B.Com 2nd Year Cost Accounting Introduction Long Notes

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खण्ड ‘ब’: 

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1 – ‘लागत की अच्छी पद्धति व्यय पर नियन्त्रण के साधन के रूप में सेवा क प्रदान करती है तथा निर्माण में मितव्ययिता प्राप्त करने में सहायक होती है।” लागत ल लेखांकन के उद्देश्यों को स्पष्ट करने के लिए इस कथन को समझाइए।

“A good system of costing serves as a means of control over expenditure and helps to secure economy in manufacture.” Discuss the statement to show the objects of cost accounting. 

अथवा लागत लेखांकन का क्या अर्थ है? इसके उद्देश्य एवं लाभों की विवेचना कीजिए।

What is cost accounting ? Explain its objectives and advantages. 

उत्तर- लागत लेखांकन का अर्थ एवं परिभाषाएँ

(Meaning and Definitions of Cost Accounting) 

आधुनिक व्यावसायिक प्रतिस्पर्धा के युग में उत्पादन करना और उसका वितरण करना एक जटिल समस्या है। इस समस्या का समाधान करने के लिए प्रत्येक उत्पादक अपने उत्पाद (वस्तु) की श्रेष्ठ किस्म का उत्पादन, न्यूनतम लागत पर करना चाहता है, जिससे वह अपने र उत्पाद का कम विक्रय मूल्य निर्धारित करके, बाजार में अपने उत्पाद की अधिक-से-अधिक बिक्री करके अधिकतम लाभ प्राप्त कर सके। व्यावसायिक प्रतिस्पर्धा के कारण ही लागत लेखा पद्धति का जन्म हुआ।

लागत लेखांकन के अन्तर्गत उत्पादन से लेकर बिक्री एवं वितरण के सभी व्ययों का आलेखन (Recording), वर्गीकरण (Classification) एवं अनुभाजन (Allocation) किया जाता है, जिससे कि उत्पादित वस्तुओं अथवा प्रदान की जाने वाली सेवाओं की प्रति इकाई लागत और उत्पादन की कुल लागत ज्ञात हो सके और इसके आधार पर प्रति इकाई का

सही-सही विक्रय मूल्य निर्धारित किया जा सके। यह लागत लेखों द्वारा आसानी से ज्ञात हो सकता है कि कौन-सी वस्तु का उत्पादन अधिक लाभदायक है और कौन-सी वस्तु का उत्पादन कम लाभदायक या हानिप्रद है। लागत लेखों द्वारा सामग्री, श्रम, अन्य प्रत्यक्ष व्ययों, कारखाना उपरिव्ययों, कार्यालय एवं प्रशासनात्मक उपरिव्ययों और बिक्री एवं वितरण उपरिव्ययों को नियमित एवं नियन्त्रित किया जाता है। इससे उत्पादन, कार्यालय एवं प्रशासनात्मक और बिक्री व वितरण लागतें कम होती हैं।

लागत लेखांकन की प्रमुख परिभाषाएँ निम्नलिखित हैं-

(1) ‘आई०सी०डब्ल्यू ०ए०, लन्दन‘ (IL.C.W.A., London) की एक रिपोर्ट के अनुसार, “लागत ज्ञात करने की प्रविधि एवं प्रक्रिया को ही लागत लेखांकन कहते हैं।”

(2) जॉन डब्ल्यू० कार्टर (John W. Carter) के शब्दों में, “लागत लेखे लेखांकन की एक ऐसी विधि है, जिसके अन्तर्गत किसी विशिष्ट वस्तु को बनाने या किसी विशिष्ट कार्य को करने में प्रयुक्त सामग्री एवं श्रम का हिसाब रखा जाता है।”

(3) वाल्टर डब्ल्यू० बिग (Walter W. Bigg) के अनुसार, “लागत लेखांकन व्ययों या का एक ऐसा विश्लेषण एवं वर्गीकरण है, जिससे उत्पादन की किसी विशेष इकाई की कुल त लागत शुद्धतापूर्वक ज्ञात हो सके और इसके साथ ही यह भी ज्ञात हो सके कि कुल लागत किस प्रकार प्राप्त हुई है।”

उपर्युक्त परिभाषाओं के विश्लेषणात्मक अध्ययन के आधार पर निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है-“लागत लेखे लेखांकन की एक ऐसी व्यवस्था है, जिसके अन्तर्गत लागतों का विश्लेषण किया जाता है और उत्पादन, बिक्री एवं वितरण की विभिन्न अवस्थाओं में लागतें ज्ञात की जाती हैं, जिससे व्ययों पर समुचित नियन्त्रण रखा जा सके और सही विक्रय मूल्य निर्धारित किया जा सके, अत: लागत लेखों का उद्देश्य तब तक अपूर्ण रहता है जब तक बे लागतों को नियन्त्रित करने में और विभिन्न कार्यों की लाभदायकता और उपयोगिता जानने में सहायता न दें।”

