Depositories Act – 1996 B.Com 3rd Year Notes In Hindi

Depositories Act – 1996 B.Com 3rd Year Notes In Hindi :- Economic Laws, Study Material Question Answer Examination Paper Sample Model Practice Notes PDF MCQ (Multiple Choice Questions) available in our site. parultech.com. Topic Wise Chapter wise Notes available. If you agree with us, if You like the notes given by us, then please share it to all your Friends. If you are Confused after Visiting our Site Then Contact us So that We Can Understand You better.



निक्षेपागार अधिनियम, 1996

(Depositories Act, 1996)

भारत में निक्षेपागार अधिनियम प्रतिभूतियों में डिपोजिटरीज के नियन्त्रण हेतु व्यवस्था करता है। यह अधिनियम 20 सितम्बर, 1995 से सम्पूर्ण भारत में लागू हुआ। भौतिक प्रतिभूतियों के आदान-प्रदान में अनेक कठिनाईयाँ जैसे बैड डिलीवरी, नकली प्रमाण-पत्र, रास्ते में खो जाना, कट-फट जाना, प्रमाण-पत्रों की चोरी तथा हस्तान्तरण में देरी आदि आती थीं। इन समस्याओं के निदान हेतु निक्षेपागार अधिनियम, 1996 लागू किया गया ताकि गति, शुद्धता, तथा सुरक्षा के साथ प्रतिभूतियों की स्वतंत्र हस्तांतरणीयता सुनिश्चित करने के लिए प्रतिभूतियों में डिपॉजिटरीज की स्थापना हेतु व्यवस्था हो सके। इस प्रकार सार्वजनिक सीमित कम्पनियों की प्रतिभूतियों को कुछ अपवादों के साथ स्वतंत्र तौर पर हस्तांतरणीय बनाया जा सका है; डिपॉजिटरी तरीके से प्रतिभूतियों का गैर भौतिकीकरण (dematerialising) सम्भव हो सका है; तथा एक Book Entry फॉर्म में स्वामित्व रिकॉर्डों के अनुरक्षण हेतु व्यवस्था हो सकी है। निपटान की प्रक्रिया के दोनों ही चरणों को सुचारू बनाने के लिए निक्षेपागार अधिनियम एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति को प्रतिभूतियों को इधर से उधर किये बिना Book Entry द्वारा इलैक्ट्रॉनिक तरीके से प्रतिभूतियों के स्वामित्व के हस्तांतरण की व्यवस्था करता है। ‘डिपोजिटरी’ एक ऐसा संगठन है जो कि प्रतिभूतियों को निवेशकों की तरफ से इलैक्ट्रानिक बुक एन्ट्री के रूप में धारण करता है ठीक उसी प्रकार जैसे बैंक हमारे धन को रखता है। जैसे हम बैंक से पैसा निकालने के लिए चैक जारी करते हैं वैसे ही अपने खाते से प्रतिभूतियों की डिलीवरी हेतु debit instruction जारी करते हैं। इसी तरह अपने खाते में प्रतिभूतियों को लाने के लिए हम ठीक अपने बैंक खातों में फण्डों को क्रेडिट कराने के लिए प्रयुक्त Pay-in-Slip के समान एक credit insturction जारी करते हैं। एक डिपॉजिटरी प्रतिभूतियों को dematerialised प्रारूप में धारण करता है। वह प्रतिभूतियों का स्वामित्व रिकार्ड बनाता है तथा Book Entry के माध्यम से स्वामित्व का हस्तांतरण सम्भव कर देता है। कानून की दृष्टि से वह स्वामी की ओर से स्वामित्व के हस्तांतरण के उद्देश्य से (सीमित उद्देश्य से) अपने पास पड़ी प्रतिभूतियों का पंजीकृत स्वामी (Registered Owner) होता है। डिपॉजिटरी का नाम निर्गमनकर्ता के रिकॉर्डो में प्रतिभूतियों के पंजीकृत स्वामी के रूप में दिखाया जाता है। वास्तविक स्वामी का नाम डिपॉजिटरी के रिकॉर्डों में लाभग्रहीता स्वामी के रूप में दिखाया जाता है। लाभग्रहीता स्वामी (Beneficial Owner) को प्रतिभूतियों से जुड़े सभी अधिकार तथा दायित्व मिलते हैं। डिपॉजिटरी सेवाओं का लाभ लेने का इच्छुक प्रतिभूतियों का स्वामी एक डिपॉजिटरी भागीदार (Depository Participant-DP) के माध्यम से एक खाता खोलता है। प्रतिभूतियों को लाभग्रहीता स्वामी के आदेश पर ही (Book Entry) के माध्यम से एक खाते से दूसरे खाते को हस्तांतरित किया जाता है। डिपॉजिटरी प्रणाली में भौतिक स्वरूप से इलैक्ट्रॉनिक स्वरूप में प्रतिभूतियों के परिवर्तन, इलैक्ट्रॉनिक प्रखण्ड में सौदे का निपटान, स्वामित्व के इलैक्ट्रानिक हस्तांतरण तथा प्रतिभूतियों के इलैक्ट्रॉनिक प्रखण्ड में सौदे का निपटान, स्वामित्व के इलैक्ट्रानिक हस्तांतरण तथा प्रतिभूतियों के इलैक्ट्रॉनिक रख रखाव का समावेश होता है। डिपॉजिटरीज में सभी प्रतिभूतियाँ सभी दृष्टियों से समान होती हैं (identical in all respects and are fungible)। डिपॉजिटरी प्रणाली अनिवार्य नहीं है तथा यह निवेशक के ऊपर छोड़ दिया जाता है कि वह स्वयं निर्णय ले कि क्या वह dematerialisation द्वारा डिपॉजिटरी प्रणाली की ओर जाने के विकल्प का चयन करे। यदि एक निवेशक प्रतिभूतियों को रखे रखना चाहता है तो वह उनको भौतिक स्वरूप में रखने के विकल्प को लागू कर लेता है लेकिन यदि वह बेचना चाहता है तो उसको एक Participant को dematerialisation हेतु प्रतिभूतियों को ऑफर करना होता है। Dematerialised प्रतिभूतियों में सौदा व्यवहार की लगभग अब अनेक स्टॉक एक्सचेंजों में आज्ञा है। एक निवेशक जिसने अपनी प्रतिभूतियों को dematerialise करा लिया है चाहे तो पुन: rematerialisation का विकल्प लागू कर सकता है तथा depository को Physical demat आवेदन पाने की तिथि से 30 दिन के भीतर rematerialisation करना होगा।

