B.Com 2nd Year Planning Long Notes In Hindi

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विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1- नियोजन की अवधारणा को स्पष्ट कीजिए तथा इसके प्रकारों का वर्णन कीजिए।

Explain the concept of planning and describe its types. 

उत्तर – नियोजन की अवधारणा

(Concept of Planning) 

किसी भी प्रकार के संगठन या संस्था में लक्ष्यों का निर्धारण तथा लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए उठाए जाने वाले कदमों की निर्धारण प्रक्रिया को ‘नियोजन’ कहा जाता है।

किसी ने कहा है कि यदि आप यह नहीं जानते कि आपको कहाँ पहुँचना है तो कोई भी सड़क आपको गंतव्य तक नहीं ले जा सकती। इस विचारधारा के अनुसार एक फर्म या संगठन बिना योजना के प्रभावहीन सिद्ध होगा। जब तक उसका प्रबन्धक योजना नहीं बनाता, चाहे वह लिखित हो या मौखिक, अपने लक्ष्य पर पहुँचने में कठिनाई अनुभव करेगा।

जब कोई प्रबन्धक या व्यक्ति स्पष्ट लक्ष्य लेकर आगे बढ़ता है तो वह भावी अनिश्चितताओं व आने वाली कठिनाइयों का पूर्वानुमान कर लक्ष्य पर पहुँचने के लिए ऐसी प्रभावी योजना बना सकता है जिसमें सफलता की अधिक सम्भावना होती है। इस प्रकार नियोजन भविष्य के बारे में सोचने तथा निर्णय लेने से सम्बन्धित होता है। इसीलिए यह कहा जाता है कि कल के कार्य का आज निर्धारण करना ही नियोजन है।

एक विद्यमान एवं चाल उपक्रम की दशा में नियोजन के अन्तर्गत उपक्रम के पिछले कार्य का आकलन, वर्तमान स्थिति, उपलब्ध संसाधनों, सुअवसरों व चुनौतियों का विश्लेषण शामिल है, जिनके आधार पर एक उपक्रम अपना भावी मार्ग या उद्देश्यों का निर्धारण करता है और यह तय करता है कि उपक्रम भविष्य में किस दिशा में आगे बढ़ेगा, क्या कार्य करेगा, कब और कैसे करेगा। इस प्रकार नियोजन मुख्यतया भविष्य में झाँकने तथा पूर्वानुमान लगाने से सम्बन्ध रखता है और प्रबन्धक का यह एक प्रमुख एवं प्राथमिक कार्य माना जाता है।

निम्न परिभाषाएँ नियोजन की अवधारणा को स्पष्ट करती है – 

प्रो० कण्ट्ज एवं ओ डोनेल के अनुसार, “नियोजन द्वारा पहले ही यह निश्चय का दिया जाता है कि क्या कार्य किया जाएगा, कब किया जाएगा तथा इसे कौन करेगा। हम जिय स्थान पर है और जिस स्थान पर पहुँचना चाहते हैं, उसके बीच की खाई (gap) को पाटने का कार्य नियोजन द्वारा किया जाता है।”

बिली ई० गोज के अनुसार, “नियोजन मूल रूप में चयन कार्य है और नियोजन की समस्या तभी पैदा होती है जब कार्य के वैकल्पिक ढंगों का पता होता है।”

हेयन्स एवं मैसी के अनुसार, “नियोजन प्रबन्ध का वह कार्य है जिसमें वह पहले से ही निश्चय कर लेता है कि भविष्य में उसे क्या करना है। यह एक विशिष्ट प्रकार की निर्णय प्रक्रिया है-यह एक ऐसी बौद्धिक प्रक्रिया है जिसमें सृजनात्मक विचारधारा तथा कल्पनाशक्ति आवश्यक होती है।”

उपर्युक्त परिभाषाओं के अध्ययन से यह ज्ञात होता है कि नियोजन के अन्तर्गत(1) भविष्य का आकलन तथा वांछित लक्ष्यों या उद्देश्यों का निर्धारण किया जाता है।

(ii) भावी अनिश्चितताओं का पूर्वानुमान कर लक्ष्यों की प्राप्ति हेतु सम्भावित विकल्प या मार्ग खोजे जाते हैं।

(ii) इन विकल्पों में से न्यूनतम जोखिम वाले विकल्प का चुनाव किया जाता है, इसे सर्वोत्तम विकल्प मानते हैं तथा

(iv) सर्वोत्तम विकल्प के अनुसार कदम उठाने के लिए आवश्यक नीतियाँ (policies) कार्य-विधियाँ (procedures) तथा कार्यक्रम (programmes) तैयार किए जाते हैं।

नियोजन के प्रकार

(Types of Planning) 

1. महत्त्व के आधार पर (On the basis of Importance)-महत्त्व के आधार पर योजनाओं को निम्नलिखित तीन भागों में बाँटा जा सकता है

(क) रणनीतिक योजना (Strategic Planning)-इसके अन्तर्गत उच्च प्रबन्ध बाह्य वातावरण तथा आन्तरिक संसाधनों का आकलन करके लक्ष्य निर्धारित करता है तो उने प्राप्त करने के लिए बहुविकल्पीय योजना बनाता है ताकि परिस्थितियों के अनुरूप उपयुक्त योजना लागू की जा सके।

