B.Com 2nd Year Public Revenue Long Notes In Hindi

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प्रश्न 6 – अल्पविकसित देशों के आर्थिक विकास में घाटे की वित्त व्यवस्था की भूमिका का आलोचनात्मक वर्णन कीजिए।

Discuss the role of deficit financing in the economic development of underdeveloped countries. 

उत्तर – हीनार्थ प्रबन्धन का अर्थ

(Meaning of Deficit Financing

सरल शब्दों में, हीनार्थ प्रबन्धन अथवा घाटे की वित्त व्यवस्था एक ऐसी स्थिति है जिसमें कार का व्यय उसकी आय का तुलना में अधिक होता है और सरकार इस घाटे की पूर्ति करने के ऋण लेती है चाहे वह ऋण जनता से लिया जाए (आन्तरिक ऋण) या केन्द्रीय बैंक से अथवा नई मुद्रा छापकर उसकी पूर्ति की जाए

1. पाश्चात्य दृष्टिकोण (Western Concept)-अधिकांश पश्चिमी देशों में जब कभी सरकार का व्यय उसकी आय से अधिक हो जाता है तो बैंकों तथा जनता से ऋण लेकर इस घाटे की पूर्ति की जाती है। इस विधि को हीनार्थ प्रबन्धन कहते हैं। डॉ० के० के० शर्मा के अनुसार, “पश्चिमी देशों में राजस्व प्राप्तियों की तुलना में सरकार द्वारा किए गए व्यय की अधिकता को जिसमें कि पूँजीगत व्यय भी सम्मिलित है, घाटे की वित्त व्यवस्था कहा जाता है, भले ही उस व्यय की पूर्ति ऋण द्वारा उपलब्ध प्राप्तियों से की गई हो।”

2. भारतीय दृष्टिकोण (Indian Concept)-भारत में घाटे की वित्त व्यवस्था से तात्पर्य है कि सरकार बजट के घाटे को अधिक नोट छापकर अथवा केन्द्रीय बैंक से ऋण लेकर पूरा करे। दोनों ही दशाओं में देश में मुद्रा की मात्रा में वृद्धि होती है। इस आधार पर हीनार्थ प्रबन्धन की मुख्य परिभाषाएँ निम्न हैं

(i) डॉ० वी० के० आर० वी० राव के अनुसार, “जब सरकार जानबूझकर किसी उद्देश्य से अधिक व्यय करे और अपने घाटे की पूर्ति ऐसी विधि से करे जिससे देश में मुद्रा की मात्रा बढ़े तो इसे हीनार्थ प्रबन्धन कहते हैं।”

(ii) योजना आयोग के अनुसार, “हीनार्थ प्रबन्धन शब्द का उपयोग बजट के घाटे द्वारा सकल राष्ट्रीय व्यय में प्रत्यक्ष वृद्धि से किया जाता है, चाहे यह आयगत कमी हो या पूँजीगत खाते से हो।”

इस प्रकार घाटे की वित्त व्यवस्था का प्रयोग तब होता है जब सरकार अपनी आय से अधिक व्यय करती है जो उसे करों, राजस्व के अन्य साधनों, जनता से ऋणों, बैंकों से उधार तथा नकद कोषों को खर्च करके प्राप्त होती है।

I. परम्परागत या मौलिक उद्देश्य 

(Traditional or Basic objectives)

ये उद्देश्य निम्नलिखित हैं-

(1) मन्दीकाल को दूर करना (To Counter Depression)-प्रत्येक देश में व्यापार-चक्र क्रियाशील रहते हैं। मन्दी की अवस्था में कुल प्रभावपूर्ण माँग में कमी, उत्पादन में गिरावट, विनियोग की कमी तथा बेरोजगारी आदि स्थितियाँ उत्पन्न हो जाती हैं। घाटे की वित्त-व्यवस्था मन्दी को दूर करने में सहायक होती है।

मन्दी के प्रभाव को दूर करने के लिए घाटे की वित्त-व्यवस्था के दो स्वरूप हैं

(अ) पम्प उपक्रामण (Pump Priming) – इसके अन्तर्गत अर्थव्यवस्था में मन्दी से उत्पन्न शिथिलता को दूर करने के लिए सार्वजनिक निर्माण कार्य आरम्भ किए जाते हैं। इसके फलस्वरूप रोजगार में वृद्धि होती है, प्रभावी माँग बढ़ती है तथा उत्पादन एवं राष्ट्रीय आय में वृद्धि होती है।

(ब) चक्रीय हीनार्थ प्रबन्धन (Cyclical Deficit Financing)-इस उपाय का उद्देश्य व्यापार-चक्र की तीव्रता को कम करना होता है। इसके अन्तर्गत सरकार अपने व्यय में वृद्धि करती है और करों में छूट देती है। कभी-कभी बेरोजगारी भत्ते भी दिए जाते हैं।

(2) युद्ध की वित्तीय व्यवस्था के लिए – (For War Financing)-युद्ध के संचालन के लिए बड़े पैमाने पर मुद्रा की आवश्यकता पड़ती है। इस समय करारोपण से एकाएक आय प्राप्त नहीं हो सकती और अतिरिक्त करों को लगाना भी सम्भव नहीं होता। ऋणों से भी पर्याप्त आय प्राप्त नहीं हो पाती। ऐसी स्थिति में युद्ध संचालन की वित्तीय व्यवस्था में हीनार्थ प्रबन्धन के अतिरिक्त सरकार के पास दूसरा साधन नही रह जाता।

(3) निजी निवेश को पूरा करने के लिए – (To Supplement Private Investment) अर्थव्यवस्था में निजी क्षेत्र का महत्त्वपूर्ण स्थान होता है। जब देश में निजी निवेश पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध नहीं होता तो सरकार घाटे की वित्त-व्यवस्था करके स्वयं सामान्य से अधिक व्यय करती है जिससे निजी निवेश की कमी दूर हो जाए, प्रभावपूर्ण माँग में वृद्धि हो और अर्थव्यवस्था को गति मिले। 

II. आधुनिक उद्देश्य

(Modern objectives)

आधुनिक समय में घाटे की वित्त व्यवस्था का प्रमुख उद्देश्य आर्थिक विकास के लिए विन्न उपलब्ध करना है। आर्थिक विकास में घाटे की वित्त-व्यवस्था निम्न प्रकार से सहायक होती है 

(1) भौतिक साधनों का पूर्ण उपयोग – विकासशील देशों में भौतिक साधन पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध रहते हैं जिनका टोहन पँजी के अभाव क कारण नहीं हो पाता। हीनार्थ प्रबन्धन के द्वारा सरकार

पर्याप्त धन प्राप्त कर लेती है जिसके माध्यम से उपर्युक्त संसाधनों का विवेकपूर्ण विदोहन संभव या है. फलत: उत्पादन और रोजगार में वृद्धि होती है।

(2) उपभोग स्तर में कमी (Reduction in Consumption Level) घाटे की वित्त-व्यवस्था से कीमतें बढ़ती हैं। फलस्वरूप लोगों के उपभोग स्तर में कमी होती है तथा वे बचत करने के लिए विवश हो जाते है। इन बचतों का प्रयोग निवेश बढ़ाने के लिए किया जाता है।

(3) तरलता पसन्दगी में वृद्धि (Increase in Liquidity Preference)-आर्थिक विकास के फलस्वरूप लोगों के जीवन-स्तर में वृद्धि होने से उनके द्वारा नकद कोष के रूप में तरलता पसन्दगी बढ़ जाती है तथा मुद्रा की माँग अधिक की जाने लगती है।

(4) अर्थव्यवस्था का अमौद्रिक क्षेत्र (Non-monetary Sector of Economy)-अल्प-विकसित देशों का अधिकांश क्षेत्र अमौद्रिक होता है। 

विकास की गति के साथ ही यह अमौद्रिक क्षेत्र धीरे-धीरे मौद्रिक होने लगता है जिससे मुद्रा की माँग स्वत: ही बढ़ने लगती है।

विकासशील देशों में घाटे की वित्त-व्यवस्था की कार्यकुशलता आर्थिक विकास को बढ़ाने के एक साधन के रूप में निम्नलिखित घटकों पर निर्भर करती है

(i) घाटे की वित्त-व्यवस्था को अर्थव्यवस्था के सोखने या पोषक की शक्ति के अनुसार करना चाहिए।

(ii) घाटे की वित्त-व्यवस्था द्वारा होने वाली अनिवार्य बचतों से उपभोग में कमी आ जाने से जो संसाधन मुक्त हो जाते हैं, उनका उपयोग उच्च उत्पादक क्षेत्र में किया जाना चाहिए जिससे राष्ट्रीय उत्पादन अधिकतम हो सके।

(iii) घाटे की वित्त-व्यवस्था की क्रियाओं के अन्तर्गत वास्तविक बचतों का अनुपात स्फीतिक प्रभाव के अन्तर्गत समाज द्वारा सहन किए गए वास्तविक कष्टों से अधिक होना चाहिए।

प्रश्न 7- सार्वजनिक आय से क्या आशय है? भारत के सन्दर्भ में सार्वजनिक आय के विभिन्न साधनों की व्याख्या कीजिए।

What it meant by Public Revenue? Discuss the main sources of puble revenue with special reference to India. 

अथवा लोक आगम के प्रमुख साधन क्या हैं? विस्तार से समझाइए।

What are the principal sources of Public Revenue? Explain in detail. 