निरूपीकरण के पक्षकार (Demat Business Partners)

प्रतिभूतियों के निरूपीकरण व्यवसाय में स्वयं NSDL तथा निम्नलिखित वर्णित पक्षकार सम्मिलित होते है-

(1) Depository Participants (DPs)

यह एक मध्यस्थ है जिसे अपना कार्य प्रारम्भ करने से पूर्व SEBI के यहां अपने कराना आवश्यक है। DP डिपोजिटरी के एजेन्ट की भांति होता है जो NSDL की ओर सरकार खाते रखता है। साथ ही उसे अपने ग्राहक के साथ DP के रूप में कार्य करने से पर्व का करना होता है। प्रत्येक ग्राहक के लिए पृथक्-पृथक् खाता खोला जाता है। DP द्वारा अपने पार Statement of Account भेजना आवश्यक है। यदि DP नियम विरूद्ध व्यवसाय करताना लाइसेन्स SEBI द्वारा निलम्बित किया जा सकता है। यदि उसका व्यवहार कपटपर्ण रहा बार-बार निलम्बित किया जा चुका है तो लाइसेंस निरस्त भी किया जा सकता है। 

(2) Clearing Corporation/Clearing House

यह एक संस्था है जोकि स्टॉक एक्सचेन्ज में किए गए व्यवहारों को Settle करने में तथा Clearing का कार्य करती है। यह NSDL में रजिस्टर्ड होती है तथा एक समझौते के अन्तर्गत स्टॉक एक्सचेन्ज के Clearing के कार्य सम्पादित करती है। इस समझौते में NSDL तथा Clearing House के आपसी कर्तव्य तथा दायित्व का वर्णन होता है। 