उपर्युक्त विवेचन के आधार पर कहा जा सकता है-“लागत लेखे निर्माण करने वाले व्यापारों में प्रयोग किए जाते हैं और व्यापारिक लेखों में एकत्रीकृत रूप में लिखे हुए लेखों को = विश्लेषित रूप में प्रकट करते हैं, जिससे निर्मित वस्तुओं की प्रति इकाई लागत मालूम की जा सके। लागत लेखांकन आधुनिक प्रबन्ध का एक अपरिहार्य यन्त्र है।”

लागत लेखांकन के उद्देश्य

(Objectives of Cost Accounting

वित्तीय लेखांकन की अपूर्णता के कारण ही लागत लेखांकन का विकास हुआ है। 1 लागत लेखांकन के उद्देश्यों के सम्बन्ध में एन० सरकार (N. Sarkar) ने लिखा है कि 1 “लागत लेखांकन का मुख्य उद्देश्य एक इकाई की कुल लागत ज्ञात करना है।”1. समय – समय पर वास्तविक स्थिति का ज्ञान प्राप्त करने में सहायक (Helpful T in Getting Knowledge of Actual Position Time to Time)-लागत लेखे प्राय:

साप्ताहिक, मासिक, त्रैमासिक आधार पर तैयार किए जाते हैं, जिसके कारण व्यवसायी के समय-समय पर अपने व्यवसाय की वास्तविक स्थिति का ज्ञान होता रहता है।

2. तुलनात्मक अध्ययन में सहायक (Helpful in Comparative Study)लागत लेखे किन्हीं दो समयावधियों में विभागों, प्रक्रियाओं, उत्पादन विधियों, यन्त्रों तथा मशीने की लागतों की पारस्परिक तुलना के लिए समंक प्रस्तुत करते हैं।

3. नीति-निर्धारण में सहायक (Helpful in Policy Determination)- लागत लेखे भविष्य की योजनाओं के निर्माण तथा नीति-निर्धारण हेतु मार्गदर्शन करते हैं और यह बताते हैं कि कौन-सी योजनाएँ दीर्घकाल में उपयोगी सिद्ध हो सकती हैं।

4. प्रबन्धकीय निर्णयों में सहायक (Helpful in Managerial Decisions)लागत लेखांकन की सहायता से प्रबन्धकों को महत्त्वपूर्ण निर्णय लेने में सुविधा रहती है क्योंकि लागत लेखे प्रबन्धकों को निर्णय लेने के लिए उपयुक्त समंक प्रस्तुत करते हैं जैसे वस्तु के विक्रय मूल्य में वृद्धि की जाए अथवा कमी, पुराने प्लाण्ट के स्थान पर नए प्लाण्ट को प्रतिस्थापित किया जाए अथवा नहीं, किसी आदेश को कम मूल्य पर स्वीकार किया जाए अथवा नहीं आदि।

5. दोषों का निराकरण (Elimination of Defects)-लागत लेखे यह बताते हैं कि उत्पादन में किस प्रकार मितव्ययिताएँ प्राप्त की जा सकती हैं तथा प्रबन्ध के दोषों को कैसे दूर किया जा सकता है।

6. पूर्वानुमान में सहायक (Helpful in Forecasting)-लागत लेखांकन की सहायता से भावी विक्रय लक्ष्यों को निर्धारित किया जा सकता है और उनके अनुसार भावी उत्पादन तालिकाएँ, रोकड़ बजट एवं पूँजी बजट तैयार किए जा सकते हैं।

7. अन्य उद्देश्य (Other Objective)-

(i) प्रति इकाई लाभ ज्ञात करना। 

(ii) लागत नियन्त्रण। 

(iii) विक्रय मूल्य का निर्धारण। 

(iv) अतिरिक्त व्ययों पर नियन्त्रण। 

(v) श्रम-क्षमता का प्रमापीकरण।

उपर्युक्त विवेचन के आधार पर कहा जा सकता है-“लागत की एक अच्छी पद्धति व्यय पर नियन्त्रण के साधन के रूप में सेवा प्रदान करती है तथा निर्माण में मितव्ययिता प्राप्त करने में सहायक होती है।” दूसरे शब्दों में, “लागत लेखांकन दूरदर्शिता की पद्धति है न कि उत्तरवर्ती परीक्षण। यह हानियों को लाभों में परिवर्तित करता है, कार्य-कलापों को गतिशील बनाता है और क्षयों को दूर करता है।”

