B.Com 2nd Year Motivating & Leading People Work Short Notes In Hindi

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लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1- अभिप्रेरणा का अर्थ एवं कोई दो विशेषताएँ बताइए।

State the meaning of motivation and two characteristics. 

उत्तर – अभिप्रेरणा का अर्थ

(Meaning of Motivation) 

भौतिक संसाधन (कच्चा माल, मशीन व औजार) तथा संगठन संरचना किसी भी उपक्रम में श्रमिकों की उत्पादकता को तभी प्रभावित कर पाते हैं जब श्रमिक स्वयं अपनी इच्छा से अधिकाधिक कार्य करने के लिए अभिप्रेरित हों। भारत के प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक डॉ० एच०सी० गांगुली ने अपने शोध कार्य द्वारा यह सिद्ध कर दिया है कि श्रमिकों या कर्मचारियों की कार्यक्षमता का अभिप्रेरणा (motivation) से धनात्मक सम्बन्ध है अर्थात् एक श्रमिक का अभिप्रेरण स्तर जितना ऊँचा होगा, उतनी ही उसकी कार्यक्षमता भी अधिक होगी।

प्रो० गांगुली ने कोलकाता के एक जूट मिल के 8 श्रमिकों को अपने अध्ययन के लिए चुना और यह पाया कि मशीनें, कच्चा माल तथा बाह्य वातावरण समान रहने पर भी उनकी कार्यक्षमता 63.5% से 79.9% के बीच पायी गई। प्रो० गांगुली के अनुसार, कार्यक्षमता का यह अन्तर श्रमिकों की व्यक्तिगत अभिप्रेरणा स्तर के कारण था। अत: एक उपक्रम में श्रमिकों या कर्मचारी की कार्यक्षमता में वृद्धि करने के लिए हमें प्रमुख अभिप्रेरक तथा अभिप्रेरणा प्रदान करने के प्रमुख सिद्धान्तों का ज्ञान होना अत्यावश्यक है। परन्तु अभिप्रेरणा के सिद्धान्तों, घटकों या तकनीकों की जानकारी करने से पहले अभिप्रेरणा की अवधारणा, प्रकृति व प्रक्रिया का अध्ययन करना अधिक तर्कसंगत होता है।

अत: स्पष्ट है कि “अभिप्रेरणा एक श्रमिक को पूरी शक्ति के साथ कार्य करने को प्रेरित करती है।”

अभिप्रेरणा की विशेषताएँ

(Characteristics of Motivation)

अभिप्रेरणा की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

1. अभिप्रेरणा एक प्रक्रिया है (Motivation is a Process)-प्रत्येक व्यक्ति की कुछ न कुछ आवश्यकताएँ होती हैं, उन आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर ही प्रबन्धक उन्हें कुछ प्रेरक (incentives) प्रदान करता है जो श्रमिक को अधिक कार्य करने के लिए अभिप्रेरित करते हैं और इन प्रेरकों के द्वारा श्रमिक अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करने में समर्थ हो जाता है।

उदाहरणार्थ-नए शादीशुदा श्रमिक की भौतिक आवश्यकताओं (भोजन, वस्त्र, मकान) में होती है जिनकी पूर्ति के लिए उसे धन की आवश्यकता होती है। अत: ऐसे श्रमिक को अधिक मजदूरी का प्रेरक दिया जा सकता है जिससे वह अधिक कार्य करने के लिए अभिप्रेरित होगा बढ़ी हुई मजदूरी के रूप में प्राप्त अतिरिक्त धन से अपनी भौतिक आवश्यकताओं को सन्तुष्ट कर का प्रयास करेगा। इस प्रकार अभिप्रेरणा की प्रक्रिया निम्न रूप में दृष्टिगत होती है।

→ आवश्यकताएँ → प्रेरक → अभिप्रेरणा → आवश्यकताओं की सन्तुष्टि,

2. अभिप्रेरणा इच्छाशक्ति जगाती है (Motivation creats Will Power)अभिप्रेरणा एक श्रमिक में इच्छा शक्ति को जाग्रत करती है और उन्हें कार्य के प्रति निष्ठावान बनाती है, अर्थात् उनमें पूरी कार्यक्षमता के साथ कार्य करने की इच्छा उत्पन्न करती है।

प्रश्न 2 – वित्तीय प्रेरणाओं को समझाइए। 

Explain Financial incentives.

