B.Com 3rd Year Appointment Remuneration Rights And Duties Of An Auditor Notes

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कम्पनी अधिनियम, 2013 (प्रतिरूप कम्पनी अधिनियम, 1956) के अनुसार प्रत्येक कम्पनी का अनिवार्य रूप से अपने लेखों का अंकेक्षण योग्य अंकेक्षक द्वारा किया जाता है। इस अधिनियम के अन्तर्गत अंकेक्षक की नियुक्ति, निष्कासन, योग्यताएँ, पारिश्रमिक, अधिकार, कर्तव्य आदि से सम्बन्धित प्रावधान किये गये हैं। ये प्रावधान समस्त कम्पनियों चाहे वे निजी कम्पनी हों, सार्वजनिक कम्पनी हों, सरकारी हों या लाइसेंसधारी कम्पनी हों, सभी पर लागू होते हैं। कम्पनी अंकेक्षक की योग्यताएँ (Qualifications of Company Auditors) – एक व्यक्ति (An Individual) [धारा 141(1)]-कोई भी ऐसा व्यक्ति जो चार्टर्ड एकाउण्टेण्ट अधिनियम, 1949 के अन्तर्गत चार्टर्ड एकाउण्टेण्ट हो, उसे किसी कम्पनी में अंकेक्षक के रूप में नियुक्त किया जा सकता है। चार्टर्ड एकाउण्टेण्ट फर्म (A Firm of Chartered Accountant) [धारा 141(2)]-किसी भी चार्टर्ड एकाउण्टेण्ट की फर्म को अंकेक्षक के रूप में नियुक्ति के लिए योग्य माना जाएगा, यदि उसक अधिकतर साझेदार जो भारत में कार्यरत हैं, चार्टर्ड एकाउण्टेण्ट हों। इस स्थिति में अंकेक्षक की नियुक्ति फर्म के नाम से की जाती है और कोई भी साझेदार फर्म की ओर से कार्य एवं हस्ताक्षर कर सकता है। सीमित दायित्व साझेदारी फर्म (Limited Liability Partnership Firm, LLP) –एक LL फर्म भी अंकेक्षक के रूप में नियुक्ति के लिए योग्य है, परन्तु केवल वे साझेदार जो चार्टर्ड एकाउण्ट हैं, फर्म की ओर से कार्य एवं हस्ताक्षर कर सकते हैं।

कम्पनी अंकेक्षक की अयोग्यताएँ।धारा 141 (3)]

(Disqualifications of an Auditor) [Section 141 (3)] 

कम्पनी अधिनियम, 2013 के अन्तर्गत निम्नलिखित व्यक्ति किसी कम्पनी के अंकेक्षक के नियुक्ति हेतु अयोग्य माने जाते हैं – (1) सीमित दायित्व वाली साझेदारी फर्म जिसका पंजीयन सीमित दायित्व साझेदारी आधा 2008 के अन्तर्गत हुआ है को छोड़कर अन्य कोई निगमित निकाय/समामेलित संस्था र Corporate); (2) कम्पनी का कोई अधिकारी अथवा कर्मचारी;  (3) कोई व्यक्ति जो कम्पनी के किसी अधिकारी या कर्मचारी का साझेदार या उसका कम  (4) कोई व्यक्ति, उसका साझेदार अथवा उसका रिश्तेदार : (i) कम्पनी अथवा उसकी सहायक अथवा उसकी सूत्रधारी अथवा उसकी एसोशियेट प्रतिभूति का धारक है अथवा उसमें उसका हित है; यद्यपि, रिश्तेदार के पास कम्पनी की एक हजार रूपए या ऐसी राशि जो निर्धारित की जाए तक की प्रतिभूतियाँ या हित हो सकता है: (ii) कम्पनी अथवा उसकी सहायक अथवा उसकी सूत्रधारी अथवा सहयोगी कम्पनी का निर्धारित राशि से अधिक का ऋणी है। अथवा  (iii) किसी तृतीय पक्षकार की ऋणग्रस्तता के सम्बन्ध में, कम्पनी को, अथवा उसकी सहायक भारी अथवा एसोशियेट कम्पनी को निर्धारित राशि से सम्बन्धित कोई गारंटी दी हुई है अथवा प्रतिभूति दी हुई हैं। (5) कोई व्यक्ति, अथवा फर्म जिसका प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से, कम्पनी से, अथवा उसकी सहायक, अथवा सुत्रधारी अथवा एसोशियेट अथवा ऐसी सूत्रधारी की सहायक कम्पनी से, रित प्रकृति का व्यावसायिक सम्बन्ध है: (6) ऐसी कोई व्यक्ति जिसका कोई रिश्तेदार कम्पनी का संचालक है, या संचालक अथवा प्रमुख अधिकारी के रूप में कम्पनी के नियोजन में है; (7) कोई व्यक्ति जो अन्यत्र पूर्णकालीन रोजगार में है, अथवा ऐसा व्यक्ति अथवा किसी फर्म का सका अंकेक्षक नियुक्त है यदि ऐसा व्यक्ति अथवा साझेदार ऐसी नियुक्ति की तिथि को, बीस पनियों से अधिक का अंकेक्षक नियुक्त है; (8) ऐसा व्यक्ति जिसे कपट के लिए न्यायालय द्वारा अपराधी ठहराया जा चुका है और ऐसे अपराधी के होने के पश्चात् अभी दस वर्ष व्यतीत नहीं हुए हैं; (9) कोई व्यक्ति जिसकी सहायक अथवा एसोशियेट कम्पनी अथवा अन्य किसी निकाय के रूप में कोई संस्था नियुक्ति की तिथि को, धारा 144 में उल्लिखित विशिष्ट सेवा प्रदान करती हो। धारा 144 में उन सेवाओं का वर्णन है जो अंकेक्षक कम्पनी को नहीं प्रदान कर सकते।