लागत लेखांकन के लाभ अथवा महत्त्व 

(Advantages or importance of Cost Accounting) 

अध्ययन की सुविधा की दृष्टि से लागत लेखांकन के लाभ अथवा महत्त्व को अग्रालाखा पाँच वर्गों में वर्गीकृत किया जा सकता है-

1. उत्पादक एवं प्रबन्धकों को लाभ (Advantages to Produce Managers)-लागत लेखांकन सभी व्यापारियों एवं उत्पादकों के लिए वरदान सिद्ध हुआ क्योंकि यह लागत नियन्त्रण में महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन करता है। लागत लखाका उत्पादकों और प्रबन्धकों को निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते हैं

(1) लागत लेखांकन की सहायता से प्रबन्धक और उत्पादक: सामग्री, श्रम तथा सयन्त्र का सर्वोत्तम प्रयोग करके उत्पादन की क्षमता में वृद्धि करते हैं, जिससे उन्हें अधिक लाभ प्राप्त होते हैं।

(2) लागत लेखे अपनाने से उत्पादक व्यापार के लाभकारक एवं हानिकारक कार्यों का ज्ञान सरलता से प्राप्त कर लेते हैं।

(3) उत्पादन लागत का विश्लेषण, तुलना, वर्गीकरण करके प्रबन्धक अच्छी किस्म का वस्तुएँ कम मूल्य पर बाजार में उपलब्ध कराकर प्रतिस्पर्धा कर सकते हैं।

(4) प्रति इकाई उत्पादन लागत और उचित बिक्री मूल्य निर्धारित करने के लिए प्रबन्धक लागत लेखों का उपयोग करते हैं।

(5) उत्पादकों व ठेकेदारों द्वारा कार्य प्रारम्भ करने से पूर्व ही लागत लेखों की सहायता से टेण्डर का अनुमानित मूल्य ज्ञात किया जा सकता है।

(6) लागत लेखों से उत्पादक लाभ-हानि के कारणों की जानकारी प्राप्त करते हैं। लागत लेखों से वे किसी भी समय लाभ-हानि विवरण तैयार कर सकते हैं।

(7) उत्पादक मन्दीकाल में लागत लेखों से ‘परिवर्तनशील लागतों’ एवं ‘स्थिर लागतों’ की जानकारी प्राप्त करके महत्त्वपूर्ण निर्णय ले सकते हैं।

(8) उत्पादक प्रमापित लागत एवं बजटरी नियन्त्रण विधियों का प्रयोग करके उत्पादन लागत को नियन्त्रित करते हैं एवं भविष्य के लिए लक्ष्य निर्धारित करते हैं।

(9) लागत लेखे वित्तीय लेखों की कमियों को दूर करके प्रबन्ध के लिए महत्त्वपूर्ण सूचनाएँ एवं आँकड़े प्रस्तुत करते हैं।

2. कर्मचारियों को लाभ (Advantages to Employees)-लागत लेखांकन के द्वारा कर्मचारियों को निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते हैं

(1) श्रमिकों को इच्छा एवं योग्यतानुसार कार्य मिलता है।

(2) श्रम-विभाजन द्वारा प्रत्येक श्रमिक का कार्य एवं दायित्व निर्धारित कर दिया जाता है, अत: प्रत्येक कर्मचारी प्रमापित स्तर पर कार्य करके अपनी कार्यकुशलता एवं क्षमता में वृद्धि करता है।

(3) इसके द्वारा श्रमिक, कार्य के घण्टों या इकाई के अनुसार अपना पारिश्रमिक स्वयं ज्ञात कर सकते हैं। इससे श्रमिक अधिक परिश्रम करके अधिक धन अर्जित कर सकते हैं।

(4) कुशल श्रमिकों को बोनस मिलता है तथा अकुशल श्रमिकों को बोनस से वंचित रहना पड़ता है। इस प्रकार कुशल श्रमिकों को उनकी योग्यता का उचित परस्कार प्राप्त होता है।

3. उपभोक्ताओं को लाभ (Advantages to Consumers)-निरन्तर अनुसन्धान, विश्लेषण एवं वर्गीकरण से उत्पादन लागत कम करने व किस्म सुधारने में लागत लेखे सहायक होते हैं, जिससे उपभोक्ताओं को सस्ती एवं अच्छी किस्म की वस्तुएँ प्राप्त होती हैं।