(ख ) युक्तिकौशल योजना (Tactical Planning)-यह मध्यस्तरीय प्रबन्ध द्वारा बनाई जाती है। इसमें रणनीतिक योजनाओं को वास्तविकता के सन्निकट लाया जाता । मध्यस्तरीय प्रबन्ध आन्तरिक संसाधनों का सही आकलन करके मानवीय, वित्तीय एवं भौतिक संसाधनों को सर्वोपयुक्त मिश्रण इस दृष्टि से तैयार करता है जिससे कि संगठनात्मक तर अत्यधिक कुशलतापूर्वक प्राप्त किए जा सकें।

(ग) परिचालन नियोजन (Operating Planning)-यह नियोजन कार्य प्रथमस्तरीय प्रबन्धकों द्वारा किया जाता है। पर्यवेक्षक अपने-अपने क्षेत्रों में अल्पकालीन (सामान्यतया एक सप्ताह से एक वर्ष तक) योजनाएं बना लेते है। ये योजनाएँ प्रत्येक कार्यात्मक क्षेत्र जैसे उत्पादन, विक्रय, क्रय, वित्त आदि के लिए पृथक्-पृथक् बनाई जाती है और ये बजट आदि द्वारा निर्दिष्ट होती है।

2. समय के आधार पर (On the basis of Time)-समय के आधार पर योजनाओं को दो भागों में बाँटा जा सकता है –

(क) दीर्घकालीन योजना (Long-term Planning) यह सामान्यतया एक वर्ष से अधिक अवधि की होती है। दीर्घकालीन योजना की अधिकतम अवधि उद्योग या कार्य की प्रकति पर निर्भर करती है, जैसे निर्माणी उद्योगों में यह अवधि पाँच या दस वर्ष हो सकती है लेकिन खनिज विदोहन, विद्युत सम्प्रेषण एवं आपूर्ति तथा बागान उद्योगों में यह अवधि पच्चीस या तीस वर्ष भी हो सकती है।

(ख) अल्पकालीन योजना (Short-term Planning)-यह सामान्यतया एक वर्ष या उससे कम अवधि की होती है। यह एक सप्ताह, एक माह या तीन माह की हो सकती है।

वास्तव में, जहाँ दीर्घकालीन योजना एक उपक्रम के विस्तार, विविधीकरण जैसी महत्त्वपूर्ण बातों से सम्बन्ध रखती है वहाँ अल्पकालीन योजना उत्पादन, विपणन तथा अन्य परिचालन कार्यों से सम्बन्ध रखती है।

3. उपयोग के आधार पर (On the basis of Use)-उपयोग के अनुसार योजना दो प्रकार की हो सकती है –

(क) स्थायी योजनाएँ (Standing Plans) इनमें सर्वोच्च प्रबन्ध द्वारा निर्धारित नीतियाँ, कार्यविधियाँ व नियम सम्मिलित किए जाते हैं, जिनके आधार पर प्रबन्ध उपक्रम के कार्यों का संचालन करते हैं। इनमें प्रबन्धकों के लिए मार्गदर्शक बातें निश्चित कर दी जाती हैं ताकि निर्णय लेने में बार-बार अपने वरिष्ठ प्रबन्धकों से दिशा-निर्देश न लेना पड़े और उपक्रम स्वाभाविक रूप से अपने उद्देश्यों की ओर बढ़ता रहे।

(ख) एकल उपयोग योजनाएँ (Single use Plans)-इनमें बजट, प्रोग्राम तथा प्रोजेक्ट सम्मिलित किए जाते हैं। ये योजनाएँ परिचालन कार्य से अधिक सम्बन्ध रखती हैं। ये विशिष्ट कार्यों को पूरा करने के लिए बनाई जाती हैं और एक बार ही प्रयोग में आती हैं, इनकी पुनरावृत्ति नहीं की जाती। उदाहरणार्थ-एक फर्म में किसी वर्ष की पहली छमाही का बजट दूसरी छमाही के लिए प्रयोग में नहीं लाया जा सकता।

4. प्रबन्ध के स्तर के आधार पर (On the basis of Level of Management)-प्रबन्ध के स्तर के आधार पर योजनाओं को तीन भागों में विभक्त किया जा सकता है –

(क) उच्चस्तरीय योजना (High Level Planning)-यह उपक्रम के साथ प्रबन्ध द्वारा तैयार की जाती है और इसमें उपक्रम के प्रमुख लक्ष्य, उद्देश्य व नीतियाँ दी जाती है। यह योजना प्रबन्धकों का पथ-प्रदर्शन करती है।

(ख) मध्यस्तरीय योजना (Middle Level Planning)—यह विभागीय प्रबन्धवा द्वारा अपने विभागों के लिए निर्धारित लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए बनाई जाती है और प्रथमस्तरीय प्रबन्धकों तथा पर्यवेक्षकों को मार्गदर्शन प्रदान करती है।

(ग) प्रथमस्तरीय योजना (Ist Level Planning) यह सामान्यतया प्रत्येक उपविभाग के अधीक्षकों तथा पर्यवेक्षकों द्वारा निर्धारित लक्ष्यों को प्राप्त करने तथा दैनिक कार्यों का संचालन करने के लिए बनाई जाती है। सामान्यतया यह पाया गया है कि योजना बनाने में सर्वाधिक समय उच्च प्रबन्ध देता है, मध्य प्रबन्ध उससे कम तथा प्रथम-स्तरीय प्रबन्ध सबसे कम समय देता है।

प्रश्न 2 – नियोजन प्रक्रिया से आप क्या समझते हैं? इसके प्रमुख पगों की विवेचना कीजिए।

What do you understand by Planning Process? Discuss the steps involved in it. 