अंकेक्षक की नियुक्ति

(Appointment of Auditor) 

कम्पनी अंकेक्षक की नियुक्ति से सम्बन्धित प्रावधानों की कम्पनी अधिनियम, 2013 की धारा 139 में विवेचना की गई है। इन प्रावधानों का सारांश निम्नलिखित है- (A) प्रथम अंकेक्षक की नियुक्ति (Appointment of First Auditor) –
  1. गैर-सरकारी कम्पनी की स्थिति में (In Case of a Non-Government Company) [धारा 139(6)]
  • • कम्पनी के पंजीयन के 30 दिनों के अन्दर संचालक मण्डल के द्वारा। 
  • • यदि संचालक मण्डल निर्धारित समय में अंकेक्षक की नियुक्ति नहीं कर पाता है तो संचालक मण्डल द्वारा इसकी सूचना कम्पनी के सदस्यों को दी जानी चाहिए। 
  • ‘ कम्पनी के सदस्य 90 दिनों के अन्दर असाधारण सामान्य सभा (Extraordinary General Meeting, EGM) में प्रथम अंकेक्षक की नियुक्ति करेंगे।
  • प्रथम अंकेक्षक का कार्यकाल प्रथम वार्षिक सामान्य सभा (Annual General Meeting ___AGM) की समाप्ति तक होगा। 
  1. सरकारी कम्पनी की स्थिति में (In Case of a Government Company) [धारा 139 (7)] :
  • ऐसी कम्पनियों में प्रथम अंकेक्षक की नियक्ति कम्पनी के पंजीयन के 60 दिनों के अन्दर भारत के नियन्त्रक-महालेखा परीक्षक (Comptroller and Auditor General, CAG of India) के द्वारा की जाती है।
  • यदि CAG के द्वारा निर्धारित समय में प्रथम अंकेक्षक की नियुक्ति नहीं की जाती है, तो ना का संचालक मण्डल अगले 30 दिनों के अन्दर प्रथम अंकेक्षक की नियुक्ति करेगा। 
  • संचालक मण्डल द्वारा 30 दिनों के अन्दर अंकेक्षक की नियुक्ति नहीं कर पाने की स्थिति में, संचालक मण्डल इसकी सूचना कम्पनी के सदस्यों को प्रदान करेगा, तत्पश्चात् सदस्य 60 । के अन्दर EGM में प्रथम अंकेक्षक की नियुक्ति करेंगे। 
  • प्रथम अंकेक्षक का कार्यकाल प्रथम वार्षिक साधारण सभा (AGM) की समाप्ति तक होगा। 
(A) अनुगामी अंकेक्षक की नियक्ति (Appointment of Subsequent Auditor) 
  1. गैर-सरकारी कम्पनी की स्थिति में (In Case of a Non-Government Company) [धारा 139(1)]
  • प्रत्येक कम्पनी के द्वारा, अपनी प्रथम वार्षिक साधारण सभा (AGM) में, किसी व्यक्ति या फर्म अंकेक्षक के रूप में नियुक्त किया जाना चाहिए।
  •  इस प्रकार नियुक्त किये गये अंकेक्षक का कार्यकाल इस सभा की समाप्ति से लेकर कम्पनी की छठी AGM की समाप्ति तक होगा एवं इसके पश्चात् प्रत्येक छठी साधारण समाप्ति सभा की समाप्ति पर कम्पनी के सदस्यों द्वारा अंकेक्षकों का चयन निर्धारित रीति एवं प्रक्रियानसा जायेगा।
नोट – (a) इस नियुक्ति के पूर्व अंकेक्षक से लिखित सहमति तथा शर्तों के पूर्ण होने साल प्रमाणपत्र लिया जाता है। (b) कम्पनी के द्वारा सम्बन्धित अंकेक्षक को उसकी नियुक्ति की सूचना दी जानी चाहिए: इसकी सूचना रजिस्ट्रार के कार्यालय में, उस सभा जिसमें यह नियुक्ति की गई है के 15 दिनों के दर्ज करानी चाहिए।] (c) अंकेक्षक की नियुक्ति सदस्यों द्वारा प्रत्येक AGM में अभिपुष्ट (ratify) की जानी चाहि (जैसे, दूसरी तीसरी, चौथी एवं पाँचवीं (AGM) 2.सरकारी कम्पनी की स्थिति में (In Case of a Government Company) [धारा 139 (511. 
  • वित्तीय वर्ष के प्रारम्भ से 180 दिनों के अन्दर CAG द्वारा कम्पनी के अंकेक्षक की नियम नियुक्ति की जानी चाहिए। 
  • अंकेक्षक का कार्यकाल AGM की समाप्ति तक होगा।

आकस्मिक रिक्तता को भरना [धारा 139 (8)]

(Filling of a Casual Vacancy) [Sec. 139 (8)] 

आकस्मिक रिक्तता तब उत्पन्न होती है जब नियुक्त अंकेक्षक मृत्यु के कारण, त्यागपत्र देने के कारण, बुरे स्वास्थ्य के कारण, अंकेक्षकों की फर्म का विघटन होने के कारण अपने कार्य को नहीं कर पाता है।
  1. गैर-सरकारी कम्पनी की स्थिति में (In Case of a Non-Government Company) : 
  • अंकेक्षक के कार्यालय में आकस्मिक रिक्तता को संचालक मण्डल द्वारा रिक्तता के 30 दिनों के अन्दर भर देना चाहिए। 
  • यदि यह रिक्तता अंकेक्षक के त्यागपत्र के कारण हुई है, तो नये अंकेक्षक की नियुक्ति की स्वीकृति कम्पनी के द्वारा, सामान्य सभा में संचालक मण्डल की अनुशंसा के 3 महीने के अन्दर, कर दी जानी चाहिए। 
  • आकस्मिक रिक्तता की दशा में नियुक्त किये गये अंकेक्षक का कार्यकाल अगली AGM की समाप्ति तक होगा। 
  1. सरकारी कम्पनी की स्थिति में (In Case of a Government Company) : 
  • अंकेक्षक के कार्यालय में आकस्मिक रिक्तता को CAG द्वारा रिक्तता के 30 दिनों के अन्दर भर देना चाहिए। 
  • यदि CAG निर्धारित समय के अन्दर रिक्तता को भर नहीं पाता है, तो संचालक मण्डल द्वारा 30 दिनों के अन्दर रिक्तता को भर देना चाहिए। 
  • ऐसे अंकेक्षक का कार्यकाल अगली AGM की समाप्ति तक होगा।

