B.Com 2nd Year Entrepreneurial Development Programmes Hindi Long Notes

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B.Com 2nd Year Entrepreneurial Development Programmes Hindi Long Notes
B.Com 2nd Year Entrepreneurial Development Programmes Hindi Long Notes

प्रश्न – किसी नई व्यावसायिक इकाई की स्थापना के लिए उठाए जाने वाले कदमों की व्याख्या कीजिए।

Discuss the various steps taken for the establishment of a new industrial unit. 

अथवा नवीन व्यावसायिक उद्यम की स्थापना के विभिन्न चरणों का वर्णन कीजिए।

Describe the different stages of starting of a new Business Undertaking 

अथवा किसी नई व्यावसायिक इकाई की स्थापना के लिए उठाए जाने वाले कदमों की व्याख्या कीजिए। ऐसी इकाई के लिए किन वैधानिक आवश्यकताओं की पूर्ति की आवश्यकता होती है?

Discuss the various steps taken for the establishment of a new industrial unit. What the legal requirements are essential for a new unit?

उत्तर – किसी भी नवीन व्यावसायिक इकाई की स्थापना एक अत्यधिक जटिल एवं जोखिमपूर्ण प्रक्रिया है। इस प्रक्रिया में उद्यमी को अनेक कार्यवाहियाँ पूर्ण करनी होती हैं तथा अनेक जटिल एवं जोखिमपूर्ण निर्णय लेने होते हैं। जेम्स आर० एडम्स (James R.Adams). के अनुसार, “व्यवसाय पृथ्वी पर सबसे महत्त्वपूर्ण क्रिया है। यह वह आधारशिला है जिस पर संस्कृति का निर्माण होता है। वास्तव में धर्म, समाज और शिक्षा सबका मूल आधार व्यवसाय ही है।” नई-नई व्यावसायिक इकाइयों से जहाँ रोजगार, उत्पादन, आय एवं बचत में वृद्धि के साथ-साथ तीव्र आर्थिक-सामाजिक विकास का मार्ग प्रशस्त हो रहा है, वहीं राजकीय नियमनों एवं नियन्त्रणों के कारण नई इकाई की स्थापना अत्यधिक जटिल एवं जोखिमपूर्ण हो गई है।

नई व्यावसायिक इकाई की स्थापना के चरण (कदम) 

(Stages or Steps of Starting a New Business Undertaking)

नई व्यावसायिक इकाई की स्थापना के मुख्यत: अग्रलिखित छह चरण हैं जिनसे उद्यमी को गुजरना होता है-

1. परिकल्पना अवस्था (Stage of Conception)-परिकल्पना उद्यमी का वह विचार है जब वह किसी व्यवसाय की स्थापना के बारे में सोचता है। (McNaughton) के शब्दों में, “प्रत्येक व्यावसायिक संगठन का प्रारम्भिक जिल्ला होता है। विचार वह प्रेरक शक्ति है जो प्रत्येक व्यावसायिक संगठन को गति प्रदान यह विचार ही नई इकाई की स्थापना की प्रथम सीढ़ी है। इस विचार के बाद ही वह दर व्यावसायिकता एवं लाभदायकता पर विचार करता है।

किसी नए व्यवसाय की परिकल्पना करते समय उद्यमी को दो बातों पर विशेष का ध्यान देना चाहिए-प्रथम, ‘वह व्यवसाय क्यों करना चाहता है’ तथा द्वितीय, ‘वह कौन व्यवसाय प्रारम्भ करना चाहता है’।

किसी भी उद्यमी द्वारा व्यावसायिक इकाई की स्थापना का आधार ठोस होना चाहिए. आक्रामकता, अति उत्साह अथवा आशावादिता नहीं। दूसरे, व्यवसाय का प्रारूप निर्धारित करने से पूर्व उसे व्यवसाय/उद्योग की प्रकृति को स्पष्ट रूप से समझ लेना चाहिए। सर्वप्रमुख बात यह है कि उद्यमी को मूलतः इस बात पर विचार करना चाहिए कि उपभोक्ता क्या चाहता है, बाजार में उस वस्तु की माँग कैसी है, बाजार की दशा क्या है, प्रारम्भिक उत्पादन तथा विपणन लागत क्या आएगी, व्यवसाय के सम्बन्ध में सरकारी नीति क्या है, प्रतिस्पर्धा कैसी है तथा व्यवसाय में किस प्रकार की व्यावसायिक, तकनीकी एवं प्रबन्धकीय क्षमता की आवश्यकता है।

2. प्रारम्भिक तैयारियों की अवस्था (Stage of Preliminary Preparations)परिकल्पना के बाद उद्यमी को व्यवसाय स्थापना की प्रारम्भिक तैयारियाँ करनी होती हैं। इसमें सर्वप्रथम व्यवसाय का चयन करना होता है। व्यवसाय के चयन का निर्णय उसे अपने अनुभव, ज्ञान, कौशल व दूरदर्शिता से करना चाहिए। इसके अतिरिक्त इस सम्बन्ध में अनुभवी व्यक्तिया व विशेषज्ञों से परामर्श कर लेना चाहिए। व्यवसाय का चुनाव करते समय उसे निम्नलिखित बाता पर विशेष ध्यान देना चाहिए

(1) सर्वप्रथम उसे व्यवसाय से सम्बन्धित विभिन्न प्रकार के जोखिमों (विता जोखिम, पेशेवर जोखिम, वैयक्तिक जोखिम) आदि के बारे में व्यापक विचार-विमर्श कर ल चाहिए। उसे यह भी जान लेना चाहिए कि व्यवसाय की भावी सम्भावनाएँ क्या हैं।

(ii) उद्यमी को चयनित व्यवसाय को प्रभावित करने वाले नीति.नियम एवं कार व्यापक जानकारी ले लेनी चाहिए।

(iii) उसे संगठन के आकार का निर्धारण कर लेना चाहिए। संगठन का र हो. मध्यम हो अथवा छोटा हो यह निर्णय लेते समय उसे अपनी वित्तीय एवं प्रबन्ध को ध्यान में रखना चाहिए।

(iv) यह निर्णय करना भी आवश्यक है कि उसके व्यवसाय के स्वामित्व का प्रारूप क्या होगा-एकल, साझेदारी अथवा कम्पनी।

(v) इसके पश्चात् उद्यमी व्यावसायिक इकाई के आर्थिक एवं सामाजिक उद्देश्यों का निर्धारण करता है। इन्हीं उद्देश्यों के अनुरूप व्यावसायिक इकाई का संचालन किया जाता है।

(vi) व्यावसायिक इकाई के स्थान का निर्धारण करते समय व्यावसायिक कार्य की प्रकृति, आकार, बाजार-क्षेत्र आदि को ध्यान में रखा जाना चाहिए।

व्यवसाय एवं स्थान का चयन करने के बाद उद्यमी को कुछ प्रारम्भिक अनुबन्ध करने होते हैं; जैसे-भूमि, भवन, कॉपीराइट, पेटेण्ट आदि के लिए विभिन्न पक्षकारों से अनुबन्ध, सरकार अथवा विदेशी फर्मों के साथ अनुबन्ध, तकनीकी व विधि विशेषज्ञों के साथ अनुबन्ध, प्रचार माध्यमों से अनुबन्ध आदि।

3. प्राथमिक नियोजन की अवस्था (Primary Planning Stage)-किसी भी व्यावसायिक इकाई की स्थापना से पूर्व कुछ आर्थिक व सामाजिक उद्देश्य निर्धारित किए जाते हैं

और इन्हीं उद्देश्यों की आपूर्ति को ध्यान में रखते हुए इकाई का संचालन किया जाता है। इसके लिए उद्यमी अपने उद्देश्यों व संसाधनों को ध्यान में रखते हुए एक समग्र योजना तैयार करता है ताकि वह न्यूनतम साधनों के इष्टतम संयोग से अधिकतम उत्पादन-कुशलता प्राप्त कर सके। इस योजना के प्रमुख अंग निम्नलिखित हैं

(i) परियोजना नियोजन (Project Planning)-इसमें परियोजना के जोखिम, लागत व उनसे प्राप्त होने वाले लाभों का तुलनात्मक विवरण तैयार किया जाता है और तब यह निर्णय लिया जाता है कि परियोजना अपनाने योग्य है अथवा नहीं।

(ii) विपणन नियोजन (Marketing Planning)-इसमें उत्पाद, मूल्य व विपणन से सम्बन्धित नियोजन किया जाता है। इसमें निम्नलिखित पर विचार किया जाता है

उत्पादित वस्तु का रंग, रूप, डिजाइन, लेबिल, पैकिंग कैसा हो, उत्पाद का मूल्य किस आधार पर निर्धारित किया जाए, संवर्द्धन के लिए किस साधन का प्रयोग किया जाए तथा विपणन के लिए किस माध्यम का चयन किया जाए।

(iii) उत्पादन-नियोजन (Production Planning)-उचित ढंग से, उचित मात्रा में तथा कम खर्चे पर उत्पादन करने के लिए उत्पादन-नियोजन आवश्यक है। इसके लिए निम्नलिखित पक्षों के सम्बन्ध में नियोजन किया जाता है

(अ) संयन्त्र नियोजन, (ब) भवन व उपकरणों का नियोजन, (स) उत्पादन प्रणाली का नियोजन तथा (द) उत्पादन कार्यक्रम का नियोजन।

(iv) वित्तीय नियोजन (Financial Planning)-वित्त व्यवस आधारशिला है। वित्तीय नियोजन करते समय निम्न बिन्दुओं पर ध्यान दिया जा

(अ) पूँजी की आवश्यकता एवं स्रोतों का निर्धारण, (ब) स्थायी एवं कार्यशील नियाजन, (स) पूँजी के अनुकूलतम आकार का निर्धारण तथा (द) पूँजी के मोर एवं कार्यशील पूँजी का जी के स्रोतों का चयन आदि।

(v) लागत नियोजन (Cost Planning)-इसमें दो घटकों पर नियोजन जाता है-(अ) लागतों का अनुमान लगाना तथा (ब) अनुमानित लागतों पर उत्पा सुनिश्चित करना। बाजार में प्रतिस्पर्धी बने रहने के लिए यह अति आवश्यक है।

(vi) कार्यालय नियोजन (Office Planning)-कार्यालय नियोजन निम्नलिखित बातें आती हैं

सूचनाएँ एकत्र करना, उनको क्रमबद्ध करना, उनका सारणीयन करना, तुलना करना । तथा अभिलेख बनाना।

इन सब कार्यों को करने के लिए विभिन्न प्रकार के उपकरणों (कम्प्यूटर, टेलीफोन, फोटोस्टेट मशीन आदि) की आवश्यकता पड़ती है। इन सबकी व्यवस्था करना कार्यालय नियोजन के अन्तर्गत ही आता है।

(vii) सेविवर्गीय नियोजन – इसमें कर्मचारियों की संख्या, योग्यता, उनकी नियुक्ति, प्रशिक्षण, वेतन, प्रशासन, पदोन्नति, कल्याण व सुरक्षा आदि के सम्बन्ध में योजना बनाई जाती है।

4. संगठन-संरचना निर्माण अवस्था (Organization-structure Building Stage)-संगठन-संरचना के निर्माण के सम्बन्ध में एक उद्यमी को निम्नलिखित काय करत

