B.Com Provisions Of Information Technology Act 2000 & Digital Signature Notes

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डिजिटल हस्ताक्षर

(Digital Signature) 

डिजिटल हस्ताक्षर एक गणितीय तकनीक है जिसका उपयोग किसी संदेश, सॉफ्टवेयर या डिजिटल दस्तावेज की प्रमाणिकता और अंखडता को मान्य करने के लिए किया जाता है। एक हस्तलिखित हस्ताक्षर के डिजिटल समकक्ष के रूप में, एक डिजिटल हस्ताक्षर कहीं अधिक अंतर्निहित सुरक्षा प्रदा करता है, और इसका उद्देश्य डिजिटल संचार में छेड़छाड़ और प्रतिरूपण की समस्या को हल करना है। डिजिटल हस्ताक्षर एक इलैक्ट्रॉनिक दस्तावेज, लेनदेन या संदेश की उत्पत्ति, पहचान और स्थिति के साक्ष्य के लिये आश्वासन प्रदान कर सकते हैं और हस्ताक्षरकर्ता द्वारा सूचित सहमति को स्वीकार कर सकत संयक्त राज्य अमेरिका सहित कई देशों में डिजिटल हस्ताक्षर समान रूप से बाध्यकारी माने जाते है।

डिजिटल हस्ताक्षर कैसे काम करते हैं (How Digital Signatures Work)

इस सम्बन्ध में निम्नलिखित शब्दावली को समझना आवश्यक है असममित या विषम गूढ़ प्रणाली (Asymetric Crypto System) असममित या विषम गूढ़ तात्पर्य सुरक्षित कुंजी युग्म की उस प्रणाली से है जिसमें अंकीय हस्ताक्षर/संकेतक सृजित करने एक निजी कुंजी और अंकीय हस्ताक्षर/संकेतक को सत्यापित करने के लिए एक लोक/ सार्वजनिक कुंजी सम्मिलित है। कुंजी युग्म (Key pair)-कुंजी युग्म या कुंजियों के जोड़े से तात्पर्य निजी कुंजी और कीय रूप से सम्बन्धित उसकी लोक कुंजी से है। ये दोनों कुंजियाँ इस प्रकार सम्बन्धित होती हैं कंजी उस अंकीय हस्ताक्षर/संकेतक को सत्यापित कर सकती है जिसे निजी कुंजी द्वारा सृजित किया गया है। निजी कंजी (Private Key)—निजी कुंजी से तात्पर्य कुंजी युग्म की उस कुंजी से है जो अंकीय हस्ताक्षर/संकेतक सृजित करने के लिए उपयोग की जाती है।  सार्वजनिक कुंजी (Public Key)—सार्वजनिक कुंजी से तात्पर्य कुंजी युग्म की उस कुंजी से है कीय हस्ताक्षर/संकेतक को सत्यापित करने हेतु उपयोग की जाती है और अंकीय हस्ताक्षर प्रमाण  पत्र मे सूचीबद्ध है। डिजिटल हस्ताक्षर सार्वजनिक कुंजी (Public Key) क्रिप्टोग्राफी पर आधारित होते हैं, जिन्हें असममित (Asymmetric) क्रिप्टोग्राफी भी कहा जाता है। डिजिटल हस्ताक्षर विश्वसनीय रूप से काम करते हैं क्योंकि सार्वजनिक कुंजी क्रिप्टोग्राफी दो पारस्परिक रूप से प्रमाणीकृत क्रिप्टोग्राफिक कुंजियों पर निर्भर करती है। जो व्यक्ति डिजिटल हस्ताक्षर कर रहा है, वह हस्ताक्षर-सम्बन्धी डेटा को एन्क्रिप्ट करने के लिए अपनी निजी कुंजी (private key) का उपयोग करता है और उस डेटा को डिक्रिप्ट करने का एकमात्र तरीका है हस्ताक्षरकर्ता की सार्वजनिक कुंजी। इस तरह डिजिटल हस्ताक्षर प्रमाणित होते हैं। डिजिटल हस्ताक्षर तकनीक में सभी पक्षों को यह विश्वास होना आवश्यक है कि हस्ताक्षर करने वाला व्यक्ति अपनी निजी कुंजी को गुप्त रखने में सक्षम है। यदि किसी अन्य के पास हस्ताक्षरकर्ता की निजी कुंजी तक पहुंच है, तो वह पार्टी निजी कुंजी धारक के नाम पर कपटपूर्ण डिजिटल हस्ताक्षर बना सकती है।

डिजिटल हस्ताक्षर प्रमाणपत्र

(Digital Signature Certificate/DSC) 

