Product Concept B.Com Notes – Principles Of Marketing

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वस्तु या उत्पाद का अर्थ

(Meaning of the Product) 

उत्पाद का अर्थ उन दृष्टिगोचर भौतिक और रासायनिक लक्षणों से है जो कि आसानी से पहचान में आने वाली आकृति, आकार, परिमाण आदि में संग्रहीत हों। परन्तु यह उत्पाद का संकीर्ण अर्थ ही है। व्यापक दृष्टिकोण से उत्पाद मूर्त तथा अमूर्त गुणों, लक्षणों से युक्त वह कोई चीज है जिसे ग्राहकों की आवश्यकताओं की सन्तुष्टि के लिए बाजार में विक्रय हेतु प्रस्तुत किया जाता है।

उत्पाद की परिभाषाएँ 

  1. डब्ल्यू. एल्डरसन (W. Alderson) के अनुसार, “उत्पाद उपयोगिताओं का एक पुलिन्दा है। जिसमें उत्पाद के विभिन्न लक्षण और उसके साथ दी जाने वाली सेवाएँ सम्मिलित हैं।”
  2. आर० एस० डावर के अनुसार, “विपणन की दृष्टि से वस्तु को सुविधाओं का पुलिन्दा माना जा सकता है जो उपभोक्ता को प्रस्तुत की जा रही हैं।”
  3. जॉर्ज फिस्क के अनुसार, “वस्तु मनोवैज्ञानिक सन्तुष्टियों का एक पुलिन्दा है।”
निष्कर्ष रूप में, उत्पाद से तात्पर्य किसी भी मूर्त, स्पर्शनीय या दर्शनीय (Tangible) माल तथा अमर्त सेवा, विचार आदि से है जिनको किसी इच्छा या आवश्यकता की सन्तुष्टि हेतु बाजार म प्रस्तावित किया जाता है। कोटलर ने उत्पादों में निम्नांकित दस तत्वों/चीजों को सम्मिलित किया है-1. माल, 2. सेवाएँ 3. अनुभव, 4. घटनाएँ, 5. व्यक्ति, 6. स्थान, 7. सम्पदाएँ, 8. संगठन, 9. सूचनाएँ तथा 10. विचार।

उत्पाद अवधारणा 

(Product Concept) 

‘उत्पाद अवधारणा’ शब्द सबसे पहले थियोडोर लेविट द्वारा प्रयुक्त किया गया था। उनक अनुसार उत्पाद अवधारणा से आशय उपयोगिताओं के योग से है जिसमें विभिन्न उत्पाद विशेषताएँ तथा सेवाएँ सम्मिलित होती हैं। उत्पाद अवधारणा के अग्र तीन आयाम होते हैं
  1. प्रबन्धकीय आयाम-इसमें कुल उत्पाद सम्मिलित होता है जो विपणनकर्ता द्वारा बाजार में सय हेतु प्रस्तुत किया जाता है। एक उत्पाद प्याज जैसा होता है जिसमें कई परतें होती हैं जो सभी उत्पाद की सम्पूर्ण धारणा बनाने में योगदान करती हैं। इसकी महत्त्वपूर्ण परतें निम्नलिखित हैं-(अ) मख्य उत्पाद (Core product) अथवा सेवा जिसके कुछ विशेष लक्षण होते हैं जिसके आधार पर उसकी पहचान होती है; (ब) सम्बन्धित उत्पाद जैसे ब्राण्ड नाम, विशेष पैकिंग, ट्रेडमार्क आदि, (स) प्रतीकात्मक उत्पाद जेसे सुपुर्दगी, स्थापना, मरम्मत, गारण्टी आदि।
  2. उपभोक्ता आयाम-यदि उत्पाद खरीदने से उपभोक्ता की आवश्यकता एवं आशाओं की सन्तष्टि हाती है तो वह उसे पुनः खरीदने का निर्णय लेता है।
  3. सामाजिक आयाम-इसके अन्तर्गत यह माना जाता है कि उत्पाद के क्रय से न केवल तुरन्त सन्तुष्टि प्राप्त होगी, अपितु इससे उपभोक्ता का दीर्घकालीन कल्याण होगा।