पड़ते हैं

(अ) औपचारिकताओं को पूरा करना—ये औपचारिकताएँ हैं

(i) कम्पनी की दशा में उसका समामेलन एवं पंजीयन कराना। 

(ii) वाणिज्यिक कर विभाग के अन्तर्गत पंजीयन कराना। 

(iii) यदि आवश्यक हो तो सक्षम अधिकारी से अनुज्ञा-पत्र प्राप्त करना। 

(iv) उद्योग निदेशालय में पंजीयन कराना। 

(v) स्थानीय सक्षम अधिकारी से अनुमति प्राप्त करना।

यदि अनिवार्य हो तो ‘कारखाना अधिनियम के अन्तर्गत पंजीयन कर 

(vi) प्रविवरण जारी करने से पूर्व उसकी SEBI से जाँच कराना। 

(vii) प्रदूषण बोर्ड से अनापत्ति प्रमाण-पत्र प्राप्त करना।

(vii) सम्बन्धित मंत्रालय से स्वीकृति प्राप्त करना।

(ब) आवश्यक साधनों एवं सुविधाओं की व्यवस्था करना – इनमें मुख्य हैं

(i) प्रारम्भिक कोषों की व्यवस्था करना। 

(ii) भूमि, भवन, कार्यालय आदि की व्यवस्था करना। 

(iii) यदि उपलब्ध हो तो औद्योगिक बस्ती या पार्क में स्थान प्राप्त करना। 

(iv) सम्बन्धित अधिकारी से मानचित्र पास कराना। 

(v) आवश्यक उत्पादन संयन्त्रों, यन्त्रों व उपकरणों की स्थापना करना। 

(vi) तकनीकी विशेषज्ञों की सेवाएँ प्राप्त करना। 

(vii) अनिवार्य आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु आवश्यक व्यवस्थाएँ करना। 

(स) आन्तरिक संगठन संरचना का निर्माण करना – इनमें मुख्य हैं

(i) संगठन की समस्त क्रियाओं तथा उपक्रियाओं का विवरण तैयार करना। 

(ii) क्रियाओं को विभिन्न समूहों में वर्गीकृत करना। 

(iii) कार्यों को योग्यतानुसार सौंपना। 

(iv) कार्यों से सम्बद्ध आवश्यक साधन एवं अधिकार देना।

(v) कर्मचारियों में परस्पर समन्वय बनाए रखना। 

(द) विपणन व्यवस्था करना-इसमें निम्नलिखित कार्य आते हैं

(1) विक्रय प्रतिनिधियों की नियुक्ति करना। 

(ii) विपणन मध्यस्थों की नियुक्ति करना। 

(iii) परिवहन व संग्रहण की व्यवस्था करना। 

(iv) विक्रय संवर्द्धन के लिए प्रयास करना।

5.वित्तीय व्यवस्था अवस्था (Financing Stage)-चूँकि वित्त किसी भी व्यवसाय की आधारशिला है। अत: यह आवश्यक है कि व्यवसाय की स्थापना से पूर्व उद्यमी अल्पकालीन एवं दीर्घकालीन, स्थायी एवं कार्यशील सभी प्रकार की पूँजी प्राप्त करने का प्रयास करे। पूँजी निजी स्रोतों, मित्रों व सम्बन्धियों, वित्तीय संस्थाओं व बैंकों से प्राप्त की जा सकती है। अंश, ऋणपत्र आदि के द्वारा भी पूँजी प्राप्त की जा सकती है, किन्तु इसके लिए विभिन्न पूर्व-क्रियाएँ आवश्यक होती हैं।

6. प्रारम्भ अवस्था (Commencement Stage) कम्पनी को छोड़कर, अन्य सभी प्रकार के संगठन उपर्युक्त चरणों के पूरा होने के पश्चात् अपना व्यवसाय आरम्भ कर सकते हैं। कम्पनी व्यवसाय प्रारम्भ करने का प्रमाण-पत्र प्राप्त होने के बाद ही अपना व्यवसाय आरम्भ कर सकती है।

नया एकाकी व्यवसाय प्रारम्भ करने के लिए काननी कार्य

(Legal Requirements for Establishing a New Unit) 

नया एकाकी व्यवसाय प्रारम्भ करने के लिए किसी प्रकार की वैधानिक का आवश्यकता नहीं होती है। कोई भी वयस्क व्यक्ति, जो कि स्वस्थ मस्तिष्क का राजनियम द्वारा अनबन्ध के अयोग्य नहीं है, अपना व्यवसाय आरम्भ कर सकता है और समापन कर सकता है बशर्ते कि व्यवसाय और व्यवसाय का स्थान उस व्यवसाय बन्धित न हो। हाँ, व्यापार कर आदि में व्यवसाय का पंजीकरण कराना अनिवार्य है कि उस दायरे में आता है।

प्रश्न – भारत की विदेश व्यापार नीति (2015-20) की विवेचना संक्षेप में कीजिए।

Discuss the Foreign Trade Policy (2015-20) of India in breif. 

उत्तर – विदेश व्यापार नीति (2015-20)

[Foreign Trade Policy (2015-20)] 

केन्द्र सरकार द्वारा 1 अप्रैल, 2015 को विदेश व्यापार नीति की घोषणा की गई। नई विदेश व्यापार नीति के तहत 2020 तक यानी अगले पाँच साल में वस्तुओं एवं सेवाओं का निर्यात दोगुना करने और नौ सौ अरब डॉलर तक पहुँचाने का लक्ष्य रखते हुए भारत को वैश्विक व्यापार में प्रमुख भागीदार बनाना है। साथ ही निर्यात में हर साल 14 फीसदी की बढ़ोतरी करने की भी कोशिश की जाएगी।

सरकार इस तथ्य से भली-भाँति परिचित है कि वैश्विक मंदी तथा अशान्ति के माहौल में उसकी कुछ सीमाएँ हैं। भारत के प्रमुख व्यापारिक साझीदारों में अमेरिका की हालत स्थिर है। यूरोपीय यूनियन में सुधार आया है, लेकिन मध्यपूर्व तथा मध्य एशिया में हालत खराब हो गई है, जिसका असर भारत पर पड़ना अवश्यंभावी है। आज दुनिया की करीब सारा बड़ा अर्थव्यवस्थाएँ विकास दर और बेरोजगारी दोनों ही मोर्चों पर गम्भीर संकट से जूझ रही हैं। इन बाह्य परिस्थितियों के परिप्रेक्ष्य में भारत सरकार देश में विदेशी व्यापार के अनुकूल हालात पदा करने के लिए कटिबद्ध है और इसीलिए व्यापार नीति में उसने सारी बातों को ध्यान में रखा इसमें दो राय नहीं कि यदि कारोबारियों को उत्कृष्ट उत्पाद बनाने के लिए तमाम सविधाएँ मिलें तो नि:सन्देह वे ऐसे उत्पादों का निर्यात करने में सक्षम होंगे जिसस भार ब्रैडिंग मजबूत हो। स्मरण रहे कि अभी भारत की वैश्विक निर्यात में हिस्सेदारी मात्र 2 प्रा है जिसे सरकार बढ़ाकर 3.5 प्रतिशत करना चाहती है। इस हेतु सरकार का विचार स्वास्थ्य देखभाल, लॉजिस्टिक्स क्षेत्र पर विशेष फोकस करने का है। साथ ही वह सेज

यानी विशेष आर्थिक क्षेत्रों में स्थित इकाइयों को विशेष प्रोत्साहन देगी। इस व्यापार नीति का मुख्य विशषता यह है कि इसके अन्तर्गत ‘मेक इन इण्डिया’ और ‘डिजिटल इण्डिया’ दोनों को नापस म जोड़ा जाएगा और निर्यात बढाने के काम में राज्य सरकारों को भी शामिल किया जाएगा।

विदेश व्यापार नीति [Foreign Trade Policy-FTP 

(1) 2015-20 में दो नई योजनाएँ प्रारम्भ की गई हैं। पहली, भारत से पण्यगत निर्यात जना (Merchandise Exports from India Scheme-MEIS) और भारत से सेवा निर्यात योजना (Services Exports from India Scheme-SEIS)|

(2) एमईआईएस में जहाँ विशिष्ट बाजार विदेशी व्यापार नीति के लिए विशिष्ट सेवाओं को प्रोत्साहन देना है, वहीं एसईआईएस में अधिसूचित सेवाओं के निर्यात को बढ़ाने की व्यवस्था है। ये दोनों योजनाएँ पहले की बहुविध योजनाओं के स्थान पर होंगी।

(3) एमईआईएस और एसईआईएस के लिए प्रदत्त प्रोत्साहनों को विशेष आर्थिक क्षेत्रों, हथकरघा, हस्तशिल्प और पुस्तकों आदि के ई-कॉमर्स के लिए भी उपलब्ध किया जाएगा।

(4) एमईआईएस और एसईआईएस दोनों से प्राप्त लाभों को विशेष आर्थिक क्षेत्रों में स्थित इकाइयों में विस्तारित किया जाएगा।

(5) एमईआईएस के अन्तर्गत कृषि तथा ग्रामीण उद्योग उत्पादों को सम्पूर्ण विश्व में 3 प्रतिशत और 5 प्रतिशत की दर से सहायता प्रदान की जाएगी। एमईआईएस के अन्तर्गत प्रसंस्कृत तथा पैकेज युक्त कृषि व खाद्य वस्तुओं को उच्च सहायता प्रदान की जाएगी।

(6) मुख्य बाजारों में औद्योगिक उत्पादों को 2 प्रतिशत से 3 प्रतिशत की दरों में सहायता दी जाएगी।

(7) भारत से सेवित की जा रही योजना (Served From India Scheme-SFIS) के स्थान पर भारत से नियति सेवा योजना (Service Export from India Scheme-SEIS) को प्रारम्भ किया जाएगा। ऐसे क्षेत्रों में निर्यात को प्रोत्साहन देने के लिए बांडिंग अभियान चलाना प्रस्तावित है। जहाँ भारत परम्परागत दृष्टि से मजबूत हालत में है। यह भी उल्लेखनीय है कि भारत में जरी जरदोजी, बेंत व लकड़ी फर्नीचर, पीतल की कारीगरी और दसरे इस तरह के कलात्मक काम भी प्रसिद्ध हैं।

(8) एसईआईएस ‘भारतीय सेवा संभरकों’ (Indian Service Providers) के स्थान पर ‘भारत में स्थित सेवा संभरकों’ (Service Providers Located in India) पर लागू होगा।

(9) बिजनेस सेवाएँ, होटल और रेस्टोरेन्ट एसईआईएस के अन्तर्गत 3 प्रतिशत और अन्य विनिर्दिष्ट सेवाओं के लिए 5 प्रतिशत की दर पर प्रतिभूति पत्र (स्क्रिप्स Scrips) प्राप्त करेंगे।

(10) शुल्क जमा प्रतिभति पत्रों को बिना किसी बाधा के अन्तरित किया जा सकेगा और य सीमा शुल्क, उत्पाद शुल्क तथा सेवा कर के भुगतान के लिए उपयोग में लाए जाएंगे।

(11) प्रतिभूति पत्रों के लिए ‘सेनवेट’ (CENVAT) क्रेडिट अथवा ड्रॉबैक के लिए

होगा।

(12) एक्सपोर्ट हाउस, स्टार एक्सपोर्ट हाउस, ट्रेडिंग हाउस, प्रीमियर ट्रेडिंग द्वारा प्रमाण-पत्र के नामकरण को बदलकर 1, 2, 3, 4, 5 स्टार निर्यात गृह में बदल दिया गया है। ___

(13) स्टेस होल्डर की मान्यता के लिए निर्यात निष्पादन के मानदण्ड को रुपये से अमेरिकी डॉलर अर्जनों में परिवर्तित कर दिया गया है।

(14) ऐसे उत्पादक जो स्टेटस होल्डर भी हैं, वे भारत से जाने वाले विनिर्मित माल का स्व-प्रमाणन करने में समर्थ होंगे।

(15) ईपीसीजी के अन्तर्गत घरेलू अधिप्राप्ति के लिए घटाई गई निर्यात बाध्यता (Reduced Export Obligation-REO) को 75 प्रतिशत करना।

(16) चार्टर्ड एकाउण्टेण्ट/कम्पनी सेक्रेट्री/कॉस्ट एकाउण्टेण्ट द्वारा डिजिटल तौर पर ‘ हस्ताक्षरित दस्तावेज की ऑनलाइन प्रक्रिया विकसित की जाएगी।

(17) विभिन्न लाइसेंसों के निर्गम के लिए ऑनलाइन अन्तर मंत्रालयिक परामर्श की व्यवस्था की जाएगी।