डिजिटल हस्ताक्षर प्रमाणपत्र क्या है? (What is Digital Signature Certificate)–डिजिटल सिग्नेचर सर्टिफिकेट (DSC) भौतिक या पेपर सर्टिफिकेट का डिजिटल समकक्ष अर्थात् इलेक्ट्रॉनिक प्रारूप ह। भौतिक प्रमाणपत्रों के कछ उदाहरण ड्राइवरों के लाइसेंस, पासपोर्ट या सदस्यता कार्ड हैं। प्रमाण पत्र एक निश्चित उद्देश्य के लिए किसी व्यक्ति की पहचान के प्रमाण के रूप में काम करते हैं; उदाहरण के लिए, ड्राइविंग लाइसेंस किसी ऐसे व्यक्ति की पहचान करता है जो किसी विशेष देश में कानूनी रूप से १२१ कर सकता है। इसी तरह, एक डिजिटल प्रमाणपत्र को इलेक्ट्रॉनिक रूप से किसी की पहचान को साबित करने के लिए. इंटरनेट पर सचना या सेवाओं तक पहुंचने या कुछ दस्तावेजों को औपचारिक रूप हस्ताक्षरित करने के लिए प्रस्तुत किया जा सकता है। डिजिटल हस्ताक्षर प्रमाणपत्र (DSC) की आवश्यकता क्यों है? (Why is Digital Signature Uncate Required)-भौतिक दस्तावेजों को मैन्यूअल रूप से हस्ताक्षरित किया जाता है, परन्तु इलैक्टॉनिक दस्तावेजों को डिजिटल हस्ताक्षर प्रमाण पत्र का उपयोग करके डिजिटल रूप से हस्ताक्षर किए जाने की आवश्यकता होती है। डिजिटल हस्ताक्षर प्रमाणपत्र कौन जारी करता है? (Who Issue the Digital Signature ate)-एक लाइसेंस प्राप्त प्रमाणन अधिकारी (CA) डिजिटल हस्ताक्षर प्रमाणपत्र जारी करता है। नि अथॉरिटी (सीए) का मतलब है कि वह व्यक्ति जिसे भारतीय आईटी-अधिनियम 2000 24 के अन्तर्गत डिजिटल हस्ताक्षर प्रमाण पत्र जारी करने का लाइसेंस दिया गया है। लाइसेंस का सूची के साथ-साथ उनकी संपर्क जानकारी एमसीए पोर्टल पर उपलब्ध होती है।  डिजिटल हस्ताक्षर की काननी स्थिति क्या है? (What is the Legal Status of Digital Signature) डिजिटल हस्ताक्षर न्यायालय में कानूनी रूप से स्वीकार्य हैं, जैसा कि आईटी अधिनियम, 2000 के प्रावधानों के तहत प्रदान किया गया है। डिजिटल हस्ताक्षर कैसे काम करते हैं? (How Digital Signature w. हस्ताक्षर इलैक्ट्रॉनिक “उंगलियों के निशान” की तरह हैं। एक कोडिड संदेश हस्ताक्षर सरक्षित रूप से एक हस्ताक्षरकर्ता को एक रिकॉर्ड किए गए लेनदेन में दरवार है। डिजिटल हस्ताक्षर एक मानक, स्वीकृत प्रारूप का उपयोग करते हैं. जिसे अवसंरचना (पीकेआई) कहा जाता है, जो उच्चतम स्तर की सुरक्षा और सार्वभौमिक करता है। यह इलेक्ट्रॉनिक हस्ताक्षर (e-Signature) का एक विशिष्ट हस्ताक्षर तकनीकी का PKI के लिये प्रदाता को दो लंबी संख्या उत्पन्न करने के लिए गणितीय एल्गोरिथा का आवश्यकता होती है, जिसे कुंजी (Key) कहा जाता है। एक कुंजी सार्वजनिक कहलाती है और निजी कहलाती है। जब कोई हस्ताक्षरकर्ता इलैक्ट्रॉनिक रूप से किसी दस्तावेज पर हस्ताक्षर कर हस्ताक्षरकर्ता की निजी कुंजी का उपयोग करके हस्ताक्षर बनाया जाता है, जो हमेशा हस्ताक्षर सरक्षित रूप से रखा जाता है। गणितीय एल्गोरिथ्म एक संकेताक्षर की तरह काम करता है जो दर दस्तावेज से मेल खाते हुए डेटा बनाता है, हैश कहलाता है और उस डेटा को एन्क्रिप्ट कर परिणामी एन्क्रिप्टेड डेटा डिजिटल हस्ताक्षर है। हस्ताक्षर पर वह समय भी चिन्हित किया जाता दस्तावेज पर हस्ताक्षर किए गए थे। यदि हस्ताक्षर करने के बाद दस्तावेज बदलता है, तो डिजिटल हस्ताभा अमान्य माने जाते हैं।

सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000

(Information Technology Act, 2000) 

सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम सन् 2000 में पारित किया गया। इसे राष्ट्रपति की स्वीकृति ) जून, 2000 को प्राप्त हुई। इसे 17 अक्टूबर, 2000 से लागू/प्रभावी किया गया। इस अधिनियम में 2008 में संशोधन किया गया। संशोधित अधिनियम को 27 अक्टूबर 2009 से प्रभावी किया गया। सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम जम्मू तथा कश्मीर राज्य सहित सम्पूर्ण भारत पर लागू होता है। इस अधिनियम के प्रावधान उन अपराधों पर भी लागू होते हैं जो भारत के बाहर किये गये हैं यदि उनमें प्रयुक्त कम्प्यूटर, कम्प्यूटर प्रणाली या कम्प्यूटर नेटवर्क भारत में स्थित है। अधिनियम के उद्देश्य (Objectives of the Act):  सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम के प्रमुख उद्देश्य निम्नानुसार हैं:

  1. संयुक्त राष्ट्र (UN) की साधारण सभा के प्रस्ताव को लाग करना ताकि पत्र-आधारित सादा सन्देशों एवं सूचना संग्रहण के अन्य विकल्पों पर लागू होने वाले कानन में समरूपता लाया जा सका
  2. इलेक्ट्रॉनिक समंक आदान-प्रदान द्वारा एवं अन्य इलैक्टॉनिक संचार माध्यमों के द्वारा किया वाले लेन-देनों अर्थात् ई-कॉमर्स को वैधानिक मान्यता प्रदान करना।
  3. किसी भी कानून के अधीन प्रमाणन की आवश्यकता की पर्ति के लिए अकाय हस्ता प्रमाणन हेतु मान्यता प्रदान करना।
  4. सरकारी विभागों में प्रलेखों की ई-फाइलिंग की सुविधा प्रदान करना। 
  5. समंकों के इलैक्ट्रॉनिक संग्रहण की सुविधा प्रदान करना।
  6. विश्वसनीय इलैक्ट्रॉनिक अभिलेखों के माध्यम से जनता को त्वरित गति स सरक प्रदान करना।
  7. बैंकों एवं वित्तीय संस्थाओं के बीच इलैक्ट्रॉनिक साधनों से कोषों के अन्तरण का मान्यता प्रदान करना।
  8. बैंकों की लेखा पुस्तकों को इलैक्ट्रॉनिक प्रारूप में रखने को कानुनी मान्यता प्रदान
  9. भारतीय दण्ड संहिता, भारतीय साक्ष्य अधिनियम, बैंकर्स बक्स एविडेन्स एक्ट ऑफ एण्डिया एक्ट में संशोधन करना।
  10. कम्प्यूटर अपराधों को रोकना तथा इन्टरनेट उपयोगकर्ताओं की निज (privacy) को संरक्षण प्रदान करना।

अधिनियम का लागू न होना (Act Does Not Apply)  

यह अधिनियम उन प्रलेखों या लेन-देनों पर लागू नहीं होता है जिनको इस अनुसूची प्रथम में विनिर्दिष्ट किया गया है। ऐसे प्रमुख प्रलेख तथा लेन-देन अग्रानुसार हैं-

  1. चैक को छोडकर अन्य किसी भी प्रकार का विनिमय साध्य विलेख। 
  2. मुख्तार नामा (Power of Attorney)