4. विनियोक्ताओं को लाभ (Advantages to Investors)-विनियोक्ता एक ऐसी संस्था में विनियोग करना पसन्द करते हैं, जो अपने कोषों को इस ढंग से व्यवस्थित करती है, जिससे उसकी लाभांश देने की क्षमता अधिक हो। ऋणदाता भी ऐसी संस्था या उद्योग को ऋण देते हैं, जिसकी भविष्य में उन्नति सम्भव हो तथा जिससे अधिक ब्याज प्राप्त किया जा सके, अत: विनियोक्ता एवं ऋणदाता लागत-लेखों की सहायता से यह ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं कि अमुक व्यवसाय या औद्योगिक इकाई की वर्तमान एवं भावी लाभार्जन क्षमता कितनी होगी। अमेरिका में तो केवल उन्हीं कम्पनियों को ऋण दिया जाता है, जो लागत-लेखा पद्धति को अपना लें क्योंकि इससे ऋण डूबने की सम्भावना का पता समय पर ही चल जाता है और उसे बचाने के उपाय किए जा सकते हैं।

5. राष्ट्र को लाभ (Advantages to the Nation)-प्रत्येक देश की सरकार वर्तमान एवं भावी विकास के लिए वार्षिक एवं बहुवर्षीय योजनाएँ बनाती है। योजनाओं के नियोजन में पहले लागतों का अनुमान लगाया जाता है, इसके बाद लक्ष्य निर्धारित करके धन की व्यवस्था की जाती है। लागत लेखा पद्धति के उपयोग से सरकार ‘बजटरी नियन्त्रण विधि’ द्वारा विभिन्न विभागों के बजट तैयार करती है तथा ‘प्रामाणिक लागत पद्धति’ अपनाकर औद्योगिक एवं आर्थिक विकास की योजनाओं पर होने वाले व्ययों को नियन्त्रित करती है।

प्रश्न 2 – लागत लेखे वित्तीय लेखों से किन विशेष बातों में समान हैं एवं किन विशेष बातों में भिन्न हैं? लागत नियन्त्रित करने में लागत लेखे कैसे सहायक सिद्ध होते हैं?

In what essential aspects is cost accounting similar to and different from financial accounting? How does cost accounting help in controlling cost ?

उत्तर – परिव्यय (लागत) लेखे वित्तीय लेखों के पूरक हैं जिसका प्रयोग उपक्रम को लागत सम्बन्धी अतिरिक्त सूचना प्रदान करने के लिए किया जाता है। इन्हें लेखा पद्धति के विभिन्न अंग न माना जाकर पूरक माना जाता है। वित्तीय लेखों के अभाव में परिव्यय लेखे पंगु हैं जिनकी सत्यता की कसौटी पर विश्वास नहीं किया जा सकता। परिव्यय लेखांकन के अभाव में वित्तीय लेखे केवल ऐतिहासिक महत्त्व के आँकड़े मात्र हैं जो व्यावहारिक दृष्टि से उपयोगी नहीं हो सकते। एच० डब्ल्यू० हाकिन्स के शब्दों में “साधारण व्यापारिक लेखे अत्यधिक मूल्यवान् वस्तुओं का ताला लगा हुआ भण्डार-गृह है परिव्यय लेखांकन प्रणाला जिसकी चाबी (key) है।”

लागत लेखांकन लागत लेखे तथा वित्तीय लेखों की समानताएँ 

(Similarities of Cost Accounts and Financial Accounts)

इस प्रकार परिव्यय लेखांकन वित्तीय लेखाकर्म के लिए सहायक मात्र है, उसका प्रतिस्पर्धी नहीं है। इन दोनों में कुछ समानताएँ तथा असमानताएँ हैं। इनकी मुख्य समानी निम्नलिखित हैं

1. दोनों लेखों के आधार – पत्र एक ही होते हैं व्यापार के सम्बन्ध में प्रामाणिक बीजक व प्रपत्र प्रयोग किए जाते हैं। उन्हीं के आधार पर व्यापारिक लेखों एवं लागत लेखों में लेखे किए जाते हैं।

2. प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष व्यय – दोनों में ही प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष व्ययों का लेखा किया जाता है।

3. प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष निष्कर्ष – दोनों ही प्रकार के लेखों द्वारा व्यापार के निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं। दोनों ही लेखों में एक निश्चित समय के उपरान्त लाभ एवं हानि ज्ञात की जा सकती है।

4. विक्रय मूल्य का ज्ञान-दोनों ही लेखों द्वारा उत्पादित वस्तुओं के विक्रय मूल्य का ज्ञान हो सकता है।

