Foreign Exchange Management Act FEMA 1999 – Economic Laws B.Com 3rd Year Notes

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विदेशी विनिमय प्रबन्ध अधिनियम, 1999 

Foreign Exchange Management Act FEMA 1999

विदेशी विनिमय प्रबन्ध अधिनियम, 2000 

[Foreign Exchange Management Act (FEMA), 2000] 

आर्थिक उदारीकरण के युग में भारत में भी विदेशी विनिमय के कुशल प्रबन्ध की आवश्यकता अनुभव की गई। फलत: विदेशी विनिमय नियमन अधिनियम, 1973 (फेरा) की समीक्षा की गई। स्थायी समिति के सुधारों एवं संशोधनों को अपनाते हुये केन्द्रीय सरकार ने विदेशी विनिमय प्रबन्ध विधेयक को लागू करने और 1973 के ‘फेरा’ (FERA) को रद्द करने का निर्णय किया तथा इसके स्थान पर विदेशी विनिमय प्रबन्ध अधिनियम (FEMA) लागू किया गया। फेमा में कुल 49 धाराएं है।

विदेशी विनिमय प्रबन्ध अधिनियम, 1999 के उद्देश्य 

(Objectives of Foreign Exchange Management Act (FEMA), 1999)

इस अधिनियम को संक्षेप में “फेमा’ (FEMA) के नाम से जाना जाता है। इस अधिनियम प्रस्तावना में यह उल्लेख किया गया है, कि, “यह अधिनियम विदेशी विनिमय से सम्बन्धित कार संघटित और संशोधित करे ताकि विदेशी व्यापार का सरलीकरण हो और भारत का विदेशा । बाजार ठीक से चले तथा उसका व्यवस्थित विकास हो।” संक्षेप में, इस अधिनियम के प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित हैं-

  1. विदेशी विनिमय के क्रय-विक्रय पर नियन्त्रण रखना। 
  2. विदेशी विनिमय दर में स्थिरता लाना।
  1. विदेशों से एवं विदेशों को होने वाले भुगतानों का नियमन करना।
  2. भारत के विदेशी विनिमय बाजार का सुव्यवस्थित विकास करना। 5. भारत से पूँजी के बहिर्गमन पर रोक लगाना। 
  3. भुगतान असन्तुलन को दूर करने में सहायता करना। 
  4. आर्थिक कार्यक्रमों हेतु विदेशी मुद्रा की पूर्ति बनाये रखने में सहायता प्रदान करना।
  5. अनिवासी भारतीयों के भारत में रोजगार, व्यवसाय, विनियोजन, पेशा आदि का नियमन करना। 

आधारभूत परिभाषाएँ (Basic Definitions)

  1. निर्णायक अधिकारी (Adjudicating Authority)—इससे आशय धारा 16 की उपधारा (1) के अन्तर्गत आने वाले अधिकृत-अधिकारी से है।

[धारा 2(a)] 

  1. पुनरावेदन न्यायाधिकरण (Appellate Tribunal)—इसका तात्पर्य, उस न्यायाधिकरण से है जो धारा 18 के अन्तर्गत विदेशी-विनिमय के लिए गठित किया गया है।

[धारा 2(b)] 

  1. अधिकृत व्यक्ति (Authorised Person)-ऐसा व्यक्ति कोई अधिकृत डीलर मुद्रा परिवर्तक, अपतट बैंकिंग इकाई (Off-shore Banking unit) या अन्य वह व्यक्ति हो सकता है जिसे धारा 10 की उपधारा (1) के अन्तर्गत विदेशी विनिमय या विदेशी प्रतिभूतियों में व्यवहार करने के लिए अधिकृत किया गया हो।

[धारा 2(c)] 

  1. बैंच (Bench) से तात्पर्य पुनरावेदन न्यायाधिकरण की बैंच से है।

[धारा 2(d)] 

  1. पूँजी खाता व्यवहार (Capital Account Transactions)-इससे आशय उस व्यवहार से है जो भारत में निवासी व्यक्तियों के, भारत के बाहर की सम्पत्तियों और देनदारियों, जिनमें संभाव्य देनदारियाँ भी सम्मिलित हैं, में परिवर्तन लाता है। इसमें धारा 6 की उपधारा (3) के व्यवहारों को भी सम्मिलित किया जाता है।

