Intellectual Property Rights & Patent Act – Economic Laws B.Com 3rd Year Notes

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बौद्धिक सम्पदा का अर्थ

(Meaning of Intellectual Property) 

बौद्धिक सम्पदा से तात्पर्य मस्तिष्क या बुद्धि के उन सृजनों से है जिनके सृजन कर्ताओं को कानून एक निर्धारित अवधि तक उन पर अपना एकाधिकार बनाये रखने का वैधानिक अधिकार देता है तथा अन्य किसी भी व्यक्ति को उनके अनाधिकृत उपयोग/विदोहन करने पर प्रतिबन्ध लगाता है। बौद्धिक सम्पदा को दो वर्गों में विभक्त किया जाता है- औद्योगिक सम्पदा तथा साहित्यिक सम्पदा। औद्योगिक सम्पदा से तात्पर्य उन संकेतकों से है जो बाजार में उपलब्ध किसी भी उत्पाद या सेवा के सम्बन्ध में सूचनाओं को उपभोक्ताओं तक पहुँचाते हैं। इसमें उन सभी संरक्षण उपायों को भी सम्मिलित किया जाता है जो उन संकेतकों के अनाधिकृत उपयोग को रोकने में सहायता करते हैं। साहित्यिक सम्पदा से तात्पर्य ऐसी सम्पदा से है जो साहित्य एवं कलात्मक कार्यों तथा अभिनय करने वाले कलाकारों (नाच, गाना, ड्रामा, आदि के कलाकारों) फोटोग्राफरों, चलचित्रकारों, प्रसारणकर्ताओं आदि के कार्यों से सृजित होती हैं।

बौद्धिक सम्पदा अधिकार

(intellectual Property Rights) 

बौद्धिक सम्पदा अधिकार वे वैधानिक अधिकार हैं जो मानव जाति की बौद्धिक क्रियाओं के प्रयासों से जन्म लेते हैं। ऐसे अधिकार ऐसे प्रयासों से सृजन करने वाले लोगों के अधिकारों एवं हितों का संरक्षण एवं नियमन करते हैं। भारत में ऐसे अधिकारों का पंजीयन कॉपीराइट अधिनियम 1957′ के अधीन किया जाता है। बौद्धिक सम्पदा अधिकारों को दो प्रमुख वर्गों में बाँटा जा सकता है-औद्योगिक सम्पदा अधिकार तथा साहित्य सम्पदा अधिकार। औद्योगिक सम्पदा अधिकार सम्पदा अधिकारों में नवकरणों/नवाचारों ट्रेड-मार्क, सेवा मार्क, व्यापारिक मार्क, औद्योगिक डिजाइनें, माल के भौगोलिक संकेतकों, माल के उद्गम स्थल के संकेतकों को सम्मिलित किया जाता है साहित्य सम्पदा अधिकारों से तात्पर्य उन अधिकारों से है जो साहित्य एवं कलात्मक कार्यों तथा अभिनय करने वाले कलाकारों, फोटोग्राफरों, चलचित्रकारों, कम्प्यूटर प्रोग्रामर्स, प्रसारकों आदि के कार्यों से उत्पन्न होते हैं। साहित्यिक सम्पदा अधिकारों को दो प्रमुख वर्गों में विभक्त किया जाता हैकॉपीराइट्स तथा परिवेशी या समीपवर्ती (Neighbouring) अधिकार।

बौद्धिक सम्पदा अधिकारों के संरक्षण का महत्व, औचित्य

(Significance/Rationale of Protection of IPRs) 

बौद्धिक सम्पदा अधिकारों का संरक्षण करना प्रत्येक देश के सामाजिक, आर्थिक, वैज्ञानिक एवं तकनीकी विकास के लिए परमावश्यक है। इनसे देश के अल्पकालीन एवं दीर्घकालीन दोनों ही प्रकार के हितों का पोषण एवं संवर्द्धन होता है। प्रो. माइकेल लेन्केने (Michael lankeney) ने बौद्धिक सम्पदा अधिकारों के संरक्षण के पीछे निम्नांकित कारण बताये हैं जो निम्नानुसार हैं:

