B.Com 2nd Year Organizing Short Notes In Hindi

B.Com 2nd Year Organizing Short Notes In Hindi :- Hello friends this site is a very useful for all the student. you will find all the Question Paper Study Material  Unit wise chapter wise available Question Answer Sample Model Practice Notes PDF available in our site. parultech.com


लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न  – 1 आदर्श संगठन को परिभाषित कीजिए। 

Dehne Ideal Organization.

उत्तर – आदर्श संगठन की परिभाषा

(Definitions of Ideal Organization

(1) लुईस एलन के अनुसार, “संगठन किसी कार्य को पहचानने व समूहबद्ध करने, अधिकार व दायित्वों को परिभाषित व अन्तरित करने, उद्देश्य प्राप्ति के लिए व्यक्तियों द्वारा प्रभावपूर्ण कार्य किए जाने हेतु उनके पारस्परिक सम्बन्धों की स्थापना करने वाली एक प्रक्रिया है।”

(2) आर०सी० डेविस के अनुसार, “संगठन व्यक्तियों का एक ऐसा समह है। सामान्य उद्देश्य की पूर्ति हेतु के निर्देशन के अन्तर्गत सहयोग करते हैं।”

(3) हैने के अनुसार, “किसी सामान्य उद्देश्य या उद्देश्यों की प्राप्ति हेतु विशिष्ट अंगों का मैत्रीपूर्ण संयोजन ही संगठन कहलाता है।”

(4) मूने एवं रेले के अनुसार, “सामान्य उद्देश्य की प्राप्ति के लिए बनाया गया प्रत्येक मानव समुदाय संगठन कहलाता है।”

(5) जी०आर० टैरी के अनुसार, “संगठन से आशय कुछ चुने हुए कार्य, व्यक्तियों तथा कार्यस्थलों के मध्य ऐसे प्रभावपूर्ण अधिकृत सम्बन्ध स्थापित करने से है जिससे समूह द्वारा कार्य दक्षतापूर्वक सम्पादित किया जा सके।”

प्रश्न – 2 विभागीकरण क्या है? 

What is Departmentation ?

उत्तर – विभागीकरण (Departmentation) – विभागीकरण संगठनात्मक संरचन के समतलीय आयाम से सम्बन्धित है। विभागीकरण का आशय किसी व्यावसायिक उपक्रम के विभिन्न विभागों व उप-विभागों में बाँटना होता है। किसी क्रियाशील संगठन का छोटी, लोचपूर्ण, स्वतन्त्र एवं सुविधाजनक इकाइयों में विभाजन ही विभागीकरण कहलाता है। उदाहरण के लिए एक व्यावसायिक प्रतिष्ठान को हम क्रय विभाग, उत्पादन विभाग, वित्त विभाग, सेविवर्गीय विभाग, विक्रय विभाग आदि में विभागीकृत कर सकते हैं। व्यवसाय के स्वभाव एवं आकार को ध्यान में रखते हुए, यदि विभागीय प्रबन्धक चाहे तो कार्यकुशलता बढ़ाने हेतु वह अपने विभाग को समान प्रकार की क्रियाओं के आधार पर अनेक उप-विभागों में

भी बाँट सकता है; जैसे-विक्रय विभाग को प्रबन्धक विज्ञापन विभाग, ग्राहक सेवा विभाग, विपणन अनुसन्धान विभाग, निर्यात संवर्द्धन विभाग आदि उप-विभागों में विभाजित कर सकता है।

प्रश्न 3 – विभागीकरण के प्रमुख लाभ बताइए। 

State the main merits of departmentation. 