[धारा 2(e)] 

  1. सभापति (Chair-person)-से आशय पुनरावेदन न्यायाधिकरण के सभापति से है। 

धारा 2()]

  1. चार्टर्ड एकाउन्टेन्ट (Chartered Accountant)इसको नियत करते समय, इससे आशय चार्टर्ड एकाउन्टेण्ड्स अधिनियम 1949 की धारा 2(1) में दिये गये अनुच्छेद (ब) से होगा। 

[धारा 2(g)]

  1. प्रचलित मुद्रा (Currency)—इसमें प्रचलित कागजी नोट, पोस्टल नोट, पोस्टल ऑर्डर, मनी-आर्डर, चैक, ड्राफ्ट्स, यात्री चैक, साख-पत्र, विनिमय बिल, प्रतिज्ञा पत्र, क्रेडिट-कार्ड एवं वे सभी प्रपत्र (Instruments) आदि सम्मिलित हैं जिन्हें रिजर्व बैंक ऑफ इण्डिया द्वारा अधिसूचित किया जाता

[धारा 2(h)] 

9.प्रचलित कागजी मुद्रा (Currency notes) में सिक्के तथा बैंक-नोट सम्मिलित हैं। 

[धारा 2(1)]

  1. चालू खाता व्यवहार (Current Account Transactions)-इसमें पूँजी खाता व्यवहारों को छोड़कर, निम्नलिखित व्यवहारों को सम्मिलित किया गया है

(i) विदेशी व्यापार से सम्बन्धित देय भुगतान, अन्य चालू व्यवसाय, सेवाएँ, लघु-अवधि बैंकिंग एवं साख सुविधाएँ (ii) ऋणों पर देय ब्याज का भुगतान और विनियोगों से प्राप्त शुद्ध आय; (iii) विदेशों में निवास कर रहे अपने माता-पिता, पति/पत्नी एवं बच्चों के जीवन-यापन के खर्चों के लिए प्रेषित धनराशि; तथा (iv) अपने माता-पिता, पति/पत्नी एवं बच्चों पर किये गये ऐसे समस्त खर्चे, जो विदेशी भ्रमण, शिक्षण एवं स्वास्थय चिकित्सा से सम्बन्धित हों।

[धारा 2(6)] 

  1. प्रवर्तन निदेशक (Director of Enforcement) से आशय है, धारा 36 की उपधारा (1) के अनुसार नियुक्त प्रवर्तन निदेशक से है।

[धारा 2(k)] 

  1. निर्यात (Export) इस शब्द के व्याकरण-सम्मत परिवर्तनों को ध्यान में रखते हुए निम्नलिखित अर्थ होगा(i) भारत से कोई भी माल, भारत के बाहर ले जाना; एवं

[धारा 2(] 

(ii) किसी भी व्यक्ति को भारत से बाहर सेवाएं प्रदान करना।

  1. विदेशी मद्रा (Foreign Currency) से आशय भारतीय चल मुद्रा के अतिरिक्त अन्य किसी विदेशी चल मुद्रा से है।

[धारा 2(m)]

  1. विदेशी विनिमय (Foreign Exchange) इसका आशय, विदेशी मुद्रा में निम्नलिखित कर सम्मिलित करने से है

(i) जमाएँ, साख एवं शेष जो किसी भी विदेशी मुद्रा में देय हों; (ii) ड्राफ्ट्स, यात्री चैक, साख-पत्र या विनिमय-विपत्र जो भारतीय मुद्रा में उल्लेखित या आहरित हों किन्तु किसी विदेशी मुद्रा में देय हों; तथा (iii) ड्राफ्टस, यात्री चैक, साख पत्र या विनिमय-विपत्र जो भारत के बाहर किसी बैंक द्वारा, किसी संस्था द्वारा या किसी व्यक्ति द्वारा आहरित हों किन्तु जिनका भुगतान भारतीय प्रचलित मुद्रा में किया गया हो।

[धारा 2(n)]

