B.Com 2nd Year Industrial Disputes Act Short Notes

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लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1- औद्योगिक/विवाद संघर्ष की परिभाषा दीजिए। 

Define Industrial Disputes.

उत्तर – औद्योगिक विवाद (Industrial Dispute)-औद्योगिक विवाद का अभिप्राय नियोक्ताओं के बीच या नियोक्ताओं और श्रमिकों के बीच किसी झगड़े या मतभेद से है जो किसी भी व्यक्ति की नियुक्ति, सेवा समाप्ति या रोजगार की शर्तों अथवा श्रम की दशाओं से सम्बन्धित हो।

उपर्युक्त परिभाषा के अनुसार, औद्योगिक संघर्ष एक श्रमिक व उसके नियोजन बीच अथवा अनेक श्रमिकों या नियोक्ताओं के बीच हो सकता है। विभिन्न प्रकार औद्योगिक संस्थानों के नियोक्ताओं के बीच तथा स्वयं श्रमिक के बीच होने वाले विवाद औद्योगिक संघर्ष की श्रेणी में ही आते हैं।

विवाद वास्तविक होना चाहिए। इसका सम्बन्ध श्रमिक के रोजगार, रोजगार समाति रोजगार की शर्तो रोजगार की दशाओं आदि से होना चाहिए। विवाद से सम्बन्धित पक्षकार का विवादग्रस्त मामलों में सारवान हित होना भी आवश्यक है। इसके अभाव में विवाद वास्तविक विवाद नहीं कहलाएगा। स्टैण्डर्ड वेक्यूम रिफाइनिंग कं० ऑफ इण्डिया लि. बनाम श्रमिकों के मामले में दिए गए निर्णय में औद्योगिक विवाद के लक्षण बताए गए हैं।

प्रश्न 2 – कार्य देने में असमर्थता से क्या आशय है? इसके क्या कारण हैं? 

What is lay-off ? What are the causes of lay-off ? 

उत्तर – कार्य देने में असमर्थता का अर्थ और कारण

(Meaning of Lay-off and Causes) 

छंटनी व कार्य देने में असमर्थता दोनों ही स्थितियों में श्रमिकों को कार्य से वंचित रहना पड़ता है, किन्तु कार्य देने में असमर्थता छंटनी से भिन्न होती है। दोनों में बहुत अन्तर है। छंटनी में श्रमिक को स्थायी रूप से या लम्बे समय तक कार्य से वंचित रहना पड़ता है जबकि कार्य देने में असमर्थता में श्रमिक की सेवा समाप्त नहीं होती है वरन् अल्प समय के लिए उसे कार्य नहीं मिल पाता है। इन दोनों के कारण भी भिन्न-भिन्न होते हैं। औद्योगिक विवाद अधिनियम की धारा 2 के अनुसार, कार्य देने में असमर्थता अथवा कार्य देने से इन्कार करने से आशय किसी उचित कारण से नियोक्ता द्वारा श्रमिकों को कार्य देने से मना करने से है, अर्थात् श्रमिक कार्यस्थल पर उपस्थित तो होते हैं, किन्तु नियोक्ता द्वारा उन्हें काम देने से इन्कार कर दिया जाता है अथवा असमर्थता प्रकट कर दी जाती है।

इस प्रकार श्रमिकों अथवा कर्मचारियों को कुछ समय के लिए कार्य से वंचित रखना ही ‘कार्य देने में असमर्थता’ कहलाता है। यह बात ध्यान देने योग्य है कि नियोक्ता कार्य दनम असमर्थता जान-बूझकर या स्वेच्छा से प्रकट करता है। इस असमर्थता का कारण उसका शाका के बाहर होना चाहिए जैसे कच्चे माल या कोयले की कमी, निर्मित माल के स्टाक । बहुतायत, मशीनों की टूट-फूट, बिजली की कमी, पानी की कमी, सरकारी आदेश अथवा काई प्राकृतिक कारण जिसे नियोक्ता टाल नहीं सकता। कार्य देने में असमर्थता अथवा इन्कार करने के आवश्यक तत्त्व निम्नलिखित हैं –

(1) श्रमिकों को कार्य पर जारी रखने में नियोक्ता की असफलता अथवा अस 

(2) श्रमिकों का संस्थान के मस्टर रोल में नाम होना। 

(3) असमर्थता का अस्थायी होना। 

(4) असफलता या असमर्थता के विशिष्ट कारण होना। 

(5) असमर्थता का छंटनी से भिन्न होना।

प्रश्न 3 – छंटनी क्या है? इसके क्या कारण हैं? 

What is Retrenchment ? What are its causes ?

उत्तर – सामान्य शब्दों में, छंटनी का आशय नियोक्ता द्वारा कर्मचारी एवं श्रमिकों की अधिकता की दशा में सेवा या नौकरी से कार्य मुक्त करना है।

औद्योगिक विवाद अधिनियम की धारा 2 (00) के अनुसार, “छंटनी से आशय अनुशासन सम्बन्धी दण्ड के अतिरिक्त अन्य किसी कारण से नियोक्ता द्वारा किसी श्रमिक की सेवा समाप्त करने से है लेकिन निम्न कारणों से सेवा समाप्ति को छंटनी नहीं माना जाएगा।”

(i) किसी श्रमिक द्वारा स्वेच्छा से अवकाश ग्रहण करना। 

(ii) आयु सीमा के समाप्त होने पर अवकाश ग्रहण करना। 

(iii) निरन्तर बीमारी के कारण श्रमिक की सेवा समाप्त करना।

निष्कर्ष (Conclusion)-अत: निष्कर्ष के रूप में कहा जा सकता है कि कार्य की तुलना में श्रमिकों की अधिकता के कारण उन्हें कार्य देने से मना करते हुए, नियमानुसार उपक्रम से निकाल देना, ‘छंटनी’ कहा जाता है।

