Consumer Behaviour B.Com 3rd Year Notes Study Material – Parultech

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उपभोक्ता व्यवहार का अर्थ एवं परिभाषाएँ

(Meaning and Definitions of Consumer Behaviour) 

क्रेता/उपभोक्ता अपनी आवश्यकताओं की सन्तुष्टि के लिए क्या, कब, कितनी, कैसी, कहाँ तथा किससे वस्तुएँ एवं सेवाएँ खरीदते हैं और ऐसी खरीद जिस व्यवहार का परिणाम होती है, उसे क्रेता व्यवहार/उपभोक्ता व्यवहार कहा जाता है। वाल्टर एवं पाल के अनुसार, “उपभोक्ता व्यवहार एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें व्यक्ति यह निर्णय लेता है कि वस्तुओं और सेवाओं को खरीदना है तो क्या, कब, कहां और किससे खरीदना है।” प्रो० गोथे के अनुसार, “क्रय करते समय किसी व्यक्ति के सम्पूर्ण व्यवहार को क्रय व्यवहार कहा जा सकता है।”

उपभोक्ता व्यवहार का क्षेत्र

(Scope of Consumer Behaviour) 

जैसा कि स्पष्ट ही है कि उपभोक्ता व्यवहार से आशय उपभोक्ताओं के क्रय निर्णय सम्बन्धी व्यवहार के अध्ययन से है। उपभोक्ता व्यवहार का अध्ययन एवं विश्लेषण करके सामान्यत: निम्नांकित समस्याओं/प्रश्नों का उत्तर प्राप्त किया जा सकता है
  1. वह किन (Which) उत्पादों/सेवाओं का क्रय करना चाहता है? 
  2. वह उन उत्पादों/सेवाओं को क्यों (Why) क्रय करना चाहता है ? 
  3. वह उनका क्रय किस प्रकार (How) करना चाहता है ? 
  4. वह उनका क्रय कहाँ से (Where) करना चाहता है ? 
  5. वह उनका क्रय कब (When) करना चाहता है अर्थात् उत्पाद (वस्तु) की खरीद का वास्तविक समय क्या है? 
  6. वह उनका क्रय किन से (From whom) करना चाहता है ? 

उपभोक्ता व्यवहार को प्रभावित करने वाले तत्त्व अथवा घटक

(Factors Affecting Consumer Behaviour) 

