B.Com 3rd Year Industrial Dispute Act 1947 – Economic Laws Hindi Notes

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द्वितीय विश्वयुद्ध के पश्चात् औद्योगिक संघर्षों को रोकने, कम करने एवं निपटाने के उद्देश्य से सन् 1947 में औद्योगिक विवाद अधिनियम पारित किया गया। यह अधिनियम सम्पूर्ण भारतवर्ष में 1 अप्रैल, 1947 से लागू होता है। इसमें 40 धारायें और 5 अनुसूचियाँ हैं। यह अधिनियम सन् 1982 में विस्तृत रूप से संशोधित किया गया। इस अधिनियम में अन्तिम संशोधन अगस्त 1984 में किया गया जब इसमें चार नई अनुसूचियों को और जोड़ा गया। इस तरह कुल पाँच अनुसूचियाँ बनायीं गयीं।

औद्योगिक विवाद/संघर्ष का आशय एवं परिभाषा

(Meaning and Definition of Industrial Dispute) 

सामान्य अर्थ में, औद्योगिक विवाद का आशय, औद्योगिक क्षेत्र में कर्मचारी एवं नियोक्ता के मध्य, श्रमिकों के मध्य, नियोक्ता एवं नियोक्ता के मध्य होने वाले विवाद से है। यह विवाद हड़ताल, तालाबन्दी, सही प्रकार कार्य न करना, शिथिलता से कार्य करना, घेराव, विरोध प्रदर्शन, धरना आदि के रूप में देखा जा सकता है। ___ परिभाषा (Definition)—”औद्योगिक संघर्षों या विवाद का आशय नियोक्ताओं और नियोक्ताओं के बीच, नियोक्ता और श्रमिक के बीच, श्रमिकों और श्रमिकों के बीच, संघर्ष अथवा मतभेद से है जो किसी व्यक्ति की नियुक्ति अथवा उसके काम के सम्बन्ध में हो या प्रतिबन्धों या शर्तों के सम्बन्ध में हो।”

-औद्योगिक विवाद अधिनियम की धारा 2(k) 

औद्योगिक विवाद/संघर्ष के आवश्यक लक्षण

(Essentials of An Industrial Dispute) 

औद्योगिक विवाद के मुख्य लक्षण निम्नलिखित प्रकार हैं-

  1. कर्मचारी एवं नियोक्ता के मध्य हुये अनुबन्ध के सम्बन्ध में विवाद होना। 
  2. कर्मचारी की समस्या को नियोक्ता द्वारा अनसुना करना। 
  3. नियोक्ता और नियोक्ता के मध्य, श्रमिक एवं नियोक्ता के मध्य विवाद होना।
  4. मजदूरी की दर के सम्बन्ध में प्रतिस्पर्धा के कारण नियोक्ताओं के मध्य विवाद होना। 
  5. नियोजन की कार्यदशाओं के सम्बन्ध में विवाद होना। 
  6. औद्योगिक विवाद के लिए श्रमिक व नियोक्ता के मध्य अनुबन्ध होना जरूरी है। 
  7. श्रमिक का औद्योगिक उपक्रम में कार्यरत होना आवश्यक है। 
  8. औद्योगिक विवाद ऐसे उद्योगों में होना चाहिए जो क्रियाशील हैं।

वे विवाद जो औद्योगिक विवाद नहीं हैं (Disputes which are not Industrial Disputes) निम्नलिखित विवाद औद्योगिक विवाद नहीं माने जाते-

  1. किसी ऐसे नये औद्योगिक उपक्रम के सम्बन्ध में प्रस्तुत विवाद जिसका औद्योगिक कार्य प्रारम्भ ही नहीं हुआ हो।
  2. किसी ऐसे पुराने औद्योगिक उपक्रम के प्रति प्रस्तुत विवाद जिसका औद्योगिक कार्य बन्द हो चुका हो।
  3. श्रमिकों द्वारा न की जाने वाली माँगों के सम्बन्ध में प्रस्तुत विवाद। 
  4. श्रमिकों के लिए आवासीय योजना के सम्बन्ध में प्रस्तुत विवाद। 
  5. श्रमिक को दण्डित करने या सेवामुक्त करने के सम्बन्ध में उत्पन्न विवाद। 
  6. ऐसे विवाद जो श्रम संगठन, श्रम संघ या किसी श्रम समूह ने प्रस्तुत न किये हों।

औद्योगिक विवाद अधिनियम के प्रमुख उद्देश्य

(Main objectives of Industrial Disputes Act) 

संक्षेप में, औद्योगिक विवाद अधिनियम के मुख्य उद्देश्य निम्नलिखित हैं-

  1. श्रम व पूँजी के मध्य मधुर सम्बन्ध स्थापित करने और उसे बनाये रखने में सहायता करना।
  2. नियोक्ताओं और नियोक्ताओं के मध्य, नियोक्ताओं और श्रमिकों के मध्य, श्रमिकों एव श्राम के मध्य उत्पन्न हुये औद्योगिक विवादों के विषय में जाँच करना एवं उन्हें हल करना।
  1. देश में औद्योगिक शान्ति बनाये रखना।
  2. कार्य देने की असमर्थता जबरी छुट्टी, छंटनी एवं बन्दी आदि के सम्बन्ध में आवश्यक प्रतिबन्ध नाना एवं इन दशाओं में श्रमिकों के हितों की रक्षा करना।
  3. अवैधानिक तालाबन्दियों एवं हड़तालों पर रोक लगाना। 
  4. औद्योगिक उत्पादन का स्तर ऊँचा बनाये रखना। 
  5. श्रमिक नेताओं तथा श्रम संघों के सदस्यों को मान सम्मान दिलाना। 
  6. सामूहिक सौदेबाजी को बढ़ावा देना।

आधारभूत परिभाषाएँ (Basic Definitions) (धारा 2) 

  1. उपयुक्त सरकार (Appropriate Government)-(अ) निम्नलिखित उद्योगों के सम्बन्ध में

मी औद्योगिक विवाद के सन्दर्भ में उपयुक्त सरकार से आशय केन्द्रीय सरकार’ से है- (i) केन्द्रीय सरकार के अधीन संचालित उद्योग  (ii) रेलवे कम्पनी द्वारा नियोजित कोई उद्योग  (iii) बैकिंग कम्पनी  (iv) बड़े बन्दरगाह  (v) खान, तेल क्षेत्र के उद्योग (vi) औद्योगिक वित्त निगम, कर्मचारी राज्य एवं बीमा निगम, जीवन बीमा निगम, कृषि, पुनर्वित निगम, यूनिट ट्रस्ट ऑफ इंडिया से सम्बन्धित विवाद (vii) इण्डियन एयर लाइन्स या एयर इंडिया से सम्बन्धित विवाद।  (ब) अन्य किसी औद्योगिक विवाद के सम्बन्ध में उपयुक्त सरकार से आशय ‘राज्य सरकार’ से [धारा 2(a)] 

  1. मध्यस्थ या पंच (Arbitrator) मध्यस्थ या पंच से आशय अधिनिर्णायक (umpire) से है।

[धारा 2(aa)] 

  1. औसत वेतन (Average Salary)

(i) मजदूरी का मासिक भुगतान प्राप्त करने वाले मजदूरों या श्रमिकों की दशा में सम्पूर्ण तीन कलैण्डर माह में भुगतान की जाने वाली मजदूरी के औसत से है। __ (ii) मजदूरी का साप्ताहिक भुगतान प्राप्त करने वाले मजदूरों या श्रमिकों की दशा में सम्पूर्ण चार सप्ताह में भुगतान की जाने वाली मजदूरी के औसत से है। (iii) मजदूरी का दैनिक भुगतान प्राप्त करने वाले मजदूरों या श्रमिकों की दशा में सम्पूर्ण बारह दिवस में भुगतान की जाने वाली मजदूरी के औसत से है। [धारा 2(aaa)] 