  1. विदेशी प्रतिभूति (Foreign Security)—इससे तात्पर्य, कोई भी ऐसी प्रतिभूति से है जो अंशों, स्कन्धों, बन्ध-पत्रों (Bonds), ऋणपत्रों एवं किसी अन्य प्रपत्र से है जो विदेशी मुद्रा में उल्लेखित है। इसमें वे प्रतिभूतियाँ भी सम्मिलित हैं जो विदेशी मुद्रा में उल्लेखित हैं किन्तु जिनके ब्याज एवं लाभांश की वापसी भारतीय प्रचलित मुद्रा में होनी हो।

[धारा 2(0)] 

  1. आयात (Import) से आशय, भारत में वस्तुओं और सेवाओं का लाना है। 

[धारा 2(p)]

  1. भारतीय प्रचलित मुद्रा (Indian Currency)-इससे आशय, ऐसी मुद्रा से है जो भारतीय रूपये में आहरित अथवा उल्लेखित है किन्तु इसमें विशेष बैंक नोट एवं एक रूपये का वह नोट सम्मिलित नहीं है जिसे भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम, 1934 की धारा 28-A के अन्तर्गत निर्गमित किया गया है।

[धारा 2(q)] 

  1. ‘व्यक्ति ‘ (Person)—इसमें निम्नलिखित सम्मिलित हैं-

(i) एक व्यक्ति (Individual),  (ii) एक हिन्दू अविभाजित परिवार,  (iii) एक कम्पनी,  (iv) एक फर्म,  (v) व्यक्तियों का एक संघ अथवा संस्था, चाहे वह समामेलित हो या नहीं,  (vi) प्रत्येक वैधानिक एवं कृत्रिम व्यक्ति, जिसका पूर्व में पराभव नहीं हुआ हो, अथवा  (vii) कोई भी एजेन्सी, कार्यालय या शाखा, जिसका नियंत्रण ऐसे व्यक्तियों के हाथ में हो। 

[धारा 2(u)] 

  1. भारत में निवासी व्यक्ति (Person Resident in India)-ऐसे व्यक्ति से तात्पर्य

(i) उस व्यक्ति से है जो विगत वित्तीय वर्ष में 182 दिन से अधिक भारत में रहा हो, किन्तु इसमें निम्नलिखित को सम्मिलित नहीं किया जाता है (A) भारत का एक नागरिक जो भारत के बाहर जा चुका है या बाहर रहता है, सम्मिलित नहीं है यदि वह (a) भारत के बाहर रोजगार के लिए गया हो, अथवा  (b) भारत के बाहर व्यवसाय या धन्धा चलाने के लिए गया हो, अथवा (c) किसी अन्य उद्देश्य से, जिससे उसकी इच्छा अनिश्चित अवधि के लिए भारत से बाहर रहने का संकेत करती हो। (B) भारत का एक नागरिक, जिसका भारत में आवास समाप्त हो गया था, भारत में लौटता है या रहता है (a) भारत में रोजगार के लिए आने पर, अथवा  (b) भारत में व्यवसाय या धन्धा चलाने के लिए, अथवा (C) किसी अन्य उद्देश्य के लिए, ऐसी परिस्थितियाँ जो उसकी इच्छा को अनिश्चित अवधि के लिए भारत में रूकने का संकेत करें।

[धारा 2(v)]

विदेशी विनिमय प्रबन्ध अधिनियम के प्रमुख प्रावधान 

  1. संक्षिप्त नाम-इस अधिनियम को “विदेशी विनिमय प्रबन्ध अधिनियम, 1999′ कहा जायेगा।

[धारा 2(1)]

2.क्षेत्र या विस्तार- यह अधिनियम सम्पूर्ण भारत में लागू होता है।

[धारा 1(2)] 

3. लागू होना- (i) यह भारत में निवासी व्यक्ति के स्वामित्व अथवा नियन्त्रण वाला बाहर स्थित सभी शाखाओं, कार्यालयों तथा एजेन्सियों पर भी लागू होता है। (ii) अधिनियम तब भी लागू होता है जब कोई भारत का निवासी व्यक्ति भारत के बाहर इस अधिनियम का उल्लंघन करता है।

  1. प्रारम्भ (प्रभावी)-केन्द्रीय सरकार ने इस अधिनियम को अधिसूचना जारी करके 1 जून, 2000 से प्रभावी कर दिया है।

