B.Com 2nd Year Entrepreneurial Behaviour Notes In Hindi

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B.Com 2nd Year Entrepreneurial Behaviour Notes In Hindi
B.Com 2nd Year Entrepreneurial Behaviour Notes In Hindi

प्रन – नवाचार, सृजनशीलता और आविष्कार पर एक लेख लिखिए।

Write a note on Innovation, Creativity and Invention. 

उत्तर – नवाचार से आशय

(Meaning of Innovation) 

वर्तमान विचारों को अपनाने की प्रक्रिया ही नवाचार है। इसके अतिरिक्त, नवाचार एक ऐसा विचार, प्रथा या वस्तु होती है, जिसे नया समझा जाता है। यह बात कम महत्त्व रखती है कि उक्त विचार विषयगत रूप से उसके प्रथम उपयोग या खोज के एक लम्बे समय के बाद नया समझा जा सकता है अथवा नहीं। अत: नवाचार एक आर्थिक एवं सामाजिक शब्द है। यह वह कार्य होता है जो स्रोतों को सम्पदा की नई क्षमता प्रदान करता है। लक्ष्यों को प्राप्त करने के विभिन्न रास्ते सहित उद्यमी उसके स्थानापन्न ढूँढ़ने के लिए तैयार रहता है। उद्यमी एवं नवाचार के सन्दर्भ में प्रमुख परिभाषाएँ निम्नलिखित हैं

आर्थर डेविंग (Arthur Dewing) के अनुसार, “उद्यमी वह व्यक्ति है जो विचारों को लाभदायक व्यवसाय में रूपान्तरित करता है।”

फ्रेन्ज (Frantz) के शब्दों में, “उद्यमी प्रबन्धक से बड़ा होता है। उद्यमी नवप्रवर्तक एवं प्रवर्तक दोनों है।”

पीटर एफ० ड्रकर (Peter F. Drucker) के शब्दों में, “उद्यमी वह व्यक्ति है जो सदैव परिवर्तन की खोज करता है, उस पर प्रतिक्रिया करता है तथा एक अवसर के रूप में उसका लाभ उठाता है।”

जोसेफ ए० शुम्पीटर (Joseph A. Schumpeter) के अनुसार, “उद्यमी वह व्यक्ति है जो किसी अवसर की पूर्व कल्पना करता है तथा किसी नई वस्तु, नई उत्पादन विधि, नए कच्चे माल, नए बाजार अथवा उत्पादन के साधनों के नए संयोजक को अपनाते हुए अवसर का लाभ उठाता है।”

उपर्युक्त परिभाषाएँ उद्यमी को नवाचार की गतिशील भूमिका प्रदान करती हैं। उद्यमी. प्रत्येक स्थिति का एक सृजनात्मक प्रत्युत्तर (Ceative Response) प्रस्तुत करता है तथा उद्यमी आजीविकास्वरूप उन रास्तों का अनुसरण करता है जिनसे अवसरों को सृजनात्मक और नवाचारी बनाना सम्भव होता है।

सजनशीलता से आशय

(Meaning of Creativity) 

सृजनात्मकता एवं नवप्रवर्तन दोनों शब्दों का अक्सर एक ही आशय समझा जाता है, का दाना का अर्थ भिन्न है। ‘सजनात्मकता’ से आशय नवीनता को वास्तविकता में लाने पाला वाग्यता से है, जबकि नवप्रवर्तन नवीन कार्यों को करने की एक प्रक्रिया है. दोनों के मध्य हामनता आत महत्त्वपूर्ण है। किसी भी विचार या कल्पना का मल्य तब तक शन्य होता है जब तक कि वह किसी नए उत्पाद, सेवा अथवा प्रक्रिया के रूप में परिवर्तित नहीं हो जाती। नवप्रवर्तन मूलत: सृजनात्मक कल्पनाओं एवं धारणाओं (Creative Ideas) का लाभप्रद प्रयोगों से रूपान्तरण है, जबकि सृजनात्मकता, नवप्रवर्तन से पूर्व की आवश्यकता है।

1. विचार की पहचान या जन्म (Recognition)-इस अवस्था को अंकुरण (sermination) अवस्था भी कहते हैं। इससे किसी नवीन विचार की खोज अथवा किसी समस्या के समाधान का कोई नवीन हल का प्रारम्भ होता है।

2.विचार व्याख्या (Rationalization)-नवीन विचार के मन्थन की अवस्था को यक्तिपर्ण विचार व्याख्या कहते हैं। इस सोपान में विचार का जनक नवीन विचार की विश्लेषणात्मक ढंग से व्याख्या करता है। इस सोपान में सम्बन्धित साहित्य सूचनाएँ एवं ज्ञान संग्रह किया जाता है।

3.विचार विकास (Incubation)-यह अवस्था पोषण की अवस्था होती है। इस अवस्था को Incubation Stage भी कहते हैं।

4.विचार ग्राह्यता (Realization)-उक्त अवस्थाओं की प्राप्ति के बाद नवविचार का प्रादर्भाव होने लगता है जिससे विचार की संरचना समझी जाती है एवं उसके क्रियान्वयन का विश्वास होने लगता है।

5. विचार प्रमापीकरण (Validation)-इस अवस्था में विचार का विभिन्न दष्टिकोणों से परीक्षण किया जाता है तथा विचार मूल्य का स्पष्टीकरण हो जाता है।

आविष्कार (Invention) 

आविष्कार (Invention) आविष्कार एवं प्रवर्तन दो पूर्णतया भिन्न पक्ष हैं। आविष्कार से वैज्ञानिक और प्रौद्योगिक समस्या का समाधान होता है, जबकि प्रवर्तन आर्थिक-सामाजिक व्यवस्था में नए उत्पाद एवं तकनीकी को समाविष्ट कराने की सामाजिक-प्रबन्धकीय प्रक्रिया है। सर्वविदित है कि सभी आविष्कार अच्छे प्रवर्तक नहीं होते हैं। हेनरी फोर्ड इसका उदाहरण है-उसने किसी नई वस्तु का आविष्कार नहीं किया बल्कि दूसरों की युक्तियों का अध्ययन करके अपने ऑटोमोबाइल उद्योग में समायोजित कर दिया। इस तकनीक में कुछ भी नया नहीं था, परन्तु फोर्ड एवं प्रवर्तक और उद्यमी था। दूसरी ओर थॉमस एडीसन आविष्कार था। वह एक बार दिवालिया हुआ, विपत्ति में जीवित रहा, परन्तु जिन्दगी भर धन नहीं कमा सका क्योंकि वह न तो प्रवर्तक था और न ही उद्यमी। ऐसा ही एक उदाहरण येस्टर केरिसन भौतिकशास्त्री का है, जिन्होंने अपने ज्ञान के आधार – पर सन् 1930 ई० में फोटोकॉपी उपकरण का आविष्कार किया, परन्तु वह सामाजिक उपयोग में तब आया जब सन् 1960 ई० में जी० सी० विल्सन के नेतृत्व में एक रचनात्मक समूह के प्रयासों के फलस्वरूप जीराक्स कॉपी के रूप में क्रान्तिकारी परिवर्तन आया। 

प्रश्न – व्यवसाय के सामाजिक उत्तरदायित्व से आप क्या समझते हैं? विस्तार से समझाइए।

What do you understand by Social Responsibilities of Business ? Explain in detail. 

अथवा व्यवसाय के सामाजिक उत्तरदायित्व से क्या आशय है? अंशधारियों, कर्मचारियों, उपभोक्ताओं, समाज व सरकार के प्रति व्यवसाय के क्या दायित्व हैं?

What is meant by Social Responsibilities of Business ? What are the Responsibilities of Business towards Shareholders, Employees, Consumers, Society and State ?

उत्तर – प्रत्येक आर्थिक क्रिया में सरकारी हस्तक्षेप का उद्देश्य ‘जनहित’ अथवा सामाजिक कल्याण (Social Welfare) में वद्धि करना होता है। यद्यपि व्यवहार में व्यवसाय ससमाज का आकाक्षाओं का बदलता स्वरूप, बदलती प्राथमिकताएँ तथा स्वयं समाज में होने वाले निरन्तर परिवर्तनों से ‘जनहित’ का अर्थ बदलता रहता है तथापि व्यवसाय समाज को व्यापक रूप से प्रभावित करता है। व्यवसाय द्वारा ही मजदूरी-भुगतान, श्रम कल्याण, आद्यागिक सम्बन्ध उपभोग वस्तुओं का उत्पादन, वस्तु का मल्य एवं गण. उपभोक्ताओं की रुचि. पसन्द एवं फैशन, बाजार व्यवहार, रोजगार, विनियोग, सरकारी राजस्व आदि को प्रमाप (Standard) के रूप में निर्धारित किया जाता है। इस प्रकार व्यवसाय समाज का एक अभिन्न अंग है। अत: यह आवश्यक है कि व्यवसाय समाज की आकांक्षाओं के अनुरूप व्यवहार करे। इस प्रकार व्यवसाय सुसंगठित एवं सुव्यवस्थित समाज के निर्माण में एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

व्यवसाय के सामाजिक उत्तरदायित्व की परिभाषाएँ

(Definitions of Social Responsibility of Business) 

व्यवसाय के सामाजिक उत्तरदायित्व की महत्त्वपूर्ण परिभाषाएँ निम्नलिखित हैं

(1) कण्ट्ज एवं ओडोनेल के अनुसार, “सामाजिक उत्तरदायित्व निजी हित में कार्य करने वाले प्रत्येक व्यक्ति का ऐसा दायित्व है, जिससे वह स्वयं आश्वस्त होता हो कि उसके द्वारा अन्य व्यक्तियों के न्यायोचित अधिकारों एवं हितों को कोई हानि न पहुँचती हो।”

(2) बोवेन के शब्दों में, “सामाजिक उत्तरदायित्व से आशय ऐसी नीतियों का अनुसरण करना एवं निर्णयों को क्रियान्वित करना है, जो समाज के उद्देश्यों एवं मूल्यों के सन्दर्भ में वांछनीय हों।”

(3) फ्रान्सिस क्रौस्टेन होलटेन के अनुसार, “वे समस्त कार्य जो किसी व्यावसायिक संस्था के उद्देश्यों में जोड़े जाते हैं कि किस प्रकार समाज के प्रत्येक वर्ग का हित ध्यान में रखा जाए तथा संस्था को इस प्रकार संचालित किया जाए कि सम्पूर्ण समाज का कल्याण हो।”

4) अन्तर्राष्ट्रीय सेमिनार दिल्ली, 1965′ के अनुसार, “व्यवसाय प्रबन्ध के सामाजिक दायित्व से आशय ग्राहकों, कर्मचारियों, अंशधारियों तथा समुदाय के प्रति दायित्व से है।”

(5) स्टोनियर के अनुसार, “वास्तविक अर्थों में व्यावसायिक प्रबन्ध के सामाजिक उत्तरदायित्व को स्वीकार करने का अभिप्राय समाज की आशाओं को समझना एवं मान्यता देना है तथा इसकी उपलब्धियों को समाज को देने का निश्चय हैं।

इस प्रकार व्यवसाय के सामाजिक उत्तरदायित्व के अन्तर्गत वे सभी कार्य सम्मिलित किए जाते हैं, जो एक व्यवसायी अथवा व्यावसायिक संस्थान द्वारा समाज के विभिन्न अंगों से अपना सम्बन्ध निरन्तर बनाए रखने हेतु आवश्यक होते हैं। व्यवसायी द्वारा समाज के विभिन्न वर्गों के हितों को ध्यान में रखते हुए व्यवसाय का कुशलतापूर्वक संचालन करते रहना ही व्यवसायी या व्यवसाय का सामाजिक उत्तरदायित्व है। एच० आर० बोवेन के अनुसार, “एक व्यवसायी का यह दायित्व है कि वह ऐसी नीतियों का अनुसरण करे, ऐसे निर्णय ले अथवा ऐसी क्रियाएँ करे जो समाज के मूल्य एवं उद्देश्यों के अनुरूप हो।”

प्रो० कीथ डेविस (Prof. Keith Devis) के अनुसार, “सामाजिक उत्तरदायित्व वहाँ आरम्भ होता है, जहाँ कानून समाप्त होता है।’

व्यवसाय के सामाजिक उत्तरदायित्व के लक्षण अथवा विशेषताएँ

(Characteristics of Social Responsibility of Business) 

व्यवसाय के सामाजिक उत्तरदायित्व के प्रमुख लक्षण निम्नलिखित हैं

(1) यह विचारधारा निजी एवं सार्वजनिक दोनों व्यवसायों पर समान रूप से लागू होती है।

(2) यह विचारधारा व्यवसाय के व्यक्तिगत तथा सामाजिक दोनों पहलुओं को परस्पर सम्बन्धित करती है।

(3) यह एक सामूहिक एवं सामाजिक संस्था है, जिसका संगठन एवं संचालन समाज के लाभ के लिए किया जाता है।

(4) यह एक द्विमार्गी क्रिया है। जहाँ एक ओर व्यवसाय से उसके स्वामी, ग्राहक, कर्मचारी, समुदाय तथा सरकार विभिन्न आशाएँ रखते हैं वहीं व्यवसाय भी इन लोगों से कुछ आशाएँ रखता है। अत: व्यवसाय के सामाजिक उत्तरदायित्व को निभाया जाना पारस्परिक सहयोग, सद्विश्वास एवं नैतिकता पर निर्भर करता है।

(5) यह विचारधारा व्यवसाय से सम्बन्धित विभिन्न पक्षकारों के सर्वांगीण विकास पर बल देती है।

(6) व्यावसायिक सफलता का मूलभूत आधार सामाजिक उत्तरदायित्व है।

(7) यह एक निरन्तर प्रक्रिया है। एक व्यवसायी जब तक व्यावसायिक क्रियाएँ करता है, तब तक उसका सामाजिक दायित्व बना रहता है।

व्यवसाय के सामाजिक उत्तरदायित्व का क्षेत्र 

(Scope of Social Responsibilities of Business) 

आज व्यवसाय जनसेवा का पर्याय बन गया है और व्यवसायियों से यह आशा की जाती है कि वे ‘जन प्रन्यासियों’ (Public Trustees) के रूप में कार्य करें। उन्हें समाज के दो वर्गों से व्यवहार करना होता है-प्रथम, व्यवसाय का आन्तरिक वर्ग; जैसे-अंशधारी, व्यवसाय के स्वामी व व्यवसाय में कार्यरत कर्मचारी तथा द्वितीय, व्यवसाय से बाह्य वर्ग; जैसे—ग्राहक, ऋणदाता, सरकार और समुदाय। व्यवसाय के प्रबन्धक का यह दायित्व है कि वह व्यवसाय से प्राप्त प्रतिफल को समान आधार पर वितरित करे अर्थात् अंशधारियों को उचित प्रतिफल दे, अपने कर्मचारियों को अच्छी कार्य-दशाएँ एवं उचित मजदूरी/वेतन दे, उपभोक्ताओं के साथ अच्छा व्यवहार करे तथा अपने व्यवसाय को सम्पूर्ण समाज एवं राष्ट्र के लिए एक अच्छी परिसम्पत्ति (Asset) बनाए।

विभिन्न वर्गों के प्रति व्यवसाय के दायित्वों का वर्णन अग्र प्रकार किया जा सकता है

1. स्वामियों/अंशधारियों के प्रति उत्तरदायित्व (Responsibilities towards Owners/Shareholders)