  1. फैसला या निर्णय (Award) किसी श्रम न्यायालय, औद्योगिक ट्रिब्यूनल द्वारा किसी औद्योगिक विवाद के सम्बन्ध में दिया गया अन्तिम निर्णय ‘परिनिर्णय’, ‘फैसला’ या निर्णय कहलाता है। इसके अन्तर्गत ‘पंच निर्णय’ भी शामिल है।

[धारा 2(b)] 

  1. उद्योग (Industry)उद्योग से आशय ऐसी किसी व्यवस्थित क्रिया से है जो कि किसी नियोक्ता और उसके श्रमिकों के सहयोग से की जा रही है और जो मानवीय आवश्यकताओं या इच्छाओं का पूर्ति के लिए माल या सेवाओं के उत्पादन, पूर्ति या वितरण के लिए है; चाहे

(i) उस क्रिया को चलाने के लिए कोई पूँजी विनियोजित की गई है या नहीं, अथवा  (ii) ऐसी क्रिया लाभ कमाने के उद्देश्य से की जाती है या नहीं।  इन उपर्युक्त क्रियाओं के अतिरिक्त उद्योग में निम्नलिखित क्रियाएँ भी सम्मिलित हैं- (a) डॉक लेबर बोर्ड द्वारा की जाने वाली कोई भी क्रिया। (b) विक्रय या व्यवसाय अथवा दोनों की अभिवृद्धि से सम्बन्धित किसी संस्थान द्वारा की जाने पाला काई भी क्रिया। किन्तु उद्योग में निम्नलिखित क्रियाओं को सम्मिलित नहीं किया जाता है- (i) कोई भी कृषि कार्य जिसमें समन्वित रूप से किया जाने वाला कोई भी ऐसा कार्य सम्मिलित ह जो उपर्युक्त वर्णित किसी भी कार्य से मिलता-जुलता हो तथा ऐसा दूसरा कार्य प्रभावशाली हो। किन्तु कृषि में बागान उद्योग की कोई क्रिया सम्मिलित नहीं है, या (ii) अस्पताल तथा औषधालय, या  (iii) शैक्षिक, वैज्ञानिक, शोध एवं प्रशिक्षण संस्थाएँ, या  (iv) आशिक या पूर्ण रूप से दान, सामाजिक एवं पुण्य के कार्यों में लगे संगठनों के स्वामित्व एवं प्रबन्ध में चलाई जाने वाली संस्थाएँ, या (v) खादी एवं ग्रामीण उद्योग, या (vi) रक्षा, शोध, अणुशक्ति तथा अन्तरिक्ष सहित केन्द्रीय सरकार के विभागों द्वारा संचालित सभी क्रियाएँ जो सरकार की प्रभुसत्ता से सम्बन्धित हैं, या (vii) कोई भी घरेलू सेवा, या (viii) कोई क्रिया, जो कि किसी व्यक्ति या संस्था द्वारा व्यवसाय के रूप में की जाती है, यदि ऐसे व्यक्ति या संस्था द्वारा रखे गये व्यक्तियों की संख्या 10 से कम है, या (ix) कोई क्रिया जो सहकारी समिति या क्लब या व्यक्तियों की किसी अन्य संस्था द्वारा की जाती है. यदि उसके द्वारा रखे गये व्यक्तियों की संख्या 10 से कम है। [धारा 2(j)]  विभिन्न न्यायालयों द्वारा दिये गये निर्णयों के अनुसार इस अधिनियम के अन्तर्गत निम्नलिखित को उद्योग में सम्मिलित किया जा सकता है- (i) सरकार द्वारा चलाया जाने वाला अस्पताल।  (ii) एक आयुर्वेदिक कॉलेज बशर्ते वहाँ औषधियों का निर्माण होता हो।  (iii) कृषि, बागवानी एवं मछली उद्योग।  (iv) चार्टर्ड एकाएण्टेण्ट्स की फर्म जो अंकेक्षण कार्य कराने के लिए बड़ी संख्या में स्टॉफ रखती है। (v) तेल वितरण कम्पनी। (vi) उद्योग द्वारा लाभ कमाने के उद्देश्य से गठित समिति। (vii) भारतीय मानक संस्थान (ISI) किन्तु न्यायिक निर्णयों के अनुसार निम्नलिखित उद्योग नहीं हैं-क्लब, क्रिकेट क्लब, कॉलेज या विश्वविद्यालय, चिकित्सा अनुसन्धान केन्द्र, वकीलों के दफ्तर इत्यादि।

  1. नियोक्ता (Employer) केन्द्रीय सरकार या राज्य सरकार के अधीन या उसके किसी विभाग द्वारा संचालित उद्योग के सम्बन्ध में निर्धारित अधिकारी’ नियोक्ता कहलाता है।

यदि कोई अधिकारी निर्धारित नहीं किया गया है तो उस विभाग का ‘प्रधान’ नियोक्ता कहलाता है। स्थानीय अधिकारी द्वारा या उसकी ओर से संचालित उद्योग के सम्बन्ध में ‘मुख्य प्रशासकीय अधिकारी’ (Chief Executive Office) नियोक्ता कहलाता है। [धारा 2(g)] 

  1. औद्योगिक विवाद (Industrial Dispute)औद्योगिक विवाद से आशय नियोक्ताओं और नियोक्ताओं के बीच, अथवा नियोक्ताओं और श्रमिकों के बीच, अथवा श्रमिकों और श्रमिकों के बीच हुए किसी विवाद या मतभेद से है जो किसी व्यक्ति की नियुक्ति अथवा सेवामुक्ति अथवा रोजगार की शर्तों या श्रम की दशाओं से सम्बन्धित हो।

[धारा 2(k)] 

  1. काम देने में असमर्थता (lay Off)-कोयला, शक्ति, कच्चे माल का अभाव, तैयार माल का संग्रह, मशीन या प्लाण्ट की खराबी, प्राकृतिक संकट या इनसे सम्बन्धित अन्य किसी कारण से, ऐसे श्रमिकों को जिनका नाम मस्टर रोल पर है और जिनकी छंटनी नहीं की गई है नियोक्ता द्वारा काम देने से इन्कार या असमर्थता ‘काम बन्दी’ या ‘काम देने में असमर्थता’ कहा जायेगा। 

[धारा 2(kkk)]

  1. तालाबन्दी (Lock-out)-तालाबन्दी का आशय रोजगार के स्थान को बन्द करने या कार्य को रोक देने या नियोक्ता द्वारा कर्मचारियों की किसी संख्या को काम देने से इन्कार करने से है। धारा 2(L)]
  2. लोकोपयोगी सेवा (Public Utility Service) लोकोपयोगी सेवा से आशय निम्नलिखित सेवाओं से है

(i) यात्रियों तथा माल को लाने व ले जाने के लिए परिवहन सेवा। (ii) औद्योगिक संस्थान का कोई भी विभाग जिसके कार्य पर उसमें नियुक्त कर्मचारियों की सुरक्षा निर्भर हो। (iii) कोई भी डाक तार या टेलीफोन सेवा। (iv) किसी उद्योग द्वारा जनता को प्रकाश, जल तथा शक्ति प्रदान करने की सेवा। (v) सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए प्रदान की गई सेवा।