उत्तर – नियोजन प्रक्रिया 

(The Planning Process)

अथवा 

नियोजन में उठाए जाने वाले कदम (पग)

(Steps in Planning) 

नियोजन की एक निश्चित प्रक्रिया है जिसमें एक के बाद एक कुछ तर्कसंगत कदम उठाने होते हैं। यह प्रक्रिया वृहत, मध्यम तथा लघु उपक्रमों सभी के लिए समान है। यह अवश्य है कि उपक्रम के आकार तथा प्रकृति के अनुसार प्रक्रिया को थोड़ा समायोजित किया जा सकता है।

नियोजन प्रक्रिया के अन्तर्गत सर्वप्रथम संस्था के लक्ष्य या उद्देश्य निर्धारित किए जाते हैं, फिर उन उद्देश्यों की प्राप्ति हेतु दीर्घकालिक योजना बनायी जाती है जिसमें भविष्य में लागू की जाने वाली नीतियों का निर्धारण किया जाता है, कार्यविधि व नियम तैयार किए जाते हैं तथा योजना को कार्यरूप देने के लिए बजट व कार्यक्रम आदि तैयार किए जाते हैं। जैसा कि चित्र संख्या 3 से स्पष्ट है। नियोजन प्रक्रिया के क्रमिक कदमों का संक्षिप्त विवेचन अग्रलिखित प्रकार है

1. लक्ष्यों या उद्देश्यों का निर्धारण – एक उपक्रम के मूल उद्देश्य ही उपक्रम को दिशा प्रदान करते है। अत: नियोजन के अन्तर्गत प्रथम कदम उस उपक्रम के उद्देश्यों का निर्धारण करना होता है। ये उद्देश्य ही प्रबन्धकों व कर्मचारियों को स्पष्ट दृष्टि तथा उद्देश्य प्राप्ति के लिए सामूहिक प्रेरणा प्रदान करते हैं। परन्तु प्रभावी नियोजन के लिए यह आवश्यक है कि उद्देश्य समझे जा सकने योग्य तथा विवेकपूर्ण हों। ये उद्देश्य स्पष्ट शब्दों में परिभाषित हो क्योंकि ये उद्देश्य ही यह निर्देशित करते हैं कि क्या किया जाना है, कब किया जाना है और प्रारम्भिक जोर किस बात पर देना है। नियोजन के अन्तर्गत उद्देश्यों के निर्धारण से पूर्व यह आवश्यक है कि उपक्रम को प्राप्त हो सकने वाले सुअवसरों का आकलन कर लिया जाए। इसके लिए उपक्रम के बाह्य वातावरण (सरकारी नीतियाँ, सामाजिक-राजनीतिक परिवर्तन, प्रतिस्पर्धात्मक स्तर, टेक्नोलॉजी की उपलब्धता आदि) तथा उपक्रम के आन्तरिक वातावरण (संगठनात्मक शक्तियाँ तथा कमजोरियाँ) का अध्ययन करना होगा तभी सुअवसरों की तलाश की जा सकेगी और सर्वोपयुक्त उद्देश्य व रणनीतियों का निर्धारण किया जा सकेगा। उदाहरण के लिए बजाज ऑटो ने सरकार की उदारीकरण नीति तथा विदेशी सहयोग की उपलब्धता का अध्ययन करके ही ‘कार परियोजना’ स्थापित करने का उद्देश्य निर्धारित किया है। इसी प्रकार एक कम्पनी वातावरण का आकलन कर भारत के कम्प्यूटर्स बाजार के 25 प्रतिशत भाग पर अगले तीन वर्षों में आधिपत्य जमा लेने का उद्देश्य निर्धारित कर सकती है।

2. रणनीति या व्यूह-रचना – नियोजन के अन्तर्गत उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए व्यूह-रचना (दीर्घकालीन योजना) तैयार की जाती है। व्यूह-रचना इस बात को इंगित करती है कि भविष्य में उद्देश्यों के प्राप्त करने के लिए मुख्य उपाय क्या अपनाए जाएंगे। इस दृष्टि से इसके अन्तर्गत निम्न कदम उठाने होते हैं

(i) विकल्पों का निर्धारण एवं मूल्यांकन – उद्देश्य प्राप्ति के सामान्यतया एक से अधिक विकल्प हो सकते हैं। अत: सर्वप्रथम तो यह पता करना होगा कि सम्भावित विकल्प या मार्ग कौन-कौन से हो सकते हैं। इसके उपरान्त प्रत्येक विकल्प का विभिन्न दृष्टिकोणों से