5. माल तथा श्रम – दोनों ही पद्धतियों में उत्पादन क्षेत्र में प्रयोग में आने वाले प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष माल व श्रम का लेखा किया जाता है।

6. पिछली योजना की जाँच – उत्पादक दोनों प्रकार के लेखाकर्म के अधीन अपनी पिछली योजनाओं की जाँच कर सकते हैं तथा भविष्य की योजनाएँ निर्मित कर सकते हैं।

7. विभिन्न वर्गों के व्ययों की तुलना – दोनों ही प्रकार के लेखाकर्मों के अनुसार भिन्न-भिन्न वर्गों के व्ययों की तुलना की जा सकती है।

8. दोहरे लेखे प्रणाली के सिद्धान्त – लागत लेखाकर्म और व्यापार लेखाकर्म दोनों में ही दोहरे लेखा प्रणाली का सिद्धान्त अपनाया गया है।

लागत लेखों एवं वित्तीय लेखों में असमानताएँ/अन्तर 

(Difference between Cost Accounts and Financial Accounts)

उपर्युक्त समानताओं के साथ-साथ इन दोनों पद्धतियों में अनेक ऐसी विशेषताएँ हैं जिनके आधार पर लेखा विशेषज्ञों ने इन्हें पृथक्-पृथक् माना है। ऋजवे के मतानुसार, “विश्लेषण की रीति के अनुसार लागत लेखे शुद्ध लाभों पर इस प्रकार पहुँचने का प्रयत्न करते हैं मानों बहुत से छोटे-छोटे व्यापारिक व लाभ-हानि खाते बनाए गए हों। इसके विपरीत, व्यापारिक खाते शुद्ध लाभों पर प्रत्येक प्रकार के खर्चों को एकत्रित करके लाभ ज्ञात करने का प्रयत्न करते हैं।” विलियम बैल ने इन दोनों का अन्तर स्पष्ट करते हुए कहा-“व्यापारिक लेखों का उद्देश्य एक निश्चित समय में किए जाने वाले कार्यों का अन्तिम आर्थिक पत्र निकालना है, परन्तु लागत लेखों का उद्देश्य मुख्यत: उत्पादित वस्तु की विस्तृत लागतें ज्ञात करना है।”

इन दोनों में महत्त्वपूर्ण अन्तर निम्न आधारों पर किया गया है_

1. लेखों की अनिवार्यता का आधार (Basis of Compulsion of Accounts)लागत लेखों की रचना किसी भी कम्पनी अथवा व्यापारिक संस्था के लिए अनिवार्य नहीं है। इसके विपरीत, व्यापारिक लेखे सभी व्यापारिक संस्थाओं को रखने होते हैं। कम्पनी के अन्तर्गत अन्तिम खाते कम्पनी अधिनियम 1956 के अनुसार बनाए जाते हैं।

2. कार्यकुशलता का आधार (Basis of Efficiency)-लागत लेखे उत्पादन को 2 कार्यकुशल बनाने में अधिक सहायक होते हैं। इसके विपरीत, व्यापारिक लेखे कार्यकुशलता से पर कोई प्रभाव नहीं डालते हैं। __3. अनुमानित व्ययों का आधार (Basis of Estimated Expenditure)लागत लेखों के अन्तर्गत टेन्डर दशाओं में अनुमानित व्ययों का भी लेखा किया जाता है। इसके विपरीत, व्यापारिक लेखों में केवल वास्तविक व्ययों का ही लेखा किया जाता है।

4. भविष्य के अनुमानित मूल्य का आधार (Basis of Estimated Price in दि Future)-लागत लेखे भविष्य में वस्तु के अनुमानित मूल्य निकालने में सहायक होते हैं। उ इसके विपरीत, व्यापारिक लेखे भविष्य में वस्तु का अनुमानित मूल्य ज्ञात करने में सहायक नहीं होते, इनके माध्यम से तो केवल उसी दशा में लागत मूल्य ज्ञात किया जा सकता है है जबकि अन्तिम खाते तैयार किए जा चुके हों।

5. लेखे रखने के आधार (Basis of keeping Records)-लागत लेखों को प्रायः बड़ी-बड़ी कम्पनियाँ ही रखती हैं। इसके विपरीत, व्यापारिक लेखे सभी छोटे बड़े एकाकी इ साझेदारी संस्थाओं तथा संयुक्त प्रमण्डलों द्वारा रखे जाते हैं।