अंकेक्षक की पुनर्नियुक्ति [धारा 139 (9)]

(Re-appointment of Auditor) [Sec. 139 (9)] 

कम्पनी की AGM में सेवानिवृत्त होने वाले अंकेक्षक को पुनर्नियुक्त किया जा सकता है, यदि- (a) वह पुनर्नियुक्ति के लिए अयोग्य न हो तो,  (b) उसने कम्पनी को अपनी पुनर्नियुक्ति की अनिच्छा की लिखित सूचना न दी हो, (c) इस सामान्य सभा में, किसी दूसरे अंकेक्षक की नियुक्ति के सम्बन्ध में विशेष प्रस्ताव पारित हुआ हो, या इस अंकेक्षक की पुनर्नियुक्ति नहीं करने का स्पष्ट प्रावधान न किया गया हो, सामान्य सभा में अंकेक्षक की नियुक्ति/पुनर्नियुक्ति में असफल होना (Failure Appoint/Re-appoint Auditor in AGM) [धारा 139(10)] यदि किसी AGM में अंकेक्षक नियुक्ति या पुनर्नियुक्ति नहीं की जाती है, तो वर्तमान अंकेक्षक ही कम्पनी के अंकेक्षक के कार्य जारी रखेंगे। अंकेक्षण समिति की दशा में अंकेक्षक की नियुक्ति (Appointment of Auditor in Audit Committee) [धारा 139 (11)]-जहाँ एक कम्पनी के लिए धारा 177 के अन्तर्गत अंकेक्षण समिति का गठन करना आवश्यक हैं उस दशा में अंकेक्षक की सभी नियुक्ति(आकस्मिक रिक्तता सहित) ऐसी समिति की सिफारशों को ध्यान में रखते हुए की जायेगी। नियुक्ति की अधिकतम अवधि (Maximum Period of Appointment) कोई भी सूचीबद्ध निर्धारित श्रेणी की कम्पनी किसी व्यक्ति को निरन्तर पाँच वर्षों की एक अवधि से देत अंकेक्षक नियुक्त नहीं कर सकती एवं किसी अंकेक्षण फर्म को निरन्तर पाँच वर्ष की दो अवधियों से अधिक समय के लिए अर्थात् कुल 10 वर्ष से अधिक के लिए अंकेक्षक नियुक्त नहीं ता। एक व्यक्ति अंकेक्षक जिसने 5 वर्ष की अवधि पूरी कर ली है अथवा अंकेक्षण फर्म न की अवधि पूरी कर ली है अपने कार्यकाल की समाप्ति से 5 वर्षों तक अंकेक्षक के रूप में उसकी पुनर्नियुक्ति नहीं हो सकती है।  अंकेक्षण करने की संख्या की सीमा (Ceiling on the Number of Audits) [धारा 141 (3)(g)-(i) एक अकेला व्यक्ति 20 कम्पनियों से अधिक का अंकेक्षक नहीं हो सकता; (ii) यदि की फर्म है तो प्रत्येक साझेदार के लिए अधिकतम 20 कम्पनियाँ निर्धारित की गई हैं। एक था जो पर्णकालिक कहीं और रोजगार में है, उसे भी फर्म के द्वारा अंकेक्षण करने की संख्या की सीमा तय करने में ध्यान में रखा जाता है। नियक्ति के सम्बन्ध में अंकेक्षक का व्यावसायिक दायित्व – अपनी नियुक्ति के सम्बन्ध में स्वीकति भेजने से पूर्व अंकेक्षक को चार्टर्ड एकाउण्टेण्ट्स एक्ट की धारा 22 की व्यवस्थाओं का ध्यान रखना चाहिए जो निम्नवत् हैं : (1) इस प्रकार नियुक्त अंकेक्षक अपनी नियुक्ति की सूचना उस अंकेक्षक को दे देगा जिसके स्थान पर वह नियुक्त किया जा रहा है और जो पहले चार्टर्ड एकाउण्टेण्ट था। (2) यह देखना चाहिए कि उसकी नियुक्ति के सम्बन्ध में कम्पनी अधिनियम की धाराओं का पूर्णरूपेण पालन किया गया है। (3) अंकेक्षक अपनी नियुक्ति किसी प्रतिस्पर्धा के आधार पर स्वीकार नहीं करेगा। अत्याधिक कम फीस पर नियुक्ति स्वीकार करना इसका एक उदाहरण हो सकता है। इस नियुक्ति में पिछले अंकेक्षक को हटाने का इरादा प्रकट नहीं होना चाहिए। (4) अपनी नियुक्ति के लिए प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से प्रयास या सिफारिश या दबाव का प्रयोग करना उनके लिए व्यावसायिक दुराचरण का दोष माना जायेगा जिस दोष का उसे भागी बनाया जा सकता है। अंकेक्षक को हटाया जाना (Remuneration of an Auditor) [धारा 140 (1)]–धारा 139 के अन्तर्गत नियुक्त अंकेक्षक को उसकी अवधि समाप्त होने से पहले केन्द्र सरकार से पूर्व अनुमति लेने के ” निधारित तरीके से कम्पनी द्वारा विशेष प्रस्ताव पारित करके पद से हटाया जा सकता है परन्तु शर्त ‘ कि इस धारा के अन्तर्गत कार्यवाही करने से पूर्व अंकेक्षक को सुनवाई का उचित अवसर दिया जाएगा। अंकेक्षक का पारिश्रमिक (Removal of An Auditor)  सामान्य नियम है कि जो अधिकारी अंकेक्षक की नियुक्ति करता है वही उसका पारिश्रिक तय करता है। कम्पनी अधिनियम, 2013 की धारा 142 के अनुसार अंकेक्षक के पारिश्रमिक के सम्बन्ध में व्यवस्था निम्नवत् है : (1) यदि अंकेक्षक की नियुक्ति संचालकों के बोर्ड द्वारा की जाती है, तो पारिश्रमिक भी बोर्ड द्वारा तय किया जाता है। यदि अंकेक्षक सरकार द्वारा नियुक्त किये जाते हैं तो वह ही उनका पारिश्रमिक तय करेगी। (2) अन्य दशाओं में अंकेक्षक का पारिश्राम साधारण सभा में या सभा में जैसा कम्पनी निश्चित करें, उसके अनुसार निर्धारित किया जाता है। यदी कम्पनी ने अंकेक्षक के खर्चों (auditor’s expenses) के लिए कुछ भुगतान किया हो, तो, यह रकम भी पारिश्रमिक में शामिल कर ली जाएगी. परन्तु कम्पनी के अनुरोध पर अन्य किसी प्रदत्त सेवा चुकता राशि पारिश्रमिक में शामिल नहीं होगी।