उत्तर – विभागीकरण के प्रमुख लाभ निम्नलिखित हैं-

(1) विभागीकरण करने से उपक्रम की क्रियाओं पर प्रभावी नियन्त्रण सम्भव होता है।

(2) विभागीकरण में कर्मचारियों के अधिकार व दायित्वों का स्पष्ट विभाजन तथा व्याख्या की जाती है जिससे उत्तरदायित्व निर्धारण सुनिश्चित होता है।

(3) प्रत्येक विभाग तथा उसके कर्मचारियों के कार्यों का मूल्यांकन करना सरल हो जाता है। 

(4) विभागीय बजट सरलतापूर्वक तैयार और क्रियान्वित किए जा सकते हैं। 

(5) विभागीय प्रबन्धकों के द्वारा स्वतन्त्र रूप से निर्णयन के कारण योग्यता में वृद्धि होती है।

(6) प्रत्येक विभाग के लिए आवश्यक कर्मचारियों, पदों तथा अन्य बातें सरलतापूर्वक ज्ञात की जा सकती हैं।

(7 विभागीकरण से विकेन्द्रीकरण के सभी लाभ प्राप्त होते हैं।

(8) अधिकारों के उचित भारार्पण से अधिकारों का दुरुपयोग और दायित्वों के खिसका की प्रवृत्ति पर रोक लगती है।

प्रश्न 4 – विभागीकरण के प्रमुख दोष बताइए। 

State the main demerits of departmentation. 

उत्तर – विभागीकरण के दोष

(Demerits of Departmentation

विभागीकरण के प्रमुख दोष निम्नलिखित हैं –

(1) चूँकि कार्यानुसार विभागीकरण के अन्तर्गत फर्म के सभी उत्पादों के विक्रय का कार्य अकेला विक्रय विभाग ही देखता है, अत: ग्राहकों की पूर्ण सन्तुष्टि कर पाना सम्भव नहीं होता।

(2) विभिन्न विभागों के मध्य आन्तरिक शत्रुता व संघर्ष होने लगता है जिसका फर्म की कार्यक्षमता पर दुष्प्रभाव पड़ता है।

(3) विभागीकरण के कारण प्रत्येक विभाग के कर्मचारियों व प्रबन्धकों की वफादारी अपने विभाग के प्रति हो जाती है। अत: विभागीय लक्ष्यों पर ध्यान देने के कारण सम्पूर्ण उपक्रम के लक्ष्य नजरन्दाज कर दिए जाते हैं। __

(4) विभागीकरण में प्रबन्धक मात्र एक विभाग से सम्बन्धित कार्यों में निपुण हो पाता है, अत: सर्वोच्च प्रबन्धक के पदों के लिए चतुर्मुखी अनुभव रखने वाले प्रबन्धकों का अभाव हो जाता है।

(5) विभागीकृत संगठन के अन्तर्गत लाभों की जिम्मेदारी विभागीय प्रबन्धकों की न होकर प्रबन्ध संचालक या मुख्य प्रबन्धक की होती है। एक बड़े आकार वाली फर्म में अकेले व्यक्ति पर सफलता का पूर्ण दायित्व डालना दुष्कर बन जाता है।

(6) विभागीकरण के कारण विभागों के मध्य समन्वय करना एक जटिल क्रिया बन जाता है।

प्रश्न 5 – औपचारिक संगठन क्या है

What is formal organization ? 

उत्तर – औपचारिक संगठन

(Formal Organization) 

औपचारिक संगठन से आशय उस संगठन से है जिसमें प्रबन्ध के प्रत्येक स्तर पर अधिकारियों के अधिकार, कर्तव्यों एवं उत्तरदायित्वों की स्पष्ट रूप से व्याख्या की जाती है। इस प्रकार के संगठनों में अधिकार उच्च स्तर से निम्न स्तर की ओर प्रत्यायोजित होते हैं और पूरी संगठन संरचना संस्था के उद्देश्यों को प्राप्त करने का प्रयत्न करती है। यह एक ऐच्छिक संगठन है जिसमें प्रत्येक व्यक्ति की कार्य सीमा निर्धारित होती है और उसे निश्चित नियमों व आदेशों का कठोरता से पालन करना होता है। औपचारिक संगठन की प्रमुख परिभाषाएँ निम्नलिखित हैं