स्वामियों/अंशधारियों के प्रति व्यवसाय के निम्नलिखित दायित्व होते हैं

1.विनियोग पर उचित प्रतिफल (Appropriate Rate of Return on Investment)-व्यवसाय का यह उत्तरदायित्व होता है कि वह अपने स्वामियों/अंशधारियों द्वारा विनियोजित पूँजी पर उचित लाभांश (Dividend) प्रदान करे तथा पॅजी का मल्य ह्रास (Depreciation) न होने दे। विनियोजकों को विनियोजित पँजी पर पर्याप्त प्रतिफल निरन्तर मिलता रहना चाहिए।

2. स्वामी की पूँजी की सुरक्षा (Protection of Owner’s Capital)-व्यवसाय का यह उत्तरदायित्व होता है कि वह स्वामी द्वारा विनियोजित पूँजी की पूर्ण सुरक्षा करे। वास्तव म विनियोजक व्यवसाय में पँजी को इस आशा से विनियोजित करते हैं कि व्यवसाय एक प्रन्यासी की भाँति उनकी पूँजी को सुरक्षित रखेगा।

3. लाभांश का समयानुसार भुगतान करना (Timely Payment of Dividends)-व्यवसाय का दायित्व केवल लाभांश घोषित करना नहीं है अपितु यह भी उसका प्रधान दायित्व है कि उचित व निश्चित समय में लाभांश का भुगतान कर दिया जाए, अन्यथा लाभांश का समय पर भुगतान न होने से स्वामियों/अंशधारियों में निराशा की भावना छा जाती है।

4. कार्यकरण से अवगत कराना (Information Regarding Functioning of the Business)-व्यवसाय का यह भी दायित्व है कि वह स्वामी/अंशधारी को संस्था की प्रत्येक गतिविधि से सम्बन्धित सभी सूचनाएँ समय-समय पर उपलब्ध कराता रहे। ये सूचनाएँ समाचार-पत्र, प्रगति रिपोर्ट, गश्ती-पत्र तथा संभाओं के आयोजन द्वारा दी जा सकती हैं।

5. उचित व्यवहार करना (Reasonable Behaviour)-व्यवसाय को अपने स्वामियों/अंशधारियों के प्रति उचित आदर व सम्मान प्रदर्शित करना चाहिए। उसे उनकी आकांक्षाओं का निरादर नहीं करना चाहिए। उसे पूर्वाधिकार अंशधारियों व साधारण अंशधारियों के मध्य किसी प्रकार का भेदभाव नहीं करना चाहिए।

II. कर्मचारियों के प्रति उत्तरदायित्व

(Responsibilities towards Employees)

अपने कर्मचारियों एवं श्रमिकों के प्रति व्यवसाय के निम्नलिखित सामाजिक उत्तरदायित्व होते हैं

1. कार्य के अनुसार उचित पारिश्रमिक देना (Reasonable Remuneration according to Work)-व्यवसाय द्वारा अपने कर्मचारियों एवं श्रमिकों को उनके कार्य के अनसार वेतन/मजदूरी अवश्य दी जानी चाहिए। साथ ही यह भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि उन्हें कम-से-कम न्यूनतम मजदूरी का भुगतान अवश्य होता रहे। दूसरे शब्दों में श्रमिकों को इतनी मजदूरी अवश्य मिलनी चाहिए कि वे अपनी उचित जीवनयापन सम्बन्धी आवश्यकताओं को अवश्य पूरा कर सकें।

2. उचित लाभांश-भागिता (Appropriate Profit Sharing)-व्यवसाय का यह दायित्व है कि वह अपने कर्मचारियों के लिए लाभ में भागीदारी की व्यवस्था करे। कर्मचारी उद्योग की प्रगति में सक्रिय योगदान देते हैं। अत: लाभ का कुछ अंश उन्हें भी मिलना चाहिए। लाभांश परस्पर विचार-विमर्श द्वारा निर्धारित किया जाना चाहिए।

3. दुर्घटनाग्रस्त होने पर क्षतिपूर्ति (Compensation in Case of Accident)यदि कर्मचारी कारखाने में काम करते समय दुर्घटनाग्रस्त हो जाता है तो व्यवसाय का यह दायित्व है कि वह उसकी उचित क्षतिपूर्ति करे।

4. अच्छी कार्य-दशाएँ उपलब्ध कराना (To Make Available Good Working Conditions)-व्यवसाय के लिए यह आवश्यक है कि वह कर्मचारियों को अच्छी कार्य-दशाएँ उपलब्ध कराए. कार्य-स्थल पर शुद्ध वायु, प्रकाश तथा उचित तापमान को व्यवस्था हो। इसके अतिरिक्त उन्हें श्रम कल्याण सुविधाएँ भी उपलब्ध होनी चाहिए।

5. पदोन्नति के अवसर प्रदान करना (To Ensure Promotional Avenues)-कर्मचारियों को उनकी योग्यता, कार्य-अवधि एवं अनुभव के आधार पर पदोन्नति के उचित अवसर उपलब्ध कराए जाने चाहिए। पदोन्नति की सम्भावना उन्हें अधिक और कुशलतापूर्वक कार्य करने के लिए प्रेरणा प्रदान करती है तथा इससे उनमें व्यवसाय के प्रति अपनत्व की भावना भी बलवती होती है।

6. कर्मचारी प्रशिक्षण व विकास कार्यक्रम सम्बन्धी सुविधाएँ उपलब्ध करना (To Ensure Employee’s Training and Development Facilities)-व्यवसाय का यह भी दायित्व है कि वह नवीन एवं आधुनिक तकनीकों तथा कार्य करने की वैकल्पिक विधियों से अपने कर्मचारियों को अवगत कराए। साथ-ही-साथ वह उन्हें प्रशिक्षण सम्बन्धी सुविधाएँ भी उपलब्ध कराए। इसके परिणामस्वरूप कर्मचारियों के मानसिक स्तर का विकास होगा, संस्था को कुशल एवं प्रशिक्षित कर्मचारियों की सेवा का लाभ मिलेगा, उत्पादन में वृद्धि होगी, अपव्यय कम होंगे और लाभों में वृद्धि होगी।

7. प्रबन्ध में श्रमिकों की भागीदारी (Workers’ Participation in Management)-उत्पादन क्रिया में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण योगदान कर्मचारियों तथा श्रमिकों का होता है। अत: व्यवसाय का यह दायित्व है कि वह प्रबन्ध के विभिन्न स्तरों पर कर्मचारियों व श्रमिकों के प्रतिनिधियों को शामिल करे, उनके सुझावों पर विचार करे तथा उपयोगी सुझावों को क्रियान्वित करे। 

III. उपभोक्ताओं के प्रति उत्तरदायित्व (Responsibilities towards Consumers)

उपभोक्ताओं के प्रति व्यवसाय के सामाजिक उत्तरदायित्व निम्नलिखित हैं

1. उचित मूल्य पर वस्तुएँ एवं सेवाएँ प्रदान करना (To Supply Goods and Services at Reasonable Price)-व्यवसाय का यह दायित्व है कि वह अपने ग्राहकों को उचित मूल्य पर वस्तुएँ व सेवाएँ उपलब्ध कराए। व्यवसाय की उन्नति ग्राहकों पर ही निर्भर करती है। यदि वस्तु के विक्रय में ग्राहक को धोखा दिया जाएगा तो व्यवसाय की ख्याति (Goodwill) को धक्का लगेगा तथा उसके अस्तित्व पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा।

2. उत्तम किस्म की वस्तुओं का विक्रय (Sale of Good Quality Commodities)-व्यवसाय का यह दायित्व है कि वह अपने ग्राहकों को अच्छी किस्म की वस्तुओं का ही विक्रय करे। उपभोक्ताओं को अच्छी किस्म की वस्तुएँ उपलब्ध कराने से व्यवसाय की ख्याति बढ़ती है।

3. उपभोक्ता की रुचि व आवश्यकता समझना (To Understand Consumers’ Needs and Tastes)समय के साथ-साथ उपभोक्ताओं की रुचि, आदत व आवश्यकताएँ बदलती रहती हैं। व्यवसाय को चाहिए कि वह विपणन शोध (Marketing Research) के माध्यम से उपभोक्ता की आवश्यकता, स्वभाव, रुचि व फैशन आदि को मालूम करे और उसी के अनुरूप उपभोक्ताओं को वस्तुएँ व सेवाएँ उपलब्ध कराए।

4. भ्रामक विज्ञापन से बचना (To Avoid Misleading Advertisement)विज्ञापन का उद्देश्य उपभोक्ता को वस्तु के बारे में आवश्यक जानकारी देना होता है। विज्ञापन के आधार पर ही उपभोक्ता किसी वस्तु को क्रय करने के लिए आकर्षित होते हैं। अतः झूठा विज्ञापन उपभोक्ताओं के साथ धोखा है। व्यवसाय का यह दायित्व है कि वह झूठे विज्ञापनों से उपभोक्ताओं को गुमराह न करे।

5. विक्रय के बाद मरम्मत सुविधाएँ (To Make Available After Sale Services)-वस्तु-विक्रय के उपरान्त भी यदि वस्तु में किसी प्रकार का दोष पाया जाता है तो व्यवसाय का यह दायित्व है कि यथासम्भव उसका निवारण करे। प्रतिष्ठित फर्मे उपभोक्ताओं को विक्रयोपरान्त मरम्मत सेवाएँ भी उपलब्ध कराती हैं।

6. ग्राहकों की शिकायतों पर ध्यान देना (To Pay Attention to Consumers’ Complaints)-यदि उपभोक्ता को उसके द्वारा दिए गए मूल्य के बदले उचित व वांछित वस्तु/सेवा उपलब्ध नहीं हुई है और उपभोक्ता इस बारे में शिकायत करता है तो व्यवसाय का यह दायित्व है कि वह उपभोक्ता से प्राप्त शिकायतों के बारे में उचित जाँच-पड़ताल करके उन्हें यथासम्भव दूर करने का प्रयास करे। 

IV. समाज के प्रति दायित्व (Responsibilities towards Society)

समुदाय के प्रति व्यवसाय के निम्नलिखित उत्तरदायित्व हैं

1. वातावरण को प्रदूषण से बचाना (To Protect Environment from Pollution)-कारखानों से निकलने वाला धुआँ अथवा गैसें वायु को प्रदूषित करती हैं, जिसका जनता के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। नहरों एवं तालाबों में कारखानों से निकलने वाले रासायनिक द्रव्य के मिश्रण का कृषि व पशुओं के स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पडता है। अत: व्यवसाय का यह दायित्व है कि वह ऐसे उपाय अपनाए जिससे कि वातावरण दूषित न होने पाए।

2.समाज के हित में कार्यक्रम चलाना (To Initiate Programmes in the Interest of Society)-अपनी आर्थिक क्षमता के अनुसार व्यवसाय को समुदाय क विकास के लिए शिक्षा, खेलकूद तथा सांस्कृतिक गतिविधियों के प्रोत्साहन के नए कार्यक्रमो का आरम्भ करना चाहिए एवं चिकित्सालय, पाठशालाएँ, धर्मशालाएँ तथा वाचनालय आदि का स्थापना करनी चाहिए।

3. समाज को रोजगार के अवसर प्रदान करना (To Provide Employme Opportunities to Society)-कारखाने की स्थापना के समय उस स्थान-विशेष की

प्रश्न – डेविड McClelland द्वारा प्रतिपादित ‘उपलब्धि प्रेरणा सिद्धान्त को संक्षेप में समझाइए।

Explain the “Theory of Achievement Motivation’ propounded by David McClelland in short.

उत्तर – मैक्क्लीलैण्ड मॉडल (The McClelland Model)-मैक्क्लीलैण्ड के मतानुसार, व्यवसाय के क्षेत्र में उच्च उपलब्धि के लिए उद्यमी को पर्याप्त कल्पना, चिन्तन, नवीन संयोजन आदि योग्यता की आवश्यकता होती है। उनके अनुसार, उपलब्धि की इच्छा व्यक्ति के आर्थिक व्यवहार का मुख्य कारण तथा उच्च प्राप्ति की भावना उद्यमिता विकास का मुख्य आधार है।

मैक्क्लीलैण्ड के अनुसार, उद्यमिता की ओर अभिप्रेरित होने का मुख्य कारण नवयुवकों में उपलब्धि की भावना का वैचारिक उद्भव होना है जोकि श्रेष्ठता के नवीन बोध के कारण उत्पन्न होती हैं। उनके इस विचार को निम्न रूप में दर्शाया गया है

उपलब्धि की इच्छा वैचारिक मूल्य

साहसी व्यवहार परिवार 

समाजीकरण डेविड मैक्क्लीलैण्ड (David McClelland) के अपनी पुस्तक Achieving Society’ में सफल उद्यमी के निम्नलिखित गुणों का वर्णन किया है

(1) सफलता की सम्भावना का बोध (Perception of probability of success) 

(2) जोखिम वहन की प्राथमिकता (Preference of risk bearing) 

(3) ओजस्वी व्यवहार (Energetic behaviour) 

(4) भविष्योन्मुखी (Future orientation) 

(5) उपलब्धि प्राप्ति की इच्छा (Desire for achievement) 

(6) असाधारण सृजनशीलता (Extraordinary creativi

भारत में तमिलनाडु राज्य में उद्यमी से सम्बन्धित अध्ययन का निष्कर्ष – क अ उद्यमी के लिए निम्नलिखित गुणों पर प्रकाश डाला गया

(1) वह एक साहसी व्यक्ति, साधन सम्पन्न, नए अवसरों के प्रति सजग, परिवर्तन दशाआ का समायोजित करने के योग्य तथा परिवर्तन के जोखिमों को वहन करने का तर होता है।

(2) वह अपने उत्पाद के गुण को सुधारने एवं तकनीकी प्रगति का इच्छुक हात

(3) तत्पर उद्यमी अपने कार्य संचालन के आकार को विस्तार देने तथा इस दृषि अपने लाभों का विनियोजन करने के लिए सदैव तत्पर रहता है।

क्रिस्टोफर (Christofer) ने साहसी के 18 गुणों का वर्णन किया है—(i) दृढ़ता एवं परिश्रम, (ii) जोखिम वहन योग्यता, (iii) उच्च आकांक्षा, (iv) सीखने की इच्छा, (v) गतिशील एवं सृजनात्मक, (vi) अनुकूलनशील, (vii) नवप्रवर्तक, (viii) कुशल विक्रय कला (ix) मित्रों को जीतने तथा संकटों का सामना करने की क्षमता, (x) पहलपन. (xi) आत्मविश्वास, (xii) संकल्प शक्ति, (xiii) सफलता का दृढ़ संकल्प, (xiv) आकर्षक व्यक्तित्व एवं व्यवहारकुशल, (xv) उच्च चरित्र, (xvi) उत्तरदायी, (xvii) कार्य में श्रेष्ठत (xviii) समय अवबोध।

इन गुणों के आधार पर एक उद्यमी के लिए अपेक्षित गुणों का विवरण निम्नलिखित रूमें दिया जा सकता है

1. उद्यमशीलता (Entrepreneurial Ability)-साहसिक योग्यता के लिए उद्यम का दृष्टिकोण साहसिक एवं मनोवृत्ति सकारात्मक होनी चाहिए। वह एक ओजस्वी व्यवहा वाला एवं सफलता की सम्भावना का बोध रखने वाला व्यक्ति होना चाहिए, उसमें संगठकौशल भविष्योन्मुखी होना चाहिए। इस प्रकार उत्तरदायित्व के प्रति इच्छा रखने वाला व्यक्ति साहसिक योग्यता रखता है।

2. जोखिम वहन करने की क्षमता (Risk Bearing Capacity)-किसी भी उद्यम के अन्तर्गत साहसी को सम्भावित सफलता व हानि को सन्तुलित करते हुए अनिश्चितता के वातावरण में निर्णय लेने होते हैं जिनके परिणाम अनिश्चित एवं अज्ञात होते हैं। उद्यमी सदैव स्थिति का पूर्ण मूल्यांकन करते हुए ही जोखिम उठाता है, अर्थात् वह सदैव उन योजनाओं के ही हाथ में लेता है जिन्हें पूरा किया जा सके। वास्तव में, सन्तुलित व व्यावहारिक जोखिमों के वहन करना ही उद्यमी होने का लक्षण है।