(18) निर्यातक-आयातक प्रोफाइल पर उपलब्ध दस्तावेजों की कागजी प्रतिलिपियों को बार-बार प्रस्तुत करने की आवश्यकता नहीं है।

(19) अब कारोबारियों को ढेर सारे दस्तावेज नहीं जमा करने होंगे। ऑनलाइन शिकायतें की जा सकेंगी और उनका निपटारा भी जल्द होगा।

(20) विशेष रसायनों, ऑर्गेनिज्म्स, सामग्रियों, उपस्करों और प्रौद्योगिकियों (Special Chemicals, Organisms, Materials, Equipment and Technologies SCOMET) के दोहरे उपयोग की मदों के लिए निर्यात प्राधिकार की वैध अवधि को मौजूदा 12 महीनों से बढ़ाकर 24 माह किया गया है।

(21) रक्षा, सैन्य स्टोर, एरोस्पेश और परमाणु ऊर्जा से सम्बन्धित निर्यात मदों के लिए निर्यात बाध्यता अवधि को 18 माह के बजाय अब 24 माह किया गया है।

(22) कालीकट हवाई अड्डा, केरल और अरक्कोणम आईसीडीएस, तमिलना आयात तथा निर्यात के लिए पंजीकृत पत्तनों के रूप में अधिसचित किया गया है।

(23) स्वतन्त्र चार्टर्ड इन्जीनियर से ईपीसीजी प्राधिकार के उन्मोचन हेतु प्रमाणअब आवश्यकता नहीं है।

(24) विशाखापत्तनम और भीमावरम को निर्यात उत्कष्ट टाउन के रूप में जोडा गया है।

(25) आयात का लाइसेंस पाने में सिर्फ दो दिन लगेंगे, जबकि इसमें पहले महीनों भी लग जाया करते थे। नई नीति का एक और अहम पहल यह है कि सौदों की प्रक्रियागत लागत पहले के मुकाबले काफी कम होगी।

(26) निर्यात के प्रोत्साहन में राज्यों को भी हिस्सेदार बनाया जाएगा।

(27) हालाकि विश्व व्यापार संगठन की शर्तों के मद्देनजर निर्यात सब्सिडी घटाई गई है। पर दूसरी ओर निर्यातकों को प्रोत्साहन देने के लिए कई कदम उठाए गए हैं। इस तरह नई विदेश व्यापार नीति को मेक इन इण्डिया और डिजिटल इण्डिया जैसे कार्यक्रमों से जोड़ा गया है।

प्रश्न – नेतृत्व की अवधारणा से आप क्या समझते हैं? इसकी प्रकृति की व्याख्या कीजिए और व्यवसाय प्रबन्ध में इसका महत्त्व बताइए।

What do you understand by the Concept of Leadership ? Discuss its nature and explain its importance in Business Administration. 

अथवाकिसी औद्योगिक उपक्रम की सफलता उसके नेतृत्व के गुण पर निर्भर करती है।इस कथन को स्पष्ट कीजिए।

“The success of an industrial enterprise depends upon the quality of its leadership.” Explain this statement. 

उत्तर – नेतृत्वअर्थ एवं परिभाषा 

(Leadership : Meaning and Definitions) 

“नेतृत्व से आशय व्यक्तियों के अभिप्रेरण (Motivation) से है।” नेतृत्व का सामान्य अर्थ किसी व्यक्ति-विशेष के ऐसे गुणों से है जिसके द्वारा वह समूह के उद्देश्यों एवं प्रयत्नों को एकता प्रदान करता है, सदस्यों को प्रेरणा देता है तथा उनका सफल मार्गदर्शन करता है। अच्छे नेतत्व के कारण श्रमिकों में आत्मविश्वास की भावना जाग्रत होती है तथा उनका कार्यानुराग (Morale) विकसित होता है।

इस प्रकार नेतृत्व एक कला है, जो किसी व्यक्ति-विशेष के गुणों का परिणाम है तथा दारा दसरे व्यक्तियों का मार्गदर्शन एवं उनकी क्रियाओं का संचालन किया जाता है। नेतृत्व की महत्त्वपूर्ण परिभाषाएँ निम्नलिखित हैं

(1) लिविंग्स्टन के अनुसार, “नेतृत्व प्रबन्ध का एक आन्तरिक तन्त्र तथा प्रणाली एवं नियन्त्रण एक बाह्य तन्त्र है।”

(2) बर्नार्ड के अनुसार, “नेतृत्व से आशय व्यक्ति के व्यवहार के उस गुण से है, दारा वह अन्य लोगों को संगठित प्रयास से सम्बन्धित कार्य करने हेतु मार्गदर्शन करता है।”

(3) कुण्ट्ज ओडोनेल के अनुसार, “किसी लक्ष्य की प्राप्ति हेतु सन्देशवाल माध्यम द्वारा व्यक्तियों को प्रभावित कर सकने की योग्यता नेतृत्व कहलाती है।”

(4) एल्फोर्ड तथा बीटी के अनुसार, “नेतृत्व वह गुण है जिसके द्वारा अनुयायियों के एक समूह से वांछित कार्य स्वेच्छापूर्वक एवं बिना किसी दबाव के कराए जाते हैं।”

(5) ऑर्डवे टीड के अनुसार, “नेतृत्व गुणों का वह संयोजन है, जिसके होने से कोई भी अन्य से कुछ कराने के योग्य होता है क्योंकि मुख्यत: उसके प्रभाव द्वारा वे ऐसा करने को तत्पर हो जाते हैं।”

(6) मूने तथा रेले के अनुसार, “प्रक्रिया में प्रवेश करते समय अधिकारी वर्ग जो स्वरूप धारण करता है, उसे नेतृत्व कहते हैं।’

(7) जॉर्ज आर० टेरी के अनुसार, “नेतृत्व उन व्यक्तियों का सम्बन्ध है, जिसके अन्तर्गत एक व्यक्ति अथवा नेता दूसरों को सम्बन्धित कार्यों पर स्वेच्छा से साथ-साथ कार्य करने के लिए प्रभावित करता है ताकि नेता द्वारा इच्छित आदर्शों की पूर्ति की जा सके।”

(8) ‘सामाजिक विज्ञानों का विश्वकोश‘ (Encyclopaedia of Social Sciences) के अनुसार, “नेतृत्व से आशय किसी व्यक्ति एवं वर्ग के मध्य ऐसे सम्बन्ध से है, जो कि सामान्य हित के लिए दोनों पक्ष परस्पर मिल जाते हैं तथा अनुयायियों का समूह उस व्यक्ति (अर्थात् नेता) के निर्देशानुसार ही कार्य करता है।”

नेतृत्व की विशेषताएँ

(Characteristics of Leadership) 

नेतृत्व की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

1. अन्य व्यक्तियों द्वारा अनुसरण (Follow-up by Others)-नेतृत्व की प्रथम विशेषता यह है कि नेता के आदेशों एवं निर्देशों का दूसरे व्यक्तियों द्वारा अनुसरण किया जाना चाहिए। जिस व्यक्ति के जितने अधिक अनुयायी होते हैं उसका नेतृत्व उतना ही अधिक श्रेष्ठ एवं कुशल समझा जाता है।

2. श्रेष्ठ आचरण (Good Conduct)-सामान्यतः सभी अनुयायी आदर्श नेता का आदर करते हैं। नेता केवल अगुआ ही नहीं होना चाहिए वरन् उसमें एक आदर्श व्यक्ति के विविध गुण भी होने चाहिए ताकि उसके व्यवहार एवं आचरण की सामान्य जनता भी प्रशंसा कर सके। एक श्रेष्ठ नेता ईमानदार, नि:स्वार्थी तथा परिश्रमी होना चाहिए।

3. स्वक्रियाशीलता द्वारा नेतृत्व (Leadership by Selfaction)-कुशल नेतृत्व के लिए यह भी आवश्यक है कि नेता स्वयं भी क्रियाशील हो। यदि नेता संस्था या व्यवसाय के उद्देश्यों के लिए अथक प्रयास करता है तो उसके प्रयत्नों का अनुसरणकर्ताओं पर अच्छा प्रभाव पड़ता है। कर्मचारी प्रायः अपने नेता के आचरण का अनसरण करते हैं। यदि कर्मचारियों का सानियामत समय पर कार्य पर आता है तो इसका कर्मचारियों पर अच्छा प्रभाव पड़ता है तथा वे भी नियत समय पर काम पर आने का प्रयास करते हैं।

4. हितों की एकता (Uniformity of Interests)-एक सफल नतृत्व क लिए यह भा आवश्यक है कि उसके द्वारा नेता. अनयायियों तथा संस्था के हितों में एकता स्थापित की जा सके।

5. परिस्थितियों के अनुकूल परिवर्तनशील (Flexible according to Circumstances)-नेता में परिस्थितियों के अनुसार कार्य करने की क्षमता होनी चाहिए अथात् नतृत्व परिस्थितियों के साथ परिवर्तनशील होना चाहिए। जो नेता परिस्थिति के अनसार कार्य करने की योग्यता रखते हैं उनको ही वास्तविक सफलता मिलती है।

नेतृत्व की प्रकृति

(Nature of Leadership) 

परिभाषाओं के आधार पर नेतृत्व की प्रकृति के सम्बन्ध में निम्नलिखित दो बातें स्पष्ट होती हैं

1. नेतृत्व, नेता और अनुयायी परस्पर सम्बद्ध होते हैं (Leadership, Leader and Followers are Interrelated)-प्रबन्धक नेता अपने नेतृत्व गुणों के द्वारा अनुयायियों (अन्य कर्मचारियों) को वांछित उद्देश्यों/लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए उपयुक्त दिशा प्रदान करता है और वांछित दिशा में कार्य करने के लिए प्रेरित करता रहता है।

2. नेतत्व एक गतिशील प्रक्रिया है (Leadership is a Dynamic Process)नेतृत्व एक सतत एवं गतिशील प्रक्रिया है जो उपक्रम के साथ जुड़ी हुई है। इसका अस्तित्व उपक्रम के अस्तित्व तक बना रहता है। नई-नई व्यावसायिक समस्याओं के समाधान के लिए नई नई तकनीकों की आवश्यकता होती है जिनकी खोज में नेतृत्व निरन्तर प्रयत्नशील रहता है।

व्यावसायिक प्रबन्ध में नेतृत्व का महत्त्व 

(Importance of Leadership in Business Management)

व्यावसायिक प्रबन्ध में नेतृत्व का महत्त्वपूर्ण स्थान है। व्यावसायिक प्रबन्ध में नेतृत्व एक सदायिनी शक्ति के समान है क्योंकि नेतृत्व के अभाव में प्रबन्ध की सफलता सम्भव ही नहीं है। नेतत्व प्रबन्धकीय कुशलता की कुंजी है। कहा जाता है कि प्रबन्धकीय गणों के बिना नेतृत्व तो सफल हो सकता है, परन्तु नेतृत्व के अभाव में प्रबन्धकीय सफलता असम्भव है। एक अच्छा नेता संगठन के सदस्यों को नियमित एवं नियन्त्रित कर सकता है, वांछित उद्देश्यों को साप्त करने के लिए उनका मार्गदर्शन कर सकता है और सामूहिक उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए प्रेरणा दे सकता है। सामूहिक प्रयासों को समन्वित रूप से गतिशील बनाने के लिए एक गतिशील नेतृत्व की आवश्यकता होती है ताकि वह निरन्तर बदलती हुई परिस्थितियों में अपने गुणों के द्वारा उचित सामंजस्य स्थापित करके संगठन के सदस्यों को निर्धारित उद्देश्यों के प्रति निष्ठावान् बनाए रख सके, उन्हें कार्य के प्रति अभिप्रेरित करता रहे और उनका विश्वास एवं सहयोग प्राप्त कर सके। एक कुशल नेतृत्व, संगठन के सदस्यों को न केवल वांछित उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए अभिप्रेरित करता है अपितु उनमें विश्वास एवं सद्भावना उत्पन्न करके उनका सहयोग प्राप्त करने में भी सफल हो जाता है।

प्रश्न – संयन्त्र अभिन्यास को परिभाषित कीजिए। इसके क्या उद्देश्य हैं? संयन्त्र अभिन्यास के आधारभूत सिद्धान्त बताइए।

Define Plant Layout. What are its Objectives ? Give the basic principles of Plant Layout. 