जार्ज आर० टैरी के अनुसार, “पूर्व निर्धारित लक्ष्यों की प्राप्ति हेतु शासकीय अनुमति के द्वारा बनाया गया संगठन औपचारिक संगठन है।”

चेस्टर आई० बरनार्ड के अनुसार, “जब किसी संगठन के दो या दो से अधिक व्यक्तियों की क्रियाओं को किसी निश्चित लक्ष्य की प्राप्ति के लिए चेतनापूर्वक समन्वित किन जाता है तो ऐसा संगठन औपचारिक संगठन कहलाता है।”

उपर्युक्त परिभाषाओं से स्पष्ट है कि पद्धतियों, नियमों, नीतियों तथा कम्पनी के नियन्त्रणों पर परिभाषित मानवीय पारस्परिक सम्बन्ध का स्वरूप ही औपचारिक संगठन का निर्माण करता है।

प्रश्न 6 – अनौपचारिक संगठन क्या है

What is informal organization ?

उत्तर – अनौपचारिक संगठन

(Informal Organization) 

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और उसे किसी एक निश्चित ढाँचे में नहीं बाँधा जा सकता है। जहाँ सभी लोग मिल-जुलकर कार्य करते हैं वहीं उनमें निरन्तर सम्पर्क उत्पन्न हो जाते हैं। इन्हीं सम्बन्धों एवं समूहों को अनौपचारिक संगठन कहा जाता है। इसमें निरीक्षक-अधीनस्थ सम्बन्ध नहीं होते और किसी भी व्यक्ति के अधिकार एवं कर्त्तव्य स्पष्ट रूप से निर्धारित नहीं होते। इसमें कोई नियम या सीमाएँ निर्धारित नहीं की जातीं। प्रत्येक सदस्य स्वेच्छा से सम्बन्ध रखता है। इसकी प्रमुख परिभाषाएँ निम्न प्रकार हैं

हिक्स एवं गुलैट के अनुसार, “अनौपचारिक संगठन अशासकीय एवं अनधिकृत सम्बन्धों से निर्मित होता है जो कि औपचारिक संगठन में व्यक्तियों एवं समूहों के मध्य अनिवार्य रूप से घटित होते हैं।”

मैसी के अनुसार, “अनौपचारिक संगठन मानवीय अन्तक्रियाओं का वह समूह है, जो स्वत: स्वाभाविक तौर से लम्बे समय तक साथ रहने से उत्पन्न हो जाता है।” – 

उपर्युक्त परिभाषाओं के अध्ययन से स्पष्ट है कि अनौपचारिक संगठन व्यक्तिगत एवं सामाजिक सम्बन्धों का एक ऐसा जाल है जो बिना किसी योजना के स्वत: विकसित होता है।

प्रश्न 7 – समिति संगठन से क्या आशय है

What is meant by Committee Organization ? 

उत्तर – समिति संगठन

(Committee Organization) 

समिति संगठन एक ऐसा संगठन है जिसमें कुछ निश्चित कार्यों को करने के लिए दो या दो से अधिक व्यक्तियों को सम्मिलित किया जाता है, जिसे समिति कहा जाता है। समिति के सदस्यों के मध्य से ही किसी एक व्यक्ति को समिति का अध्यक्ष बना दिया जाता है। यह समिात स्थायी अथवा अस्थायी प्रकृति की हो सकती है। समिति संगठन वास्तव में रेखीय एवं स्टाफ संगठन का बढ़ा हुआ रूप है जिसमें प्रबन्ध के विभिन्न स्तरों पर रेखीय प्रबन्धक या स्टार (विशेषज्ञ) प्रबन्धक के स्थान पर एक समिति कार्य करती है। समिति संगठन प्रारूप को सरकारी व गैर-सरकारी दोनों ही स्थानों पर प्रयोग में लाया जा सकता है। व्यावसायिक उपक्रमों में समिति संगठन में वित्त समिति, नियोजन समिति, शोध समिति, गुण नियन्त्रण समिति, उत्पादन समिति आदि हो सकती हैं।