उत्तर – वित्तीय अभिप्रेरणाएँ (Financial Incentives)-वित्तीय प्रेरणाएँ वे हैं जो कि प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से मुद्रा से सम्बन्धित होती हैं। वित्तीय प्रेरणाओं में वेतन, मजदूरी बोनस, सेवा निवृत्ति लाभ, लाभ विभाजन, छुट्टियों का वेतन, जीवन बीमा, नि:शुल्क चिकित्सा सेवा आदि को सम्मिलित किया जाता है। यह तो हम जानते ही हैं कि मुद्रा एक महत्त्वपूर्ण अभिप्रेरक तत्त्व है जो केवल भौतिक सुख ही नहीं वरन् स्वाभिमान सम्बन्धी आवश्यकताओं की सन्तुष्टि भी करती है।

प्रश्न 3 – मैक्ग्रेगर द्वारा प्रतिपादित एक्ससिद्धान्त की व्याख्या कीजिए। भारत के सन्दर्भ में इसका प्रयोग बताइए।

Explain the X’ theory as propagated by Prof. McGregor. Explain use of this theory with reference to India. 

उत्तर –एक्ससिद्धान्त

(“X’ Theory) 

मैकग्रेगर द्वारा प्रतिपादित इस सिद्धान्त की यह मान्यता है कि व्यक्ति स्वत: कार्य नहीं करना चाहता है। अत: व्यक्ति को डरा-धमकाकर अथवा दण्ड का भय दिखाकर काम करने के लिए प्रेरित किया जाता है।

एक्ससिद्धान्त की मान्यताएँ

(Assumptions of ‘X’ Theory) 

इस सिद्धान्त की मान्यताएँ निम्नवत् हैं-

(1) ‘एक्स’ सिद्धान्त को परम्परागत विचारधारा के रूप में मान्यता प्रदान की गई।

(2) आर्थिक रूप से अधिक लाभ अर्जित होने का लालच देकर कार्य के लिए किया जा सकता है।

(3) श्रमिक के प्रति प्रबन्धन तन्त्र की भावना कुण्ठित होने के कारण वह श्रमिक मशीन समझता है तथा उसी रूप में लगातार काम लेना चाहता है।

(4) व्यक्ति अपनी महत्त्वाकांक्षाओं को दबाए रखता है क्योंकि वह अपनी अथवा परिवार की सुरक्षा के प्रति अधिक सतर्क रहता है। महत्त्वाकांक्षी होने में जोखिम बढ़ जाता है।

(5) इसमें व्यक्ति की कार्य के प्रति कोई रुचि नहीं होती है। 

(6) व्यक्ति स्वेच्छा तथा प्रसन्नतापूर्वक कार्य करने का इच्छुक कदापि नहीं होता है। 

(7) निर्देशन की अवस्था में ही व्यक्ति कार्य करने की ओर प्रेरित होता है। 

(8) भयातुर होने पर ही व्यक्ति कार्य करने की ओर उन्मुख होता है।

(9) व्यक्ति स्वत: किसी उत्तरदायित्व को वहन करने से सदैव बचता है। मजबूरी में ही वह उत्तरदायित्व का भार अपने ऊपर लेता है।

भारत के सन्दर्भ में एक्ससिद्धान्त का प्रयोग

(Use of ‘X’ Theory with Reference to India) 

उपर्युक्त मान्यताओं का अध्ययन कर हम इस सिद्धान्त की प्रकृति का ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं तथा यह कह सकते हैं कि ‘X’ सिद्धान्त अवास्तविक मान्यताओं पर आधारित है। यह सिद्धान्त उत्पादन के मुख्य साधन श्रमिक को केवल एक मशीन के पुर्जे की तरह महत्त्व देता है। भारत में निरन्तर लम्बे समय तक गुलाम रहने के कारण यहाँ के श्रमिकों की मानसिकता नहीं बदली है, उन्हें नियन्त्रण चाहिए।

इस प्रकार ‘X’ सिद्धान्त परम्परागत है तथा निराशावादी दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है। इसके अन्तर्गत व्यक्ति से कार्य लेने के लिए दबाव का प्रयोग किया जाता है तथा श्रमिक को कोई प्रेरणा नहीं दी जाती है।

प्रश्न 4 – मैकग्रेगर द्वारा प्रतिपादित वाईसिद्धान्त की व्याख्या कीजिए। भारत के सन्दर्भ में इसका प्रयोग बताइए।

Explain the ‘Y’ theory as propagated by Prof. McGregor. Explain use of this theory with reference to India. 