उपभोक्ता के क्रय सम्बन्धी व्यवहार को अनेक घटक प्रभावित करते हैं। उपभोक्ता के व्यवहार में सदैव परिवर्तन होते रहते हैं। उपभोक्ता व्यवहार में परिवर्तन के कारण इसे प्रभावित करने वाले घटकों में परिवर्तन होता रहता है। उपभोक्ता व्यवहार को मुख्य रूप से दो भागों में विभाजित किया जा सकता I मनोवैज्ञानिक घटक (Psychological Factors),
  1. आर्थिक घटक (Economic Factors) 
I मनोवैज्ञानिक घटक (Psychological factors) इसमें निम्नलिखित तत्वों को सम्मिलित किया जाता है
  1. आधारभूत आवश्यकतायें (Basic Needs)-क्रेता की कुछ आधारभूत आवश्यकतायें होती हैं जिनकी पूर्ति वह सर्वप्रथम करना चाहता है। प्रसिद्ध अर्थशास्त्री ए० एच० मैस्लो (A. H. Maslow) ने आवश्यकताओं में निम्नलिखित प्राथमिकतायें निश्चित की हैं
(i) शारीरिक आवश्यकताएँ (Physiological Needs)-मैस्लो के अनुसार व्यक्ति सबसे पहले अपनी देहिक आवश्यकताओं को पूरा करता है जो मानव जीवन को बनाये रखने के लिये जरूरी है, जैसे-भोजन, वस्त्र, मकान आदि। (ii) सुरक्षा आवश्यकताएँ (Safety Needs)-इसमें शारीरिक, आर्थिक एवं मनोवैज्ञानिक सुरक्षाओं को सम्मिलित किया जाता है। प्रत्येक व्यक्ति सुरक्षा, स्थायित्व एवं निश्चितता चाहता है। (iii) सामाजिक आवश्यकताएँ (Social Needs)-प्रत्येक व्यक्ति समाज में सम्मान चाहता है। वह समाज के सदस्यों से प्रेम, स्नेह और मित्रतापूर्ण व्यवहार चाहता है। (iv) सम्मान और स्वाभिमान (Esteem and Self Respect)-इन आवश्यकताओं में मान्यता प्राप्त करने की इच्छा, प्रतिष्ठा पाने की इच्छा, ख्याति प्राप्त करने की इच्छा, प्रमुख बनने की इच्छा आदि को सम्मिलित किया जाता है। (v) स्वः यथार्थवादिता (Self-actualisation) प्रत्येक व्यक्ति में अपने को पूर्ण रूपक विकसित करने तथा अपनी योग्यता एवं कार्यक्षमता द्वारा महानतम उपलब्धियां प्राप्त करने की इच्छा स विद्यमान होती है। उपर्युक्त सभी आवश्यकताएँ उपभोक्ता के व्यवहार को प्रभावित करती हैं। ऐसी वस्तुओं औ अ सेवाओं का विपणन आसान होता है जो उपर्यक्त आवश्यकताओं की सन्तुष्टि में सहायक होती हैं।
  1. छवि (Image)-किसी वस्तु या विषय के सम्बन्ध में ज्ञान या अज्ञानतावश किसी वस्त मास्तष्क में जो छाप होती है उसे छवि कहा जाता है। उपभोक्ता व्यवहार पर इसका भी बहत प्रभात पड़ता है। छवि कई प्रकार की हो सकती है, जैसे-आत्म छवि, वस्तु छवि, ब्राण्ड छवि इत्यादि।
(i) आत्म छवि (Self Image)—प्रत्येक व्यक्ति की आत्म छवि भिन्न होती है। आत्मछवि आशय उस तस्वीर से है जो कि एक व्यक्ति अपने सम्बन्ध में रखता है। (ii) वस्तु छवि (Product Image)-वस्तु के सम्बन्ध में क्रेताओं की धारणा वस्तु छवि कहलाती है। (iii) ब्राण्ड छवि (Brand Image)-ब्राण्ड छवि का निर्माण वस्तु के प्रयोग से, निर्माता की ख्याति से तथा विज्ञापन से होता है। ब्राण्ड छवि ही व्यक्ति को विशिष्ट ब्राण्ड की वस्तु क्रय करने या न करने के लिये प्रेरित करती है। _
  1. ज्ञान सिद्धान्त (Learning Theory)-ज्ञान सिद्धान्त के अनुसार उपभोक्ता व्यवहार को निम्न तत्व प्रभावित करते हैं