कम्पनी अंकेक्षक के वैधानिक अधिकार

(Statutory Rights of Company’s Auditor) 

कम्पनी अधिनियम, 2013 की धारा 143 (1) के अन्तर्गत अंकेक्षक को निम्नलिखित अ प्राप्त हैं –
  1. कम्पनी की पुस्तकों, लेखों तथा प्रमाणकों का निरीक्षण करने का अधिकार – कम्पनी प्रत्येक अंकेक्षक को कम्पनी की पुस्तकों, लेखों व प्रमाणकों का निरीक्षण किसी भी समय करने का अधिकार है तथा कम्पनी के अधिकारियों से ऐसी सूचनाएँ व स्पष्टीकरण माँगने का अधिकार है जिनकी अंकेक्षक अपने कर्त्तव्यों का पालन करने के लिए आवश्यक समझे।
  2. बिना सूचना दिए हुए अंकेक्षण प्रारम्भ करने का अधिकार – वैधानिक रूप से अंकेक्षक को यह अधिकार है कि नियुक्त हो जाने के बाद बिना सूचना दिए हुए किसी भी तिथि से अंकेक्षण का कार्य आरम्भ कर सकता है। परन्तु व्यवहार में अंकेक्षण करने के लिए एक तिथि संचालकों से निश्चित कर ली जाती है। यदि वह किसी अन्य तिथि को आना चाहे तो उचित सूचना देने की प्रथा है।
  3. शाखा पुस्तकें देखने का अधिकार – यदि कम्पनी की शाखा का अंकेक्षण कम्पनी अंकेक्षक द्वारा नहीं कराया जाता है तो कम्पनी अंकेक्षक को शाखा कार्यालय पर रखे हुए हिसाब की पुस्तकों तथा प्रमाणकों तक हर समय पहुँच रखने का अधिकार होता है।
  4. साधारण सभाओं से सम्बन्धित सूचनायें प्राप्त करने का अधिकार – कम्पनी अंकेक्षक को कम्पनी की वार्षिक साधारण सभाओं से सम्बन्धित सचनाओं को प्राप्त करने का अधिकार होता है।
  5. साधारण सभा में भाग लेने का अधिकार – अंकेक्षक को यह अधिकार प्राप्त है कि वह कम्पनी की साधारण सभा में भाग ले सकता है, परन्तु उसे अपने सम्बन्धित कार्यों को छोड़कर किसी अन्य विषय पर बोलने का अधिकार नहीं होता।
  6. वैधानिक प्रलेखों को देखने का अधिकार – अंकेक्षक को कम्पनी के पार्षद सीमानियम, अन्तर्नियम व प्रविवरण पत्र को देखने का अधिकार है।
  7. तकनीकी एवं वैधानिक सलाह लेने का अधिकार – अंकेक्षक स्वयं प्रत्येक विषय का विशेषज्ञ नहीं होता है। अत: यदि वह आवश्यक समझे तो वह किसी भी मामले पर विशेषज्ञ की कानूनी राय ले सकता है।
  8. पारिश्रमिक प्राप्त करने का अधिकार – यदि अंकेक्षक ने अपना कार्य समाप्त कर लिया है, तो उसे अपना पारिश्रमिक पाने का अधिकार है, परन्तु यदि अंकेक्षक की नियुक्ति वार्षिक शुल्क पर की गई है परन्तु उसे उस वर्ष की समाप्ति से पूर्व ही हटा दिया गया है तो उसे पूरे वर्ष का पारिश्रमिक पाने का अधिकार है, जैसे कि होमर बनाम निकलटर, के मामले में 1908 में निर्णय दिया गया था।
  9. क्षतिपूर्ति प्राप्त करने का अधिकार – किसी कम्पनी द्वारा अंकेक्षक के विरुद्ध कोई अभियोग लगाया गया है और अंकेक्षक को आत्मरक्षा के लिए उस मुकदमे पर व्यय करना पड़ा है तो यदि उस मुकदमे का निर्णय अंकेक्षक के पक्ष में होता है तब अंकेक्षक को उस मुकदमे पर व्यय की गई राशि की क्षतिपूर्ति प्राप्त करने का अधिकार है।
  10. लेखापुस्तकों एवं दस्तावेजों पर ग्रहणाधिकार (Lien on Books): कम्पनी के द्वारा अंकेक्षक को दी गई लेखापुस्तकों एवं दस्तावेजों पर अंकेक्षक का ग्रहणाधिकार होता है, यदि उस पारिश्रमिक का भुगतान प्राप्त नहीं हुआ हो।