उत्तर- संयन्त्र अभिन्यास का अर्थ एवं परिभाषा

(Meaning and Definition of Plant Layout) 

संयन्त्र अभिन्यास का आशय किसी कारखाने के अन्दर मशीनों, उपकरणों, प्रक्रियाओं एवं संयन्त्र सेवाओं को उपयुक्त स्थान पर स्थापित करने की एक ऐसी विधि अथवा तकनीक से है जिसके फलस्वरूप न्यूनतम लागत पर उच्चकोटि का उत्पादन प्राप्त हो सके। एक अच्छा एवं प्रभावी संयन्त्र अभिन्यास व्यवसाय के साधनों का अनुकूलतम उपयोग सम्भव बनाता है; समय, श्रम व सामग्री की अपव्ययिता को न्यूनतम करता है तथा कर्मचारियों के आराम, सुविधा, सुरक्षा व कुशलता में वृद्धि करता है।

‘संयन्त्र अभिन्यास’ शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है-संयन्त्र (Plant) तथा अभिन्यास‘ (Layout)। ‘संयन्त्र’ से आशय उत्पादन क्रिया में सहायक विभिन्न यन्त्रों से है तथा ‘अभिन्यास’ से आशय यन्त्रों एवं मशीनों के क्रम निर्धारण से है। अत: ‘संयन्त्र अभिन्यास’ से आशय उत्पादन प्रक्रिया में सहायक यन्त्र, मशीन, श्रम तथा सामग्री को कारखाना-भवन में इस प्रकार समायोजित करने से है कि न्यूनतम लागत पर अधिकतम उत्पादन किया जा सके। दूसरे शब्दों में; इसका आशय मशीनों, यन्त्रों एवं अन्य सहायक साज-सामान तथा सुविधाओं को एक पूर्व-नियोजित विधि द्वारा उपयुक्त स्थानों पर एक निर्धारित क्रम में स्थापित करने से है।

संयन्त्र अभिन्यास की प्रमुख परिभाषाएँ निम्नलिखित हैं

(i) मल्लिक एवं गॉड्रयू के अनुसार, “संयन्त्र अभिन्यास से आशय मशीनों एव साज-सज्जा को सर्वोत्तम स्थान पर लगाने की एक योजना से है, जिसके अन्तर्गत पदार्थों का न्यूनतम लागत पर शीघ्र से शीघ्र बहाव, पदार्थों के विधायन तथा कच्चे माल की प्राप्ति से लेकर निर्मित वस्तुओं का बाहर भेजना न्यूनतम रखरखाव से सम्भव हो सके।”

(ii) क्लाउड एस० जॉर्ज के अनुसार, “व्यापक अर्थ में संयन्त्र या सुविधा अभिन्यास सम्पूर्ण प्रणाली का एक अंग है। इसके अन्तर्गत भवन की बुनियादी डिजाइन से लेकर काये-पीठ का स्थान और गतिविधियाँ सम्मिलित हैं। यह उत्पादन नियोजन, रखरखाव, सामग्री-हस्तन और संगठन का एक एकीकृत हिस्सा है।”

(iii) जम्स लुण्डी के शब्दों में “संयन्त्र अभिन्यास में स्थान विभाजन एवं मशीनों की ऐसी आदर्श व्यवस्था सम्मिलित है जिससे कुल परिचालन लागतें न्यूनतम होती हैं।”

(IV) जाज आर० टेरी के अनसार, “संयन्त्र अभिन्यास किसी फैक्टी में मशीनों कार्य-क्षेत्रों और सेवा क्षेत्रों की व्यवस्था है।”

(v) एफ० जी० मूरे के अनुसार, “मशीनों एवं सुविधाओं की कोई भी व्यवस्था संयन्त्र अभिन्यास है।”

(vi) एम० सी० शुक्ला के अनुसार, “संयन्त्र अभिन्यास एक ऐसी तकनीक है जिसमें कारखाने के भीतर मशीन, प्रक्रियाओं तथा संयन्त्र सेवाओं की इस प्रकार स्थापना की जाती है ताकि उच्च गुणों वाला अधिकतम सम्भव उत्पादन न्यूनतम लागत पर प्राप्त किया जा सके।

(vii) प्रो० आर०सी० डेविस के अनुसार, “संयन्त्र अभिन्यास भौतिक दशाओं एवं मशीन, उपकरण तथा कार्यों के बीच सम्बन्धों के नियोजन और संगठन की क्रिया है जो उत्पादन मितव्ययिता एवं प्रभावोत्पादकता की एक सन्तोषजनक मात्रा को सम्भव बनाती है।”

(viii) मॉरिस ई० हर्ले के अनुसार, “संयन्त्र अभिन्यास; भवन साज-सज्जा तथा उत्पादन क्रियाओं के मध्य भौतिक सम्बन्धों का विकास करना है जिससे निर्माणी प्रक्रिया को अधिक कार्यक्षमता के साथ चलने योग्य बनाया जा सके।”

(ix) स्त्रीगल एवं लेन्सबर्ग के अनुसार, “संयन्त्र अभिन्यास यन्त्रों, प्रविधियों एवं अन्य सेवा सविधाओं की किसी कारखाने में व्यवस्था करने की ऐसी तकनीक है जिसके द्वारा न्यूनतम लागत पर अधिकतम उत्पादन प्राप्त किया जा सके।”

(x) एमरीन, रिकी तथा हुली के अनुसार, “संयन्त्र अभिन्यास किसी उत्पाद के निर्माण के लिए भौतिक सुविधाओं का दृश्य प्रस्तुतीकरण है।’

(xi) जॉन ए० शुबिन के अनुसार, “उत्पादों के निर्माण अथवा उपभोक्ताओं की माँग की पूर्ति में क्षमता प्राप्त करने के उद्देश्य से उत्पादन करने वाली मशीनों के कार्य, केन्द्रों तथा सहायक सुविधाओं की व्यवस्था करना ही संयन्त्र अभिन्यास है।”

उचित परिभाषा – “संयन्त्र अभिन्यास एक ऐसा समायोजन है जिसके अन्तर्गत उत्पादन के लिए आवश्यक मशीनों, उपकरणों, प्रविधियों, सामग्री एवं कार्य-स्थलों तथा सहायक सेवाको जैसे भण्डारण, निरीक्षण, सामग्री हस्तन, रखरखाव, परिवहन आदि को कारखाने के लिए पलब्ध स्थान में इस प्रकार नियोजित किया जाता है जिससे उत्पादन लागत न्यनतम की जा

सके तथा उत्पादन के प्रत्येक साधन की उत्पादकता में वृद्धि हो सके, जिससे उत्पादक तथा उपभोक्ता दोनों को लाभ हो।”

संयन्त्र अभिन्यास के उद्देश्य

(Objectives of Plant Layout) 

आर० सी० डेविस ने आदर्श संयन्त्र अभिन्यास के चार उद्देश्य बताए हैं

(1) न्यूनतम लागत पर अधिकतम एवं उत्तम कोटि का उत्पादन करना। 

(2) उपभोक्ताओं को सन्तोषजनक सेवाएँ प्रदान करना। 

(3) कर्मचारियों के लिए सन्तोषजनक कार्यदशाएँ प्रदान करना तथा दुर्घटनाओं को रोकना।

(4) चालू एवं स्थायी सम्पत्तियों का सर्वोत्तम उपयोग करना।

रिचर्ड जे० होपमेन ने एक उत्तम संयन्त्र अभिन्यास के निम्नलिखित आठ प्रमुख उद्देश्य बताए हैं

(1) सामग्री स्थल को न्यूनतम करना ताकि श्रम एवं समय का अपव्यय रोका जा सके। 

(2) कर्मचारियों के स्वास्थ्य एवं सुरक्षा को प्रभावित करने वाले जोखिमों में कमी करना।

(3) पूर्व-निर्धारित उत्पादन अनुसूची के अनुसार उत्पादन को सम्भव बनाने के लिए उत्पादन प्रक्रिया को सन्तुलित करना

(4) कर्मचारियों के मनोबल में वृद्धि करना। 

(5) उपलब्ध स्थान का अधिकतम उपयोग करना। 

(6) मशीनी हस्तक्षेप को कम करना।

(7) न्यूनतम लागत पर बिना हेर-फेर एवं असुविधा के आवश्यक समायोजनों एवं संसाधनों को सम्भव बनाना।

(8) श्रम शक्ति का प्रभावपूर्ण उपयोग करना। 

डॉ० क्लाउड एस० जॉर्ज ने एक आदर्श अभिन्यास के निम्नलिखित उद्देश्य बताए हैं

(1) उत्पादन लागतों में कमी करना। 

(2) उत्तम कोटि की वस्तुएँ उत्पादित करना। 

(3) ग्राहकों को उत्तम सेवाएँ प्रदान करना। 

(4) कर्मचारियों की सुरक्षा में वृद्धि करना। 

(5) पुँजीगत विनियोग को कम करने का प्रयास करना। 

(6) संस्थान की लोचशीलता में वृद्धि करना। 

(7) कारखाने में भूमि-तल (Floor Space) का सही ढंग से उपयोग करना। 

(8) कच्चे माल के अपव्यय को रोकना। 

(9) कर्मचारियों के मनोबल में वृद्धि करना। 

(10) कच्चे माल एवं सुविधाओं का सर्वोत्तम उपयोग करना।

(11) कार्य में होने वाली देरी तथा बाधाओं को कम करना। 

(12) नियन्त्रण एवं निरीक्षण में सुधार करना। 

(13) अर्द्ध-निर्मित माल की मात्रा में कमी करना। 

(14) श्रम शक्ति का अधिक प्रभावशाली उपयोग करना। 

(15) निर्माण चक्रों (Production Cycles) में कमी लाना। 

(16) मरम्मत कार्य को अधिक सुविधाजनक बनाना। 

(17) भीड़-भाड़ वाले स्थानों की संख्या में कमी लाना।

संयन्त्र अभिन्यास के आधारभूत सिद्धान्त

(Basic Principles of Plant Layout) 

प्रो० मैक्नॉटन (McNaughton) के अनुसार, “संयन्त्र अभिन्यास ऐसा होना चाहिए कि वह स्थान, प्रक्रिया, सेविवर्ग एवं नीति सम्बन्धी आवश्यकताओं की पूर्ति कर सके।”

वी०पी०एस० पनन्दीकर ने एक अच्छे संयन्त्र अभिन्यास के निम्नलिखित सात सिद्धान्त बताए हैं

(1) कार्यक्षेत्र न्यूनतम एवं सीमित हो। 

(2) उपलब्ध स्थान का उचित उपयोग किया जाए। 

(3) एक कार्य प्रणाली से दूसरी कार्य प्रणाली में माल के सीधा पहुँचाने की व्यवस्था हो। 

(4) आवश्यक सुविधाओं की उपयुक्त व्यवस्था हो। 

(5) पुनर्व्यवस्था के लिए पूँजी की उपलब्धता को बनाए रखा जाए। (6) माल व मनुष्यों को लाने-ले जाने की पर्याप्त व्यवस्था हो। 

(7) कार्य की दशाओं एवं सुरक्षा को पूर्ण रूप से ध्यान में रखा जाए।

प्रो० मूथर (Muther) ने संयन्त्र अभिन्यास के छह प्रमुख सिद्धान्त बताए हैं, जो निम्नानुसार हैं

(1) न्यूनतम लागत पर अधिकतम उत्पादन प्राप्त करने के लिए उत्पादन के विभिन्न साधनों में उपयुक्त एकीकरण एवं समन्वय होना चाहिए।