समिति संगठन में समितियाँ कार्यकारी अथवा मात्र परामर्शदात्री हो सकती हैं। प्रायः समितियाँ परामर्शदात्री प्रकृति की ही होती हैं जो कार्यकारी प्रबन्धक को परामर्श देती हैं तथा विभिन्न कार्यों का समन्वय भी करती हैं। वैसे इस समिति को विभिन्न विभागों से आँकड़े व सूचनाएँ लेने, सुझाव माँगने आदि का अधिकार होता है। इन समितियों का मुख्य उद्देश्य सम्बन्धित व्यक्ति की बुद्धि का एकीकरण है। जैसे नए उत्पाद समिति में निर्माणी, इंजीनियरी, विपणन तथा वित्त विभागों के विशेषज्ञ नियुक्त किए जा सकते हैं। यद्यपि इन समितियों के परामर्श को लागू करना अनिवार्य नहीं है, परन्तु ये समिति रेखीय प्रबन्धकों को विचार-विमर्श में सम्मिलित करके स्वेच्छा से सिफारिशों को लागू करने के लिए प्रेरित करती हैं।

प्रश्न 8 – संगठन के कोई तीन उद्देश्य दीजिए। 

Give any three purpose of organization. 

उत्तर – संगठन के उद्देश्य

(Purpose of Organization) 

बुद्धि का विकास होने पर मनुष्य ने समूह में रहकर ही काम करना पसन्द किया और समूह में रहकर कार्य करने के दौरान ही उसके समक्ष संगठन की समस्या उत्पन्न हुई। वर्तमान समय में समाज में रहने वाले व्यक्तियों की पारस्परिक निर्भरता में वृद्धि होने तथा संस्थाओं में कार्यरत व्यक्तियों की संख्या में वृद्धि होने के कारण संगठन का महत्त्व भी बढ़ा है। लेकिन अभी भी छोटे व्यावसायिक उपक्रमों में एकाकी व्यवसायी स्वयं या उसकी ओर से नियुक्त प्रबन्धक व्यवसाय के सभी कार्यों की देखभाल कर लेता है, परन्तु बड़ी-बड़ी कम्पनियों में, जहाँ बहुत सारे विभाग व उपविभाग होते हैं तथा हजारों कर्मचारी इन विभागों में कार्य करते हैं, संगठन का कार्य जटिल हो जाता है क्योंकि विभिन्न कार्यों का विभागों और उपविभागों में आवंटन तथा उनकी क्रियाओं में समन्वय उत्पन्न करना आसान कार्य नहीं है। इसीलिए वर्तमान समय में वृहत उपक्रमों के कुशलतापूर्वक संचालन में उपयुक्त संगठन की महत्ता काफी हद तक बढ़ गई है। वर्तमान समय में संगठन के निम्नलिखित उद्देश्य हैं

1. मानवीय प्रयासों का अनुकूलतम उपयोग (Optimum Use of Human Efforts)-चूँकि एक संगठन के अन्तर्गत प्रत्येक कर्मचारी का कार्य, उसके अधिकार एवं दायित्व सुनिश्चित होते हैं और इस बात की सम्भावना भी समाप्त हो जाती है कि किसी कार्य के लिए कोई व्यक्ति उपलब्ध नहीं है और किसी कार्य को करने के लिए बहुत सारे लोगों को कह दिया गया हो। इस प्रकार, संस्था के मानवीय प्रयासों का सर्वोत्तम उपयोग सम्भव होता है।

2. विशिष्टीकरण को प्रोत्साहन (Encouragement to Specialization)-संगठन का श्रम विभाजन पर आधारित होता है। फर्म के सभी कार्यों को उनकी प्रकृति के अनुसार पहचान

कर समूहबद्ध किया जाता है और फिर उस कार्य को उपयुक्त व्यक्ति को सौंपा जाता है। श्रम विभाजन का ही एक रूप है जिसमें प्रत्येक व्यक्ति अपने कार्य में विशिष्टता प्राप्त कर फर्म की उत्पादकता में वृद्धि करता है।