कम्पनी के अंकेक्षक के कर्तव्य

(Duties of Company’s Auditor) 

कम्पनी अंकेक्षक के कर्त्तव्यों को अध्ययन की सुविधा की दृष्टि से निम्नलिखित शीर्षकों में विभक्त किया गया है
  1. भारतीय कम्पनी अधिनियम के अनुसार कर्त्तव्य,
  2. न्यायाधीशों के निर्णयानुसार कर्त्तव्य।
  3. भारतीय कम्पनी अधिनियम के अनुसार कर्तव्य 
  4. विशेष जाँच करना-कम्पनी अधिनियम, 2013 की धारा 143 (1) के अन्तर्गत अंकेक्षक निम्नलिखित विषयों की विशेष जाँच करनी चाहिए
(i) क्या कम्पनी के द्वारा दिए गए ऋण और अग्रिम भुगतान (Loans and Advances) प्रतिभूति के आधार पर दिए गए हैं।  वे उचित रूप से सुरक्षित हैं और जिन शर्तों पर ये दिए गए हैं. वे पनी और उसके सदस्यों के हितों के विरुद्ध तो नहीं हैं ? (ii) क्या कम्पनी के लेनदेन जो पुस्तकों की प्रविष्टियों से प्रकट होते हैं, कम्पनी के हित के विरुद्ध तो नही है। (iii) य़दी  एक कम्पनी विनियोजित कम्पनी है या एक बैंकिंग कम्पनी है, तो क्या इसकी सम्पत्तियों का वह भाग जो अंशों, ऋण-पत्रों या अन्य प्रतिभूतियों में है, इनके क्रय-मूल्य से कम में बेचा गया है ? (iv) क्या कम्पनी द्वारा दिए गए ऋण और अग्रिम निक्षेपों (Deposits) की तरह दिखलाए गए हैं ?  (v) क्या व्यक्तिगत व्यय लाभगत खाते में ले जाए गए हैं ? (vi)  यदि अंशों का आबंटन (Allotment) नकद हुआ है, तो क्या ऐसे आबंटन के सम्बन्ध में नकदी वास्तव में प्राप्त कर ली गई है और यदि कोई भी नकदी वास्तव में प्राप्त नहीं की गई है तो जो स्थिति लेखा-पुस्तकों में व चिट्ठे में दिखाई गई है वह ठीक, नियमित और विश्वसनीय है ?
  1. रिपोर्ट में अन्तिम खातों की सत्यता की सूचना देना – अंकेक्षक का यह कर्त्तव्य है कि वह अपने द्वारा अंकेक्षित खातों, चिट्ठ तथा लाभ-हानि खाते और ऐसे अन्य प्रपत्रों के सम्बन्ध में जो चिट्ठे या लाभ-हानि खाते के साथ संलग्न किए जाते हैं, एक रिपोर्ट देगा और यह लिखेगा कि उनकी राय में और पूर्ण जानकारी में उसे जो स्पष्टीकरण दिए गए हैं, उसके अनुसार ये खाते कम्पनी की सच्ची तथा उचित स्थिति प्रकट करते हैं या नहीं। _
  2. रिपोर्ट में अन्य बातों का समावेश – अंकेक्षक का यह कर्त्तव्य है कि वह अपनी रिपोर्ट में निम्नलिखित बातों को प्रकट करे-(i) क्या उसे वह सूचनायें व स्पष्टीकरण जो अंकेक्षण कार्य को करने के लिए आवश्यक थीं प्राप्त हो गये हैं। (ii) संस्था के खाते कम्पनी अधिनियम के अनुसार रखे गए हैं या नहीं तथा कम्पनी की शाखाओं से जिसका उसने निरीक्षण नहीं किया है, समस्त सूचनायें प्राप्त कर ली गई हैं। कम्पनी का चिट्ठा तथा लाभ-हानि खाता पुस्तकों के अनुसार है।
4.रिपोर्ट पर हस्ताक्षर करना – धारा 145 के अनुसार अंकेक्षक का कर्तव्य है कि वह अपने द्वारा दा हुई रिपोर्ट पर हस्ताक्षर करे और यदि कोई फर्म किसी कम्पनी के लिए अंकेक्षक नियुक्त हो तो उनका कोई भी साझेदार रिपोर्ट पर हस्ताक्षर कर सकता है।
  1. प्रविवरण में दी गयी सूचना को प्रमाणित करना – धारा 26 के अनुसार जब एक चालू कम्पनी भाववरण निर्गमित करती है तो अंकेक्षक को नीचे लिखी बातों के सम्बन्ध में अपनी रिपोर्ट देनी चाहिए –
(क) कम्पनी के लाभ-हानि के सम्बन्ध में,  (ख) सम्पत्ति तथा दायित्व के लिए, और (ग) पिछले पाँच वर्षों में से प्रत्येक वर्ष में कम्पनी द्वारा बाँटे गये लाभांश के लिए। 
  1. एच्छिक समापन पर रिपोर्ट देना – जब कम्पनी स्वेच्छा से समाप्त (voluntary winding-up) है और उसके संचालक कम्पनी अधिनियम, 2013 की धारा 305 (1) के अनुसार कम्पनी की शोधन-क्षमता  होती है और उसके संचालक शोधन-क्षमता (solvency) के विषय में अपनी घोषणा करते हैं तो अंकेक्षक का कर्तव्य हो जाता है कि वह इस घोषणा के बारे में अपनी रिपोर्ट दे।