(2) संयन्त्र अभिन्यास के अन्तर्गत पदार्थों की उठा-धरी न्यूनतम दूरी के लिए होनी चाहिए ताकि आन्तरिक परिवहन लागत कम हो जाए।

(3) उत्पादन क्रिया बिना किसी अवरोध के चलती रहे।

(4) संयन्त्र के लिए उपलब्ध समस्त स्थान का प्रभावपूर्ण तथा मितव्ययितापूर्ण उपयोग हो।

(5) मशीनों एवं उपकरणों का समायोजन इस प्रकार हो कि श्रमिकों की अधिकतम सरक्षा बनी रहे और उनको अधिकतम सन्तोष का अनुभव हो।

(6) मशीनों एवं उपकरणों का समायोजन करते समय इस तथ्य को ध्यान में रखा जाए कि यदि आवश्यक हो तो संयन्त्र अभिन्यास में परिवर्तन आसानी से किया जा सके।

अन्य सिद्धान्त – प्रो० मूथर द्वारा बताए गए उपर्युक्त सिद्धान्तों के अलावा निम्नलिखित बातों या सिद्धान्तों को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए

(i) संयन्त्र अभिन्यास के अन्तर्गत वायु, जल, विद्युत एवं गैस, अग्नि बुझाने वाले यन्त्रों आदि की उपयुक्त व्यवस्था होनी चाहिए।

(ii) अभिन्यास ऐसा होना चाहिए जिससे कोई मशीन बेकार न रहे तथा अर्द्ध-निर्मित माल एक जगह अनावश्यक मात्रा में एकत्रित न होने पाए।

(iii) संयन्त्र अभिन्यास ऐसा होना चाहिए जिससे सम्पूर्ण संयन्त्र के पर्यवेक्षण तथा नियन्त्रण में सुविधा मिले।

(iv) अभिन्यास ऐसा होना चाहिए कि उपलब्ध संसाधनों का अनुकूलतम उपयोग हो ताकि न्यूनतम लागत पर अधिकतम उत्पादन सम्भव हो।

(v) संयन्त्र के लिए अनावश्यक पूँजी खर्च न हो।

प्रश्न – उद्यमिता के विकास में सामाजिक-आर्थिक पर्यावरण के योगदान का संक्षेप में वर्णन कीजिए।

Describe in brief the role of Socio-economic Environment in the Development of Entrepreneurship. 

अथवा उद्यमिता एवं आर्थिक पर्यावरणपर एक लेख लिखिए।

Write a note on ‘Entrepreneurship and Economic Environment. 

अथवाउद्यमिता एक पर्यावरण-प्रधान क्रिया है।समझाइए और बतलाइए कि आर्थिक पर्यावरण किस प्रकार उद्यमिता के विकास में सहायता करता है।

“Entrepreneurship is an environment-oriented activity.” Elucidate and discuss how Economic Environment helps in Development of Entrepreneurship. 

उत्तर – उद्यमिता का अर्थ

(Meaning of Entrepreneurship) 

उद्यमिता जीवन का एक आधारभूत एवं आवश्यक अंग है। इसके माध्यम से ही व्यक्ति का सम्पर्ण सामाजिक एवं आर्थिक विकास सम्भव होता है। सामान्य शब्दों में उद्यमिता से आशय उस प्रवृत्ति, योग्यता अथवा क्षमता से है, जिसके द्वारा व्यवसायी व्यवसाय में निहित विभिन्न प्रकार की अनिश्चितताओं एवं जोखिमों को वहन करते हुए अपने व्यवसाय का संचालन करता है। इस प्रकार उद्यमिता उद्यमी की वह क्षमता है जिसके द्वारा वह उत्पादन के विभिन्न साधनों-भूमि, श्रम, पूँजी को संयोजित करता है तथा उनका अनुकूलतम अनुपात म उत्पादन हेतु प्रयोग करता है। जी० ई० स्टेपनेक के अनुसार, “उद्यमिता किसी उपक्रम में जोखिम उठाने की क्षमता, संगठन की योग्यता तथा विविधीकरण एवं नवप्रवर्तनों को जन्म देन की इच्छा है।”

सामाजिक पर्यावरण का अर्थ

(Meaning of Social Environment) 

व्यवसाय एक सामाजिक संस्था है. अतः इस पर सामाजिक पर्यावरण का व्यापक प्रभाव पडता है। सामाजिक पर्यावरण सामाजिक मूल्यों, विश्वास, रीति-रिवाज, शिक्षा, बौद्धिक स्तर, धर्म, संस्कृति आदि से मिलकर बनता है। व्यवसाय अथवा उद्योग वा उपेक्षा नहीं की जा सकती। व्यवसाय स्वयं में समाज का अंग है और व्यवसाय का उदय के सदस्यों को वस्तएँ एवं सेवाएं प्रदान कर उनकी आवश्यकताओं को सन्तुष्ट करना होता ९२० प्रकार सामाजिक पर्यावरण व्यवसाय को प्रभावित करता है और व्यवसाय से प्रभावित भा होता है।

आर्थिक पर्यावरण का अर्थ

(Meaning of Economic Environment) 

आर्थिक पर्यावरण में आर्थिक प्रणाली, आर्थिक दशाओं तथा आर्थिक नीतियों को सम्मिलित किया जाता है। आर्थिक दशाएँ किसी भी व्यवसाय की व्यूह-रचना के निर्माण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। आय, उपभोग, बचत, रोजगार और माँग व्यवसाय के आर्थिक क्रिया-कलापों का निर्धारण करते हैं। राजकोषीय, मौद्रिक एवं व्यापार नीतियाँ व्यवसाय की दिशा को निर्धारित करती हैं तथा आर्थिक पद्धतियाँ व्यावसायिक पर्यावरण का निर्माण करती हैं।

उद्यमिता एवं आर्थिक पर्यावरण

 (Entrepreneurship and Economic Environment) 

उद्यमिता के विकास में आर्थिक पर्यावरण की उल्लेखनीय भूमिका होती है। वे सभी शक्तियाँ एवं घटक उद्यमिता के आर्थिक पर्यावरण का निर्माण करते हैं, जो उद्यमिता की कार्य-प्रणाली को सीधे प्रभावित करते हैं। स्टर्डीवण्ट (Sturdivant) के शब्दों में “आर्थिक पर्यावरण से आशय सामान्यत: उन बाह्य शक्तियों से होता है जो उद्यमिता को प्रत्यक्षतः आर्थिक रूप से प्रभावित करती हैं।” आर्थिक पर्यावरण पर प्रभाव डालने वाले प्रमख घटक दल प्रकार हैं

1.देश की आर्थिक प्रणाली (Economic System of a Country)-किसी भी देश की आर्थिक प्रणाली समाजवादी, पूजीवादी अथवा मिश्रित-कोई भी हो सकती प्रणालियाँ देश में उद्यमिता के विकास को विभिन्न रूपों में प्रभावित करती हैं। मिश्रित प्रणाली में उद्यमिता के विकास के लिए अधिक प्रेरणाएं होती हैं। अत: इस प्रणाली में विकास की अधिक सम्भावनाएँ होती हैं।

2. आर्थिक विकास की दशा (State of Economic Development)-विकसित अर्थव्यवस्था में व्यावसायिक, बैंकिंग एवं वित्तीय संस्थाएं विकसित अवस्था में होती हैं अतः उद्यमिता का विकास तीव्र गति से होता है। इसके विपरीत, विकासशील अथवा अलदेशों में उद्यमिता विकास के मार्ग में अनेक आर्थिक कठिनाइयाँ एवं बाधाएं आती हैं।

3. आर्थिक उच्चावचन (Economic Fluctuations)-व्यापार-चक्र आर्थिक पर्यावरण को व्यापक रूप से प्रभावित करते हैं। मन्दी की स्थिति में आर्थिक जगत् मन्दी की चपेट में आ जाता है, जिससे उद्यमिता विकास हतोत्साहित होता है और उसे अनेक चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। इसके विपरीत, स्फीतिकाल में देश आर्थिक रूप से समृद्ध होता है और उद्यमिता विकास को प्रोत्साहन मिलता है।

4. देश का आर्थिक ढाँचा (Economic Infrastructure of the Country)देश के आर्थिक ढाँचे से आशय कृषि, उद्योग, बचत, निवेश, राष्ट्रीय आय, आय का वितरण, वाणिज्य एवं व्यापार से है। जिस देश में ये सभी घटक विकसित (उच्च) अवस्था में होते हैं, वहाँ उद्यमिता प्रोत्साहित होती है। इनके अभाव में उद्यमिता के विकास के लिए आर्थिक पर्यावरण पिछड़ जाता है।

5. सरकारी हस्तक्षेप (Government Intervention)-सरकार आर्थिक नीतियों एवं सन्नियमों द्वारा उद्यमीय पर्यावरण का नियमन करती है। औद्योगिक नीति, व्यापार नीति, आयात-निर्यात नीति तथा राजकोषीय व मौद्रिक नीतियों द्वारा सरकार व्यावसायिक क्रियाओं के लिए दिशा-निर्देश जारी करती है, जबकि बैंकिंग अधिनियम, कम्पनी अधिनियम, मजदूरी अधिनियम, श्रम सन्नियमों द्वारा उद्यमीय पर्यावरण को नियमित एवं नियन्त्रित करती है।

6. बचत, निवेश एवं पूँजी निर्माण (Saving, Investment and Capital Formation)-व्यवसाय के लिए प्रथम आवश्यकता पूँजी जुटाने की है। बचत पूँजी का महत्त्वपूर्ण स्रोत होती है और लाभ की सम्भावना निवेश को प्रोत्साहित करती है। जिस देश में बचत व पूँजी निर्माण की दर उच्च होती है, मुद्रा एवं पूँजी बाजार विकसित एवं सुदृढ़ होता है तथा निवेश प्रेरणाएँ उपलब्ध होती हैं, उस देश का आर्थिक पर्यावरण उद्यमिता विकास के अनकल होता है। इसकी विपरीत दशा में, उद्यमीय पर्यावरण पिछड़ा एवं अविकसित रहता है।

7. ग्राहक एवं आपूर्तिकर्ता (Customers and Suppliers)-प्रत्येक उत्पादक को उत्पादन के लिए विभिन्न प्रकार की आदाओं-श्रम, कच्चा माल, मशीनें, उपकरण, शक्ति व वित्त की आवश्यकता होती है। इनके अभाव में वस्तु अथवा सेवा का उत्पादन सम्भव नहीं है। इनकी अबाध आपूर्ति व्यावसायिक पर्यावरण में उद्यमिता विकास को प्रोत्साहित करती है। इसके अतिरिक्त उत्पादित वस्तुओं की बिक्री के लिए ग्राहक (उपभोक्ता) और विक्रेता की भी आवश्यकता होती है। विक्रय नीति, माल की किस्म, विज्ञापन एवं प्रचार, उपभोक्ताओं की क्रय-शक्ति, आदतें एवं फैशन-ये सभी उद्यमिता विकास को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करते हैं।

8. अन्य देशों की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता (Competitive Capacity of Other Countries)-प्रत्येक संस्था को बाजार में अन्य संस्थाओं से प्रतिस्पर्धा करनी पड़ती है। प्रतिस्पर्धी संस्थाओं द्वारा उत्पादित वस्तुओं की मात्रा, स्थानापन्न वस्तुओं की उपलब्धि, उत्पादित वस्तुओं की गुणवत्ता, मूल्य एवं विश्वसनीयता आदि सभी उद्यमिता विकास को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करते हैं। यदि प्रतिस्पर्धी फर्मों द्वारा उत्पादित वस्तुओं की गुणवत्ता श्रेष्ठ और मूल्य कम है तो निश्चित रूप से उद्यमिता हतोत्साहित होगी।

