B.Com 2nd Year Fundamentals Of Entrepreneurship Short Notes

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B.Com 2nd Year Fundamentals Of Entrepreneurship Short Notes
B.Com 2nd Year Fundamentals Of Entrepreneurship Short Notes

प्रश्न 1 – उद्यमिता विकास कार्यक्रम का अर्थ स्पष्ट कीजिए।

Explain the meaning and definition on Entrepreneurial Development Programme.

उत्तर- उद्यमिता विकास कार्यक्रमअर्थ एवं परिभाषा 

(Entrepreneurial Development Programme : Meaning and Definition)

अर्थ–’उद्यमिता विकास’ शब्द, दो शब्दों से मिलकर बना है-‘उद्यमिता‘ एवं ‘विकास’; जिसका शाब्दिक अर्थ है उद्यमिता की वृत्ति का उत्तरोत्तर विकास‘। इस आधार पर उद्यमिता विकास कार्यक्रम से आशय ऐसे कार्यक्रम या प्रयास से है जिसके द्वारा किसी व्यक्ति में उद्यमिता की वृत्ति का विकास किया जा सके, उसे उद्यमिता का मार्ग अपनाने के लिए प्रेरित किया जा सके तथा उसकी आन्तरिक शक्तियों का विकास किया जा सके ताकि वह एक सफल उद्यमी बन सके। इन कार्यक्रमों द्वारा शिक्षण और प्रशिक्षण प्रदान कर उसकी क्षमताओं को परिमार्जित किया जाता है तथा उसे बौद्धिक, तकनीकी एवं वैचारिक क्षमताओं से युक्त एवं सम्पन्न बनाया जाता है।

परिभाषा-प्रो० उदय पारीक एवं मनोहर नादकर्णी के शब्दों में, “व्यावहारिक दृष्टिकोण से उद्यमिता के विकास से आशय उद्यमियों के विकास तथा साहसिक श्रेणी में व्यक्तियों के प्रवाह को प्रोत्साहित करने से है।”

प्रो० पारीक एवं नादकर्णी के अनुसार, उद्यमियों के विकास से तात्पर्य देश में उद्यमिता की पूर्ति को निर्धारित करने वाले घटकों को प्रभावित करने से है।

संक्षेप में “वह कार्यक्रम, जो उद्यमी को अपना उद्यम लगाने के उद्देश्यों को पूरा करने में इस प्रकार सहायक हो कि उद्यमी अपने सामाजिक कर्त्तव्यों को पूरा कर सके, उद्यमिता विकास कार्यक्रम कहलाता है।

प्रश्न 2 – उद्यमी और विदेशी विनिमय का अर्जन पर टिप्पणी लिखिए।

Examine the role of Entrepreneur in “Foreign Exchange Earning’.

उत्तर- विदेशी विनिमय अर्जन में उद्यमी की भूमिका

(Role of Entrepreneur of Foreign Exchange Earning) 

किसी भी उद्योग की स्थापना और संचालन के लिए पूँजी की आवश्यकता होती है। पूँजी हा उधोग का आधारशिला है। उद्योग के लिए दो प्रकार की पँजी की आवश्यकता होती है भौतिक पूँजी व बौद्धिक पूँजी (मानवीय कौशल पँजी)। माल, मशीन, भूमि, भवन व फर्नीचर आदि भातिक पूंजी के उदाहरण हैं, जबकि ग्राहक-सम्पर्क, व्यावसायिक प्रतिष्ठा, मानव मस्तिष्क तथा बुद्धि-कौशल बौद्धिक पूँजी के उदाहरण हैं।

नियोत मूल्य को आयात मूल्य से अधिक करके विदेशी विनिमय का अर्जन किया जा सकता है। उद्यमी निम्न प्रकार से विदेशी मुद्रा का अर्जन कर सकते हैं

(1) ऐसी वस्तुओं व सेवाओं का उत्पादन बढ़ाकर जिनका निर्यात हो सकता है। 

(2) आयात प्रतिस्थापन की सूची में आने वाली वस्तुओं का देश में ही निर्माण करके। 

(3) विदेशी पूँजी, तकनीक व प्रौद्योगिकी का आयात कम करके। 

(4) विदेशी कच्चे माल व श्रम पर निर्भरता कम करके। 

प्रश्न 3 – निर्णयन क्या है

What is Decision-making ?

उत्तर – प्रशासन द्वारा निर्धारित योजनाओं के कार्यान्वयन के लिए प्रबन्धकों को अनेक महत्त्वपूर्ण निर्णय लेने पड़ते हैं। यह उनका सर्वप्रथम कार्य है। व्यवसाय में प्रारम्भ से लेकर अन्त तक अनेक कार्यों के सम्बन्ध में निरन्तर निर्णय लेने की आवश्यकता होती है। प्रवर्तकों को किसी नए उद्योग की स्थापना के समय व्यवसाय के नाम, स्थान, प्रकृति, उद्देश्य आदि के सम्बन्ध में निर्णय लेने होते हैं जबकि व्यवसाय के संचालन हेतु पूँजी, उत्पादन, क्रय-विक्रय, कर्मचारियों की भर्ती आदि के सम्बन्ध में अनेक निर्णय लिए जाते हैं। अत: स्पष्ट है कि किसी कार्य के सम्बन्ध में उपलब्ध अनेक विकल्पों में से सर्वश्रेष्ठ विकल्प का चयन करना ही निर्णयन है।

निर्णयन की परिभाषाएँ

(Definitions of Decision-making) 

प्रबन्ध विज्ञान के प्रमुख विद्वानों ने निर्णयन को निम्नवत् परिभाषित किया है

(1) आर० एस० डावर के अनुसार, “निर्णय लेना एक ऐसा चनाव केली अधिक सम्भावित विकल्पों में से किसी एक व्यवहार के विकल्प लेने से आशय काट देना’ अथवा व्यावहारिक रूप से ‘किसी निष्कर्ष पर आना’ से है।

(2) जॉर्ज आर० टेरी के अनुसार, “निर्णयन किसी कसौटी पर आधारित अधिक सम्भावित विकल्पों में से एक का चुनाव है।”

उपर्युक्त परिभाषाओं के अध्ययन के आधार पर निर्णय प्रकार दी जा सकता है- निर्णयन किसी कार्य को करने के विभिन्न विकल्पों में से किसी एक सर्वश्रेष्ठ विकल्प का चयन करना है।

प्रश्न 4-उद्यमिता विकास कार्यक्रमों के आर्थिक आयामों का विवेचन कीजिए। 

Examine the economic dimensions of EDPs. 

उत्तर- उद्यमिता विकास कार्यक्रम के आर्थिक आयाम

(Economic Dimensions of EDPs) 

उद्यमिता विकास कार्यक्रम के आर्थिक आयाम निम्नलिखित हैं-

(1) नवीन उद्यमियों की आर्थिक क्रियाओं से राष्ट्र की सकल उत्पादन क्षमता बढ़ती है । और राष्ट्रीय आय तथा प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि होती है।

(2) इन कार्यक्रमों से स्वरोजगार को प्रोत्साहन मिलता है, जिससे बेरोजगारी की दर और मात्रा कम होती है।

(3) उद्यमियों की आर्थिक क्रियाओं के माध्यम से विभिन्न प्रकार के कर-आगम में वृद्धि होती है।

(4) इन नवप्रवर्तित उद्यमियों के नवीन उत्पादन से उपभोक्ताओं को पहले से अधिक वस्तुएँ एवं सेवाएँ उपभोग के लिए उपलब्ध होती हैं। ।

(5) पूँजी निर्माण की दर बढ़ जाती है। 

(6) विपणन एवं वितरण की दशाओं में सुधार होता है। 

(7) कुल मिलाकर आर्थिक समृद्धि बढ़ती है। 

प्रश्न 5-उद्यमिता विकास कार्यक्रमों की विशेषताएँ बताइए। 

Explain the characteristics of EDPs. 