छंटनी के कारण (Causes of Retrenchment)-छंटनी निम्नलिखित कारणों से की जा सकती है

1. कार्य की तुलना में श्रमिकों की अधिक संख्या। 

2. उद्योग में कामबन्दी के कारण छंटनी करना आवश्यक होना। 

3. उत्पादन लागत में अचानक वृद्धि हो जाना। 

4. मशीनीकरण के कारण श्रमिकों की आवश्यकता कम होना। 

5. औद्योगिक उपकरणों की किसी इकाई का बन्द हो जाना। 

6. औद्योगिक उपकरणों के उत्पादन कार्यों का सीमित हो जाना। 

7.विवेकीकरण और वैज्ञानिक शोध के आधार पर श्रमिकों की कम आवश्यकता होना। 

8. कच्चे माल की पूर्ति में कमी होना। 

9. ऊर्जा शक्ति का अभाव होना। 

10. कड़ी प्रतिस्पर्धा के कारण उपक्रम को निरन्तर हानि होना।

11. सरल आयात नीति के कारण आयातों का बढ़ जाना और घरेलू उत्पादकों में कमी आना।

12. सरकार की कठोर कर नीति के कारण उद्योग का विकास रुक जाना आदि। 

प्रश्न 4 – छंटनी के सम्बन्ध में क्या प्रवधान हैं? 

What are the provisions regarding retrenchment ? 

उत्तर – छंटनी से सम्बन्धित प्रावधान

(Provisions Regarding Retrenchment) 

औद्योगिक विवाद अधिनियम की धारा 25 (F) के अनुसार, किसी भी श्रमिक को जो किसी भी उद्योग में किसी सेवायोजक के अधीन कम-से-कम एक वर्ष तक लगातार कार्य करता रहा हो, छंटनी अग्रलिखित शर्तों के अनुसार ही की जा सकती है –

(i) श्रमिक को एक माह की लिखित सूचना दी जाए अथवा नोटिस मजदूरी का भुगतान अग्रिम कर दिया जाए।

(ii) कर्मचारी को पूर्ण वर्ष की सेवाओं के लिए प्रति पूर्ण वर्ष 15 दिन का वेतन दिया जाए।

(iii) श्रमिक को नोटिस देने अथवा भुगतान करने की सूचना 3 दिन के अन्दर को भेज दी जाए।

जिस श्रमिक ने एक पूर्ण वर्ष में 40 दिन तक कार्य कर लिया हो, उसे एक वर्षका माना जाएगा।

प्रश्न 5 – छंटनी तथा कार्य देने में असमर्थता में अन्तर बताइए। Distinguish between Retrenchment and Lay-off. 

उत्तर – कार्य देने में असमर्थता (कामबन्दी) तथा छंटनी में अन्तर(Differences between Lay-off and Retrenchment)

प्रश्न 6 – तालाबन्दी से आप क्या समझते हैं?

What is meant by lock-out? 

अथवा तालाबन्दी की परिभाषा दीजिए।

Define lock-out. 

उत्तर – तालाबन्दी का अर्थ

(Meaning of Lockout

सामान्य शब्दों में तालाबन्दी से आशय किसी उद्योग में सेवायोजक द्वारा कार्य के स्थान को बन्द कर देने अथवा काम पर आने वाले कर्मचारी वर्ग को काम न देने से है। औद्योगिक विवाद अधिनियम की धारा 2 (L) के अनुसार, “किसी सेवायोजक द्वारा नौकरी के स्थान को बन्द कर देने या कार्य के लिए नियुक्त व्यक्तियों की किसी संख्या को काम देने से मना कर देना तालाबन्दी कहलाती है।”

तालाबन्दी को कारखाना बन्दी भी कहते हैं। 

प्रश्न 7 – सम्पूर्ण अंग हानि क्या है? 

What is total disablement ?

उत्तर – सम्पूर्ण अंग हानि (Total Disablement)-सम्पूर्ण अंग हानि या पूर्ण अयोग्यता में स्थायी या अस्थायी दोनों प्रकार की अयोग्यता सम्मिलित हैं। सम्पूर्ण अंगहीन में कर्मचारी उस रोजगार में काम करने के पूर्णत: अयोग्य हो जाता है जिसमें वह दुर्घटना के समय काम करने योग्य था, अर्थात् सम्पूर्ण अंग हानि में श्रमिक की अर्जन शक्ति शत-प्रतिशत चली जाती है। अनुसूची 1 के भाग 1 में जिन आघातों की सूची दी गई है उनसे कर्मचारी की अर्जन शक्ति शत-प्रतिशत चली जाती है। उदाहरणार्थ-दोनों आँखों के प्रकाश की स्थायी व पूर्ण हानि, एक हाथ तथा एक पाँव की हानि, सम्पूर्ण बहरापन इत्यादि पूर्ण अयोग्यताएँ मानी जाती हैं। यदि पूर्ण अयोग्यता अल्प समय के लिए रहती है तो उसे अस्थायी पूर्ण अयोग्यता या अस्थायी सम्पूर्ण अंग हानि कहते हैं और यदि पूर्ण अयोग्यता हमेशा के लिए रहती है तथा कर्मचारी की अर्जन शक्ति शत-प्रतिशत चली जाती है तो उसे स्थायी पूर्ण अयोग्यता या स्थायी सम्पूर्ण अंग हानि कहते हैं।

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