(i) अभिप्रेरणा (Motivation)-क्रय प्रेरणाओं से उपभोक्ता व्यवहार बहुत अधिक प्रभावित होता , है। इन प्रेरणाओं के अन्तर्गत भावात्मक, विवेकपूर्ण, स्वाभाविक एवं सीखे हुए प्रयोजन आदि शामिल होते हैं। (ii) पुनरावृत्ति (Repetition)-किसी वस्तु को उपभोक्ता के निरन्तर सम्पर्क में लाने से उसके वस्तु ज्ञान में वृद्धि हो जाती है, उदाहरण के लियेकिसी वस्तु के निरन्तर विज्ञापन से उपभोक्ता को उस वस्तु के बारे में अधिक ज्ञान प्राप्त हो जाता है और वह वस्तु का क्रय करने के लिये प्रोत्साहित होता है। __ (iii) वस्तु स्थिति (Conditioning)—वस्तु स्थिति के ज्ञान से भी उपभोक्ता व्यवहार बहुत अधिक प्रभावित होते हैं, जैसे-यदि किसी वस्तु की पैकिंग को सुन्दर और आकर्षक बना दिया जाये तो बहुत से क्रेता उसके पैकिंग से प्रभावित होकर वस्तु का क्रय कर लेते हैं। (iv) समूह प्रभाव (Group Influence)-समूह प्रभाव भी उपभोक्ता व्यवहार पर प्रभाव डालता है। यदि समाज में कोई धनी या प्रतिष्ठित व्यक्ति किसी वस्तु का उपभोग आरम्भ कर देता है तो समाज के अन्य व्यक्ति भी उसका अनुसरण करने लगते हैं।
  1. आधारभूत आवश्यकतायें एवं उपभोक्ता व्यवहार (Basic Needs and Consumer Behaviour) उपभोक्ता व्यवहार आधारभूत आवश्यकताओं से भी प्रेरित होता है सबसे पहले वह ऐसा आवश्यकताओं को पूरा करता है। 
  2. आर्थिक तत्त्व (Economic Factors)
उपभोक्ता व्यवहार को प्रभावित करने वाले प्रमुख आर्थिक घटक निम्न प्रकार हैं
  1. व्यक्तिगत आय (Personal Income)-उपभोक्ता की निजी आय उनकी क्रय शक्ति को बहत प्रभावित करता है। उपभाक्ता का निजी आय में वृद्धि प्राय: उपभोग में वद्धि करती है और निजी स आय में कमी उपभोग में कमी करती है।
  2. पारिवारिक आय (Family Income) ग्राहकों को पारिवारिक आय भी उनकी क्रय शक्ति का प्रभावित करता है। यदि परिवार का आय कम होती है तो उनका क्रय व्यवहार व्यक्तियों के क्रय व्यवहार से भिन्न हाता है जिनका आय निर्धारित पक्ति से ऊपर है। कम आय वाले व्यक्ति निम्न अ किस्म की वस्तुओं का क्रय करते हैं, जबकि अधिक आय वाले व्यक्ति उच्च किस्म की वस्तओं और अ सेवाओं को क्रय करते हैं।
  3. 3. भावी आय की आशायें (Expectation of Income)-यदि किसी व्यक्ति को निकट भविष्य पर में कुछ आय प्राप्त होने की आशा हो तो उसके द्वारा प्राय: अधिक मात्रा में क्रय किया जाता है। इसके च विपरीत, भविष्य में आय प्राप्ति की आशा न होने पर कम क्रय किया जाता है।
  1. उपभोक्ता की साख (Consumer’s Credit)-यदि उपभोक्ता को वस्तएँ एवं सेवाएँ उधार मिल जाती हैं तो वह अधिक मात्रा में क्रय करने के लिये प्रेरित होते हैं। विपणन के क्षेत्र में उपभोक्ता की साख का बहुत अधिक महत्व है, जिसकी सहायता से बाजार को विस्तृत या संकुचित किया जा सकता है।
  2. स्वाधीन आय (Discretionary Income)-स्वाधीन आय से आशय है, जो आवश्यक आवश्यकताओं की पूर्ति के बाद बच जाती है। इस प्रकार की आय को उपभोक्ता अपनी स्व-इच्छा से र खर्च करता है। स्वाधीन आय उपभोक्ता को विशिष्ट वस्तुओं या सेवाओं को क्रय करने के लिये प्रेरित करती है. जैसे-फर्नीचर, स्कूटर, पंखें एवं अन्य विलासिता की वस्तुएँ। 
  3. सरकारी नीति (Government Policy)-सरकार द्वारा लगाये जाने वाले अधिक कर क्रय व शक्ति को कम कर देते हैं। इसी प्रकार मुद्रा प्रसार की अवस्था में बढ़ती हुई कीमतें भी क्रय-शक्ति को कम कर देती हैं। अत: उपभोक्ता को सरकारी नीतियों के अनुसार क्रय व्यवहार में परिवर्तन करना से पड़ता है।