(3) Issuer Company and Registrar & Transfer Agent (R & T)

डिपोजिटरी अधिनियम, 1996 के अन्तर्गत निवेशक को प्रतिभूति भौतिक रूप में या Demat रूप में रखने का विकल्प प्राप्त है। Issuer Company को यह विकल्प अपने निर्गमन में निवेशक को देना होता है। अत: कम्पनी को NSDL से समझौते के अन्तर्गत यह व्यवस्था स्वयं या R & T के द्वारा करानी होती है। निरूपीकरण की प्रक्रिया में भी R & T की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है। 

निरूपीकरण के लाभ (Advantages of Dematerialisation)

  1. बैड डिलीवरी की समाप्ति, 2. जोखिम की समाप्ति, 3. स्टाम्प ड्यूटी से मुक्ति, 4. तत्काल हस्तान्तरण का रजिस्ट्रेशन, 5. तीव्र सेटिलमेन्ट अवधि, 6. क्रेता सुरक्षित होता है, 7. बोनस तथा राइट्स अंशों का शीघ्र वितरण, 8. ब्रोकरेज दर में कमी, 9. ग्राहकों को स्थिति विवरण की उपलब्धि, 10. एक ही खाते के माध्यम से लेन-देन। 

इलेक्ट्रॉनिक रूप में प्रतिभूति व्यवहार (Trading in Electronic Form)

इलेक्ट्रॉनिक रूप में प्रतिभूतियों का क्रय-विक्रय भौतिक रूप में प्रतिभूतियों के क्रय-विक्रय की भांति ही होता है। इलेक्ट्रॉनिक रूप में प्रतिभूतियों का सौदा करना अधिक सुरक्षित तथा सरल होता है। जब निवेशक अंश बेचना चाहता है, तो वह ब्रोकर को अंश बेचने का आदेश देता है और सौदा हा जाने के बाद DP को Delivery Instruction द्वारा उन अंशों को Debit करने का निर्देश देता है जोकि उसने बेच दिए हैं। यह निर्देश बैंक को चैक द्वारा निश्चित राशि के भुगतान के निर्देश के समान होता है। जब निवेशक अश क्रय करना चाहता है तो ब्रोकर को क्रय-आदेश देगा। ‘सौदा’ पूरा हो जाने पर निवेशक ब्रोकर को अपना Demat A/C No. की जानकारी देगा और Receipt Instruction कवार खराद गए अंशों को अपने Demat A/c में Credit करने का निर्देश देगा। भगतान के अगले दिन क्रय किय गए अंश Demat खाते में जमा कर दिए जाते हैं। इस क्रय में भौतिक अंशों की तरह Transfer Form भरन, उस पर टिकट लगाने और हस्तान्तरण को भेजने तथा प्रतीक्षा करने की आवश्यकता ही नहीं होती है। भारत सरकार ने अगस्त 1996 में Depositories Act को लाग करके दो Depositories का स्थापना का मार्ग प्रशस्त किया। (1) The National Securities Depositories Limited (NSDL) जिसका प्रवर्तन UTI, IOD तथा NSE द्वारा किया गया। (2) The Central Depository Services (India) Limited (CDSL) forwant yada BSE & किया गया। महत्वपूर्ण परिभाषाएँ (Important Definitions)  निक्षेपागार अधिनियम., 1996 की धारा 2 में निम्नलिखित परिभाषाओं का उल्लेख है- 1.”लाभग्रहीता स्वामी” (beneficial owner) अर्थात एक व्यक्ति जिसका नाम एक डिपाज के पास इस रूप में उल्लेखित है।

  1. “अन्तर्नियम” (bye-laws) अर्थात् धारा 26 के अन्तर्गत डिपॉजिटरी द्वारा बनाये गये अन्तर्नियम।