उत्तर – सार्वजनिक आय से आशय एवं परिभाषा

(Meaning and Definition of Public Revenue) 

राजस्व का एक मुख्य विभाग सार्वजनिक आय है। जिस प्रकार किसी व्यक्ति को अपनी विभिन्न आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए आय की आवश्यकता होती है उसी प्रकार

सरकार को भी अपने कार्यों को सफलतापर्वक क्रियान्वित करने के लिए आय की आवश्यकता होती है। विभिन्न साधनों के माध्यम से सरकार जो आय प्राप्त करती है उसे सार्वजनिक आय या लोक आगम या सार्वजनिक आगम कहते हैं।

प्रो० डाल्टन के अनुसार, “सार्वजनिक आय को सूक्ष्म तथा व्यापक दोनों अर्थों में प्रयुक्त करते हैं। व्यापक अर्थ में इसमें सरकार को प्राप्त होने वाली सभी प्रकार की प्राप्तियों को सम्मिलित किया जाता है। इसके विपरीत. संकचित अर्थ में, इसमें सिर्फ उन प्राप्तियों को ही सम्मिलित किया जाता है जिसे आगम की सामान्य धारणा के अन्तर्गत माना जाता है।”

अन्य शब्दों में, सार्वजनिक आय से आशय सरकार की उन सभी प्राप्तियों से है जिनसे सरकार के दायित्वों में कोई वृद्धि नहीं होती अर्थात् जिन्हें सरकार को भविष्य में लौटाना नहीं पड़ता है।

सार्वजनिक आय के विभिन्न साधन

(Different sources of Public Revenue) 

सार्वजनिक आय के प्रमुख साधन निम्नलिखित हैं

I. कर आगम (Tax Revenue)। 

II. गैर-कर आगम (Non-tax Revenue):

(1) वाणिज्यिक आय (Commercial Revenue) 

(2) प्रशासनिक आय (Administrative Revenue) 

(3) उपहार एवं अनुदान (Gifts and Grants)

(4) अन्य गैर-कर आगम (Other Non-tax Revenue)। 

1.कर आगम (Tax Revenue)

आधुनिक राज्यों की आय का प्रमुख साधन कर है। सरकार जनता से सार्वजनिक कार्यो के संचालन हेतु जो धन वसूल करती है उसे कर (Tax) कहते हैं। दूसरे शब्दों में, कर से आशय अनिवार्य भुगतान से है जो सरकार द्वारा अपने व्ययों एवं कल्याणकारी कार्यों को करने देत देश की जनता से प्राप्त किया जाता है। कर प्राय: दो प्रकार के होते हैं-(i) प्रत्यक्ष कर तथा अप्रत्यक्ष कर। प्रत्यक्ष कर सामान्यत: व्यक्तियों पर लगाए जाते हैं तथा इनका कर-भार एक व्यक्ति पर ही पड़ता है। अप्रत्यक्ष कर वस्तुओं या सेवाओं पर लगाए जाते हैं तथा यह कर-भार विभिन्न व्यक्तियों पर पड़ता है।

विभिन्न अर्थशास्त्रियों ने कर को निम्न प्रकार परिभाषित किया है-

(1) फिण्डले शिराज के अनुसार, “कर (जनता द्वारा) सार्वजनिक अधिकारियों को दिए जाने वाले अनिवार्य अंशदान हैं जिन्हें सार्वजनिक लाभ हेतु सरकार द्वारा किए जाने वाले सामान्य व्यय का पूरा करने के लिए दिया जाता है और जिनका विशेष लाभ से कोई सम्बन्ध नहीं होता।”

(2) डाल्टन के अनुसार, “कर किसी सार्वजनिक सत्ता द्वारा लगाया गया एक अनिवार्य अंशदान है, चाहे करदाता को बदले में निश्चित मात्रा में सेवाएँ प्राप्त न हों, और न ही यह किसी कानूनी अपराध की सजा के रूप में लगाया जाता है।” 

(3) सेलिगमैन के अनुसार, “कर एक व्यक्ति का उन व्ययों को पूरा करने के लिए अनिवार्य अंशदान है जो सार्वजनिक हित में किए जाते हैं और जिनका सम्बन्ध विशेष लाभों की प्राप्ति से नहीं होता है।” 

(4) टेलर के अनुसार, “वे अनिवार्य भुगतान, जो सरकार को करदाता द्वारा बिना किसी प्रत्यक्ष लाभ की आशा के किए जाते हैं कर हैं।” 

(5) प्लेहन के अनुसार, “कर धन के रूप में दिया गया वह अनिवार्य अंशदान है जो राज्य के निवासियों को सामान्य लाभ पहुंचाने के लिए किए गए व्यय को पूरा करने हेतु व्यक्तियों से लिया जाता है।” इस प्रकार निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि “कर वह धन है जो देश के नागरिकों द्वारा सार्वजनिक व्ययों की पूर्ति हेतु सरकार को अनिवार्य रूप से भुगतान किया जाता है; जैसे-आयकर, बिक्री अथवा व्यापार कर, उत्पादन कर आदि।”

उपर्युक्त परिभाषाएँ कर की निम्न विशेषताओं की ओर इशारा करती हैं-

(i) कर की मात्रा सरकार पर निर्भर होती है। 

(ii) कर की आय का उपयोग सामान्य लाभ के लिए किया जाता है। (iii) कर सेवा का लागत मूल्य नहीं है। 

(iv) कर एक अनिवार्य भुगतान है।

(v) करों में करदाता को त्याग करना पड़ता है। 

II. गैरे-कर आगम 

(Non-tax Revenue)

गैर-कर आगम से आशय सरकार की उस आय से है जो कर के अतिरिक्त अन्य साधनों से प्राप्त होती है। पहले आय के इस स्रोत का अधिक महत्त्व नहीं था क्योंकि अर्थव्यवस्था में सरकारी हस्तक्षेप न के बराबर था व सरकार अपनी आय के अधिकांश भाग की पूर्ति करों द्वारा ही कर लेती थी। गैर-कर आगम के स्रोत निम्नवत् हैं-

(1) वाणिज्यिक आय (Commercial Revenue)-सरकार भी कम्पनियों और व्यक्तियों की भाँति अपना व्यवसाय (जैसे-भारतीय रेल, डाक विभाग आदि) चलाकर आय प्राप्त करती है। इन व्यवसायों से प्राप्त आय वाणिज्यिक आय कहलाती है।

वाणिज्यिक आय या मूल्य की विशेषताएँ (Characteristics of Commercial Revenueor Price)-वाणिज्यिक आय या मूल्य की निम्नलिखित विशेषताएँ होती हैं

(i) मूल्य का भुगतान करने वाले व्यक्ति को उसके बदले प्रत्यक्ष रूप से कोई वस्तु या सेवा प्राप्त नहीं होती है।

(ii) इसमें जिस राशि का भुगतान किया जाता है और इसके बदले में जो वस्तु या सेवा दी जाती है, उसके बीच एक निश्चित सम्बन्ध होता है। 

(ii) मूल्य का भुगतान अनिवार्य नहीं होता है।

(2) प्रशासनिक आय (Administrative Revenue) – सरकार द्वारा प्रशासनिक कार्य किए जाते हैं, परिणामस्वरूप सरकार को आय प्राप्त होती है। इस आय को प्रशासनिक आय कहा जाता है। सामान्यतः प्रशासनिक आय निम्न प्रकार की होती है

(i) शुल्क (Fees) – सार्वजनिक आय का मुख्य साधन शुल्क अथवा फीस है। शुल्क सरकार से प्राप्त किसी विशेष लाभ के बदले में अथवा जनहित पर व्यय की गई धनराशि को पूरा करने के लिए व्यक्ति द्वारा सरकार को दिया जाता है। शुल्क का मुख्य उद्देश्य कुछ सेवाओं अथवा सुविधाओं को जनता के हित हेतु नियन्त्रित करना होता है।

अन्य शब्दों में, सरकार द्वारा कुछ व्यक्तियों को विशेष प्रकार की सेवाएं प्रदान की जाती हैं और इन सेवाओं के बदले में उनसे कुछ राशि वसूल की जाती है जिसे शुल्क कहा जाता है जैसे-न्यायालय की फीस वही व्यक्ति अदा करता है जो किसी प्रकार का मुकदमा दायर करता है। शुल्क को विभिन्न अर्थशास्त्रियों ने निम्नवत् प्रकार परिभाषित किया है

(1) सेलिगमैन के अनुसार, “शुल्क मुख्यत: वह भुगतान है जो जनसेवा के अभिप्राय से की गई प्रत्येक निरन्तर उत्पन्न होने वाली सेवा की लागत को चुकाने के लिए लिया जाता है, परन्तु यह शुल्कदाता को एवज में कुछ विशेष लाभ भी प्रदान करता है।” 

(2) फिण्डले शिराज के अनुसार, “शुल्क सार्वजनिक हित में किए गए भुगतान हैं जो विशेष सेवाओं के लिए किए जाते हैं और जिन्हें लोगों की स्वेच्छा और अनिच्छा से स्वीकार करना होता है।” शुल्क के अन्तर्गत निम्नलिखित विशेषताएँ पायी जाती हैं

(a) शुल्क के बदले प्राय: शासन से सम्बन्धित सेवाएँ प्रदान की जाती हैं।

(b) शुल्क के बदले में कुछ विशेष लाभ प्राप्त होते हैं अर्थात् शुल्क में ‘जैसे को तैसा’ का सम्बन्ध होता है।

(c) शल्क प्राय: सेवा की लागत के अनुपात में न होकर उससे कम या अधिक हो सकता है।

(d) शुल्क का भुगतान अनिवार्य होता है।

(ii) लाइसेन्स शुल्क (Licence Fees) लाइसेन्स से आशय किसी व्यक्ति या फर्म को कोई विशेष कार्य करने की अनुमति प्रदान करने से है। जब सरकार द्वारा किसी को कोई लाइसेन्स दिया जाता है तो उसके लिए कुछ फीस भी ली जाती है, इसी को लाइसेन्स शुल्क कहते हैं। लाइसेन्स शुल्क में सरकारी निगमन एवं नियन्त्रण का उद्देश्य निहित होता है।

उदाहरणार्थ – बन्दूक के प्रयोग करने का लाइसेन्स शल्क मादक पदार्थों जातं वनयों के विक्रय का लाइसेन्स शुल्क आदि।

लुट्ज के अनुसार, “लाइसेन्स शुल्क उन अवस्थाओं में भुगतान किया जाता है जिनमें । सरकारी अधिकारी स्वयं कोई स्पष्ट सेवा प्रदान न करके किसी व्यक्ति को उस कार्य के करने की अनुमति प्रदान करता है।” लाइसेन्स शुल्क भी सार्वजनिक आय का स्रोत है।

(iii) विशेष निर्धारण (Special Assessment)-जब भी किसी भूमि या सम्पत्ति में सरकार द्वारा किए गए व्यय के परिणामस्वरूप सुधार होता है तो उस भूमि अथवा सम्पत्ति के मूल्य में वृद्धि हो जाती है। उस पर सरकार एक विशेष दायित्व लगा देती है जो प्राप्त हुए लाभ के अनुपात में होता है तथा जिसको चुकाना उसके लिए अनिवार्य होता है। इसी दायित्व को विशेष निर्धारण कहा जाता है। विशेष निर्धारण को ‘विकास सेवा’ के नाम से भी जाना जाता है।