क्रय प्रेरणा का अर्थ एवं परिभाषा

(Meaning and Definition of Buying Motive) 

क्रय प्रेरणा वह शक्ति है जो क्रेता को अपनी आवश्यकताओं की सन्तुष्टि हेतु किसी वस्तु अथवा 7 सेवा को खरीदने की प्रेरणा देती है। उदाहरण के लिए यदि किसी व्यक्ति को भूख लगी है एवं भूख _ को मिटाने के लिए उसके द्वारा कुछ वस्तुओं को क्रय किया जाता है। अत: उसके द्वारा खरीदी गई वस्तओं की क्रय-प्रेरणा, भूख मिटाना है। विलियम जे० स्टेन्टन के अनुसार, “एक प्रेरणा उस समय क्रय प्रेरणा बन जाती है जबकि एक व्यक्ति किसी वस्तु के द्वारा सन्तुष्टि प्राप्त करना चाहता है।” डी० जे० ड्यूरियन के अनुसार, “क्रय प्रेरणाएँ वे प्रभाव या विचार हैं जो क्रय करने, कार्य करने अथवा वस्तुओं या सेवाओं के क्रय में पसन्दगी को निर्धारित करने हेतु प्रेरणा प्रदान करते हैं।

क्रय प्रेरणाओं का वर्गीकरण

(Classification of Buying Motives) 

प्रत्येक सामान्य व्यक्ति, स्व-हित में रूचि रखने वाला होता है और स्वयं की इच्छाओं, भावनाओं, लालसाओं, साधनों और बुद्धि के अनुरूप व्यवहार करता है। यही कारण है कि विपणन क्षेत्र में, विभिन्न प्रकार की क्रय-प्रेरणाएँ और क्रय व्यवहार दिखाई देते हैं। अध्ययन की सुविधा की दृष्टि से क्रय प्रेरणाओं को निम्नलिखित भागों में बाँटा जा सकता हैं।
  1. स्वाभाविक या अन्तर्निहित बनाम सीखी हुई क्रय प्रेरणायें

(Inherent Vs. Learned Buying Motives)

स्वाभाविक क्रय प्रेरणाओं से आशय उपभोक्ता के ऐसे व्यवहार से है जो कि उसकी अन्तर्निहित आवश्यकताओं से प्रेरित होता है। मनुष्य की स्वाभाविक प्रेरणायें भूख, प्यास, सैक्स, विश्राम तथा अपनी सी सुरक्षा सम्बन्धी आवश्यकताओं के रूप में प्रकट होती हैं। इसके विपरीत सीखी हुई प्रेरणाओं या वातावरण सम्बन्धी प्रयोजन से आशय ऐसी प्रेरणाओं से है जिनको मनुष्य अपने अनुभव और सामाजिक वातावरण में सीखता है, जैसे-नवजात शिशु भूख लगने पर रोने लगता है। यह इसकी सीखी हुई क्रिया का रूप है क्योंकि शिशु यह सीख जाता है कि रोना उसका भोजन प्राप्ति का साधन है। इसी प्रकार समाज में प्रतिष्ठा प्राप्त करना सीखा हुआ प्रयोजन है। स्पष्ट है कि स्वाभाविक या अन्तर्निहित को क्रय-प्रेरणायें सहज एवं मूल मानवीय प्रवृत्तियों (Basic Human Needs) से सम्बन्ध रखती हैं, जबकि नजी सीखी हई क्रय-प्रेरणाओं को मनुष्य अपने अनुभव एवं सामाजिक वातावरण में सीखता है। अन्तर्निहित क्रय-प्रेरणायें प्राथमिक प्रेरणायें है और अत्याधिक स्पष्ट हैं, सुनिश्चित हैं, जबकि सीखी हुई (अर्जित) क्ति क्रय-प्रेरणायें गौण-प्रेरणायें हैं और अपेक्षाकृत कम स्पष्ट हैं। वास्तव में, क्रेता सम्बन्धी व्यवहार मूल प्रवृत्ति पर आधारित न होकर सीखने (Learning) पर नम्न अधिक निर्भर करते हैं। मानव किस प्रकार अपनी भूख की सन्तुष्टि करता है यह उसके सामाजिक स्तर और सीखने आदि से अधिक प्रभावित होता है, जैसे कुछ व्यक्ति भूख की सन्तुष्टि करने के लिये रोटी खाते हैं तो कुछ फलों का उपयोग करते हैं। स्पष्ट है कि विपणनकर्ता को स्वाभाविक प्रेरणाओं के स्थान चष्य पर सीखी हुई प्रेरणाओं पर अधिक ध्यान देना चाहिए और उन्हीं के अनुरूप विपणन कार्यक्रम बनाना सके चाहिए।
  1. भावात्मक बनाम विवेकपूर्ण क्रय प्रेरणायें