[धारा 2(n)] 

  1. छंटनी (Retrenchment) छंटनी से आशय अनुशासन सम्बन्धी दण्ड के अतिरिक्त किसा भी अन्य कारण से नियोक्ता द्वारा कर्मचारी की सेवा समाप्त करने से है।

[धारा 2(00)] 

  1. समझौता (Settlement) समझौते से आशय उस लिखित ठहराव से है जो नियोक्ता और कर्मचारियो के मध्य होता है तथा जिस पर दोनों के हस्ताक्षर होते हैं। इसकी एक-एक प्रतिलिपि निधारित अधिकारी तथा समझौता अधिकारी के पास भेज दी जाती है।

[धारा 2(p)]

  1. हडताल (Strike)-हड़ताल से आशय किसी उद्योग में काम वाले कर्मचारियों के संघ द्वारा बन्द कर देने या साधारण समझौते के अधीन काम करने से मना करने या काम को स्वीकार न करने से है।

[धारा 2(q)] 

  1. श्रमिक (Workman)– श्रमिक से आशय ऐसे प्रत्येक व्यक्ति से है जो किसी उद्योग में रोजगार की शर्तों के अधीन मजदूरी के बदले शारीरिक, लेखा सम्बन्धी या निरीक्षण सम्बन्धी कार्य करने के लिए नियुक्त किया गया हो।

इस अधिनियम के अन्तर्गत श्रमिक में ऐसा व्यक्ति भी शामिल है जो औद्योगिक विवाद की किसी कार्यवाही के सम्बन्ध में निकाल दिया गया हो, या अलग कर दिया गया हो या जिसकी छंटनी कर दी गई हो या जिसके निकालने, अलग करने या छंटनी करने से कोई विवाद उत्पन्न हुआ हो।  [धारा 2(rs)] किसी एक श्रमिक को निकाले जाने आदि का प्रभाव (Effect on dismissal etc. of an Industrial Workman)—जब कोई नियोक्ता किसी एक श्रमिक को सेवामुक्त कर देता है, छंटनी कर देता है या अन्य किसी प्रकार से उसकी सेवायें समाप्त कर देता है तो श्रमिक और नियोक्ता के मध्य उत्पन्न कोई विवाद औद्योगिक विवाद माना जायेगा। [धारा 2(A)]  औद्योगिक विवादों का निपटारा (Settlement of Industrial Disputes) सामान्यत: जब कोई औद्योगिक विवाद उत्पन्न होता है तो सर्वप्रथम उसे रोकने का प्रयास किया जाता है यदि विवाद नहीं रूकता है तो उसके निपटारे के लिए कानूनी व्यवस्था अपनायी जाती है। औद्योगिक विवादों के निपटारे के लिए निम्नलिखित कानूनी व्यवस्था विद्यमान हैं-

  1. कार्य समिति (Work Committee)

[धारा 3] 

  1. समझौता अधिकारी (Conciliation Officer)

[धारा 4] 

  1. समझौता बोर्ड (Board of Conciliation)

[धारा 5] 

  1. जाँच न्यायालय (Court of Enquiry)

[धारा 6]

  1. श्रम न्यायालय (Labour Court)

[धारा 7] 

  1. औद्योगिक अधिकरण या ट्रिब्यूनल (Industrial Tribunal)

[धारा 7A] 

  1. राष्ट्रीय अधिकरण या ट्रिब्यूनल (National Tribunal)

[धारा 7B] 

  1. परिवेदना निवारण अधिकारी (Grievance Settlement Authority)

[धारा 9C] 

9.पंच निर्णय (Arbitration) [धारा 10A]  उपर्युक्त सभी प्राधिकारी वर्ग को अग्रलिखित चार वर्गों में बाँटा जा सकता है

  1. स्वैच्छिक निपटारा व्यवस्था (Voluntary Settlement Machinery)-इसके अन्तर्गत कार्य समिति’ को सम्मिलित किया जाता है।
  2. समझौता आधारित व्यवस्था (Conciliation Machinery)—इसके अन्तर्गत परिवेदना निवारण प्राधिकारी, समझौता अधिकारी, समझौता मण्डल और जाँच न्यायालय को शामिल किया जाता है।

III. न्यायिक व्यवस्था (Judicial Machinery)—इसके अन्तर्गत श्रम न्यायालय, औद्योगिक न्यायाधिकरण तथा राष्ट्रीय न्यायाधिकरण को सम्मिलित किया जाता है।

  1. ऐच्छिक पंचनिर्णय (Voluntary Arbitration) उपर्युक्त के अतिरिक्त विवादों का निपटारा ऐच्छिक पंचनिर्णय से भी होता है।
  2. कार्य समिति (Work Committee)

औद्योगिक विवाद अधिनियम की धारा 3 के अन्तर्गत कार्य समिति के गठन की व्यवस्था की गई है। इस सन्दर्भ में अधिनियम के प्रमुख प्रावधान निम्नलिखित प्रकार हैं

  1. समुचित सरकार द्वारा गठन [धारा 3(1)]-समुचित सरकार ऐसे उद्योगों को कार्य समिति के गठन का आदेश देती है जिन उद्योगों में सौ या अधिक श्रमिक कार्य कर रहे हों या पिछले बारह महीनों की अवधि में कार्य कर चुके हों।
  2. श्रम प्रतिनिधि [धारा 3(1)] कार्य समिति में श्रम प्रतिनिधि कार्यरत श्रमिक ही होता है। बाहरी व्यक्ति श्रम प्रतिनिधि नहीं बनता।
  3. सदस्य संख्या-कार्य समिति का गठन नियोक्ताओं और श्रमिकों के प्रतिनिधियों के माध्यम से किया

श्रामक प्रतिनिधियों की संख्या नियोक्ताओं के प्रतिनिधियों की संख्या से कम नहीं होनी चाहिए। 

  1. सदस्यों की संख्या-केन्द्रीय सरकार के नियमों के अनुसार सदस्यों की संख्या 20 से अधिक नहीं होनी चाहिए।

कार्य समिति के कर्त्तव्य (Duties of Work Committee)-औद्योगिक विवाद अधिनियम की धारा 3(2) के अनुसार कार्य समिति के मुख्य कर्त्तव्य निम्नलिखित हैं

  1. नियोक्ताओं और श्रमिकों के मध्य मधुर सम्बन्ध बनाये रखना और इस दिशा में निरन्तर प्रयास करना।
  2. नियोक्ताओं और श्रमिकों के सामान्य हितों के विषय पर विचार-विमर्श करना।
  3. नियोक्ताओं और श्रमिकों के सामान्य हितों के विषय पर उत्पन्न प्रत्येक मतभेद को दूर करना। 
  4. समझौता अधिकारी (Conciliation Officer) (धारा 4)

औद्योगिक विवाद अधिनियम 1947 की धारा 4 के अन्तर्गत समझौता अधिकारी की नियक्ति एवं उसके कार्यक्षेत्र का निर्धारण करने का प्रावधान वर्णित है, ये प्रावधान निम्नलिखित हैं

  1. नियुक्ति-उपयुक्त सरकार, सरकारी गजट में अधिसूचना देकर व्यक्तियों की उचित एवं न्याय संगत संख्या को समझौता अधिकारियों के रूप में नियुक्त कर सकती है। इनका प्रमुख कर्त्तव्य नियोक्ताओं और श्रमिकों के बीच मध्यस्थता करना एवं औद्योगिक विवादों को प्रभावशाली ढंग से निपटाना है।

[धारा 4(1)]