  1. घरेलू अर्थव्यवस्था के विकास के लिए।
  2. विदेशी निवेश के प्रोत्साहन के लिए। 
  3. तकनीक के अन्तरण एवं प्रसारण के लिए। 
  4. स्थानीय रोजगार एवं आय में अभिवृद्धि करने के लिए।
  5. राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था का क्षेत्रीय एवं भूमण्डलीय अर्थव्यवस्थाओं के साथ एकीकरण/समन्वयीकरण के लिए।

अन्य कारण –

  1. लोगों को परिवर्तन एवं नवाचार हेतु प्रोत्साहित करने के लिए। 
  2. साहित्य की चोरी की रोकथाम के लिए।
  1. व्यक्तित्व की पहचान बनाने के लिए। 
  2. उद्यमियों के हितों की रक्षा के लिए। 
  3. अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार की सुविधा के लिए। 
  4. आविष्कर्ताओं को अनन्य (Exclusive) अधिकार देने के लिए।

बौद्धिक सम्पदा अधिकारों के क्षेत्र में अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग (International Cooperation in IPRs)  औद्योगिक सम्पदा अधिकारों के संरक्षण के लिए प्रथम अन्तर्राष्ट्रीय संधि/समझौता सन् 1883 में हुआ जिसे ‘पेरिस कन्वेशन फॉर द प्रोटेक्शन ऑफ इण्डस्ट्रिल प्रॉपर्टी’ के नाम से जाना जाता है। यह संधि सन् 1884 में प्रभावी हुई तथा इसे 14 सदस्य देशों ने लागू किया। विश्व बौद्धिक सम्पदा संगठन (WIPO) की स्थापना 14 जुलाई, 1967 को की गई तथा इसे सन् 1970 में प्रभावी बनाया गया था। बौद्धिक सम्पदा अधिकारों के प्रबन्ध में सहयोग हेतु ‘WIPO’ तथा ‘WTO’ में सहयोग समझौता दिसम्बर, 1995 में हुआ था। बौद्धिक सम्पदा अधिकारों के प्रभावी संरक्षण के लिए ‘WTO’ ने ‘TRIPs Agreement’ (Trade Related Intellecctual Properties Agreement) का निर्माण उरूग्वे वातों के दौर (सन् 1986 से 1994 के बीच) में किया गया था। TRIPS Agreement’ में सात प्रकार की बौद्धिक सम्पदाओं के अधिकारों के संरक्षण हेतु न्यूनतम मानक निर्धारित किये गये हैं। बौद्धिक सम्पदा अधिकारों के संरक्षण हेतु अन्तर्राष्टीय सहयोग सनिश्चित करने के लिए निम्नांकित चार स्तरीय व्यवस्थाएँ की गयी हैं-बहुस्तरीय संधियाँ, क्षेत्रीय संधियाँ, क्षेत्रीय व्यापार समझौते तथा द्विपक्षीय ठहराव/समझौते। सन् 2002 में ‘WIPO’ ने ‘एडवाइजरी कमेटी ऑफ एन्वफोर्समैन्ट‘ की स्थापना की। यह समिति औद्योगिक बौद्धिक सम्पदा अधिकारों तथा कॉपीराइट एवं समीपवर्ती/परिवेशी अधिकारों के प्रवर्तन सम्बन्धी अन्तर्राष्ट्रीय मामलों की प्रभारी है। इसके साथ ही ‘WIPO’ ने ‘एन्फोर्समैन्ट एण्ड स्पेशल प्रोजेक्टस डिविजन’ भी स्थापित किया है, जिसका प्रमुख कार्य ‘अन्तर्राष्ट्रीय ब्यूरो’ की प्रवर्तन सम्बन्धी क्रियाओं पर विशेष ध्यान देना है। वर्तमान में ‘WIPO’ 24 संधियों का (जिनमें 3 संधियाँ अन्य अन्तर्राष्ट्रीय संगठनों के साथ मिलकर) प्रशासन करता है। इस हेतु यह अपने सदस्य राष्ट्रों एवं सचिवालय के माध्यम से कई व्यापक कार्यक्रमों का संचालन करता है।

एकस्व या पेटेण्ट अधिनियम

(The Patents Act) 