(Emotional Vs. Rational Buying Motives)

भावात्मक क्रय प्रेरणाओं से आशय ऐसी क्रय प्रेरणाओं से है जिनमें मस्तिष्क अथवा विवेक स्थान पर ह्रदय या भावना की प्रधानता रहती है। व्यवहार में अनेक भावात्मक प्रेरणायें क्रेता को वस्त क्रय करने के लिये अभिप्रेरित करती हैं, जैसे-भूख, प्यास, साथी की इच्छा, प्रतिष्ठा, अहंकार गौरव-भाव, ईष्या, प्रेम, सैक्स, सरक्षा, शत्रता, सुन्दरता आदि। विपणनकर्ता भावनात्मक क्रय प्रेरणा का पता लगाकर उनके प्रचार द्वारा उपभोक्ता की भावना को प्रेरित करता है, जैसे-जीवन बीमा निगम द्वारा परिवार की सुरक्षा और अच्छे भविष्य की अपील द्वारा ग्राहकों को आकर्षित किया जाता है। वास्तव में भावात्मक क्रय प्रेरणाओं से प्रेरित होकर व्यक्ति तुरन्त वस्तु को खरीद लेता है वह उसके गुण-दोषों पर विचार नहीं करता है। विवेकपूर्ण क्रय प्रेरणाओं के अन्तर्गत क्रय की जाने वाली वस्तु की कीमत, मितव्ययिता, प्रयोग टिकाऊपन, उपयोगिता, सेवा, विश्वसनीयता, सुविधा, कार्यकुशलता आदि अनेक तत्वों पर विचार करके वस्तु को क्रय करने के निर्णय लिये जाते हैं। विवेकपूर्ण प्रेरणाओं से प्रेरित क्रेता वस्तु के क्रय करने में अधिक समय लगाता है। वस्तु के गुण-दोष पर पर्याप्त विचार करता है। विपणनकर्ता विवेकपर्ण प्रेरणाओं का पता लगाकर अपने विज्ञापन में इन प्रेरक तत्वों का प्रचार करते हैं, जैसे-कुकर के निर्माता अपने विज्ञापन में समय तथा ईंधन की बचत की बात कहते हैं। पंखों के निर्माता अपने विज्ञापन में अपने पंखो की हवा और टिकाऊपन पर अधिक महत्व देते हैं। अधिकांश क्रय, विवेकशील एवं भावनात्मक प्रेरणाओं से प्रेरित होते हैं और इनमें भी भावात्मक प्रेरणायें अग्रणी होती है। एक ही वस्तु के क्रय के भिन्न-भिन्न क्रेताओं के प्रयोजनों में भी भिन्नता हो सकती है। यही नहीं, दो व्यक्ति समान प्रयोजन रखते हुए भी भिन्न आचरण रखते हैं। अत: विपणनकर्ता को अपनी नीतियों के सही नियोजन के लिये क्रेताओं की भावनात्मक प्रेरणाओं को जानने का प्रयास करना चाहिये। 

III. प्राथमिक एवं चयनात्मक क्रय-प्रेरणायें

(Primary and Selective Buying Motives)