उत्तर – वाईसिद्धान्त

(‘Y’ Theory) ‘X’ 

सिद्धान्त के दोषों को दूर करने के लिए ‘Y’ सिद्धान्त का प्रतिपादन किया गया। इसका प्रतिपादन भी मैकग्रेगर ने किया है। यह सिद्धान्त आशावादी दृष्टिकोण पर आधारित है। इसमें मानवीय सम्बन्धों पर अधिक ध्यान दिया जाता है। मैक्ग्रेगर के अनुसार, “एक प्रभावशाली संगठन वह है जिसमें निर्देशन एवं नियन्त्रण के स्थान पर सत्यनिष्ठा एवं सहयोग हो और जिसमें प्रत्येक निर्णय से प्रभावित होने वाले को सम्मिलित किया जाता हो।”

वाईसिद्धान्त की मान्यताएँ

(Assumptions of ‘Y’ Theory) 

इस सिद्धान्त की मान्यताएँ अग्रवत् है –

(1) इस सिद्धान्त के अनुसार व्यक्ति को पद की सन्तुष्टि रहती है तथा अपने सामाजिक स्वरूप के अनुसार जीवन-स्तर भी सही रहता है।

(2) यह सिद्धान्त इस मान्यता पर आधारित है कि व्यक्ति को मौद्रिक अभिप्रेरणाओं के साथ-साथ अमौद्रिक अभिप्रेरणाएँ भी दी जानी चाहिए।

(3) इसमें कर्मचारियों की समस्याओं के निराकरण पर विशेष जोर दिया जाता है। प्रजातान्त्रिक अवधारणाओं पर आधारित होने के कारण ऐसा किया जाना स्वाभाविक है।

(4) कोई भी व्यक्ति कार्य से नहीं घबराता है। वह स्वेच्छा से कार्य करना चाहता है। इसके लिए आवश्यक है कि व्यक्ति को कार्य करने का उचित अवसर प्रदान किया जाए।

(5) कार्य के द्वारा व्यक्ति को पूर्ण सन्तुष्टि प्राप्त होती है। अत: उसको कार्य का किया जाना अरुचिकर नहीं लगता है।

(6) किसी भी व्यक्ति को डरा-धमकाकर कार्य का निष्पादन नहीं कराया जा सकता है। कार्य का निष्पादन कराने के लिए उचित वातावरण, साधन एवं अवसर प्रदान किए जाते हैं।

(7) इस सिद्धान्त में व्यक्ति में महत्त्वाकांक्षा का तत्त्व महत्त्वपूर्ण होता है। वह उत्तरदायित्व के गुरुतर भार को सहर्ष स्वीकार करने के लिए सदैव उद्यत रहता है।

(8) इसमें मानवीय सम्बन्धों पर जोर दिया जाता है जिस कारण सम्बन्धों में मधुरता परिव्याप्त रहती है तथा कर्मचारियों को सन्तुष्टि प्राप्त होती है।

भारत के सन्दर्भ में वाईसिद्धान्त का प्रयोग

(Use of ‘Y’ Theory with Reference to India) 