3. निर्णय लेने की क्षमता (Decision-making Ability)-उद्यमी किसी भी व्यावसायिक अवसर का पूरा लाभ तभी उठा सकता है, जबकि उसमें तुरन्त निर्णय लेने के क्षमता हो। इमरसन का कथन है-“जो व्यक्ति निर्णय ले सकता है, उसके लिए कुछ भी असम्भव नहीं है।” उद्यमी के निर्णयों का संगठन के भविष्य पर दूरगामी प्रभाव पड़ता है। अत: निर्णय सृजनात्मक एवं लाभप्रद होना चाहिए। उद्यमी को वैज्ञानिक विधि के द्वारा ही किर्स समस्या का समाधान खोजना चाहिए।

4. नेतृत्व करने की क्षमता (Leadership Ability)-उद्यमी में नेतृत्व क्षमता होने से कर्मचारियों को प्रेरणा एवं निर्देशन मिलता रहता है जिससे उनके मनोबल में वृद्धि होती है। अत: उद्यमी में नेतृत्व क्षमता का होना आवश्यक है। मेरेडिथ एवं नेलसन का कहना है-“सफल उद्यमी सफल नेता होते हैं चाहे वे कुंछ या कई सौ कर्मचारियों का नेतृत्व करें।” उनके अनुसार नेतृत्व क्षमता रखने वाले उद्यमियों में निम्नांकित गुण अवश्यंभावी रूप से विद्यमान होते हैं

(i) नए विचारों को विकसित एवं क्रियान्वित करना, 

(ii) सामुदायिक जीवन में सक्रिय भाग लेना, 

(iii) अपनी शक्ति को बढ़ाने तथा दुर्बलता को दूर करने के लिए निरन्तर प्रयास करना 

(iv) अपने कार्यों के लिए समयानुकूल योजना बनाना, 

(v) नेतृत्व क्षमता को विकसित करने के लिए सतत प्रयास करना,

(vi) अपनी कमियों से सीखना, 

(vii) अपने लक्ष्यों के प्रति समर्पित होना, 

(viii) अपने कर्मचारियों को अधिकार एवं दायित्व से सम्पन्न करना, 

(ix) अपनी क्षमताओं में पूरा विश्वास रखना, 

(x) सभी व्यक्तियों के साथ पूरा सामंजस्य कायम करना, 

(xi) संगठन की सफलता में कर्मचारियों की सहभागिता सुनिश्चित करना

इस प्रकार उपर्युक्त लक्षण ही उद्यमी में नेतृत्व क्षमता का गुण होने के प्रतीक है और । संगठन को मजबूत करते हैं।

प्रश्न – व्यवसाय के सामाजिक उत्तरदायित्वों की सीमाएँ बताइए।

Explain the limits of Social Responsibilities of Business. 

अथवा सामाजिक उत्तरदायित्व की आवश्यकता एवं महत्त्व को समझाइए। सामाजिक

उत्तरदायित्व को निभाने में क्या बाधाएँ आती हैं? सामाजिक उत्तरदायित्व के निर्धारण की, कसौटी क्या है?

Discuss the need and importance for assumption of Social Responsibilities. What are the constraints in assuming Social Responsibilities? What is the criteria for determining Social Responsibilities ?

उत्तर सामाजिक उत्तरदायित्व से आशय ईमानदारी से ‘सामाजिक कल्याण में वृद्धि Increase in Social Welfare) के उद्देश्य की आपूर्ति के लिए प्रयास करना है और प्रत्येक प्रकार की विनाशकारी क्रियाओं से अपने आप को बचाना है। इस दृष्टि से यह आवश्यक है कि व्यवसाय समाज की आकांक्षाओं को समझे और उनकी प्राप्ति में भरसक योगदान करे।

सामाजिक उत्तरदायित्व की आवश्यकता एवं महत्त्व

(Need and Importance of Social Responsibility) 

व्यवसाय के सामाजिक उत्तरदायित्व की आवश्यकता एवं महत्त्व को निम्न प्रकार स्पट किया जा सकता है

अनुरूप कार्य नहीं थाओं को पूरा कर क्योंकि वह

1. व्यवसाय की दक्षता सुनिश्चित करना (To Ensure Viability Business)-व्यवसाय का अस्तित्व इसलिए है क्योंकि वह समाज की अमूल्य स करता है। यदि वह समाज की आकांक्षाओं को पूरा करने में असफल रहता है अथवा वह सा की आशाओं के अनुरूप कार्य नहीं कर पाता है तो उसका अस्तित्व ही खतरे में पड़ यदि व्यवसाय को अपनी सामाजिक शक्ति बनाए रखनी है तो उसे समाज की आवश्यक के अनरूप कार्य करना ही होगा। इसे ‘उत्तरदायित्व का लौह नियम’ (Iron Lis Responsibility) कहते हैं। इतिहास साक्षी है कि समाज ने उनकी सामाजिक शाक हासित किया है जिन्होंने इस शक्ति का उपयोग सामजिक हित में नहीं किया।

2. दीर्घकालीन स्वहित को पूरा करना (To Fulfil Long-run Self-interes) यह प्रत्येक व्यवसाय के हित में है कि उसे अपनी क्रियाओं के संचालन के लिए एक अच्छा समुदाय मिले। ऐसे समाज के निर्माण के लिए व्यवसाय को सामाजिक कल्याण के कुछ विशेष कार्यक्रम चलाने होंगे। सामाजिक सुधारों के फलस्वरूप अपराध कम होंगे, सम्पत्ति की सुरक्षा के लिए कम धन व्यय होगा, अच्छे और कुशल श्रमिकों की भर्ती होगी, श्रम-परिवर्तन एवं अनुपस्थिति दर घटेगी और इस प्रकार एक अच्छा समाज एक ऐसे अच्छे वातावरण का निर्माण करेगा, जिसमें व्यवसाय अपने दीर्घकालीन लक्ष्य-लाभ अधिकतमीकरण’ (Profit Maximization) को प्राप्त करने में सफल होगा।

3. अच्छी लोक भावना की स्थापना (To Establish Better Public Image)-अधिक ग्राहकों को आकर्षित करने, अच्छे कर्मचारियों की भर्ती करने तथा अधिक लाभ कमाने के लिए यह आवश्यक है कि प्रत्येक व्यावसायिक संगठन जनता के समक्ष अपनी अच्छी तस्वीर पेश करे। इसके लिए उसे सामाजिक लक्ष्यों की प्राप्ति में सहयोग करना होगा।

4. सरकारी नियमन एवं नियन्त्रण से बचना (To Avoid GovernmentRegulation and Control)-प्रत्येक व्यवसाय के लिए सरकारी नियमन एवं नियन्त्रण कष्टकारी होते हैं। इनसे शक्ति एवं धन का अपव्यय होता है और व्यवसाय में निर्णय लेने की लोच सीमित हो जाती है। सामाजिक उत्तरदायित्वों को पूरा करने में व्यवसायियों की असफलता सरकारी हस्तक्षेप-नियमन एवं नियन्त्रण-को आमन्त्रित करती है। व्यवसायी स्वयं सामाजिक दृष्टि से दायित्वपूर्ण निर्वाह करते हुए सरकारी हस्तक्षेप को हतोत्साहित कर सकते हैं

और सामाजिक कार्यक्रमों में सरकार के साथ सहयोग करके सरकार का विश्वास प्राप्त कर सकते हैं।

5. राष्ट्रीय संसाधन एवं आर्थिक शक्ति के दुरुपयोग से बचना (To Avoid Misuse of National Resources and Economic Power)-समाज के उत्पादक साधनों पर व्यवसायियों का पर्याप्त अधिकार होता है। उनका यह दायित्व है कि वे इन साधनों का उपयोग समाज की भलाई के लिए ही करें और यह न भूलें कि राष्ट्रीय संसाधनों के उपयोग का अधिकार उन्हें समाज ने ही दिया है और वह भी एक विशिष्ट उद्देश्य के लिए अर्थात् समाज की भलाई के लिए अधिक धन का सृजन। इस अधिकार का प्रयोग करते समय उन्हें सामाजिक दायित्वों का पूर्णतया निर्वाह करना चाहिए।

6. वर्ग संघर्ष से बचना (To Avoid Class Conflict)-व्यवसाय की सफलता के लिए औद्योगिक शान्ति (Industrial Peace) अनिवार्य है। श्रम संघ सामाजिक कल्याण उपायों उचित मजदूरी, अच्छी कार्य-दशाएँ, प्रबन्ध में श्रम सहभागिता आदि पर बल देते हैं

और अपनी मांगों को मनवाने के लिए संघर्ष का रास्ता तक अपनाने में भी नहीं हिचकते। उनकी दन माँगों को तेजी से बदलते हुए सामाजिक वातावरण एवं समाजवादी समाज की स्थापना के सरकारी प्रयासों से और अधिक बल मिलता है। व्यवसायियों को निजी हित में कर्मचारियों का विश्वास प्राप्त करना चाहिए और यह प्रयास करना चाहिए कि वर्ग संघर्ष न हो।

7. समस्याओं एवं कठिनाइयों को साधनों में परिवर्तित करना (To Convert Problems and Resistances into Resources)-यदि साहसी की क्षमता सामाजिक समस्याओं के समाधान में लग जाए तो अनेक समस्याएँ साधनों में परिवर्तित हो जाएँगी और साधनों की क्रियात्मक क्षमता कई गुना बढ़ जाएगी। इस विधि में यद्यपि प्रत्येक समस्या का समाधान नहीं किया जा सकता तथापि समाज के हित में अनेक समस्याओं एवं समाधान किया जा सकता है।

यहाँ यह उल्लेखनीय है कि बचाव हमेशा इलाज से अच्छा होता है। समस्याओं के समाधान में विलम्ब, व्यावसायिक प्रबन्धकों को भविष्य में कठिनाटक दगा। अत: अच्छा यही है कि समस्याओं के आमन्त्रित होने से पूर्व ही उनका समाधान कर जाए। व्यवसाय इस सन्दर्भ में बहुत कुछ कर सकता है बशर्ते कि उसकी योग्यताएँ सही गतिशील की जाएँ।

सामाजिक उत्तरदायित्व को निभाने में बाधाएँ 

(Constraints in assuming Social Responsibilities)

अथवा 

सामाजिक उत्तरदायित्व के विपक्ष में तर्क 

(Arguments Against Social Responsibilities) 

व्यवसाय के सामाजिक उत्तरदायित्व के पक्ष में दिए गए उपर्युक्त तर्क सैद्धान्तिक अधिक हैं, व्यावहारिक कम। इसके बावजूद सामाजिक उत्तरदायित्व एक अमिश्रित वरदान नहीं है। अत: इसके विपक्ष में भी तर्क दिए जाते हैं। इनमें से कुछ महत्त्वपूर्ण तर्क निम्नलिखित हैं

1. लाभ अधिकतमीकरण के विचार का प्रचलन (Prevalence of the Ideology of Profit Maximization)-प्रतिष्ठित अर्थशास्त्रियों के अनुसार व्यवसाय का मुख्य आर्थिक कार्य ‘लाभ को अधिकतम’ करना है और ‘आर्थिक मूल्य’ ही व्यवसाय की सफलता का मूल मापदण्ड है। यदि ‘लाभ अधिकतमीकरण’ के सरल नियम का परित्याग कर दिया जाए तो व्यवसाय प्रबन्ध के लिए लोकहित में कार्य करने का कोई निर्देशक (Guide) ही नहीं रहेगा। इसके अतिरिक्त व्यवसायियों को ‘लोकहित में क्या है।’ यह निर्णय करने का प्रयास नहीं करना चाहिए क्योंकि- “आर्थिक प्रणाली खेल का मैदान नहीं है जहाँ व्यवसायी अपना विशिष्ट प्राथमिकताओं का प्रयोग करे।”

2. व्यवसाय के प्राथमिक उद्देश्य पर कम बल देना (Dilution of Business Primary Purpose)-सामाजिक उद्देश्यों की प्राप्ति में व्यवसाय के संलग्न होने का अर्थ ह व्यवसाय द्वारा आर्थिक उत्पादकता पर कम बल देना, अपने नेताओं के हितों को विभाजित करना तथा बाजार में अपने व्यवसाय को कमजोर करना। इसके परिणामस्वरूप व्यवसाय अपने आर्थिक उद्देश्यों को पूरा कर पाएगा और न सामाजिक उद्देश्यों को। किसी भी दिर व्यवसाय की असफलता, व्यवसाय की ख्याति पर प्रतिकूल प्रभाव डालेगी।

3.सामाजिक संलग्नता की लागत (Cost of Social Involvement) सामाजिक लक्ष्यों की आपूर्ति से व्यवसाय को सामान्यत: कोई आर्थिक लाभ प्राप्त नहीं हार सामाजिक कार्यों पर किया गया व्यय उसकी आय को कम करता है। यदि यह व्यय आप तो हो सकता है कि उद्योग की सामान्य फर्मे बाजार से हट जाएँ और उत्पादन कार्य बन्द कर दें।

4. सामाजिक कौशल का अभाव (Lack of Social Skills)-अनेक व्यवसायियों में सामाजिक उत्तरदायित्वों का अनुपालन करने की क्षमता ही नहीं होती, उनका दृष्टिकोण मूल रूप से आर्थिक होता है। ऐसे कार्यों के लिए वे मनोवैज्ञानिक एवं भावनात्मक रूप से अयोग्य होते हैं।

5.हिसाबदेयता का अभाव (Lack of Accountability)-सामाजिक उत्तरदायित्वों को पूरा करने में व्यवसायी जनता के प्रति हिसाबदेय नहीं होते हैं। प्रबन्ध का एक आधारभूत सिद्धान्त यह है कि ‘हिसाबदेयता’ (Accountability) और उत्तरदायित्व (Responsibility) दोनों साथ-साथ चलते हैं। अतः एक तर्क यह दिया जाता है कि जब तक सामाजिक उत्तरदायित्व की स्पष्ट रूपरेखा प्रस्तुत न की जाए, व्यवसाय सामाजिक क्रियाओं के स्थान पर आर्थिक लक्ष्यों को प्राप्त करने पर ही समुचित ध्यान दे।

6.शक्ति का अत्यधिक केन्द्रीकरण (Excessive Concentration of Power)-व्यवसाय में अत्यधिक सामाजिक शक्ति होती है और सम्पूर्ण समाज पर इसके प्रभाव को देखा जा सकता है। व्यवसाय की सामाजिक क्रियाओं के साथ व्यवसाय की पूर्व स्थापित क्रियाओं को सम्बद्ध करने की प्रक्रिया से व्यवसाय में अत्यधिक शक्ति का संकेन्द्रण हो जाएगा। आलोचकों का विचार है कि शायद समाज व्यवसाय में इतनी अधिक शक्ति का संकेन्द्रण न चाहे।

7. अन्तर्राष्ट्रीय भुगतान सन्तुलन की स्थिति को कमजोर करना (To Weaken International Balance of Payments)-सामाजिक कार्यक्रमों पर व्यय करने से व्यवसाय की लागतें बढ़ती हैं। लागतों में यह वृद्धि उत्पादों की कीमत को बढ़ाती है। यदि इन फर्मों को अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में ऐसी फर्मों के साथ प्रतियोगिता करने के लिए खुला छोड़ दिया जाए जिनकी सामाजिक लागते शून्य हैं तो ये फर्मे उनकी प्रतियोगिता के सामने नहीं ठहर पाएंगी। इसका परिणाम देशों में भुगतान सन्तुलन की प्रतिकूलता’ हो सकता है। 