उत्पाद वर्गीकरण 

डॉ आर०एस०डाबर ने उत्पादों का वर्गीकरण निम्न प्रकार किया हैं
Product Concept B.Com Notes - Principles Of Marketing
Product Concept B.Com Notes Principles Of Marketing

I. उपभोक्ता उत्पाद (Consumer Products)

ये वे उत्पाद हैं जो अन्तिम उपभोक्ताओं द्वारा प्रयोग किये जाते हैं। इनका उपवर्गीकरण निम्न प्रकार है
  1. सुविधाजनक उत्पाद (Convenient Products)-सुविधा उत्पाद वे हैं जिन्हें उपभोक्ता बार-बार ‘तुरन्त एवं न्यूनतम तुलना करके एवं अपेक्षाकृत बहुत कम क्रय प्रयासों से खरीदता है, जैसे-सिगरेट, साबुन, समाचार-पत्र, दियासलाई, दवाइयाँ आदि। यह उल्लेखनीय है कि ऐसे उत्पाद टिकाऊ नहीं होते और उपभोक्ताओं द्वारा उनका प्रयोग शीघ्रता से किया जाता है।
  2. बिक्रीगत उत्पाद (Shopping Products)-बिक्रीगत या सौदे के उत्पाद वे हाते हैं जिनका चुनाव और क्रय करने से पूर्व उपभोक्ता उपयुक्तता, किस्म, कीमत और शैली आदि आधारों पर विभिन्न निर्माताओं के उत्पादों से तुलनाएँ करता है। इन उत्पादों में फर्नीचर, महिला परिधान एवं जूते, बढ़िया चीनी के बर्तनों के सेट, कीमती साड़ियाँ आदि को सम्मिलित किया जा सकता है।
  3. विशिष्ट उत्पाद (Speciality Products)-विशिष्ट उत्पाद से आशय ऐसे उत्पादों से है जिनमें कुछ ऐसी अद्वितीय विशेषताएँ होती हैं जिनके कारण एक विशिष्ट क्रेता समूह अपनी आदतवश ऐसे उत्पादों के क्रय हेतु विशेष प्रयत्न करने को भी तत्पर रहता है। रेफ्रीजरेटर, कारें, मूल्यवान विद्युत उपकरण, खाने का कीमती सामान, एकत्र किये जाने वाले स्टाम्प एवं सिक्के आदि विशिष्ट उत्पादों के कुछ उदाहरण हैं। 
II. औद्योगिक उत्पाद (Industrial Products) अमेरिकन मार्केटिंग एसोसिएशन की परिभाषा समिति के अनुसार,”औद्योगिक उत्पाद वे हैं जो मुख्यत: अन्य माल (उत्पाद) के उत्पादन में अथवा सेवाएँ प्रदान करने में प्रयोग हेतु बनाये जाते हैं। इनम साज-सामान, संघटक हिस्से, अनुरक्षण, मरम्मत, परिचालन, आपूर्तियाँ कच्चा माल अर्द्ध-निर्मित माल और गढ़ी हुई सामग्रियाँ सम्मिलित हैं।” इस प्रकार ये उत्पाद उपभोक्ताओं के उपभोग हेतु नहीं हात बल्कि कारखानों में उपभोक्ता माल बनाने के काम आते हैं। दूसरे शब्दों में, औद्योगिक उत्पाद अन्तम उपभोक्ताओं द्वारा प्रयोग नहीं किये जाते। अन्तिम उपभोक्ताओं की तुलना में औद्योगिक प्रयोगकर्ताओं के क्रय व्यवहार में काफी एकरूपता देखने को मिलती है। ऐसे उत्पादों के क्रेताओं की संख्या काफी कम होती है। प्रत्येक क्रय बड़ी मात्रा में और अधिक मूल्य का होता है।