3.प्रन्यास विलेख (Trust Deed)

  1. वसीयता नामा  (will) जिसके अन्तर्गत अन्य कोई भी वसीयती प्रलेख भी सम्मिलित है जिसे चाहे किसी भी नाम से पुकारा जाता है।
  2. किसी भी अन अचल सम्पत्ति या उसमें किसी भी हित के विक्रय का ठहराव।
  3. अन्य कोई भी कोई भी विलेख/प्रलेख या लेन-देन जिसे राजकीय गजट में अधिसूचित किया जायेगा।

सचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 के प्रमुख प्रावधान  Important Provisions of Information Technology Act, 2000)  इस अधिनियम के प्रमुख प्रावधान निम्नानुसार हैं:

  1. कम्प्यूटर प्रणाली आदि की क्षति के लिए दण्ड एवं क्षतिपूर्तिः 

यदि कोई व्यक्ति किसी कम्प्यूटर, कम्प्यूटर प्रणाली, कम्प्यूटर नेटवर्क या कम्प्यूटर संसाधन सभी को ‘कम्प्यूटर’ आदि शब्द लिखकर प्रकट किया है) के स्वामी या प्रभारी की अनुमति निम्नांकित में से किसी प्रकार का कार्य करता है तो वह व्यक्ति प्रभावित व्यक्ति की क्षतिपूर्ति के लिये उत्तरदायी होगा जो 1 करोड़ रू. से अधिक नहीं होगी-

  1. किसी कम्प्यूटर आदि में पहुंच जाता है या पहुँच बनाने का उपाय करता है।

2 किसी कम्प्यूटर आदि से कोई समंक, कम्प्यूटर समंक-आधार अथवा सूचना को डाउनलोड करता है, निकालता है या उनकी प्रतिलिपि करता है।

  1. किसी कम्प्यूटर आदि में कम्प्यूटर संदूषक या विष (Contaminant or Virus) प्रवेश करता है अथवा करवाता है।
  2. किसी कम्प्यूटर आदि में विद्यमान किसी कम्प्यूटर प्रणाली या कम्प्यूटर नेटवर्क, समंक, कम्प्यूटर समंक-आधार या अन्य किसी कम्प्यूटर प्रोग्राम को क्षति पहुँचाता है अथवा क्षति पहुँचाने के उपाय करता है।
  3. किसी कम्प्यूटर आदि में अवरोध उत्पन्न करता है अथवा करवाता है।
  4. किसी कम्प्यूटर आदि में अधिकृत रूप से प्रवेश करने के अधिकारी को उनमें प्रवेश करने से रोकता है अथवा रोकने के उपाय करता है। ___
  5. किसी कम्प्यूटर आदि में इस अधिनियम के प्रावधानों, नियमों, विनियमों आदि का उल्लंघन करते हुए किसी व्यक्ति को उनमें प्रवेश करने में सुविधा प्रदान करता है।
  6. किसी कम्प्यूटर आदि में छेड़छाड़ या छलकपट करके किसी व्यक्ति द्वारा उपयोग की गई आक शल्क को किसी अन्य व्यक्ति के खाते में डालता है।
  7. किसी कम्प्यूटर संसाधन में विद्यमान किसी सचना को किसी भी साधन से नष्ट करता है, हटा S) या परिवर्तित करता है अथवा उसकी उपयोगिता या महत्व को कम करता है अथवा उसे हानि पहुँचाकर प्रभावित करता है।
  8. किसी कम्प्यूटर संसाधन में प्रयक्त किसी कम्प्यटर साधन कोड को क्षति पहुँचाने के उद्देश्य से छपाता है, नष्ट करता है, अथवा किसी से उस कोड को चुरवाता है, नष्ट करवाता है अथवा छिपवाता है।

स्पष्टीकरण इस धारा के सम्बन्ध में अधिनियम में निम्नांकित स्पष्टीकरण दिये गये हैं:.  (i) कम्प्यूटर प्रदूषक/सन्दूषक (Computer Contaminant) कम्प्यूटर संदूषक से तात्पर्य कम्पयूटर निर्देशों का कोई समूह जो निम्नाकित उदेश्यों से बनाया गया है। (अ) किसी कम्प्यूटर, कम्प्यूटर प्रणाली या कम्प्यूटर नेटवर्क के समंकों या कार्यक्रमों को पारिवर्तित या नष्ट करने, उनसे अभिलेख बनाने या उनका अन्तरण/सम्प्रेषण करने के लिए।  (ब) किसी कम्प्यूटर, कम्प्यूटर प्रणाली या कम्प्यूटर नेटर्वक के सामान्य संचालन का किसी भी साधन से अपहरण करने के लिए। (ii) कम्प्यूटर समंक-आधार Computer Database) कम्प्यूटर समंक-आधार से तात्पर्य मूल (Text), छवि/प्रतिबिम्ब वीडियो ऑडियों में सूचनाओं, जानकारियों, तथ्यों, अवधारणाओं क प्रस्तुतीकरण से है जिन्हें औपचारिक रूप से तैयार किया जा रहा है अथवा तैयार कर लिया गया है अथवा अनुदेशों के प्रस्तुतीकरण से है जिन्हे औपचारिक रूप से तैयार किया जा रहा है अथवा तैयार कर लिया गया है अथवा जिनका कम्प्यूटर, कम्पयूटर नेटर्वक में उपयोग करने का इरादा है।

(iii) कम्प्यटर वायरस (Computer Virus) कम्प्यूटर विष या वायरस से ताता कम्प्यूटर निर्देश, सूचना, समंक या प्रोग्राम से है जो किसी कम्प्यूटर संसाधन को ना पहुँचाता है, उसका स्तर घटाता (degrade) या उसकी कार्य-क्षमता को प्रतिकूल तरीके से प्रभावित है अथवा वह अपने आपको किसी अन्य कम्प्यूटर संसाधन को सम्पर्क में ले लेता के करना प्रारम्भ कर देता है जबकि उस कम्प्यूटर प्रणाली में किसी प्रोग्राम, समंक, या निर्देशन किया जाता है अथवा जब कोई अन्य घटना घटित होती है।