  1. कार्यक्षेत्र एवं कार्य की अवधि-समझौता अधिकारी किसी एक विशिष्ट क्षेत्र के लिए या उस क्षेत्र के एक या अधिक विशिष्ट उद्योगों के लिए नियुक्त किया जा सकता है। वह स्थायी रूप से या सीमित अवधि के लिए नियुक्त किया जा सकता है।

[धारा 4(2)] 

समझौता अधिकारी के कर्त्तव्य (Duties of Conciliation Officer)-समझौता अधिकारी के कर्तव्य निम्नलिखित हैं

  1. विवाद निपटाने के लिए मध्यस्थता करना एवं पक्षकारों को समझौते के लिए प्रेरित करना।
  2. औद्योगिक विवाद के समझौते की कार्यवाही को निर्धारित विधि से पूरा करना। 
  3. सभी तथ्यों की समुचित जाँच करना। 
  4. समझौते की रिपोर्ट समुचित सरकार या अधिकृत अधिकारी के पास भेजना। 5. समझौता न होने पर उसकी रिपोर्ट समुचित सरकार के पास भेजना।
  5. यदि समुचित सरकार रिपोर्ट से सन्तुष्ट हो तो मामले को समझौता बोर्ड, श्रम न्यायालय, औद्योगिक अधिकरण को निर्देशित करना।
  6. समझौता अधिकारी द्वारा कार्यवाही प्रारम्भ करने के 14 दिनों में या समुचित सरकार द्वारा निश्चित किसी भी कम अवधि में रिपोर्ट प्रस्तुत करना। 
  7. समझौता बोर्ड (Conciliation Board)

औद्योगिक विवाद अधिनियम की धारा 5 के अन्तर्गत समझौता बोर्ड के गठन सम्बन्धी निम्नलिखित प्रावधान दिये गये हैं

  1. बोर्ड की स्थापना-सरकार सरकारी गजट में अधिसूचना देकर औद्योगिक विवाद के निबटारे के लिए समझौता बोर्ड की स्थापना कर सकती है। _
  2. सदस्यों की नियुक्ति-समझौता बोर्ड में एक अध्यक्ष नियुक्त होता है और दो या चार सदस्य नियुक्त होते हैं। 

1 [धारा 5(1)]  बोर्ड की शक्तियाँ (Powers of the Board)

[धारा 5(2)] 

  1. समझौता बोर्ड औद्योगिक विवाद की जाँच करने के उद्देश्य से सूचना देकर विवाद से सम्बन्धित किसी भी संस्थान में प्रवेश कर सकता है।
  2. औद्योगिक विवाद की सुनवाई करते समय समझौता बोर्ड को वे समस्त अधिकार प्राप्त होंगे जो ‘कोड ऑफ सिविल प्रोसिजर’ 1908 के अन्तर्गत दीवानी न्यायालय को प्राप्त होते हैं।
  3. बोर्ड का प्रत्येक सदस्य एक लोक सेवक माना जाता है, अत: उसे लोक सेवक की सभी शक्तियाँ प्राप्त हैं।

समझौता बोर्ड को अपनी रिपोर्ट 2 माह के अन्दर प्रस्तुत करना अनिवार्य है।

  1. जाँच न्यायालय (Court of Inquiry)

जाँच न्यायालय के गठन और कार्यवाही के सम्बन्ध में प्रमुख प्रावधान औद्योगिक अधिनियम का धारा 6 में दिये गये हैं 1. गठन-समुचित सरकार सरकारी गजट में अधिसूचना देकर जाँच न्यायालय का गठन कर सकती है।

  1. उद्देश्य-सरकार किसी भी औद्योगिक विवाद के निपटारे के लिए जाँच न्यायालय का गठन कर सकती है।
  1. सदस्य-जाँच न्यायालय में एक या एक से अधिक सदस्य हो सकते हैं, ये सदस्य निष्पक्ष होंगे।
  2. अध्यक्ष-यदि जाँच न्यायालय में एक ही व्यक्ति सदस्य है तो वही उसका अध्यक्ष होगा लेकिन यदि दो या दो से अधिक सदस्य हैं तो उनमें से किसी एक व्यक्ति को सरकार अध्यक्ष नियुक्त करेगी।

जाँच न्यायालय के कर्त्तव्य (Duties of Court of Enquiry)-जब कोई विवाद जाँच न्यायालय को निर्देशित किया जाता है तो न्यायालय के निम्नलिखित कर्त्तव्य हो जाते हैं

  1. निर्देशित विवाद की पूर्ण जाँच करना। 
  2. जाँच करने के बाद 6 महीने के अन्दर समुचित सरकार को रिपोर्ट भेजना।
  3. जाँच करने में न्याय और निष्पक्षता के नियमों का पालन करना। 
  4. श्रम न्यायालय (Labour Court)

औद्योगिक विवाद अधिनियम की धारा 7 के अन्तर्गत श्रम न्यायालय से सम्बन्धित प्रावधान दिये गये हैं जो निम्नलिखित प्रकार हैं-

  1. समुचित सरकार सरकारी गजट में अधिसूचना देकर विवाद पर निर्णय देने के लिए एक या एक से अधिक श्रम न्यायालयों की स्थापना कर सकती है।

[धारा 7(1)] 

  1. एक श्रम न्यायालय में केवल एक ही व्यक्ति होता है जो सरकार द्वारा नियुक्त किया जायेगा।

[धारा 7(2)] 

  1. श्रम न्यायालय के पद पर नियुक्त होने के लिए एक व्यक्ति में निम्नलिखित योग्यतायें होनी चाहियें

[धारा 7(3)]  (A) वह व्यक्ति किसी अन्य न्यायालय का न्यायाधीश हो या रहा हो।  (B) वह कम से कम दो वर्ष के लिए ट्रिब्यूनल के अध्यक्ष या सदस्य के पद पर रहा हो। (C) वह कम से कम तीन वर्ष के लिए जिला न्यायाधीश या अतिरिक्त जिला न्यायाधीश के पद पर रहा हो। (D) वह कम से कम 7 वर्ष के लिए भारत में न्यायिक पद पर रहा हो।  (E) वह कम से कम 5 वर्ष के लिए श्रम न्यायालय के अधिकारी के पद पर रहा हो। श्रम न्यायालय के सभापति की अयोग्यतायें (Disqualification for the Presiding Officer of Labour Court) औद्योगिक विवाद अधिनियम की धारा 7(C) के अन्तर्गत श्रम न्यायालयों के सभापति की अयोग्यतायें निम्नलिखित प्रकार हैं- (a) वह एक स्वतन्त्र व्यक्ति नहीं है। (b) उसने अपने जीवन के 65 वर्ष पूरे कर लिये हैं। 

  1. औद्योगिक अधिकरण (Industrial Tribunal)

उपयुक्त सरकार सरकारी गजट में अधिसूचना देकर औद्योगिक विवादों पर निर्णय देने के लिए एक या अधिक औद्योगिक अधिकरणों या ट्रिब्यूनलों की स्थापना कर सकती है। 

  1. सदस्यों की नियुक्ति-ऐसे अधिकरण में एक ही व्यक्ति होता है जो सरकार द्वारा नियुक्त किया जायेगा। 

[धारा 7(1)] 

  1. योग्यतायें-अधिकरण के पद पर नियुक्त होने के लिए व्यक्ति में निम्नलिखित योग्यतायें होनी चाहियें

[धारा 7A(2)] (A) वह उच्च न्यायालय का न्यायाधीश हो अथवा रहा हो। [धारा 7A(3)]  (B) वह कम से कम 3 वर्ष की अवधि तक जिला न्यायाधीश या अपर जिला न्यायाधीश रहा हो।