3. प्रबन्धकीय क्षमता में वृद्धि (Increase in Managerial Efficiency)-संगठन का उद्देश्य न केवल कार्य का विभाजन करना है बल्कि कर्मचारियों के पारस्परिक सम्बन्धी अधिकार एवं दायित्वों का निर्धारण करना भी है ताकि सभी विभागों व उपविभागों के कार्यों में समन्वय बना रहे और कार्य-संचालन में आने वाली रुकावटें दूर हो जाएँ। कुल मिलाकर इन सबका यह परिणाम होता है कि प्रबन्धकीय क्षमता तथा उसकी प्रभावशीलता बढ़ जाती है।

प्रश्न 9 – संगठनात्मक ढाँचे का अर्थ स्पष्ट कीजिए। 

Explain the meaning of organizational structure.

उत्तर – संगठनात्मक ढाँचे से आशय ऐसे ढाँचे से है जिसमें संगठनात्मक लक्ष्य के लिए कार्यरत व्यक्तियों के मध्य कार्यों का बँटवारा, उनके कर्तव्यों, उत्तरदायित्वों का निर्धारण तथा उनके आपसी औपचारिक सम्बन्धों की व्याख्या दी गई होती है। यह संगठनात्मक ढाँचा

प्रबन्धकों को तथा उच्च कर्मचारियों को यह बताता है कि उन्हें संगठन में क्या-क्या करना है उनके अधीनस्थ कौन हैं तथा उनका वरिष्ठ अधिकारी कौन है। उन्हें अपने वरिष्ठ अधिकारी से क्या अधिकार प्राप्त हैं और उन्हें अधीनस्थों को कितने अधिकार अन्तरित करने हैं। उनके क्या उत्तरदायित्व हैं और उन उत्तरदायित्वों का निर्वाह कैसे किया जा सकता है।

इस संगठन संरचना के दो प्रमुख प्रकार होते हैं

(1) क्षैतिज या समतल संरचना (Horizontal structure) 

(2) शीर्ष या लम्बरूप संरचना (Vertical structure)।

क्षैतिज या समतल संरचना (Horizontal Structure)-यह विभिन्न क्रियाओं के विभागीकरण पर आधारित होती है। इसमें प्रकृति के आधार पर कार्यों को समूहबद्ध करके विभागों में बाँट दिया जाता है, जैसे एक विश्वविद्यालय की संगठित संरचना में परीक्षा विभाग कॉलिज सम्बद्ध विभाग, गोपनीय विभाग, वित्त विभाग, सामान्य विभाग आदि हो सकते हैं। इस प्रकार के एक निर्माणी उपक्रम में क्रय, वित्त, उत्पादन, विक्रय एवं लेखा, सेविवर्गीय आदि विभागों की रचना की जा सकती है, जैसा कि निम्नांकित चार्ट से स्पष्ट है –

शीर्ष या लम्बरूप संरचना (Vertical Structure)-यह प्रबन्धकीय स्तर तक प्रबन्धकीय पारस्परिक सम्बन्धों पर आधारित होती है। इसमें प्रत्येक प्रबन्धक को अपने वारण

प्रबन्धकों तथा अधीनस्थ प्रबन्धकों के साथ औपचारिक सम्बन्धों का ज्ञान करा दिया जाता है। यह संगठन संरचना सर्वोच्च प्रबन्ध से प्रारम्भ होकर अधीनस्थ प्रबन्ध की ओर चलती है। चूंकि उच्च-स्तरीय प्रबन्धकों की तुलना में मध्य-स्तरीय प्रबन्धकों की संख्या अधिक होती है, अत: यह संरचना पिरामिड के आकार की बन जाती है जैसा कि निम्नांकित चार्ट से स्पष्ट है

‘यदि ठीक तरह से देखा जाए तो क्षैतिज तथा शीर्ष संगठन संरचना अन्तर्सम्बन्धित है क्योंकि विभागों के निर्माण के बाद ही प्रबन्धकों के पद सृजित किए जाते हैं।

प्रश्न 10 – समिति संगठन को किस प्रकार प्रभावी बनाया जा सकता है

How can the committee organization be made effective ? 