सामाजिक उत्तरदायित्व को निर्धारित करने वाले मापदण्ड (कसौटी)

(Criteria for Determining Social Responsibilities) 

सामाजिक उत्तरदायित्व की उस मात्रा का निर्धारण करना, जो प्रत्येक व्यवसाय को स्वीकार्य हो, एक कठिन कार्य है। कुछ सीमा तक सामाजिक उत्तरदायित्व को वैधानिक नियमों द्वारा निर्धारित किया जा सकता है जैसा कि प्रदूषण नियन्त्रण, गुण-नियन्त्रण, कर्मचारियों के कल्याण एवं सुरक्षा आदि के सन्दर्भ में किया जाता है, किन्तु अधिनियमों के अभाव में सामाजिक उत्तरदायित्व का वांछनीय सीमा स्पष्ट नहीं होती और विभिन्न संगठन सामाजिक कार्यक्रमों पर भिन्न-भिन्न राशिया निधारित करते हैं। इस सम्बन्ध में किसी एक सिद्धान्त का निरूपण सम्भव नहीं है। हाँ, कुछ सामान्य निर्देशक सिद्धान्तों का पालन अवश्य किया जाना चाहिए; यथा

(1) व्यावसायिक संगठन का आकार (Size) एवं प्रकार या स्वरूप (Form), सामाजिक उत्तरदायित्व की सीमा को प्रभावित करेंगे। जैसे-जैसे फर्म का आकार बढ़ता जाता है, समाज के प्रति उसका उत्तरदायित्व भी बढ़ता जाता है। इसी प्रकार कम्पनी के स्वरूप के अनुसार सामाजिक उत्तरदायित्व भी भिन्न होते हैं।

(2) एक व्यावसायिक संगठन के सामाजिक उत्तरदायित्व का निर्धारण करना निम्नलिखित घटकों को ध्यान में रखना चाहिए

(i) शीर्षस्थ प्रबन्धकों के हित एवं मूल्य, 

(ii) लोक-आकांक्षाएँ व कम्पनी का स्तर दिशाएँ तथा 

(iii) लागत-लाभ विश्लेषण।

(3) यह ध्यान में रखना चाहिए कि व्यवसाय मुख्य रूप से एक आर्थिक संसार जिसका मुख्य उद्देश्य ‘लाभ कमाना’ है। सरकार व अन्य सामाजिक संस्थाओं द्वारा दी जाने वाली मौद्रिक एवं अन्य प्रेरणाएँ निश्चित रूप से व्यवसाय के सामाजिक कार्यक्रमों को प्रभावित करेंगी।

(4) कुछ व्यवसाय सामाजिक शक्ति अर्जित करने के लिए सामाजिक उत्तरदायित्वों को निभा सकते हैं, लेकिन यह उचित नहीं है।

(5) व्यवसाय द्वारा सामाजिक कार्यक्रमों के लिए वित्तीय साधनों का अधिक आवंटन, ‘पूँजी पर औसत प्रतिफल’ को कम कर सकता है जो कि व्यावसायिक दृष्टि से वांछनीय नहीं है।

(6) एक व्यावसायिक संगठन को उन्हीं सामाजिक उत्तरदायित्वों को हाथ में लेना चाहिए जिन्हें वह पूरा कर सके।

(7) जिन सामाजिक उत्तरदायित्वों को पूरा करने में कम लागत आती है, व्यवसाय को उन्हें सहर्ष स्वीकार कर लेना चाहिए।

प्रश्न – भारत में उद्यमिता के विकास में विभिन्न वित्तीय संस्थाओं के योगदान को समझाइए।

Explain the contribution of Financial Institutions towards the development of Entrepreneurship in India. 

अथवा भारत में औद्योगिक वित्त की पूर्ति के लिए विशेष वित्तीय संस्थाओं की आवश्यकता का विश्लेषण कीजिए।

Analyse the need for Specialized Financial Institutions for providing Industrial Finance in India. 

उत्तर – भारत में औद्योगिक वित्त की पूर्ति के लिए विशेष वित्तीय संस्थाओं की आवश्यकता 

(Need for Specialized Financial Institutions

for Providing Industrial Finance in India) 

भारत में औद्योगिक वित्त प्रदान करने वाली किसी ससंगठित संस्था की आवश्यक बहत समय से अनुभव की जा रही थी। 1918 ई० के औद्योगिक आयोग’ ने अपनी रिपोटम भारतीय औद्योगिक कम्पनियों के अर्थ-प्रबन्धन की महत्ता पर जोर देकर यह सुझाव दिया थ कि देश की औद्योगिक प्रगति के लिए एक अखिल भारतीय वित्त-पुरक संस्था होनी चा ‘बैंकिंग जाँच समिति, 1929’ ने भी उद्योगों को वित्तीय सहायता देने के लिए एक ओद्यालय वित्त निगम की स्थापना पर जोर दिया था, लेकिन इन सुझावों का कोई परिणाम नहीं निकला।

द्वितीय विश्वयुद्ध के समाप्त हो जाने पर भारत में औद्योगिक वित्त की समस्या की ओर लोगों का ध्यान पुन: आकर्षित हुआ।

स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात् 1948 ई० में औद्योगिक वित्त निगम की स्थापना के लिए एक विधेयक पारित किया गया, जिसके अनुसार 1 जुलाई, 1948 को ‘भारतीय औद्योगिक वित्त निगम’ की स्थापना की गई। अप्रैल 1948 ई० में घोषित औद्योगिक नीति म विशिष्ट औद्योगिक वित्तीय संस्थाएँ खोलने की आवश्यकता पर विशेष ध्यान दिया गया। इस नीति के फलस्वरूप देश में अनेक वित्तीय संस्थाएँ स्थापित की गईं।

भारत में विशेष वित्तीय संस्थाएँ

(Special Financial Institutions in India

भारत में औद्योगिक वित्त प्रदान करने वाली प्रमुख संस्थाएँ निम्नलिखित हैं

(I) भारतीय औद्योगिक वित्त निगम लि०

(Industrial Finance Corporation of India Ltd.), 

(II) राज्य वित्त निगम

(State Financial Corporation), 

(III) भारतीय औद्योगिक ऋण एवं विनियोग निगम लि.

(Industrial Credit and Investment Corporation of India Ltd.), 

(IV) भारतीय औद्योगिक विकास बैंक

(Industrial Development Bank of India), 

(V) राष्ट्रीय औद्योगिक विकास निगम

(National Industrial Development Corporation), 

(VI) यूनिट ट्रस्ट ऑफ इण्डिया

(Unit Trust of India)। 

इन संस्थाओं का संक्षिप्त विवेचन निम्नवत् है

I. भारतीय औद्योगिक वित्त निगम लि.

(Industrial Finance Corporation of India Ltd.) 

स्थापना एवं उद्देश्य (Establishment and Objectives)-‘भारतीय औद्योगिक वित्त निगम’ की स्थापना 1 जुलाई, 1948 को ‘औद्योगिक वित्त निगम अधिनियम, 1948’ के अन्तर्गत की गई। इस संस्था का मुख्य उद्देश्य उद्योगों को दीर्घकालीन एवं मध्यमकालीन ऋण प्रदान करना है।

प्रबन्ध (Management)-इस निगम का प्रबन्ध एक संचालक मण्डल द्वारा किया जाता है, जिसमें अध्यक्ष के अतिरिक्त 12 संचालक होते हैं। इनमें चार संचालक भारतीय औद्योगिक विकास बैंक’ द्वारा, दो केन्द्रीय सरकार द्वारा, दो अनुसूचित बैंकों द्वारा, दो बीमा एवं वित्तीय संस्थाओं द्वारा और दो सहकारी बैंकों द्वारा चुने अथवा मनोनीत किए जाते हैं। संचालक मण्डल की

सहायता के लिए एक केन्द्रीय समिति’ है, जिसके पाँच सदस्य हैं। इसके अतिरिक्त, निगम को परामर्श देने के लिए 6 सलाहकार समितियाँ हैं। निगम का मुख्य कार्यालय नई दिल्ली में है।

1 जुलाई, 1993 से इस निगम की प्रकृति में परिवर्तन करके इसे एक कम्पनी का रूप दे दिया गया है। इस आधार पर इसे ‘भारतीय औद्योगिक वित्त निगम लि०’ का स्तर प्रदान कर दिया गया। 

वित्तीय सहायता के स्वरूप 

(Forms of Financial Assistance)

वित्तीय सहायता के विभिन्न स्वरूप निम्न प्रकार हैं

(1) औद्योगिक संस्थाओं को ऋण देना अथवा उनके द्वारा निर्गमित ऋणपत्रों को खरीदना, जो अधिक-से-अधिक 25 वर्षों के अन्दर देय हों।

(2) औद्योगिक संस्थाओं द्वारा निर्गमित अंशों, ऋणपत्रों एवं बॉण्ड्स का अभिगोपन , करना।

(3) औद्योगिक संस्थाओं द्वारा पूँजी बाजार हेतु लिए जाने वाले ऋणों की गारण्टी प्रदान करना।

(4) भारतीय औद्योगिक संस्थाओं द्वारा विदेशी अथवा भारतीय निर्माताओं से स्थगित भुगतान के आधार पर लिए गए माल अथवा मशीन के मूल्य के भुगतान की गारण्टी प्रदान करना।

(5) कम्पनियों की अंश-पूँजी और स्कन्धों का प्रत्यक्ष अभिदान करना। 

(6) विदेशी मुद्रा में प्राप्त किए गए ऋणों की गारण्टी प्रदान करना।

(7) विदेशी बैंक अथवा केन्द्रीय सरकार द्वारा किसी औद्योगिक संस्था को ऋण देने अथवा ऋणपत्रों को क्रय करने पर केन्द्रीय सरकार तथा विश्व बैंक के एजेण्ट के रूप में कार्य करना।

II. राज्य वित्त निगम

(State Financial Corporation) ___

स्थापना एवं उद्देश्य (Establishment and Objectives)-28 दिसम्बर, 1951 को केन्द्रीय सरकार ने राज्य वित्त निगम अधिनियम’ पारित किया। इसके अन्तर्गत सबसे पहला ‘राज्य वित्त निगम’ 1953 ई० में पंजाब राज्य में स्थापित किया गया। इस समय देश में 18 राज्य वित्त निगम’ हैं, जिनमें से 17 ‘राज्य वित्त निगम’, ‘राज्य वित्त निगम अधिनियम 1951 के तहत गठित किए गए थे, जबकि ‘तमिलनाडु औद्योगिक निवेश निगम लि.’ की स्थापना ‘कम्पना अधिनियम के तहत की गई थी। इनकी स्थापना का मुख्य उद्देश्य विभिन्न राज्यों की लघु एवं मध्यम आकार वाली औद्योगिक संस्थाओं को दीर्घकालीन ऋण प्रदान करना है।

प्रबन्ध (Management)-प्रत्येक राज्य वित्त निगम’ का प्रबन्ध एक संचालक मण्डल द्वारा किया जाता है, जिसमें 10 सदस्य होते हैं। संचालक मण्डल के अतिरिक्त कुछ राज्यों में एक-एक ‘कार्यकारिणी समिति’ भी होती है, जिसके सदस्यों की संख्या चार होती है। समिति का अध्यक्ष वित्त निगम का प्रबन्ध संचालक होता है।

उद्यमिता के आधारभूत तत्त्व राज्य वित्त निगमों के कार्य 

(Functions of State Financial Corporations)

राज्य वित्त निगम के प्रमुख कार्य निम्नवत् हैं

(1) ये 20 वर्ष तक के लिए ऋण प्रदान कर सकते हैं। .

(2) ये पब्लिक लि० कम्पनी व सहकारी संस्थाओं को ₹ 20 लाख तक व अन्य औद्योगिक संस्थाओं को उनकी प्रदत्त पँजी के 10% या ₹ 10 लाख (जो भा कम हा) स अधिक ऋण नहीं प्रदान कर सकते।

(3) ये औद्योगिक संस्थाओं के 20 वर्ष तक के ऋणपत्र क्रय कर सकते हैं। 

(4) ये अन्य वित्तीय संस्थाओं से लिए गए ऋणों की गारण्टी देते हैं। 

(5) ये औद्योगिक संस्थाओं के अंशों व ऋणपत्रों के अभिगोपन का कार्य करते हैं।

(6) ये राज्य सरकार व ‘औद्योगिक वित्त निगम’ जैसी संस्थाओं के प्रतिनिधि के रूप में कार्य कर सकते हैं।

III. भारतीय औद्योगिक ऋण एवं विनियोग निगम लि० 

(Industrial Credit and Investment Corporation of India Ltd.)

स्थापना एवं उद्देश्य (Establishment and Objectives)-‘भारतीय औद्योगिक ऋण एवं विनियोग निगमकी स्थापना 5 जनवरी, 1955 को की गई। इसकी स्थापना के तीन प्रमुख उद्देश्य थे

(1) निजी क्षेत्र के उपक्रमों के निर्माण, विकास एवं आधुनिकीकरण में सहायता करना, (2) ऐसे निजी उपक्रमों में देश एवं विदेश के विभिन्न साधनों से निजी पूँजी के विनियोग को प्रोत्साहित करना,

(3) औद्योगिक विनियोग में निजी स्वामित्व को प्रोत्साहित एवं विनियोग बाजारों का विकास करना।

प्रबन्ध (Management)—निगम का प्रबन्ध एक संचालक मण्डल द्वारा किया जाता है। इसमें कम-से-कम 5 और अधिक-से-अधिक 15 सदस्य हो सकते हैं। इस समय संचालक मण्डल में 14 सदस्य हैं। निगम का प्रधान कार्यालय मुम्बई में तथा तीन क्षेत्रीय कार्यालय दिल्ली, कोलकाता तथा चेन्नई में हैं। 

सहायता के स्वरूप (Forms of Assistance)

सहायता के विभिन्न स्वरूप इस प्रकार हैं

(1) यह निगम 15 वर्ष तक के लिए दीर्घकालीन एवं मध्यमकालीन ऋण प्रदान करता है। (2) यह अंशों व ऋणपत्रों का अभिगोपन कर सकता है। (3) यह प्रत्यक्ष रूप से अंशों में बजी लगा सकता है। (4) यह ऋणों के लिए गारण्टी दे सकता है। (5) यह विदेशी मुद्रा में अण प्रदान कर सकता है। (6) यह उद्योगों को प्रबन्ध व तकनीकी सलाह देता है।

IV. भारतीय औद्योगिक विकास बैंक 

(Industrial Development Bank of India)

स्थापना एवं उद्देश्य (Establishment and Objectives)-भारतीय औद्योगिक विकास बैंक की स्थापना 1 जुलाई, 1964 को ‘औद्योगिक विकास अन्तर्गत हुई। इसकी स्थापना के उद्देश्य निम्नलिखित हैं

(1) वित्तीय संस्थाओं को औद्योगिक वित्त के लिए सहायता देना तथा बैंकों को पनाह एवं गारण्टी की सुविधा देना, (2) वित्तीय संस्थाओं के अंशों व बॉण्ड्स को क्रय करना उनका अभिगोपन करना, (3) औद्योगिक संस्थाओं के बिलों को बट्टे पर भुनाना, (4) औद्योगिक संस्थाओं को ऋण देना, (5) औद्योगिक विकास से सम्बन्धित अनुसन्धान सर्वेक्षण कर तकनीकी आर्थिक अध्ययनों को सम्पन्न करना, (6) भारत में वित्तीय संस्थाओं के लिए केन्द्रीय समन्वयकारी संस्था के रूप में कार्य करना, (7) भावी औद्योगिक विकास के लिए प्राथमिकताओं का क्रम निर्धारित करना, (8) दीर्घकालीन व मध्यमकालीन औद्योगिक वित्त की माँग व पर्ति के अन्तराल को दूर करना।