  1. पद रिक्त होने पर नियुक्ति-यदि पीठासीन अधिकारी का पद स्थायी रूप से खाली हो जाता है तो समुचित सरकार उस पद की पूर्ति करेगी। 

[धारा 8] क्षेत्र (Scope) औद्योगिक अधिकरण के क्षेत्र में वे सभी मामले आते हैं जो अनुसूची 2 में वर्णित ह और श्रम न्यायालय को निर्देशित किये जाते हैं। इनके अतिरिक्त अनसची 3 में निहित सभी मामले भी इस अधिकरण के क्षेत्र में आते हैं। 

  1. राष्ट्रीय अधिकरण (National Tribunal)

औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 की धारा 7(B) के अधीन राष्ट्रीय अधिकरण के सम्बन्ध में प्रावधान दिये गये हैं जो निम्नलिखित हैं-

  1. स्थापना-केन्द्रीय सरकार गजट में सूचना देकर राष्ट्रीय महत्व के प्रश्नों के सम्बन्ध में उत्पन्न औद्योगिक विवादों पर निर्णय देने के लिए एक या अधिक राष्ट्रीय अधिकरणों की स्थापना कर सकती है।

[धारा 7B(2)] 

  1. सदस्यों की नियुक्ति-ऐसे अधिकरण में केवल एक ही व्यक्ति केन्द्रीय सरकार द्वारा नियक्त किया जायेगा।

[धारा 7B(2)] 

  1. योग्यतायें-कोई भी व्यक्ति राष्ट्रीय अधिकरण के अधिकारी के रूप में तभी नियक्त होग जबकि वह किसी उच्च न्यायालय का न्यायाधीश हो या रह चुका हो। 
  2. मूल्यांकक-केन्द्रीय सरकार यदि उचित समझे तो राष्ट्रीय अधिकरण को सलाह देने के लिए दो व्यक्तियों को मूल्यांकक के रूप में नियुक्त करेगी। __

[धारा 7B(4)] 

  1. पद रिक्त होने पर नियुक्ति-यदि पीठासीन अधिकारी का पद स्थायी रूप से रिक्त हो जाता है तो केन्द्रीय सरकार उक्त पद की पूर्ति करेगी।
  2. उद्देश्य एवं कार्य-राष्ट्रीय अधिकरण उन मामलों पर अपना निर्णय देता है जिन्हें केन्द्रीय सरकार राष्ट्रीय महत्व का समझती है तथा वे मामले ऐसे हों जिनमें औद्योगिक उपक्रमों का हित हो अथवा उनका हित प्रभावित हो। 

8.शिकायत निपटान अधिकारी (Grievance Settlement Authority) श्रमिकों के कुछ व्यक्तिगत मामलों को निपटाने के लिए सन् 1982 के संशोधनों में शिकायत निपटान अधिकारी की नियुक्ति की व्यवस्था की गई है। [धारा 9c] ऐसे औद्योगिक संस्थानों में जहाँ 50 या अधिक श्रमिक नियुक्त हों अथवा पिछले 12 महीनों में कभी भी नियुक्त हुये हों, वहाँ इस अधिनियम के प्रावधानों के अन्तर्गत व्यक्तिगत औद्योगिक विवादों को निपटाने के लिए नियोक्ता द्वारा शिकायत निपटान अधिकारी की नियुक्ति की जायेगी। इस समिति में सदस्यों की कुल संख्या अधिक से अधिक 6 होगी। इसमें नियोक्ता और श्रमिकों के बराबर संख्या में प्रतिनिधि होंगे। (v) निर्णय की अवधि-औद्योगिक विवाद प्रस्तुत करने की तिथि से 3 महीने के अन्दर शिकायत निपटान अधिकारी अपना निर्णय देगा। [धारा 10(2A)] 

9.पंच निर्णय (Arbitration) औद्योगिक विवाद अधिनियम की धारा 10-A के अन्तर्गत किसी भी औद्योगिक विवाद को पक्षकारों के सहमत होने पर पंच निर्णय के लिए निर्देशित किया जा सकता है। विवाद को निपटाने की यह सबसे शीघ्रतम तथा कम खर्चीली व्यवस्था है। इसके सम्बन्ध मे निम्नलिखित नियम हैं (i) पंच निर्णय के सम्बन्ध में विवाद के पक्षकारों के मध्य एक लिखित ठहराव होना चाहिए।  (ii) यह ठहराव न्यायालयों को मामला सन्दर्भित किये जाने से पहले किया जाना चाहिए। (iii) विवाद निपटवाने के लिए पक्षकारों को बराबर संख्या में पंच नियुक्त करने का अधिकार है। वे चाहें तो एक ही पंच नियुक्त कर सकते हैं। हड़ताल (Strikes) शब्दकोष के अनुसार, “हड़ताल का आशय श्रमिकों द्वारा कार्य को चालू रखने से इन्कार करना भारतीय औद्यागिक विवाद अधिनियम की धारा 2(q) के अनुसार किसी उद्योग में नियुक्त व्यक्तिया के समूह द्वारा सामूहिक रूप से कार्य बन्द कर देना या सम्मिलित रूप से कार्य करने से इन्कार कर दना अथवा उसी उद्योग में कार्य करते रहने या नियोजन स्वीकार करते रहने के लिए नियुक्त व्यक्तियों का किसी संख्या द्वारा सामूहिक रूप से अथवा एक सामान्य समझदारी के अधीन कार्य करने से इन्कार देना हड़ताल है। 

हड़ताल की विशेषतायें (Characteristics of Strike)

  1. श्रमिकों द्वारा केवल एकत्रित होना हड़ताल नहीं है, कार्य न करना हड़ताल है। 
  2. जब तक हड़ताल अवैध घोषित नहीं होती, श्रमिक और नियोक्ता का सम्बन्ध बना रहता है। 
  3. हड़ताल वैध व अवैध हो सकती है।

4 हड़ताल में श्रमिक अस्थाई रूप से काम करने से इन्कार कर देते हैं। 

  1. हड़ताल के लिए उद्देश्य महत्वपूर्ण नहीं है। 
  2. हड़ताल करना श्रमिकों का अधिकार नहीं है। 
  3. धीरे-धीरे कार्य करना हड़ताल नहीं मानी जायेगी। 
  4. हड़ताल समझौते के अन्तर्गत होनी चाहिए, मनमाने ढंग से नहीं। 
  5. हड़ताल उसी औद्योगिक संस्थान में होनी चाहिए जहाँ श्रमिक कार्य करते हैं। 
  6. हड़ताल सामूहिक एवं संयुक्त रूप से कार्य बन्द कर देना है। 
  7. सामूहिक रूप से त्याग पत्र देना हड़ताल है। 
  8. सामूहिक रूप से अवकाश लेना हड़ताल नहीं है।

तालाबन्दी (Lockout)  जब किसी औद्योगिक संस्थान का नियोक्ता अपने संस्थान में श्रमिकों को काम देने से इन्कार कर देता है जबकि श्रमिक कार्य करना चाहता है तो ऐसी स्थिति को तालाबन्दी कहते हैं। नियोक्ता तालाबन्दी श्रमिकों से परेशान होकर या उनके विरोध और क्रोध से डरकर करता है।

परिभाषा-औद्योगिक विवाद अधिनियम की धारा 2010 के अनुसार नियोक्ता द्वारा कर्मचारियों को काम पर जारी नहीं रखने के लिए निम्न कार्यों में से कोई भी कार्य करना तालाबन्दी में सम्मिलित है-