मूल्यांकन किया जाता है। उदाहरण के लिए यदि एक कम्पनी का भारत के कम्प्यूटर्स बाजार 25 प्रतिशत पर अधिकार कर लेने का उद्देश्य है तो वह व्यूह-रचना या रणनीति तय करने । पूर्व यह पता करेगी कि इस उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए क्या-क्या विकल्प हो सकते हैं जैसे उत्पादन क्षमता में वृद्धि करने के लिए एक विकल्प विद्यमान संयन्त्र क्षमता में वृद्धि करना हो सकता है, दूसरा विकल्प कम्प्यूटर्स की लघु इकाइयों को क्रय कर लेना हो सकता है, तीसर विकल्प कम्प्यूटर पार्ट्स अन्य उपक्रमों से क्रय कर अपने संयन्त्र में मात्र कम्प्यूटर्स संयोजित (assemble) करना हो सकता है। इसी प्रकार कम्प्यूटर्स की बिक्री आदि के क्षेत्र में भी विकल्पों का पता लगाया जा सकता है।

(ii) सर्वोत्तम विकल्प का चयन – उपयुक्त विकल्पों में से प्रत्येक क्षेत्र में जैसे उत्पादन बिक्री, शोध एवं विकास आदि में एक-एक विकल्प का चयन किया जाता है जो उपक्रम की संगठन संरचना के अनुरूप हो। यह विकल्प का चयन कार्य ही व्यूह-रचना कहलाती है।

3. नीतियों का निर्धारण – उपर्युक्त व्यह-रचना के अन्दर जो उपाय किए जाते हैं उनके क्रियान्वयन में प्रबन्धकों को अनेक निर्णय लेने होते हैं। निर्णयों में एकरूपता बनाए रखने के लिए कुछ मार्गदर्शक सिद्धान्त तय कर दिए जाते हैं जिन्हें नीतियों के नाम से जाना जाता है। जैसे कम्पनी की यह नीति निर्धारित की जा सकती है कि “कम्पनी अपने ग्राहकों को वित्तीय सीमाओं के अन्तर्गत सर्वोत्तम सेवाएँ प्रदान करेगी।”

4. कार्यविधियों का निर्धारण – नीतियों के लागू करने के लिए सामान्यतया कार्यविधि निर्धारित कर दी जाती है और सम्बन्धित विभाग से यह अपेक्षा की जाती है कि वह नीति लागू करने में प्रत्येक बार वही कार्यविधि अपनाएगा। नीति एक सिद्धान्त के रूप में या वाक्य के रूप में उच्च प्रबन्ध निर्धारित करता है, परन्तु कार्यविधि क्रमिक कदमों के रूप में विभागीय प्रबन्धकों द्वारा ही निर्धारित कर ली जाती है, जैसे कम्प्यूटर में दोष आ जाने पर उसे नए कम्प्यूटर द्वारा प्रतिस्थापित कर देना कम्पनी की एक नीति कही जाएगी, परन्तु प्रतिस्थापित करने से पूर्व क्या-क्या कदम उठाए जाएँगे, नीति को लागू करने की कार्यविधि है।

5. नियमों की रचना नियम प्रत्येक कर्मचारी के आचरण को नियन्त्रित करते हैं और नीतियों को लागू करने में सहायक होते हैं; जैसे ग्राहकों को एक माह तक की उधार देना एक नियम है। इसी प्रकार कुछ नियम किसी विशिष्ट नीति से सम्बन्धित न होकर सामान्य भी हो सकते हैं; जैसे-मशीन पर कार्य करते समय धूम्रपान वर्जित है।

6. बजट बनाना – बजट अल्पकालीन नियोजन का भाग है। दीर्घकालीन लक्ष्यों के अन्तर्गत ही कुछ अल्पकालीन लक्ष्य निर्धारित कर लिए जाते हैं; जैसे-विक्रय या उत्पादन का लक्ष्य। इनको उपयुक्त नीतियों के अन्तर्गत ही कार्यान्वित करने के लिए संख्यात्मक रूप में बजट तैयार किया जाता है ताकि संसाधनों की व्यवस्था समयानुसार की जा सके।

7. कार्यक्रम बनाना – उपक्रम के उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए ही कार्यक्रम Horogrammes) बनाए जाते हैं। जैसे यदि बाजार पर प्रभुत्व प्राप्त करना एक उद्देश्य है तो उसके लिए विज्ञापन कार्यक्रम बनाया जा सकता है। कार्यक्रम तथा परियोजनाएँ लगभग समानार्थक हैं।

प्रश्न – 3 निर्णयन की प्रक्रिया का वर्णन कीजिए। 

Elaborate the process of decision-making. 

उत्तर – निर्णयन प्रक्रिया

(The Decision-making Process) 

निर्णयन प्रक्रिया में सामान्यतया निम्न सोपान होते हैं-

(1) समस्या का निदान (Diagnosis of the Problem), 

(2) सम्भावित विकल्पों की खोज (Search for Possible Alternatives), 

(3) विकल्पों का मूल्यांकन (Evaluation of Alternatives),

(4) किसी विकल्प का चयन या निर्णय (Selection of an alternative or Decision-making),

(5) निर्णय का क्रियान्वयन एवं मूल्यांकन (Implementation and Evaluation of the Decision)।

समस्या का निदान 

(Diagnosis of the Problem)

निर्णयन प्रक्रिया में पहले यह समझना होता है कि वास्तविक एवं सही समस्या क्या है। अगर प्रारम्भ से ही समस्या के सही स्वरूप का निश्चय नहीं हो पाता है तो उसके समाधान के लिए लिया गया निर्णय फलदायक सिद्ध नहीं होगा और उस पर किया गया सम्पूर्ण व्यय तथा परिश्रम व्यर्थ हो जाएगा। इसके साथ-ही ऐसा भी हो सकता है कि इस समस्या के साथ कुछ अन्य समस्याएँ भी उठ खड़ी हों।