9. श्रम संघों की भूमिका (Role of Trade Unions)–श्रम आथिक पयावर का सजीव घटक है। अतः श्रम की पूर्ति, उसकी शारीरिक व मानसिक कार्यक्षमता, मजदूरी का दर एवं उत्पादकता, श्रम-प्रबन्ध सम्बन्ध एवं उद्योग क्षेत्र में श्रम संघ की भूमिका आदि सभी पटक उद्यमीय पर्यावरण को प्रभावित करते हैं।

10. बराजगारा (Unemployment)-बेरोजगारी एक ओर मजदूरी की दर को कम करके उत्पादन लागत को घटाती है तो दसरी ओर प्रभावी माँग को कम करक आत उत्पादन की स्थिति को उत्पन्न करती है। इस प्रकार बेरोजगारी की दर आर्थिक पयावरण का प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करती है।

उद्यमिता एवं सामाजिक पर्यावरण 

(Entrepreneurship and Social Environment) 

मूल्य, विश्वास, रीति-रिवाज, शिक्षा, संस्कृति एवं परम्पराएँ सामाजिक पर्यावरण का निर्माण करते हैं। समृद्ध एवं प्रगतिशील सामाजिक पर्यावरण उद्यमिता को तेजी से प्रोत्साहित करता है, जबकि रूढ़िवादी एवं परम्परागत सामाजिक पर्यावरण उद्यमिता विकास में बाधक बनता है। सामाजिक पर्यावरण को प्रभावित करने वाले प्रमुख घटक निम्नलिखित हैं

1. शैक्षिक स्तर (Educational Level)-देश के निवासियों का शैक्षिक स्तर उद्यमीय पर्यावरण को अत्यधिक प्रभावित करता है। यदि नागरिकों का शैक्षिक स्तर उच्च है तो देश में उत्पादन की नई-नई प्रविधियों का विकास होगा जो उद्यमीय पर्यावरण के अनुकूल होगा।

2. सामाजिक सुरक्षा उपाय (Social Security Measures)-समाज की सुरक्षा आवश्यकताएँ भी उद्यम के सामाजिक पर्यावरण को प्रभावित करती हैं; जैसे—यदि सरकार द्वारा प्रदत्त सुरक्षा सुविधाएँ प्रभावी नहीं हैं तो. निवासी स्वयं अपनी सुरक्षा के लिए ऐसे उत्पादों को क्रय करेंगे जो उन्हें सुरक्षा प्रदान करते हों। इसके फलस्वरूप उद्यमी अधिक उत्पादन के लिए प्रोत्साहित होंगे।

3. जीवन के सम्बन्ध में दृष्टिकोण (Life Approach)-समाज का जीवन के प्रति दृष्टिकोण भी उद्यम के सामाजिक पर्यावरण को प्रभावित करता है; जैसे-जो लोग भविष्य के लिए अधिक चिन्तित नहीं होते और सप्ताह के अन्तिम दिन मौज-मस्ती में बिताना अधिक पसन्द करते हैं. उन लोगों के निवास-क्षेत्रों में पर्यटन स्थलों का तेजी से विकास होता है।

4. स्वास्थ्य जागरूकता (Health Consciousness)-यदि देश के निवासियों में स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता है तो वे ऐसे उत्पादों को नकार देंगे जो स्वास्थ्य पर प्रतिकल प्रभाव डालते हैं, किन्त यदि देश के निवासी स्वास्थ्य के प्रति जागरूक नहीं हैं तो दीर्घकाल में हानिकारक उत्पादों की बिक्री पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा, जिसके फलस्वरूप सामाजिक विकृतियाँ उत्पन्न होंगी।

5.जनसंख्या वृद्धि दर (Rate of Population Growth)-देश में जनसंख्या वृद्धि र का भी उद्यम के सामाजिक पर्यावरण पर प्रभाव पड़ता है। जनसंख्या में वृद्धि की दर अधिक होने पर देश में अल्पकाल में उत्पाद की बिक्री में वृद्धि होती है, किन्तु दीर्घकाल में जीवन-स्तर, स्वास्थ्य सुविधाओं, शिक्षा व आय आदि पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है जिसके कारण उद्यम-क्षेत्र भी दुष्प्रभावित होता है।

6. जनसंख्या में आयु वितरण (Age Distribution)-देश की जनसंख्या में आयु के अनसार निवासियों का वर्गीकरण भी उद्यम के सामाजिक पर्यावरण को प्रभावित करता है। कार्यशील जनसंख्या के प्रतिशत में कमी उद्यमिता विकास को हतोत्साहित करती है।

7. संस्कृति (Culture)-संस्कृति समाजशास्त्रीय परिवेश का एक महत्त्वपूर्ण अंग है। संस्कृति व्यक्तियों के दृष्टिकोण एवं मानसिक विकास की व्याख्या करती है। सांस्कृतिक संरचना का उद्यमीय निर्णयों पर गहरा प्रभाव पड़ता है।

8. आय वितरण (Income Distribution)-समाज में आय का वितरण उद्यम के सामाजिक पर्यावरण को प्रभावित करता है। यदि समाज में आय का वितरण समान है तो समाज के भिन्न वर्गों से उद्यमी सामने आएँगे, किन्तु यदि समाज में आय का वितरण समान नहीं है तो वर्ग-संघर्ष का उदय होगा एवं उद्यमी वर्ग भी उच्च वर्ग से ही होगा। 

9. अन्य घटक – उपर्युक्त घटकों के अतिरिक्त निम्नलिखित घटक भी सामाजिक पर्यावरण को प्रभावित करते हैं

(i) पुरुष व स्त्रियों का समाज में योगदान बराबर होने पर महिला उद्यमीय क्षमता विकसित होती है।

(ii) जीवन-स्तर ऊँचा होने का उद्यमीय वातावरण पर अनुकूल प्रभाव पड़ता है। 

(iii) फैशन में निरन्तर परिवर्तन उद्यमिता विकास को प्रोत्साहित करते हैं।

(iv) देश के नागरिकों की जातिगत संरचना एवं सामाजिक कठोरता उद्यमीय क्षमता को कम करती है।

(v) विदेशी उत्पादों व सेवाओं के प्रति जनता की उपेक्षा देश के उद्यमिता विकास पर अनुकूल प्रभाव डालती है।

(vi) अच्छे सामाजिक मूल्य उद्यमिता विकास को प्रोत्साहित करते हैं। 

(vii) स्थापित प्रथाएँ एवं परम्पराएँ उद्यमिता का मार्गदर्शन करती हैं।

(viii) परिवर्तनों को अपनाने एवं जोखिम उठाने की सकारात्मक भावना उद्यमिता विकास के अनुकूल होती है।

संक्षेप में, उद्यमिता विकास में समाजार्थिक पर्यावरण की अहम भूमिका होती है। यह पर्यावरण जितना सरल, सशक्त, समृद्ध एवं सन्तुलित होता है, उद्यमिता का विकास उतनी ही तेजी से सम्भव होता है। इसके विपरीत दशा में उद्यमिता विकास अवरुद्ध होता है।

प्रश्न – उद्यमिता विकास कार्यक्रम की भमिका और प्रासंगिकता की विवचना कीजिए।

Explain the role & relevance of an Entrepreneurial development programme (EDP). 

उत्तर – उद्यमिता विकास कार्यक्रम 

(Entrepreneurial Development Programme) 

अर्थ-उद्यमिता विकास शब्द, दो शब्दों से मिलकर बना है-‘उद्यमिता एव ‘विकास’, जिसका शाब्दिक अर्थ है ‘उद्यमिता की वत्ति का उत्तरोत्तर विकास’। अतः कहा जा सकता है कि उद्यमिता विकास कार्यक्रम एक ऐसा प्रयास है जिसके द्वारा किसी व्यक्ति में उद्यमिता का वृत्ति का विकास किया जा सके, उसे उद्यमिता का मार्ग अपनाने के लिए प्रेरित किया जा सके तथा उसकी आन्तरिक शक्तियों का विकास किया जा सके ताकि वह एक सफल उद्यमी बन सके। इन कार्यक्रमों द्वारा शिक्षण और प्रशिक्षण प्रदान कर उसकी क्षमताओं को परिमार्जित किया जाता है तथा उसे बौद्धिक, तकनीकी एवं वैचारिक क्षमताओं से सम्पन्न बनाया जाता है।

परिभाषा-प्रो० उदय पारीक एवं मनोहर नादकर्णी के शब्दों में, “व्यावहारिक दृष्टिकोण से उद्यमिता के विकास से आशय उद्यमियों के विकास तथा उद्यमिता श्रेणी में व्यक्तियों के प्रवाह को प्रोत्साहित करने से है।” –

प्रो० पारीक एवं नादकर्णी के विचारों के अनुसार, उद्यमियों के विकास से तात्पर्य देश में उद्यमिता की पूर्ति को निर्धारित करने वाले घटकों को प्रभावित करने से है।

अत: संक्षेप में कहा जा सकता है कि वह कार्यक्रम जो उद्यमी को अपना उद्यम लगाने के उद्देश्यों को पूरा करने में इस प्रकार सहायक हो कि उद्यमी अपने सामाजिक कर्तव्यों का भली-भाँति निर्वाह कर सके, उद्यमिता विकास कार्यक्रम कहलाता है।

उद्यमिता विकास कार्यक्रम की विशेषताएँ 

[Characteristics of Entrepreneurial Development

Programme (EDP)] 

उद्यमिता विकास कार्यक्रम की निम्नलिखित विशेषताएँ हैं

(1) उद्यमिता विकास कार्यक्रम व्यक्ति में उद्यमिता की इच्छा उत्पन्न करता है। 

(2) यह कार्यक्रम नए व्यवसाय को शुरू करने का मार्ग प्रशस्त करता है। 

(3) ऐसा कार्यक्रम लाभार्थियों को उद्यमी बनने की ओर अग्रसर करता है। .

(4) यह कार्यक्रम लाभार्थियों की क्षमताओं का मूल्यांकन कर उन्हें परिमार्जित करता है।

(5) ये कार्यक्रम उद्यमी को उत्प्रेरित करते हैं तथा व्यक्ति के उद्यमिता व्यवहार को गतिशील बनाते हैं।

(6) ये कार्यक्रम लघु एवं कुटीर उद्योगों को प्रोत्साहित करते हैं। 

(7) ये कार्यक्रम स्वरोजगार को प्रोत्साहन देते हैं।

(8) ये कार्यक्रम व्यक्ति को नव-उद्यमी में और नव-उद्यमी को सफल उद्यमी में । परिवर्तित करने का प्रयास करते हैं।

(9) ऐसे समस्त कार्यक्रम मानव संसाधन के विकास के महत्त्वपूर्ण उपादान हैं।

उद्यमिता विकास कार्यक्रम की भूमिका और प्रासंगिकता 

[Role and Relevance of an Entrepreneurial

Development Programme (EDP)] 

उद्यमिता विकास कार्यक्रम ने देश के चहुमुखी विकास के लिए महत्त्वपूर्ण कार्य किया है। इनके माध्यम से विभिन्न क्षेत्रों में उद्यमिता के अवसरों का सृजन हुआ है। उद्यमिता विकास कार्यक्रम के महत्त्व को निम्न रूप में प्रकट किया जा सकता हैI. 