6. लाभ ज्ञात करने का आधार (Basis of Estimating Profit)-लागत लेखों ल के आधार पर केवल वस्तु विशेष के उत्पादन पर होने वाले लाभ को ज्ञात किया जा सकता है। इसके विपरीत, व्यापारिक लेखों में सम्पूर्ण व्यापार के लाभों को दर्शाया जाता है।

7. व्ययों के विश्लेषणात्मक लेखों का आधार (Basis of Analysis of Expenses)-लागत लेखों के अन्तर्गत उत्पादन क्षेत्र में किए व्ययों का विश्लेषणात्मक रीति र से लेखा किया जाता है। इसके विपरीत, व्यापारिक लेखों में व्ययों का लेखा मिश्रित रूप से किया जाता है।

8. व्ययों के लेखों का आधार (Basis of Records of Expenditure)-लागत लेखों के अन्तर्गत लागत के मूल तथ्यों से सम्बन्धित व्ययों का लेखा किया जाता है। इसके विपरीत, व्यापारिक लेखों में सभी व्ययों का लेखा किया जाता है।

9. उद्देश्यों की पूर्ति का आधार (Basis of Fulfilment of Objects)-लागत – लेखे चाहे कितने ही सुचारु तथा वैज्ञानिक ढंग से ही क्यों न रखे जाएँ ये व्यापारिक लेखों के . उद्देश्यों की पूर्ति नहीं कर सकते हैं। इसके विपरीत, व्यापारिक लेखे यदि विशेष परिश्रम के साथ बनाए जाएँ तो उन उद्देश्यों की पूर्ति कर सकते हैं जिनके लिए ये लेखे बनाए जाते हैं।

10. प्रति इकाई लागत मूल्य ज्ञात करने के आधार (Basis of Finding Cost AUnit) लागत लेखा पद्धति के अन्तर्गत अधिक सचनाएँ प्राप्त होती हैं तथा प्रणाला अधिक विवरण प्रस्तुत करती है। यदि इस प्रणाली को वैज्ञानिक ढंग से लिखा जाए तो इसम उत्पादन की प्रत्येक इकाई का लागत मूल्य आसानी से ज्ञात हो सकता है।

11. माल एवं रोकड़ की देख-रेख का आधार (Basis of Watch on Materials and Cash) लागत लेखों में कच्चे माल और उससे बने हुए समान दोनों से सम्बन्धित लेखों पर उचित देख-रेख रखी जाती है। इसके विपरीत, व्यापारिक लेखों में माँग की अपेक्षा रोकड़ तथा इससे सम्बन्धित कार्यों पर अधिक देख-रेख रखी जाती है।

12. अंकेक्षण का आधार (Basis of Audit)-कम्पनी अधिनियम 1956 की धारा 233 B के अनुसार उत्पादन निर्माण या खाद्यान्न की क्रियाओं में लगे हुए कम्पनी में लागत लेखों का अंकेक्षण आवश्यक है। इसके विपरीत, व्यापारिक लेखों का अंकेक्षण कराना कम्पनियों की दशा में कम्पनी अधिनियम 1956 के अधीन आवश्यक है।

13. लेखापालकों की योजना का आधार (Basis of Qualification of Accountant)-लागत लेखों के लिए विशेष योग्यता प्राप्त एकाउन्टेन्ट की आवश्यकता होती है जिसके लिए आई०सी०डब्ल्यू०ए० की परीक्षा पास व्यक्तियों को रखा जाता है। इसके विपरीत, व्यापारिक लेखों में चार्टर्ड एकाउन्टेन्ट्स की परीक्षा पास किए हुए व्यक्ति ही अधिक उपयुक्त माने जाते हैं।

इस प्रकार हम इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि यद्यपि इन दोनों में कुछ महत्त्वपूर्ण अन्तर हैं तथापि लागत लेखे व्यापारिक लेखों के सहायक हैं प्रतिद्वन्द्वी नहीं। श्री डब्ल्यू० बिग ने अपने विचार इस दृष्टिकोण से इस प्रकार प्रस्तुत किए हैं, “दोनों प्रकार के लेखों को अलग-अलग प्रकार से रखना चाहिए, लेकिन इनके रखने का आधार ऐसा होना चाहिए कि इनका आसानी से समाधान किया जा सके। दोनों ही एक-दूसरे के पूरक तथा एक सफल व्यापारिक गृह के लिए उपयोगी है।” 

लागत नियन्त्रण एवं लागत लेखें 

(Cost Control and Cost Accounting)

इसके लिए विस्तृत उत्तरीय प्रश्न 1 के अन्तर्गत शीर्षक ‘उत्पादक एवं प्रबन्धकों को लाभ’ देखें।

प्रश्न 3 – लागत अंकेक्षण की परिभाषा दीजिए। लागत अंकेक्षण के उद्देश्यों का वर्णन कीजिए। लागत अंकेक्षण रिपोर्ट का एक नमूना दीजिए।

Define Cost Audit. Describe the objectives of cost audit. Give a specimen of cost audit report.