उत्तर- उद्यमिता विकास कार्यक्रमों की विशेषताएँ

(Characteristics of EDPs) 

उद्यमिता विकास कार्यक्रमों की विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-

(1) उद्यमिता विकास कार्यक्रम, व्यक्ति में उद्यमिता की इच्छा उत्पन्न करते हैं। 

(2) ये कार्यक्रम नए व्यवसाय के प्रवर्तन का मार्ग प्रशस्त करते हैं। 

(3) ये कार्यक्रम लाभार्थियों को उद्यमी बनने की प्रेरणा देते हैं। 

(4) ये कार्यक्रम लाभार्थियों की क्षमताओं का मूल्यांकन कर उन्हें परिमार्जित करते हैं।

(5) ये कार्यक्रम उद्यमी को उत्प्रेरित करते हैं तथा व्यक्ति के उद्यमिता व्यवहार को गतिशील बनाते हैं।

(6) ये कार्यक्रम लघु एवं कुटीर उद्योगों को प्रोत्साहित करते हैं। 

(7) ये कार्यक्रम स्वरोजगार को प्रोत्साहन देते हैं।

(8) ये कार्यक्रम व्यक्ति को नव-उद्यमी में और नव-उद्यमी को सफल उद्यमी में परिवर्तित करने का प्रयास करते हैं।

(9) ये कार्यक्रम मानव संसाधन विकास के महत्त्वपूर्ण उपकरण हैं।

Distinguish between ‘Innovation’ and ‘Invention’. 

उत्तर – नवप्रवर्तन और आविष्कार

(Innovation and Invention

आविष्कार एवं नवप्रवर्तन दो पूर्णतया भिन्न पक्ष हैं। आविष्कार से वैज्ञानिक और प्रोद्योगिक समस्या का समाधान होता है, जबकि नवप्रवर्तन आर्थिक-सामाजिक व्यवस्था में नए उत्पादन एवं तकनीकी को समाविष्ट कराने की सामाजिक-प्रबन्धकीय प्रक्रिया है। सर्वविदित है कि सभी आविष्कारक अच्छे नवप्रवर्तक नहीं होते हैं। हेनरी फोर्ड इसका उदाहरण है-उसने किसी नई वस्तु का आविष्कार नहीं किया बल्कि दूसरों की युक्तियों का अध्ययन करके अपने ऑटोमोबाइल उद्योग में समायोजित कर दिया। इस तकनीक में कुछ भी नया नहीं था, परन्तु फोर्ड एक नवप्रवर्तक और उद्यमी था। दूसरे थॉमस एडीसन आविष्कारक था। वह एक बार दिवालिया हुआ, विपत्ति में जीवित रहा, परन्तु जिन्दगी भर धन नहीं कमा सका क्योंकि वह न तो नवप्रवर्तक था और न ही उद्यमी। ऐसा ही उदाहरण येस्टर केरिसन भौतिकशास्त्री का है जिन्होंने अपने ज्ञान के आधार पर सन् 1930 में फोटो कॉपी उपकरण का आविष्कार किया, परन्तु वह सामाजिक उपयोग में तब आया जब सन् 1960 में जी०सी० विल्सन के नेतृत्व में एक रचनात्मक समूह के प्रयासों के फलस्वरूप जीरॉक्स कॉपी के रूप में क्रान्तिकारी परिवर्तन आया। एक उद्यमी सतत् नए विचारों की खोज करता है तथा अनिश्चितता का सामना करता है। इसमें कल्पनाशक्ति, अन्तर्ज्ञान तथा जोखिम वहन करने की योग्यता सम्मिलित है।

प्रश्न 7 – सेज (SEZ) का क्या आशय है

What is meant by SEZ? 

उत्तर – सेज का आशय (Meaning of SEZ)

SEZ ‘सेज’ का अर्थ ‘आर्थिक रूप से विशिष्ट आर्थिक क्षेत्र’ (Special Economic Zone) है। साधारणतया इसे आधुनिक आर्थिक क्षेत्र भी कहा जाता है। उदारीकरण के इस युग में विभिन्न देशों में ऐसे विशिष्ट आर्थिक क्षेत्रों का गठन किया गया है। ऐसे देश जिनकी सीमाएं आपस में मिली हुई हैं, उनके लिए यह अत्यन्त लाभप्रद हैं। ‘सेज’ का मुख्य उद्देश्य व्यापार में वृद्धि, निवेश में वृद्धि, रोजगार सृजन और प्रभावशील प्रशासन देना है।

प्रश्न 8 – उद्यमिता की परिभाषा दीजिए। 

Define Entrepreneurship.

उत्तर –अर्थव्यवस्था में उद्यमिता वह है जो अर्थव्यवस्था में नवीनता लाती है; जैसे-उत्पादन में किसी नई विधि को अपनाना जिसे पहले किसी ने नहीं अपनाया. किसी ऐसी वस्तु का उत्पादन करना जिससे उपभोक्ता पहले से परिचित न हो, कच्चे माल के नए साधनों का उपयोग करना और बाजारों की खोज करना इत्यादि।”

प्रश्न 9 -” उद्यमी जन्म से होते हैं, बनाए नहीं जाते।टिप्पणी कीजिए। 

“Entrepreneurs are born not made.” Comment. 

उत्तर – उद्यमी जन्मजात होते हैं

(Entrepreneurs are Born) 

मारवाड़ी, सिन्धी, पंजाबी आदि उद्यमीय गुणों से युक्त मानी जाने वाली जातियाँ हैं। यह स्वीकार करना कठिन नहीं है कि इन जातियों में जन्म लेने वाले व्यक्तियों को व्यावसायिक वातावरण को जानने व समझने के अपेक्षाकृत अधिक अवसर मिलते हैं। जो भी हो यह सिद्ध किया जा चुका है कि उद्यमी की उत्पत्ति जाति एवं क्षेत्र के प्रभाव से मुक्त होती है। उद्यमीय गुणों से युक्त कोई भी व्यक्ति उद्यमी बन जाता है।

उद्यमी की कुछ महत्त्वपूर्ण विशेषताएँ मनोवैज्ञानिक होती हैं जिनको प्रशिक्षण से प्रभावित किया जा सकता है। प्रशिक्षण में जिस प्रकार प्रभावित करने का प्रयास किया जाता है सम्भवतः पारम्परिक उद्यमीय समुदाय व परिवार के अन्दर उसी प्रकार का प्रभाव बच्चों एवं युवाओं के समाजीकरण की प्रक्रिया में पड़ता है। दूसरे शब्दों में व्यक्तिपरक विशेषताएँ उस आवश्यक स्तर तक उभरती हैं कि वे विशिष्ट व्यवहार की उत्पत्ति करती हैं जिसे उद्यमीय व्यवहार कहा जाता है। इसकी अभिव्यक्ति उद्यम आरम्भ व स्थापित करते समय होती है।

कुछ लोगों ने उद्यमीय विकास की प्रक्रिया को अधिक सरल बताते हुए कहा है कि उद्यमियों का निर्माण किया जा सकता है निश्चय ही इस अवधारणा ने उद्यमिता विकास को हानि पहुँचाई है।

उपर्युक्त गलत अवधारणाओं ने किसी भी समाज में उद्यमिता विकास के मार्ग में अड़चनें डाली हैं। चूँकि उद्यमिता विकास प्रक्रिया में उद्यमी मूल तत्त्व है। अत: इनसे जुड़ी भ्रान्तियाँ अन्य पहलुओं जैसे सुविधाओं, आदि को एक करने में समस्याएँ उत्पन्न करती हैं और यह उद्यमियों के उचित भाव से प्रतिपादन में भी समस्याएँ उत्पन्न करती हैं। यह प्रमाणित है कि उद्यमी समान में धनात्मक पहचान चाहते हैं। अतः उन्हें स्वयं को मात्र व्यापारी या पूँजीपति के रूप में समझा जाना पसन्द नहीं होता। उद्यमी मर्यादा एवं प्रतिष्ठा को बनाए रखने के लिए यह आवश्यक है कि उद्यमिता विकास में संलग्न लोग उद्यमी को वैसा ही समझें जैसा कि वह है।

प्रश्न 10 – उद्यमशील वर्ग के सामाजिक लाभ क्या हैं

What are the Social Advantages of Entrepreneurship ? 

उत्तर-उद्यमशील वर्ग (उद्यमिता) के प्रमुख सामाजिक लाभ निम्नवत् हैं

(1) यह आर्थिक विकास की गति में तेजी लाता है। 

(2) यह उत्पादकता में वृद्धि करता है। 

(3) यह नए उत्पाद, सेवा एवं टेक्नोलॉजी का सृजन करता है। 

(4) यह प्रतिस्पर्धा में सुधार लाता है तथा परिवर्तन का मार्ग प्रशस्त करता है।

 प्रश्न 11 – PERT और CPM क्या है

What is PERT and CPM ?

उत्तर – PERT का पूरा नाम, ‘Programme Evaluation and Review Technique’ है। यह परियोजनाओं के नियन्त्रण एवं नियोजन के लिए प्रबन्ध की सर्वाधिक प्रचलित तकनीक है।

प्रश्न 12 – नवप्रवर्तक उद्यमी से क्या आशय है

What is meant by Innovative Entrepreneur ?