भारत में नियोक्ता व कर्मचारी के बीच आज भी मालिक और नौकर का भाव बना हुआ है, इसीलिए श्रमिक यह सोचता है कि उसे अपने मालिक की आज्ञा, फिर चाहे वह कैसी भी हो, का पालन करना है और नियोक्ता यह सोचता है कि श्रमिक से अधिक-से-अधिक कार्य लेना और कम-से-कम पारिश्रमिक तथा न्यूनतम सुविधाएँ देना उसका अधिकार है। इसी कारण भारत में ‘Y’ सिद्धान्त के आधार पर अधिकतर प्रबन्ध में कार्य नहीं किया जाता है। वर्तमान समय में वैधानिक प्रावधानों और श्रम संघों में जागरूकता आने के पश्चात् भी इस सिद्धान्त के उपयोग में कोई विशेष वृद्धि नहीं हुई है। अब श्रमिक अपने अधिकारों की माँग धीरे-धीरे करने लगा है। इसी प्रकार कुछ नियोक्ता भी लाभ विभाजन एवं प्रबन्ध में सहभागिता आदि के विचार को व्यवहार में ला रहे हैं। ये विचार ‘Y’ सिद्धान्त के अन्तर्गत ही आते हैं। Y सिद्धान्त की मान्यताओं को भारत में अभी पूर्ण रूप से स्वीकार नहीं किया गया है, लेकिन इसके सम्बन्ध में श्रम संघी तथा सरकार द्वारा प्रयास किए जा रहे हैं।

भारत में ‘Y’ सिद्धान्त की मान्यताओं का अभी पूर्ण विकास तो नहीं हुआ है, परन्तु यह आशा अवश्य की जा सकती है कि भविष्य में धीरे-धीरे ही यहाँ Y सिद्धान्त की मान्यताओं का महत्त्व मिलेगा।

Y सिद्धान्त आज के युग में अधिक महत्त्वपूर्ण तथा कारगर है। इस सिद्धान्त के अन्तगत श्रमिकों का स्तर ऊँचा रहता है तथा उन्हें उपक्रम में मान्यता मिलती है, इसीलिए आजकल इस सिद्धान्त का उपयोग किया जाता है।

प्रश्न 6 – नेतृत्व के प्रकारों की व्याख्या कीजिए। 

Explain the types of leadership. 

उत्तर – नेतृत्व के प्रकार

(Types of Leadership) 

किसी भी औद्योगिक संस्थान अथवा उपक्रम में नेता अग्रलिखित रूपों में पाए जाते हैं –

1. अव्यक्तिगत नेता (Impersonal Leader)-अव्यक्तिगत नेता का चयन प्रत्यक्ष रूप से नेताओं के अधीन कर्मचारियों के द्वारा होता है। इस प्रकार के नेतृत्व में समस्त योजना, व उन पर की जाने वाली कार्यवाहियों की सूचना लिखित रूप में दी जाती है। साधारणतः ।. अव्यक्तिगत नेतृत्व ऐसे कार्यस्थलों पर पाया जाता है, जहाँ कर्मचारियों की संख्या अधिक होती है जिसके कारण नेता उनसे व्यक्तिगत सम्पर्क स्थापित करने में असमर्थ रहता है। सामान्यत: आधुनिक व्यावसायिक संस्थानों में इसी प्रकार के नेता पाए जाते हैं। ये लिखित रूप में अपने कर्मचारियों को आदेश तथा निर्देश भेजते हैं।

2. विश्वासप्रेरक नेता (Persuasive Leader)-विश्वासप्रेरक नेता ऐसे . व्यक्तित्व का स्वामी होता है जो चुम्बक की भाँति अपने अनुयायियों को आकर्षित करता है। ऐसे नेता के आदेश का पालन उसके अनुयायी अपनी पूर्ण सामर्थ्य से करते हैं क्योंकि वे ” ऐसे नेता का सम्मान पूर्ण विश्वास व प्रेम के साथ करते हैं तथा उसकी साख प्राप्त करने के इच्छुक रहते हैं।

3. रचनात्मक नेता (Creative Leader)-रचनात्मक नेतृत्व के अन्तर्गत समूह एवं र नेता के मध्य विचारों का स्वतन्त्र रूप से आदान-प्रदान होता है। रचनात्मक नेता अपने अनुयायियों के विचारों को मान्यता देता है और वह अपने अनुयायियों के रुचिपूर्ण, ऐच्छिक एवं एकतामय कार्यकलापों की सराहना करता है।

4.संस्थागत नेता (Institutional Leader)-संस्थागत नेता ऐसे नेता को कहते हैं जो कि अपनी स्थिति से ही अपने अनुयायियों को प्रभावित करने की क्षमता रखता है। इस प्रकार के नेतृत्व में नेता के निर्देशानुसार ही समूह के सदस्य कार्य करते हैं। साधारणतया यह समूह नेता के विश्वासपरक लोगों का ही होता है। ____