2 [धारा 2(b)]  3.“डिपॉजिटरी” (Depository) अर्थात् कम्पनी अधिनियम, 1956 के अन्तर्गत निर्मित तथा पंजीकृत एक ऐसी कम्पनी जिसे SEBI Act, 1992 की धारा 12 (1A) के अन्तर्गत पंजीकरण का प्रमाणपत्र दिया जा चुका है। 1 [धारा 2(e)] 

  1. “निर्गमनकर्ता” (Issuer) अर्थात् प्रतिभूतियों का निर्गमन कर रहा कोई व्यक्ति। [धारा 2(f)]

5.”भागीदार” (Participant) अर्थात् SEBI Act, 1992 की धारा 12 (1A) के अन्तर्गत इस रूप में पंजीकृत एक व्यक्ति [धारा 2(g)] 

  1. “रिकॉर्ड” (record) में पुस्तकों के रूप में रखे गये रिकॉर्डो तथा एक कम्प्यूटर में स्टोर रिकॉर्डों या किसी ऐसे अन्य रूप में रिकॉर्डो का समावेश होता है जैसा कि Regulations द्वारा निर्धारित किया जा सके।

[धारा 2(1)] 

  1. “पंजीकृत स्वामी” (Registered Owner) अर्थात् एक डिपॉजिटरी जिसका नाम Issuer के रजिस्टर में इस रूप मे दर्ज है।

[धारा 2(j)]  8.”प्रतिभूति” (Security) अर्थात् SEBI द्वारा निर्दिष्ट की जा सके ऐसी प्रतिभूति। [धारा 2(m)]

निक्षेपागार अधिनियम के प्रमुख प्रावधान

(Main Provisions of Depositories Act) 