वे प्रेरणाएँ जो वस्तुओं के सामान्य क्रय हेतु प्रेरणा देती हैं, प्राथमिक क्रय-प्रेरणायें कहलाती हैं। उदाहरण के लिए टेलीविजन, कार, मोटर साइकिल अथवा स्कूटर आदि के क्रय को प्रोत्साहित करने वाली प्रेरणायें प्राथमिक क्रय-प्रेरणायें कहलायेंगी। ये प्रेरणायें वस्तुओं की सामान्य माँग को बढ़ाने वाली मानी गईं हैं और किसी ब्राण्ड विशेष की खरीद हेतु प्रेरणा नहीं देती हैं. लेकिन जब कोई क्रय-प्रेरणा किसी विशेष ब्राण्ड की वस्तु क्रय करने के लिए प्रेरणा देती है तो यह प्रेरणा चयनात्मक प्रेरणा कहलाती है। उदाहरण के लिए, बजाज स्कूटर या फिलिप्स टेलीविजन क्रय करने को प्रेरणा। कुछ विद्वानों का कहना है कि केवल ब्राण्ड का चयन ही इसमें शामिल नहीं होता है बल्कि दुकानदार की चयन भी इसमें शामिल होता है। 
  1. जागरूक एवं सुप्त क्रय-प्रेरणायें

(Conscious and Dormant Buying Motives)

‘जागरूक क्रय-प्रेरणायें’ वे प्रेरणायें हैं जिन्हें क्रेता विपणन क्रियाओं की सहायता के बिना स्पष्टतापूर्वक पहचान लेते हैं और अभिव्यक्ति करते हैं। अन्य शब्दों में सचेतन धरातल पर विद्यमान आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु क्रेताओं की खरीद को प्रोत्साहित करने वाली क्रय-प्रेरणायें जागरूक प्ररणायें कही जाती हैं। ये प्रेरणायें स्वत: ही क्रेताओं के मस्तिष्क में उत्पन्न होती रहती है। बार वातावरण की आवश्यकता इन प्रेरणाओं की उत्पत्ति के लिये अपेक्षाकत कम होती है। किन्तु बार वातावरण एवं विपणन कार्यक्रम इन क्रय-प्रेरणाओं में तीव्रता पैदा कर सकते हैं। ‘सप्त क्रय-प्रेरणायें‘ व प्रेरणायें हैं जिन्हें क्रेता उस समय तक नहीं पहचान पाते हैं जब तक विपणन क्रियाओं द्वारा उनका ध्यान क्रय-प्रेरणाओं की ओर आकष्ट न किया जाये। ये प्रेरणाय आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु क्रताओं का ध्यान आकृष्ट करती हैं जिनके बारे में क्रेताओं को स्वय ध्यान नहीं होता है और जो अचेतन धरातल पर विद्यमान होती हैं।
  1. भौतिक, मनोवैज्ञानिक एवं सामाजिक क्रय-प्रेरणायें 

(Physical, Psychological and Sociological Buying Motives)

भौतिक क्रय-प्रेरणायें वे हैं जो मनुष्य में विद्यमान होती हैं, जैसे-भूख, प्यास, नींद, आराम आदि। मनोवैज्ञानिक क्रय-प्रेरणायें वे हैं जो मानव के मनोविज्ञान पर आधारित हैं, जैसे-गर्व व भय आदि। सामाजिक क्रय-प्रेरणायें वर्तमान एवं अपेक्षित सामाजिक स्थिति से सम्बद्ध प्रेरणाओं का समूह होती हैं। 
  1. उत्पाद एवं संरक्षण क्रय-प्रेरणायें

(Product and Patronage Buying Motives)