विदेशी विनिमय के नियमन एवं प्रबन्ध सम्बन्धी प्रमुख प्रावधान 

  1. विदेशी विनिमय एवं प्रतिभूतियों के लेन-देन सम्बन्धी प्रावधान- ‘फेमा’ (FEMA) में विदेशी विनिमय एवं प्रतिभूतियों के लेन-देन पर कुछ प्रतिबन्ध लगाये गये हैं। ‘फेमा’ की धारा 3 के अनसार कोई भी व्यक्ति रिजर्व बैंक की सामान्य या विशेष अनुमति के बिना निम्नांकित प्रकार के लेन-देन नहीं करेगा-

(i) कोई भी व्यक्ति अधिकृत व्यक्ति के अतिरिक्त किसी भी व्यक्ति से विदेशी विनिमय या विदेशी पतिभति में न तो लेन-देन कर सकता है और न उसे स्तान्तरित कर सकता है। (ii) कोई व्यक्ति किसी भी तरीके से भारत के बाहर के निवासी किसी भी व्यक्ति को न तो धन की अदायगी कर सकता है और न उसके खाते में कोई धन डाल सकता है। (iii) अधिकृत व्यक्ति को छोड़कर कोई भी व्यक्ति भारत के बाहर के निवासी किसी व्यक्ति के आदेश से या किसी भी व्यक्ति की ओर से किसी भी तरीके से कोई भुगतान प्राप्त नहीं करेगा। (iv) भारत से बाहर कोई सम्पत्ति प्राप्त करने, निर्मित करने या हस्तान्तरित करने के उद्देश्य से भारत में कोई व्यक्ति किसी वित्तीय सौदे में शामिल नहीं हो सकता।

  1. विदेशी विनिमय, प्रतिभूति आदि को धारित करने से सम्बन्धित प्रावधान- इस अधिनियमच के प्रावधानों तथा नियमों का पालन किये बिना भारत का निवासी कोई भी व्यक्ति (i) किसी भी विदेशी मुद्रा को; अथवा (ii) किसी भी विदेशी प्रतिभूति को; अथवा (iii) भारत के बाहर स्थित किसी भी अचल सम्पत्ति को अधिप्राप्त, धारित या अन्तरित नहीं कर सकेगा या अपने कब्जे में नहीं रख सकेगा।

धारा 4] 

  1. चालू खाते के लेन-देन सम्बन्धी प्रावधान- कोई भी व्यक्ति चालू खाते लेन-देन से सम्बन्धित विदेशी विनिमय किसी अधिकृत व्यक्ति को बेच सकता है अथवा उससे प्राप्त कर सकता है। परन्तु केन्द्रीय सरकार जनहित में उचित समझे तो रिजर्व बैंक से परामर्श करके चालू खाते के लेन-देनों पर कोई भी उचित प्रतिबन्ध लगा सकती है।

[धारा 5] 

  1. पूँजी खाते के लेन-देन सम्बन्धी प्रावधान कोई भी व्यक्ति पूँजी खाते के लेन-देन के लिये किसी भी अधिकृत व्यक्ति को विदेशी विनिमय बेच सकता है या उसे विदेशी विनिमय प्राप्त कर सकता है। इस प्रकार पूँजी खाते के लेन-देन पर सामान्यतः कोई प्रतिबन्ध नहीं है। फिर भी रिजर्व बैंक केन्द्रीय सरकार से परामर्श करके पूँजी खाता व्यवहार के किसी वर्ग या किन्हीं वर्गों को अनुमतियोग्य (Permissible) घोषित कर सकता है तथा ऐसे लेन-देनों के लिये स्वीकृति योग्य विदेशी विनिमय की सीमा का भी निर्धारण कर सकता है। रिजर्व बैंक इससे सम्बन्धित कार्यवाहियों के सम्बन्ध में उन्हें रोकने, प्रतिबन्धित करने तथा नियमित करने के नियम बना सकता है।

[धारा 6]