उत्पाद का महत्त्व

(Importance of Product) 

उत्पाद के महत्व को निम्नांकित दो वर्गों में विभक्त करके अध्ययन किया जा सकता है I. विपणनकर्ताओं के लिए महत्व विपणनकर्ता के लिए उत्पाद के महत्व को निम्नांकित शीर्षकों से स्पष्ट किया जा सकता है
  1. विपणन का आधार-उत्पाद विपणन का आधार है। बिना उत्पाद के विपणन कार्य सम्भव नहीं है। उत्पाद ही विपणन का आदि एवं अन्त है।
  2. विपणन नीतियों एवं क्रियाओं का केन्द्र बिन्द-उत्पाद ही सभी विपणन नीतियों एवं किया का केन्द्र बिन्द है। उत्पाद ही वह प्रारम्भिक बिन्दु है जहाँ से विपणन नीतियों एवं क्रियाओं को बढ़ाया जाता है। उत्पाद रेखा एवं उत्पाद मिश्रण को ध्यान में रखकर ही मूल्य निर्धारित किया जाता मध्यस्थों की नियुक्ति की जाती है तथा संवर्द्धनात्मक मिश्रण का निर्धारण किया जाता है।
  3. विपणन प्रयासों की सफलता का आधार-यदि विपणनकर्त्ता उत्पाद सम्बन्धी निर्णय बुद्धिमत्ता । करता है तो उसकी विपणन की समस्याओं का स्वतः समाधान हो जाता है। यदि वह उत्पाद सम्बन्धी निर्ण करने में नासमझी करता है तो वह अपनी विपणन समस्याओं को तत्काल कई गुणा बढ़ा लेता है।
  4. संस्था के लाभों का निर्धारक-उत्पाद ही संस्था के लाभों का निर्धारक होता है। अच्छा उत्पाद ग्राहकों को संतुष्ट करता है। परिणामस्वरूप, संस्था का विक्रय बढ़ता है और उससे संस्था के लाभ बढ़ते हैं। विपरीत स्थिति में संस्था के लाभ सीमित ही नहीं रहते बल्कि कभी-कभी तो संस्था को हानि उठानी पड़ जाती है। _
  5. संस्था की सफलता का निर्धारक-एक विद्वान के अनुसार, “उत्पाद सर्वाधिक प्रभावी घटक है जो संस्था की सफलता को निर्धारित करता है।” वास्तव में संस्था की दीर्घकालीन सफलता अच उत्पादों पर ही निर्भर करती है। 
  6. संस्था की ख्याति में वृद्धि-अच्छे उत्पाद संस्था की ख्याति में वृद्धि करने में सहायक होते हैं क्योंकि संतुष्ट ग्राहक संस्था एवं उसके उत्पादों की दूसरों के समक्ष प्रशंसा करते हैं जिससे उनकी ख्याति में वृद्धि होती है। 
II. क्रेता की दृष्टि से महत्त्व_ वस्तु सभी आर्थिक क्रियाओं की केन्द्र-बिन्दु है। यह क्रेता की क्रयशक्ति, उसका जीवन स्तर मानसिक सन्तुष्टि व आवश्यकताओं की पूर्ति को प्रभावित करती है। उत्तम वस्तुओं का चयन एक क्रेता के जीवन को सफल बनाता है तथा वस्तुओं का अभाव उसमें अशान्ति उत्पन्न करता है। जब निर्माता वस्तु की पूर्ति में अवरोध पैदा करते हैं तो सरकार उसकी पूर्ति बनाये रखने के लिए प्रशासनिक नियन्त्रण ला करती है। अत: विपणन प्रबन्धकों का सामाजिक उत्तरदायित्व हो जाता है कि वे वस्तुओं की उचित पूर्ति है न बनाये रखें बल्कि मूल्य भी उचित रखे तथा वस्तु की क्वालिटी में गिरावट न होने दें।

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