(iv) क्षति (Damage) क्षति या हानि से तात्पर्य किसी कम्प्यूटर संसाधन को किसी भी नष्ट करना, परिवर्तित करना, समाप्त (Delete) करना, उसमें जोड़ना संशोधन/परिवर्तन करना या उसकी पुन: व्यवस्था (Re-arrange) करना है।

(v) कम्प्यूटर स्त्रोत कोड (Computer Source code)-कम्प्यूटर स्रोत कोड से तात्पर कम्प्यूटर संसाधन में किसी भी रूप में कार्यक्रमों (Programmes), कम्प्यूटर कमाण्डों/निर्देशों, डिजा तथा रूपरेखा तथा कार्यक्रम विश्लेषण को सूचीबद्ध करना है। 

  1. समंक संग्रहण की असफलता के लिए क्षतिपूर्तिः

कभी-कभी कोई निगम निकाय अपने स्वामित्व, नियन्त्रण या संचालन वाले किसी कम्प्यटर संसाधन में किसी संवेदनशील व्यक्तिगत समंक या सूचना को रखती है, संव्यवहार करती है या संचालित करती है किन्तु उनकी सुरक्षा क्रियाओं एवं प्रक्रियाओं को समुचित रूप से क्रियान्वित करने एवं बनाये रखने में लापरवाही बरतती है और जिसके कारण किसी व्यक्ति को गलत तरीके से हानि होती है अथवा लाभ होता है। ऐसी स्थिति में, ऐसी निगमित संस्था उस प्रभावित व्यक्ति की क्षतिपूर्ति के लिए उत्तरदायी होगी।

  1. सूचनाएँ, विवरणी आदि प्रस्तुत करने में असफल रहने पर दण्डः

यदि किसी भी व्यक्ति से इस अधिनियम अथवा इसके अधीन बनाये गये नियमों या विनियमों के अधीन निम्नांकित कार्यों को सम्पन्न करने की अपेक्षा की गयी है और वह व्यक्ति उन कार्यों को करने में असफल रहता है तो वह निम्नांकित प्रकार के दण्ड के लिए उत्तरदायी होगा:

(i) यदि किसी व्यक्ति को कोई प्रलेख, विवरणी या रिपोर्ट नियन्त्रक या प्रमाणन प्राधिकारी को प्रस्तुत करनी है और वह ऐसा करने में त्रुटि करता है तो उसे अधिकतम 150,000 रू. से प्रत्येक त्रुटि के लिए दण्डित किया जा सकेगा।

(ii) यदि किसी को कोई विवरणी, सूचना, पुस्तकें या अन्य प्रलेख, निर्धारित समय में प्रस्तुत करन हैं और वह ऐसा करने में त्रुटि करता है तो उसे अधिकतम 5,000 रू. प्रतिदिन तक के दण्ड से तब तक दण्डित किया जा सकेगा जब तक कि ऐसी त्रुटि/चूक जारी रहती है।

(iii ) यदि किसी व्यक्ति से लेखा पुस्तकें या अभिलेख रखने की अपेक्षा की गयी है और वह एस करने में त्रुटि करता है तो उसे अधिकतम 10,000 रू. प्रतिदिन के दण्ड से दण्डित किया जा सकता। जब तक ऐसी त्रुटि जारी रहती है।

  1. अवशिष्ट दण्ड-कोई भी व्यक्ति इस अधिनियम के अधीन बनाये गये नियमों का उल्ल करता है और उनके लिए कोई दण्ड प्रावधान नहीं किया गया है तो ऐसा व्यक्ति अधिकतम 25,0 की क्षतिपूर्ति ऐसे व्यक्ति को देने के लिए उत्तरदायी होगा, जो उस उल्लंघन से प्रभावित हुआ है अधिकतम 25,000 रू. के दण्ड के लिए उत्तरदायी होगा।

न्याय-निर्णयन सम्बन्धी प्रावधान

(Provisions to Adjudication) 

आई.टी. मामलों के न्याय-निर्णयन सम्बन्धी प्रावधान निम्नानुसार हैं: 

  1. न्याय निर्णयन अधिकारी की नियक्ति-इस अधिनियम के प्रावधानों या इनके अधीन ब गये नियमों एवं विनियमों का किसी भी व्यक्ति द्वारा उल्लंघन के मामलों पर न्याय-निर्णय द’ केन्द्रीय सरकार न्याय-निर्णयन अधिकारी की नियुक्ति कर सकती है। ऐसा अधिकारी भारत स निदेशक के पद के व्यक्ति अथवा राज्य सरकार के समान स्तर के किसी पद के अधिकारी

अधिकारी को नियुक्त नहीं किया जायेगा। ऐसा न्याय-निर्णयन अधिकारी केन्द्रीय सरकार द्वारा विधि से जाँच करेगा।

2. न्याय-निर्णयन अधिकारी का अनुभव-किसी भी ऐसे व्यक्ति को न्याय निर्णयन अधिकारी के रूप में नियुक्त नहीं किया जायेगा जिसे केन्द्रीय सरकार द्वारा निर्धारित सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम के वा न्यायिक क्षेत्र का अनुभव नही होगा।

  1. क्षेत्राधिकार का निर्धारण-यदि एक से अधिक न्याय निर्णयन अधिकारियों की नियक्ति की य सरकार आदेश जारी कर उनके क्षेत्राधिकार के मामलों एवं स्थानों का भी निर्धारण करेगी।
  2. न्याय-निर्णयन अधिकारी का मौद्रिक क्षेत्राधिकार-न्याय-निर्णयन अधिकारी उन मामलों का जिनमें दावे की राशि 5 करोड़ से अधिक की नहीं होगी। 5 करोड़ ₹ से अधिक के दावे का क्षेत्राधिकार सक्षम न्यायालय का ही होगा.
  3. पक्ष प्रस्तुत करने के बाद दण्ड देना-न्याया-निर्णयन अधिकारी आरोपी व्यक्ति को अपना पक्ष प्रस्तुत करने का अवसर देगा। इसके बाद न्याय-निर्णयन अधिकारी यदि इस बात से संतुष्ट हो कि आरोपी या नियमों का उल्लंघन किया है तो इस धारा के प्रावधानों के अनुरूप जो भी उचित समझेगा दण्ड दे सकेगा।