  1. माल तथा सेवाओं के निर्यात सम्बन्धी प्रावधान (धारा 7)-‘फेमा’ में कुछ ऐसे प्रावधान किये गये हैं ताकि माल तथा सेवाओं के निर्यात से प्राप्त विदेशी विनिमय का देश में विधिवत् प्रत्यावर्तन हो सके। ‘फेमा’ के अन्तर्गत प्रत्येक निर्यातक के निम्नलिखित कर्त्तव्य निर्धारित किये गये हैं-(i) वह रिजर्व बैंक या किसी अधिकारी को निर्धारित फार्म पर निर्दिष्ट ढंग से एक घोषणा करेगा जिसमें माल का सच्चा व सही विवरण व मूल्य हो। (ii) यदि माल का पूर्ण निर्यात मूल्य निर्यात के समय निर्धारित करना सम्भव नहीं हो तो मूल्य की वह राशि जो वर्तमान परिस्थितियों में भारत के बाहर उस माल को बेचने से निर्यातक को प्राप्त होने की आशा है। (iii) रिजर्व बैंक के निर्देशानुसार अन्य मांगी जाने वाली सूचना भी उपलब्ध करानी होगी। (iv) सेवाओं के प्रत्येक निर्यातक का यह कर्त्तव्य है कि वह रिजर्व बैंक या ऐसे ही किसी अन्य निर्धारित प्राधिकारी को निर्धारित प्रारूप एवं विधि से एक घोषणा प्रस्तुत करेगा। इस घोषणा वह निर्यात की गई सेवाओं के भुगतान से सम्बन्धित सही-सही तथ्यात्मक/महत्त्वपूर्ण विवरण देगा।
  2. विदेशी विनिमय की वसली एवं प्रत्यावर्तन सम्बन्धी प्रावधान-यदि भारत के निवासी किसी त का विदेशी विनिमय देय अथवा अर्जित हो गई है तो ऐसा व्यक्ति रिजर्व बैंक द्वारा निर्धारित अवधि में रत विधि से वह सभी उचित कदम उठा सकता है जिससे कि उस विदेशी विनिमय की वसूली हो सके एवं उस विदेशी विनिमय को भारत लाया जा सके

[धारा 8]

  1. वसूली एवं प्रत्यावर्तन प्रावधानों से छूट-उपर्युक्त धारा 4 के अन्तर्गत वर्णित विदेशी विनिमय प्रतिभूति आदि को धारित करने से सम्बन्धित प्रावधान एवं धारा 8 के अन्तर्गत वर्णित विदेशी विनिमय वसूली एवं प्रत्यावर्तन सम्बन्धी प्रावधान निम्नलिखित स्थितियों में लागू नहीं होंगे- (i) रिजर्व बैंक द्वारा निर्धारित सीमा तक किसी व्यक्ति द्वारा विदेशी करेन्सी व विदेशी मुद्रा को अपने अधिकार में रखना। रिजर्व बैंक द्वारा निर्धारित सीमा तक किसी व्यक्ति या व्यक्तियों द्वारा विदेशी करेन्सी खाते को रखना और उसका परिचालन। (iii) रिजर्व बैंक की सामान्य या विशेष आज्ञा के अधीन किसी व्यक्ति द्वारा 8 जुलाई 1947 से पहले विदेशी विनिमय की प्राप्ति या उससे किसी आय का होना। (iv) रिजर्व बैंक द्वारा निर्धारित सीमा तक भारत के निवासी किसी व्यक्ति द्वारा धारित ऐसी विदेशी विनिमय, जो उसे ऐसे व्यक्ति से भेंट या उत्तराधिकार में उस राशि में से प्राप्त हई हो जो 8 जुलाई, 1947 से पूर्व उसके पास भारत के बाहर थी या उससे प्राप्त होने वाली आय में से प्राप्त हुई हो। (v) नौकरी, व्यवसाय, व्यापार, पेशा, सेवाये, मानदेय उपहार, वसीयत या विधिसम्मत साधनों द्वारा प्राप्त विदेशी विनिमय जो रिजर्व बैंक द्वारा निर्धारित सीमा के भीतर हो। (vi) रिजर्व बैंक द्वारा विशेष रूप से स्पष्ट की गई किसी अन्य विदेशी विनिमय की प्राप्ति।

‘फेमा’ की व्यवस्थाओं का उल्लंघन एवं दण्ड

(Contravention and Penalties) 

  1. दण्ड (Penalties) [धारा (13)]