समस्या के निदान में उसके समस्त मूल कारणों का पता लगाना आवश्यक हो जाता है समस्या के मात्र कछ चिह्न या लक्षणों के प्रकट हो जाने को ही समस्या का सही निदान नही समझ लेना चाहिए। कारणों का पता लगाने के लिए समस्या से सम्बन्धित विभिन्न तथ्यों व सूचनाओं को एकत्र कर उनका विश्लेषण करना चाहिए। 

II. सम्भावित विकल्पों की खोज 

(Search for Possible Alternatives)

निर्णयन प्रक्रिया का दूसरा कदम है उन सम्भावित विकल्पों की खोज करना जिनके द्वारा समस्या का समाधान किया जा सकता है।

उदाहरणार्थ – यदि एक कम्पनी के लाभ घट रहे हैं तो लाभों के घटने की इस प्रवृत्ति को रोकने के लिए दो विकल्प सामने आते हैं-लागतों पर नियन्त्रण करना और प्रेरणात्मक मजदरी पद्धति को लाग करना। परन्त यदि विकल्प की खोज नहीं हो पाती है तो समस्या का समाधान असम्भव हो जाएगा। विकल्पों की संख्या भी इस बात पर निर्भर करेगी कि प्रबन्धक के पास निर्णय लेने में कितना समय शेष है तथा निर्णय स्वयं में कितना महत्त्वपूर्ण है।

विकल्पों को खोजने का ढंग (Means for Searching Alternatives)-किसी समस्या के समाधान के लिए सम्भावित विकल्पों का पता लगाने के लिए सम्बन्धित सूचनाओं तथा आँकड़ों की उपलब्धता निरन्तर बनी रहनी चाहिए। इन सूचनाओं का विश्लेषण कर समाधान के लिए विकल्प खोजे जा सकते हैं। प्रबन्धकीय सूचनाएँ तथा निर्णयन सह-सम्बन्धित होते हैं क्योंकि कुशल निर्णय इन सूचना तथा ऑकड़ों के संग्रहण, वर्गीकरण तथा विश्लेषण पर ही निर्भर करता है

स्वयं के अनुभव पर पुनर्विचार, अन्य फर्मों की विधियों की जाँच, ब्रेन स्टोर्मिंग विधि, सांकेतिक समूहीकरण विधि आदि विकल्प खोजने की अनेक विधियाँ हो सकती हैं। 

III. विकल्पों का मूल्यांकन

(Evaluation of Alternatives)

किसी समस्या के वैकल्पिक समाधानों का मूल्यांकन किया जाना निर्णयन प्रक्रिया का तीसरा चरण है। विभिन्न विकल्पों को खोज लेने के बाद प्रबन्धक इस स्थिति में होता है कि वह गुण-दोष या लागत-लाभ विश्लेषण (cost-analysis) के आधार पर सभी विकल्पों का मूल्यांकन करे। चूंकि सभी विकल्पों में कुछ गुण और दोष विद्यमान होते हैं, अत: उनका मूल्यांकन निष्पक्ष तथा वैज्ञानिक ढंग से किया जाना चाहिए। विकल्पों के प्रभावों का मूल्यांकन करते समय प्रबन्धक को उन सीमाओं को ध्यान में रखना चाहिए जिनकी परिधि में ही निणय लिए जाने होते हैं; जैसे

(त) आन्तरिक एवं बाह्य वातावरण, (ii) कम्पनी की पूँजी-सम्बन्धी क्षमता,

(ii) कम्पनी का निधारित नीति, (iv) उपलब्ध समय तथा संसाधना 

IV. किसी विकल्प का चयन या निर्णय

(Selection of an alternative or Decision-making)

एक समस्या के समाधान के लिए खोजे गए विभिन्न विकल्पों का मूल्यांकन कर पश्चात उनमे स किसा एक विकल्प को चुनने की आवश्यकता होती है जो निण कहलाता है। यह कार्य ऊपरी तौर पर आसान पता है परन्तु वास्तव में, सर्वाधिक कठिन

कार्य है। गलत निर्णय हो जाने की आशंका में कुछ कमजोर प्रबन्धक तो निर्णय ही नहीं ले पाते हैं। वैसे निर्णय लेने से पूर्व निम्नलिखित बातों को ध्यान में रखना चाहिए।

(i) किस विकल्प द्वारा निर्दिष्ट लक्ष्यों की प्राप्ति सम्भव है, 

(ii) कौन-सा विकल्प आर्थिक प्रभावशीलता की दृष्टि से सर्वोत्तम है

(iii) कौन-सा विकल्प फर्म के आन्तरिक एवं बाह्य वातावरण के अन्तर्गत क्रियान्वित किया जाना सम्भव है।

विकल्प के चयन में कभी-कभी परिमाणात्मक तकनीकों का भी सहारा लिया जाता है। इन परिमाणात्मक तकनीकों में सम्भाव्यता सिद्धान्त (Probability Theory), प्रतीक्षा पंक्ति सिद्धान्त (Queuing Theory), रेखीय प्रोग्रामिंग (Linear Programming), खेल का सिद्धान्त (Game Theory) आदि प्रमुख हैं। 

v. निर्णय का क्रियान्वयन एवं मूल्यांकन 

(Implementation and Evaluation of the Decision)