उत्तर – समिति संगठन को अधिक प्रभावशाली बनाने के लिए सुझाव 

(Suggestions for Making Committee Organization More Effective) 

समिति संगठन को अधिक प्रभावशाली बनाने के लिए इसके स्वभावजन्य दोषों का निवारण करना होगा, जिसके लिए निम्नलिखित सुझाव दिए जा सकते हैं –

(1) समिति के अधिकार एवं कार्यक्षेत्र पूर्णतया स्पष्ट होने चाहिए ताकि आपसी मतभेद न हो सके।

(2) समिति के सदस्यों की संख्या उपयुक्त होनी चाहिए। वह न तो इतने कम होने चाहिए कि आवश्यक ज्ञान व अनुभव का संयोजन न हो सके और न ही इतने ज्यादा होने चाहिए कि बैठक में विचार प्रकट करने का अवसर न मिले।

(3) समिति संगठन में ऐसे योग्य सदस्यों का चुनाव करना चाहिए जो योग्य, अनुभवी और विविध विभागों के प्रतिनिधित्वकर्ता हों।

(4) समिति की अध्यक्षता एक योग्य व्यक्ति को सौंपनी चाहिए जो प्रस्तावों को डर रूप दे सके, वाद-विवादों को निश्चित दिशा दे सके और कार्यवाही का सुचारु रूप से संचालन कर सके।

(5) समिति के विचार के लिए व्यापक और महत्त्वपूर्ण विषय निर्धारित किए जाने चाहिए, नैत्यक मामले नहीं।

(6) समिति की बैठक के लिए निश्चित कार्यक्रम तैयार करके सभी सदस्यों को सूचित कर देना चाहिए।

(7) समिति की बैठक के दौरान हुई कार्यवाही को सूक्ष्म रूप में लिख करके अगली बैठक में पुष्टि करानी चाहिए। आवश्यकतानुसार सुधार-संशोधन करके उस पर अन्तिम स्वीकृति के उपरान्त ही उसे अमल में लाना चाहिए और प्रगति तथा सुझावों से समिति को । अवगत कराते रहना चाहिए।

प्रश्न 11 केन्द्रीकरणका अर्थ बताइए। 

State the meaning of ‘Centralization’. 

उत्तर – केन्द्रीकरण

(Centralization) 

केन्द्रीकरण से अभिप्राय केन्द्र बिन्दु पर निर्णयन कार्य के कुछ हाथों में केन्द्रित हो जाने से है।

लुईस ए० एलन के अनुसार, “केन्द्रीकरण संगठन के केन्द्र बिन्दुओं पर अधिकारों का प्रणालीबद्ध एवं संगत आरक्षण है।”

उपर्युक्त परिभाषा के आधार पर केन्द्रीकरण की निम्नलिखित विशेषताएँ होती हैं-

(1) अधिकार संगठन में निर्णयन कुछ केन्द्र बिन्दुओं तक ही सीमित रहता है। 

(2) संगठन में निर्णयन में अधीनस्थों की भूमिका लगभग समाप्त हो जाती है। 

(3) अधीनस्थ केवल उच्च प्रबन्धकों द्वारा लिए गए निर्णयों को ही क्रियान्वित करते रहते हैं।

(4) इसमें अधिकारों का अन्तरण या प्रत्यायोजन सीमित हो जाता है। 

प्रश्न 12 विकेन्द्रीकरण की मात्रा को प्रभावित करने वाले घटकों को लिखिए। 

State the factors affecting degree of decentralization. 