(अ) यदि कोई व्यक्ति रिजर्व बैंक द्वारा जारी तथा इस अधिनियम के अन्तर्गत दिए गए नियमों, विनियमों, अधिसूचनाओं, निर्देशों या रिजर्व बैंक के अधिकार क्षेत्र में जारी की गई शर्तों का उल्लंघन करता है तो ऐसी दशा में (i) जहाँ राशि मापन योग्य (Quantifiable) हो तो उस राशि का तीन गुणा अथवा (ii) जहाँ राशि मापन योग्य नहीं है, दो लाख ₹ तक का दण्ड, रिजर्व बैंक अपने न्यायाधिक्षेत्र में, प्रदान कर सकता है। (iii) यदि दण्ड निश्चित कर देने के पश्चात् भी यह उल्लंघन जारी रहता है तो दण्ड की राशि नहीं चुकाने तक पाँच हजार ₹ प्रतिदिन की दर से दण्ड देय होगा। (ब) इस अधिनियम की धारा 19 (2) के प्रावधानों के अनुसार, यदि धारा 13 के अन्तर्गत दिए गए आर्थिक दण्ड का भुगतान, कोई व्यक्ति नोटिस की तिथि के पश्चात् 90 दिन में भी करने में असफल रहता है तो वह दीवानी जेल (Civil Imprisonment) की सजा का भागी होगा।

निर्णय एवं अपील

(Adjudication and Appeal) 

1.निर्णायक अधिकारी की नियुक्ति (1) इस अधिनियम की धारा 13 के अन्तर्गत, उल्लंघन करने वाले व्यक्ति की जाँच करने के लिए, केन्द्र सरकार गजट में अधिसूचना जारी करके, निर्धारित प्रारूप में विभिन्न अधिकारियों की नियुक्ति करन के लिए आदेश प्रसारित कर सकती है। ऐसे आदेश का मूल उद्देश्य उल्लंघन करने वाले व्यक्ति के विरूद्ध दण्ड (Penalty) का निर्धारण करना होता है। प्रत्येक निर्णायक अधिकारी, को शिकायत का निपटारा अविलम्ब तथा अन्तिम रूप में, शिकायत प्राप्त होने की तिथि से 1 वर्ष के भीतर करना होगा।

[धारा 16]

  1. विशिष्ट निदेशक (पुनरावेदन) को पुनर्विचार याचिका/अपील (Appeal to Special Director : Appeals)

केन्द्र सरकार, अधिसूचना द्वारा, निर्णायक-अधिकारी द्वारा दिए गए निर्णय के विरूद्ध अपील दायर करने के लिए विशिष्ट निदेशक (पुनरावेदन) की नियुक्ति कर सकती है तथा उसके न्यायिक क्षेत्राधिक के स्थानों एवं मामलों को निर्दिष्ट (Specify) कर सकती है। यदि कोई व्यक्ति निर्णायक अधिकारी द्वारा दिए गए निर्णय से पीड़ित है तो वह विशिष्ट । (पुनरावेदन) को अपील कर सकता है। पीड़ित पक्षकार द्वारा ऐसी अपील, निर्णायक-अधिकारी द्वारा दि निर्णय की प्रति (Copy) प्राप्त होने की तिथि से 45 दिन के भीतर की जानी चाहिए। विशिष्ट निदेशक के बाद भी अपील स्वीकार कर सकता है किन्तु वह उन कारणों से संतुष्ट होना चाहिए, जिनके कारण देरी हो गई है। निर्णायक अधिकारी तथा विशिष्ट निदेशक (पुनरावेदन) को पुनरावेदन न्यायाधिकरण की धारा 28 अन्तर्गत न्यायिक कार्यवाही के लिए भारतीय दण्ड विधान 1860 की धारा 193 एवं 228 तथा निर्णय देत अपराध प्रक्रिया संहिता 1973 की धारा 345 एवं 346 को प्रयोग करने का अधिकार दिया गया है।

[धारा 17] 

एक व्यक्ति, विशिष्ट निदेशक (पुनरावेदन) के पद पर नियुक्ति योग्य होगा जब वह- (a) भारतीय विधि सेवाओं (Indian Legal Services) का प्रथम श्रेणी का पद धारण किए हुए हो, या (b) ‘भारतीय राजस्व सेवा’ (Indian Revenue Service) का सदस्य हो तथा भारत सरकार के संयुक्त सचिव के पद के समकक्ष हो।