भारत में 1911 से ही पेटेण्ट्स तथा डिजाइन्स अधिनियम लागू था, किन्तु 1970 में इसके स्थान पर पेटेण्ट अधिनियम लागू किया गया। पेटेण्ट अधिनियम, 1970 भारत में 20 अप्रैल, 1970 से लागू किया गया था। यह अधिनियम सम्पूर्ण भारत पर लागू होता है। इस अधिनियम में सन् 1999, 2002 तथा 2005 में संशोधन किया गया था। पेटेण्ट वह अधिकार है जो सरकार द्वारा उस व्यक्ति को प्रदान किया जाता है जिसने किसी नये तथा उपयोगी उत्पाद का आविष्कार किया है अथवा किसी विद्यमान उत्पाद में कोई सुधार किया है अथवा उत्पादन की किसी नयी प्रक्रिया का आविष्कार किया है। भारत में पेटेण्ट अधिनियम, 1970 के अधीन यह अधिकार पंजीकृत कर प्रदान किया जाता है।

प्रमुख शब्दावली की परिभाषाएँ

(Definitions of Main Terms) 

पेटेण्ट अधिनियम में कुछ शब्द एक विशेष अर्थ में प्रयुक्त किये गये हैं, उनकी परिभाषा निम्नानुसार है:

  1. बुडापेस्ट सन्धि (Budapest Treaty) बुडापेस्ट संधि से तात्पर्य, बुडापेस्ट (शहर) में 28 अप्रैल, 1977 को की गई उस संधि से है जो पेटेण्ट प्रक्रिया के उद्देश्य से सूक्ष्म जीवों की धरोहर को अन्तर्राष्ट्रीय मान्यता प्रदान करने से सम्बन्धित है, जिसे समय-समय पर संशोधित एवं परिवर्तित किया गया हैं।

12005 में जोड़ी गयी धारा 2(1)(aba)] 

  1. अभिसमय प्रार्थना-पत्र (Convention Application) अभिसमय प्रार्थना-पत्र से तात्पर्य उस प्रार्थना-पत्र से है जो किसी पेटेण्ट के लिए धारा 135 के अधीन दिया गया है। 

[धारा 2(1)]l

  1. अभिसमय देश (Convention Country)-अभिसमय देश से तात्पर्य किसी देश से है जो देशों के किसी समह का या देशों के संघ का या किसी अन्तसेरकारी संगठन का पर जिसे धारा 133 के अधीन अभिसमय देश कहा गया है।

12005 में संशोधित धारा 2(1)(d]

  1. अन्तर्राष्ट्रीय आवेदन-पत्र (International Application)-अन्तर्राष्ट्रीय आवेदन से तार आवेदन-पत्र से है जो पेटेण्ट हेतु पेटेण्ट सहयोग विधि के अनुरूप दिया गया है।

धारा 2(1)(ia)]

  1. आविष्कार (Invention)-आविष्कार से तात्पर्य किसी नये उत्पाद या प्रकिया आविष्कारी कदम निहित है तथा जो औद्योगिक उपयोग के योग्य है।

[धारा 2(1)(j)]

वस्तत: आविष्कार किसी नयी वस्तु को प्राप्त करने/खोजने की क्रिया है। यह एवं प्रयोग के द्वारा ऐसी वस्तु को ढूंढ़ने एवं उत्पन्न करने की प्रक्रिया है, जिसकी पडले नहीं होती है या पहले विद्यमान नहीं होती है। आविष्कार एक अवधारणा है, यह मस्तिष्क में समाहित है। यह किसी विद्यामाना वस्त का प्रकटीकरण नहीं है। किन्तु यह उस वस्तु का सृजन है जो पहले कभी विद्यमान ही नही थी।

  1. नया आविष्कार (New Invention)-नये आविष्कार से तात्पर्य किसी भी ऐसे आविष्कार या प्रौद्योगिकी से है जिसका पूर्ण विशिष्ट विवरण के साथ पेटेण्ट आवेदन-पत्र प्रस्तुत करने की तिथि से पूर्व तक-

(i) किसी भी प्रलेख में प्रकाशन द्वारा नहीं किया गया है, अथवा  (ii) देश में कभी भी उपयोग नहीं किया गया है, अथवा  (iii) विश्व में कभी भी उपयोग नहीं हुआ है। [धारा 2(1)(0] दूसरे शब्दों में, नये आविष्कार की विषय-वस्तु सार्वजनिक प्रभाव क्षेत्र नहीं हुई होती है अथवा वर्तमान समय की सर्वोत्तम तकनीक एवं ज्ञान (Art of State) का हिस्सा नहीं होती है।