5. व्यक्तिगत नेता (Personal Leader)-व्यक्तिगत नेता ऐसे नेता को कहा जाता है जो कि संस्था में लोकतान्त्रिक आधार पर नहीं बल्कि व्यक्तिगत सम्बन्धों के आधार पर नेता बनता है। यह नेता व्यक्तिगत रूप से अपने अनुयायियों को प्रभावित करके उन्हें प्रत्यक्ष रूप में आदेश एवं निर्देश देता है तथा कार्य करने के लिए उन्हें प्रत्यक्ष रूप से प्रेरित भी करता है। इस प्रकार के नेता का प्रभाव अन्य नेताओं की अपेक्षा अधिक पड़ता है। ___

6. जनतन्त्रीय नेता (Democratic Leader)-संस्था में समूह के सहयोग एव समर्थन पर आश्रित नेता जनतन्त्रीय नेता कहलाता है। समूह का विश्वास प्राप्त रहने तक ही वह नेता बना रह सकता है। इसमें नेतृत्व के आधारों को अपने विश्वस्तों में बाँट दिया जाता है। अर्थात् सभी को साथ लेकर चला जाता है। इसमें नेता प्रत्येक कार्य समह की सलाह के आधार पर करता है। आधुनिक व्यावसायिक युग में इसी प्रकार के नेता पाए जाते हैं। इस प्रकार से नेतृत्व में समूह नेता के प्रति निष्ठा रखता है तथा वह समूह उपक्रम में अपना अस्तिल समझता है। इस प्रकार के नेतृत्व में समूह के सदस्य ऊँचे मनोबल के साथ कार्य करते हैं आर हे संस्था के लिए अच्छे उत्पादक सिद्ध होते हैं।

7.निर्बाधावादी नेता (Laissez-faire Leader)-निर्बाधावादी नेता से तात्पर्य ऐसे नेता से है जो अपने समूह के कार्य में किसी प्रकार की बाधा नहीं डालता अपितु वह अपने समूह को कार्यों के लिए स्वतन्त्र छोड़ देता है। इस प्रकार के नेतृत्व में समूह का प्रत्येक सदस्य अपनी इच्छा से स्वतन्त्रतापूर्वक कार्य करता है एवं निर्णय लेता है। निर्बाधावादी नेता केवल अपने समूह के लिए आवश्यक सूचनाएँ तथा तथ्य एकत्रित करने एवं साधनों के एकत्र करने से सम्बन्धित कार्य करते हैं। इस प्रकार का नेतृत्व आधुनिक औद्योगिक युग में नहीं पाया जाता है।

8. निरंकुश नेता (Autocratic Leader)-निरंकुश शब्द से ही स्पष्ट हो जाता है कि ऐसा नेता जनतन्त्रीय नेता के बिल्कुल विपरीत होता है। निरंकुश नेतृत्व केन्द्रीकरण के सिद्धान्त पर आधारित है। निरंकुश नेतृत्व में निर्णय लेना, नियोजन करना, कार्य का आवंटन करना अर्थात् निदेशक के समस्त महत्त्वपूर्ण कार्य नेता द्वारा ही किए जाते हैं। इस प्रकार निरंकुश नेता समस्त अधिकार अपने पास तक ही सीमित रखना चाहता है। समूह के कार्यों पर अंकुश रखने के कारण उसे निरंकुश नेता कहते हैं। वह समूह के समस्त क्रियाकलापों पर अपना अधिकार रखता है तथा अपने आदेशानुसार ही कार्य करवाता है। दूसरे शब्दों में, समूह का कोई भी सदस्य स्वेच्छा से कार्य नहीं कर सकता।

प्रश्न 7 – निरंकुश नेतृत्व क्या है

What is autocratic leadership?

