगा। यह भी उल्लेखनीय है कि संचालकों को उनकी पेशेवर सेवाओं के अतिरिक्त सभी सेवाओं के लिए देय पारश्रमिक को कुल अधिकतम पारिश्रमिक की राशि में जोड़ा जायेगा।  13. व्यक्तिगत एवं कल पारिश्रमिक की अधिकतम सीमा – किसी भी एक प्रबन्ध संचालक अथवा पूर्णकालिक संचालक अथवा प्रबन्धक को देय पारिश्रमिक कम्पनी के शुद्ध लाभों के अधिक नहीं हो सकेगा। यदि कम्पनी में ऐसे एक से अधिक संचालक, प्रबन्ध संचालक अनि सभी संचालकों को देय कुल पारिश्रमिक शुद्ध लाभों के 10 प्रतिशत से अधिक नहीं हो सकता है।
  1. गैर-कार्यकारी संचालकों का पारिश्रमिक – गैर-कार्यकारी या अंशकालीन (Nons, part-time) संचालकों (जो न तो प्रबन्ध संचालक या प्रबन्धक है तथा न पूर्णकालिक संचालक ही को देय पारिश्रमिक निम्नांकित सीमाओं में होगा :
(i) कम्पनी के शुद्ध लाभ के एक प्रतिशत से अधिक नहीं, यदि कम्पनी में कोई प्रबन्ध संचालक या प्रबन्धक या पूर्णकालिक संचालक है।  (ii) अन्य किसी भी दशा में, कम्पनी के शुद्ध लाभों के 3 प्रतिशत से अधिक नहीं। उपर्युक्त वर्णित प्रतिशत में संचालकों को देय सभा शुल्क सम्मिलित नहीं हैं। नोट – कम्पनी अपनी सामान्य सभा में विशेष प्रस्ताव पास करके एवं केन्द्रीय सरकार की स्वीकति लेकर पारिश्रमिक की उपर्युक्त दरों में वृद्धि कर सकती है तथा यह वृद्धि 5 वर्ष के लिए वैध रहेगी। 15. कम्पनी की लेखा पुस्तकों को सुरक्षित रखना – कम्पनी अधिनियम, 2013 के अन्तर्गत कम्पनी के लेखों से सम्बन्धित प्रावधान धारा 128 से 134 के अन्तर्गत दिये गये हैं। प्रत्येक कम्पनी को अपनी लेखा पुस्तकें एवं सम्बद्ध पुस्तकें अपने पंजीकृत कार्यालय पर रखनी होती हैं। ये लेखा पुस्तकें दोहरी लेखा पद्धति के अनुसार रखना अनिवार्य है। संचालक मण्डल लेखा पुस्तकों को पंजीकृत कार्यालय के अतिरिक्त अन्य किसी स्थान पर रखने का निर्णय भी ले सकते हैं तथा ये इलेक्ट्रॉनिक रूप में रखे जा सकते हैं। लेखा पुस्तकों का निरीक्षण व्यावसायिक घंटों के दौरान कोई भी संचालक कर सकता है। कम्पनी की लेखा पुस्तकें 8 वर्ष तक (यदि वह कम्पनी आठ वर्ष पुरानी नहीं है तो जितने वर्षों से वह कम्पनी कार्यरत है उस अवधि के लिए) सुरक्षित रखना आवश्यक है, किन्तु केन्द्र सरकार इससे अधिक अवधि हेतु भी संरक्षित करने का निर्देश दे सकती है।

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