  2. कम्पनी अनुसंधान के समय सहायता करना – कम्पनी अधिनियम की धारा 217 के अनसार ना का अनुसंधान होता है. तो अंकेक्षक का यह कर्त्तव्य है कि वह निरीक्षक (Inspector) की हायता करे तथा उसके पास जो कम्पनी से सम्बन्धित पुस्तकें व प्रपत्र हों उनको सौंप दे।
कम्पनी ” विधान ने कम्पनी के अंकेक्षक का कर्तव्य स्पष्ट कर दिया है और उसके कार्य में कम्पनी ” सदस्य या अन्तर्नियम किसी प्रकार हस्तक्षेप नही कर सकते है।
  1. न्यायाधीशों के निर्णयानुसार अंकेक्षक के कर्त्तव्य
न्यायालय द्धारा अंकेक्षक के सम्बन्ध में विभिन्न कार्यालय निर्णय दिये गये हैं, जिनके अनुसार  अंकेक्षक के कर्तव्य निम्न प्रकार है-
  1. नियुक्ति से सम्बन्धि कम्पनी अधिनियम की व्यवस्थाओं के पालन का पता लगाना – बी० मि के० एन० जे० सत्यवादी (10 March 1955) के विवाद में यह निर्णय दिया गया कि अंकेक्षक का यह प्रथम कर्त्तव्य है कि वह यह देखे कि उसकी नियुक्ति से सम्बन्धित नियमों का पालन हुआ है या नही।
  2. इन्स्टीट्यूट का सदस्य बनना व प्रमाण – पश्र प्राप्त करना-केन्द्रीय सरकार के व्यापार व
उद्योग उपमन्त्री बनाम ए० सी० कहर (21 Nov. 1954) के विवाद में निर्णय दिया गया है कि व्यक्ति तब तक अंकेक्षण नहीं कर सकता जब तक कि वह इन्स्टीट्यूट का सदस्य न बन प्रमाण पत्र प्राप्त न कर ले।
  1. हस्तगत रोकड़ का स्वयं सत्यापन करना – केन्द्रीय सरकार के वित्त व अर्थउप-सचिव बनाम ए० एस० गुप्ता (1955) के विवाद में यह निर्णय दिया गया कि अंकेक्षकको रोकड़ का सत्यापन स्वयं करना चाहिए। यदि उसे खाते में कोई गड़बड़ी दिखाई दे तो उसकी स्पष्ट शब्दों में कम्पनी के अंशधारियों को देनी चाहिए।
  2. ईमानदारी व सावधानी से कार्य करना – लन्दन एवं जनरल बैंक लि. (1895 के यह निर्णय दिया गया कि अंकेक्षक को सावधानी व ईमानदारी से कार्य करना चाहिए।
  3. अंकेक्षक द्वारा अपना कार्य उचित योग्यता, सतर्कता व चतुराई से करना – किंग्सटन कर मिल्स लि० (1896) के विवाद में यह स्पष्ट किया गया है कि अंकेक्षक का यह कर्त्तव्य है कि अपना कार्य उचित योग्यता, सतर्कता एवं चतुराई से करे। किसी मामले में कितनी सावधानी एवं चन उचित होगी, वह उस मामले की परिस्थितियों पर निर्भर करता है। ___
  4. प्रतिभूतियों की विद्यमानता और सुरक्षा की जाँच करना – सी० टी० बिल फायर इन्श्योरेंस कम्पनी लि० के विवाद में यह निर्णय दिया गया कि अंकेक्षक का यह कर्त्तव्य है कि वह स्वयं यह देख कि कम्पनी की प्रतिभूति विद्यमान तथा सुरक्षित हैं।
  5. आर्थिक स्थिति की सत्यता एवं औचित्य की जाँच करना – लीड्स एस्टेट विल्डिंग एण्ड इन्वेस्टमेन्ट सोसायटी लि. बनाम शेफर्ड के मामले में यह निर्णय दिया गया कि अंकेक्षक का यह कर्त्तव्य होता है कि वह आर्थिक चिट्ठे की केवल गणितीय शुद्धता की ही जाँच न करे बल्कि उसे यह भी देखना चाहिये कि आर्थिक चिट्ठा सही स्थिति को स्पष्ट करता है या नहीं।
  6. अंशधारियों पर अपनी नियुक्ति के लिए दबाव न डालना – बी० जी० दफारिया बनाम एस० एम० कसवेकर (10 July, 1955) के विवाद में यह निर्णय दिया गया है कि अंशधारियों पर अंकेक्षक द्वारा अपनी नियुक्ति के लिए दबाव नहीं डालना चाहिए।
  7. ऋण-पत्रों की जाँच करना – डाबर एण्ड सन्स लिमिटेड बनाम एस० एम० कृष्णास्वामी (1951) के विवाद के निर्णय में यह कहा गया कि अंकेक्षक का यह कर्त्तव्य है कि यदि कम्पनी द्वारा ऋणपत्र निर्गमित किये गए हों तो वह यह देखे कि ऋणपत्र प्रन्यासी लेख में इस सम्बन्ध में क्या नियम दिये हुए हैं। उनके भुगतान करने के लिए सिंकिंग फण्ड की व्यवस्था हो तो उसका विनियोग किस प्रकार किया गया है।
  8. सन्देहजनक परिस्थितियों की गहन जाँच – लन्दन आयल स्टोरेज क० बनाम सीयर हसलक एण्ड क० के विवाद में यह निर्णय दिया गया कि यदि अंकेक्षक को किसी तथ्य पर सन्देह हो ता उसकी गहन जाँच करनी चाहिए और इसके पश्चात् ही अपनी रिपोर्ट देनी चाहिए।