फिण्डले शिराज़ के अनुसार, “विशेष निर्धारण, शुल्क से भिन्न होता है और इसे विशेषत: नगरपालिकाओं द्वारा सार्वजनिक हित में किए गए किसी असाधारण व्यय को पूरा करने के लिए, जिससे सम्पत्ति में सुधार होता है, एक ही बार लगाया जाता है।

टेलर के अनुसार, “विशेष कर वह भार है जो विकास कार्य से लाभान्वित सम्पत्ति पर लागत या लाभ के अनुपात में लगाया जाता है।”

सेलिगमैन के अनुसार, “विशेष कर निर्धारण वह अनिवार्य अंशदान है जो विशेष लाभ के अनुपात में लगाया जाता है और जिसका उद्देश्य सार्वजनिक कल्याण के लिए सम्पत्ति के विशेष सुधार की लागत प्राप्त करना है।”

उपर्युक्त परिभाषाओं के आधार पर विशेष निर्धारणों में निम्नलिखित विशेषताएँ पायी

जाती हैं

(a) यह किसी विशेष स्थान की लागत को पूरा करने के लिए लगाया जाता है। 

(b) इसका भुगतान अनिवार्य होता है जो प्राय: प्राप्त लाभ के अनुपात में किया जाता है। 

(c) विशेष निर्धारण भावी विकास एवं सामान्य हित में किया जाता है।

(iv) अर्थदण्ड या जुर्माना (Fine or Penalty) – किसी कानून को भंग करने के कारण व्यक्तियों पर सरकार द्वारा जो प्रभार लगाया जाता है उसे अर्थदण्ड अथवा जुर्माना कहा जाता है। अर्थदण्ड, आय का महत्त्वपूर्ण साधन नहीं है क्योंकि यह आय प्राप्ति के उद्देश्य से नहीं लगाया जाता बल्कि इसका उद्देश्य जनता को अपराध करने से रोकना होता है। कोई भी सरकार यह नहीं चाहती कि अपराध और कानून तोड़ने की घटनाओं में वृद्धि हो और उनके लिए किए गए जुर्माने से उसे अधिक आय प्राप्त हो।

प्रो० डाल्टन के अनुसार, “करों की तुलना में जुर्माने का उद्देश्य आय प्राप्त करना नहीं होता वरन अपराधियों को दण्ड देकर समाज में होने वाली बुराइयों को दूर करना अथवा रोकना होता है।”

(3) उपहार एवं अनुदान (Gifts and Grants)-सरकार को कभी-कभी उपहार एवं अनदान के माध्यम से भी आय प्राप्त होती रहती है। सरकार को उदार धार्मिक प्रवृत्ति वाले व्यक्तियों तथा धनी व्यक्तियों के माध्यम से कछ विशेष कार्यों को सम्पन्न करने के लिए उपहारस्वरूप धन अथवा सम्पत्ति प्राप्त होती है। ये उपहार मुख्यत: स्कूल, कॉलेज, चिकित्सालय तथा इसी प्रकार की सार्वजनिक संस्थाओं की स्थापना के उद्देश्य से दिए जाते है।

सामान्यत: उपहारों की मात्रा न्यनतम होती है, परन्तु युद्ध जैसी परिस्थितियों में सरकार को अपनी आय में वृद्धि करने हेत बड़ी मात्रा में धनराशि एवं सम्पत्ति उपहारस्वरूप प्राप्त होती है।

(4) अन्य गैर-कर आगम (Other Non-tax Revenues)-अन्य गैर-कर आगम निम्नलिखित हैं

(i) सार्वजनिक सम्पत्ति से आय (Income from Public Property)-प्रत्येक सरकार के पास अपनी व्यक्तिगत भूमि तथा सम्पत्ति होती है जिसे बेचकर या पट्टे पर देकर सरकार आय प्राप्त करती है। प्राचीनकाल में सार्वजनिक आय के लिए इस प्रकार के साधन का बड़ा महत्त्व होता था, परन्तु वर्तमान समय में यह इतना महत्त्वपूर्ण साधन नहीं रह गया है। सार्वजनिक सम्पत्ति में मुख्यत: जंगल, पहाड़, खान तथा भूमि इत्यादि को सम्मिलित किया जाता है।

(ii) हीनार्थ प्रबन्धन (Deficit Financing)-इसमें सरकार नोट छापकर अर्थात् पत्र-मुद्रा का निर्गमन करके अपने पास एकत्रित धनराशि में वृद्धि कर सकती है। सरकार द्वारा इस प्रकार का कार्य करने से जनकल्याण पर व्यय करने हेतु अलग से धनराशि प्राप्त होती है, परन्तु इस विधि का प्रयोग उस परिस्थिति में ही किया जाता है जब अन्य साधन समाप्त हो जाएँ।

(iii) लॉटरी से आय (Income from Lottery)-आजकल लॉटरी के टिकट बेचकर अनेक राज्य आय प्राप्त कर रहे हैं। लॉटरी से आय, गैर-कर आय का एक महत्त्वपूर्ण स्रोत बनता जा रहा है।

(iv) व्याज से आय (Income from Interest)-सरकार को ब्याज से भी आय प्राप्त होती है। ब्याज की प्राप्ति दो प्रकार से होती है-(i) विभिन्न बैंकों और वित्तीय संस्थाओं के पास जमा धनराशि पर ब्याज तथा 

(ii) दिए गए ऋणों पर ब्याजा

प्रश्न 8 – “प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष कर दोनों ही एक न्यायपूर्ण एवं पर्याप्त कर व्यवस्था के लिए आवश्यक हैं।व्याख्या कीजिए।

“Both direct and indirect taxes are needed to evolve an equitable and adequate tax system.” Discuss. 

अथवा प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष करी को परिभाषित कीजिए। प्रत्येक के गण एवं दोषों का भी उल्लेख कीजिए।

Define Direct and Indirect Taxes. Also discuss their merits and demerits.

अथवा प्रत्यक्ष तथा परोक्ष करों में भेद कीजिए। क्या परोक्ष करों के विरोध में कोई सैद्धान्तिक कारण है

Distinguish between direct and indirect taxes. Is there any theoretical cause against indirect taxation ?

उत्तर – करों को प्रत्यक्ष तथा परोक्ष दो वर्गों में बाँटने की परम्परा अत्यन्त प्राचीन है। सामान्य रूप से जब कर की देयता (Impact) तथा कर की वाह्यता (Incidence) एक ही व्यक्ति पर रहती है तो उसे प्रत्यक्ष कर (Direct Tax) कहा जाता है। इसके विपरीत, जब कर की देयता तथा वाह्यता भिन्न-भिन्न व्यक्तियों पर होती है तो उसे अप्रत्यक्ष कर (Indirect Tax) कहा जाता है। प्रत्यक्ष तथा परोक्ष करों का यह वर्गीकरण एक सामान्य वर्गीकरण है। इस आधार को स्वीकार करने में एक कठिनाई आती है। वह यह कि किसी भी कर के भार अथवा वाह्यता का हमेशा सही-सही पता लगाना सम्भव नहीं होता। इसके अतिरिक्त विभिन्न अर्थशास्त्री भी इन करों की व्याख्या एक प्रकार से नहीं करते।

प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष करों की परिभाषाएँ

(Definitions of Direct & Indirect Taxes) 

विभिन्न वित्तविदों द्वारा दी गई प्रमुख परिभाषाएँ निम्न प्रकार हैं

(1) प्रो० जे० एस० मिल – “प्रत्यक्ष कर वह है जो उसी व्यक्ति से माँगा जाता है जिससे यह आशा तथा इच्छा की जाती है कि वह उसे अपने पास से देगा और परोक्ष कर वह है जो किसी व्यक्ति से इस इच्छा अथवा आशा से माँगा जाता है कि वह किसी दूसरे से इस कमी को पूरा कर लेगा।”

प्रो० मिल के कथन का विश्लेषण करने से स्पष्ट है कि करों का भेद सरकार अथवा विधान मण्डल की इच्छा पर आधारित है। सैद्धान्तिक दृष्टि से तो यह ठीक है, परन्तु व्यवहार में यह आवश्यक नहीं कि भार सरकार की इच्छा व आशा के अनुरूप ही पड़े। दूसरे, यह ज्ञात करना भी कठिन है कि कर भार का विवर्तन (Shifting) हुआ अथवा नहीं, यदि विवर्तन हुआ तो कितनी मात्रा में।

पो०बैस्टेबिल – “प्रत्यक्ष कर वे कर होते हैं जो स्थायी तथा बार-बार उत्पन्न होने वाले अवसरों पर लगते हैं, जबकि परोक्ष कर वे कर हैं जो कभी-कभी उत्पन्न होने वाले अवसरों पर लगाए जाते हैं।”

स्टेबिल का वर्गीकरण अधिक स्पष्ट एवं सत्य नहीं है क्योंकि प्रथम बार उत्पन्न होने वाले अवसरों तथा विशिष्ट अवसरों का अर्थ स्पष्ट नहीं है। द्वितीय, यह कहना भी उचित नहीं है कि विशेष अवसरों पर लगाए जाने वाले कर सदैव ही परोक्ष कर होते हैं।

पो० डीमार्को “यदि किसी व्यक्ति की आय सीधे ही कर से मालूम की जाती है तो उसे प्रत्यक्ष कर कहना चाहिए। आय का इस प्रकार सीधे हिसाब लगाना सदैव सहज नहीं होता. फलस्वरूप अनेक व्यक्तियों की आय अंशत: अथवा पूर्णत: कर देने से वंचित रह सकती है। इन बची हुई आयों पर परोक्ष रूप से कर उस समय लगता है जब वह उसे करता है।”

प्रो० डी मार्को का यह कथन भी शत-प्रतिशत सत्य नहीं प्रतीत होता क्योकि पर कहना उचित नहीं है कि जो आय प्रत्यक्ष करों द्वारा वंचित रह जाती है उस शेष आय पर ही परोक्ष कर नहीं लगाए जाते हैं। (ii) केवल करों की चोरी को रोकने के लिए ही परोक्ष कर नहीं लगाए जाते। इसके अतिरिक्त प्रो० डी मार्को ने अपने वर्गीकरण को आर्थिक वर्गीकरण घोषित किया है, जबकि यह एक प्रशासनिक (Administrative) वर्गीकरण है।