उत्तर – निरंकुश नेतृत्व (Authoritarian or Autocratic Leadership)निरंकुश अथवा तानाशाही नेतृत्व के अन्तर्गत नेता सर्वेसर्वा हो जाता है जिसे तानाशाह नेता भी कहते हैं। यह नेता सभी अधिकारों को अपने पास केन्द्रित रखता है तथा सारे निर्णय स्वयं ही लेता है। यह अनुयायियों को निर्णयन प्रक्रिया में शामिल नहीं करता, वरन् उन्हें निर्णयों के क्रियान्वयन हेतु आवश्यक निर्देश देता है। यह अपने अनुयायियों को लक्ष्यों की जानकारी भी नहीं देता है, अत: वे पूर्णत: नेता पर आश्रित रहते हैं। निरंकुश नेता यह मानकर चलता है कि व्यक्ति स्वभाव से ही आलसी होते हैं तथा उत्तरदायित्वों से बचना चाहते हैं।

प्रश्न 8 – स्वतन्त्र नेतृत्व से क्या आशय है

What is meant by Fred-rein Leadership? 

उत्तर – स्वतन्त्रतावादी नेतृत्व अथवा स्वतन्त्र नेतृत्व

(Free-Rein or Laissez Fair Leadership) 

नेतृत्व की इस शैली में प्रबन्धक प्रशासनिक नीतियों के निर्धारण में अपने अधीनस्थों को स्वतन्त्रतापूर्वक सुझाव देने का अवसर प्रदान करते हैं तथा उनके सुझावों को समन्वित ढंग से लागू करते हैं। इसमें अनुयायी स्वयं अपने-अपने कार्य की सीमाएँ निश्चित करके उनकी प्राप्ति हेतु नीतियों के निर्धारण में सहयोग देते हैं।

प्रश्न 9 – नेतृत्व बनाम बॉसिज्म को समझाइए। 

Clarify Leadership Vs. Bossism. 

उत्तर – नेता बनाम प्रबन्धक (Leader Vs. Manager)

अथवा नेतृत्व बनाम बॉसिज्म (Leadership Vs. Bossism) एक निश्चित लक्ष्य की ओर अनुयायियों को प्रेरित करना नेतृत्व की योजना होती है। नेतृत्व एक विशिष्ट दिशा की ओर समूह के सदस्यों को उत्प्रेरित करने की एक प्रक्रिया है। नेतृत्व प्रबन्ध का एक अंग है। एक प्रबन्धक को नियोजन, संगठन एवं अन्य प्रबन्धकीय क्रियाओं का निष्पादन करना होता है, लेकिन नेता का कार्य नियोजन, संगठन एवं अन्य प्रबन्धकीय कार्य करना न होकर अन्य व्यक्तियों से अपने निदेशों का अनुसरण कराना होता है। एक नेता अपने निदेशों का अनुयायियों से पालन तो करा सकता है लेकिन इस बात की कोई गारन्टी नहीं होती कि वह अनुयायियों को सही दिशा की ओर अग्रसर कर रहा है। इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि एक अच्छा नेता, एक कमजोर प्रबन्धक हो सकता है क्योंकि वह प्रबन्ध के मुख्य कार्यों का निष्पादन करने में कमजोर होता है। साथ ही यह आवश्यक नहीं है कि एक नेता द्वार किए जाने वाले सभी कार्य प्रबन्धक के कार्यों की श्रेणी में आते हों अर्थात् वह कुशल प्रबन्धक हो। यद्यपि एक अच्छा नेता एक अच्छा प्रबन्धक होना चाहिए, लेकिन कई बार यह देखने को मिलता है कि अच्छे नेता कमजोर प्रबन्धक साबित हुए हैं। इसी प्रकार एक प्रबन्धक, एक कमजोर नेता हो सकता है, लेकिन प्रबन्धक के रूप में सभी व्यक्तियों द्वारा स्वीकार किया जाता हो। वास्तव में हमारी राय में यह आवश्यक है कि एक प्रभावी प्रबन्धक, एक अच्छा नेता भी हो

प्रश्न 10 – प्रभावी सम्प्रेषण से क्या आशय है?

What is meant by Effective Communication ?