यह निर्णयन प्रक्रिया का पाँचवाँ लेकिन महत्त्वपूर्ण चरण है। एक विकल्प का चयन कर लेने के बाद यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि उसका सही प्रकार से क्रियान्वयन हो। यही प्रभावी नियोजन का आधार है।

विकल्प का चयन कर लेने के बाद प्रबन्धक को चाहिए कि वह इसके क्रियान्वयन के लिए विस्तृत रूपरेखा तैयार करे। उसको सम्बन्धित अधिकारियों को सम्प्रेषित करे, उसके लिए समर्थन जुटाने के साथ-साथ तथा आवश्यक संसाधन उपलब्ध कराए। निर्णायक का यह दायित्व है कि वह अपने निर्णय के क्रियान्वयन को सुनिश्चित करे। वह यह सोचकर ही सन्तुष्ट न हो जाए कि निर्णय हो जाने के बाद तो वह स्वमेव ही क्रियान्वित हो जाएगा।

निर्णय के क्रियान्वयन के बाद निर्णय का मूल्यांकन भी किया जाना आवश्यक है ताकि यह पता लगाया जा सके कि निर्णय समस्या के समाधान में कितना सहायक सिद्ध हुआ। यह ऐसी प्रक्रिया है जिसमें प्रबन्धक अपने अनुभवों से सीखता है और सीखने की इस प्रक्रिया के दौरान अपने अनुभव में वृद्धि करता है।

प्रश्न 4 – समामेलित नियोजन का अर्थ बताइए। इसकी मुख्य विशेषताएँ क्या हैं? क्या भारत में समामेलित नियोजन सफल हो रहा है?

Explain the meaning of corporate planning. What are its main characteristics ? Is corporate planning successful in India ? 

उत्तर- निगमीय नियोजन का अर्थ एवं परिभाषा

(Meaning and Definition of Corporate Planning) 

सरल शब्दों में, निगमीय नियोजन से आशय ऐसी योजनाओं से है जो किसी कम्पनी के विकास एवं विस्तार के लिए स्वयं उद्योगपतियों अथवा उच्च प्रबन्ध द्वारा दीर्घकालीन रणनीति के आधार पर बनाई जाती हैं। वस्तुत: निगमीय नियोजन दीर्घकालीन समयावधि का होता है।

निगमीय नियोजन की मुख्य परिभाषाएँ अग्रलिखित हैं –

1. एन्डरसन के अनुसार, “निगम नियोजन का आशय ऐसी अग्रोन्मुखी रणनीतिक योजनाओं के निर्माण से लगाया जाता है जो सम्पूर्ण व्यवसाय के लिए संचालक मण्डल द्वारा स्थापित निगमित-नीति संरचना के अन्तर्गत दीर्घकालीन, मध्यमकालीन तथा अल्पकालीन उद्देश्यों को परिभाषित करती हैं।”

2. पीटर ड्रकर के अनुसार, “निगम नियोजन सर्वोत्तम सम्भव भावी ज्ञान के आधार पर क्रमबद्ध रूप में साहसिक निर्णय करने, उन निर्णयों को लागू करने के लिए आवश्यक प्रयास को क्रमबद्ध रूप में संगठित करने तथा संगठित क्रमबद्ध फीडबैक द्वारा लक्ष्यों के विरुद्ध परिणामों को मापने की एक सतत प्रक्रिया है।”

3. स्टेनर के अनुसार, “निगमीय नियोजन एक संगठन के मुख्य लक्ष्यों तथा उन नीतियों ए एवं व्यूह रचनाओं का निर्धारण करने की प्रक्रिया है जो उन लक्ष्यों की प्राप्ति हेतु संसाधनों की प्राप्ति, उपयोग तथा निस्तारण को नियन्त्रित करती है।”

निगमीय नियोजन के लक्षण/विशेषताएँ

(Characteristics of Corporate Planning) 

1. रणनीतिक नियोजन एवं परिचालन नियोजन दोनों का समावेश यह उपक्रम की रणनीतिक योजना को अल्पकालीन परिचालन योजनाओं से एकीकृत करती है। रणनीतिक नियोजन का लक्ष्य अपनी विलक्षण आन्तरिक क्षमताओं व बाह्य अवसरों का उपयोग करते हुए अपनी प्रतियोगी शक्ति’ को मजबूत करना है, जबकि संचालकीय योजनाएँ; जैसे-उत्पादन योजना, विपणन योजना, वित्त योजना आदि रणनीतिक नियोजन को कार्यान्वित करने के लिए है तैयार की जाती हैं।

2. दूरगामी प्रभावों एवं चुनौतियों का पूर्वानुमान – निगमीय नियोजन के अन्तर्गत दूरगामी प्रभावों एवं चुनौतियों का पूर्वानुमान करके कम्पनी की क्षमताओं एवं संसाधनों के प्रभावी उपयोग पर बल दिया जाता है।

3. विस्तृत कार्य-योजना – यह कम्पनी की मास्टर योजना होती है। समस्त कार्यात्मक योजनाएँ इसी से तैयार की जाती हैं।