उत्तर – विकेन्द्रीकरण की मात्रा को प्रभावित करने वाले घटक

(Factors Affecting Degree of Decentralization) 

निम्नलिखित घटकों के कारण विकेन्द्रीकरण की मात्रा प्रभावित होती है – 

(1) निर्णय जितना खचीला होगा और कार्यवाही जितनी उपयोगी होगी, उसमें आधा सम्भावना यही होगी कि निर्णय उच्च स्तर पर लिया जाएगा।

(2) विशाल और लघु इकाइयों में मात्रा का अन्तर होगा जो कार्य व्यापार के संचालन पर निर्भर करेगा।

(3) केन्द्रीकरण वहाँ पर फलीभूत होता है जहाँ योजना में एकरूपता पायी जाती है।

(4) व्यापारिक प्रतिष्ठान की स्थापना के स्वरूप पर भी विकेन्द्रीकरण की मात्रा प्रभावित होती है।

(5) विकेन्द्रीकरण पर उच्च प्रबन्धन के तौर-तरीकों का भी प्रभाव पड़ता है। 

(6) प्रतिष्ठान का ओजस्वी स्वरूप भी विकेन्द्रीकरण की मात्रा को प्रभावित करता है। 

(7) सही ढंग से स्थापित तकनीक भी उच्च कोटि के केन्द्रीकरण में सहायक होती है।

(8) योग्य व प्रशिक्षित प्रबन्धकों के अभाव में विकेन्द्रीकरण की धारणा को धक्का लगता है।

(9) जब किसी संस्थान का परिचालन तन्त्र विकेन्द्रित होता है तो अधिकारीगण भी विकेन्द्रीकरण की ओर अभिमुख हो जाते हैं।

(10) प्राधिकार के विकेन्द्रीकरण में बाहरी पर्यावरण का भी महत्त्वपूर्ण अवदान होता है जिसमें शामिल हैं मजदूर संगठन, करारोपण की शासकीय नीतियाँ इत्यादि।

प्रश्न 13 – नौकरशाही क्या है? 

What is Bureaucracy ?

उत्तर – नौकरशाही (Bureaucracy)-पारकिंसन के नियम (Parkinson’s Law) में नार्थकोट पारकिंसन ने यह आरोप लगाया कि प्रबन्ध के ही कारण उपक्रम में ऊँच-नीच का भेदभाव, मनमुटाव, लालफीताशाही और नौकरशाही जैसी दूषित मनोवृत्तियाँ पनपती हैं। व्यवसाय का प्रबन्ध एक प्रकार से नौकरों का राज्य और उच्च जाति के प्रशासकों का राज्य बन जाता है। प्रबन्धक ‘हुजुर और मजूर’ का वातावरण बना करके अपनी जेबों को भरने के लिए शक्ति का दुरुपयोग करने लगते हैं। अपनी शक्ति के नशे में मदमस्त होकर मनमानी करने लगते हैं और यही उनके पतन की शुरुआत होती है।

प्रश्न 14 – भारार्पण की प्रकृति पर सूक्ष्म लेख लिखिए। 

Write a brief note on The Nature of Delegation. 

उत्तर – भारार्पण के तत्त्व या प्रकृति

(Elements or Nature of Delegation) 

भारार्पण के प्रमुख तत्त्व या प्रकृति को निम्न प्रकार स्पष्ट किया जा सकता है

1. कार्यभार सौंपा जाना (Assigning of Duty)-भारार्पण का मुख्य तत्त्व कार्यभार का सौंपा जाना है क्योंकि इसके अन्तर्गत प्रबन्धक अपने कार्यों को अपने अधीनस्थों को सौंपता है। किसी भी व्यक्ति के लिए यह सम्भव नहीं है कि वह व्यवस्था की सम्पूर्ण क्रियाओं को स्वयं सम्पन्न कर ले इसलिए वह अपने कार्यों को अन्य व्यक्तियों को सौंप देता है। इससे उपक्रम अपने निश्चित उद्देश्यों को आसानी से पूरा करने में समर्थ होता है क्योंकि प्रबन्धक अपने कार्यों को अपने अधीनस्थों को सौंप देते हैं और अपना अमूल्य समय व्यवसाय के विकास में लगाते हैं। इस प्रकार ‘कार्यभार सौंपा जाना’ भारार्पण का मुख्य तत्त्व कहलाता है।