संरक्षण क्रय-प्रेरणायें, वे प्रेरणायें हैं जो क्रेताओं को किसी विशिष्ट विक्रेता से ही वस्तुयें क्रय करने को प्रोत्साहित करती हैं। विक्रेताओं में निर्माता, थोक व्यापारी और फुटकर व्यापारी सभी सम्मिलित होते हैं। कोपलैण्ड के विचारानुसार विक्रेता की विश्वसनीयता, सुपुर्दगी में समय की पाबन्दी, सुपुर्दगी में शीघ्रता, वस्तुओं से पूर्ण सन्तुष्टि, विभिन्न किस्में और विश्वसनीय मरम्मत सेवाओं की इन्जीनियरिंग एवं डिजायनिंग वे घटक हैं जो संरक्षण क्रय-प्रेरणाओं के आधार हैं।

उपभोक्ता व्यवहार मॉडल 

सामाजिक एवं मनोवौनिक विचारकों ने उपभोक्ता व्यवहार को प्रभावित करने वाले घटकों एवं अभिप्रेरणाओं के आधार पर विभिन्न मॉउल विकसित किये हैं। कुछ प्रमुख मॉडल निम्न प्रकार हैं
  1. आर्थिक मॉडल-इसका प्रतिपादन अल्फ्रेड मार्शल ने किया था। इसके अनुसार मनुष्य उचित मूल्यों पर ऐसी वस्तु चाहता है जो गुणों और उपयोगिता से परिपूर्ण है एवं अधिकतम सन्तुष्टि प्रदान करें।
  2. सीखने वाला मॉडल-इसका प्रतिपादन रूसी मनोवैज्ञानिक पावलोवियन ने किया था। इसके अनुसार मनुष्य का अधिकांश व्यवहार सीखने से प्रभावित होता है।
  3. मनोविश्लेषणात्मक मॉडल-इसका प्रतिपादन सिगमण्ड फ्रायड ने किया था। इसके अनुसार प्रत्येक उपभोक्ता में कुछ छिपी हुई प्रेरणाएँ होती हैं जो उसे क्रय निर्णय के लिये प्रेरित करती हैं। __
  4. सामाजिक-सांस्कृतिक मॉडल-इसका प्रतिपादन बेबलेन ने किया था। इसके अनुसार मनुष्य का क्रय व्यवहार समाज से प्रभावित होता है।
  5. संगठनात्मक मॉडल-इसका प्रतिपादन थॉमस हाब्स ने किया था। यह मॉडल संस्थागत एवं विभागीय क्रेताओं के व्यवहार को स्पष्ट करता है।
6.निकोसिया मॉडल-इसका प्रतिपादन श्री फ्रांसिस्को निकोसिया ने सन् 1966 में किया था। 
  1. हावर्ड सेठ मॉडल-इसे जॉन हावर्ड तथा जगदीश सेठ ने सन् 1969 में प्रस्तुत किया।

भारतीय उपभोक्ताओं का क्रय व्यवहार

(Buying Behaviour of Indian Consumers)

भारतीय उपभोक्ताओं का व्यवहार एक-सा नहीं है। इसका कारण यह है कि ये विभिन्न जाति, धर्म, भाषा एवं सामाजिक स्तर से बंधे हुए हैं। लेकिन फिर भी उनके क्रय व्यवहारों में अग्रलिखित बातें प्रमुख हैं__
  1. सौदेबाजी-अधिकांश भारतीय उपभोक्ताओं के क्रय व्यवहार में सौदेबाजी की प्रवृति पायी जाती है। _
  2. किस्म बनाम कीमत-भारतीय उपभोक्ता कीमत के प्रति अधिक जागरूक है, किस्म को अधिक महत्व नहीं देता।
  3. ब्रॉण्ड या ट्रेडमार्क चेतना-भारतीय उपभोक्ता अब ब्रॉण्ड या ट्रेडमार्क वाली वस्तु के प्रति अधिक जागरूक रहते हैं।
  4. स्त्रियों की भूमिका-भारतीय स्त्रियों की क्रय सम्बन्धी निर्णयों में भागीदारी बढ़ रही है।
  5. 5. शिकायत की प्रवृति-भारतीय उपभोक्ता में शिकायत करने की प्रवृति है।

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