(1) निक्षेपागार (Depositories) द्वारा व्यापार प्रारम्भ करने का प्रमाण पत्र (धारा 3) निक्षेपागार अधिनियम की धारा 3 व्यवस्था करती है कि कोई भी डिपॉजिटरी एक डिपॉजिटरी के रूप में कार्य नहीं कर पायेगी जब तक वह व्यापार प्रारम्भ करने का प्रमाणपत्र (Certificate of Commencement of Business) सेबी से प्राप्त नहीं कर लेता। सेबी तब तक प्रमाणपत्र प्रदान नहीं करेगा जब तक वह संतुष्ट नहीं हो जाता कि डिपॉजिटरी के पास पर्याप्त तंत्र तथा व्यवस्था मौजूद हैं जो रिकॉर्डो तथा लेनदेनों की गड़बड़ियों को रोक सके। तथा निक्षेपागार का शुद्ध धन 100 करोड़ रू. से कम नहीं है। लेकिन किसी भी प्रमाणपत्र की तब तक मनाही नहीं की जायेगी जब तक सम्बद्ध डिपॉजिटरी को सुनवाई का उचित अवसर नहीं दे दिया जाता। (2) निक्षेपक (Depository) और भागीदार (Participants) के मध्य समझौता (धारा 4)-धारा 4 व्यवस्था करती है कि एक डिपॉजिटरी एक या अधिक Participants के साथ उसके एजेन्ट के रूप में ठहराव करेगा। प्रत्येक ठहराव ऐसे फॉर्म में होगा जैसा अन्तर्नियमों में निर्दिष्ट किया जा सके। (3) निक्षेपक की सेवाएँ (धारा 5) – कोई भी व्यक्ति डिपोजिटरी के साथ उसकी सेवाओं का लाभ उठाने के लिए एक भागीदार (participant) के माध्यम से ऐसे प्रारूप में एक ठहराव कर सकता है जैसा कि अन्तर्नियमों द्वारा निर्दिष्ट किया जाए। (4) प्रतिभूति के सर्टिफिकेट का समर्पण (Surrender of Certificate of Security) (धारा 6)-धारा 6 व्यवस्था करती है कि लाभग्रहीता स्वामी प्रतिभूति प्रमाणपत्र जो उसके पास भौतिक रूप में है, को निर्गमनकर्ता को निर्दिष्ट तरीके से सौंप देगा। प्रतिभूति के प्रमाणपत्र के पाने पर निर्गमनकर्ता प्रतिभूति के प्रमाणपत्र को रद्द कर देगा तथा अपने रिकॉर्डों में उसके स्थान पर उस प्रतिभूति के सम्बन्ध में एक पंजीकृत स्वामी के तौर पर डिपॉजिटरी का नाम लिखेगा तथा डिपॉजिटरी को तदानुसार सूचना देगा। एक डिपॉजिटरी ऐसी सूचना के मिलने पर अपने रिकॉर्डों में व्यक्ति का नाम लाभग्रहीता स्वामी (beneficial owner) के रूप में रिकॉर्ड कर लेगा। (5) निक्षेपागार द्वारा प्रतिभूतियों के हस्तान्तरण का पंजीकरण (धारा 7)-इस धारा में डिपॉजिटरी एक participant से सूचना मिलने पर हस्तांतरी के नाम में प्रतिभूति का हस्तांतरण रजिस्टर कर लेगा। यदि एक लाभग्रहीता स्वामी या किसी प्रतिभूति का एक हस्तांतरी ऐसी प्रतिभूति का कब्जा लेना चाहता है तो डिपॉजिटरी निर्गमनकर्ता को इस सम्बन्ध में सूचित करेगा। (6) प्रतिभति सर्टिफिकेट प्राप्त करने का विकल्प (धारा 8)-एक निर्गमनकर्ता द्वारा प्रस्तावित प्रतिभूतियों के प्रति अभियाचना कर रहे प्रत्येक व्यक्ति को यह विकल्प प्राप्त होता है कि या तो वह प्रतिभूति प्रमाण पत्र प्राप्त करे या डिपॉजिटरी के पास प्रतिभूतियों को रखे। जहाँ एक व्यक्ति एक डिपॉजिटरी के पास किसी प्रतिभूति को रखने का विकल्प चुनता है वहाँ निर्गमनकर्ता ऐसे डिपॉजिटरी को प्रतिभूति के आबंटन के विवरण सूचित करेगा तथा ऐसी सूचना के मिलने पर डिपॉजिटरी अपने रिकॉर्डो में आबंटनग्रहीता (allottee) का नाम उस प्रतिभूति के लाभग्रहीता स्वामी के रूप में दर्ज कर लेगा। (7)  रिफ्रेशर निश्पागारों (Depositories) में प्रतिभूतियों का अमूर्त रूप (धारा 9) – डिपॉजिटरी टा रखी गई सभी प्रतिभतियाँ dematerialised की जायेगी तथा एक fungible प्रारूप में रखी जायेगी। (8) निक्षेपागार (Depository) तथा लाभग्रहीता स्वामी के अधिकार (धारा 100_धारा 10 व्यवस्था करती है कि डिपॉजिटरी को एक लाभग्रहीता स्वामी के लिए किसी प्रतिभा हस्तांतरण के उद्देश्यों हेतु पंजीकृत स्वामी माना जायेगा। पंजीकृत स्वामी के रूप में कि मताधिकार नहीं होगा अथवा उसके द्वारा धारित प्रतिभूतियों के सम्बन्ध में कोई अस र मिलेगा। लाभग्रहीता स्वामी ही ऐसे सभी अधिकारों तथा लाभों के लिए अधिकतो डिपॉजिटरी द्वारा धारित अपनी प्रतिभूतियों के सम्बन्ध में सभी दायित्वों के अन्तर्गत माना जा (9) लाभग्रहीता स्वामियों का रजिस्टर (धारा 11)-धारा 11 व्यवस्था करती है कि डिपॉजिटरी लाभग्रहीता स्वामियों का एक रजिस्टर तथा एक इन्डैक्स भी