(4) डॉ० डाल्टन – “प्रत्यक्ष कर उसी व्यक्ति द्वारा देय होता है जिस पर वह वैधानिक रूप में लगाया जाता है। परोक्ष कर एक व्यक्ति पर लगाया जाता है किन्तु भुगतान पूर्णत: अथवा अंशत: किसी अन्य व्यक्ति द्वारा किया जाता है। यह उसके अनुबन्ध या सौदे की शर्तों में कुछ परिवर्तन के द्वारा सम्भव होता है।”

प्रो० डाल्टन के दृष्टिकोण का अनुसरण करते हुए हम यह कह सकते हैं कि परोक्ष कर वह कर है जिसका भार किसी अन्य व्यक्ति पर डाला जा सकता है, जबकि प्रत्यक्ष कर में ऐसा सम्भव नहीं होता।

(5) प्रो० फिण्डले शिराज – “प्रत्यक्ष कर वे कर होते हैं जो सीधे अथवा प्रत्यक्षतः लोगों की सम्पत्ति अथवा आय पर लगाए जाते हैं और जो उपभोक्ताओं द्वारा प्रत्यक्ष रूप से राज्य को अदा किए जाते हैं। इस प्रकार आय तथा सम्पत्ति कर, मृत्यु कर, उपभोग कर जो कि प्रत्यक्ष रूप से राज्य को अदा किए जाते हैं, प्रत्यक्ष करों की श्रेणी में गिने जाएँगे, जबकि अन्य सभी कर परोक्ष करों की श्रेणी में आ जाएँगे, अर्थात् वे कर जो लोगों के कार्यों व तुष्टि प्राप्ति के कृत्यों तथा पदार्थों के उपभोग के माध्यम द्वारा उनको सम्पत्ति तथा आय तक पहुँचाते हैं, व्यवसाय कर, मनोरंजन कर, परोक्ष करों की श्रेणी में आ जाएँगे।”

इसमें सन्देह नहीं कि प्रो० शिराज के विचार सामान्य विचारधारा के अनुरूप हैं तथा इस व्याख्या में कुछ दोष पाए जाते हैं; जैसे—(1) इसमें उपभोग करों को दोनों श्रेणियों में रखा गया है। (2) करों में भेद केवल भुगतान विधि के आधार पर किया गया है जो वास्तविक नहा है। (3) इसके अतिरिक्त इस व्याख्या में कर भार पर कोई ध्यान नहीं दिया गया है।

(6) डॉ० कालडोर – “आय तथा सम्पूर्ण सम्पत्ति पर लगने वाला कर प्रत्यक्ष कर कहलाता है, जबकि सम्पत्ति के क्रय-विक्रय पर लगने वाला कर परोक्ष कर कहलाता है।

(7) प्रो० ए० आर० प्रेस्ट – वे कर जो प्राप्त होने वाली आय पर आधारित होत ह प्रत्यक्ष होते हैं और जिन्हें व्यय पर लगाया जाता है वे अप्रत्यक्ष होते हैं। इस प्रकार आयकर, लाभ कर तथा पूंजी लाभ कर प्रत्यक्ष कर हैं तथा सामा शुल्क, उत्पादन कर और स्टाम्प शुल्क अप्रत्यक्ष कर हैं।”

पो० जे० के० मेहता – वह कर प्रत्यक्ष है जिसको परी तरह से उसा व्यापा द्वारा चुकाया जाता है जिस पर उसे लगाया जाता सको पूरी तरह से उसी व्यक्ति के उसका तत्काल भार उसी व्यक्ति पर

पड़ना चाहिए जो कर अधिकारी को कर की राशि चुकाता है। अप्रत्यक्ष कर वह कर है जिसे न करने वाला व्यक्ति दूसरों पर पूर्णतया व आंशिक रूप में टाल देता है।”

उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि प्रत्यक्ष तथा परोक्ष करों के मध्य एक सर्वमान्य स्पष्ट निभाजक रेखा खींचना सरल नहीं है क्योंकि आधारभूत दृष्टिकोण में व्यापक भिन्नता दृष्टिगत होती है। फिर भी सामान्य रूप से यह कहा जा सकता है कि जिस कर के भुगतान में कर भार तथा कर दायित्व (Incidence and Impact) एक ही व्यक्ति पर पड़े उसे प्रत्यक्ष कर कहा जाता है। इसके विपरीत, जब कर भुगतान में कर भार तथा दायित्व अलग-अलग व्यक्तियों पर पड़ता है तो उसे अप्रत्यक्ष कर कहा जाता है। वस्तुतः यही वर्गीकरण अधिक व्यावहारिक, तर्कसंगत, वैज्ञानिक और न्यायसंगत है।

प्रत्यक्ष करों के गुण

(Merits of Direct Taxes) 

प्रत्यक्ष करों के मुख्य गुण निम्नलिखित हैं

(1) मितव्ययितापूर्ण (Economical) – इन करों का भुगतान करदाता द्वारा सीधे राज्य को होता है। इन करों को आय के स्रोत पर ही वसूल किया जाता है। अत: करों के संग्रह पर बहुत कम खर्च होता है।

(2) निश्चित (Certain) – प्रत्यक्ष करों में निश्चितता के सिद्धान्त (Canon of Certainty) का अधिक पालन होता है। करदाता को यह विदित होता है कि उसे कितनी मात्रा में कर का भुगतान करना है तथा सरकार को भी यह विदित होता है कि उसे कितनी धनराशि कर के रूप में प्राप्त होगी। इस प्रकार सरकार तथा व्यक्ति दोनों अपनी-अपनी आय-व्यय का सही-सही समायोजन करने में सफल हो जाते हैं।

(3) न्यायपर्ण (Just) – ये कर न्यायपूर्ण होते हैं क्योंकि इन करों का निर्धारण करदान क्षमता (Taxable Capacity) के आधार पर किया जाता है। इन करों का एक प्रमुख उद्देश्य समाज में धन तथा सम्पत्ति के वितरण को समान बनाना भी होता है। अत: ये कर प्राय: प्रगतिशील होते हैं। प्रो० जे० के० मेहता के अनुसार, “प्रत्यक्ष कर न्यायोचित हैं क्योंकि वे करदाता की योग्यता के आधार पर वसूल किए जाते हैं।”

(4) लोचपर्ण (Elastic )- प्रत्यक्ष करों में लोच (Elasticity) का पर्याप्त अंश पाया जाता है। अत: संकटकाल में करों में आवश्यकतानुसार परिवर्तन करके सरकार अपनी आय में वांछनीय परिवर्तन ला सकती है। आर्थिक विकास के साथ-साथ इन करों से प्राप्त आय भी स्वत: बढ़ती जाती है।

(5) उत्पादक (Productive – प्रत्यक्ष करों में उत्पादकता का स्वाभाविक गुण पाया जाता है। समाज के विकास तथा आर्थिक प्रगति के साथ-साथ इन करों की राशि में स्वाभाविक वृद्धि होती है। यही कारण है कि प्रत्यक्ष करों से निरन्तर आय प्राप्त होती रहती है।

सामाजिक तथा राजनीतिक चेतना (Social and Political Conscious ness)-ये कर सामाजिक तथा राजनीतिक चेतना को जाग्रत करने वाले होते हैं। इस प्रकार कर करदाताओं में त्याग, जागरूकता तथा उत्तरदायित्व की भावनाओं को जगाते हैं, फलत. प्रजातन्त्र की भावनाओं को शक्ति प्राप्त होती है। अन्य शब्दों में, इन करों का व्यापक शैक्षणिक प्रभाव (Educative Effect) भी पड़ता है।

प्रो० जे० के० मेहता के शब्दों में, “प्रत्यक्ष करों से जनता में नागरिक उत्तरदायित्व की भावना उदय हो जाती है और वे यह जानने का प्रयास करते हैं कि राज्य द्वारा संग्रह किया गया धन उचित ढंग से व्यय हुआ है या नहीं।”

प्रत्यक्ष करों के दोष

(Demerits of Direct Taxes) 

प्रत्यक्ष करों के मुख्य दोष निम्नलिखित हैं

(1) असुविधाजनक (Inconvenient)-प्रत्यक्ष करों का भुगतान सदैव ही असुविधाजनक होता है क्योंकि करदाताओं को अपने आय-व्यय का लेखा रखना पड़ता है। इतना ही नहीं कभी-कभी तो कर विशेषज्ञों की सलाह भी लेनी पड़ती है। इसके अतिरिक्त, आय भी प्राय: थोड़ी-थोड़ी करके प्राप्त होती है, लेकिन करों का दायित्व एक साथ उठाना पड़ता है।

(2) करदाताओं द्वारा विरोध (Opposition by Tax Payers)-इन करों का करदाताओं पर प्रत्यक्ष तथा तत्काल प्रभाव पड़ता है परिणामत: वे इनका विरोध करते हैं। इतना ही नहीं कभी-कभी करों की चोरी (Tax-evasion) का भी प्रयास किया जाता है।

(3) कर निर्धारण की जटिलता (Complexity of Tax Determination)प्रत्यक्ष करों की निर्धारण पद्धतियाँ जटिल तथा आधारहीन होती हैं। इतना ही नहीं कभी-कभी कर-अधिकारी कर की मनमानी राशि निर्धारित कर देते हैं जिससे ईमानदार करदाताओं को हानि होती है। इसलिए कभी-कभी यह कहा जाता है कि प्रत्यक्ष कर ईमानदारी एकर होता है। (Direct Tax is a Tax on Honesty.) प्रत्यक्ष करों की जटिल – भ्रष्टाचार को भी प्रोत्साहन मिलता है। अस्पष्ट यवस्था से

(4) उत्पादन क्षमता पर प्रतिकूल प्रभाव (Adverse Effect on Productive Capacity)-प्रत्यक्ष करों का देश व समाज की उत्पादन व समाज का उत्पादन क्षमता पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ता है क्योंकि करों का भुगतान करने के कारण बहुत-से लोग विनियोग करने से वंचित रह जात हा इसके अतिरिक्त, करदाताओं को अधिक परिश्रम करने के लिए प्रोत्साहन नहीं मिलता है।