  1. पेटेण्ट सहयोग संधि (Patent Cooperation Treaty)-पेटेण्ट सहयोग संधि से तात्पर्य उस संधि से है जो 19 जून, 1970 को वाशिगंटन में की गयी है तथा समय-समय पर संशोधित एवं परिवर्तित की गयी है। [धारा 2(1)(oa)] 

पेटेण्ट तथा पेटेण्टधारी

(Patent and Patentee) 

“पेटेण्ट से तात्पर्य इस अधिनियम के अधीन किसी आविष्कार के लिए स्वीकृत या प्रदान किये गये पेटेण्ट से है।”

[धारा 2(1)(m)] 

व्यापक अर्थ में, पेटेण्ट से तात्पर्य उस वैधानिक अधिकार से है जो किसी व्यक्ति को उसके आविष्कार के लिए सरकार द्वारा प्रदान किया जाता है ताकि अन्य लोगों को अनाधिकृत रूप से उस आविष्कार से कुछ भी बनाने, उपयोग करने या बेचने से रोका जा सके। यह उल्लेखनीय है कि पेटेण्ट के अधिकार में पेटेण्टधारी का वह अधिकार भी सम्मिलित है जिसके अधीन वह अन्य लोगों को उस आविष्कार से कोई उत्पाद बनाने, उपयोग करने या बेचने के लिए लाइसेन्स दे सकता है। पेटेण्ट प्रदान करते समय सरकार एक पेटेण्ट-पत्र (Letter of Patent) जारी करती है। प्रत्यक पेटेण्ट-पत्र एक सरकारी एवं औपचारिक प्रलेख है जो आविष्कारक को एक निश्चित अवधि तक अप आविष्कार को बनाने, उपयोग करने या बेचने का अनन्य या अखण्ड अधिकार या विशेषाधिकार प्रदान करता है। पेटेण्टधारी से आशय उस व्यक्ति से है जिसका नाम किसी समय विशेष पर रजिस्टर, किसी पेटेण्ट के स्वामी या हस्तांकिती के रूप में लिखा हुआ है।

[धारा 2 (1)(P)]

अत: पेटेण्टधारी वह व्यक्ति है जिसे पेटेण्ट प्रदान किया गया है। यह शब्द प्रायः ऐसे व्या लिए उपयोग में लाया जाता है जिसे किसी नये आविष्कार के लिए पेटेण्ट-पत्र प्राप्त हुआ है।

किन्हें आविष्कार नहीं माना जाता

(Which are not considered as Inventions) 

पेटेण्ट अधिनियम की धारा 3 के अनुसार निम्नांकित को आविष्कार नहीं माना जाता। परिणामस्वरूप उन्हें पेटेण्ट योग्य नहीं माना जाता है।

  1. जो आविष्कार तुच्छ (Frivolous) प्रकति का है अथवा जो किसी ऐसी बात का दावा करता है जो प्रकृति के नियम के सुस्पष्ट रूप से प्रतिकूल है।

धारा 3(a)] 

  1. वह आविष्कार जिसका प्राथमिक या अभीष्ट उपयोग अथवा व्यापारिक विदोहन सार्वजनिक व्यवस्था या नैतिकता के प्रतिकूल हो सकता है अथवा जो मानव, पशुधन, या वनस्पति या स्वास्थ्य या पर्यावरण पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है।

[धारा 3(b)] 

  1. किसी भी वैज्ञानिक सिद्धान्त की खोज या किसी ठोस सिद्धान्त का सत्रीकरण या प्रकति में होने वाले किसी सजीव या निर्जीव पदार्थ/तत्व की खोज।

[धारा 3c)]

  1. किसी ज्ञात तत्व की नये प्रारूप में खोज जो तत्व की ज्ञात क्षमता में वृद्धि नहीं करती है अथवा किसी ज्ञात तत्व के केवल नये लक्षण या नये उपयोग की खोज या ज्ञात प्रक्रिया, मशीन या उपकरण का उपयोग जब तक कि ऐसी ज्ञात प्रक्रिया से किसी नये उत्पाद का जन्म नहीं होता है अथवा जो कम से कम एक नये अभिकारक (Ractant) का उपयोग नहीं करती है। 