प्रबन्ध (Management)-बैंक के कार्यों का प्रबन्ध एक संचालक मण्डल द्वारा किया जा रहा है, जिसमें प्रबन्ध संचालक सहित 22 संचालक हैं। इनमें 13 अधिकारीय संचालक, 5 गैर-अधिकारीय संचालक, 1 कर्मचारियों का प्रतिनिधि संचालक, 1 रिजर्व बैंक का प्रतिनिधि तथा 1 अध्यक्ष एवं 1 प्रबन्ध संचालक है। बैंक का मुख्य कार्यालय मुम्बई में है।

बैंक का पुनर्सगठन (Re-organization of the Bank)-‘भारतीय औद्योगिक विकास बैंक’ ने रिजर्व बैंक से पृथक् होकर औद्योगिक वित्त के क्षेत्र में एक शीर्ष संस्था के रूप में 16 फरवरी, 1976 से अपना कार्य आरम्भ कर दिया है। 

सहायता का स्वरूप (Forms of Assistance)

भारतीय औद्योगिक विकास बैंक द्वारा सहायता निम्नलिखित स्वरूपों में दी जाती है

(1) यह औद्योगिक संस्थाओं को दीर्घकालीन ऋण प्रदान करता है तथा उनके ऋणपत्र क्रय करता है। (2) यह औद्योगिक संस्थाओं द्वारा बैंकों से लिए जाने वाले ऋणों व स्थगित भगतानों की गारण्टी देता है। (3) यह वित्तीय संस्थाओं द्वारा दिए जाने वाले ऋणों एवं नियतिक लिए पुनर्वित्त की सुविधा देता है। (4) यह औद्योगिक संस्थाओं के अंश खरीद सकता है

(5) यह औद्योगिक संस्थाओं के अंशों, ऋणपत्रों, बॉण्ड्स आदि के लिए अभिगोपन का काय कर सकता है। (6) यह उद्योगों के लिए अनुसन्धान एवं सर्वेक्षण कर सकता है।

v. राष्ट्रीय औद्योगिक विकास निगम 

(National Industrial Development Corporation)

(establishment and Objectives) – Jeta 3110m विकास निगम की स्थापना 29 अक्टूबर, 1954 को एक राजकीय संस्था के रूप में हुई, . पर केन्द्रीय सरकार का पूर्ण स्वामित्व एवं नियन्त्रण है। प्रारम्भ में इसके अग्रालाखत निर्धारित किए गए

(1) देश में सूती वस्त्र तथा जूट उद्योग की मशीनरी के आधुनिकीकरण एवं पुनर्स्थापन के लिए विशेष ऋण प्रदान करना। (2) मशीनरी एवं संयन्त्र निर्माण करने वाली संस्थाओं के विकास के लिए ऋण प्रदान करना। (3) उद्योगों को आवश्यक मशीनरी एवं संयन्त्र प्रदान करने में सहायता देना तथा आधारभूत उद्योगों का प्रवर्तन, निर्माण एवं परिसंचालन करना। (4) देश के औद्योगिक विकास में सहायता तथा वर्तमान और प्रस्तावित उद्योगों को तकनाका एक इंजीनियरिंग सेवाएँ प्रदान करना।

वर्तमान समय में यह निगम वित्तीय निगम के स्थान पर एक ‘अन्तर्राष्ट्रीय औद्योगिक सलाहकार एजेन्सी’ के रूप में कार्य कर रहा है।

प्रबन्ध (Management)-निगम का प्रबन्ध केन्द्रीय सरकार द्वारा मनोनीत किए गए संचालक मण्डल द्वारा किया जाता है। संचालकों की संख्या 15 से 25 तक हो सकती है। इस समय अध्यक्ष को मिलाकर कुल 15 संचालक हैं। इसके अतिरिक्त, एक कार्यकारिणी समिति तथा सूती वस्त्र, जूट एवं मशीनी औजार उद्योगों के लिए 3 पृथक् सलाहकार समितियाँ भी हैं। निगम का प्रधान कार्यालय दिल्ली में है। 

सहायता का स्वरूप (Forms of Assistance)

निगम द्वारा सहायता दो प्रकार से की जाती है—(1) कुछ उद्योगों के आधुनिकीकरण एवं पुन: संस्थापन के लिए ऋण तथा (2) उद्योगों की स्थापना के लिए प्रारम्भिक अनुसन्धान करना एवं तकनीकी सलाह देना।

VI. यूनिट ट्रस्ट ऑफ इण्डिया

(Unit Trust of India) 

स्थापना एवं उद्देश्य (Establishment and Objectives)-‘यूनिट ट्रस्ट ऑफ इण्डिया’ की स्थापना 1 जुलाई, 1964 को ‘यूनिट ट्रस्ट ऑफ इण्डिया अधिनियम’ के अन्तर्गत की गई। इसके निम्नलिखित उद्देश्य है

(1) जनता की बचत को एकत्रित करना, (2) छोटे-छोटे विनियोजकों को यूनिट बेचकर बचत एकत्रित कर पूँजी में वृद्धि करना तथा (3) इस बचत को उद्योगों में विनियोजित करना।

प्रबन्ध एवं संगठन (Management and Organization)-यूनिट ट्रस्ट का प्रबन्ध एक प्रन्यासी मण्डल (Board of Trustees) द्वारा किया जाता है। इस मण्डल में 10 प्रन्यासी होते हैं। इसके अतिरिक्त, रिजर्व बैंक द्वारा एक कार्यकारी प्रन्यासी भी मनोनीत किया जाता है। यनिट ट्रस्ट की एक प्रशासनिक समिति भी है, जिसमें प्रन्यास मण्डल के अध्यक्ष कार्यकारी प्रन्यासी तथा रिजर्व बैंक द्वारा मनोनीत दो प्रन्यासी होते हैं। 16 फरवरी 1976 से यनिट ट्रस्ट रिजर्व बैंक के स्थान पर ‘भारतीय औद्योगिक विकास बैंक’ की सहायक संस्था हो गई है। 

वित्त-व्यवस्था (Financing)

यनिट ट्रस्ट की प्रारम्भिक पूँजी ₹ 5 करोड़ थी, जिसमें से ₹ 1.5 करोड़ भारतीय औद्योगिक विकास बैंक द्वारा, ₹ 75 लाख स्टेट बैंक द्वारा, ₹ 1.75 करोड़ जीवन बीमा निगम

द्वारा और रू 1 करोड़ अनसचित बैंकों तथा अन्य वित्तीय संस्थाओं द्वारा प्रदान किा इसके अतिरिक्त, यूनिट ट्रस्ट अपने यूनिटों को जनता में भी विक्रय करता है।

आलोचनात्मक मूल्यांकन

(A Critical Evaluation) 

डॉ० पी० एस० लोकनाथन के शब्दों में, “इन विशिष्ट वित्तीय संस्थाओं तथा जी बामा निगम की विनियोजन क्रियाओं से देश की औद्योगिक वित्त व्यवस्था की अनेक कमियाँ का हुई हैं। आज जो देश में तीव्र गति से औद्योगीकरण हो रहा है, वह इन नवीन संस्थाओं के अभाव में कभी भी सम्भव नहीं होता। वास्तव में, औद्योगिक पूँजी को गतिमान करने में इन विशिल वित्तीय संस्थाओं ने महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया है। इन संस्थाओं ने औद्योगिक उपक्रमों को केवल पूँजी ही नहीं प्रदान की है वरन् अप्रत्यक्ष रूप से औद्योगिक परियोजनाओं के मूल्यांकन में भी योगदान दिया है।” फिर भी इनके विरुद्ध निम्नलिखित आलोचना की। जाती है

(1) इन संस्थाओं ने देश के विकसित क्षेत्रों के उद्योगों को अधिक सहायता दी है तथा अविकसित राज्यों की उपेक्षा की है।

(2) इन संस्थाओं ने ऋण देने में पक्षपात करके देश में आर्थिक सत्ता के केन्द्रीकरण में सहायता दी है।

(3) ये संस्थाएँ ऋण प्रदान करने में काफी देरी करती हैं। 

(4) ऋण देना व्ययसाध्य है तथा कहीं-कहीं इससे कार्य में दोहरापन आ जाता है।

डॉ० पी० एस० लोकनाथन के ही शब्दों में, “सन् 1951 ई० के बाद से औद्योगिक वित्त व्यवस्था की प्रवृत्ति में क्रान्तिकारी परिवर्तन हुए हैं। देश में हए तीव्र गति से औद्योगीकरण तथा उसके विविधीकरण के कारण विभिन्न प्रकार के वित्त की माँग बढ़ी है। संस्थागत औद्योगिक वित्त, जो स्वतन्त्रता से पूर्व बिल्कुल नहीं था, एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।”

प्रश्न – साहस पूँजी से क्या आशय है? भारत में साहस पूँजी का क्षेत्र एवं स्त्रोत की विवेचना कीजिए।

What is meant by Venture Capital ? Discuss the scope and source of venture capital in India. 

उत्तर – साहस पूँजी से आशय

(Meaning of Venture Capital) 

साहस पूँजी कम्पनी भारत में एक नवीन अवधारणा है, जिसे टेक्नोलॉजी विकास एव उन्नयन हेतु उच्च जोखिमयुक्त उद्यमियों की वित्तीय आवश्यकताओं की पर्ति के लिए बनाया गया है। साहस पूँजी दो शब्दों का योग है-साहस (Venture) एवं पूँजी (Capital ‘साहस’ (Venture) से आशय किसी कार्यवाही (a course of proceeding) सर जिसका परिणाम अनिश्चित होता है, लेकिन जिसमें हानि के खतरे की जोखिम समाहित रहती है। ‘पूँजी’ (Capital) से आशय उपक्रम प्रारम्भ करने के लिए संसाधनों से है। इस प्रकार, साहस पूंजी से आशय उपक्रम के उन संसाधनों (पँजी) से है जिनमें जोखिम तथा साहसिकता (risk and adventure) समाहित है। अन्य शब्दों में, नए व्यावसायिक उपक्रम को प्रारम्भ से (from scratch) कोष उपलब्ध कराने की वित्तीय क्रिया को ‘साहस पूँजी’ कहा जाता ह। इस परिभाषा में सभी उच्च जोखिमें तथा उच्च सम्भावित विनियोग सम्मिलित हैं। एक नइ कम्पना को प्रारम्भिक अवस्था में वेंचर कैपिटल उपलब्ध करायी जाती है जो तेजी से आगे बढ़ना चाहती है।

वेन हाँर्न (Van Horne) के अनुसार, “वेंचर पँजी एक नए उपक्रम में सम्मिलित कोषों का प्रतिनिधित्व करता है। कभी-कभी ऋण कोष (debt funds) भी उपलब्ध कराए जाते हैं, लेकिन अधिकांश भाग के लिए सामान्य स्टॉक (common stock) हा साम्मालत होता है। प्रायः ऐसा स्टॉक वर्षों तक रजिस्टर्ड नहीं होता है जिसे ‘letter stock’ के नाम स जाना जाता है। यह उस समय तक नहीं बेचा जा सकता है जब तक कि यह रजिस्टर्ड नहीं हो जाता है। अत: विनियोक्ताओं की ऐसे कोषों पर एक निश्चित अवधि तक तरलता नहीं होती है। इसका मत है कि एक नए उपक्रम (venture) के साथ अनेक प्रकार की जोखिमें सम्मिलित रहती हैं और असफलता की उच्च सम्भावना रहती है। असफलता के साथ ही उद्यमी (investor) का सब कुछ समाप्त हो जाता है। ऐसे वेंचर कैपिटल पर पोर्टफोलियो प्रत्याय अधिकांश विनियोगों में काफी संवेदनशील (highly skewed) होता है, फलत: ऐसे विनियोगों के लिए वेंचर कैपिटल मिलना काफी जटिल होता है। 

वास्तव में, वेंचर कैपिटल को ऐसी सृजनात्मक पूँजी (creative capital) की संज्ञा दी जा सकती है, जिसके द्वारा आर्थिक क्रियाओं के निष्पादन की आशा की जाती है, जो अन्य विनियोग वाहनों (investment vehicles) से भिन्न हैं तथा जो विस्तार पूँजी (expansion capital) की तरह कार्य करती है। यह नई अवधारणाओं के समता समर्थन की क्रिया है, जिसमें उच्च जोखिम तथा उच्च वृद्धि एवं लाभ सम्भावना विद्यमान है। साहस पूँजी कोष प्रदान करने के साथ-साथ फर्म को स्थापित करने के लिए वांछित चातुर्य भी प्रदान करता है, विपणन व्यूहरचना की प्ररचना में सहायता करता है तथा उसका प्रबन्ध एवं संगठन करता है। इस प्रकार यह उच्च जोखिम विनियोग दशाओं के अधीन क्रमबद्ध रूप से (successive stages) कम्पनी के विकास की अवस्थाओं से दीर्घकालीन साहचर्य है जिसमें विकास की प्रत्येक अवस्था पर विशिष्ट प्रकार के वित्त प्रबन्ध की पूर्ति की जाती है।

साहस पूँजी का क्षेत्र

(Scope of Venture Capital) 

परियोजना की विभिन्न अवस्थाओं में साहस पूँजी के विभिन्न रूप हो सकते हैं। परियोजना के विकास की चार क्रमबद्ध अवस्थाएँ निम्नलिखित हैं

परियोजना विचार का विकास, विचार का क्रियान्वयन, वाणिज्यिक उत्पादन एवं विपणन तथा पैमाने की बचतें तथा स्थिरता प्राप्त करने हेतु बड़े पैमाने पर विनियोग।

इन चारों अवस्थाओं में साहस पूँजी द्वारा वित्त प्रबन्धन के प्रमुख रूप निम्नलिखित हैं

1. एक विचार का विकास-बीज पूँजी (Development of an Idea : Seed Capital)-परियोजना विकास की प्रारम्भिक अवस्थाओं में साहस पूंजीपति (venture capitalist) एक विचार को व्यावसायिक रूप में परिणत करने हेतु बीज पुँजी capital) उपलब्ध कराता है। इस अवस्था में गहराई से अनुसंधान किया जाता है जिसमें या अधिक वर्ष का समय लग जाता है।

2. क्रियान्वयन अवस्था-शुरुआती वित्त (Implementation Stage : Starts up Finance)-जब तक उत्पाद या सेवा का निर्माण करने के लिए किसी फर्म का किया जाता है तो उद्यमी पूँजीपति (venture capitalist) द्वारा शुरुआती वित्त उपलब्ध कराया जाता है। प्रथम एवं द्वितीय स्थिति की पूँजी का उपयोग समग्र पैमाने पर निर्माण करने तथा अन्य व्यावसायिक वृद्धि हेतु किया जाता है।

3. उड़न अवस्था-अतिरिक्त वित्त (Fledging Stage : Additional Finance)-इस अवस्था में फर्म उत्पाद के निर्माण की क्रिया में तेजी से प्रवेश करती है. लेकिन उसे कुछ जटिल समस्याओं (teething problems) का सामना करना पड़ता है। वह पर्याप्त कोषों का सृजन करने योग्य नहीं होती है। अत: विपणन अवस्थापना (marketing infrastructure) के विकास हेतु अतिरिक्त वित्त उपलब्ध कराया जाता है।