बनायेगा। (10) निक्षेपागार में जमा प्रतिभूतियों का बन्धक या रहन (Hypothecation) (धारा 12. धारा 12 के अनुसार एक लाभग्रहीता स्वामी, डिपॉजिटरी की पूर्व अनुमति से, एक डिपॉजिटरी के माध्यम से उसके द्वारा स्वामीत्वाधीन प्रतिभूति के सम्बन्ध में एक गिरवी या रहन उत्पन्न कर सकता है। प्रत्येक लाभग्रहीता स्वामी को ऐसे रहन या प्रभार की डिपॉजिटरी को सूचना देनी होगी तथा तत्पश्चात ऐसा डिपॉजिटरी अपने रिकॉर्डों में तदानुसार प्रविष्टियाँ करेगा। डिपॉजिटरी के रिकॉर्डों में कोई भी प्रविष्टि एक रहन या गिरवी का साक्ष्य मानी जायेगी। (11) निक्षेपागार तथा निर्गमनकर्ता द्वारा सूचना और रिकार्ड उपलब्ध कराना (धारा 13) धारा 13 के अनुसार प्रत्येक डिपॉजिटरी निर्गमनकर्ता को ऐसे अन्तरालों पर तथा ऐसे तरीके से, लाभग्रहीता स्वामियों के नाम में प्रतिभूतियों के हस्तांतरण के बारे में सूचनाएँ पेश करेगा, जैसा कि अन्तर्नियमों में दिया जा सके। प्रत्येक निर्गमनकर्ता डिपॉजिटरी को ऐसे डिपॉजिटरी द्वारा धारित प्रतिभूतियों के सम्बन्ध में सम्बद्ध रिकॉर्डों की प्रतियाँ पेश करेगा। (12) किसी प्रतिभूति के सम्बन्ध में निक्षेपागार (Depository) से अलग होना (धारा 14) धारा 14 लाभग्रहीता स्वामी को विकल्प प्रदान करती है कि डिपॉजिटरी को सूचना देकर किसी भी प्रतिभूति के सम्बन्ध में डिपॉजिटरी से अलग हो सके। ऐसी सूचना के मिलने पर डिपॉजिटरी अपने रिकॉर्डों में उपयुक्त प्रविष्टियाँ बनायेगा तथा निर्गमनकर्ता को सूचित करेगा। ऐसी सूचना के मिलने के 30 दिन के भीतर तथा ऐसे शुल्क के भुगतान पर जो, नियमविधानों द्वारा निर्दिष्ट की जा सके, प्रत्येक निर्गमनकर्ता लाभग्रहीता स्वामी को या हस्तांतरी को, प्रतिभूतियों के प्रमाण पत्र जारी करेगा। (13) अधिनियम की धारा 15-के अनुसार Banker’s Books Evidence Act, 1891 एक डिपॉजिटरी पर लागू होगा मानों उस अधिनियम की धारा 2 के अन्तर्गत वह एक बैंक हो। (14) निक्षेपागार द्वारा हानि की क्षतिपूर्ति करना (धारा 16) धारा 16 के अनुसार, डिपॉजिटरी या participant की लापरवाही के कारण लाभग्रहीता स्वामी को होने वाली किसी हानि की डिपॉजिटरा एस लाभग्रहीता स्वामी की भरपाई करेगा। ऐसे मामलों में डिपॉजिटरी को अधिकार होगा कि दोषी participant से हानि को वसूल सके। (15) जांच पड़ताल तथा निरीक्षण (Enquiry and Inspection) (धारा 18)-धारा 18 व्यवस्था करती है कि इस बारे में संतुष्ट हो जाने पर कि ऐसा करना निवेशकों के हित में है या जनहित में है, सेबी लिखित में आदेश देकर: (अ) किसी निर्गमनकर्ता, डिपॉजिटरी, participant या लाभग्रहीता स्वामी को कह सकता हाक एक डिपॉजिटरी में रखी प्रतिभूतियों के सम्बन्ध में ऐसी सूचना लिखित में प्रस्तुत करे जो वह आवश्यक समझे, या (ब) निर्गमनकर्ता, लाभग्रहीता स्वामी, डिपॉजिटरी या participant के काम काज के सम्बन्ध कोई जांच पड़ताल या निरीक्षण करने के लिए किसी व्यक्ति को अधिकृत कर सकता है जो उसका एक जाँच या निरीक्षण की रिपोर्ट ऐसी अवधि के भीतर पेश करेगा जैसा कि आदेश में निर्दिष्ट किया जाये। डिपॉजिटरी या निर्गमनकता या Participant या लाभग्रहीता स्वामी का प्रत्येक निदेशक, प्रबन्धक, साझेदार, सचिव, अधिकारी या कर्मचारी, मांगने पर जाँच या निरीक्षण कर रहे व्यक्ति के सामना सूचना, या ऐसे रिकॉर्डों तथा अन्य प्रपत्रों को जो उसके कब्जे में है पेश करेगा जो ऐसी जाँच या निरीक्षण की विषय वस्तु पर प्रभाव डाल सकते हैं। सेबी द्वारा दिशा-निर्देश देने की शक्ति (धारा 19)-धारा 19 के अनुसार, यदि कोई जाँच या निरीक्षण करने या कराने के बाद SEBI संतुष्ट होता है कि यह आवश्यक है: (i) निवेशक के हित में या प्रतिभूति बाजार के व्यवस्थित विकास में; या (ii) किसी डिपॉजिटरी या participant के कामकाज के इस प्रकार किये जाने को रोकने के लिए जो निवेशकों या प्रतिभूति बाजार के हितों के प्रति नुकसानदेह हैं, तो सेबी ऐसे दिशा-निर्देश जारी कर सकता है। (अ) किसी डिपॉजिटरी या participant या प्रतिभूति बाजार से जुड़े किसी व्यक्ति को; या (ब) किसी निर्गमनकर्ता को, जो निवेशकों के हित में या प्रतिभूति बाजार के हित में उपयुक्त हो सके।