[धारा 3(d)]

  1. केवल मिश्रण से प्राप्त कोई तत्व या पदार्थ के उत्पादन की प्रक्रिया जिसके परिणामस्वरूप केवल उसके घटकों के लक्षणों का समूहीकरण होता है।

[धारा 3(e)] 

  1. किसी ऐसे ज्ञात यन्त्रों को मात्र संजोना या क्रमबद्ध या पुन: क्रमबद्ध करना या उनकी अनुलिपि (Duplication) करना जिनमें से प्रत्येक यन्त्र एक-दूसरे से स्वतन्त्र रूप से ज्ञात तरीके से अपना कार्य करता है।

[धारा 3(1)] 

  1. कृषि या बागवानी की कोई विधि।

[धारा 3(h)] 

  1. मानव जाति के लिए औषधीय, शल्यक्रिया सम्बन्धी, उपचारात्मक, रोगनिरोधी (Phrophylactic), रोग निधानी, चिकित्सीय (Therapeutic) या अन्य प्रकार के उपचार की प्रक्रिया अथवा पशुओं के उपचार की ऐसी ही कोई प्रक्रिया जो उन्हें रोग-मुक्त करती है या उनकी या उनके उत्पादों की आर्थिक उपादेयता बढ़ाती है।

[धारा 3(1)] 

  1. कोई भी वनस्पति तथा पशुधन चाहे पूर्ण हो या उनका कोई भाग जिसमें सूक्ष्म जीवाणु सम्मिलित नहीं हैं किन्तु जिसमें बीज विविधताएँ तथा प्रजातियाँ तथा विशेष रूप से वनस्पति एवं पशुधन के उत्पादन/प्रजनन एवं प्रसार की जीवविज्ञान प्रक्रियाएँ सम्मिलित हैं।

[धारा 3(j)] 

  1. कोई अंकगणितीय या व्यापारिक विधि या स्वभावत: कम्प्यूटर प्रोग्राम अथवा एलगोरिथम्स (Algorithms)।

[धारा 3(k)] 

  1. किसी भी प्रकार का साहित्यिक, नाट्यात्मक, संगीतात्मक या कलात्मक कार्य अथवा अन्य कोई सौन्दर्यपूर्ण सृजन जिसमें चलचित्रकारी कार्य, टेलीविजन प्रसारण कार्यक्रम भी सम्मिलित हैं।

[धारा 3(I)] 

  1. किसी मानसिक क्रिया को निष्पादित करने की योजना, नियमावली या विधि अथवा कोई खेल खेलने की विधि।

[धारा 3(m)] 

  1. सूचनाओं का किसी भी प्रकार का प्रस्तुतीकरण।

[धारा 3(n)] 

  1. इन्टेग्रेटेड सर्किट की कोई स्थल आकृति (Topography)

[धारा 3(0)] 

  1. कोई आविष्कार जो प्रभाव से परम्परागत ज्ञान है अथवा परम्परागत ज्ञात घटक या घटकों का समूहीकरण या अनुलिपिकरण (Aggregation or Duplication) है।

[धारा 3(p)] 

पेटेण्ट के लिए आवेदन-पत्र

(Application for Grant of Patent) 

पेटेण्ट के लिए आवेदन किसी आविष्कार का वास्तविक एवं प्रथम आविष्कारक अथवा उसका हस्तांकिती अथवा उसकी मृत्यु की दशा में उसका वैधानिक प्रतिनिधि कर सकता है। यदि पेटेण्ट के आवेदन-पत्र के साथ अस्थायी विशिष्ट विवरण प्रस्तुत किया गया है तो इस आवेदन पत्र के प्रस्तुत करने की तिथि के 12 माह के भीतर पूर्ण विशिष्ट विवरण प्रस्तुत कर देना चाहिए अन्यथा उस आवेदन-पत्र का परित्याग किया माना जायेगा। पेटेण्ट के लिए प्राप्त आवेदन-पत्र को जनता के लिए सामान्यत: निर्धारित की गई अवधि के भीतर प्रकाशित नहीं किया जायेगा। पेटेण्ट आवेदन-पत्र का प्रकाशन नियन्त्रक द्वारा तब किया जाता है जबकि आवेदक द्वारा अनुरोध किया जाता है। पेटेण्ट हेतु प्राप्त आवेदन-पत्र का परीक्षण आवेदक या किसी हितकारी व्यक्ति के अनरोध या आवेदन पर करवाया जा सकता है। यदि परीक्षण हेतु निर्धारित अवधि में अनुरोध नहीं किया जाता है तो यह माना जायेगा कि आवेदक ने अपने आवेदन-पत्र का परित्याग कर दिया है। कोई भी व्यक्ति नियन्त्रक को कोई पेटेण्ट प्रदान करने के विरोध में धारा 25 के अधीन अपना अभ्यावेदन (Representation) दे सकता है।