2.अधिकार प्रदान करना (Granting of Authority)-प्रत्येक व्यक्ति, जिसे कुछ कार्य सम्पन्न करने का दायित्व सौंपा जाता है, को कुछ विशिष्ट अधिकार भी प्रदान किए जाते हैं। यदि किसी व्यक्ति को केवल कार्यभार ही सौंपा जाए और उसे कोई अधिकार प्रदान न किया जाए तो उस व्यक्ति के लिए अपने दायित्वों का निर्वाह करना असम्भव होगा। अत: यह आवश्यक है कि जिसे कोई उत्तरदायित्व सौंपा जाए उसे अधिकार भी प्रदान किए जाएं। उत्तरदायित्व अधिकारों के अभाव में व्यर्थ है और अधिकार, उत्तरदायित्व के बिना व्यर्थ है। इसलिए भारार्पण के लिए आवश्यक है कि अधिकारों का भारार्पण भी किया जाए।

3. दायित्व निर्धारित करना (Determination of Accountability)-जब उन अधिकारी द्वारा अपने कार्यों को अपने अधीनस्थों को प्रदान किया जाता है तो उन्हें कुछ

अधिकार भी प्रदान किए जाते हैं। ऐसी परिस्थिति में उच्च अधिकारी का यह कर्त्तव्य हो जाता है कि वह अपने अधीनस्थों के कार्यों को देखे कि वे कार्य-उद्देश्यों के अनुकूल एवं नियमित रूप से कार्य कर रहे हैं या नहीं। यदि वे ऐसा नहीं करते हैं तो उच्च अधिकारी उनसे जवाब तलब कर सकता है और उनका दायित्व निर्धारित कर सकता है। अत: भारार्पण में अधीनस्थों का दायित्व भी निर्धारित किया जाता है।

इस प्रकार भारार्पण करते समय उपर्युक्त तत्त्वों को ध्यान में रखना अनिवार्य है और इन्हीं तत्त्वों के आधार पर भारार्पण की प्रक्रिया सम्पन्न की जाती है।

प्रश्न 15- क्या उत्तरदायित्वों का भारार्पण सम्भव है? 

Whether delegation of responsibilities is possible ? 

उत्तर – उत्तरदायित्वों का भारार्पण सम्भव है या नहीं 

(Whether Delegation of Responsibilities is possible or Not)

यदि गहनतापूर्वक सोचा जाए तो यह निष्कर्ष निकलता है कि कोई भी अधिकारी अपने उत्तरदायित्वों का भारार्पण नहीं कर सकता। हाँ, यदि कोई भी अधिकारी चाहे तो वह अपने उत्तरदायित्वों को पूरा करने में अधीनस्थों का सहयोग ले सकता है और अधीनस्थों को कुछ अधिकारों का भारार्पण कर सकता है। इस सम्बन्ध में स्मरणीय तथ्य यह है कि उत्तरदायित्व तो । उसी अधिकारी का रहेगा, जिसको कि उपक्रम का कार्यभार सौंपा गया है। यदि उपक्रम को कोई हानि होती है तो उच्च अधिकारियों के प्रति उसी अधिकारी की जवाबदेही मानी जाएगी, जिसको उच्च अधिकारियों ने कार्य सौंपा था न कि उसके अधीनस्थों को उस कार्य के प्रति जिम्मेदार ठहराया जाएगा। अतः स्पष्ट है-“केवल अधिकारों का भारार्पण हो सकता है, उत्तरदायित्वों का नहीं।”

Follow Me

Facebook

B.Com 1st 2nd 3rd Year Notes Books English To Hindi Download Free PDF

Leave a Reply

Your email address will not be published.

*