उत्तर – प्रभावी सम्प्रेषण से अभिप्राय उस स्थिति से है जबकि सम्प्रेषण के उद्देश्य पूरी होते हों। इस स्थिति में सम्प्रेषक और सम्प्रेषिती, दोनों की सक्रिय भूमिका आवश्यक है।

प्रभावी सम्प्रेषण की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

1. स्पष्ट एवं सरल अभिव्यक्ति (Clear and Simple Expression)-सम्प्रषण का उद्देश्य आपसी समझदारी को विकसित करना होता है। सम्प्रेषक को ऐसी स्पष्ट एवं सरल भाषा का प्रयोग करना चाहिए जो कि सम्प्रेषिती को आसानी से समझ में आ जाए। क्लिष्ट भारी-भरकम और तकनीकी शब्दावली के प्रयोग से यथासम्भव बचना चाहिए।

2. प्रभावी ढंग से सुनना (Effective Listening)-सम्प्रेषण में सम्प्रेषक द्वारा के गई बातों को सन्देश प्राप्तकर्ता को धैर्य, सावधानी और सतर्कता के साथ सुनना चाहिए। वस्तुत प्रभावी ढंग से सुनना एक कला है। इसमें सम्प्रेषक को भी हरसम्भव सहयोग देना चाहिए।

3. पारस्परिक सहयोग एवं विश्वास (Mutual Co-operation and Confidence)-सम्प्रेषक एवं सम्प्रेषिती, दोनों में पारस्परिक सहयोग एवं विश्वास की भाग होनी चाहिए और किसी भी प्रकार के पूर्वाग्रह (Prejudices) नहीं होने चाहिए। दोना एक-दूसरे की भावनाओं का सम्मान करना चाहिए।

4. समुचित सम्प्रेषण तकनीक (Appropriate Transmission Technique)सन्देश को कितने ही अच्छे तरीके से तैयार किया गया हो, यदि सम्प्रेषण विधि या तकनीक अभद्र है तो इससे सन्देश प्राप्त करने वाले के आत्मसम्मान को ठेस लग सकती है। सम्प्रेषण की समुचित तकनीक सम्प्रेषक और सम्प्रेषिती के पद-स्तर, अवसर तथा प्रचलित विधियों पर निर्भर करती है।

5. सम्प्रेषण में निरन्तरता (Continuity in Communication)-कभी-कभी विचारों के आदान-प्रदान की अपेक्षा निरन्तर सम्प्रेषण सदैव अच्छा माना जाता है। इससे गलतफहमियों के पैदा होने की सम्भावनाएँ बहुत क्षीण हो जाती हैं।

6. गतिप्रदायकों का उपयोग (Use of Expeditors)-जब प्रबन्धकों को यह डर होता है कि कोई महत्त्वपूर्ण सन्देश मार्ग में खो सकता है या दूषित हो सकता है, तो ऐसे गतिप्रदायकों (Expeditors) की नियुक्ति की जाती है जो सभी औपचारिकताओं को पूरा करते हुए और सभी अवरोधों को तोड़ते हुए सन्देश की प्रगति को गति प्रदान करते हैं।

7. अनुभूति इकाइयों का प्रयोग (Use of Sensing Units)-प्रबन्धकों को कुछ ऐसी अनुभूति इकाइयों और व्यक्तियों का भी उपयोग करना चाहिए जो कि ऐसी बातों की सूचना देते रहे जो उनके पास तक नहीं पहुँचती या उनसे जानबूझकर छुपाई जाती हैं।

8. कार्य, शब्दों से अधिक जोर से बोलते हैं (Actions Speak Louder than words)-सम्प्रेषण में यह भी देखा जाता है कि सम्प्रेषक की कथनी और करनी में कोई । अन्तर तो नहीं है। इसलिए प्रबन्धक वर्ग को सम्प्रेषण करते समय अपने कार्यों और व्यवहार की । तुलना अपने सन्देश और कथनों से करते रहना चाहिए। जब सम्प्रेषक वही कहता है जिसका । वह स्वयं आचरण करता है तो उससे सम्प्रेषण बहुत प्रभावशाली हो जाता है।

प्रश्न 11 – अंगूरीलता सन्देशवाहन क्या है? – 

Whaths Grapevine Communication?

उत्तर – अंगूरीलता सम्प्रेषण अनौपचारिक सम्प्रेषण का ही रूप है। अधिकांशत: व्यक्ति सामूहिक रूप से मिलने एवं बातचीत करने के अवसरों को नहीं खोना चाहता है। इस प्रकार के सम्प्रेषण में जहाँ एक ओर तथ्यपूर्ण एवं सार्थक विषयों पर चर्चाएँ होती हैं, वहीं दूसरी ओर गप्पबाजी तथा अफवाहों का बाजार गर्म होता है।


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