न्याय-निर्णयन प्राधिकारी की शक्तियाँ

  1. इसके समक्ष होने वाली सभी कार्यवाहियों को भारतीय दण्ड संहिता के प्रावधानों (धारा 193 से के अर्थों में न्यायिक कार्यवाहियाँ माना जायेगा।
  2. इसे दण्ड प्रक्रिया संहिता के प्रावधानों (धारा 345 से 346) से अधीन दीवानी न्यायालय माना जायेगा। 
  3. इसे दण्ड प्रक्रिया संहिता के प्रावधानों (अध्याय XI) के उद्देश्यों के लिए दीवानी न्यायालय माना जायेगा।

अपराध एवं दण्ड

(Offences and Punishment) 

इस अधिनियम में कुछ क्रियाओं को अपराध की श्रेणी में रखा गया है तथा उनके करने वालों को दण्डित करने का प्रावधान भी किया गया है। ऐसे प्रमुख प्रावधान निम्नलिखित हैं

1.कम्प्यूटर साधन प्रलेखों से छेड़छाड़ पर दण्ड-कोई भी व्यक्ति किसी कम्प्यूटर, कम्प्यूटर प्राग्राम, कम्प्यूटर प्रणाली, या कम्प्यूटर नेटवर्क में उपयोग किये जाने वाले कम्प्यूटर साधन कोड को जानबूझकर या इरादतन (knowingly or intentionally) छिपाता है, नष्ट करता है या परिवर्तित करता है अथवा जानबूझकर या इरादतन किसी दूसरे से छिपवाता है, नष्ट करवाता है, परिवर्तित कराता है तो उस का तान वर्षों तक का कारावास की सजा अथवा दो लाख रू. तक के जुर्माने अथवा दोनों से ही दण्डित किया जा सकेगा।

यहाँ कम्प्यूटर साधन कोड से तात्पर्य कार्यक्रमों, कम्प्यूटर आदेशों, डिजाइन तथा रूपरेखा तथा किसी भी प्रारूप में कम्प्यूटर संसाधन के प्रोग्राम के विश्लेषण को सूचीबद्ध करने से है। 

  1. कम्प्यूटर सम्बन्धी अपराधों के लिए दण्ड यदि कोई व्यक्ति बेईमानी या कपटपूर्ण तरीके से कोई कार्य (जिनका धारा 43 में उल्लेख किया गया है।) करता है तो उसे तीन वर्ष तक का कारावास लाख तक का जाना अथवा दोनों ही दण्ड दिये जा सकते हैं। 
  2. संचार साधनों द्वारा आपत्तिजनक सन्देश भेजने पर दण्ड:कोई भी व्यक्ति जो कम्प्यूटर पार साधन/उपकरण से निम्नांकित प्रकार के आपत्तिजनक सन्देश भेजता है उसे तीन वर्ष तक के कारावास तथा जुर्माने की सजा से दण्डित किया जा सकता है: । 

(i) कोई भी सूचना देना जो पर्णत: आपत्तिजनक हो अथवा जो धमकीपूर्ण हो।

(ii) कोई भी ऐसी सूचना जिसे वह असत्य जानता/मानता हो किन्तु चिढ़ाने/खिजाने, कष्ट देने नवराध उत्पन्न करने, अपमान करने, क्षति पहुँचाने, आपराधिक तरीके से भयभीत करने, शत्रुता, घृणा या दुर्भावना उत्पन्न करने के उद्देश्य से ऐसी असत्य सूचना कम्प्यूटर संसाधन या संचार कर निरन्तर रूप से देता हो। 

(iii) कोई भी ई-मेल सन्देश खिजाने/चिढाने या कष्ट देने, या उस सन्देश के उद्गम से प्रेषिति या प्राप्तकर्ता को भ्रमित करने या धोखा देने के उद्देश्य से भेजता हो। 

4. चोरी के कम्प्यूटर संसाधन या संचार उपकरण को बेईमानी से प्राप्त करने पर दण्ड कभी कभी काई व्यक्ति किसी चोरी किये हए कम्प्यूटर संसाधन या संचार उपकरण को यह सच

जानते हुए या ऐसा जानने के पर्याप्त कारण होते हुए भी बेईमानी से प्राप्त करता है अथवा रख लेता है। ऐसे व्यक्ति को तीन वर्ष तक के कारावास की सजा अथवा एक लाख रू. तक के अथवा दोनों ही दण्डों से दण्डित किया जा सकता है। [2008 के संशोधन अधिनियम द्वारा जो धारा 66B]

  1. पहचान की चोरी के लिए दण्ड-कभी-कभी कोई व्यक्ति कपटपूर्वक अथवा बेईमानी कर दूसरे व्यक्ति के इलैक्ट्रॉनिक हस्ताक्षर, पासवर्ड, अथवा किसी अन्य विशिष्ट पहचान चिन्ह का करता है। ऐसे व्यक्ति को किसी भी प्रकार के तीन वर्षों तक के कारावास की सजा दी जा सकती अथवा एक लाख रू. तक का जुर्माना लगाया जा सकता है। [2008 के संशोधन द्वारा जोडी गयी। 66C]
  2. कम्प्यूटर संसाधन का उपयोग कर छद्मवेश में धोखाधड़ी करने पर दण्ड-कभी-कभी व्यक्ति संचार उपकरण अथवा कम्प्यूटर संसाधन का उपयोग कर छद्मवेश या नाटकीय गर धोखाधड़ी करता है। ऐसे व्यक्ति को किसी भी प्रकार के तीन वर्ष तक के कारावास की सजा दी जा सकती है तथा एक लाख रू. तक की राशि का जुर्माना भी लगाया जा सकता है। [2008 के संशोधन अधिनियम द्वारा जोड़ी गयी धारा 66D]
  3. निजता या एकांतता के उल्लंघन पर दण्ड-कभी-कभी कोई व्यक्ति इरादतन या जानबझकर किसी व्यक्ति की सहमति के बिना, उस व्यक्ति की निजता या एकांतता (his or her privacy) का उल्लंघन करने वाली परिस्थितियों में उसके एकान्त क्षेत्र का चित्र लेता है या प्रकाशित करता है या उसे सम्प्रेषित करता है। ऐसे व्यक्ति को तीन वर्ष तक के कारावास की सजा अथवा दो लाख रू. तक के जुर्माने अथवा दोनों से ही दण्डित किया जा सकता है। [2008 के संशोधन अधिनियम द्वारा जोड़ी गयी धारा 66E]
  4. साइबर आंतक के लिए दण्ड-किसी भी व्यक्ति द्वारा साइबर आतंक का अपराध किया हुआ समझा जायेगा जबकि वह निम्नांकित में से किसी भी प्रकार की प्रक्रिया में लिप्त होता है:
  5. यदि वह भारत की एकता, अखण्डता, सुरक्षा, प्रभुसत्ता को धमकाने के इरादे से अथवा जनता में या जनता के किसी वर्ग में आंतक फैलाने के उद्देश्य से निम्नांकित कार्य करता है:

(i) किसी कम्प्यूटर संसाधन में पहुँच करने देने से इनकार करता है अथवा इनकार करवाता है।

(ii) किसी कम्प्यूटर संसाधन में बिना अधिकार के प्रवेश का प्रयास करता है अथवा पहुंच का अधिकृत सीमा का उल्लंघन करता है।

(iii) किसी कम्प्यूटर में संदूषक (Contaminant) प्रवेश करता है अथवा करवाता है आर एस आचरण से व्यक्तियों की मृत्यु या क्षति होती है अथवा हो सकती है अथवा सम्पत्ति को क्षति पहुंचता ह अथवा सम्पत्ति नष्ट होती है अथवा यह जानते हुए कि ऐसा करने से समदाय के लोगों के लिए आवश्यक वस्तुओं या सेवाओं की आपूर्ति में बाधा हो सकती है अथवा धारा 70 में वर्णित संवदेनशील सूप संरचना संसाधनों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।

  1. यदि वह जानबूझकर या इरादतन किसी कम्प्यटर संसाधन में अनाधिकृत रूप स प्रर करता है अथवा अधिकृत प्रवेश सीमा तक उल्लंघन करता है तथा ऐसे आचरण से वह एसा व समंक या कम्प्यूटर समंक-आधार तक पहुँच प्राप्त कर लेता है जिन तक पहँच बनाना राष्ट्रीय सुरक्षा विदेशी सम्बन्धों के कारणों से प्रतिबन्धित है अथवा किसी प्रतिबन्धित सचना. समक या कम्प्यूटर आधार तक वह यह समझते हुए पहुँच करता है कि ऐसी सचना समंक या कम्प्यटर समंक-आधार पहुँच बनाना भारत की प्रभुत्ता तथा अखण्डता, राष्ट्रीय सुरक्षा, विदेशी राष्टों के साथ मित्रतापूर्ण जन-जीवन की शांति, शालीनता या नैतिकता को क्षति पहुँचा सकती है अथवा जिसके कारण न्यायालय की अवमानना या मानहानि हो सकती है अथवा किसी को अपराध की प्रेरणा मिलता जिससे किसी विदेशी राष्ट्र या लोगों के समूह या अन्य किसी को भी लाभ पहुंच सकता हो।

दण्ड-कोई भी व्यक्ति जो साइबर आतंक के अपराध को करता है अथवा अपराध रचता है उसे आजीवन कारावास की सजा दी जा सकती है। 12008 के संशोधन अधिनिय जोड़ी गयी धारा 66F]

9. इलैक्ट्रॉनिक प्रारूप में अश्लील सामग्री प्रकाशित या प्रेषित करने पर दण्ड-कभा व्यक्ति इलैक्ट्रॉनिक रूप में ऐसी सामग्री प्रकाशित या प्रेषित करता है अथवा प्रकाशित करवाता कामोत्तेजक होती है अथवा कामुक रुचि को भड़काती है अथवा जो ऐसे प्रभाव वाली है कि लोगों

को चरित्रहीन एवं भ्रष्ट बनाने की ओर प्रवृत्त करती है जिनके द्वारा (सम्बन्धित परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए) उसमें सम्मिलित सामग्री को पढ़ने, देखने या सुनने की सम्भावना है। ऐसे व्यक्ति को निम्नाकित प्रकार से दण्डित किया जै सकेगा।-

(i) ऐसे पहले अपराध के लिए उसे किसी भी प्रकार के तीन वर्ष तकके कारावास की सजा दी जा सकेगी तथा पाँच लाख रू. तक के जुर्माने से दण्डित किया जा सकेगा। 

(ii) दूसरे या पश्चात्वर्ती किसी भी ऐसे अपराध के लिए उसे किसी भी प्रकार के पाँच वर्ष तक की सजा तथा दस लाख तक के जुर्माने से दण्डित किया जा सकेगा। [धारा 67] 

  1. कामवासना सम्बन्धी आचरण आदि के प्रकाशन पर दण्ड-कभी-कभी कोई व्यक्ति रूप में किसी ऐसी सामग्री को प्रकाशित या प्रेषित करता है अथवा प्रकाशित या प्रेषित समें कामवासना सम्बन्धी क्रियाओं/आचरण का स्पष्ट प्रदर्शन होता है। ऐसे व्यक्ति को निम्नांकित प्रकार से दण्डित किया जा सकता है।

(i) प्रथम अपराध की दशा में उसे किसी भी प्रकार का पाँच वर्ष तक के कारावास की सजा 10 लाख रू. तक के जुर्माने से दण्डित किया जा सकेगा।

(ii) द्वितीय या पश्चात्वर्ती किसी भी ऐसे अपराध के लिए उसे सात वर्ष की सजा तथा दस लाख रु तक के जुर्माने से भी दण्डित किया जा सकेगा। 

  1. बच्चों को कामवासना सम्बन्धी कार्यों में प्रदर्शित करने पर दण्ड-कोई भी व्यक्ति जो निम्नांकित क्रियाओं में लिप्त है तो यह माना जायेगा कि वह व्यक्ति बच्चों को कामवासना सम्बन्धी याओं में प्रदर्शित करने वाली सामग्री के प्रकाशन या प्रेषण का अपराधी है: 

(i) यदि वह व्यक्ति इलैक्ट्रॉनिक प्रारूप में किसी ऐसी सामग्री का प्रकाशन या प्रेषण करता है अथवा करवाता है जिसमें बच्चों को कामवासना सम्बन्धी क्रियाओं में लिप्त रूप में प्रदर्शित किया गया है।.