उत्तर – लागत अंकेक्षण का आशय एवं परिभाषाएँ

(Meaning and Definitions of Cost Audit) 

लागत अंकेक्षण से आशय लागत लेखों के अंकेक्षण से है, जिसका सम्बन्ध लागत पद्धति तकनीक एवं लागत लेखों की गहन जाँच एवं शुद्धता के प्रमाणन से है। लागत अंकेक्षण की कछ मुख्य परिभाषाएँ निम्न प्रकार हैं

(1) “लागत लेखों की शुद्धता का सत्यापन तथा लागत लेखांकन की योजना का अनुसरण लागत अंकेक्षण कहा जाता है।”

(2) “लागत अंकेक्षण शब्द का आशय लागत पद्धति, तकनीक व लेखों की गहन जाँच है ताकि उसकी शुद्धता का प्रमाणन किया जा सके व लागत लेखों के उद्देश्यों की पूर्ति का अनुसरण किया जा सके।”

लागत अंकेक्षण में कुल मिलाकर जहाँ एक ओर यह जाँच की जाती है कि लागत लेखे शुद्ध रखे गये हैं, अर्थात लागत की गणना शद्ध है. वहीं दूसरी ओर यह भी देखा जाता है कि इन लेखों के रखने में लागत लेखांकन के सिद्धान्तों, नियमों और प्रक्रियाओं का उचित रूप से पालन हुआ है या नहीं। लागत अंकेक्षण के सन्दर्भ में ‘लागत लेखे’ एक व्यापक शब्द है, जिसमें लागत पुस्तकें, लागत लेखे, लागत विवरण, लागत पत्र तथा उनसे सम्बन्धित प्रमुख एवं सहायक प्रपत्र शामिल होते हैं।

लागत अंकेक्षण के उद्देश्य

(Objects of Cost Audit) 

लागत अंकेक्षण के मुख्य उद्देश्य निम्नलिखित हैं-

I. संरक्षणात्मक उद्देश्य (Protective Objective)

1. लागत लेखांकन की शुद्धता – लागत लेखांकन रिकार्ड की शुद्धता की जाँच करना तथा प्रमाणित करना कि उन्हें लागत लेखांकन के सिद्धान्तों के अनुसार रखा गया है या नहीं।

2. सिद्धान्तों एवं प्रकियाओं का पालन – यह प्रमाणित करना कि प्रबन्ध द्वारा लागत लेखांकन के स्वीकृत सिद्धान्तों एवं प्रक्रियाओं का पूर्णरूपेण पालन किया जा रहा है।

3. त्रुटियों का पता लगाना – त्रुटि एवं कपटों का पता लगाना (यदि कोई हो)।

4. व्यवस्था की पर्याप्तता का परीक्षण-यह देखना कि लागत लेखों के रखने की वर्तमान व्यवस्था, रिपोर्टों तथा विवरणों की प्रस्तुति कहाँ तक सहायक एवं पर्याप्त है। जहाँ भी आवश्यक हो, उनको अधिकाधिक अर्थपूर्ण एवं निर्णयनोन्मुख बनाने के लिए सुझाव दिए जा सकते हैं।

5. कमियाँ बताना – सामग्री, श्रम एवं मशीनों के प्रयोग में कमियों या अकुशलताओं को बताना तथा इस प्रकार से प्रबन्ध की सहायता करना।

6.सही होने का प्रमाणन – यह प्रमाणित करना कि लागत की गणना सही ढंग से और उचित रूप से प्रस्तुत की गई है।

7.लागत नियन्त्रण का लागू होना – यह देखना कि लागत नियन्त्रण एवं लागत में कमी के कार्यक्रमों को सही प्रकार से लागू किया जा रहा है।

8. बजटों एवं मानकों से तुलना – यह परीक्षण करना कि क्या किए गए व्यय बजट-सीमाओं और निर्धारित मानकों के अन्तर्गत हैं।

9. प्रबन्ध को सलाह – लागत लेखांकन विभाग के कार्य में सुधार के लिए धनात्मक सुझाव देकर प्रबन्ध का मार्गदर्शन करना।