  1. रोजगार के स्थान को कुछ समय के लिए बन्द करना। 

2.कार्य स्थगित करना। 

  1. कार्य देने से मना कर देना। 

तालाबन्दी की विशेषतायें-तालाबन्दी की मुख्य विशेषतायें निम्नलिखित हैं-

  1. कुछ समय के लिए औद्योगिक संस्थान को बन्द कर देना तालाबन्दी मानी जायेगी। 
  2. उद्योग को सुरक्षा कारणों से बन्द कर देना तालाबन्दी नहीं है। 
  3. तालाबन्दी उचित, अनुचित, वैधानिक या अवैधानिक हो सकती है। 
  4. व्यावसायिक कारणों से कुछ समय के लिए उपक्रम को बन्द कर देना तालाबन्दी नहीं है। 
  5. श्रमिकों की छंटनी करना तालाबन्दी नहीं है। 
  6. उद्योग का स्थानान्तरण करते समय कार्य देने से मना करना तालाबन्दी नहीं है। 
  7. कार्य को बन्द करना तालाबन्दी नहीं है। 

हड़ताल एवं तालाबन्दी के सम्बन्ध में निषेधात्मक प्रावधान (Prohibition on Strikes and Lockouts)  औद्योगिक विवाद अधिनियम की धारा 22 के अधीन हड़ताल तथा तालाबन्दी के सम्बन्ध में निषेधात्मक प्रावधान निम्न प्रकार हैं-

  1. लोक कल्याण सेवाओं में हड़ताल-लोक कल्याण सम्बन्धी सेवाओं के उपक्रम में नियुक्त कोई भी व्यक्ति हड़ताल नहीं करेगा जब तक कि उसने हड़ताल करने के पूर्व के 6 सप्ताह के अन्दर हड़ताल की सूचना अपने नियोक्ताओं को न दे दी हो।

[धारा 22(1)]  हड़ताल अवैध मानी जायेगी यदि ऐसी सूचना को दिये हुये 14 दिन पूरे न हुये हो अथवा हड़ताल प्रारम्भ होने की सूचना में वर्णित तिथि समाप्त न हो गयी हो अथवा किसी समझौता अधिकारी के समक्ष चल रही कार्यवाही को सात दिन पूरे न हो गये हों।

  1. लोक कल्याण सेवाओं में तालाबन्दी-लोक कल्याण सम्बन्धी सेवाओं के उपक्रम के नियोक्ता तब तक तालाबन्दी नहीं कर सकेंगे जब तक कि तालाबन्दी करने से पूर्व के 6 सप्ताहों में तालाबन्दी करने की लिखित सूचना न दे दी गयी हो अथवा ऐसी सूचना दिये हुये 14 दिन पूरे न हुये हों अथवा सूचना में तालाबन्दी प्रारम्भ होने की वर्णित तिथि समाप्त न हो गयी हो अथवा किसी समझौता अधिकारी के समक्ष 

नोट-यदि उपरोक्त प्रावधानों को नहीं माना जायेगा तो हड़ताल या तालाबन्दी अवैध होगी।

[धारा 22(2)] 

  1. समुचित सरकार को सूचना देना-यदि किसी नियोक्ता को हड़ताल की सूचना प्राप्त होती है अथवा कोई नियोक्ता तालाबन्दी की सूचना देता है तो ऐसी सूचना प्राप्त करने या सूचना देने के 5 दिनों क भातर समुचित सरकार को या उसके द्वारा निर्धारित अधिकारी को सूचना के सम्बन्ध में रिपोर्ट भेजनी होगी।

[धारा 22(6)]

हड़ताल या तालाबन्दी के सम्बन्ध में सामान्य निषेध (General prohibition on strikes and Lockouts) निम्नलिखित दशाओं में किसी भी औद्योगिक संस्थान का कोई भी श्रमिक अनुबन्ध भंग करने वाली हड़ताल नहीं कर सकता और न ही कोई नियोक्ता तालाबन्दी कर सकता है। (i) यदि समझौता बोर्ड के समक्ष चल रही कार्यवाही को समाप्त हुये 7 दिन पूरे न हुये हो। (ii) यदि किसी श्रम न्यायालय, अधिकरण या राष्ट्रीय अधिकरण के समक्ष चल रहीं कार्यवाही को समाप्त हुये दो माह पूरे न हुये हों। अथवा (iii) पंच निर्णय की कार्यवाही को समाप्त हुये 2 माह नहीं हुये हो।  (iv) यदि कोई समझौता या निर्णय प्रभावशील हो।

[धारा 23] 

अवैध हड़ताल या तालाबन्दी पर दण्ड का प्रावधान (Penalty for illegal strikes and Lockouts)-अवैध हड़ताल या तालाबन्दी की दशा में दण्ड सम्बन्धी प्रावधान निम्नलिखित हैं

  1. अवैध हड़ताल के सम्बन्ध में

(i) एक महीने तक के कारवास की सजा, अथवा (ii) पचास रू. तक का जुर्माना, अथवा (iii) सजा और जुर्माना दोनों। 

  1. अवैध तालाबन्दी के सम्बन्ध में

(i) एक महीने तक के कारावास की सजा, अथवा  (ii) एक हजार रू. तक का जुर्माना, अथवा  (iii) सजा एवं जुर्माना दोनों।

[धारा 26(2)] 

  1. अवैध हड़ताल एवं तालाबन्दी को उकसाने के सम्बन्ध में-

(1) 6 महीने तक के कारावास की सजा, अथवा  (ii) 1 हजार रू. तक का जुर्माना अथवा (iii) सजा एवं जुर्माना दोनों।

[धारा 27] 

  1. अवैध हड़ताल एवं तालाबन्दी को वित्तीय सहायता देने के सम्बन्ध में 

(i) 6 महीने तक के कारावास की सजा अथवा  (ii) 1 हजार  तक का जुर्माना अथवा  (iii) सजा एवं जुर्माना दोनों। [धारा 28]  कार्य देने में असमर्थता/कामबन्दी (Lav-offer  औद्योगिक विवाद अधिनियम की धारा 2 kkk के अनुसार, “कार्य देने में असमर्थता से आशय नियोक्ता द्वारा किसी ऐसे श्रमिक को जिसका नाम उसके औद्योगिक उपक्रम के उपस्थिति रजिस्टर में लिखा है एवं जिसकी छंटनी न की गयी हो कोयला, शक्ति अथवा कच्चे माल की कमी अथवा स्टॉक का संग्रह अथवा मशीन का बन्द हो जाना या अन्य किसी कारण से कार्य देने में असमर्थता, इन्कार करने अथवा अयोग्यता से है।” निष्कर्ष-उपरोक्त विवरण से यह स्पष्ट है कि कामबन्दी या कार्य देने में असमर्थता अस्थायी होती है स्थायी प्रकृति की नहीं। काम देने में असमर्थता या कामबन्दी की विशेषताएँ (Characteristics of Lay-off)–कार्य देने में असमर्थता या कार्यबन्दी के प्रमुख लक्षण निम्नलिखित हैं

  1. श्रमिक या कर्मचारी का नाम औद्योगिक उपक्रम के उपस्थिति रजिस्टर में लिखा होना चाहिये। 
  2. कार्य देने में असमर्थता अस्थायी रूप से हो। 
  3. कार्य देने में असमर्थता के कारण अपरिहार्य होते हैं। 