(ii) यदि वह व्यक्ति इलैक्ट्रॉनिक प्रारूप में बच्चों को अश्लील या अभद्र या कामवासना सम्बन्धी क्रियाओं में प्रदर्शित करने वाले किसी विषय-सामग्री का अंकीय चित्रों में सृजन करता है, संग्रह करता है, प्राप्त करने का प्रयास करता है, तलाश (Brouse) करता है, डाउनलोड करता है, प्रचारित करता है, विनिमय करता है, अथवा वितरित करता है।

(iii) यदि वह कामवासना भड़काने वाली क्रियाओं के लिए बच्चों को किसी अन्य एक या अधिक बच्चों के साथ ऑनलाइन सम्बन्ध बनाने के लिए प्रेरित करता है या फुसलाता है जो कम्प्यूटर संसाधन पर किसी भी समुचित वयस्क व्यक्ति को आपत्तिजनक लग सकता है।

(iv) यदि वह बच्चों के ऑन लाइन दुरूपयोग में सहायता करता है।

(v) यदि वह बच्चों के साथ कामवासना सम्बन्धी क्रियाओं में अपने आपके या किन्हीं अन्य व्याक्तयों के दुरूपयोग को इलैक्ट्रॉनिक प्रारूप में रिकॉर्ड करता है।

दण्ड-उपर्युक्त प्रकार से दोषी/अपराधी व्यक्ति को निम्नांकित प्रकार से दण्डित किया जा सकेगा:

(i) प्रथम अपराध की दशा में उसे किसी प्रकार के पाँच वर्ष तक के कारावास की सजा तथा दस लाख रू. तक के जाने से दण्डित किया जा सकेगा।

(ii) द्वितीय या पश्चात्वर्ती किसी भी ऐसे अपराध के लिए उसे किसी भी प्रकार का सात वर्ष कारावास की सजा तथा दस लाख रू. तक के जुर्माने की सजा से दण्डित किया जा सकेगा।

यहां इस धारा के लिए बालक से तात्पर्य उस व्यक्ति से है जिसने अपनी आयु के 18 वर्ष पूरे नहीं किये हैं।

  1. मध्यस्थों द्वारा सचनाओं के संरक्षण नहीं करने पर दण्ड-प्रत्येक मध्यस्थ निर्धारित विधि से तथा प्रारूप म उन सभी निर्धारित सूचनाओं का उस अवधि तक संरक्षण करेगा तथा अपने पास रखेगा जो केन्द्रीय सरकार द्वारा निर्धारित की जायेगी।

13. निर्देशों के पालन नही करने का दण्ड नियन्त्रक किसी भी प्रमाणन प्राधिकारी या उसके चारी को कुछ ऐसे उपाय करने या कुछ ऐसे कार्य नहीं करने का निर्देश दे सकता है जो इस अधिनियम के प्रावधानों तथा उनके अधीन बनाये गये नियमों एवं विनिमयों की अनुपालना के लिए यदि कोई व्यक्ति ऐसे निर्देशों का पालन करने में जानबूझकर या इरादतन त्रुटि करता है तो

अपराध सिद्ध होने पर उसे दो वर्ष तक के कारावास की सजा अथवा एक लाख तक अथवा दोनों से ही दण्डित किया जा सकेगा।

  1. किसी सूचना के अवरोधन/मॉनिटरिंग या विगूढ़न हेतु निर्देशों का पालन नई दण्ड-कभी-कभी केन्द्रीय सरकार या राज्य सरकार या इसके किसी अधिकृत अधिकारीको कि भारत की प्रभसत्ता या अखण्डता, भारत की सुरक्षा, राष्ट्र की सुरक्षा, विदेशी राष्ट्रों के सम्बन्धी, सार्वजनिक व्यवस्था, अथवा उपर्युक्त से सम्बन्धित किसी सम्भाव्य संज्ञान योग्य अपराध को रोकने या किसी अपराध की जाँच पड़ताल करने के उद्देश्य से किसी सूचना का अवरोधन प विगूढन (Interception. monotoring or decryption) करना आवश्यक हो गया है। ऐसी टा कारणों का लिखित अभिलेख तैयार कर समुचित सरकार की कोई भी एजेन्सी किसी भी ससाधन के माध्यम से प्रेषित. प्राप्त या संगृहीत किसी भी सूचना का अवरोधन, मॉनिटरिंग करने का निर्देश दे सकती है।

ऐसे निर्देश के उपरान्त कोई भी उपयोगकर्ता या मध्यस्थ या किसी भी कम्प्यूटर संसाधन का निम्नांकित प्रकार की सुविधाएँ तथा तकनीकी सहायता उपलब्ध करेगा:

(अ) यह ऐसी सूचना को सृजित, प्रेषित, प्राप्त एवं संग्रहण करने वाले कम्प्यूटर संसाधन पहुँच या सुरक्षित पहुँच प्रदान करेगा।

(ब) वह उस सूचना का अवरोधन, मॉनिटरिंग या विगूढ़न करेगा। 

(स) कम्प्यूटर संसाधन में संग्रहीत सूचना प्रदान करेगा।

दण्ड-यदि कोई उपयोगकर्ता/मध्यस्थ या अन्य कोई व्यक्ति जो निर्देश देने वाली एजेन्सीको सहायता करने में त्रुटि करेगा उसे सात वर्ष तक के कारावास की सजा तथा जुर्माने से भी दण्डित किया जा सकेगा।

[धारा 697 

  1. किसी सूचना की सार्वजनिक पहुँच का अवरोध करने के निर्देश का पालन नहीं करने पर दण्ड-कभी-कभी केन्द्रीय सरकार अथवा इसके किसी विशेष रूप से अधिकृत अधिकारी को यह प्रतीत हो कि भारत की प्रभुसत्ता एवं अखण्डता के लिए, भारत की रक्षा के लिए, देश की सुरक्षा के लिए, विदेशी राष्ट्रों के साथ मैत्रीपूर्ण सम्बन्धों के लिए या सार्वजनिक व्यवस्था बनाये रखने के लिए अथवा उपर्युक्त से सम्बन्धित किसी भी संज्ञानयोग्य अपराध को होने से रोकने के लिए किसी सूचना को जनता तक पहुँचने से रोकना आवश्यक है। ऐसी स्थिति में केन्द्रीय सरकार या उसका अधिकृत अधिकारी किसी भी सरकारी एजेन्सी या मध्यस्थ को किसी कम्प्यूटर संसाधन से सृजित, प्रेषित, प्राप्त या संग्रहीत सूचना को जनता तक पहुँचने से रोकने के निर्देश दे सकता है।