(5) व्यय-साध्य (Expensive)-प्रत्यक्ष करों को एकत्रित करने के लिए एक विस्तृत प्रशासन की आवश्यकता होती है। अत: इन करों से राजस्व प्राप्त करना एक व्यय तथा दक्ष प्रशासन की आवश्यकता हो साध्य कार्य है।

(6) सीमित क्षेत्र (Limited Scope)-प्रत्यक्ष कर केवल उन व्यक्तियों पर ही लगाए जाते हैं जिनकी आर्थिक स्थिति अच्छी होती है और समाज में ऐसे व्यक्तियों की संख्या बहुत थोड़ी होती है। इस प्रकार प्रत्यक्ष करों का क्षेत्र बहुत सीमित होता है।

(7) करों की चोरी (Tax Evasion)-प्रत्यक्ष करों में चोरी की सम्भावना बहुत अधिक होती है। इन करों से बचने के लिए करदाता सामान्यतः झूठ और कपट का सहारा लेते हैं।

(8) अपर्याप्त आय (Inadequate Income)-प्रत्यक्ष करों से प्राप्त आय प्राय: बहुत कम होती है। अत: सार्वजनिक आय का केवल एक थोड़ा-सा अंश ही इन करों से प्राप्त होता है। विकासशील देशों में यह बात उन देशों के आय-व्यय पत्रकों से पूर्णतः स्पष्ट हो जाती है।

उपर्युक्त दोषों के बावजूद प्रत्यक्ष कर काफी लाभदायक माने जाते हैं और उपर्युक्त दोष प्रशासनिक कार्य-प्रणाली के कारण हैं, किन्हीं मौलिक सिद्धान्तों के कारण नहीं।

परोक्ष/अप्रत्यक्ष करों के गुण

(Merits of Indirect Taxes) 

परोक्ष करों के प्रमुख मुण निम्नलिखित हैं

(1) न्यायपूर्ण (Just)-परोक्ष कर मुख्यत: उपभोग पदार्थों पर लगाए जाते हैं, अत: इनका भार समस्त समाज पर पड़ता है। दूसरे, इन करों का भुगतान व्यक्ति को अपने उपभोग के अनुसार ही करना पड़ता है। अत: इन करों को न्यायपूर्ण कहा जाता है।

(2) सुविधाजनक (Convenient)-परोक्ष कर राज्य और करदाताओं दोनों के दष्टिकोण से सुविधाजनक होते हैं क्योंकि करदाता को इन करों का भुगतान वस्तुओं तथा सेवाओं का क्रय करते समय छोटी-छोटी किस्तों में करना पड़ता है, जिसमें करों का भार महसूस नहीं होता। दूसरी ओर राज्य को इन करों से काफी आय प्राप्त हो जाती है।

(3) लोचपूर्ण (Elastic)-जब परोक्ष कर ऐसी वस्तुओं तथा सेवाओं पर लगाए जाते हैं जिनकी माँग बेलोचदार (Inelastic) होती है (जैसे-अनिवार्यताएँ) तो इन करों में पर्याप्त लोच पायी जाती है। सामान्यत: अनिवार्यताओं पर लगे करों की दर में थोड़ी-सी वृद्धि करने पर पर्याप्त मात्रा में आय में वृद्धि हो जाती है।

(4) करों की चोरी सरल नहीं (No Tax Evasion)-ये कर वस्तुओं तथा सेवाओ के मूल्य में शामिल होते हैं। अत: इन करों की चोरी (Tax Evasion) सरल नहीं होती।

(5) समाज कल्याण (Social Welfare)-इन करों का सामाजिक कल्याण पक्ष अत्यन्त सुदृढ़ है क्योंकि मादक पदार्थों आदि पर उच्च दर से कर लगाकर सरकार इन पदार्थों के उपभोग को अवश्य ही नियन्त्रित कर सकती है।

(6) व्यापक सहयोग (Co-operation)-इन करा का भार प्रायः समाज सदस्यों पर पड़ता है। इस प्रकार परोक्ष करों के द्वारा राष्ट्र निर्माण में नागरिक सहयोग प्राप्त हो जाता है।

(7) मितव्ययिता (Economical)-ये कर पयोप्त बचतपूर्ण होते एकत्र करने में प्राय: सरकार को विशेष व्यय नहीं करना पड़ता।

(8) कर प्रणाली को विस्तृत आधार की प्राप्ति (Broad Base)-परोक्ष का बहुत भारी वस्तुओं तथा सेवाओं पर लगाए जाते हैं, फलतः इन करों से देश की कर पर अत्यन्त विस्तृत हो जाती है।

परोक्ष करों के दोष

(Demerits of Indirect Taxes) 

परोक्ष करों के प्रमुख दोष निम्नलिखित हैं

(1) असमानता (Inequality)-परोक्ष कर समानता तथा न्यायशीलता के विरुद्ध होते हैं। ये कर करदान क्षमता (Taxable Capacity) के सिद्धान्तों का उल्लंघन करते हैं क्योंकि इन्हें प्राय: उपभोग की वस्तुओं पर लगाया जाता है जिससे इन करों का अधिकांश भार निर्धन वर्ग पर पड़ता है। धन की सीमान्त उपयोगिता की दृष्टि से भी निर्धन वर्ग को ही अधिक त्याग करना पड़ता है जो समानता, न्यायशीलता तथा करदान क्षमता के सिद्धान्त के सर्वथा प्रतिकूल है।

(2) अनिश्चितता (Uncertainty)-“परोक्ष कर मूलतः अनिश्चित प्रकृति के होते हैं।” यह कथन लोचदार माँग वाली वस्तुओं के सन्दर्भ में अधिक सत्य है क्योंकि मूल्यो म होने वाले परिवर्तनों का माँग पर व्यापक प्रभाव पड़ता है। उपभोग के अनिश्चित होने पर इन करों से प्राप्त आय भी अनिश्चित हो जाती है।

(3) अमितव्यया (Uneconomical)-ये कर अमितव्ययी होते हैं क्योंकि छोटी-छोटी मात्रा में अधिक करदाताओं से ये कर वसल किए जाते हैं जिससे सरकार का विशेष वास्तविक लाभ नहीं हो पाता।

(4) मन्दी के समय में कम आय (Lesser Income during Rece मान्टीकाल में क्रय शक्ति के घट जाने से इन करों से प्राप्त आय भी कम हो जाता

(5) कर चोरी की सम्भावना (Tax Evasion)-परोक्ष करारोपण म (Black Marketing) तथा गलत बहीखातों के द्वारा करों की चोरी की जाती

(6) महँगाई का कारण (Cause of Inflation)-परोक्ष कर मूल्य योग देते हैं। सामान्यत: व्यापारी कर के नाम पर अधिक राशि वसूल करने का इसके अतिरिक्त सरकार तथा अन्तिम उपभोक्ता के मध्य अनेक मध्यस्थ होते हैं, जिससे वस्तुओं का मूल्य बढ़ जाता है।

(7) नागरिक तथा सामाजिक चेतना जाग्रत करने में असमर्थ (Incapable to Raise Civic and Social Consciousness)-परोक्ष कर प्रत्यक्ष करों की भाँति सामाजिक चेतना जाग्रत नहीं कर पाते क्योकि सामान्यत: करदाता को कर भार का ज्ञान ही नहीं होता।

(8) बेकारी तथा आर्थिक अनिश्चितता के जनक (Father of Unemployment and Economic Instability)-परोक्ष करों के द्वारा वस्तुओं तथा सेवाओं के उपभोग में कमी आ जाती है जिसका अन्ततः उत्पादन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है जिससे अर्थव्यवस्था म बेकारी तथा आर्थिक अनिश्चितता उत्पन्न होने लगती है।

प्रत्यक्ष तथा परोक्ष करों की तुलना 

poomparison between Direct & Indirect Taxes) 

प्रत्यक्ष तथा परोक्ष करों के मध्य प्रधानत: तीन दृष्टिकोणों से तुलना की जा सकती है

(1) साधनों का आवंटन (Distribution of Resources)-साधनों के आवंटन की दृष्टि से प्रत्यक्ष कर अधिक अच्छे माने जाते हैं क्योंकि यदि निश्चित राशि का एकत्रीकरण परोक्ष करों के द्वारा किया जाए तो उसका समाज पर अधिक भार पड़ता है। लेकिन इसके विपरीत, प्रो० ए० आर० प्रेस्ट ने परोक्ष करों के प्रभाव को अधिक श्रेष्ठ सिद्ध करने का प्रयास किया है।

(2) प्रशासकीय पहलू के आधार पर (Administrative Aspect)-प्रशासकीय दृष्टि से सामान्यत: प्रत्यक्ष कर अधिक अच्छे सिद्ध होते हैं क्योंकि इनका संग्रह सरल और सुविधाजनक होता है तथा इनकी चोरी (Tax Evasion) भी कठिन होती है।

प्रो० प्रेस्ट (Prof. Prest) ने परोक्ष करों को प्रत्यक्ष करों की अपेक्षा निम्नलिखित कारणों से अधिक अच्छा माना है

(i) अधिकांश व्यक्ति अशिक्षित होते हैं तथा वे अपनी आय के सम्बन्ध में लेखे नहीं रखते। 

(ii) छोटे उत्पादकों की संख्या अधिक होती है। 

(iii) अधिकांश व्यक्ति अपनी जीविका चलाने भर के लिए ही कमा पाते हैं।

(3) वितरण की दृष्टि से (Distribution Aspect)–वितरण के दृष्टिकोण से प्रत्यक्ष कर ही अधिक श्रेष्ठ होते हैं क्योंकि ये कर प्रगतिशील होते हैं और वे धन के वितरण की असमानता को कम करते हैं। इसके विपरीत, परोक्ष कर प्रतिगामी होते हैं और उनका भार निधन वर्ग पर अधिक पड़ता है।

प्रत्यक्ष तथा परोक्ष करों में पूरकता का सम्बन्ध

(Relationship between Direct and Indirect Taxes) 

उपर्यक्त विवेचन से स्पष्ट है कि दोनों प्रकार के करों में कुछ गुण-दोष पाए जाते हैं। अत: यह निर्णय नहीं किया जा सकता कि कौन-सा कर अधिक श्रेष्ठ है। प्राचीन समय में लोग सामान्यतः परोक्ष करों को श्रेष्ठ मानते थे, परन्तु अब लोकमत का झुकाव प्रत्यक्ष करों की ओर अधिक है। वस्तुत: लोक वित्त की उचित व्यवस्था के लिए यह आवश्यक है कि दोनों प्रकार के करों में उचित समन्वय स्थापित किया जाए ताकि एक न्यायोचित कर प्रणाली स्थापित हो सके।