4. दीर्घकालीन दृष्टि – निगमीय नियोजन दीर्घकालीन दृष्टि का अनुसरण करता है।

5. उच्च प्रबन्ध अथवा उद्योगपति द्वारा निर्माण – निगमीय नियोजन का निर्माण स्वयं उद्योगपतियों द्वारा अथवा उच्च प्रबन्ध द्वारा किया जाता है।

6. सतत प्रक्रिया बाह्य एवं आन्तरिक परिवर्तनों के अनुरूप निगमीय नियोजन में सुधार एवं संशोधन का कार्य सदैव चलता रहता है।

7. व्यवस्थित प्रक्रिया – निगमीय नियोजन कम्पनी के दीर्घकालीन लक्ष्यों की प्राप्ति हेतु संसाधनों की प्राप्ति, उपयोग तथा निस्तारण की व्यवस्थित प्रक्रिया है।

निगमीय नियोजन के प्राचल (Parameters of Corporate Planning)निगमीय नियोजन के निर्माण में निम्नलिखित प्राचलों का प्रयोग किया जाता है –

(1) संस्था के उज्ज्वल भविष्य के लिए किए जाने वाले कार्य अर्थात् पृथक्-पृथक् । विभागों के लिए पृथक्-पृथक् योजनाएँ बनाना।

(2) वर्तमान समय में जिन क्षेत्रों में कार्य किया जा रहा है उनके विकास की सम्भावनाओं को निर्धारित करना।

(3) तकनीकी ज्ञान के सहयोग वाले क्षेत्रों का निर्धारण। 

(4) पर्याप्त विकास की सम्भावना वाले क्षेत्रों का निर्धारण।

निगमीय नियोजन के लाभ (Advantages of Corporate Planning)निगमीय नियोजन के प्रमुख लाभ निम्नलिखित हैं-

(1) निगमीय नियोजन के माध्यम से कम्पनी की नीतियाँ अधिक अर्थपूर्ण बन जाती हैं एवं उचित प्रबन्धकीय नियन्त्रण सुनिश्चित हो जाता है।

(2) संस्था के कार्य-कलापों की गति में वृद्धि होती है।

(3) निगमीय नियोजन के माध्यम से जिस पर्यावरण में सम्बन्धित कम्पनी संचालित होगी, उक्त पर्यावरण की पूर्व जानकारी प्राप्त हो जाती है।

(4) निगमीय नियोजन के द्वारा जोखिम व परिवर्तनों का प्रभावपूर्ण प्रबन्ध करके गम्भीर संकटों से बचा जा सकता है।

(5) पूर्व निर्धारित लक्ष्यों की प्राप्ति एवं अपने बचाव के लिए मोर्चाबन्दी करने में सहायता मिलती है।

(6) बाह्य चुनौतियों, खतरों एवं अनिश्चितताओं के विरुद्ध सुरक्षा प्राप्त की जा सकती है।

(7) निगमीय नियोजन के द्वारा भौतिक एवं मानवीय संसाधनों का प्रभावी उपयोग सम्भव होता है।

(8) निगमीय नियोजन कम्पनी को एक दिशा एवं लक्ष्य-बोध प्रदान करता है। 

(9) निगमीय नियोजन दीर्घकालीन समस्याओं पर गहनता से ध्यान केन्द्रित करता है।

निगमीय नियोजन के दोष व बाधाएँ

(Obstacles of Corporate Planning) 

निगमीय नियोजन के प्रमुख दोष व बाधाएँ निम्नलिखित हैं-

(1) भावी प्रतिस्पर्धा का पूर्वानुमान कठिन होता है।

(2) तीव्र परिवर्तनों एवं गतिशील वातावरण के साथ निगमीय नियोजन को समायोजित करना कठिन होता है।

(3) बदलती हुई सरकारी नीतियाँ व कानून भी निगमीय नियोजन में बाधा उत्पन्न करते हैं।

(4) बन्द कमरों में तैयार किया गया निगमीय नियोजन व्यावहारिक परिस्थितियों के त अनुकूल नहीं होता।

भारत में निगमीय योजनाओं का क्रियान्वयन (Implementation of Corporate Planning in India) हमारे देश में निगमीय योजनाओं को क्रियान्वित करने में अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ता है। इन समस्याओं को मुख्य रूप से दो भागों में विभक्त किया जा सकता है—(1) योजना की कमियाँ, एवं (2) संस्था के बाहरी वातावरण में समय-समय पर होने वाले तीव्र परिवर्तन। इस सन्दर्भ में डी०एम० कोहली का यह कथन

उल्लेखनीय है कि भारत में निगमीय योजनाएँ प्रथम तो इसलिए असफल होती हैं कि आधुनिक विधियों से प्रारम्भ न किया जाकर परम्परागत विधियों से प्रारम्भ किया जाता है और दूसरे उनके उद्देश्य वास्तविकता से कहीं ऊँचे निर्धारित किए जाते हैं। दीर्घकालीन योजना तैयार करते समय इस बात का ध्यान नहीं रखा जाता कि अल्पकालीन योजनाएँ जो दीर्घकालीन योजनाओं का ही अंग हैं. किस प्रकार लागू की जा सकती हैं।

प्रश्न 5 – कार्यनीति को परिभाषित कीजिए। कार्यनीति निर्माण के अन्तर्गत उठाए जाने वाले कदमों का वर्णन कीजिए।

Define Strategy. Describe the steps taken in the formulation of 

उत्तर- कार्यनीति/व्यूह-रचना का अर्थ एवं परिभाषा

(Meaning and Definitions of Strategy)