उत्तर – जब उद्यमी किसी नवीन बात (जैसे-नई वस्तु, उत्पादन को नई विधि, नई संगठन संरचना, नया बाजार आदि) का प्रतिपादन या प्रयोग करता है, तब वह ‘नवप्रवर्तक उधमा कहलाता है। ये उद्यमी आवश्यक सचनाएँ एवं तथ्य एकत्रित करके प्रत्येक नवीन बात का प्रयोग द्वारा परीक्षण करते हैं। शम्पीटर के अनुसार, “नवप्रवर्तक उद्यमी भी नए आविष्कार का क्रियान्वित करने, उत्पादन के तरीकों में सधार करने या उनमें क्रान्ति लाने का कार्य करते हैं।”

प्रश्न 13 – उद्यमी की विशेषताएँ बताइए। 

Give the characteristic features of an Entrepreneur. 

उत्तर – उद्यमी की विशेषताएँ 

(Characteristic Features of an Entrepreneur) 

उद्यमी की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

(1) उद्यमी ही समाज में नवप्रवर्तन करते हैं। 

(2) उद्यमी सामान्य जोखिम (Moderate Risk) लेना पसन्द करते हैं।

(3) उद्यमी ही किसी उपक्रम की स्थापना के लिए भूमि, पूँजी, श्रम जैसे आवश्यक साधनों की व्यवस्था करता है।

(4) उद्यमी उच्च प्राप्तियों में विश्वास रखते हैं। 

(5) उद्यमी अवसरवादी होते हैं। 

(6) उद्यमी स्वतन्त्र जीवन व्यतीत करना पसन्द करते हैं। 

(7) उद्यमी जीवन के प्रति व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाते हैं। 

(8) बड़े उपक्रमों में उद्यमी एवं प्रबन्धक अलग-अलग होते हैं। 

(9) उद्यमी समाज को नई दिशा प्रदान करते हैं। 

(10) प्राय: उद्यमी ही जोखिम उठाने वाला व्यक्ति होता है। 

प्रश्न 14 – परियोजना मूल्यांकन का क्या अर्थ है?

What is meaning of Project Appraisal ? 

आर्थिक क्षमता, वित्तीय जीव्यता

उत्तर – परियोजना मूल्यांकन से आशय “किसी परियोजना की तकनीकी व्यवहार्यता आर्थिक क्षमता, वित्तीय जीव्यता (viability) तथा उसके सफल संचालन के भयक प्रबन्धकीय योग्यता का निधारण करने के लिए किए जाने वाले विस्तृत

है।” यह उद्यमी द्वारा प्रस्तावित उद्यम योजना की सुदृढ़ता एवं सम्भाव्य सफलता के सम्बन्ध में निर्णय लेने की प्रक्रिया है।

प्रश्न 15 – विपणन युक्ति क्या है

What is the Marketing Strategy?

उत्तर – विपणन युक्ति यह बताती है कि जोखिम भरा कार्य कैसे पूरा किया जाए। यह उद्यम को मंडी के लक्ष्य की ओर केन्द्रित करती है तथा कमी को दूर करके उपयुक्त स्थान बनाती है। भली-भाँति कथित विपणन योजना आशातीत परिणामों, संसाधनों के आवंटन (allocation), विपणन की जिम्मेदारियों और उद्यमी को नियन्त्रित करने के तरीकों का मार्गदर्शन करती है।

प्रश्न 16 – एक उद्यमी के सामाजिक उत्तरदायित्व क्या हैं

What are social responsibility of an entrepreneur ?

उत्तर प्रत्येक आर्थिक क्रिया में सरकारी हस्तक्षेप का उद्देश्य ‘जनहित’ अथवा ‘सामाजिक कल्याण’ (Social Welfare) में अभिवृद्धि करना होता है। यद्यपि व्यवहार में व्यवसाय से समाज की आकांक्षाओं का परिवर्तित होता स्वरूप, परिवर्तित होती प्राथमिकताएँ तथा स्वयं समाज में होने वाले लगातार परिवर्तनों से ‘जनहित’ का अर्थ बदलता रहता है, तथापि व्यवसाय समाज को व्यापक रूप से प्रभावित करता है।

सामान्यत: व्यवसाय के सामाजिक उत्तरदायित्व के अन्तर्गत वे सभी कार्य आते हैं जो एक व्यवसायी अथवा व्यावसायिक संस्थान द्वारा समाज के विभिन्न वर्गों से अपना सम्बन्ध निरन्तर बनाए रखने हेतु आवश्यक होते हैं। समाज के विभिन्न वर्गों के हितों को ध्यान में रखते हुए व्यवसाय का कुशलतापूर्वक संचालन करते रहना ही व्यवसायी या व्यवसाय का सामाजिक उत्तरदायित्व होता है। एच० आर० बोवेन के अनुसार, “एक व्यवसायी का यह दायित्व होता है कि वह ऐसी नीतियों का अनुसरण करे, ऐसे निर्णय ले अथवा ऐसी क्रियाएँ करे जो समाज के मूल्य एवं उद्देश्यों के अनुरूप हों।”

प्रश्न 17 – अवसरों के विश्लेषण से क्या आशय है

What is meant by Opportunities Analysis ? 

उत्तर- अवसरों के विश्लेषण से आशय

(Meaning of Opportunities Analysis) 

अवसरों के विश्लेषण से आशय परियोजना के विचार के गुण-दोषों, जोखिम-बाधाओं, संशोधनों एवं सीमाओं के विस्तृत मूल्यांकन से है। किसी भी उद्यम को मूर्त रूप देने से पूर्व उद्यमी नए-नए विचारों, नए अवसरों, नई खोजों एवं नई अवधारणाओं की पहचान करके विभिन्न विषयों के बारे में विस्तृत जानकारी प्राप्त करता है; जैसे-उपक्रम के निर्माण में क्या-क्या बाधाएँ एवं रुकावटें आ सकती हैं, उसमें जोखिम की मात्रा कितनी है, बाजार का स्वरूप कैसा है, संसाधनों (वित्तीय एवं भौतिक) का एकत्रण कहाँ से और कैसे होगा, तकनीकी ज्ञान कहाँ से उपलब्ध होगा, इस हेतु सरकार की नीति क्या है, उपक्रम की स्थापना किस स्थान पर लाभप्रद रहेगी व उपक्रम का आकार कैसा होगा आदि।

प्रश्न 18 – एफ०डी०आई० (FDI) क्या है

What is FDI ?

उत्तर – एफ०डी०आई० का पूरा नाम ‘प्रत्यक्ष विदेशी निवेश’ (Foreign Direct Investment) है। इसका अभिप्राय है कि कोई विदेशी संस्था अथवा व्यक्ति किसी दूसरे देश में अपनी पूँजी से उत्पादन इकाई स्थापित कर सकता है।

प्रश्न 19 – उद्यमिता विकास कार्यक्रम के उद्देश्य पर टिप्पणी लिखिए। 

Write short note on objectives of Entrepreneurship Developme Programmes. 

उत्तर – उद्यमिता विकास कार्यक्रमों के उद्देश्य

(Objectives of EDPs) 

उद्यमिता विकास कार्यक्रमों के प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित हैं

(1) प्रथम पीढ़ी के उद्योगपतियों का निर्माण करना। 

(2) नौकरी करने के स्थान पर व्यक्तियों को स्वरोजगार के लिए प्रेरित करना। 

(3) कार्य कैसे करना है, इसके लिए उन्हें समुचित जानकारी देकर प्रशिक्षित करना।

(4) लाभार्थियों को कच्चा माल, श्रम, तकनीक एवं प्रौद्योगिकी आदि उपलब्ध संसाधनों की सूचना उपलब्ध कराना।

(5) सम्पर्क क्षेत्र में उपलब्ध कच्चे माल, श्रम, तकनीक आदि संसाधनों के माध्यम से लघु एवं कुटीर उद्योग-धन्धों की स्थापना हेतु प्रेरणा देना।

(6) भविष्य में व्यापार-संचालन के मार्ग में आ सकने वाली समस्याओं से उन्हें परिचित कराना तथा उन समस्याओं से कैसे निपटा जाए इसकी जानकारी प्रदान करना जिससे कि भविष्य में समस्याओं का सामना होने पर उद्यमी उनका निदान एवं निराकरण करने में सफल हो सकें।

(7) उद्यमियों के मन में उत्पन्न शंकाओं का निराकरण करना।

(8) जनकल्याण की योजनाओं की समुचित जानकारी उपलब्ध कराना तथा सरकारी योजनाओं का उपयोग किस प्रकार किया जाए, इसकी व्यापक जानकारी उपलब्ध कराना।

(9) उद्यमियों को उत्पादित माल के विक्रय-क्षेत्र अर्थात् बाजारों की जानकारी प्रदान करना।

(10) प्रतिस्पर्धा के इस युग में उद्यमियों को माल बेचने के कौशल सिखाना। 

प्रश्न 20 – साहस (वेंचर) पूँजी तथा बीज पूँजी को संक्षेप में स्पष्ट कीजिए। 

Explain in short Venture Capital and Seed Capital. 