फिर भी यह नहीं कहा जा सकता कि दोनों प्रकार के करों का कितनी बार जाए। वस्तुत: इस बात का निर्णय कि दोनों करों का किस सीमा तक समन्वय किया विशेष की आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक तथा मनोवैज्ञानिक स्थिति पर निर्भर वस्तुत: एक कुशल लोक वित्त व्यवस्था की दृष्टि से दोनों प्रकार के करों का लगभग महत्त्व है। वर्तमान समय की सामान्य विचारधारा भी यही है कि प्रत्यक्ष तथा पर एक-दूसरे के विरोधी न होकर परक हैं। प्रो० डी मार्को के कथन से भी इसी तथ्य की होती है-“प्रत्यक्ष तथा परोक्ष कर एक-दूसरे के पूरक हैं और परस्पर एक-दसरे केली दूर करते हैं।” प्रसिद्ध राजनीतिज्ञ ग्लैडस्टन ने इन दोनों करों को सुन्दर बहनों के समान पर जिनके बीच वे निष्पक्ष रहना चाहते थे। उनके शब्दों में, “यह केवल अनुमति योग्य नहीं, वरन कर्त्तव्य भी है कि दोनों का सत्कार किया जाए।” डाल्टन के शब्दों में “प्रत्यक्ष कर और परोक्ष कर एक-दूसरे के दोषों को कम करके कर प्रणाली में साम्य की स्थापना करते हैं।”

डी मार्को के अनुसार प्रत्यक्ष कर तथा परोक्ष कर एक-दूसरे के पूरक हैं-

(i) परोक्ष कर व्यक्ति के उपभोग पर लगाए जाते हैं और आय की उस मात्रा पर भी वसूल किए जाते हैं जो प्रत्यक्ष करों से बच जाती है। 

(ii) परोक्ष कर उन वस्तुओं पर लगाए जा सकते हैं जिनका उपयोग स्वयं उत्पादकों द्वारा किया जाता है। 

प्रश्न 9 – सार्वजनिक व्यय के, किसी देश के उत्पादन और वितरण पर पड़ने वाले प्रभावों का विवेचन कीजिए।

Discuss the effects of Public Expenditure on Production and Distribution of a Country. 

अथवा सार्वजनिक व्यय के आर्थिक प्रभावों पर संक्षिप्त नोट लिखिए। 

Write a short note on Economic Effects of Public Expenditure. 

अथवा किसी देश की आर्थिक क्रियाओं पर लोक व्यय के प्रभावों की विवेचना का

Discuss the effects of Public Expenditure on Econo Activities of a Country. 

उत्तर – सार्वजनिक व्यय के आर्थिक प्रभाव

(Economic Effects of Public Expenditure) 

प्राचीन अर्थशास्त्रियों का सार्वजनिक व्यय के सम्बन्ध में मत था कि यह होता है, अत: राज्य को अपना व्यय न्यूनतम रखना चाहिए, परन्तु आधुनिक विचारानुसार, सार्वजनिक व्यय का देश के उत्पादन, रोजगार एवं आय के स्तर पर पड़ता है। यदि सार्वजनिक व्यय का उपयोग उत्पादक कार्यों के लिए या उन्हें प्रात लिए किया जाता है तो देश में उत्पादन तथा नागरिकों की आय में वृद्धि होती है, उनके रहन-सहन के स्तर में सुधार आता है, आर्थिक स्थायित्व प्राप्त होता है एवं देश के आर्थिक विकास में सहायता मिलती है। सार्वजनिक व्यय के आर्थिक प्रभावों को निम्नवत् स्पष्ट किया जा सकता है

(अ) सार्वजनिक व्यय के उत्पादन पर प्रभाव – 

(Effects of Public Expenditure on Production)

सार्वजनिक व्यय का देश के उत्पादन पर विशेष प्रभाव पड़ता है। यह उत्पादन की मात्रा एव उसकी प्रकृति को प्रभावित करके आय एवं रोजगार को भी प्रभावित करता है। प्रो० डाल्टन के अनुसार, “जबकि करारोपण अकेले उत्पादन को नियन्त्रित कर सकता है, सार्वजनिक व्यय का अकेले उसमें प्राय: निश्चित ही वृद्धि करनी चाहिए।” अतः सार्वजनिक व्यय के लिए चाहिए कि वह उत्पादन में अधिक-से-अधिक वृद्धि करे। डाल्टन ने उत्पादन पर सार्वजनिक व्यय के प्रभावों का विश्लेषण निम्नलिखित तीन शीर्षकों के अन्तर्गत किया है

(1) कार्य करने तथा बचत करने की इच्छा पर प्रभाव (Effect on Desire of Working and Saving) सार्वजनिक व्यय का कार्य करने एवं बचत करने की इच्छा पर क्या प्रभाव पड़ता है, इस प्रकार का उत्तर देना बहुत कठिन है। इसमें कठिनाई इसलिए आती है क्योंकि इसके लिए हमें लोक व्यय के प्रति लोगों की मनोवैज्ञानिक प्रतिक्रिया को समझना होता है। इसे भली-भाँति समझने के लिए दो भागों में विभाजित करेंगे

(i) वास्तविक व्यय का प्रभाव। 

(ii) सम्भावित व्यय का प्रभाव।

(i) वास्तविक व्यय का प्रभाव (Effect of Actual Expenditure)-कुछ व्यक्तियों में कार्य करने एवं बचत करने की न्यूनतम इच्छा होती है, परन्तु जब सार्वजनिक व्यय के द्वारा लोगों की आय में वृद्धि होती है तो जिन व्यक्तियों की कार्य करने की इच्छा कम हो गई थी. तब वे सोचते हैं कि सामान्य जीवन-स्तर के अनुसार उनके पास पर्याप्त आय हो गई है अतः उन्हें अब अधिक कार्य करने की कोई आवश्यकता नहीं है परिणामस्वरूप सार्वजनिक व्यय का कार्य करने की इच्छा पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। लेकिन यह कथन तर्कयुक्त नहीं है। अधिकांश व्यक्ति अपने वर्तमान जीवन-स्तर से सन्तुष्ट नहीं होते बल्कि अपने जीवन स्तर को और अधिक ऊँचा उठाना चाहते हैं अत: उनके कार्य करने की क्षमता कम नहीं सीक दसका प्रभाव यह होता है कि वास्तविक व्यय का बचत करने की इच्छा पर अनकल प्रभाव पड़ता है।

(ii) सम्भावित व्यय का प्रभाव (Effect of Expected Expenditure)-प्रायः सार्वजनिक व्यय द्वारा प्राप्त होने वाले सम्भावित लाभ का कार्य करने एवं बचत करने की इच्छा पर अनकल प्रभाव पड़ने की अपेक्षा प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है अर्थात् व्यक्तियों की कार्य करने एवं बचत करने की इच्छा न्यूनतम हो जाती है क्योंकि सरकारी व्यय के माध्यम से जैसे ही लोगों को किसी क्षेत्र में सहायता का आश्वासन दिया जाता है, वे सरकार पर निर्भर हो जाते हैं और उनकी कार्य करने की इच्छा न्यूनतम हो जाती है; और जब कार्य करने की इच्छा कम हो

जाती है तो बचत करने की इच्छा भी न्यूनतम हो जाती है। लेकिन जब सार्वजनिक र होता है तो इसका विपरीत असर नहीं पड़ता है।

(2) कार्य करने तथा बचत करने की क्षमता पर प्रभाव (Effect on AL Working and Saving)-सार्वजनिक व्यय का प्रभाव कार्य करने तथा बचत क क्षमता पर पड़ता है। जिस प्रकार कर (Tax) व्यक्ति की कार्य करने की क्षमता (कार्यकशल को कम करता है उसी प्रकार सार्वजनिक व्यय यदि व्यक्ति की कार्यकुशलता में वद्धि करता तो उसकी कार्य करने की क्षमता को भी बढ़ावा मिलता है। यदि सार्वजनिक व्यय का लाभ जनता को नकद अनुदान के रूप में प्राप्त होता है तो इससे लोगों की कार्यकुशलता में वद्धि नही होती है अपितु वे आलसी तथा अपव्ययी हो जाते हैं क्योंकि वे यह सोचने लगते हैं कि उन्हें ऐसी सुविधाएँ आगे भी सरकार से प्राप्त होती रहेंगी, जिससे कार्य करने एवं बचत करने की क्षमता में वृद्धि नहीं होती है। इसके विपरीत, यदि जनता को सार्वजनिक व्यय का लाभ सेवा या वस्तु के अनुदान के रूप में प्राप्त होता है; जैसे—मकान, शिक्षा एवं चिकित्सा आदि; तो इससे जनता की कार्यकुशलता में वृद्धि होगी, जिससे कार्य करने व बचत करने की क्षमता भी बढ़ेगी। इस प्रकार सार्वजनिक व्यय प्राय: कार्य करने और बचत करने की क्षमता में वृद्धि करता है, फलत: उत्पादन में भी वृद्धि होती है।

(3) आर्थिक साधनों के स्थानान्तरण पर प्रभाव (Effect on Diversion of Economic Resources)-सार्वजनिक व्यय द्वारा आर्थिक साधनों को एक उपयोग से दूसरे उपयोग में स्थानान्तरित किया जा सकता है। यदि साधनों को किसी विशेष व्यवसाय या व्यवहार में स्थानान्तरित किया जाए तो इससे उत्पादन में वृद्धि की जा सकती है। इस कार्य को सम्पन्न करने के लिए या तो सरकार निजी उद्योगों को अनुदान देती है या सायं उद्योगों की स्थापना करती है, जिससे उत्पत्ति के साधन इन उद्योगों की ओर आकर्षित होता है एवं वस्तुओं व सेवाआ के उत्पादन में वृद्धि होती है। इसी प्रकार सार्वजनिक व्यय द्वारा विभिन्न स्थानों पर भी आर्थिक साधनों का स्थानान्तरण हो सकता है जिसके परिणामस्वरूप उत्पादन में वृद्धि की जा सकता है। 