4. स्थापना अवस्था-स्थापना वित्त (Establishment Stage : Establishment Finance)-इस अवस्था में फर्म बाजार में स्थापित हो जाती है तथा उससे तीव्र गति से विस्तार की आशा की जाती है, फलत: विस्तार एवं विविधीकरण हेतु पुनः अतिरिक्त वित्त की आवश्यकता होती है ताकि वह बड़े पैमाने के लाभ तथा स्थिरता को प्राप्त हो सके। स्थापना अवस्था की समाप्ति के बाद फर्म का स्टॉक एक्सचेंज पर सूचीयन हो जाता है, फलतः साहसी पूँजीपति उपलब्ध विद्यमान रास्तों के द्वारा अपने द्वारा धारित अंशों का आयोजन (disinvestment) कर लेता है।

परियोजना अवस्था एवं साहस पूँजी स्वरूप 

साहस पूँजी के स्रोत एवं विधियाँ 

(Methods and Sources of Venture Financing) 

साहस पूँजी के अनेक स्रोत हैं जिसमें से प्रमुख निम्नलिखित हैं

(1) समृद्ध निजी व्यक्ति (Wealthy individuals), 

2) पेंशन फण्ड, प्रन्यास, बीमा कम्पनी, बैंक आदि।

भारत में साहस पूँजी निम्नलिखित तीन रूपों में उपलब्ध है

(1) समता (equity) 

(2) शर्तयुक्त ऋण (conditional loan) 

(3) आय नोट (income note)।

वर्तमान समय में भारत में वेंचर कैपिटल प्रदान करने वाली संस्थाओं (Venture Capital Players) को निम्नलिखित चार श्रेणियों में विभक्त किया जा सकता है

1. अखिल भारतीय वित्तीय संस्थाओं द्वारा प्रवर्तित कम्पनियाँ – इसमें निम्नालाखत कम्पनियाँ सम्मिलित हैं

(i) भारतीय औद्योगिक विकास बैंक का वेंचर कैपिटल डिवीजन’।

(ii) जोखिम पूँजी एवं टेक्नोलॉजी वित्त निगम लिमिटेड (भारतीय औद्योगिक वित्त निगम की सहायक)।

(iii) भारतीय टेक्नोलॉजी विकास एवं सूचना कम्पनी लिमिटेड (भारतीय औद्योगिक साख एवं विनियोग निगम तथा यूनिट ट्रस्ट ऑफ इण्डिया द्वारा प्रवर्तित)।

2. राज्य वित्त निगमों द्वारा प्रवर्तित कम्पनियाँ – इसमें निम्नलिखित कम्पनियाँ सम्मिलित हैं

(i) गुजरात वेंचर फाइनेंस लिमिटेड (गुजरात वित्त निगम द्वारा प्रवर्तित)। (ii) आन्ध्र प्रदेश औद्योगिक विकास निगम वेंचर कैपिटल लिमिटेड। 

3. बैंकों द्वारा प्रवर्तित कम्पनियाँ इसमें निम्नलिखित कम्पनियाँ सम्मिलित हैं

(i) कैन बैंक वेंचर कैपिटल फण्ड (कैनफिना तथा कैनरा बैंक द्वारा प्रवर्तित कम्पनियाँ)।

(ii) एस०बी०आई० वेंचर कैपिटल फण्ड। (iii) भारतीय विनियोग फण्ड (ग्रिन्डलेज बैंक द्वारा प्रवर्तित)। (iv) इन्फ्रास्ट्रक्चर लीजिंग (सेण्ट्रल बैंक ऑफ इण्डिया द्वारा प्रवर्तित)। 

4. निजी क्षेत्र की कम्पनियाँ – इसमें निम्नलिखित कम्पनियाँ सम्मिलित हैं(i) इन्डज वेंचर कैपिटल फण्ड (मफतलाल एवं हिन्दुस्तान लीवर द्वारा प्रवर्तित)। 

(ii) 20वीं सेंचुरी वेंचर कैपिटल कॉरपोरेशन लिमिटेड। 

(iii) वेंचर कैपिटल फण्ड (वी० बी० देसाई द्वारा प्रवर्तित)।

प्रश्न – PEST विश्लेषण से क्या आशय है? यह किन-किन कारकों से प्रभावित होता है?

What is meant by PEST Analysis ? Discuss the factors affecting it. 

उत्तर- पेस्ट या स्टेप विश्लेषण का आशय

(Meaning of PEST or STEP Analysis) 

किसी संस्था या विभाग के बाहरी वातावरण की जाँच PEST विश्लेषण द्वारा की जा सकती है। बाह्य तत्त्व प्राय: संस्था के नियन्त्रण के बाहर होते हैं एवं कभी-कभी संस्था के लिए चुनौतियाँ प्रस्तुत करते हैं। PEST का अर्थ है

P = Political Factors 

E = Economic Factors 

S = Sociocultural Factors 

T = Technological Factors.

TEST क अक्षरों के ही पुनः संयोग द्वारा STEP शब्द की रचना की गई है। अतः PEST व STEP विश्लेषण का समान अर्थ है।

पेस्ट को प्रभावित करने वाले कारक

(Factors affecting the PEST) 

पेस्ट को प्रभावित करने वाले कारक निम्न प्रकार हैंI. 

1. राजनीतिक एवं कानूनी वातावरण का विश्लेषण (Political and Legal Environment Scan)

राजनीतिक निर्णयों को व्यवसाय द्वारा एक व्यापक परिवेश में स्वीकार किया जाता है तथा इसके अनुसार अपनी कार्यविधि में समायोजन के प्रयास किए जाते हैं। लेकिन ऐसा बहुत कम होता है कि राजनीतिक निर्णय व्यवसाय के व्यापक हित में ही लिए जाएँ। व्यवसाय के लिए प्रशासकीय वर्ग भी बहुत भारी पड़ता है। धीमी गति, मनमानी, भ्रष्टाचार, कार्य में बाधाएँ खड़ी करना आदि कारणों से प्रशासनिक तन्त्र चर्चाओं के घेरे में रहता है, तभी इसे ‘नौकरशाही’ व ‘लालफीताशाही’ जैसे नामों से जाना जाता है।

दूसरी ओर वैधानिक वातावरण का क्षेत्र भी अत्यन्त व्यापक है। इसके द्वारा आर्थिक जगत में व्यवसाय के सभी पहलुओं पर नियन्त्रण रखा जाता है। देश में व्यवसाय एवं उद्योगों को प्रभावित करने वाले निम्नलिखित अधिनियम महत्त्वपूर्ण माने जाते हैं

(1) भारतीय कम्पनी अधिनियम, (2) भारतीय अनुबन्ध अधिनियम, (3) वस्तु विक्रय अधिनियम, (4) भारतीय साझेदारी अधिनियम, (5) उद्योग विकास एवं नियमन अधिनियम, (6) एकाधिकार एवं प्रतिबन्धित व्यापार व्यवहार अधिनियम, (7) प्रतिभति प्रसंविदा नियमन अधिनियम, (8) विदेशी विनिमय प्रबन्धन अधिनियम, (9) प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड अधिनियम (10) भारतीय कारखाना अधिनियम, (11) पेटेन्ट अधिनियम (12) जल प्रदषण प नियन्त्रण अधिनियम, (13) वायु प्रदूषण निवारण व नियन्त्रण अधिनियम, (14) औद्योगिक विवाद अधिनियम, (15) न्यूनतम मजदूरी अधिनियम, (16) बोनस भुगतान अधिनियम, 17 कर्मचारी क्षतिपूर्ति अधिनियम, (18) आवश्यक वस्तु अधिनियम, (19) बाँट एवं माप-तौल अधिनियम, (20) चोर बाजारी निवारण अधिनियम, (21) रुग्ण औद्योगिक कम्पनी (विशेष प्रावधान) अधिनियम, (22) खाद्य अपमिश्रण निवारण अधिनियम, (23) पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, (24) व्यापार एवं वस्तु चिह्न अधिनियम, (25) कर्मचारी राज्य बीमा अधिनियम, (26) कर्मचारी भविष्य निधि अधिनियम आदि।

II. आर्थिक वातावरण का विश्लेषण 

(Economic Environment Scan)

1. आर्थिक प्रणाली (Economic System)-व्यवसाय की दष्टि से किसी देश के आर्थिक वातावरण को समझने के लिए उस देश में प्रचलित आर्थिक प्रणाली का ज्ञान बहुत आवश्यक है। देश की आर्थिक प्रणाली उस देश की आर्थिक विचारधारा, आर्थिक संरचना व आर्थिक खुलेपन को प्रदर्शित करती है। इसके अध्ययन से व्यवसाय को देश की वर्तमान अवस्था की जानकारी हो जाती है।

2. आर्थिक दशाएँ (Economic Conditions)-आर्थिक दशाएँ एक ओर आथिक प्रगति की सूचक मानी जाती हैं तो दूसरी ओर आर्थिक विकास की सम्भावनाओं का आधार प्रस्तुत करती हैं। सरकार इन्हें नियोजन एवं विकास का आधार मानकर अनेक कार्यक्रमों का संचालन करती है। व्यवसाय इनके आधार पर ही अपने विस्तार एवं विकास, नए बाजारों की खोज, नए उत्पादों की शुरुआत, व्यावसायिक उपक्रमों का स्थानीकरण, विभिन्न उत्पादों का सम्मिश्रण, नए मॉडल आदि के बारे में योजनाएँ एवं कार्यक्रम तैयार करता है।

3. आर्थिक नीतियाँ (Economic Policies)-किसी देश की आर्थिक नीतियाँ उद्योग एवं आर्थिक क्रियाओं को बहुत प्रभावित करती हैं। एक विकासशील अर्थव्यवस्था में आर्थिक नीतियों का निर्धारण आर्थिक समानता, रोजगार सृजन, गरीबी निवारण, मुद्रा-स्फीति एवं संकुचन पर नियन्त्रण, आय वृद्धि, आन्तरिक बचत एवं विनियोजन अभिवृद्धि, निर्यात संवर्द्धन, विदेशी विनियोजन आदि लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए किया जाता है। 

III. सामाजिक वातावरण का विश्लेषण

(Social Environment Scan)

व्यवसाय का सामाजिक वातावरण समाज की प्रवृत्तियों, इच्छाओं, आकांक्षाओं, रीति-रिवाज एवं परम्पराओं आदि घटकों से निर्मित होता है। इन तत्त्वों की उपेक्षा करने पर व्यवसाय के प्रबन्धकों को समाज की आलोचना का शिकार होना पड़ता है। विगत दशकों में नई सामाजिक मान्यताओं की स्थापना हुई है, इनमें से कुछ महत्त्वपूर्ण मान्यताएँ निम्नलिखित हैं

(1) ज्ञान व शिक्षा के प्रति प्रेम। 

(2) कार्य के नए ढंगों को विकसित करने हेतु परिवर्तन एवं प्रयोग का महत्त्व।

(3) कार्य की इच्छा व क्षमता रखने वाले व्यक्तियों के लिए समाज में सदा अवसर विद्यमान रहते हैं।

(4) जाति, धर्म और सम्प्रदाय से परे ‘व्यक्ति’ के प्रति आदर भावना। 

(5) तर्क, विज्ञान एवं तकनीकी में विश्वास। 

(6) व्यवसाय के प्रति श्रद्धा एवं विश्वास। 

(7) व्यवसाय में प्रतियोगिता की भावना का विकास।

IV. प्रौद्योगिकी या तकनीकी वातावरण का विश्लेषण 

(Technological Environment Scan)

विज्ञान, ज्ञान उपलब्ध कराता है एवं प्रौद्योगिकी उसका उपयोग करती है। राष्ट्र का कनाका विकास उत्पादन की प्रणालियों. नई वस्तओं नए बाजार, नए कच्चे माल के स्रोत नए यन्त्र व उपकरण आदि को प्रभावित करता है।

प्रश्न – निर्यात-संवर्द्धन के लिए राजकोषीय एवं मौद्रिक नीतियों से सम्बन्धित उपायों की विवेचना कीजिए।

Discuss the measures relating to fiscal and monetary policies for export promotion. 

अथवा निर्यात संवर्द्धन से क्या आशय है? इस सम्बन्ध में क्या कठिनाइयाँ हैं? निर्यात वृद्धि के लिए उपयुक्त सुझाव दीजिए। सरकार ने इस दिशा में क्या किया है?

What is meant by Export Promotion ? What are the difficulties in this respect ? Suggest measures to increase Exports. What has the Government done in this respect ? 

उत्तर – निर्यात संवर्द्धन से आशय

(Meaning of Export Promotion) 

निर्यात संवर्द्धन से आशय देश के निर्यातों में वृद्धि करने से है। देश के आन्तरिक व्यापार को समद्ध करने तथा देश में आर्थिक विकास की गति को बढ़ाने के लिए निर्यातों में वृद्धि आवश्यक है। दूसरे, निर्यात प्रोत्साहन द्वारा ही हम आयातों का भुगतान कर सकते हैं, विदेशी ऋणों के मलधन तथा ब्याज की अदायगी कर सकते हैं तथा भुगतान सन्तुलन की प्रतिकूलता को सुधार सकते हैं।

निर्यात प्रोत्साहन में कठिनाइयाँ/बाधाएँ

(Difficulties in Export Promotion) 

स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात् हमने निर्यात वृद्धि के भरपूर प्रयास किए हैं, लेकिन फिर भी निर्यात के क्षेत्र में कुछ कठिनाइयाँ पूर्ववत् बनी रही हैं। ये कठिनाइयाँ/बाधाएँ निम्न प्रकार हैं

1. ऊँचे मूल्य (High Prices)-भारत में निर्यात वस्तुओं के मूल्य ऊँचे हैं, जिसके कारण विदेशी बाजारों में उनकी मांग कम होती जा रही है।

2. विदेशी प्रतियोगिता (Foreign Competition)-भारत की अनेक वस्तुएँ विदेशी प्रतियोगिता के समक्ष ठहर नहीं पातीं। पाकिस्तान ने जूट के माल में, जापान और चीन ने सती वस्त्रों में तथा श्रीलंका और इण्डोनेशिया ने चाय में हमारे बाजारों को संकुचित कर दिया है।

3. परिमाण सीमाएँ व ऊँचे कर (Quantity Limits and High Taxes)अनेक देशों ने हमारी वस्तुओं के आयात पर परिमाण सीमाएँ और ऊँचे आयात कर लगा रखे हैं, अत: उन देशों को हमारे निर्यात सीमित हो गए हैं।

4. निम्न स्तर का माल (Low Quality of Goods)-तकनीकी ज्ञान क उत्पादन का निम्न स्तर और आधुनिकीकरण की धीमी प्रगति के कारण देश में उत्पादित माल गण में निम्न कोटि का रहता है, जिसके कारण हमारा माल विदेशों में नहीं बिक पाता।

5. व्यापारियों की दोषपूर्ण व्यापार नीति (Faulty Trade Practice of Traders)-भारतीय व्यापारी निर्यात सामग्री को मानकों के अनुरूप नहीं भेजते, जबकि नमूने के रूप में उच्च कोटि का माल दिखाते हैं। इससे विदेशों में अनेक भारतीय वस्तुओं की साख गिर गई है।

6. सीमित बाजार (Limited Market)-भारत द्वारा निर्यात की जाने वाली अनेक वस्तुओं का बाजार अत्यन्त सीमित है। इसके अतिरिक्त भारत के निर्यात का एक बड़ा भाग परम्परागत वस्तुओं का है।

7. स्थानापन्न वस्तुओं का प्रभाव (Effect of Substitutes)-हमारे कुछ निर्यात स्थानापन्न वस्तुओं की प्रतियोगिता से प्रभावित हो रहे हैं। इनके परिणामस्वरूप निर्यात धीरे-धीरे कम होते जा रहे हैं। उदाहरण के लिए, भारतीय जूट से बनी वस्तुओं (बोरे, सुतली आदि) का स्थान अब धीरे-धीरे पॉलिथीन ने ले लिया है।