उत्तर – साहस पूँजी से आशय

(Meaning of Venture Capital) 

साहस पँजी कम्पनी भारत में एक नवीन अवधारणा है जिसे टेक्नोलॉजी विकास व उन्नयन हेतु उच्च जोखिमयुक्त उद्यमियों की वित्तीय आवश्यकताओं की पर्ति के लिए बनाया गया है। साहस पूँजी दो शब्दों का योग है-साहस गया हा साहस पूजा पारावा का बाग ह-साहस (Venture) एवं पँजी (Capital)। ‘साहस’ (Venture) से आशय किसी कार्यवाही (a course of proceeding) सह जिसका परिणाम अनिश्चित होता है, लेकिन जिसमें हानि के खतरे की जोखिम समाहित रहती है। ‘पूँजी’ (Capital) स आशय उपक्रम प्रारम्भ करने के लिए संसाधनों से है। इस प्रकार, साहस पूंजी से आशय उपक्रम के उन संसाधनों (पॅूजी) से है जिनमें जोखिम तथा साहसिकता (risk and adventure) समाहित है। अन्य शब्दों में, नए व्यावसायिक उपक्रम को प्रारम्भ से (from scratch) कोष उपलब्ध कराने की वित्तीय क्रिया को साहस पूँजी

कहा जाता है। इस परिभाषा में सभी उच्च जोखिमें तथा उच्च सम्भावित विनियोग सम्मिलित हैं। एक नई कम्पनी को प्रारम्भिक अवस्था में वेंचर कैपिटल उपलब्ध करायी जाती है जो तेजी से आगे बढ़ना चाहती है।

वास्तव में, वेंचर कैपिटल को ऐसी सृजनात्मक पूँजी (creative capital) की संज्ञा दी जा सकती है, जिसके द्वारा आर्थिक क्रियाओं के निष्पादन की आशा की जाती है, जो अन्य विनियोग वाहनों (investment vehicles) से भिन्न हैं तथा जो विस्तार पूँजी (expansion capital) की तरह कार्य करती है।

बीज पूँजी से आशय

(Meaning of Seed Capital) 

परियोजना विकास की प्रारम्भिक अवस्थाओं में साहस पूँजीपति (venture capitalist) एक विचार को व्यावसायिक रूप में परिणत करने हेतु बीज पूँजी (seed capital) उपलब्ध कराता है। इस अवस्था में गहराई से अनुसंधान किया जाता है जिसमें एक या अधिक वर्ष का समय लग जाता है।

प्रश्न 21 – ‘उद्यमी उद्योगरूपी जहाज का कप्तान है।स्पष्ट कीजिए। 

“The entrepreneur is the captain of the enterprise ship” Explain. 

उत्तर – उद्यमी-उद्योग का कप्तान

(Entrepreneur : Captain of Industry) 

उद्यमी अपने क्रियाकलापों तथा रचनात्मक भूमिका द्वारा जटिल सामाजिक-आर्थिक समस्याओं के निवारण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है तथा बेहतर समाज एवं राष्ट्र के निर्माण में ‘कप्तान’ की तरह कार्य करता है। प्रसिद्ध अर्थशास्त्री मार्शल के अनुसार, उद्यमी उद्योग का कप्तान होता है क्योंकि वह जोखिम एवं अनिश्चितता का वाहक ही नहीं वरन् एक प्रबन्धक, भविष्यद्रष्टा, नवीन उत्पादन-विधियों का आविष्कारक तथा देश के आर्थिक ढाँचे का निर्माता भी होता है। अपने लाभों को अधिकतम करने के लिए एक ओर वह उद्योग की आन्तरिक व्यवस्था पर पूरी निगाह रखता है तो दूसरी ओर अपने प्रतिद्वन्द्वी की गतिविधियों पर भी पूरा ध्यान रखता है।

प्रश्न 22 – पेस्ट का अभिप्राय क्या है

What is PEST ? 

उत्तर – पेस्ट का आशय

(Meaning of PEST) 

किसी संस्था या विभाग के बाहरी वातावरण की जाँच PEST विश्लेषण द्वारा की जा सकती है। बाह्य तत्त्व प्राय: संस्था के नियन्त्रण के बाहर होते हैं एवं कभी-कभी संस्था के लिए चुनौतियाँ प्रस्तुत करते हैं। PEST का अर्थ है

P = Political Factors 

E = Economic Factors 

S = Sociocultural Factors 

T = Technological Factors.

प्रश्न 23 – भारत में उद्यम जोखिम पँजी के स्रोत पर एक टिप्पणी लिखिए। 

Write a short note on sources of venture capital. 

उत्तर – भारत में उद्यम जोखिम पूजी के स्रोत

(Sources of Venture Capital in India) 

भारत में जोखिम पँजी प्रदाता कम्पनियों की शुरुआत 20वीं शताब्दी के अन्त में हर्ड परन्तु अल्पकाल में ही भारत में इन कम्पनियों ने अपनी जड़ें जमा ली और उद्यमिता विकास एवं

न म उद्योगों को अपेक्षित वित्तीय सहायता प्रदान कर उन्हें संबल प्रदान किया। इस समय भारत के वित्त बाजार में जोखिम पूँजी प्रदाता प्रमुख संस्थाएँ निम्नांकित हैं 

(1) एस० बी० आई० कैपिटल मार्केट लिमिटेड 

(2) इण्डियन इन्वेस्टमेण्ट फण्ड बाई ग्रीन्डलेज बैंक 

(3) क्रेडिट कैपिटल वेन्चर फण्ड (CCVF) 

(4) टेक्नोलॉजी डेवलेपमेण्ट एण्ड इन्फॉर्मेशन कम्पनी ऑफ इण्डिया (TDICID

(आई०सी०आई०सी०आई द्वारा प्रवर्तित) 

(5) दि रिस्क कैपिटल एण्ड टेक्नोलॉजी फाइनेन्स कॉर्पोरेशन (RCTC)

(आई०एफ०सी०आई०आई० द्वारा प्रवर्तित) 

(6) आई०एफ०बी० वेन्चर कैपिटल फाइनेन्स लिमिटेड 

(7) वेन्चर कैपिटल डिवीजन ऑफ आई०डी०बी०आई० 

(8) सिडबी वेन्चर कैपिटल स्कीम 

(9) ट्वेण्टियथ सेन्चुरी वेन्चर कैपिटल फण्ड 

(10) इण्डस वेन्चर कैपिटल फण्ड 

(11) लाइन्स फाइनेन्स

(12) आन्ध्र प्रदेश इण्डस्ट्रियल डेवलेपमेण्ट कॉर्पोरेशन 

(13) केन बैंक फाइनेन्सियल सर्विस 

(14) गुजरात वेन्चर फाइनेन्स लिमिटेड (GVFL) 

(15) इन्फ्रास्ट्रक्चर लीजिंग एण्ड फाइनेन्सियल सर्विसेज कम्पनी लिमिटेड। 

प्रश्न 24 – उद्यमी और प्रबन्धक के मध्य अन्तर स्पष्ट कीजिए। 

Distinguish between entrepreneur and manager.

उत्तर – प्रायः उद्यमी और प्रबन्धक दोनों शब्दों को एक-दसरे के पर्यायवाची के रूप में समान आशय वाले शब्द मान लिया जाता है। वास्तव में, ये दोनों शब्द दो अलग-अलग आशय रखने वाली दो सर्वथा पृथक् आर्थिक अवधारणाएँ हैं। परिभाषा के माध्यम से इन दोना के अन्तर को स्पष्ट किया जा सकता है

उद्यमी – उद्यमी एक ऐसा व्यक्ति है जो व्यवसाय के लिए अनसन्धान करता है, नाति तैयार करता है और उसमें होने वाले जोखिम को उठाने की सामर्थ्य रखता है। इस रूप में उद्यमा व्यवसाय निवेश और कुशल नीतियों व तकनीक के द्वारा अधिकतम लाभ प्राप्त करते हुए सामाजिक उद्देश्यों की प्राप्ति करता है।

प्रबन्धक – यह व्यावसायिक संस्था का अधिकार प्राप्त कर्मचारी होता है। यह किसी प्रकार की योजना या नीति नहीं बनाता बल्कि उद्यमी द्वारा प्रस्तुत की गयी नीतियों को क्रियान्वित करने का कार्य करता है। यह अपने कुशल नेतृत्व व समन्वय क्षमता द्वारा संस्था के कर्मचारियों को समन्वित करते हुए उन्हें संस्था के उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए प्रेरित करता है।

प्रश्न 25 – बाहरी व्यावसायिक परिवेश क्या है

What is External Business environment ? 