(ब) सार्वजनिक व्यय का वितरण पर प्रभाव

(Effect of Public Expenditure on Distribution)

सार्वजनिक व्यय का किसी देश में धन के वितरण पर भी प्रभाव पड़ता है। सावजा व्यय के द्वारा धनी व निर्धन वर्ग के बीच धन व आय के वितरण की असमानता को दूर । जा सकता है। प्रो० पीगू ने इस सम्बन्ध में लिखा है कि लोक-कल्याण में वृद्धि, दशम

और सेवाओं का उत्पादन बढ़ाकर ही की जा सकती है परन्त यदि यह सम्भव न हो तो कल्याण में वृद्धि राष्ट्रीय लाभांश के वितरण के द्वारा समाज में धन की असमानता का दूर भी की जा सकती है।

धन व आय के वितरण की असमानता को दर करने के उद्देश्य से सरकार धना पातिशील दर से कर लगाती है जिससे धनी वर्ग की आय कमी होती है। दसरी ओर सरकार

इस प्रकार प्राप्त धन को निर्धन वर्ग पर व्यय करती है अर्थात् उन्हें निःशुल्क शिक्षा, स्वास्थ्य, सामाजिक सुरक्षा इत्यादि की सुविधाएँ उपलब्ध कराती है, इससे निर्धन वर्ग लाभान्वित होता है तथा उसकी आय में वृद्धि होती है। इस प्रकार सार्वजनिक व्यय द्वारा आय की असमानता को कम किया जा सकता है। 

(स) सार्वजनिक व्यय का उपभोग पर प्रभाव

(Effect of Public Expenditure on Consumption)

सरकार जनता को शिक्षा, चिकित्सा, आवास, मनोरंजन, बेकारी, वृद्धावस्था पेंशन, पारिवारिक भत्ता आदि के रूप में जो सुख-सुविधाएँ उपलब्ध कराती है उनसे जनता की क्रय-शक्ति बढ़ती है, फलत: जनता को अपना उपभोग का स्तर ऊँचा करने का अवसर मिल जाता है। राशनिंग एवं मूल्य नियन्त्रण की व्यवस्था द्वारा सरकार आवश्यक वस्तुओं को सस्ते मूल्य पर उपलब्ध कराकर जनता के उपभोग-स्तर में प्रत्यक्ष रूप से वृद्धि करती है। 

(द) सार्वजनिक व्यय के अन्य प्रभाव 

(Other Effects of Public Expenditure) 

उपर्युक्त के अतिरिक्त सार्वजनिक व्यय के कुछ अन्य प्रभाव भी होते हैं; जैसे

(1) आर्थिक विकास पर प्रभाव (Effect on Economic Development)यद्यपि व्यावहारिक जीवन में आर्थिक और अनार्थिक विकास के मध्य विभाजन रेखा खींचना सरल कार्य नहीं है, लेकिन फिर भी अर्थशास्त्र में आर्थिक विकास की धारणा का अत्यधिक महत्त्व है। सार्वजनिक व्यय और आर्थिक विकास का सीधा सम्बन्ध होता है। सार्वजनिक व्यय से देश में उत्पादन को गति मिलती है, नागरिकों की आय में वृद्धि होती है, इससे उनकी कय-शक्ति बढ़ती है, देश का विकास तीव्र गति से होने लगता है अन्तत: जिससे सन्तुष्टि का परिमाण बढ़ता है। संक्षेप में, यह कहा जा सकता है कि जिस अनुपात में सार्वजनिक व्यय की मात्रा में वृद्धि होती जाएगी उसी अनुपात में देश का आर्थिक विकास भी होता जाएगा।

(2) रोजगार पर प्रभाव (Effect on Employment)-सार्वजनिक (लोक) व्यय की मात्रा रोजगार के स्तर को भी प्रभावित करती है। विकसित देशो में बेरोजगारी कोटा लिए सार्वजनिक व्यय का उपयोग किया जाता है। सरकार द्वारा व्यय करने से व्यक्तियों की भावपर्ण माँग में वृद्धि होती है तथा प्रभावपूर्ण माँग की वृद्धि रोजगार को बढ़ाती है। मन्दीकाल रोजगारी से छटकारा पाने के लिए कीन्स ने सार्वजनिक व्यय में वृद्धि की सिफारिश की थी। आई विकसित देशों में सार्वजनिक व्यय की मात्रा में वृद्धि करके विकास कार्यों को बढ़ावा दिया जाता है। विकास की प्रक्रिया तेज होने पर रोजगार के अवसरों में वृद्धि होती है परिणामस्वरूप अर्थव्यवस्था अर्द्ध-बेरोजगारी एवं छिपी बेरोजगारी से मुक्त हो जाती है।

(3) आर्थिक स्थायित्व पर प्रभाव (Effect on Economic Stability)-विकसित देशों में आर्थिक स्थिरता को बनाए रखने के लिए सार्वजनिक व्यय नीति का प्रयोग व्यापक रूप से किया जाता है। इन देशों में कभी अत्यधिक तो कभी न्यूनतम उत्पादन की स्थिति देखने को

मिलती आती है। इस आर्थिक उतार-चढ़ाव के कारण ही अस्थिरता की स्थिति उत्पन्न इससे रोजगार व आय की मात्रा में भी अस्थिरता आ जाती है। अर्थव्यवस्था में कभी तेजी मन्दी की घटनाएँ व्यापार चक्रों को जन्म देती हैं। इन तेजी-मन्दी के प्रभावों को दरक सार्वजनिक व्यय की निर्णायक भूमिका होती है।

प्रश्न 10 – ऋण भार को कम करने की दृष्टि से निम्नलिखित रीतियों की विर कीजिए

(i) ऋण का पुनर्णोधन

(ii) ऋण का परिवर्तन

(iii) ऋण की अस्वीकारिता।

Discuss the following methods of reducing the burden of debt:

(i) Refunding of debt, 

(ii) Conversion of debt,

(iii) Repudiation of debt. 

अथवा ऋण शोधन के साधन के रूप में पूँजी कर का महत्त्व स्पष्ट कीजिए।

Discuss the importance of capital levy as a method of debt redemption. 

अथवा सार्वजनिक ऋण के भुगतान की प्रमुख विधियाँ क्या हैं ?

What are the principal methods of public debt redemption ? 

अथवा लोक ऋणों का भुगतान करने की विभिन्न रीतियों का उल्लेख कीजिए।

Point out the various methods of public debt redemption.

उत्तर – लोक ऋणों को चुकाना या मूल राशि सहित उनको लौटाना ही लोक ऋणों का शोधन अथवा प्रतिपादन (Redemption) कहलाता है। लोक ऋणों का भुगतान करना सरकार का नैतिक दायित्व होता है (चाहे सरकार बदल क्यों न जाए)। लोक ऋणों के भुगतान हेतु सामान्यत: निम्नलिखित विधियों का प्रयोग किया जाता है – 

(अ) ऋण से बचाव की रीतियाँ

(Methods for Debt Refusal) 

डॉ० डाल्टन के अनुसार, “सार्वजनिक ऋणों के भार से बचाव का एक कि उनको अदा कर दिया जाए और दूसरा यह है कि उनको अदा करने से मना कर जाए।” • 

I. ऋण की अस्वीकारिता

(Repudiation of Debt)

इस विधि के अन्तर्गत ऋणदाताओं को यह सूचित कर दिया जाता है कि राशि व ब्याज किसी का भी भुगतान नहीं किया जाएगा । इस नीति को प्रायः क्रान्तिकारी’ श्रमिक

सरकारें ही अपनाती हैं क्योंकि उनका यह विश्वास होता है कि ऋण समाज के समृद्ध वर्ग द्वारा ही दिया जाता है और करों आदि के द्वारा उन ऋणों के भुगतान का अर्थ होगा—गरीबों का शोषण। परन्तु सामाजिक तथा मनोवैज्ञानिक दृष्टि से यह विधि न्यायोचित नहीं मानी जा सकती क्योंकि इससे–(i) जनता का सरकार पर से विश्वास उठ जाता है और भविष्य में ऋणों की प्राप्ति असम्भव हो जाती है। (ii) समाज के ऋणदाता वर्ग को हानि होती है जो कि उचित नहीं है। (iii) यदि विदेशी ऋणों के सम्बन्ध में इस नीति का पालन किया जाता है तो उससे सम्बन्धों में तनाव-सा आ जाता है। 

II. ऋण रूपान्तरण 

(Loan Conversion)

प्रो० ब्यूहलर के शब्दों में, “ब्याज की दरों में आयी हुई कमी का लाभ उठाकर अपने ब्याज के भार को कम करने के उद्देश्य से चालू ऋणों में परिवर्तित करना ही ‘ऋण रूपान्तरण’ कहलाता है। दूसरे शब्दों में, ऋण रूपान्तरण का अर्थ है- “पुराने ऋणों को नए ऋणों में बदलना।” जब सरकार को किसी ऋण का भुगतान करना होता है तो वह नया ऋण लेना आरम्भ कर देती है। ऋणदाताओं को उनके मिश्रधन के बराबर नए ऋण-पत्र खरीदने का अवसर प्रदान किया जाता है और ऋण प्राय: ऊँची ब्याज – दर के होते हैं जिससे ऋणदाता नए ऋण देने को सरलता से तत्पर हो जाते हैं। इस प्रकार यह तरीका ऋण भुगतान का न होकर ऋण स्थगन का है। ऋण रूपान्तरण करते समय निम्नलिखित बातों पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए

(i) मुद्रा बाजार की प्रवृत्तियों के बारे में अद्यतन सूचना रहनी चाहिए।

(ii) भविष्य में ब्याज की दर, कर और मूल्य स्तर की स्थिति के बारे में जानकारी रहनी चाहिए। 

(iii) नए ऋणों की मूल धनराशि में उस समय तक कोई वृद्धि नहीं होनी चाहिए जब तक ऐसा करना बहुत-ही आवश्यक न हो। 

(iv) ऋण परिवर्तन की विधि बहुत-ही सरल होनी चाहिए।

(ब) ऋणों की वास्तविक अदायगी

(Actual Repayment of Debt) 

I. ऋण परिशोध कोष विधि 

(Sinking Fund Method)