I. आर्थिक भूमिका 

(Economic Role)

उद्यमिता विकास कार्यक्रम का मूल आधार ही आर्थिक है। इसके फलस्वरूप नए-नए उद्यमियों का निर्माण होता है, रोजगार के नए-नए अवसर सृजित होते हैं और आर्थिक विकास की दर तीव्र होती है। उद्यमिता विकास कार्यक्रम का आर्थिक महत्त्व निम्नवत् है

(1) राष्ट्र की सकल उत्पादन क्षमता बढ़ती है और राष्ट्रीय आय तथा प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि होती है।

(2) स्वरोजगार को प्रोत्साहन मिलता है जिससे बेरोजगारी की दर में कमी आती है। 

(3) देश के राजस्व में वृद्धि होती है।

(4) नवीन उत्पादन से उपभोक्ताओं को अधिकाधिक वस्तुएँ एवं सेवाएँ उपभोग के लिए उपलब्ध होती हैं।

(5) पूँजी निर्माण की दर में वृद्धि होती है। 

(6) विपणन एवं वितरण की दशाओं में सुधार होता है।

(7) आर्थिक विकास की दर तीव्र गति से आगे बढ़ती है। 

II. सामाजिक भूमिका

(Social Role)

उद्यमिता विकास कार्यक्रम एक स्वस्थ एवं श्रेष्ठ समाज के निर्माण का मार्ग प्रशस्त करते हैं। उद्यमिता विकास कार्यक्रमों का सामाजिक महत्त्व निम्नवत है

(1) सामाजिक जड़ता समाप्त होती है और समाज में स्पन्दन आता है।

(2) जातिगत रूढ़िवादी सोच समाप्त होती है और सामाजिक समरसता प्रकट होने लगती है।

(3) संकीर्णता समाप्त होने के कारण सोच व्यावसायिक होने लगती है।

(4) एक स्वस्थ, सबल और सजग समाज की ठोस आधारशिला तैयार होता है। 

III. मनोवैज्ञानिक भूमिका

(Psychological Role) 

उद्यमिता विकास कार्यक्रम का मनोवैज्ञानिक महत्त्व निम्नवत् है

(1) ये कार्यक्रम एक स्वस्थ रचनात्मक एवं गत्यात्मक मनोविज्ञान को जन्म दकर सकारात्मक सोच (Positive Attitude) उत्पन्न करते हैं।

(2) ऐसे कार्यक्रम अकर्मण्य लोगों और कार्य के प्रति लगन न रखने वालों को भी काय करने के लिए प्रेरित करते हैं।

(3) ऐसे कार्यक्रम व्यक्ति की हताशा, निराशा और अन्य नकारात्मक (Negative) प्रकार की सोच को समाप्त कर उसे भविष्य के प्रति आशान्वित बनाते हैं।

प्रश्न – निर्यात संवर्द्धन तथा आयात प्रतिस्थापन में उद्यमी के योगदान का वर्णन कीजिए।

Describe the role of entrepreneur in ‘Export promotion and Import substitution’. 

उत्तर – निर्यात समृद्धि एवं आयात प्रतिस्थापन में उद्यमी की भूमिका 

(Role of Entrepreneur in Export Promotion and Import Substitution) 

देश की उन्नति एवं समुचित आर्थिक विकास के लिए आवश्यक है कि अधिक-से अधिक विदेशी मुद्रा अर्जित की जाए। विशेषत: विकासशील देशों के लिए विदेशी मुद्रा अर्जन और अधिक महत्त्वपूर्ण हो जाता है। इसके लिए सरकार द्वारा समय-समय पर अपनी नीतियों एवं योजनाओं को निर्यात समृद्धि (संवर्द्धन) एवं आयात प्रतिस्थापन के सन्दर्भ में । और अधिक उदार बनाने का प्रयत्न किया जाता रहा है। आयात-निर्यात व्यापार को बढावा देने के लिए भारत सरकार विभिन्न प्रेरणादायक योजनाओं के माध्यम से उद्योगपतियों को निरन्तर प्रोत्साहित करने का प्रयास करती रहती है। देश के समुचित आर्थिक विकास में उद्योगपति एवं उद्यमियों की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। आयात-निर्यात व्यापार में भी उद्यमी की भमिका अग्रणीय (Leading) हो गई है। अनेक विकसित देश अमेरिका, फ्रांस, जापान एवं जर्मनी इसके उदाहरण हैं कि राष्ट्रीय आर्थिक प्रगति के साथ-साथ विदेशी बाजारों में इन राष्ट्रों के उद्यमियों द्वारा आधिपत्य स्थापित किया गया। अनेक विकासशील राष्ट्र आर्थिक समृद्धि के साथ-साथ अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार में अपनी हिस्सेदारी अपने देश के उद्यमियों के कारण ही बढ़ाने में सक्षम हुए। भारतीय उद्यमियों ने भी नवप्रवर्तन, अधिक जोखिम, उच्च तकनीक, घरेलू संसाधनों पर निर्भर उद्योगों की स्थापना कर स्वतन्त्रता के पश्चात् एक महत्त्वपूर्ण पहल की है।

संक्षेप में निर्यात समृद्धि एवं आयात प्रतिस्थापन में उद्यमी की भमिका को निम्नांकित बिन्दओं द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है

1. कटीर उद्योगों के उत्पादों का निर्यात (Export of Small Scale Industry Product)-भारतीय उद्यमियों द्वारा देश के विभिन्न भागों में स्थित लघु एवं कुटीर उद्योगों के उत्पाद का एकत्रित करके तथा अन्तर्राष्टीय बाजार में उनका उचित प्रचार-प्रसार करके उनके स्वरूप को आधुनिकता का लिबास पहनाकर उन्हें अन्य देशों को निर्यात किया जाता है, जिससे न केवल विदेशी मुद्रा अर्जित होती है बल्कि लघु एवं कुटीर उद्योगों को भी समुचित प्रोत्साहन एवं लाभ मिलता है।

2. निर्यात के लिए आयात (Import for Export)-ऐसे अनेक दश ह जा अन्तर्राष्ट्रीय बाजार से आयात नहीं कर पाते हैं अथवा उन्हें वस्तुओं की विस्तृत जानकारी नहीं होती है। कभी-कभी उन्हें आयात करने में विभिन्न कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। इसलिए भारतीय उद्यमियों द्वारा ऐसे उत्पाद भी आयात किए जाते हैं जिनका तुरन्त अन्य देशों को निर्यात कर दिया जाता है अथवा कुछ सुधार करने के पश्चात् उन उत्पादों का निर्यात कर दिया जाता है जिससे देश केवल विदेशी मुद्रा ही अर्जित नहीं करता बल्कि व्यापारिक सम्बन्धों में भी सुधार आता है।

3. हस्तकला उद्योग (Handicrafts Industries)-उद्यमी चूँकि लघु एवं कुटीर उद्योगों के उत्पादों पर विशेष ध्यान नहीं देते हैं, इसलिए भारतीय संस्कृति के प्राचीन रत्न हस्तकला एवं शिल्पकला के उत्पादों को संगृहीत कर उद्यमी इनको अन्तर्राष्ट्रीय बाजार तक पहुँचाने का भी कार्य करते हैं, जिससे देश केवल विदेशी मुद्रा ही अर्जित नहीं करता बल्कि भावी व्यापार के लिए मार्ग भी सुलभ होते हैं।

4. उपलब्ध संसाधनों का समुचित विदोहन (Fair uses of Available Resources)-उद्यमियों द्वारा देशों में उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों का समुचित विदोहन किया जाता है। कहा जाता है कि भारत प्राकृतिक संसाधनों की दृष्टि से सबसे अमीर देश है। देश में विभिन्न प्रकार के प्राकृतिक संसाधनों का भण्डार है। उद्यमियों द्वारा इन संसाधनों को खोजकर एक परिवर्तित स्वरूप प्रदान किया जाता है और तत्पश्चात इन्हें अन्तर्राष्ट्रीय बाजार निर्यात किया जाता है, जिसके फलस्वरूप देश को विदेशी मुद्रा की प्राप्ति होती है तथा देश को अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार में ख्याति मिलती है।

5. मानव संसाधन आधारित उत्पादों का निर्माण (Manufacturing of Human Resources Basis Products)-भारत में मानव संसाधन प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं तथा अन्य देशों की तुलना में श्रम की लागत न्यूनतम आती है। इसलिए भारतीय उद्यमियों द्वारा मुख्यत: ऐसे उत्पादों का अधिक निर्माण किया जाता है जो कि मानव श्री जिसके परिणामस्वरूप उत्पाद की लागत न्यूनतम आती है तथा मानव संसाधन का उपयोग एवं विकास होता है जिससे निर्यात समृद्धि में प्रोत्साहन मिलता है।

6. गणवत्ता वृद्धि पर निर्यात समृद्धि (Export Promotion on quality Improvement)-प्राचीन समय में वस्तुओं एवं उत्पादों की कीमत पर विशेष ध्यान दिया जाता था. परन्तु समय परिवर्तन के साथ-साथ यह अवधारणा भी परिवर्तित हो गई। वतमान समय में कीमत को मूल्यांकन के दौर में द्वितीय स्थान प्रदान किया जाता है, जबकि गुणवत्ता का प्रथम। इस बदलते परिवेश का भारतीय उद्यमियों ने समुचित लाभ उठाया तथा अपना वस्तुमा एवं सेवाओं में गुणवत्ता की वृद्धि करके तथा कीमतों को निम्न करके निर्यात समृद्धि का पूण सहयोग प्रदान किया।

7. अनुसन्धान एवं विकास पर ध्यान (Attention on Research and Development)-सामान्यत: यह माना जाता है कि परिवर्तन प्रकृति का नियम है। उसी तरह मनुष्य की आवश्यकताएँ एवं इच्छाएँ भी परिवर्तित होती रहती हैं, परिणामस्वरूप उन्हें नई-नई वस्तुओं एवं सेवाओं की आवश्यकता महसूस होती है। भारतीय उद्यमी इस बात को ध्यान में रखते हुए अनुसन्धान एवं विकास पर समुचित ध्यान देते हैं तथा नई वस्तुओं के आविष्कार तथा पुरानी वस्तुओं के सुधार के बाद उनका निर्यात करते हैं, जिससे अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में स्थायित्व प्राप्त होता है।

8. लागत नियन्त्रण के उपाय (Solution for Cost Control)-वर्तमान तीव्रतम प्रतिस्पर्धा के दौर में गुणवत्ता को प्रथम स्थान दिया जाता है, लेकिन वस्तुओं की कीमत भी महत्त्वपूर्ण घटक है। ऐसी स्थितियों में प्रत्येक व्यवसायी यह कोशिश करता है कि उसकी उत्पादन की लागत न्यूनतम हो। इसके लिए भारतीय उद्यमी सदैव प्रयत्नशील रहते हैं, जिसके परिणामस्वरूप निर्यात की मात्रा में वृद्धि होती है तथा नये व्यावसायिक अवसरों की खोज में सहायता मिलती है। 

9. घरेलू प्रौद्योगिकी का अधिक प्रयोग (Maximum use of Domestic Technology)-विदेशी उत्पादों की निर्भरता एवं विदेशी मुद्रा की बचत करने के लिए आवश्यक है कि आयातों में कमी आ जाए। इसलिए भारतीय उद्यमियों द्वारा अधिकांशत: भारतीय अथवा घरेलू प्रौद्योगिकी का प्रयोग किया जाता है जिसके परिणामस्वरूप वस्तओं की लागत में कमी आती है।

10. स्वनिर्मित उत्पादों का प्रचार-प्रसार (Advertisement of Self-Produce Products)-आयात की मात्रा में कमी करने के लिए तथा स्वदेशी वस्तओं के निर्यात के लिए उद्यमियों द्वारा स्वनिर्मित उत्पादों के प्रचार-प्रसार पर अधिक बल दिया जाता है, क्योंकि दश के आर्थिक विकास के लिए आवश्यक है कि विदेशी उत्पादों पर निर्भरता में कमी भारतीय उद्यमी इस प्रयास में काफी हद तक सफल भी हुए हैं।

11. नवप्रपवर्तन पर आधारित उच्च तकनीक वाले उत्पादों का निर्यात High Technique Products basis on Innovation)-वर्तमान में भारतीय उद्योगपतियों एवं उद्यमियों द्वारा केवल परम्परागत ढंग से ही उत्पादन नहीं किया जाता का आधुनिकता के इस दौर में उच्च तकनीक का प्रयोग भी किया जाता है, जैसे-कम्प्यूटर

सॉफ्टवेयर आदि। ऐसी उच्च तकनीक वाले उत्पादों का और अधिक नवप्रवर्तन आधारत सुधार किया जाता है तथा उनका निर्यात किया जाता है जिससे देश के आर्थिक विकास का गात प्राप्त होती है।

प्रश्न – उद्योगों के असन्तुलित क्षेत्रीय विकास का अर्थ, क्षेत्रीय विषमताएँ, कारण एवं प्रभाव बताइए। इसे दूर करने में उद्यमी की क्या भूमिका है?