पेटेण्ट की अवधि

(Term of Patent) 

पेटेण्ट संशोधन अधिनियम 2000 के लागू होने के बाद प्रदान गये पेटेण्ट की अवधि पेटेण्ट आवेदन प्रस्तुत करने की तिथि से 20 वर्ष की होगी। अन्तर्राष्ट्रीय आवेदन-पत्र के अधीन प्रदान किये गये पेटेण्ट की अवधि भी 20 वर्ष ही होगी। यह अवधि उस तिथि से गिनी जायेगी जो तिथि पेटेण्ट सहयोग संधि के आधीन अन्तर्राष्ट्रीय आवेदन-पत्र प्रस्तुत करने की तिथि है। यदि पेटेण्ट के नवीकरण की फीस के भुगतान के लिए निर्धारित की गई या उसमें वृद्धि की गई तिथि तक नवीकरण फीस का भुगतान नहीं किया जाता है तो पेटेण्ट प्रभावहीन हो जायेगा। पेटेण्ट के प्रभावहीन होने के बाद उसे पुनर्स्थापित कराने हेतु आवेदन पेटेण्टधारी द्वारा अथवा उसके वैधानिक प्रतिनिधि द्वारा अथवा पेटेण्ट के सहस्वामियों में से किसी भी अधिकृत सहस्वामी द्वारा किया जा सकता है। ऐसा आवेदन पेटेण्ट के प्रभावहीन होने के तिथि से 18 माह के भीतर किया जा सकता है। कोई भी पेटेण्टधारी कभी भी निर्धारित प्रारूप में आवेदन कर अपने पेटेण्ट के समर्पण का नोटिस नियन्त्रक को देकर पेटेण्ट का समर्पण कर सकता है।

पेटेण्ट का खण्डन [धारा 64]

(Revocation of Patents) 

यदि पेटेण्ट के खण्डन की याचिका किसी हितधारी या केन्द्रीय सरकार ने प्रस्तुत की है तो अपील बोर्ड पेटेण्ट का खण्डन कर सकता है। यदि ऐसी याचिका पेटेण्ट के उल्लंघन के आरोप के विरोध में की है तो पेटेण्ट का खण्डन उच्च न्यायालय द्वारा किया जा सकता है। अपील बोर्ड या उच्च न्यायालय पेटेण्ट का खण्डन निम्नांकित आधारों पर कर सकता है_ 

  1. जनसामान्य की पूर्व जानकारी या उपयोग-जब किसी दावे में दावाकृत आविष्कार नया नहीं है क्योंकि यह दावे की पूर्वता तिथि से अथवा उस दावे के भारत में अथवा अन्य कहीं भी किसी प्रलेख में प्रकाशित होने की तिथि से पहले से ही जनसामान्य की जानकारी में था अथवा जनसामान्य द्वारा भारत में उपयोग किया जाता था।
  2. स्पष्ट आविष्कार-यदि किसी दावे में दावाकृत आविष्कार स्पष्ट या स्वाभाविक है तथा इसमें कोई आविष्कारी कदम सम्मिलित नहीं है। ऐसा निर्णय इस बात को ध्यान में रखकर किया जायेगा कि उस दावे की पूर्णता तिथि से पूर्व कौन सी बात जनसामान्य की जानकारी में थी या भारत में जनसामान्य द्वारा कौन सी चीज उपयोग में लायी जा रही थी अथवा कौन सी बात भारत में या कहीं अन्यत्र प्रकाशित थी?
  3. अनुपयोगी आविष्कार-यदि पूर्ण विशिष्ट विवरण के दावे में दावाकृत आविष्कार उपयोगी नहीं है।
  4. पर्याप्त एवं न्यायोचित वर्णन का अभाव-कभी-कभी पूर्ण विशिष्ट विवरण में आविष्कार का तथा आविष्कार के क्रियान्वयन की विधि या आविष्कार के क्रियान्वयन के निर्देशों का पर्याप्त एवं न्यायोचित विवरण नहीं होता है। यह वर्णन इतना अपर्याप्त एवं कम होता है कि भारत में औसत स्तर के कौशल एवं ज्ञान वाला व्यक्ति भी आविष्कार का क्रियान्वयन नहीं कर सकता है।
  5. दावे के क्षेत्र की अपर्याप्त एवं अस्पष्ट व्याख्या-यदि किसी दावे के क्षेत्र की स्पष्ट एवं पर्याप्त व्याख्या नहीं की गयी है अथवा यदि कोई दावा विशिष्ट विवरण में प्रकट की गई सामग्री पर आधारित नहीं है।
  6. मिथ्याकथन द्वारा प्राप्त पेटेण्ट-यदि किसी पेटेण्ट को किसी मिथ्यावर्णन या मिथ्याकथन/सुझाव के आधार पर प्राप्त किया गया है।