अंकेक्षक एक रखवाली करने वाले कुत्ते के सदृश्य है,

परन्तु रक्त-पिपासित शिकारी कुत्ता नहीं 

(An Auditor is a watchdog, but not a blood-hound) 

आशय-उपरोक्त कथन कि “अंकेक्षण एक रखवाली करने वाला कत्ता है, परन्तु रक्त-पिन शिकारी कुत्ता नहीं”, किंग्सटन कॉटन मिल्स कम्पनी लिमिटेड, 1896 (Kingston Cotton, Company Ltd., 1896) वाले मामले में न्यायाधीश लोप्स द्वारा दिये गये निर्णय का एक अश कथन का स्पष्ट आशय यह है कि अंकेक्षक वास्तव में एक चौकीदार की भाँति होता है। यहाँ चा की उपमा ‘रखवाली करने वाले कुत्ते’ (watch dog) से दी गई है। जिस प्रकार से चौकीदार मालिक के आदेशानुसार उसकी सम्पत्ति आदि की देखभाल करता रहता है एवं किसी भी दुध दशा में भौंककर उसकी तुरन्त सूचना अपने मालिक को देता है, उसी प्रकार अंकेक्षक भी अपन का स्वामिभक्त सेवक होता है। अंकेक्षण का कार्य करते समय उसके समक्ष जो भी त्रुटि छल-कपट आता है, उसकी सूचना वह अपने नियोक्ता को देता है। परन्तु इस वाक्यांश का दूस अत्यन्त सारगर्भित है, जो अंकेक्षक के कर्त्तव्यों का बड़ी गहनता के साथ विवेचन करता है। इस का अर्थ भली प्रकार समझने के लिए पहले यह जानना चाहिए कि (i) रखवाली करने वाला कुत्ता (ii) ‘रक्त-पिपासित शिकारी कुत्ता’ (blood hound) कौन होते हैं? तथा इन दोनों में अन्तर क्या है ? (i) रखवाली करने वाले कुत्ते का आशय (Meaning of Watch Dog)-प्राय: यह सब लोग जानते है कि रखवाली करने वाले कुत्ते का काम यह देखना होता है कि कोई भी व्यक्ति उसके मालिक कर धन अथवा माल की चोरी न करे तथा उसके मालिक को किसी प्रकार का नुकसान न पहुँचाए, ओर यदि कोई चोर या अनजान व्यक्ति घर में घुस रहा है एवं चीजों को चुराने की कोशिश कर चिल्ला कर उसकी सूचना अपने मालिक को दे। एक स्वामिभक्त कुत्ते को प्राय: इस बात का रहता है कि वास्तव में कौन-सा व्यक्ति नुकसान पहुँचाने आया है और कौन-सा व्यक्ति यों ही आया है। यही कारण है कि वह हर एक व्यक्ति के आगमन पर नहीं भौंकता और न प्रत्येक व्यक्ति को काटने या कष्ट पहुँचाने की कोशिश ही करता है।  (ii) रक्त पिपासु शिकारी कुत्ता (Blood hound) से आशय – एक रक्त पिपासु शिकारी कुत्ता dhound) प्रत्येक आने वाले व्यक्ति पर भौंकता है। क्योंकि एक शिकारी कुत्ता जब शिकार के पीछे मटा जाता है तो कुत्ता यह मानकर चलता है कि उसका शिकार सामने है। वह उसे अपना शत्रु समझता है और उस शिकार को पकड़कर ही दम लेता है। इस प्रकार शिकारी कुत्ता एक खतरनाक जानवर होता है क्योंकि वह प्रत्येक जीव को अपना शत्रु समझता है, प्रत्येक व्यक्ति पर भौंकता है और उसे शक की नजर से देखता है। 

अंकेक्षक रखवाली करने वाले कुत्ते के समान है अथवा

शिकारी कुत्ते के समान ? 

उपरोक्त दोनों शब्दों में अन्तर के अध्ययन के उपरान्त इनके लक्षणों को अंकेक्षक पर चरितार्थ कीजिए। जब किसी संस्था के हिसाब-किताब के अंकेक्षण के लिए किसी अंकेक्षक की नियुक्ति की जाती है तो उसका यह कर्त्तव्य होता है कि वह यह देखे कि समस्त हिसाब-किताब ठीक है एवं संस्था की आर्थिक स्थिति भी वैसी ही है जैसे कि हिसाब-किताब में प्रतिबिंबित होती है। उसको यह भी देखना चाहिए कि लेखों में कोई कमी तो नहीं है तथा कहीं छल-कपट तो नहीं किए गए हैं। इस कर्त्तव्य का निष्पादन वह कुशलतापूर्वक उसी दशा में कर सकता है जब उसने प्रत्येक कार्य को चतुराई, विवेक एवं सावधानी के साथ किया हो। अंकेक्षण का कार्य प्रारम्भ करने के पूर्व, अंकेक्षक को ऐसी धारणा नहीं बना लेनी चाहिए कि संस्था के हिसाब-किताब में गड़बड़ी अवश्य है तथा उसके सभी कर्मचारी कपटी व बेईमान हैं। वास्तव में, उसको अपना काम सभी खातों को ठीक मान कर शुरू करना चाहिए। किसी भी संस्था में अंकेक्षण हेतु प्रवेश करने के बाद उसको मस्तिष्क में आशंकाओं के साथ नहीं घुसना चाहिए। व्यर्थ में किसी भी कर्मचारी पर शक नहीं करना चाहिए। बिना आधार किसी खाते को गलत नहीं समझना चाहिए। कार्य करते समय किसी भी व्यक्ति से कठोरता के साथ बातचीत भी नहीं करनी चाहिए। छोटी-छोटी बात को अनावश्यक रूप से महत्त्व भी नहीं देना चाहिए। उसे संस्था में कर्मचारियों के मध्य ऐसा वातावरण नहीं पैदा करना चाहिए जिससे कि लोग उसको ‘भूत’ समझने लगें, तथा उससे भयभीत हों। यदि वह ऐसा करता है, तो कभी भी सफलता प्राप्त नहीं कर सकता। इस प्रकार सामान्य परिस्थितियों में अंकेक्षक को रखवाली करने वाले कुत्ते की तरह कार्य करना चाहिए, परन्तु यदि आनयमितता, गबन या कपट का आभास हो तो उसे शिकारी कुत्ते का रूप धारण कर लेना चाहिए भर उसको तब तक आराम से नहीं बैठना चाहिए जब तक वह गहरी जाँच-पड़ताल न कर ले। दी किंग्सटन कॉटन मिल्स कम्पनी लि. के विवाद में न्यायाधीशों ने अपना निर्णय देते हुए कहा कि अकेक्षक को अपने कर्तव्य का निष्पादन करते समय यदि, कहीं पर किसी बात की शंका होती है. कम्पना के उच्च अधिकारियों द्वारा उसका निवारण करवा लेना चाहिए। यदि कम्पनी के उच्च मारया द्वारा प्रदान किए हए प्रमाण-पत्र को ठीक मान कर उसने काम किया है और इस पर वह कपट या धोखेबाजी को प्रकट नहीं कर पाता है, तो वह इसके लिए उत्तरदायी न होगा। उसको काय इमानदारी, विवेक तथा चतराई के साथ करना चाहिए। अंकेक्षक का कर्तव्य एक निश्चित भातर खोजबीन करना है। उसको रक्त-पिपासित शिकारी कुत्ते की भांति भौंकते हुए इधर-उधर मना है। यदि उसको किसी भी स्थान पर कोई शंका हो जाती है, तो उसका निवारण कर लेना “पाद शका का समाधान न हो तो उसका उल्लेख अपनी रिपोर्ट में अवश्य कर देना चाहिए।