उत्तर – बाह्य व्यावसायिक (वातावरण) परिवेश

(External Business Environment) 

व्यावसायिक पर्यावरण का एक ऐसा भी पक्ष है जो उद्यमी के नियन्त्रण में नहीं है। ऐसे पर्यावरण को बाह्य पर्यावरण (External Environment) कहा जाता है। इसे दो उपवर्गों में बाँटा जाता है-(1) व्यवसाय का व्यष्टि पर्यावरण (Micro-environment of Business) तथा (2) व्यवसाय का समष्टि पर्यावरण (Macro-environment of Business)।

1. व्यष्टि-पर्यावरण (Micro-environment)-इसके अन्तर्गत व्यावसायिक उद्यम के निकटतम वातावरण के उन सभी कारकों को सम्मिलित किया जाता है जो ग्राहकों की सेवा करने में इसकी योग्यता को प्रभावित कर सकते हैं। ऐसे प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं-

(i) ग्राहक (Customers)-व्यावसायिक उद्यम का उद्देश्य लाभ उपार्जन करना होता है। इसके लिए उसे उत्पादित वस्तु (वस्तुओं) को बेचना होता है। अत: उद्यमी का एक प्रमुख कार्य ग्राहकों को आकृष्ट करना होता है। अल्पाधिकारी फर्मों के अनेक उद्देश्यों में से एक उद्देश्य बिक्री को अधिकतम करना (Sales maximization) हो सकता है। व्यावसायिक उद्यम के ग्राहक अलग-अलग प्रकार के होते हैं, जैसे-व्यक्ति, थोक विक्रेता, खुदरा विक्रेता, निवेशकर्ता, लोक संस्थाएँ, विदेशी ग्राहक आदि। ग्राहक एक हो सकता है। जैसे-सरकार या कुछ या अनेक। उद्यमी केवल ग्राहकों की संख्या बढ़ाने पर ध्यान नहीं देता है बल्कि इस बात की भी कोशिश करता है कि वे उद्यम के साथ स्थिर रूप से जुड़े रहें।

(ii) प्रतिस्पर्धा (Competitions)-किसी भी व्यवसाय में अनेक फर्मे अर्थात् उत्पादन करने वाली इकाइयाँ होती हैं। ऐसी फर्मो के मध्य अनेक प्रकार की प्रतियोगिताएँ होती हैं। बाजार की संरचना (market structure) के अनुसार एक उद्योग में अनेक फर्ने हो सकती है या कुछ या सिर्फ एक। इनके द्वारा उत्पादित वस्तु की सभी इकाइयाँ एकसमान (homogeneous) हो सकती हैं या इनमें विभेद (Production differentiation) भी हो सकता है। विभिन्न स्थितियों में प्रतिस्पर्धा का रूप भिन्न-भिन्न होगा। यह प्रतिस्पर्धा प्रजातिगत (generic) हो सकती है या ब्रांड (brand) को लेकर भी। इस तरह अनेक प्रकार की प्रतियोगिताओं का सामना व्यावसायिक उद्यमों को करना पड़ता है जो किसी एक फर्म के नियन्त्रण में नहीं हैं।

(iii) पूर्तिकर्ता (Suppliers)-व्यावसायिक उद्यमियों का कार्य है इनपुट को उत्पत्ति में बदलना। इसलिए यह आवश्यक है कि उन्हें सभी प्रकार के इनपुट्स (inputs) नियमित रूप से तथा उचित कीमतों पर प्राप्त होते रहें। इनपुट्स के पूर्तिकर्ता के लापरवाहीपूर्ण, अविचारित व्यवहार से बचने के लिए ऊर्ध्व एकीकरण (Vertical Integration) की नीति अपनायी जाती है।

(iv) मार्केटिंग चैनल Marketine Channels)-प्रत्येक फर्म को ऐसे मध्यस्थों (middlemen) की जरूरत होती है जो इसके द्वारा उत्पादित वस्तुओं को बेचने में सहायता कर। ऐसे मध्यस्थ एजेण्ट या व्यापारी हो सकते हैं। ये लोग कम्पनी को अपने उत्पाद सही बाजार म बेचने में सहायता करते हैं। इसके लिए विज्ञापन, रेडियो, टी०वी०, सलाहकार फर्मों की भी सहायता ली जा सकती है।

(V) पब्लिक (Public)-पब्लिक या जनता से तात्पर्य एक ऐसे ग्रुप से है जो उद्धार का सफलता में अपना हित देखता है या जिसके कार्यों का प्रभाव उद्यम की कार्यवाही पर पड़ता है। एसे ग्रुप के अन्तर्गत साधारण जनता. ग्राहक संगठन, स्थानीय लोग, सरकार वित्तीय संस्थाएँ, उद्यम में कार्यरत कर्मचारी, मीडिया के लोग आदि को सम्मिलित किया जा सकता है।

कुछ लेखक मानते हैं कि व्यष्टि पर्यावरण को निर्धारित करने वाले कारक ऐसे हैं जिन पर उद्यमी का कमोबेश नियन्त्रण हो सकता है। इसलिए वे इन कारकों की चर्चा बाह्य पर्यावरण से अलग रूप में करते हैं तथा व्यावसायिक पर्यावरण को प्रभावित करने वाले कारकों को आन्तरिक तथा बाह्य में विभाजित न करके व्यष्टि तथा समष्टि में बाँटते हैं।

2.समष्टि-पर्यावरण (Macro-environment)-इस पर्यावरण में उन कारकों की विवेचना की जाती है जो किसी एक व्यवसाय के नियन्त्रण में नहीं हैं। ये कारक दो प्रकार के होते हैं

(क) आर्थिक (Economic) तथा (ख) अनार्थिक (Non-economic)। 

(क) आर्थिक कारकों में निम्नलिखित सम्मिलित हैं

(i) जनसंख्या-सम्बन्धी पर्यावरण, (ii) आर्थिक पर्यावरण, (iii) तकनीकी पर्यावरण तथा (iv) अन्तर्राष्ट्रीय पर्यावरण।

(ख) अनार्थिक कारक इस प्रकार हैं

(i) सामाजिक-सांस्कृतिक परिदृश्य, (ii) राजनीतिक व कानूनी पर्यावरण तथा (iii) भौतिक पर्यावरण।

प्रश्न 27 – उद्यमी किस प्रकार आर्थिक विकास में सहायक होता है

How is an Entrepreneur helpful in Economic Development ? 

उत्तर – उद्यमी निम्न प्रकार से आर्थिक विकास में सहायक होता है

(1) वह उपलब्ध संसाधनों का इष्टतम उपयोग करता है। 

(2) वह पूँजी व पूँजी निर्माण की दर में वृद्धि करता है। 

(3) वह अन्तर्राष्ट्रीय संस्थाओं से ऋण सुलभ कराता है। 

(4) वह रोजगार के नए-नए अवसर सृजित करता है। 

(5) वह आर्थिक व सामाजिक समानता स्थापित करने में सहायक होता है। 

(6) वह शिक्षा एवं प्रशिक्षण सुविधाओं का विस्तार करता है। 

(7) बचत, पूँजी निर्यात व निवेश में वृद्धि करके वह आर्थिक विकास की गति को तेज करता है। 

(8) वह आर्थिक एवं सामाजिक अवसंरचना का निर्माण करता है। 

(9) वह देश की अर्थव्यवस्था को आर्थिक कुचक्रों के जाल से बाहर निकालता है। 

(10) वह विभिन्न क्षेत्रों के विकास में समन्वय स्थापित करता है। 

प्रश्न 28 – SWOT विश्लेषण से क्या आशय है

What is meant by SWOT Analysis ?