4.कार्य देने में असमर्थता, छंटनी से अलग होती है।

  1. कार्य देने में असमर्थता के लिए यह आवश्यक है कि श्रमिक संस्थान में नियमित रूप से कार्य करता हो।
  2. श्रमिक की छंटनी नहीं की गयी हो। 

7.नियोक्ता आकस्मिक एवं विशेष कारणों से श्रमिक को कार्य देने में असमर्थ हो। कार्य देने में असमर्थता या कामबन्दी के कारण (Causes of Lay-off) औद्योगिक संस्थान का नियोक्ता निम्नलिखित दशाओं में श्रमिक या श्रमिकों को कार्य देने से इन्कार कर सकता है

  1. शक्ति, कच्चे माल, कोयले तथा पानी की कमी के कारण। 
  2. मशीनों की टूट-फूट
  1. उत्पादित माल का अधिक संग्रह हो जाने के कारण। 
  2. आयातों में वृद्धि के कारण। 
  3. उत्पादन की नयी तकनीक लागू होने के कारण। 
  4. औद्योगिक संघर्ष की दशा में उत्पादन कार्यों पर विपरीत प्रभाव पड़ने के कारण। 
  5. अन्य कोई प्राकृतिक कारण।

निरन्तर सेवा (Continuous Services) 

  1. औद्योगिक विवाद अधिनियम की धारा 25B के अन्तर्गत एक श्रमिक किसी अवधि के लिये निरन्तर सेवा में उस समय माना जायेगा जब वह उस अवधि में बिना किसी रूकावट के सेवा कर रहा हो। रूकावट निम्नलिखित कारणों से हो सकती है।

(i) बीमारी के कारण।  (ii) अधिकृत छुट्टी के कारण।  (iii) किसी दुर्घटना के कारण।  (iv) किसी वैध हड़ताल के कारण।  (v) किसी तालाबन्दी या कार्यबन्द होने के कारण।

  1. यदि कोई श्रमिक 6 माह या एक वर्ष की अवधि के लिए निरन्तर सेवा में नहीं रहा हो तो उसके लिये निरन्तर सेवा का निर्धारण निम्न प्रकार होगा

(अ) यदि उस श्रमिक ने पिछले 12 कैलेण्डर माह की अवधि में किसी नियोक्ता के अधीन खान में भूमि के नीचे 190 दिन वास्तव में काम किया हो तथा (ब) किसी अन्य दशा में 240 दिन वास्तव में काम किया हो, तो वह एक वर्ष की निरन्तर सेवा में माना जायेगा। (स) यदि श्रमिक ने पिछले 6 कैलेण्डर माह में नियोक्ता के अधीन, खान में भूमि के नीचे 95 दिन वास्तव में काम किया हो तथा अन्य दशा में 120 दिन वास्तव में काम किया हो तो वह 6 माह निरन्तर सेवा में माना जायेगा। कामबन्दी की दशा में श्रमिकों को क्षतिपूर्ति का अधिकार (Right of Workman for lay-off Compensation)-औद्योगिक विवाद अधिनियम की धारा 25-C के अन्तर्गत यदि किसी श्रमिक को जिसका नाम औद्योगिक संस्थान के मस्टर रोल पर लिखा हो तथा जिसने नियोक्ता के अधीन कम से कम एक वर्ष की निरन्तर सेवा पूरी कर ली हो, काम देने से मना किया जाता है या काम देने में असमर्थता दिखायी जाती है तो नियोक्ता को निम्नलिखित आधारों पर क्षतिपूर्ति करनी होगी (i) क्षतिपूर्ति उन सभी दिनों के लिए की जायेगी जितने दिन श्रमिक को काम नहीं दिया जाता है।  (ii) क्षतिपूर्ति गणना में साप्ताहिक अवकाशों को ध्यान में नहीं रखा जायेगा।  (iii) क्षतिपूर्ति मूल वेतन तथा महँगाई भत्ते की कुल राशि के 50 प्रतिशत के बराबर होगी।  (iv) क्षतिपूर्ति की राशि 12 महीने की अवधि में अधिक से अधिक 45 दिनों के लिए दी जायेगी।  श्रमिकों को कामबन्दी के लिए क्षतिपूर्ति नहीं पाने का अधिकार (No Right for lay-off Compensation)  औद्योगिक विवाद अधिनियम की धारा 25E के अनुसार एक श्रमिक को निम्नलिखित दशा में कामबन्दी के लिये क्षतिपूर्ति पाने का अधिकार नहीं है- 1.यदि श्रमिक उसी औद्योगिक संस्थान में या उसी नियोक्ता के किसी अन्य संस्थान में जो वर्तमान सस्थान से 5 मील के अर्धव्यास की दूरी पर स्थित है नियोक्ता द्वारा दिया जाने वाला कोई वैकल्पिक राजगार स्वीकार करने से मना करता है तो इस दशा में श्रमिक को कामबन्दी के लिए क्षतिपूर्ति प्राप्त करने का अधिकार नहीं होगा बशर्ते कि (i) वैकल्पिक रोजगार के लिए कोई विशेष योग्यता, कुशलता या अनुभव की आवश्यकता नहीं हो तथा  (ii) वैकल्पिक रोजगार के लिए उसे वही मजदूरी दी जाती है जो उसे पूर्व रोजगार में प्राप्त हो रही

  1. उपस्थित न होने पर यदि श्रमिक दिन में कम से कम 1 बार कार्य के सामान्य घंटों में संस्थान म काम करने के लिए उपस्थित नहीं रहता तो उसे क्षतिपूर्ति प्राप्त करने का अधिकार नहीं है।

3. कार्य देने से मना-यदि औद्योगिक संस्थान के किसी दूसरे भाग के श्रमिकों द्वारा हड़ताल करने के कारण नियोक्ता अन्य श्रमिकों को कार्य देने से मना कर देता है तो इस दशा में श्रमिको को क्षतिपूर्ति प्राप्त करने का अधिकार नहीं होगा। छंटनी (Retrenchment)  सामान्य शब्दों में, छंटनी का आशय नियोक्ता द्वारा कर्मचारी एवं श्रमिकों की अधिकता की दशा सेवा या नौकरी से कार्य मुक्त करना है। औद्योगिक विवाद अधिनियम की धारा 2(00) के अनुसार “छंटनी से आशय अनुशासन सम्बन्धी दण्ड के अतिरिक्त अन्य किसी कारण से नियोक्ता द्वारा किसी श्रमिक की सेवा समाप्त करने से है लेकिन निम्नलिखित कारणों से सेवा समाप्ति को छंटनी नहीं माना जायेगा।” (i) किसी श्रमिक द्वारा स्वेच्छा से अवकाश ग्रहण करना।  (ii) आयु सीमा के समाप्त होने पर अवकाश ग्रहण करना।  (iii) निरन्तर बीमारी के कारण श्रमिक की सेवा समाप्त करना।

निष्कर्ष-अत: निष्कर्ष के रूप में कहा जा सकता है कि कार्य की तुलना में श्रमिकों की अधिकता के कारण उन्हें कार्य देने से मना करते हुये, नियमानुसार उपक्रम से निकाल देना, ‘छंटनी’ कहा जाता है। छंटनी से पूर्व की शर्ते (Pre-conditions of Retrenchment) औद्योगिक विवाद अधिनियम की धारा-25(F) के अनुसार छंटनी वैध तभी कही जायेगी जबकि निम्नलिखित शर्ते पूरी होती हों