दण्ड-यदि कोई मध्यस्थ उपर्युक्त प्रकार के किसी निर्देश का पालन करने में त्रुटि करता है तो उसे सात वर्षों तक के कारावास तथा जुर्माने से भी दण्डित किया जा सकता है। [2008 के संशोधन अधिनियम द्वारा जोड़ी गयी धारा 69A]

  1. ट्रेफिक समंक या सूचना मॉनिटर नहीं करने पर दण्ड-कभी-कभी केन्द्रीय सरकार साइबर सुरक्षा को बढ़ाने या सुदृढ़ करने तथा देश में कम्प्यूटर संदूषण की पहचान, विश्लेषण एवं रोकथाम के लिए विचार करती है। ऐसी स्थिति में, सरकार राजपत्र में अधिसूचना जारी कर किसी भी एजेन्सा की किसी भी कम्प्यूटर संसाधन से सृजित, प्रेषित, प्राप्त या संगृहीत ट्रेफिक समंक या सूचना को मानिटर एकत्र करने के लिए अधिकृत कर सकती है। मध्यस्थ या कम्प्यूटर संसाधन का प्रभारी व्यक्ति एस एजेन्सी को वह सभी तकनीकी सहायता तथा सभी सुविधाएँ उपलब्ध करायेगा जो उस एजेन्सी द्वारा माग जायेगी ताकि वह एजेन्सी उस ट्रेफिक समंक या सूचना के सृजन, प्रेषण, प्राप्ति या संग्रहण करने वाला कम्प्यूटर तक पहुँचने में सक्षम हो सके।

दण्ड-कोई भी मध्यस्थ जो जानबूझकर या इरादतन उपर्युक्त प्रावधान का उल्लंघन करगा तीन वर्षों तक के कारावास की सजा तथा जुर्माने से भी दण्डित किया जा सकेगा। 

  1. मिथ्यावर्णन के लिए दण्ड-यदि कोई व्यक्ति नियन्त्रक से लाइसेन्स प्राप्त करने के अथवा प्रमाणन प्राधिकारी से इलेक्ट्रॉनिक हस्ताक्षर प्रमाण-पत्र प्राप्त करने हेत किसी महत्वपूर्ण त मिथ्यावर्णन करता है अथवा उसे छिपाता है तो उसे दो वर्ष तक के कारावास की सजा अथव लाख रू. तक के जुर्माने अथवा दोनों ही दण्डों से दण्डित किया जा सकेगा।

18. गोपनीयता भंग करने पर दण्ड-कभी-कभी किसी व्यक्ति को इस अधिनियम के प्रा अथवा इनके अधीन बनाये गये नियमों एवं विनियमों के कारण किसी इलैक्ट्रॉनिक अभिलेख, पुस्तक, रजिस्टर, पत्राचार, सूचना । प्रलेख या अन्य सामग्री तक पहुँच जाने की शक्ति प्राप्त हो जाती है। यदि ऐसा कोई शक्ति प्राप्त व्यक्ति सम्बन्धित व्यक्ति की सहमति के बिना उस इलैक्ट्रॉनिक अभिलेख, पुस्तक, र सचना, प्रलेख या अन्य सामग्री को किसी अन्य व्यक्ति को प्रकट करता है तो उसे दो कारावास की सजा अथवा एक लाख र तक के जुर्माने अथवा दोनों ही दण्डों से दण्डित किया जा सकगा।

  1. अनुबन्ध भंग कर सूचना प्रकट करने पर दण्ड-कभी-कभी मध्यस्थ सहित कोई भी व्यक्ति विधि सम्मत अनुबन्ध के अधीन सेवाएँ प्रदान करते हुए किसी ऐसी सामग्री तक पहुँच रखता है जिसमें व्यक्ति के सम्बन्ध में व्यक्तिगत सूचनाएँ होती हैं, ऐसे में वह व्यक्ति या मध्यस्थ उस व्यक्ति अति पहुँचाने या यह जानते हुए कि उस व्यक्ति को अनुचित क्षति हो सकती है, उस व्यक्ति के बिना या विधि सम्मत अनुबन्ध को भंग करते हुए उस सामग्री को किसी अन्य व्यक्ति को प्रकट करता है तो ऐसे व्यक्ति को तीन वर्षों तक के कारावास की सजा अथवा पाँच लाख रू. तक के ने अथवा दोनों ही दण्डों से दण्डित किया जा सकेगा।
  2. इलैक्ट्रॉनिक हस्ताक्षर प्रमाण-पत्र की कुछ बातों को असत्य रूप में प्रकाशित करने पर कोई भी व्यक्ति निम्नांकित तथ्यों की जानकारी होते हुए जानबूझकर इलैक्ट्रॉनिक हस्ताक्षर पत्र को प्रकाशित नहीं करेगा या इसे किसी अन्य व्यक्ति को उपलब्ध नहीं करेगा:

(i) यदि प्रमाण-पत्र में उल्लिखित प्रमाणन प्राधिकारी ने उसे जारी नहीं किया है। 

(ii) यदि प्रमाण-पत्र में उल्लिखित हस्ताक्षरकर्ता/उपयोगकर्ता ने उसे स्वीकार नहीं किया है।

(iii) यदि प्रमाण-पत्र खण्डित या निलम्बित किया जा चुका है, किन्तु ऐसा प्रकाशन ऐसे खण्डन या निलम्बन से पूर्व सृजित इलैक्ट्रॉनिक हस्ताक्षर के सत्यापन के उद्देश्य से किया जा सकता है।

यदि कोई व्यक्ति इस प्रावधान का उल्लंघन करता है तो उसे दो वर्ष तक के कारावास की सजा दी जा सकेगी अथवा उस पर एक लाख का जुर्माना लगाया जा सकेगा।

21. कपटपूर्ण उद्देश्यों के लिए ई-हस्ताक्षर प्रमाण-पत्र के प्रकाशन पर दण्ड-कभी-कभी व्यक्ति जानबूझकर किसी कपटपूर्ण या विधि विरुद्ध उद्देश्य से किसी इलैक्ट्रॉनिक हस्ताक्षर प्रमाण-पत्र को सृजित करता है, प्रकाशित करता है अथवा अन्य प्रकार से उपलब्ध करता है। ऐसे व्यक्ति को दो वर्ष तक के कारावास की सजा अथवा एक लाख रू. तक के जुर्माने से अथवा दोनों ही दण्डों से दण्डित किया जा सकेगा।


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