लोक ऋणों के शोधन हेतु यह पद्धति सर्वाधिक प्रचलित एवं मान्य है। प्रो० मेहता के शब्दों में “ऋण परिशोधन कोष की पद्धति ऋण भुगतान का सबसे अच्छा तरीका है। यह अमन कमबद्ध है और कोई भी इसे किसी ऋण विशेष की आवश्यकताओं की पूर्ति में राजित कर सकता है।” इस विधि में ऋणों के शोधन हेतु सरकार एक कोष की स्थापना

करती है। इस कोष में धन दो तरीकों से एकत्र किया जा सकता है-(i) वार्षिक आय में से (ii) नए ऋण लेकर।

डॉ० डाल्टन ने परिशोध कोषों को दो भागों में वर्गीकृत किया है—निश्चित अनिश्चित। निश्चित परिशोध कोष में प्रतिवर्ष एक निश्चित धनराशि अनिवार्य रूप से जमा कर दी जाती है। लेकिन अनिश्चित कोष में धन केवल उसी समय जमा हो पाता है जब सरकार के पास बजट में अतिरिक्त धन बचता है। बचत न होने की दशा में कोष में कुछ भी जमा नही किया जाता।

निश्चित ऋण परिशोधन कोष के सम्बन्ध में तीनों बातें विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं. (i) ऋण प्रतिपादन की अवधि का निश्चय (सामान्य रूप से ऋणों का भुगतान जितने कम समय में कर दिया जाए उतना ही अच्छा है)। (ii) परिशोध कोष का अवधि विशेष में फैलाव। (iii) परिशोध कोष का विभाजन अर्थात् विभिन्न ऋणों के भुगतान हेतु उनका विभाजन।

इस प्रकार सर्वप्रथम ऋणों के भुगतान हेतु अवधि का निर्धारण किया जाता है। ऋणों का भुगतान जितने अल्पकाल में किया जाएगा अर्थव्यवस्था पर उसका भार उतना ही अल्पकालीन होगा। ऋणों के भुगतान (प्रतिदान) की अवधि निर्धारित कर देने के बाद यह निर्धारित करना होता है कि भुगतान कोषों (परिशोधन कोषों) को इस निर्धारित अवधि पर किस प्रकार फैलाया जाए। ऋणों का फैलाव तीन विधियों से सम्भव है

(क) वार्षिक भुगतान की मात्रा में वृद्धि करके – इस विधि के अन्तर्गत एक संचयी ऋण परिशोधन कोष की स्थापना की जाती है जिसमें जमाराशि पर चक्रवृद्धि दर से ब्याज जुड़ता रहता है और इस प्रकार कोष का आकार निरन्तर बढ़ता रहता है। इस कोष में प्रतिवर्ष एक निश्चित राशि अवश्य जमा की जाती है।

(ख) वार्षिक भुगतान की राशि समान रखकर — इस विधि के अन्तर्गत जमा पर प्राप्त आय को ऋणदाताओं में वितरित कर दिया जाता है। ब्याज से प्राप्त आय का केवल एक अश ही कोष में जमा किया जाता है। इस व्यवस्था में प्रत्येक वर्ष ऋण का भार समान बना रहता हा

(ग) वार्षिक भुगतान की मात्रा कम करके – इस विधि के अन्तर्गत कोष का धनराशि पर जो ब्याज मिलता है, उसे ऋणदाताओं में वितरित कर दिया जाता है, अर्थात् उस काप जमा नहीं किया जाता, जिससे ऋण-भार प्रतिवर्ष कम होता जाता है।

ऋण के भुगतान की अवधि तथा कोषों के प्रसार के बाद यह निर्धारित करना पड़ता ९ ॥ कोष की राशि को विभिन्न ऋणों के भुगतान के मध्य किस प्रकार वितरित किया जाए। पाप ऋण एक जैसी प्रकृति के होते हैं तो कोई कठिनाई नहीं होती। लेकिन व्यवहार में, उनकी प्रकृ नाक भिन्नता पायी जाती है। उस समय सरकार प्राथमिकता का क्रम निर्धारित करता है।

II. वार्षिक वृत्ति

(Terminal Annuity)

जब सरकार पर ऋण का भार अधिक होता है तो साकाणों का भगतान वार्षिक ?’ के रूप में करना प्रारम्भ कर देती है और धीरे-धीरे ऋण के भार से मक्त हो जाती है। मुक्त हो जाती है। भुगतान

की राशि में मलधन तथा ब्याज दोनों शामिल होते हैं। यह नीति प्रायः स्थायी अथवा दीघकालान ऋणों के सम्बन्ध में अपनायी जाती है। 

III. लॉटरी द्वारा भुगतान

(Payment by Lottery)

जब सरकार ऋणों का भुगतान क्रम के अनुसार न करके लॉटरी के द्वारा करती है तो वह लॉटरी द्वारा भुगतान कहलाता है। इस पद्धति में अनिश्चितता का दोष पाया जाता है। 

IV. बचत बजट भुगतान द्वारा

(Payment by Surplus Budget)

इस विधि के अन्तर्गत सरकार अन्य साधनों से प्राप्त आगम के एक अंश से ऋणों का भुगतान करती है, परन्तु आधुनिक समय में बचत के बजटों को अच्छा नहीं समझा जाता। इसके अतिरिक्त, प्राय: बजटों से पर्याप्त बचत हो भी नहीं पाती। 

V. क्रमानुसार भुगतान 

(Payment by Serial Number)

इस पद्धति के अन्तर्गत प्रतिवर्ष ऋण के कुछ भाग को क्रमानुसार चुका दिया जाता है। इस विधि में प्रत्येक ऋण का कुछ भाग प्रतिवर्ष परिपक्व हो जाता है। इस विधि के द्वारा सरकार धीरे-धीरे ऋणमुक्त हो जाती है। 

VI. ब्याज-दर में हास

(Reduction in Interest Rate)

जब सरकार पर लोक ऋणों का भार बहुत अधिक बढ़ जाता है तो वह अपने भार को कम करने के लिए इस विधि को अपनाती है। इसमें वह ब्याज की पूर्व निर्धारित दर से कम दर पर भुगतान करती है, परन्तु यह विधि न्यायसंगत नहीं है। 

VII. ऋण का पुनर्शोधन

(Refunding of Debt)

इस विधि के अन्तर्गत सरकार नए ऋण प्राप्त करके उस राशि से पुराने ऋणों का भुगतान करती है। 

VIII. पूँजी कर

(Capital Levy) 

सरकार लोक ऋणों का भुगतान किसी विशेष कर अथवा पूँजी कर के माध्यम से धन के भी कर सकती है। सरल शब्दों में, पूँजी कर वह कर है जो व्यक्तियों की सम्पत्ति गठीत धन पर लगाया जाता है। प्रो० रिकार्डो तथा डाल्टन आदि ने इस कर का समर्थन किया है। पूँजी कर का विचार मुख्य रूप से प्रथम विश्वयुद्ध के समय विकसित हुआ। कर अपने प्रारम्भ से ही विवादग्रस्त प्रश्न रहा है। इस कर के पक्ष-विपक्ष में अर्थशास्त्रियों द्वारा अनेक तर्क प्रस्तुत किए जाते हैं; यथा –

पूँजी कर के समर्थकों का कहना है कि – (1) इससे युद्धकालीन लोक ऋणों का सरलता से भुगतान किया जा सकता है। 

(2) पूँजी कर न्यायपूर्ण है क्योंकि निर्धन वर्ग युद्ध में अपने प्राणों का बलिदान करता है। अत: जिस समृद्ध वर्ग ने युद्धकाल में अत्यधिक लाभ कमाया है उसे भी कर करना चाहिए। 

(3) यह कर देय क्षमता के सर्वथा अनुकूल है क्योंकि समृद्ध वर्ग की करदान क्षमता में युद्धकाल में अवश्य ही वृद्धि होती है। 

(4) पूँजी कर के द्वारा लोक ऋणों के भुगतान का अभिप्राय यह होगा कि अतिरिक्त क्रय शक्ति प्रचलन में नहीं आएगी जिससे मुद्रा प्रसार पर रोक लगेगी। 

(5) इस विधि के परिपालन से जहाँ एक ओर सरकार ऋण मुक्त हो जाएगी वहीं दूसरी ओर आर्थिक विकास तथा समाज कल्याण के कार्यक्रमों में कोई बाधा नहीं आएगी।

(6) पूँजी कर का समाज में आय के वितरण पर अनुकूल प्रभाव पड़ता है क्योंकि इससे आर्थिक विषमताओं में कमी आती है। 

(7) इस पद्धति के परिपालन से सरकार ऋण-भार से तुरन्त मुक्त हो जाएगी। 

पूँजी कर के विरोधियों का कहना है कि –

(1) पूँजी कर लगने से बचतों की मात्रा कम हो जाएगी जिससे विनियोग और अन्ततः उत्पादन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। 

(2) पूँजी कर के कारण सरकार के प्रति जनता का विश्वास कम हो जाएगा जिससे पूँजी का विदेशों को हस्तान्तरण होगा तथा विदेशी विनियोग हतोत्साहित होंगे। 

(3) यदि पूँजी कर अत्यधिक प्रगतिशील दर से लगा तो लोगों के पास क्रय-शक्ति का अभाव हो जाएगा और ऐसी दशा में सम्पत्ति के मूल्यों में भी कमी आएगी। 

(4) पूँजी कर लगाने पर अनेक प्रशासनिक समस्याएँ उठ खड़ी होंगी-प्रथम पूँजी का सही-सही मूल्यांकन करना कठिन होगा। द्वितीय, इस कर का एकत्रीकरण काठ होगा। 

(5) पूँजी कर के निर्धारण से जनता सरकार को काबी

ण स जनता सरकार को शंका की दष्टि से देखने लगेगी कि कहा वह उनके धन का अपहरण न कर ले। 

(6) पूँजी कर से सम्पन्न वर्ग पर अत्यधिक भार पडेगा जिससे पँजी निर्माण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।

(7) कछ आलोचका का विचार है कि पूँजी कर सामान्य परिस्थितियों के प्रतिकूल यह केवल युद्धोत्तर काल में ही उपयुक्त हो सकता है।

इस प्रकार पूंजी कर के द्वारा लोक ऋण का भुगतान काफी सतर्कता से किया जाना चाहिए ताकि अर्थव्यवस्था पर उसका प्रतिकूल प्रभाव न पड़े।

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