8. प्रचार एवं प्रसार की कमी (Lack of Advertisement)-साधनों के सीमित होने के कारण हमारा विदेशों में प्रचार व प्रसार कार्य धीमा रहा है, अत: हमारे निर्यातो में आशानुकूल वृद्धि नहीं हो सकी है।

निर्यात वृद्धि के लिए सुझाव

(Suggestions for Export Promotion) 

निर्यात संवर्द्धन के लिए निम्नलिखित सुझाव दिए जा सकते हैं-

(1) प्रतिस्पर्धात्मक शक्ति बढ़ाने के लिए उत्पादन लागत घटाई जाए। 

(2) उत्पादन पद्धति में सुधार किया जाए तथा श्रमिकों की उत्पादकता बढाई जाए। 

(3) कृषि उत्पादन तथा व्यापार सुविधाओं में वृद्धि की जाए। 

(4) निर्यात वस्तुओं की किस्म में सुधार किया जाए। 

(5) निर्यात प्रोत्साहन के लिए सकारात्मक प्रेरणाएँ दी जाएँ। 

(6) निर्यात वस्तुओं के उत्पादकों व निर्यातकों को वित्तीय सुविधाएँ प्रदान की जाएँ। 

(7) व्यापार समझौते के लाभों को प्राप्त करने के लिए भरपूर प्रयत्न किए जाएँ।

(8) पर्याप्त मात्रा में विदेशों में अपनी वस्तओं का प्रचार एवं प्रसार किया जाए। 

(9) विदेशी बाजारों का गहन एवं व्यापक सर्वेक्षण किया जाए। 

(10) भारताय माल की कीमतों को अन्तर्राष्ट्रीय प्रतिस्पर्धात्मक स्तरों के समरूप रखा जाए।

(11) कन्द्र तथा राज्य सरकारों द्वारा स्थापित विभागों में उचित एवं प्रभावपर्ण समन्वय स्थापित किया जाए।

(12) देश में निर्यात विकास कोष की स्थापना की जाए। 

(13) निर्यात-गृहों तथा अन्तर्राष्ट्रीय व्यापारिक केन्द्रों की स्थापना में सहायता दी जाए। 

(14) बन्दरगाहों का सुधार एवं अभिनवीकरण किया जाए। 

(15) व्यापार विपणन हेतु प्रशिक्षण दिया जाए। 

राजकोषीय और मौद्रिक नीतियों से सम्बन्धित उपाय

(Measures relating to Fiscal and Monetary Policies) 

1. नकद क्षतिपूर्ति समर्थन (Cash Compensatory Support)-इस स्कीम के अन्तर्गत निर्यातकों को उत्पादों के निवेशों पर कटौती रहित अप्रत्यक्ष करों व कुछ अन्य विशिष्ट अलाभकर स्थितियों के लिए क्षतिपूर्ति की जाती है। समय-समय पर आवश्यकतानुसार नकद क्षतिपूर्ति समर्थन प्रदान करने के लिए अतिरिक्त मदों का निर्धारण भी किया जाता रहा है।

2. शुद्ध प्रति अदायगी (Duty Drawback)-सरकार ने निर्यातित वस्तुओं पर उत्पाद शुल्क और देशीय करों में छूट दी है। छूट का हिसाब अलग-अलग मामलों के आधार पर लगाया जाता है। निर्यात की जाने वाली विभिन्न वस्तुओं के सम्बन्ध में शुल्क प्रति अदायगी (Drawback) की दरों की जून, 1988 में समीक्षा की गई थी। ऐसे महत्त्वपूर्ण उद्योगों की ओर विशेष ध्यान दिया गया था, जिनका पर्याप्त निर्यात होता है या जिनकी निर्यात क्षमता है और उनकी निविष्टियों पर काफी शुल्क लगता है। इसके अतिरिक्त, अनेक नई मदों को देश में पहली बार शुल्क प्रति अदायगी के लिए निर्धारित किया गया है।

3. निर्यात प्रधान इकाइयों को प्राविधिक ऋणों पर ब्याज से छट (Interest Concession on Term Loans to Export Oriented Units) अखिल भारतीय वित्तीय संस्थाएँ (IDBI, IFCI, ICI, CI, IRBI) निर्यात प्रधान इकाइयों को प्रत्येक वर्ष में उनकी निर्यात आवश्यकताओं, उनके निर्यातकों के प्रायोजित प्रत्याशित स्तर (Obligated/ projected Levels) को प्राप्त करने में उनके वास्तविक निष्पादन (Actual Performance) के आधार पर छूट देने की स्कीमें चला रही हैं।

4. पोत पर लदान से पूर्व और लदान के पश्चात् ऋण पर ब्याज में छूट (Interest Concession on Pre-Shipment and Post-Shipment Credit)-फरवरी 1988 में बजट प्रस्तुत करते समय यह घोषणा की गई थी कि सभी उत्पाद 180 दिन की अवधि क लिए 9.5% की रियायती दर पर पोत पर लदान से पूर्व और लदान के पश्चात् ऋण प्राप्त करने के पात्र होंगे।

5. निर्यात-आयात बैंक द्वारा समर्थन (Support from EXIM Bank)-भारतीय निर्यात-आयात बैंक निर्यात में सुविधा प्रदान करने की दृष्टि से पूर्तिकर्ताओं के ऋण को समर्थन तथा क्रेता ऋण उपलब्ध कराता रहा है। बैंक पूर्तिकर्ता को ऋण उस समय दिया जाता है, जब भारतीय निर्यातकर्ता निर्यातकों को सीधे ऋण प्रदान करते हैं। क्रेता को ऋण उस समय दिया जाता है, जब बैंक किसी समुद्रपारीय क्रेता को सीधे ही उधार देता है।

6. उत्पादकता कोष (Productivity Fund)–निर्यात संवर्द्धन के लिए विश्व बैंक द्वारा 250 मिलियन अमेरिकन डॉलर से एक उत्पादकता कोष की स्थापना की गई है। इसके अन्तर्गत इंजीनियरिंग व इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योग की निर्यातोन्मुखी इकाइयों को सहायता प्रदान की जाती है जिससे ये इकाइयाँ तकनीक व गुणवत्ता में सुधार कर सकें।

निर्यात वृद्धि के लिए सरकारी प्रयत्न

(Government Efforts for Export Promotion) 

निर्यात वृद्धि हेतु निम्नलिखित सरकारी प्रयास किए गए हैं

(1) भारतीय माल के लिए बाजार खोजने, विदेशों में उनका प्रचार करने, निर्यात सम्बन्धी आवश्यक आँकड़े एकत्रित करने, निर्यातकों को सुविधाएँ प्रदान करने और सूचना देने, निर्यात किए जाने वाले माल की गुणवत्ता सुधारने तथा इनसे सम्बन्धित नीतियाँ निर्धारत करने के लिए भारत ने स्वतन्त्रता के पश्चात् एक विशाल संगठन और अनेक संस्थाएँ स्थापित की हैं; जैसे-निर्यात निरीक्षण परिषद्, निर्यात संवर्द्धन सलाहकार परिषद् आदि।

(2) कुछ चुनी हुई वस्तुओं के निर्यात में वृद्धि के लिए निर्यात संवर्द्धन परिषदें बनाई गई हैं और इन परिषदों में समन्वय लाने के लिए ‘Federation of Indian Export Organisation’ स्थापित किया गया है।

(3) सन् 1962 ई० में ‘व्यापार बोर्ड’ की स्थापना की गई है। 

(4) ‘प्रदर्शन संचालनालय’ की स्थापना की गई है। 

(5) सन् 1956 ई० में ‘राजकीय व्यापार निगम’ की स्थापना की गई है। 

(6) सन् 1966 ई० में निर्यात साख और प्रत्याभूति निगम’ की स्थापना की गई है। 

(7) विभिन्न देशों के साथ द्विपक्षीय व्यापारिक समझौते किए गए हैं। 

(8) सरकार द्वारा विभिन्न प्रकार की कर रियायतें दी गई हैं। 

(9) जुलाई 1963 ई० में ‘विपणन विकास निधि’ की स्थापना की गई है।

(10) सन् 1964 ई० में विदेश व्यापार संस्थान’ की स्थापना की गई है। 

(11) 18 फरवरी, 1971 को ‘व्यापार विकास संस्था’ की स्थापना की गई है। 

(12) निर्यात क्षेत्र को प्राथमिक क्षेत्र मान लिया गया है। 

(13) सन् 1975 ई० में ‘समुद्री उत्पादन निर्यात विकास संस्था’ की स्थापना की गई है। 

(14) विदेशों में प्रशिक्षणार्थी भेजे जा रहे हैं। 

(15) सन् 1973 ई० में ‘खनिज एवं धात व्यापार निगम’ की स्थापना की गई। 

(16) सन् 1963 ई० में भारतीय अभ्रक व्यापार निगम’ की स्थापना की गई।

(17) मार्च 1968 ई० में सरकार ने अनेक व्यावसायिक फर्मों को निर्यात-गृह के रूप में मान्यता प्रदान की है।

(18) ‘औद्योगिक विकास बैंक’ द्वारा निर्यातकों को प्रत्यक्ष अग्रिम दिए जाते हैं। 

(19) सन् 1982 ई० में आयात-निर्यात बैंक (EXIM Bank) की स्थापना की गई है।

(20) सन् 1963 ई० में ‘निर्यात (किस्म नियन्त्रण और निरीक्षण) अधिनियम’ पारित किया गया। सन् 1964 ई० में ‘विदेश व्यापार भारतीय संस्थान’ की स्थापना की गई तथा सन् 1966 ई० में ‘इण्डियन इन्स्टीट्यूट ऑफ पैकेजिंग’ की स्थापना की गई।

(21) जुलाई 1991 ई० में भारतीय रुपये का अवमूल्यन किया गया।

(22) निर्यातकों को रियायती आयात शुल्क पर पूँजीगत सामान के आयात की अनुमति प्रदान की जाती है।

(23) निर्यातोन्मुख इकाइयों तथा निर्यात प्रसंस्करण योजनाओं को और अधिक उदार बना दिया गया है।

(24) ‘निर्यात-गृह’, ‘निर्यात व्यापार गृह’ तथा ‘स्टार ट्रेडिंग गृह’ की स्थापना की गई है।

(25) जयपुर के निकट सीतापुर में पहला ‘निर्यात संवर्द्धन औद्योगिक पार्क’ स्थापित किया गया है। IMA

पनि – उद्यमिता विकास कार्यक्रमों के आयोजन में सरकार की भूमिका का आलोचनात्मक मूल्यांकन कीजिए।

Critically evaluate the role of Government in organizing Entrepreneurial Development programmes (EDPs).

उत्तर – कई राज्यों ने स्वरोजगार योजना लागू करने के साथ-साथ सन् 1960 ई० क प्रारम्भ में उद्यमी विकास कार्यक्रम लागू किए। इन उद्देश्यों की आंशिक पर्ति गजरात और महाराष्ट राज्यों में हुई क्योंकि प्रारम्भ में उन्होंने बड़े ही तकनीकी ढंग से इस कार्यक्रम को लागू किया जिसके बारे में अनुसन्धान कार्य किए जा चुके थे। इसके अलावा जिन दूसरे राज्यों ने इन

कार्यक्रमों को बाद में शुरू किया, उन्हें इसमें सफलता नहीं मिल पायी क्योंकि इस कार्यक्रम में जिन आधारों को निरूपित किया गया था उन्हें यथोचित रूप से व्यवहार में नहीं लाया गया। प्रमख संगठन एवं संस्थानों का वर्णन निम्नवर्णित है

1. लघु उद्योग विकास संगठन 

(Small Industries Development Organization) 

केन्द्र सरकार द्वारा लघु उद्योगों को तकनीकी, विपणन, संचालन एवं वित्तीय प्रबन्धन सम्बन्धी परामर्श, प्रशिक्षण एवं सहायता उपलब्ध कराने के उद्देश्य से सन् 1954 ई० में लघु उद्योग विकास संगठन की स्थापना की गई। राष्ट्रीय स्तर के ये संगठन लघु उद्योगों के विकास एवं संवर्द्धन के साथ-साथ कृषि आधारित उद्योग-धन्धों एवं ग्रामीण उद्योग-धन्धों के विकास हेतु कार्यरत हैं।

2. लघु उद्योग सेवा संस्थान

(Small Industries Service Institute) 

सन् 1956 ई० में लघु उद्योग सेवा संस्थान की स्थापना हुई। मूलत: यह संस्थान सीडो (SIDO) का ही एक सहयोगी संस्थान है, जो कि लघु उद्योगों एवं नए उद्यमियों को वित्तीय तकनीकी, प्रबन्धकीय एवं विपणन सम्बन्धी सूचनाएँ उपलब्ध कराने के साथ-साथ उनका मार्गदर्शन भी करता है। देश के सभी राज्यों में यह संस्थान लघु उद्योगों एवं उद्यमिता प्रोत्साहन के कार्य में संलग्न है। संयुक्त रूप से SISI और SIDO औद्योगिक विस्तार सेवा का संचालन कर रहे हैं।

3. राष्ट्रीय उद्यमिता एवं लघु व्यवसाय विकास संस्थान 

(National Institute for Entrepreneurship and Small Business Development) 

6 जुलाई, 1983 ई० को भारत सरकार के उद्योग मंत्रालय द्वारा सोसायटी अधिनियम, 1860 ई० के अन्तर्गत वर्तमान समय में, उद्यमिता एवं लघु उद्योगों के विकास, मार्गदर्शन एवं प्रशिक्षण प्रदान करने वाली शीर्ष संस्था ‘राष्ट्रीय उद्यमिता एवं लघु व्यवसाय विकास संस्थान’ की स्थापना की गई। इस शीर्ष संस्था का मुख्यालय भी ‘ओखला औद्योगिक संस्थान’ नई दिल्ली में है, जिसको NSIC-PDTC कैम्पस के नाम से पुकारा जाता है।

4. युवा उद्यमियों का राष्ट्रीय संगठन

(National Alliance of Young Entrepreneur) 

उद्यमिता विकास एवं प्रोत्साहन के लिए सन् 1972 ई० में बैंक ऑफ इण्डिया द्वारा प्रायोजित NAYE ने राष्ट्रीय स्तर पर कार्य करना प्रारम्भ किया। पंजाब नेशनल बैंक एवं देना बैंक ने सन् 1973 ई० से, यूनियन बैंक ऑफ इण्डिया एवं सेन्ट्रल बैंक ऑफ इण्डिया ने सन् 1975 ई० से पश्चिमी बंगाल, पंजाब, राजस्थान, हिमाचल प्रदेश व केन्द्रशासित प्रदेशों में उद्यमिता प्रशिक्षण तथा उद्यमियों को वित्तीय सहायता एवं प्रबन्धकीय परामर्श उपलब्ध कराने के लिए योजनाओं को प्रायोजित किया। NAYE ने सन 1975 ई० में, महिला उद्यमिता प्रोत्साहन हेतु महिला प्रकोष्ठ (Women wing) की स्थापना की। NAYE द्वारा महिला उद्यमियों के लिए अब तक 8 राष्ट्रीय 3 अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर सेमिनार एवं दीक्षान्त समारोह आयोजित किए गए हैं।

5. भारतीय उद्यमिता विकास संस्थान, अहमदाबाद 

(Indian Institute of Entrepreneurship Development, Ahmedabad)

सन् 1983 ई० में एक स्वायत्त संस्था के रूप में भारतीय उद्यमिता विकास संस्थान, अहमदाबाद की स्थापना गुजरात सरकार के सक्रिय सहयोग एवं भारतीय औद्योगिक विकास बैंक (IDBI), भारतीय औद्योगिक साख एवं विनियोग निगम (ICICT), भारतीय औद्योगिक वित्त निगम (IFCI) तथा भारतीय स्टेट बैंक (SBI) के सहयोग से हुई।