[धारा 21] 

  1. पुनरावेदन न्यायाधिकरण की स्थापना (Establishment of Appellate Tribunal) केन्द्र सरकार, निर्णायक अधिकारी एवं विशिष्ट निदेशक (पुनरावेदन) के विरूद्ध की गई अपील की सुनवाई के लिए, इस अधिनियम के तहत, अधिसूचना जारी करके पुनरावेदन न्यायाधिकरण की स्थापना कर सकती है।

[धारा 18] 

पुनरावेदन न्यायाधिकरण को अपील (Appeal to Appellate Tribunal)-

  1. इस अधिनियम की उपधारा (2) के अन्तर्गत केन्द्र सरकार या विशिष्ट निदेशक (पुनरावेदन) अथवा कोई अन्य पीड़ित पक्षकार, पुनरावेदन न्यायाधिकरण के सम्मुख, निर्णायक अधिकारी के विरूद्ध, अपील कर सकता है। किन्तु ऐसा करने से पूर्व अपील करने वाले पक्षकार को निर्धारित कर दी गई दण्ड की राशि, (Levy Penalty) केन्द्र सरकार द्वारा निर्धारित विधि के अनुरूप जमा करानी होगी।

ऐसी अपील, निर्णायक अधिकारी द्वारा अथवा विशिष्ट निदेशक (पुनरावेदन) द्वारा दिए गए निर्णय की प्रति, जो कि केन्द्र सरकार द्वारा निर्धारित प्रपत्र में एवं निर्धारित शुल्क देकर प्राप्त की गई हो, की तिथि से 45 दिन के भीतर की जा सकती है।

[धारा 19] 

पुनरावेदन न्यायाधिकरण का गठन (Composition of Appellate Tribunal) -[धारा 20] इस न्यायाधिकरण में, केन्द्रीय सरकार द्वारा एक सभापति की नियुक्ति की जाएगी तथा जितना उचित समझे, केन्द्रीय सरकार, सदस्यों की नियुक्ति कर सकेगी।

सभापति एवं सदस्यों की नियुक्ति हेतु योग्यताएँ 

(Qualifications for appointment of Chair-person and Members) 

(1) एक व्यक्ति सभापति या सदस्य के रूप में नियुक्ति के योग्य होगा जब वह (a) सभापति के रूप में, किसी उच्च न्यायालय का न्यायाधीश हो, रहा हो या फिर जिलाधीश की योग्यताएँ रखता हो। (b) सदस्य के रूप में, जिला जज है, या रहा हो या जिला जज की नियुक्ति हेतु योग्यताएँ रखता है। कार्यकाल (Term of office) सभापति एवं प्रत्येक सदस्य का कार्यकाल, अधिकतम 5 वर्ष का होगा किन्तु (i) सभापति की दशा में, अधिकतम आयु 65 वर्ष, तथा  (ii) सदस्यों के सन्दर्भ में, अधिकतम आयु 62 वर्ष होगी। इससे तात्पर्य यह है कि एक व्यक्ति सभापति के पद पर अधिकतम 5 वर्ष के लिए या 65 वर्ष की आयु तक के लिए, जो भी पहले हो, तक पद पर रहेगा। इसी प्रकार, एक सदस्य, अधिकतम 5 वर्ष या 62 वर्ष की उम्र तक, जो भी पहले हो, तक अपने पद बना रह सकेगा।

[धारा 22] 

उच्च न्यायालय को अपील (Appeal to High Court)  कोई भी पक्षकार जो पुनरावेदन न्यायाधिकरण द्वारा दिये गए निर्णय से पीड़ित है वह निर्णय की तिथि से 60 दिन के भीतर उच्च न्यायालय में अपील कर सकता है।

[धारा 35] 

प्रवर्तन निदेशालय (Directorate of Enforcement)  केन्द्र सरकार इस अधिनियम की वस्थाओं को बनाए रखने के लिए प्रवर्तन निदेशालय की स्थापना कर सकती है और जितने भी उचित समझे उतने अधिकारी एवं एक निदेशक की नियुक्ति कर सकती है।

[धारा 36]


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