उत्तर – SWOT शब्द का निर्माण अंग्रेजी भाषा के चार शब्दों से हुआ है। इनका अर्थ है

S = Strength (शक्तियाँ, क्षमताएँ, ताकतें) 

W = Weaknesses (दुर्बलताएँ, कमजोरियाँ) 

0 = Opportunities (अवसर, मौका) 

T = Threats (धमकी, समस्याएँ, चुनौतियाँ)

SWOT विश्लेषण के द्वारा उद्यमी अपनी विद्यमान शक्तियों एवं कमजोरियों का अवसरों एवं धमकियों के अनुरूप व्यवहार करते हुए, प्रभावी व्यूह-रचना का निर्माण कर सकता है। एक प्रभावी व्यह-रचना वह है. जिसमें एक उद्यमी अपनी शक्तियों को मद्देनजर रखते हुए अवसरों का पूरा फायदा उठाने तथा दोषों एवं चुनौतियों को समाप्त या न्यनतम कसरी

सफल होता है।

प्रश्न 29 – नेतृत्व से आप क्या समझते हैं

What do you mean by Leadership ? 

उत्तर – नेतत्वअर्थ एवं परिभाषा ___

(Leadership : Meaning and Definition) “नेतृत्व से आशय व्यक्तियों के अभिप्रेरण (Motivation) से है।” नेतृत्व का सामान्य अर्थ किसी व्यक्ति विशेष के ऐसे गणों से है जिसके द्वारा वह समूह के उद्देश्यों एवं प्रयत्नों को एकता प्रदान करता है, सदस्यों को प्रेरणा देता है तथा उनका सफल मार्गदर्शन करता है। अच्छे नेतृत्व के कारण श्रमिकों में आत्मविश्वास की भावना जाग्रत होती है तथा उनका कार्यानुराग (Morale) विकसित होता है।

इस प्रकार नेतृत्व एक कला है, जो किसी व्यक्ति-विशेष के गुणों का परिणाम है तथा जिसके द्वारा दूसरे व्यक्तियों का मार्गदर्शन एवं उनकी क्रियाओं का संचालन किया जाता है।

नेतृत्व की महत्त्वपूर्ण परिभाषाएँ निम्नलिखित हैं

(1) लिविंग्स्टन के अनुसार, “नेतृत्व प्रबन्ध का एक आन्तरिक तन्त्र तथा प्रणाली एवं नियन्त्रण एक बाह्य तन्त्र है।”

(2) बर्नार्ड के अनुसार, “नेतृत्व से आशय व्यक्ति के व्यवहार के उस गुण से है, जिसके द्वारा वह अन्य लोगों को संगठित प्रयास से सम्बन्धित कार्य करने हेतु मार्गदर्शन करता है।”

(3) कुण्ट्ज ओडोनेल के अनुसार, “किसी लक्ष्य की प्राप्ति हेतु सन्देशवाहन के माध्यम द्वारा व्यक्तियों को प्रभावित कर सकने की योग्यता नेतृत्व कहलाती है।”

(4) एल्फोर्ड तथा बीटी के अनुसार, “नेतृत्व वह गुण है जिसके द्वारा अनुयायियों के एक समूह से वांछित कार्य स्वेच्छापूर्वक एवं बिना किसी दबाव के कराए जाते हैं।”

(5) ऑर्डवे टीड के अनुसार, “नेतृत्व गुणों का वह संयोजन है जिसके होने से कोई भा अन्य से कुछ कराने के योग्य होता है क्योंकि मुख्यत: उसके प्रभाव द्वारा वे ऐसा करने को तत्पर हो जाते हैं।”

प्रश्न 30 – ‘उद्यमी जोखिम वहन करता है।पर सूक्ष्म टिप्पणी लिखिए। 

Write a note on ‘Initiation and Risk taking by Entrepreneur.

उत्तर – उद्यमी का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण कार्य व्यावसायिक क्रियाओं के प्रारम्भ करने म पहल करना तथा व्यावसायिक क्रियाआ म आनश्चितताओं के चलते व्यावसायिक क्रियाओं का जोखिम उठाना है। यह जोखिम स्वयं की पूँजी एवं शक्ति के विनियोजन से उत्पन्न होती है।

प्रश्न 32 – विदेशी मुद्रा आय क्या है

What is Foreign exchange earning ? 

उत्तर – विदेशी मुद्रा आय

(Foreign exchange earning) 

किसी भी उद्योग की स्थापना और संचालन के लिए पूँजी की आवश्यकता होती है। पूँजी ही उद्योग की आधारिशला है। उद्योग के लिए दो प्रकार की पूँजी की आवश्यकता होती हैभौतिक पूँजी व बौद्धिक पूँजी (मानवीय कौशल पूँजी)। माल, मशीन, भूमि, भवन व फर्नीचर आदि भौतिक पूँजी के उदाहरण हैं, जबकि ग्राहक-सम्पर्क, व्यावसायिक प्रतिष्ठा, मानव मस्तिष्क तथा बुद्धि-कौशल बौद्धिक पूँजी के उदाहरण हैं।

निर्यात मूल्य को आयात मूल्य से अधिक करके विदेशी विनिमय का अर्जन किया जा सकता है। उद्यमी निम्न प्रकार से विदेशी मुद्रा का अर्जन कर सकते हैं

(1) ऐसी वस्तुओं व सेवाओं का उत्पादन बढ़ाकर जिनका निर्यात हो सकता है। 

(2) आयात प्रतिस्थापन की सूची में आने वाली वस्तुओं का देश में ही निर्माण करके। 

(3) विदेशी पूँजी, तकनीक व प्रौद्योगिकी का आयात कम करके। 

(4) विदेशी कच्चे माल व श्रम पर निर्भरता कम करके।

प्रश्न 33 – निर्यात वृद्धि के लिए सुझाव दीजिए। 

Give suggestions for Export Promotion. 

उत्तर – निर्यात वृद्धि के लिए सुझाव

(Suggestions for Export Promotion) 

निर्यात वृद्धि (संवर्द्धन) के लिए निम्नलिखित सझाव दिए जा सकत है।

(1) प्रतिस्पद्धात्मक शक्ति बढ़ाने के लिए उत्पादन लागत घटाई जाए। 

(2) उत्पादन पद्धति में सुधार किया जाए तथा श्रमिकों की उत्पादकता बढ़ाई जाए। 

(3) कृषि उत्पादन तथा व्यापार सुविधाओं में वृद्धि की जाए। 

(4) निर्यात वस्तुओं की किस्म में सुधार किया जाए। 

(5) निर्यात प्रोत्साहन के लिए सकारात्मक प्रेरणाएँ दी जाएँ। 

(6) निर्यात वस्तुओं के उत्पादकों व निर्यातकों को वित्तीय सुविधाएँ प्रदान की जाएँ। 

(7) व्यापार समझौते के लाभों को प्राप्त करने के लिए भरपूर प्रयत्न किए जाएँ। 

(8) पर्याप्त मात्रा में विदेशों में अपनी वस्तुओं का प्रचार एवं प्रसार किया जाए। 

(9) विदेशी बाजारों का गहन एवं व्यापक सर्वेक्षण किया जाए। 

(10) भारतीय माल की कीमतों को अन्तर्राष्ट्रीय प्रतिस्पर्धात्मक स्तरों के समरूप रखा जाए।

(11) केन्द्र तथा राज्य सरकारों द्वारा स्थापित विभागों में उचित एवं प्रभावपूर्ण समन्वय स्थापित किया जाए।

(12) देश में निर्यात विकास कोष की स्थापना की जाए। 

(13) निर्यात गृहों तथा अन्तर्राष्ट्रीय व्यापारिक केन्द्रों की स्थापना में सहायता दी जाए। 

(14) बन्दरगाहों का सुधार एवं अभिनवीकरण किया जाए। 

(15) व्यापार विपणन हेतु प्रशिक्षण दिया जाए। 

प्रश्न 34 – स्टेप विश्लेषण क्या है

What is STEP Analysis ? 

उत्तर – STEP विश्लेषण (STEP Analysis)

STEP विश्लेषण का सम्बन्ध बाह्य व्यावसायिक वातावरण से है। इसके अन्तर्गत उन जामख्य तत्त्वों को शामिल किया जाता है, जिनके अन्तर्गत व्यावसायिक संस्था को अपना कार्य करना होता है। महत्त्वपूर्ण यह है कि ये सभी तत्त्व अनियन्त्रणीय माने जाते हैं क्योंकि इन पर व्यावसायिक संस्था का कोई नियन्त्रण नहीं होता। कोई भी संस्था इनमें कोई भी परिवर्तन नहीं कर सकती। प्रत्येक संस्था को इन तत्त्वों को दी हुई परिस्थितियाँ मानकर स्वीकार करना होता है और इनके अनुरूप ही अपनी नीतियाँ एवं कार्यक्रम तैयार करने होते है।

प्रश्न 35 – प्रमुख एवं गौण निर्णय से क्या आशय है

What is meant by Major and Minor Decisions ? 