  1. एक वर्ष की निरन्तर सेवा-छंटनी उसी श्रमिक की जा सकती है जिसने नियोक्ता के पास कम से कम 1 वर्ष तक निरन्तर सेवा की हो।
  2. एक महीने का नोटिस-छंटनी तभी वैध मानी जायेगी जबकि नियोक्ता ने उस श्रमिक को 1 महीने का लिखित नोटिस दे दिया हो। नोटिस में छंटनी के कारणों का भी वर्णन होना अनिवार्य है।
  3. अवधि व्यतीत होने पर-वैध छंटनी तभी की जा सकती है जबकि छंटनी के नोटिस की अवधि समाप्त हो गयी हो और श्रमिक ने उस पर कोई ध्यान नही दिया हो।
  4. नोटिस न देने पर मजदूरी का भुगतान-यदि सेवायोजक ने छंटनी का नोटिस नहीं दिया है तो श्रमिक को उस अवधि के लिए जो नोटिस के लिए निश्चित है, मजदूरी का भुगतान किया जायेगा।
  5. क्षतिपूर्ति-वैध छंटनी तभी मानी जायेगी जबकि छंटनी की क्षतिपूर्ति का भुगतान कर दिया गया हो।
  6. सरकार या अधिकारी के पास नोटिस भेजना-सेवायोजक द्वारा छंटनी का नोटिस समुचित सरकार अथवा उसके द्वारा निर्धारित प्राधिकारी के पास भेजा जाना चाहिए अन्यथा छंटनी अवैध होगी।

छंटनी के कारण (Causes of Retrenchment)-छंटनी निम्नलिखित कारणों से की जा सकती है।

  1. कार्य की तुलना में श्रमिकों की अधिक संख्या। 
  2. उद्योग में कामबन्दी के कारण छंटनी करना आवश्यक होना। 
  3. उत्पादन लागत में अचानक वृद्धि हो जाना। 
  4. मशीनीकरण के कारण श्रमिकों की आवश्यकता कम होना। 
  5. औद्योगिक उपकरणों की किसी इकाई का बन्द हो जाना। 
  6. औद्योगिक उपकरणों के उत्पादन कार्यों का सीमित हो जाना। 
  7. विवेकीकरण और वैज्ञानिक शोध के आधार पर श्रमिकों की कम आवश्यकता होना। 
  8. कच्चे माल की पूर्ति में कमी होना। 

9.ऊर्जा शक्ति का अभाव होना।

10. कड़ी प्रतिस्पर्धा के कारण उपक्रम को निरन्तर हानि होना।

उपक्रम को बन्द करने पर सूचना (Notice of Close down of Undertakings)  औद्योगिक विवाद अधिनियम की धारा 25 (FFA) के अनुसार किसी उपक्रम को बन्द करने का सूचना देने के सम्बन्ध में मुख्य प्रावधान निम्नलिखित हैं

  1. सूचना की अवधि-यदि कोई नियोक्ता अपने किसी उपक्रम को बन्द करना चाहता है तो 30 ऐसे बन्द की तिथि से कम से कम 60 दिन पूर्व सरकार को इस आशय की सचना निर्धारित रीति स होगी। इस सूचना में उपक्रम को बन्द करने के कारणों का भी उल्लेख किया जायेगा।
  2. सूचना देने से मुक्ति-निम्नलिखित दशाओं में उपक्रम के बन्द करने की सूचना देना आवर नहीं है

(i) यदि औद्योगिक उपक्रम में श्रमिकों की संख्या 50 से कम है। (ii) पिछले 12 महीनों की अवधि में प्रतिदिन श्रमिकों की औसत संख्या 50 से कम रही है। (iii) यदि उपक्रम पुल, सड़कें, नहरें, भवन, बाँध का निर्माण करने या अन्य ऐसे ही कार्यों के लिए स्थापित किया गया हो।

  1. सरकार द्वारा छूट देना-औद्योगिक उपक्रम में दुर्घटना होने अथवा नियोक्ता की मृत्यु होने अथवा ऐसी ही अन्य परिस्थितियों के अन्तर्गत यदि सरकार सन्तुष्ट है तो वह उपक्रम को बन्द करने की सूचना देने के दायित्व से मुक्त कर सकती है। 

अनुचित श्रम व्यवहार (Unfair Labour Practices) अनुचित श्रम व्यवहार का अध्याय औद्योगिक विवाद (संशोधन) अधिनियम, 1982 में सम्मिलित किया गया है। इसी में पाँचवीं अनुसूची भी जोड़ी गयी है जिसमें अनुचित श्रम व्यवहार का विस्तृत विवरण है। सामान्य रूप से यह पाया जाता है कि नियोक्ताओं तथा श्रमिकों के मध्य अनेक विषयों पर मतभेद उत्पन्न हो जाता है। दोनों एक-दूसरे की भावनाओं को नहीं समझ पाते और परस्पर विरोधी भावना बनायें रखते हैं। इस विरोधी भावना के कारण दोनों ही पक्ष एक-दूसरे के लिए गैर-कानूनी कार्य करने से भी नहीं चूकते। नियोक्ताओं और श्रमिकों और उनके संगठनों द्वारा किये जाने वाले ऐसे गैर-कानूनी और अवांछनीय आचरणों या व्यवहारों को अनुचित श्रम व्यवहार की श्रेणी में रखा जाता है। _ 

अनुचित श्रम व्यवहार पर निषेध (Prohibition on Unfair Labour Practices)-औद्योगिक विवाद अधिनियम की धारा 25(T) के अधीन कोई भी नियोक्ता या श्रमिक या रजिस्टर्ड अथवा अनरजिस्टर्ड श्रम संघ कोई भी अनुचित श्रम व्यवहार नहीं करेगा। अनुचित श्रम व्यवहार के लिए दण्ड (Penalty for Unfair Labour Practices)–यदि कोई सेवा योजक अथवा श्रमिक किसी भी प्रकार का अनुचित श्रम व्यवहार करते हैं तो उन्हें 6 माह के कारावास की सजा अथवा 1 हजार रू. तक का जुर्माना अथवा दोनों ही प्रकार के दण्ड से दण्डित किया जा सकता है। निपटारे अथवा परिनिर्णय को भंग करने पर दण्ड (Penalty for breach of settlement or Award) यदि कोई व्यक्ति औद्योगिक विवाद अधिनियम के अधीन दिये गये किसी निपटारे या परिनिर्णय को भंग करता है और उसे मानने से इन्कार करता है तो वह छः माह तक के कारावास अथवा जुर्माना अथवा दोनों प्रकार से दण्डित किया जा सकता है। न्यायालय अपराधी से आर्थिक दण्ड के रूप में जो भी धन वसूल करता है वह उस धन राशि को क्षतिपूर्ति के रूप में पीड़ित पक्षकार को दिला सकता है। यदि निपटारे या परिनिर्णय की शर्त को बार-बार भंग किया जाता है तो दोषी पक्षकार जितने दिन भंग करने का अपराध करता है उतने दिनों के लिए उसे 200 रू. प्रतिदिन के हिसाब से दण्डित किया जा सकता है।

[धारा 29] 

गोपनीय सूचना को प्रकट करने पर दण्ड (Penalty for Disclosing Confidential Information) यदि कोई व्यक्ति औद्योगिक विवाद अधिनियम की धारा 21 के अधीन गोपनीय रखी जाने वाली किसी सूचना को जानबूझकर प्रकट करता है तो इस दशा में श्रम संघ या व्यक्तिगत व्यवसाय द्वारा शिकायत होने पर वह 6 माह तक का कारावास या 1,000 रू. के आर्थिक दण्ड या दोनों प्रकार से दण्डित किया जा सकता है।

[धारा 30] 


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