उपरोक्त कथन के आधार पर अंकेक्षक के कर्तव्य 

(Duties of the Auditor on the Basis of Above Statement) 

उपरोक्त कथन की विवेचना के आधार पर अंकेक्षक के निम्नलिखित कर्त्तव्य स्पष्ट होते हैं-
  1. अंकेक्षक को शंकाल नहीं होना चाहिए 
  2. अंकेक्षक को कर्मचारियों पर विश्वास करना चाहिए
  1. अंकेक्षक को केवल गणितीय सम्बन्धी शुद्धता ही नहीं देखनी चाहिए 
  2. अंकेक्षक सत्यता की गारण्टी नहीं दे सकता 
  3. अंकेक्षक को ईमानदारी से कार्य करना चाहिए 
  4. अंकेक्षक को उचित सावधानी का प्रयोग करना चाहिए 
  5. अंकेक्षक जासूस नहीं है
कम्पनियों का विशेष अंकेक्षण  केन्द्रीय सरकार किसी कम्पनी का विशेष अंकेक्षण कराने का आदेश दे सकती है, यदि केन्द्रीय सरकार की यह राय हो कि : (अ) कम्पनी के कार्य का प्रबन्ध उचित व्यापारिक सिद्धान्तों अथवा व्यावसायिक सिद्धान्तों के अनुसार नहीं चल रहा है, या (ब) कम्पनी का प्रबन्ध इस प्रकार हो रहा है कि उसके व्यापार, उद्योग या सम्बन्धित व्यवसाय के हितों की गम्भीर हानि या क्षति हो सकती है, या (स) कम्पनी की वित्तीय स्थिति इतनी कमजोर है कि इसके शीघ्र ही दिवालिया हो जाने की सम्भावना है। केन्द्रीय सरकार अपने आदेश के द्वारा विशेष अंकेक्षण की अवधि निर्धारित कर सकती है और यह तय कर सकती है कि ऐसा अंकेक्षण करने के लिए किसी चार्टर्ड एकाउण्टेण्ट को नियुक्त किया जायेगा या यह अंकेक्षण कम्पनी के अंकेक्षक के द्वारा ही किया जायेगा। ऐसा अंकेक्षक विशेष अंकेक्षक कहलायेगा। अधिकार तथा कर्त्तव्य वे ही होंगे जो धारा 143 के अन्तर्गत कम्पनी अंकेक्षक को दिये जाते हैं। अन्तर यह है कि विशेष अंकेक्षक अपनी रिपोर्ट कम्पनी के सदस्यों को देने के स्थान पर केन्द्रीय सरकार को देगा।

क्या अंकेक्षक काले धन को रोकने में सहायक है?

(Can an Auditor be helpful in Checking Black Money) – 

वस्तुत: अंकेक्षक के समक्ष जाँच हेतु वे समस्त कागज प्रस्तुत किये जाते हैं, जो काले धन से सम्बन्धित नहीं होते। काला धन छिपा हुआ धन होता है, जिसके लिये अलग से खातों की व्यवस्था की जाती है। काले धन का सृजन पूर्णतया नियोजित ढंग से होता है, जिसे ढूँढना वास्तव में अत्यन्त ही कठिन होता है। वस्तुतः एक अंकेक्षक का कार्य कागज से सम्बन्धित होता है। वह प्रमाणकों के आधार पर संस्था की लेखा पुस्तकों की जाँच करता है। यदि संस्था के पास पर्याप्त प्रमाणक हैं तथा लेन-देनों की लेखापुस्तकों में प्रविष्टियाँ की गयी हैं तो वह किसी भी प्रकार की आपत्ति नहीं कर सकता है। यही उसकी दुर्बलता है। स्पष्ट है कि अंकेक्षक काले धन को रोकने में सहायक नहीं है। काला धन एक प्रमुख समस्या है जिसे रोकने के लिए अंकेक्षक को विशेष रूप से उत्तरदायी ठहराया जाना आवश्यक है जिसके लिए संस्थागत अधिनियम में परिवर्तन तथा संशोधन की आवश्यकता है। यदि अंकेक्षक वैधानिक सीमाओं के अन्तर्गत कार्य करता रहेगा तो काला धन कम नहीं होगा, वरन् इसमें वृद्धि होती रहेगी और अंकेक्षक भी इसे न रोक पाने के कारण इसकी वृद्धि में सहायक बना रहेगा। इतना ही इस सम्बन्ध में यहाँ कहना पर्याप्त है।

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