6. राष्ट्रीय उत्पादकता परिषद्

(National Productivity Council) 

फरवरी 1958 ई० को एक केन्द्र सरकार द्वारा एक स्वायत्तशासी से ही राष्ट्रीय उत्पादकता परिषद् की स्थापना संस्था (Autonoumous body) के रूप में की गई जिसका मुख्यालय नई दिल्ली में बनाया गया। इस परिषद् के अध्यक्ष भारत सरकार के उद्योग मंत्री होते हैं।

मुख्यालय के अलावा दस औद्योगिक नगरों दिल्ली, मुम्बई, कोलकाता, पटना, गुवाहाटी, चेन्नई, बंगलुरु, अहमदाबाद, कानपुर एवं चण्डीगढ़ में क्षेत्रीय निदेशालय स्थापित किए गए हैं। भुवनेश्वर, हैदराबाद एवं जयपुर में इसके तीन क्षेत्रीय कार्यालय हैं।

राष्टीय उत्पादकता परिषद् के मार्गदर्शन में ही स्थानीय उत्पादकता परिषद कार्य करती है। ये संख्या में 49 हैं। इन परिषदों का गठन इस प्रकार से किया गया है कि उसमें उस प्रदेश की उत्पादकता एवं उद्यमिता में रुचि रखनेवाले सभी वर्गों को प्रतिनिधित्व प्राप्त हो सके।

7. राष्ट्रीय लघु उद्योग विस्तार प्रशिक्षण संस्थान 

(National Institute of Small Industries Extension Training)

उद्यमियों एवं लघु उद्योगों को प्रशिक्षण, अनुसन्धन, परामर्श तथा प्रलेख सम्बन्धी सविधाएँ उपलब्ध कराने के उद्देश्य से सन् 1960 ई० में केन्द्र तथा राज्यों के स्तर पर हैदराबाद में राष्ट्रीय उद्यमिता विकास संस्थान की स्थापना की गई। अपने 6 सहयोगी विभागों-परामर्श (Consultancy), प्रलेख (Documentation), औद्योगिक विकास (Industrial development), औद्योगिक प्रबन्ध (Industrial management), व्यावहारिक विज्ञान (Theoretical science) तथा संचार (communication) के साथ मिलकर यह संस्थान उद्यमियों को तकनीकी एवं प्रबन्धकीय सहायता प्रदान कर रहा है।

8. भारतीय राज्य व्यापार निगम लिमिटेड

(State Trading Corporation of India Limited) 

सन् 1956 ई० में उद्यमियों के उत्पादन को निर्यात करने तथा कच्चे माल को कम मल्य , पर आयात करके उपलब्ध कराने के उद्देश्य से भारतीय राज्य व्यापार निगम लिमिटेड’ की स्थापना की गई। यह निगम कच्चे तथा पक्के माल का आयात करने वाला सबसे बड़ा अभिकरण है। जिन वस्तुओं के लिए उद्यमियों को प्रत्यक्ष रूप से अनुमति प्रदान की जाती है, केवल उन्हीं वस्तुओं को यह निगम आयात करता है। केवल निगम द्वारा ही पंजीकृत उद्यमियों को संस्थान की आयात-निर्यात सुविधाएँ प्रदान की जाती हैं। उद्यमियों के उत्पादों को निर्यात करने में सहायता प्रदान करने के लिए निगम द्वारा ‘लघु उद्योगों को निर्यात में सहायता’ योजना का संचालन किया जा रहा है।

चन्द्रलोक भवन, 36 जनपद, नई दिल्ली में निगम का मुख्य कार्यालय है तथा इसके प्रादेशिक कार्यालय मुम्बई, विशाखापट्टनम, कोलकाता तथा चेन्नई में हैं। इसके अलावा विभिन्न स्थानों पर इसके उपशाखा कार्यालय भी स्थापित हैं।

9. भारतीय लघु उद्योग मण्डल संघ 

(Federation of Association of Small Scale Industries of India)

लघु उद्यमियों द्वारा प्रत्येक राज्य में अपने संघ स्थापित किए गए हैं। उद्यमिता विकास में इन अलग-अलग संघों को एक सूत्र में पिरोकर तकनीकी एवं प्रबन्धकीय परामर्श एवं सहयोग प्रदान करने के उद्देश्य से केन्द्रीय सरकार द्वारा सन् 1969 में भारतीय लघु उद्योग मण्डल संघ’ एक शोध संस्थान की स्थापना की गई है। इस संस्थान का प्रधान कार्यालय दिल्ली में तथा प्रादेशिक कार्यालय मुम्बई, कोलकाता व चेन्नई में हैं।

10. अखिल भारतीय लघु उद्योग बोर्ड 

 (All India Small Scale Industries Board)

सन् 1954 ई० में लघु उद्योगों को आवश्यक परामर्श प्रदान करने तथा उनका विकास करने हेतु अखिल भारतीय लघु उद्योग बोर्ड की स्थापना की गई। बोर्ड द्वारा दो अर्द्धवार्षिक बैठकें आयोजित की जाती हैं, जिनमें लघु उद्योगों की समस्याओं हेतु सुझाव एवं परामर्श देना आदि कार्य किया जाता है।

11. खादी एवं ग्रामोद्योग आयोग 

(Khadi and Village Industries Commission) 

ग्रामीण बेरोजगारी में कमी लाने हेत एवं खादी एवं ग्रामीण उद्योग के विकास के लिए सन् 1953 ई० में खादी एवं ग्रामोद्योग आयोग की मुम्बई में स्थापना की गई। महिला उद्यमियों के लिए यह आयोग अधिक उपयोगी है। इन उद्योगों में महिलाओं की भागीदारी 46% है। खादी एवं ग्रामोद्योग आयोग उन सभी उद्योगों को भी सहायता एवं परामर्श उपलब्ध कराता है, जो न्यूनतम निवेश के द्वारा उपयोगी उत्पादों जैसे खाद्य पदार्थों का प्रसंस्करण, चमड़ा उद्योग, गुड़ एवं खाण्डसारी, साबुन बनाना, ऐलुमिनियम के बर्तन बनाना आदि उद्योग चलाते हैं। भारत के प्रत्येक राज्य में खादी ग्रामोद्योग आयोग कार्यालय स्थापित हैं। 

12. राष्ट्रीय लघु उद्योग निगम

(National Small Industries Corporation) 

उद्यमियों के सरकारी खरीद कार्यक्रम में भाग लेने तथा किराया क्रयपद्धति पर मशीनों एवं यन्त्रों को उपलब्ध कराने के उद्देश्य से केन्द्रीय सरकार द्वारा सन् 1955 ई० में नई दिल्ली में एन०एस०आई०सी० की स्थापना की गई। लघु उद्योगों को आवश्यक प्रशिक्षण, मार्गदर्शन, तकनीकी परामर्श, विपणन, आयात-निर्यात के सम्बन्ध में यह निगम आवश्यक सलाह एवं सहयोग प्रदान करता है।

13. राज्य लघु उद्योग निगम

(State Small Industries Corporation) 

उद्यमिता विकास की ओर लघु उद्योगों को प्रेरित करने के लिए उन्हें आर्थिक, तकनीकी एवं प्रबन्धकीय सहायता देने के उद्देश्य से राज्य लघु उद्योग निगम की स्थापना की गई। व्यापारिक संस्थान के रूप में ये निगम वाणिज्यिक कार्य करते हैं।

14. उद्योग निदेशालय

(Directorate of Industries) 

संविधान द्वारा लघु उद्योगों के विकास व नियन्त्रण का कार्य राज्यों को सौंपा गया है। राज्य सरकारों द्वारा इस कार्य को पूर्ण करने के लिए उद्योग निदेशालय की स्थापना की गई है। लय उद्योगों के विकास हेतु निदेशालय द्वारा तकनीकी, प्रबन्धकीय एवं अन्य आवश्यक सुविधाएँ उपलब्ध कराई जाती हैं।

15. राज्य वित्तीय निगम

(State Financial Corporation) 

देश के सभी राज्यों के लिए, लघु उद्योगों की वित्तीय आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु कम्पनी अधिनियम 1951 ई० के अधीन राज्य वित्तीय निगम की स्थापना करने का प्रावधान

किया गया है, किन्तु आज तक मात्र 18 राज्य वित्त निगम ही स्थापित हो पाए हैं। ये निगम अपना एक समामेलित संस्था के रूप में कार्य करते हैं।

16. राष्ट्रीय परीक्षण गृह

(National Testing House) 

केन्द्रीय सरकार द्वारा राष्ट्रीय परीक्षण गृह की स्थापना लघु उद्योगों में उपयोगी कच्च माल, तैयार माल, रसायन आदि की गुणवत्ता की जाँच हेतु की गई है। उत्पादों के नमूने एव आवश्यक शुल्क की राशि भेजने के पश्चात् इन परीक्षण ग्रहों में परीक्षण किए जाते हैं। ये परीक्षण गृह अलीपुर एवं कोलकाता में स्थापित हैं।

17. भारतीय पैकेजिंग संस्थान

(Indian Packaging Institute) 

पैकेजिंग के क्षेत्र में लघु उद्योगों को सहयोग प्रदान करने के उद्देश्य से भारत सरकार द्वारा ‘भारतीय पैकेजिंग संस्थान’ की स्थापना की गई है। लघु उद्योगों को यह संस्थान पैकेजिंग के विकास हेतु आवश्यक तकनीकी जानकारी एवं प्रबन्धकीय सहायता प्रदान करता है।

18. राष्ट्रीय अनुसन्धान प्रयोगशालाएँ एवं संस्थान

(National Research Laboratories and Institute) 

भारत सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय द्वारा सन् 1942 में लघु उद्योगों की अनुसन्धान सम्बन्धी समस्याओं को हल करने एवं औद्योगिक अनुसन्धान को बढ़ावा देने के उद्देश्य से वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसन्धान परिषद् की स्थापना की गई। लघु उद्योगों की समस्याओं को हल करने के लिए परिषद् के अन्तर्गत सूचना एवं सम्पर्क कक्ष की स्थापना की गई है। इस कक्ष में प्राप्त लघु उद्योगों की समस्याओं का प्रयोगशाला में निस्तारण किया जाता है। इस समय हमारे देश में लघु उद्योगों को 36 राष्ट्रीय अनुसन्धान प्रयोगशाला एवं संस्थान सेवाएँ प्रदान कर रहे हैं।

19. हैण्ड टूल्स केन्द्रीय संस्थान

(Central Institute of Hand Tools) 

भारत सरकार एवं पंजाब सरकार के संयुक्त सहयोग से लघु उद्योगों को तकनीकी प्रशिक्षण एवं अनुसन्धान कार्यों में विकसित करने हेतु हैण्ड टूल्स केन्द्रीय संस्थान की स्थापना की गई।

20. भारतीय मानक ब्यूरो

(Bureau of Indian Standards) 

6 जनवरी, 1947 ई० भारत सरकार द्वारा लघु उद्योगों द्वारा उत्पादित उत्पादों की गुणवत्ता में वृद्धि करने हेतु भारतीय मानक संस्थान की स्थापना की गई। 26 नवम्बर, 1986 ई०

को इस व्यवस्था को संसद के एक अधिनियम के जरिए वैधानिक दर्जा प्रदान किया गया तथा 1 अप्रैल, 1987 ई० को राष्ट्रीय मानक निकाय के तौर पर भारतीय मानक ब्यूरो अस्तित्व में आया। यह निकाय खाद्य पदार्थ, रसायनिक पदार्थ, खेल के सामान, साबुन, बर्तन आदि के सम्बन्ध में मानक तैयार करता है। आज तक ब्यरो द्वारा 26,000 से अधिक मानक एवं उसके संशोधन जारी किए गए हैं। .

इसके अतिरिक्त, इस संस्थान द्वारा प्रमाणन योजना का संचालन भी किया जा रहा है। ब्यूरो द्वारा इस योजना के अन्तर्गत प्रतिपादित मानकों को पूरा करने वाले उद्यमियों को अपने उत्पादों पर मानक मुहर लगाने के लाइसेंस प्रदान किए जाते हैं। उत्पादों पर मानक मुहर लगी होने से उपभोक्ताओं को उसके सही होने का पूर्ण विश्वास होता है तथा उसके चयन में आसानी भी रहती है और विदेशी बाजार में माल की ख्याति बन जाती है सरकार द्वारा नियुक्त लघु उद्यमियों के प्रतिनिधियों द्वारा ये मानक तैयार किए जाते हैं।

21. आई०एस०ओ० 9000

0 (I.S.0.9000) 

जीवन के सभी आयामों तथा स्तरों पर इस समय गुणवत्ता की बात की जा रही है। विशेषकर आज के परिवर्तित होते परिवेश में गुणवत्ता का महत्त्व और भी बढ़ गया है। इस समय विश्व के लगभग सभी विकसित एवं विकासशील देश यह महसूस करते हैं कि पूरे विश्व में गुणवत्ता का स्तर एकसमान ही होना चाहिए। इसी सोच के क्रियान्वयन हेतु सारे विश्व को एक क्षेत्र मानते हुए क्वालिटी मैनेजमेण्ट सिस्टम‘ (QMS) विकसित करने की प्रक्रिया प्रारम्भ की गई है। तकनीकी एवं उत्पाद विनिर्दिष्टों के उद्देश्य की प्राप्ति हेतु सन् 1978 ई० में न्यनतम लागत एवं प्रबन्धकीय प्रक्रियाओं के मानकीकरण के लिए, ब्रिटेन में गठित एक कमेटी द्वारा कार्ययोजना बनाई गई। इसके पश्चात् सन् 1987 में तैयार किए गए गुणवत्ता मानक वर्तमान समय में आई०एस०ओ० 9000 सीरीज के नाम से जाने जाते हैं।

22. जिला उद्योग केन्द्र 

(District Industry Centre)

लघ एवं कटीर उद्योगों के नियमन एवं विकास के लिए जिला-स्तर पर औद्योगिक नीति 1977 के द्वारा एक सरकारी शीर्ष एवं समन्वयकारी संस्था ‘जिला उद्योग केन्द्र’ की स्थापना किए जाने का प्रावधान किया गया। मई 1978 ई० से जनपद स्तर पर, लघु एवं कुटीर उद्योगा को एक ही स्थान पर आवश्यक सुविधाएँ, सहायता एवं जानकारी उपलब्ध कराने हेतु जनपद के मख्यालयों पर जिला उद्योग केन्द्रों (District Industries Centres) की स्थापना की गई।

जिला उद्योग केन्द्र जिला स्तर की एक केन्द्रीय संस्था है। यह संस्था अपने जिले के सभी उद्यमियों को वित्त एवं साख, तकनीकी परामर्श, विपणन सुविधाएँ एवं विभिन्न प्रकार की सरकारी सुविधाएँ एक ही स्थान पर उपलब्ध कराती है। इसलिए इसे ‘एक खिड़की की विचारधारा’ (Single window concept) की संज्ञा दी जाती है। यह केन्द्र लघु उद्योगों को विकसित करने हेतु सहयोग प्रदान करने वाली अन्य संस्थाओं एवं निगम जैसे वित्त निगम (Finance Corporation), औद्योगिक विकास एवं विनियोग निगम (Industrial Development and Investment Corporation), उद्योग निदेशालय (Directorate of Industries), लघु उद्योग निगम (Small Industires Corporation), खादी एवं ग्रामोद्योग बोर्ड (Khadi & Gramodyog Board) आदि के साथ मिलकर उद्यमियों के विकास हेतु कार्य करता है।


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