7.पेटेण्ट योग्य नहीं-यदि किसी पूर्ण विशिष्ट विवरण के दावे की विषय-वस्तु इस अधिनियम के अधीन पेटेण्ट योग्य नहीं है।

  1. गैर-हकदार व्यक्ति को पेटेण्ट प्रदान करना। 
  2. विषय-वस्तु का इस अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार आविष्कारी न होना। 
  3. पेटेण्ट के अव्यवहारिक होने पर।

पेटेण्ट का रजिस्टर, हस्तांकन एवं अपील

(Register, Assignment and Appeal of Patents) 

पेटेण्टों का रजिस्टर केन्द्रीय सरकार के निरीक्षण एवं अधीक्षण में रखा जाता है किन्तु इसका प्रबन्ध एवं नियन्त्रण नियन्त्रक के पास होता है। किसी भी पेटेण्ट या उसके किसी भी हिस्से का हस्तांकन एवं बन्धक या लाइसेन्स या पेटेण्ट में किसी अन्य हित का सजन तब तक वैध नहीं होता जब तक कि वह लिखित में नहीं हो तथा उस लिखित प्रलेख का विधिवत निष्पादन नहीं किया गया हो। नियन्त्रक या केन्द्रीय सरकार के किसी भी निर्णय, आदेश या निर्देश या उनके क्रियान्वयन के लिए नियन्त्रक द्वारा दिये गये किसी भी आदेश के विरूद्ध कोई अपील नहीं की जा सकेगी। नियन्त्रक या केन्द्रीय सरकार के कुछ आदेश जो इस अधिनियम की धारा 117A के अन्तर्गत निर्धारित धाराओं के अधीन दिये गये हैं, उनके विरूद्ध अपील बोर्ड में अपील की जा सकती है। ऐसी अपील उस आदेश की तिथि के तीन माह के भीतर की जा सकेगी। यदि पेटेण्ट रजिस्टर की प्रविष्टियों में मिथ्यावर्णन किया गया है अथवा करवाया गया है तो इसके लिए दोषी व्यक्ति को दो वर्ष तक के कारावास की सजा अथवा जुर्माने अथवा दोनों ही दण्डों से दण्डित किया जा सकेगा। यदि कोई व्यक्ति पेटेण्ट अधिकारों पर अनाधिकृत दावा करता है तो उस व्यक्ति को एक लाख रू. तक के अर्थदण्ड से दण्डित किया जा सकता है।

पेटेण्ट एजेण्ट

(Patent Agent) 

पेटेण्ट एजेण्ट वही व्यक्ति बन सकता है (i) जो भारत का नागरिक हो, (iii) जो कम से कम 21 वर्ष का हो गया हो, (iii) जो मान्यता प्राप्त विश्वविद्यालय से स्नातक हो या केन्द्रीय सरकार द्वारा निर्धारित अन्य योग्यता रखता हो, (iv) जिसने इस हेतु पात्रता परीक्षा पास कर ली हो, जिसे कम से कम 10 वर्षों का परीक्षक या नियन्त्रक अथवा दोनों पदों पर कार्य करने का अनुभव हो, तथा (v) जिसने निर्धारित शुल्क का भुगतान कर दिया हो।


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