उत्तर – यदि प्रबन्ध अधिकारियों द्वारा किसी महत्त्वपूर्ण मामले के सम्बन्ध में निर्णय जाता है तो इस प्रकार के निर्णय को ‘प्रमुख निर्णय’ कहते हैं: जैसे-किसी उद्योग के लिए विशाल भूमि, प्लाण्ट या संयन्त्र क्रय करने के सम्बन्ध में निर्णय। इसके विपरीत, जब व्यवसाय के सामान्य मामलों पर निर्णय लिया जाता है; जैसे-कार्यालय के लिए पेन, स्टेशनरी आदि खरीदना तो यह ‘गौण निर्णय’ कहलाता है।

प्रश्न 36 – निर्णय लेने में क्रियात्मक अनुसन्धान की क्या उपयोगिता है

What is the utility of Operation Research in Decision-making ?

उत्तर – क्रियात्मक अनुसन्धान (Operation Research) की नवीनतम तकनीकों ने व्यावसायिक समस्याओं के परिमाणात्मक अध्ययन द्वारा विभिन्न समस्याओं के सम्बन्ध में निर्णय लेने में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है। क्रियात्मक अनुसन्धान के अन्तर्गत सम्भावित सिद्धान्त, क्यू लगाने अथवा लाइन में प्रतीक्षा करने का सिद्धान्त, खेलों का सिद्धान्त (Theory of Games), मूल्य सिद्धान्त और उपकरणों का प्रयोग किया जाता है। इनकी सहायता से प्रबन्ध श्रेष्ठ तथा सही निर्णय लेने में सफल होता है।

प्रश्न 37 – जोखिम के आर्थिक कारण लिखिए। 

Write economic causes of Risk. 

उत्तर – जोखिम के आर्थिक कारण निम्नलिखित हैं

(1) माँग के ढाँचे में परिवर्तन, 

(2) मूल्यों में उच्चावचन, 

(3) माँग सम्बन्धी पूर्वानुमानों का गलत हो जाना, 

(4) सामाजिक फैशन एवं ग्राहकों की रुचि में परिवर्तन हो जाना, 

(5) ग्राहकों की क्रय-शक्ति में कमी हो जाना, 

(6) बाजार में प्रतियोगिता का बढ़ना, 

(7) अच्छी किस्म की वस्तुओं का बाजार में आ जाना तथा 

(8) उत्पादन तकनीक में परिवर्तन हो जाना।

प्रश्न 38 – व्यावसायिक प्रबन्ध में नियोजन का महत्त्व बताइए। Give the importance of Planning in Business Management. 

उत्तर – व्यावसायिक प्रबन्ध में नियोजन का महत्त्व

(Importance of Planning in Business Management)

कोई भी प्रबन्ध बिना निश्चित योजना के सफलता प्राप्त नहीं कर सकता है। वास्तव में, नियोजन किसी व्यवसाय अथवा उपक्रम का मार्गदर्शन करता है। यह मार्ग में आने वाली कठिनाइयों को दूर करने में सहायक होता है। व्यावसायिक प्रबन्ध में नियोजन का महत्त्व निम्नलिखित बातों से स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है

1. नियोजन भविष्य की अनिश्चितता तथा परिवर्तन के कारण आवश्यक है 

(Planning is necessary due to Changes and Uncertainties of Future)— 

भविष्य अनिश्चित है तथा परिवर्तन प्रकृति की परम्परा है, अत: निरन्तर बदलती परिस्थितियों में नियोजन, उद्योग की प्रगति का सुन्दर उपाय है।

2. नियोजन व्यय में कमी करता है (Planning reduces Expenditure)

नियोजन के अन्तर्गत कार्य करने की सर्वश्रेष्ठ विधि अपनायी जाती है, जिसके कारण न्यनतम लागत व्यय पर अधिकतम उत्पादन सम्भव हो जाता है।

3. नियोजन व्यवसाय के लक्ष्यों पर ध्यान केन्द्रित करता है (Planning Centres on Objectives of Business)—

नियोजन की दशा में सब विभागों की क्रियाएँ भी संस्था के मुख्य लक्ष्य को प्राप्त करने की दिशा में मोड़ दी जाती हैं, जिसके फलस्वरूप साधनों का सर्वश्रेष्ठ उपयोग सम्भव होता है।

4. नियोजन प्रबन्ध के लिए आवश्यक है (Planning is necessary for sement)-प्रबन्ध के कई प्रकार्य हैं. परन्त नियोजन करना प्रबन्ध का मुख्य कार्य है। कोई भी बिना समुचित नियोजन के संगठन, संचालन, अभिप्रेरण तथा समन्वय की कल्पना भी नहीं कर सकता। नियोजन के द्वारा प्रबन्ध

विभिन्न क्रियाओं का समुचित पथ-प्रदर्शन तथा नियन्त्रण कर सकता है। 

5. नियोजन प्रबन्धकीय नियन्त्रण के लिए आवश्यक है- (Planning is           necessary for Management Control) किसी भी व्यवसाय में नियन्त्रण के लिए नियोजन बहुत सहायक होता है। बजट में पूर्वानुमान द्धारा विभिन्न लक्ष्य ऑकड़ों में निर्धारित किए जाते हैं।

6. नियोजन द्वारा संगठन की कार्यकशलता में वृद्धि होती है (Planning enhances the Efficiency of Organization) – नियोजन से कार्य शीघ्रता से होते हैं. कागजा कार्यवाही कम होती है और कार्य का निष्पादन उचित समय से प्रभावी ढंग से सम्भव होता है।

7. प्रबन्धकीय क्षमता में वृद्धि होती है (Planning Enhances the Efficiency of Management)-नियोजन द्वारा प्रबन्धक उपक्रम के प्रत्येक कार्य को सही दिशा प्रदान कर सकते हैं, कर्मचारियों को सही निर्देश दे सकते हैं तथा प्रभावी ढंग से लक्ष्यों की प्राप्ति कर सकते हैं। इससे प्रबन्धकीय क्षमता में वृद्धि होती है।

प्रश्न 39 – सामाजिक स्थिरता एवं सन्तुलित क्षेत्रीय विकास में उद्यमियों की भूमिका का उल्लेख कीजिए।

Discuss the role of entrepreneurs in bringing about social stability and balanced regional development. 

उत्तर – सामाजिक स्थायित्व लाने में उद्यमी की भमिका

(Role of Entrepreneur in bringing Social Stability) सामाजिक स्थायित्व से आशय सामाजिक उथल-पुथल के न होने से है। वास्तव में समाज ऐसे व्यक्तियों का समूह है जो सामाजिक मूल्यों के प्रति सकारात्मक एवं रचनात्मक भाव रखते हैं। इसके विपरीत, ऐसे लोग, जो सामाजिक मूल्यों के प्रति नकारात्मक रुख अपनाते हैं “समाज विरोधी’ कहलाते हैं। ये तत्त्व अपनी नकारात्मक सोच के कारण समाज में अस्थिरता उत्पन्न करते हैं और अशान्ति व अस्थिरता में ही आनन्द लेते हैं।

एक पुरानी कहावत है कि ‘खाली दिमाग शैतान का घर होता है’ (Empty mind is a Anil’s workshop)। खाली आदमी स्वयं भी दुःखी रहता है और दसरों को भी दःखी रखता है उद्यमी इन खाली लोगों को रोजगार देने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। वह नए-नए उद्योगों की स्थापना करक इन लागा का रोजगार दे सकता है और ऐसे लोगों को व्यस्त रख सकता है जिनके पास करने के लिए कोई काम नहीं है। वह ऐसे लोगों को रोजगार देकर उनके लिए समद्धि का मार्ग प्रशस्त कर सकता है, उन्हें गलत दिशा से हटाकर सही दिशा की ओर मोड़ कर समाज में फैली अशान्ति व अस्थिरता को नियन्त्रित कर सकता हैं।

सन्तुलित क्षेत्रीय विकास में उद्यमियों की भूमिका 

(Role of Entrepreneurs in balanced Regional Development)

उद्यमी वे व्यक्ति होते हैं जिनको इस बात का पूरा-पूरा अनुमान रहता है कि कौन-सी वस्तु का बाजार अच्छा है, किस वस्तु का उत्पादन किस क्षेत्र में किया जाए तथा उसे अधिकतम लाभ पर कहाँ बेचा जाए।

प्रकृति ने समस्त प्राकृतिक उपादानों का इस प्रकार समायोजन किया है कि कहीं एक संसाधन बहुतायत में है तो दूसरे स्थल पर दूसरे संसाधन में अधिकता है। प्रत्येक क्षेत्र में भिन्न प्रकार के प्राकृतिक, आर्थिक एवं भौतिक संसाधन पाए जाते हैं। उद्यमी अपने-अपने क्षेत्र के विशिष्ट संसाधनों का उपयोग कर आर्थिक क्रिया में संलग्न रहते हैं तथा अपने क्षेत्र में उपलब्ध कच्चे माल, श्रम, शक्ति, जल आदि संसाधनों का उपयोग कर वस्तु एवं सेवाओं का उत्पादन व वितरण करते हैं। प्रकृति में विविधता है, परन्तु उद्यमी उस विविधता का मूल्यांकन कर अपनी बौद्धिक क्षमता, पूँजीगत स्रोत और तकनीक के आधार पर समृद्धि के मार्ग खोलते हैं। इससे क्षेत्रीय असन्तुलन कम होता है और उद्योगों का एकसमान विकास होता है।

प्रश्न 40 – निर्णय के विविध प्रकार बताइए। 

Give the various types of Decision. 