Give the meaning, regional disparities, causes and effect of Imbalanced Regional Development of Industries. What is the role of Entrepreneur to solve this problem ?

उत्तर – उद्योगों के असन्तुलित क्षेत्रीय विकास का अर्थ (Meaning of Imbalanced Regional Development of Industries)

उद्योगों का एक ही स्थान पर केन्द्रीकरण आर्थिक व सामाजिक विषमताओं को उत्पन्न करता है। इससे आय, रोजगार व उपभोग स्तर में भिन्नताएँ उत्पन्न होती हैं। ये भिन्नताएँ क्षेत्रीय विषमताओं को बढ़ाती हैं, जो कालान्तर में अनेक प्रकार की आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक एवं जनांकिकीय समस्याओं को जन्म देती हैं।

इसका अर्थ यह नहीं है कि देश के सभी क्षेत्रों एवं प्रदेशों में औद्योगिक विकास के स्तर में समानता लायी जाए। इसका अर्थ है कि विभिन्न क्षेत्रों के औद्योगिक विकास में व्याप्त असमानताओं में यथासम्भव कमी लायी जाए ताकि अल्पविकसित क्षेत्रों में भी औद्योगिक विकास का लाभ प्राप्त हो सके।

भारत में क्षेत्रीय विषमताएँ 

(Regional Disparities in India)

भारत एक विकासशील राष्ट्र है। हमने विकास के लिए आर्थिक नियोजन के मार्ग को अपनाया है। देश में सभी योजनाओं का उद्देश्य न्याय के साथ आर्थिक विकास’ करना रहा है। इसके बावजूद भारत का विकास असन्तुलित ढंग से हुआ है। कुछ प्रदेश/क्षेत्र तेजी से विकास का गा जबकि कछ प्रदेश/क्षेत्र विकास की दौड़ में पिछड़ गए हैं। उदाहरण के लिए, एक ओर गजरात, हरियाणा, पंजाब, महाराष्ट्र आदि विकसित प्रदेश हैं तो दूसरी ओर ओडिशा, झारखण्ड, बिहार और उत्तराखण्ड पिछड़े प्रदेश हैं। इस प्रकार भारत में क्षेत्रीय असन्तुलन पाया जाता है।

निम्नलिखित तथ्य भारत के असन्तुलित विकास (क्षेत्रीय असन्तुलन) को दर्शाते हैं

(1) पंजाब, हरियाणा, महाराष्ट्र में प्रति व्यक्ति आय अधिक है, जबकि उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश व ओडिशा में प्रति व्यक्ति आय कम है।

(2) कृषि क्षेत्र में पंजाब, हरियाणा व उत्तर प्रदेश आगे बढ़ गए हैं। इन क्षेत्रों में हरित क्रान्ति का विशेष योगदान रहा है।

(3) महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, गुजरात, तमिलनाड, उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य अपन, रक व आन्ध्र प्रदेश में औद्योगिक विकास की गति धीमी रही है, जबकि अन्य राज्य औद्योगिक दृष्टि से पिछड़े हैं।

(4) ओडिशा, त्रिपुरा, मध्य प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, असम, उत्तर अप और कर्नाटक में लगभग 48% जनसंख्या गरीबी रेखा से नीचे रहती है, जबकि पंजाब म एता जनसंख्या का प्रतिशत बहुत कम है।।

(5) सर्वाधिक साक्षरता केरल में है यहाँ साक्षरता की दर 93.91% है। सबसे कम साक्षरता बिहार में 63.82% है।

(6) पंजाब, हरियाणा, पश्चिम बंगाल एवं तमिलनाडु में आधारिक संरचना का तेजा से विकास हुआ है, जबकि पूर्वोत्तर राज्य इस दृष्टि से पिछड़े हैं।

प्रो० राजकृष्ण के शब्दों में, “गत तीन दशकों से पर्याप्त समग्र विकास के बावजूद राज्य असन्तुलनों में वृद्धि हुई है।” .

क्षेत्रीय असन्तुलन के कारण

(Causes of Regional Imbalance) 

भारत की अर्थव्यवस्था में क्षेत्रीय असन्तुलन के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं

1. भौगोलिक परिस्थितियाँ (Geographical Conditions)-भारत के कई क्षेत्रों के पिछड़े होने के लिए वहाँ की भौगोलिक परिस्थितियाँ उत्तरदायी हैं; जैसे-जम्मू व कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, अरुणाचल प्रदेश तथा उत्तराखण्ड प्रदेश पहाड़ी क्षेत्र होने के कारण पिछड़े रहे हैं। परिवहन की कठिनाई, शीत जलवायु, उर्वरा शक्ति में भिन्नता तथा जल की उपलब्धि में कमी के कारण ये क्षेत्र पिछड़ गए हैं।

2. ब्रिटिश शासन (British Rule)-ब्रिटिश प्रशासन ने भारत को एक व्यापारिक केन्द्र के रूप में ही प्रयोग किया। अंग्रेजों ने यहाँ का कच्चा माल विदेशों में भेजा तथा वहाँ से आया हआ पक्का माल यहाँ बेचा फलस्वरूप यहाँ व्यापार तथा उद्योग पिछड गए। उन्होंने केवल उन्हीं क्षेत्रों में औद्योगिक विकास किया जिनसे उन्हें लाभ प्राप्त होता था। उन्होंने पश्चिम बंगाल तथा महाराष्ट्र का ही विकास किया।

3. नए विनियोग (New Investments)-निजी क्षेत्र के द्वारा पहले से विकसित क्षेत्रों में नया विनियोग अधिक किया गया है, जिसका उद्देश्य ज्यादा लाभ कमाना है। दसरे. विकसित क्षेत्रों में पानी, बिजली सडक, बैंक, बीमा कम्पनियाँ, श्रमिकों का आसानी से मिलना, बाजार का नजदीक होना इत्यादि का लाभ भी प्राप्त हो जाता है। इस वजह से असन्तुलन बढ़ता चला गया है।

ही किया गया। साथ ही जो विकसित क्षेत्र थे, उन्हीं क्षेत्रों में इनका अधिक प्रयोग किया गया। परिणाम यह हुआ जो विकसित क्षेत्र थे वे और अधिक विकसित हो गए तथा जो पिछड़े क्षेत्र थे वे और अधिक पिछड़ गए।

4. संसाधनों का असमान वितरण (Unequal Distribution of Resources) विभिन्न राज्यों के अन्तर्गत प्राकृतिक संसाधनों के वितरण में काफी असमानता है; जैसे-कहीं पेट्रोलियम खनिज अधिक मात्रा में हैं तो कहीं पत्थर की खाने, कहीं वन अधिक है तो कहीं बलुआ भूमि है तथा कहीं रेगिस्तान। इस प्रकार प्राकृतिक संसाधनों के असमान वितरण से क्षेत्रीय विषमताएँ अधिक बढ़ी हैं।

5. आर्थिक संरचना का असमान वितरण (Unequal Distribution of Economic Infrastructure)-बहुत-से राज्यों में औद्योगिक प्रगति के लिए जिस आर्थिक संरचना की आवश्यकता होती है, वह नहीं पायी जाती है; जैसे-विद्युत शक्ति, विपणन तथा साख सुविधाएँ, सन्देशवाहन के साधन, परिवहन हेतु सड़कें इत्यादि। इन सुविधाओं का पर्याप्त विकास न होने के कारण वे क्षेत्र आज भी पिछड़े हुए हैं।

6. सामाजिक व्यवस्था (Social System)-जिन प्रदेशों में सामाजिक व्यवस्था दकियानूसी है और लोग नई सोच, नए परिवर्तन को स्वीकार नहीं करते, वे विकास की दौड़ में पिछड़ जाते हैं। दूसरी ओर, जिन प्रदेशों के लोग नई सोच, नया जोश तथा साहस रखते हैं, वे प्रदेश विकास के रास्ते तय करके अग्रणी बन जाते हैं।

7. राजनीतिक प्रभाव (Political Influence)-जिन क्षेत्रों में नागरिक शिक्षित हैं एवं उनमें राजनीतिक रूप से जागरूकता है उन क्षेत्रों के निवासियों ने राजनीतिक लोगों की मदद लेकर अपने क्षेत्र का विकास करा लिया, किन्तु जिन क्षेत्रों के नागरिकों ने अधिक ध्यान नहीं दिया उन क्षेत्रों में विकास नहीं हो पाया है।

8.निर्धनता (Poverty)-भारत में कई प्रदेश गरीबी के कारण भी विकास की दौड़ में पिछड़ गए हैं। गरीबी के कारण वे राज्य गरीबी के दुश्चक्र में फँसकर रह जाते हैं तथा उससे बाहर निकलने का प्रयास करते हुए भी बाहर नहीं निकल पाते, किन्तु जो क्षेत्र गरीब नहीं हैं वे अपना विकास शीघ्रता से कर लेते हैं।

9. विदेशी सहायता तथा प्राविधिक ज्ञान (Foreign Assistance and Technical Knowledge)-जो राज्य विदेशी सहायता, प्राविधिक ज्ञान तथा पँजी प्राप्त करने में सफल हो जाते हैं, वे अपना विकास कर लेते हैं। इसके विपरीत वे राज्य स की सहायता प्राप्त करने में असफल रहते हैं, विकास के क्षेत्र में पिछट जाते है।

क्षेत्रीय असन्तुलन का भारतीय अर्थव्यवस्था पर प्रभाव

(Effect of Regional Imbalance on Indian Economy) भारतीय अर्थव्यवस्था पर क्षेत्रीय असन्तुलन के प्रभाव को अग्र प्रकार स्पष्ट किया जा सकता है-

(1) देश में क्षेत्रीय संघर्षों में वृद्धि हुई है। इसका मुख्य कारण राष्ट्रीयता के स्थान पर क्षेत्रीयता की भावना का प्रबल होना है।

(2) क्षेत्र में रहने वाले लोगों की विचारधारा संकुचित हुई है।

(3) अधिकांश साधन अप्रयुक्त रह गए और कुछ साधनों का दुरुपयोग हुआ है। साधना के उपयोग में अपव्ययिता भी बढ़ी है।

(4) विभिन्न क्षेत्रों के लोगों में अलगाव की प्रवृत्ति पनपी है। 

(5) आय की बढ़ती विषमताओं के कारण सामाजिक कल्याण में कमी आया ह। 

(6) क्षेत्रीय असमानताओं में वृद्धि हुई है।

क्षेत्रीय असन्तुलन को दूर करने में उद्यमी की भूमिका 

(Role of Entrepreneur in Removing Regional Imbalance) 

एक उद्यमी क्षेत्रीय असन्तुलन को दूर करने में निम्न प्रकार से सहायक हो सकता है-

(1) पिछड़े हुए क्षेत्र में नए-नए उद्योगों की स्थापना करके।

(2) पिछड़े हुए क्षेत्रों की पहचान करते हुए, उन कारणों का पता लगाकर जिससे वे पिछड़े रह गए हैं और उन कारणों को दूर करने का प्रयास करके।

(3) नए क्षेत्रों के अनुरूप उन क्षेत्रों में उद्योगों की स्थापना करके। 

(4) पिछड़े क्षेत्रों का ढाँचागत विकास करके। 

(5) पिछड़े क्षेत्रों में सामाजिक अवसंरचना का विकास करके। 

(6) परिवहन, संचार व विद्युत क्षेत्र में अधिकाधिक निवेश करके। 

(7) औद्योगिक क्षेत्र में पर्याप्त निवेश करके। 

(8) मानव पूँजी, शिक्षा, प्रशिक्षण, स्वास्थ्य, आवास में अधिकाधिक विनियोग करके।

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