कार्यनीति शब्द अंग्रेजी शब्द ‘Strategy’ शब्द से लिया गया है जो French शब्द से आया है और French लोगों ने इस शब्द को यूनान से लिया है। अंग्रेजी शब्द Strategy को दो अर्थों में प्रयोग किया जाता है

(i) युद्ध की कला जिसमें सैन्य संचालन व युद्ध की व्यूह-रचना शामिल है तथा

(ii) कोई कार्ययोजना या योजना को क्रियान्वित करने का ढंग जिसका उपयोग व्यवसाय या राजनीति के क्षेत्र में किया जाए।

हमारे अध्ययन के लिए strategy का दूसरा अर्थ ही प्रासंगिक है न कि व्यूह-रचना जैसा कि कुछ लेखक लिखते रहे हैं।

नियोजन में कार्य योजना एक महत्त्वपूर्ण सोपान है, जिसमें अनेक बिन्दुओं का ध्यान रख जाता है। कुछ विद्वानों ने कार्ययोजना को निम्नानुसार परिभाषित किया है-

मेलविन जे० स्टेनफोर्ड (Melvin J. Stanford) के अनुसार, “कार्ययोजना एक ऐसा तरीका है जिसमें प्रबन्ध फर्म के संसाधनों को उसके वातावरण के भीतर उसके उद्देश्यो तक पहुँचने के लिए प्रयोग हेतु चुनता है। इस प्रकार कार्ययोजना में फर्म, इसके उद्देश्यों तथा वातावरण के मध्य बहुआयामी सम्बन्ध सम्मिलित किए जाते हैं।”

कुण्ट्ज एवं ओडोनेल के अनुसार, “व्यवसाय में कार्ययोजना का सम्बन्ध उन दिशा-निर्देशों से है जिनमें मानव एवं भौतिक संसाधनों को, कठिनाइयों के सन्दर्भ में, एक चयनि उद्देश्य को प्राप्त करने की सम्भावना को सर्वाधिक करने के लिए लगाया एवं प्रयोग किया जाए।”

निष्कर्ष – उपर्युक्त परिभाषाओं को ध्यान में रखते हुए कहा जा सकता है कि कार्य योजना एक ऐसी योजना है जो विशेष कठिन परिस्थितियों में कुछ चुने हुए उद्देश्यों को पूरा कुशलता से प्राप्ति हेतु संस्था की समस्त कार्यवाहियों को सही दिशा देने के लिए बनाई जाती है। अतः कार्ययोजना एक व्यापक एवं समग्र योजना है जो प्रतिद्वन्द्वी व्यवसायियों की कार्यनीतिया एवं क्रियाओं को ध्यान में रखकर इस स्वरूप में बनायी जाती है, ताकि संगठनात्मक लक्ष्यों के सुगमता एवं प्रभावी ढंग से उपक्रम के हित में प्राप्त किया जा सके।

कार्यनीति निर्माण के लिए उठाए जाने वाले कदम

(Steps taken in the Formulation of Strategy) 

व्यवसाय में कार्ययोजना का उपयोग विशिष्ट परिस्थितियों का लाभ उठाने अथवा विपरीत परिस्थितियों को अनुकूल बनाने के लिए किया जाता है। प्राय: कार्ययोजना की सफलता हेतु कम्पनी में निम्नलिखित बिन्दु महत्त्वपूर्ण होते हैं

1. कार्ययोजना के उद्देश्यों का निर्धारण (Determination of Strategic Objectives)-कार्ययोजना के प्रतिपादन हेतु सर्वप्रथम हमें निश्चयात्मक उद्देश्यों को निर्धारित करना होता है। हमें यह पता होना चाहिए कि योजना का प्रतिपादन किस लक्ष्य या लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए किया जाना है क्योंकि जब तक हमें निश्चित लक्ष्य की ही जानकारी नहीं होगी, तब तक हम योजना का प्रतिपादन कैसे करेंगे।

2. व्यूह-रचना का प्रतिपादन (Formulation of Strategy)-जब प्रबन्धकों को सभी परिस्थितियों का पूर्ण ज्ञान प्राप्त हो जाए तो व्यूह-रचना का प्रतिपादन करना चाहिए तथा वैकल्पिक कार्यनीति का भी विकास करना चाहिए तथा जो सर्वोत्तम लाभदायक कार्यनीति हो उसे ही अपनाना चाहिए।

3. (Analysis of External Environment)बाह्य वातावरण में संगठन के बाहर के उन सब घटकों को सम्मिलित किया जाता है जो संगठन के लिए लाभकारी अवसर तथा विपरीत चुनौतियाँ (Opportunities and threats) प्रस्तुत करते हैं। कार्ययोजना का प्रतिपादन करने हेतु इन चुनौतियों व अवसरों को समझना व उनका विश्लेषण करना आवश्यक है।

4. फर्म की कमजोरियों एवं शक्ति का विश्लेषण (Analysis of the Weaknesses and Strengths of the Firm)-कार्ययोजना को सम्पन्न करने के लिए सम्बन्धित फर्म की कमजोरियों एवं शक्ति का विश्लेषण करना भी आवश्यक है। संगठन में जो कमजोरियाँ हों, उन्हें दूर करने के लिए उचित कदम उठाने चाहिए।

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