उत्तर – निर्णय के विविध प्रकार

(Various Types of Decision) 

निर्णय के विविध प्रकार निम्नलिखित हैं

1. नीति सम्बन्धी निर्णय (Policy Decisions)-नीति सम्बन्धी निर्णय किसी व्यवसाय अथवा उपक्रम की स्थापना के साथ ही प्रारम्भ हो जाते हैं। प्रवर्तकगण व्यवसाय के स्वरूप, कम्पनी के संचालक मण्डल, सदस्यता तथा मुख्य अधिकारियों, पूँजी की मात्रा व प्रारूप, उत्पादन की मात्रा तथा क्रय-विक्रय और कर्मचारी नीति आदि के सम्बन्ध में महत्त्वपूर्ण निर्णय लेते हैं। इन निर्णयों को ‘नीति सम्बन्धी निर्णय’ कहते हैं।

2. प्रशासनिक निर्णय (Administrative Decisions)-नीति सम्बन्धी निर्णयों को कार्यरूप देने के लिए प्रशासनिक निर्णय लिए जाते हैं।

3. प्रबन्धात्मक या तदर्थ निर्णय (Executive or Ad hoc Decisions)प्रशासनिक निर्णयों को वास्तविक रूप देने अथवा सम्पादित करने के लिए प्रबन्धात्मक निर्णय लेने पड़ते हैं। प्रबन्ध अधिकारी विभिन्न विभागों के अधीन आने वाले विविध मामलों के लिए दिन-प्रतिदिन निर्णय लेते हैं।

4. प्रमुख एवं गौण निर्णय (Major and Minor Decisions)-यदि प्रबन्ध अधिकारियों द्वारा किसी महत्त्वपूर्ण मामलों के सम्बन्ध में निर्णय लिया जाता है तो इस प्रकार के निर्णय को ‘प्रमुख निर्णय’ कहते हैं; जैसे—किसी उद्योग के लिए विशाल भूमि, प्लाण्ट या संयन्त्र का क्रय करने के सम्बन्ध में निर्णय। इसके विपरीत, जब व्यवसाय के सामान्य मामलों पर निर्णय लिया जाता है; जैसे-कार्यालय के लिए पैन, स्टेशनरी आदि खरीदना; तो इसे ‘गौण निर्णय’ कहते हैं।

5. नैत्यक या महत्त्वपूर्ण निर्णय (Routine or Strategic Decisions – प्रबन्ध द्धारा लिए गए निर्णय दैनिक तथा यान्त्रिक स्वभाव के व सामान्य होते हैं। जो निर्णय व्यवसाय के काय-सचालन के लिये लिए जाते हैं, उन्हें ‘नैत्यक निर्णय’ कहते हैं। 

6. संस्था सम्बन्धी तथा व्यक्तिगत निर्णय (Organizational and Ferso Decisions)-यदि कम्पनी या उद्योग के प्रबन्ध अधिकारी औपचारिक रूप स सगठन में स्थिति के अनुसार निर्णय लेते हैं तो ऐसे निर्णय ‘संस्था सम्बन्धी निर्णय कह ‘व्यक्तिगत निर्णय’ वे निर्णय हैं जो प्रबन्धक स्वयं के सम्बन्ध में लेते हैं।

7. बालू निर्णय (Operating Decisions)-कम्पनी के सामान्य मामलों से सम्बन्धित निर्णय ‘चालू निर्णय’ कहलाते हैं। इनको सामान्य या ‘साधारण निर्णय’ भी कहते हैं।

प्रश्न 41 – रोजगार सृजन में उद्यमी की भूमिका लिखिए। 

Write role of entrepreneur in employment generation. 

उत्तर – रोजगार के अवसरों में वृद्धि करने के लिए उद्यमी का योगदान निम्नवत् रहता है

1. विशाल उद्यमों का विकास (Growth of Large Enterprises)-वर्तमान समय में कई उद्यमी मिलकर एक बड़े उद्यम का संचालन करते हैं। ऐसे विशाल उद्यम आर्थिक विकास में सहायक होने के साथ रोजगार के लिए अवसर भी सुलभ कराते हैं।

2. नए उपक्रमों की स्थापना (Establishment of New Enterprises)आपसी प्रतिस्पर्धा होने के कारण उद्यमी सदैव नई उद्यमशीलता की खोज व प्राप्ति के लिए उत्सक रहते हैं। इसी क्रम में वे नए-नए उपक्रमों की स्थापना करते हैं जो रोजगार सुलभ कराने का माध्यम बन जाता है।

3. नए बाजारों की खोज (Search for New Markets)-उद्यमी अपने उद्यम के निवार के लिए सदैव नए बाजारों की खोज में रहता है। नए बाजारों में अपने उत्पाद की खपत के लिए वह अन्य उद्यमियों के सम्पर्क में आता है एवं उन्हें अपने उपक्रम के विस्तार करने के लिए व्यवसाय उपलब्ध कराता है जिससे अन्य उद्यम भी आगे रोजगार का प्रकार नए बाजारों की खोज व निर्माण सतत रूप से होता रहता है।

4. औधोगिक बस्तियों की स्थापना (Establishment of Industrial Estates)- औधोगिक बस्तियाँ उद्योगों की स्थापना का एक सुनियोजित मार्ग हैं। किसी क्षेत्र सामहिक रूप से विभिन्न प्रकार के उद्योगों की स्थापना की जाती है तो उद्यमियों को कर की सविधाएँ; जैसे विद्युत, सड़कें, परिवहन, बैंक आदि इन्हीं औद्योगिक बस्तियों में उपलब्ध हो जाती हैं, इसके कारण अनेक लोगों को रोजगार प्राप्त होता हैं।

5. नवप्रवर्तनकर्ता (Innovator)-उद्यमी एक नवप्रवर्तक भी होता है। वह अपनी शीलता द्वारा नई-नई वस्तुओं का सृजन करता है एवं उनमें उपयोगिता के गुण को विकसित कर उनकी खपत नए बाजारों में करता है। इससे रोजगार के नए अवसर उत्पन्न होते है।

6. एक संस्था के रूप में (As An Institution)-एक उद्यमी स्वयं में एक संस्था ही होता है क्योंकि उसके कारण समाज में विभिन्न संस्थाओं का जन्म होता है। आज विकासशील देशों में अनेक संस्थाएँ उद्यमी के रूप में कार्य कर रही हैं। इन संस्थाओं में अनेक लोगों को रोजगार मिला हुआ है।

7.प्रबन्धक उद्यमी (Managerial Entrepreneur)-छोटे व्यवसायों में प्रबन्धक का कार्य उद्यमी स्वयं कर लेता है, किन्तु वर्तमान समय में बड़े-बड़े व्यवसायों में उद्यम के प्रत्येक विभाग के लिए प्रबन्धक अलग-अलग होते हैं। इन व्यवसायों में प्रबन्धकों, तकनीशियनों व विशेषज्ञों को रोजगार के अवसर सुलभ होते हैं।

प्रश्न 42 – निर्णयन प्रक्रिया के प्रमुख चरण क्या हैं

What are the basic stages of process of Decision-making ? 

उत्तर – निर्णयन प्रक्रिया के प्रमुख चरण निम्नलिखित हैं

(1) समस्या या अवसर की पहचान एवं विश्लेषण। 

(2) सूचनाएँ एकत्रित करना। 

(3) विकल्पों का विकास। 

(4) सम्भावित विकल्पों का मूल्यांकन। 

(5) सर्वोत्तम विकल्प का चयन। 

(6) निर्णय को क्रियान्वित करना। 

(7) निर्णय का अनुसरण करना।


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