10. अन्य (Others) – (i) उपक्रम में लागत जागरूकता उत्पन्न करना, (ii) लागत नियन्त्रण एवं लागत में कमी के दृष्टिकोण से स्टाफ पर नैतिक प्रभाव की प्रक्रिया को विकसित करना, (iii) लागत लेखांकन की पद्धतियों, तकनीकों एवं प्रक्रियाओं में कुशलता को प्रोत्साहित करना, (iv) आन्तरिक लागत अंकेक्षण की प्रभावी व्यवस्था को विकसित करना। 

II. रचनात्मक उद्देश्य (Constructive Objective)

(1) उत्पादन को विनियमित (regulate) करने के लिए प्रबन्ध को उपयोगी सूचनाए एवं समंक उपलब्ध कराना।

(2) उत्पादन व्यवस्था की मितव्ययी पद्धतियों का चयन करने में प्रबन्ध को सहायता देना। 

(3) संचालनात्मक लागतों को कम करने के लिए प्रबन्ध को सुझाव देना। 

(4) लागत लेखों में त्रुटियों के समाधान के लिए प्रबन्ध को सुझाव देना। 

(5) लागत नियन्त्रण एवं लागत में कमी के लिए प्रबन्ध को सुझाव एवं परामर्श देना।

लागत अंकेक्षण रिपोर्ट का नमूना

(Specimen of Cost Audit Report) 

हम … कम्पनी अधिनियम की धारा 233(B) के अन्तर्गत (यहाँ के पश्चात ‘कम्पनी’ के नाम से संदर्भित) के नियक्त अंकेक्षक (यहाँ के पश्चात् ‘लागत अंकेक्षक’ के नाम से संदर्भित) ने कम्पनी की 31 मार्च, 2013 को समाप्त वर्ष की कम्पनी – अधिनियम की धारा 209(1)(d) के अन्तर्गत रखी गई ‘A’ उत्पाद से सम्बन्धित खाता पुस्तकों ___ एवं अन्य सम्बन्धित अभिलेखों का परीक्षण कर लिया है और रिपोर्ट करते हैं कि

(1) हमें वे सभी सूचनाएँ और स्पष्टीकरण प्राप्त हो गए हैं जो हमारी सर्वोत्तम जानकारी एवं विश्वास में इस अंकेक्षण के लिए आवश्यक थे।

(2) कम्पनी ने कम्पनी अधिनियम की धारा 209(1)(d) द्वारा निर्धारित उचित लागत अभिलेख रखे हैं।

(3) कम्पनी की जिन शाखाओं में हम नहीं गए, उनके सम्बन्ध में हमें लागत अंकेक्षण के उद्देश्य के लिए अपेक्षित उचित विवरण एवं जानकारियाँ प्राप्त हो गई हैं।

(4) उपर्युक्त खाता पुस्तकें एवं अभिलेख कम्पनी अधिनियम द्वारा अपेक्षित सूचनाएँ उसी विधि में प्रस्तुत करती हैं जो अधिनियम में उल्लेखित हैं।

(5) हमारी सम्मति में कम्पनी ने लागत लेखांकन अभिलेख उचित रूप में रखे हैं जो संदर्भित उत्पाद की उत्पादन लागत, प्रक्रियन तथा विपणन लागत के बारे में सही एवं उचित चित्र प्रस्तुत करते हैं।

इस रिपोर्ट के साथ संलग्न तथ्य भी रिपोर्ट का एक अंग हैं जो अंकेक्षण के दौरान हमारे द्वारा अवलोकित किए गए हैं।

लागत अंकेक्षक 

दिनांक ….   …दिन ……………… स्थान.. 

लागत अंकेक्षण रिपोर्ट के साथ संलग्नक-संलग्नक (annexture) का प्रारूप भी लागत अंकेक्षण रिपोर्ट नियम में प्रदत्त है। यह संलग्नक अंकेक्षण रिपोर्ट का ही भाग है। संलग्नक में संस्था की विभिन्न स्थितियों एवं कार्य-प्रणालियों के बारे में 16 बिन्दु हैं। ये 16 बिन्दु निम्नलिखित हैं –

(1) सामान्य, (2) लागत लेखांकन व्यवस्था, (3) वित्तीय स्थिति, (4) उत्पादन, . (5) उत्पादन प्रक्रिया, (6) कच्ची सामग्री, (7) शक्ति एवं ईंधन, (8) मजदूरी एवं वेतन, (9) स्टोर्स एवं स्पेयर पार्ट्स, (10) ह्रास, (11) उपरिव्यय, (12) रॉयल्टी/तकनीकी सहायता भुगतान, (13) विक्रय, (14) असाधारण लागते, (15) अन्य मद, (16) अंकेक्षक का निर्णय।


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