दण्ड विधान 

धारा 20 के अनुसार जो अधिनियम के प्रावधानों या इस अधिनियम के अन्तर्गत किन्हीं अंतनियमा या नियमविधानों का उल्लंघन करता है या उल्लंघन करने का प्रयास करता है या उल्लंघन को होने दता है ऐसी सजा से दण्डित किया जा सकेगा जो 5 साल तक हो सकती है या जुर्माने से दण्डित किया जा सकेगा या दोनों से। धारा 21 व्यवस्था करती है कि जहाँ अधिनियम के अन्तर्गत कोई अपराध एक कम्पनी द्वारा किया जाता है तो ऐसा प्रत्येक व्यक्ति जो, अपराध के किये जाने के समय, कम्पनी के व्यवसाय के संचालन के लिए उत्तरदायी या प्रभारी था, तथा साथ ही कम्पनी, को अपराध का दोषी माना जायेगा तथा उसके विरुद्ध तदानुसार कार्यवाही की जायेगी तथा दण्ड दिया जायेगा। लेकिन यह बात ऐसे किसी व्यक्ति को दण्ड के लिए भागी नहीं बना पायेगी यदि वह सिद्ध कर देता है कि अपराध को उसकी जानकारी के बिना किया गया था अथवा उसने ऐसे अपराध को रोकने के लिए उचित सावधानी बरती थी। जहाँ इस अधिनियम के अन्तर्गत अपराध एक कम्पनी द्वारा किया गया है तथा यह सिद्ध हो जाता है कि अपराध किसी संचालक, प्रबन्धक, सचिव या कम्पनी के किसी अधिकारी की सहमति से या मिलीभगत से हुआ है या उनकी किसी लापरवाही से जुड़ा है तो उनमें से प्रत्येक को अपराध का दोषी माना जायेगा तथा तदानुसार उनके विरूद्ध कार्यवाही की जायेगी तथा दण्ड दिया जायेगा। 

अपील्स तथा अपील प्रविधियाँ (Appeals and Appeal Procedure)

धारा 22 के अनुसार, कोई भी न्यायालय अधिनियम के अन्तर्गत या इसके अन्तर्गत निर्मित उपनियमों या किन्हीं नियमविधानों के अन्तर्गत किसी दण्डनीय अपराध का संज्ञान नहीं लेगा जब तक SEBI द्वारा शिकायत न की जाये। दूसरे शब्दों में, कोई भी न्यायालय अपराधों के सम्बन्ध में शिकायतों को केवल तभी स्वीकार कर सकता है जब ऐसी शिकायत SEBI द्वारा की जाये। एक महानगरीय दण्डाधिकारी या प्रथम श्रेणी के न्यायिक दण्डाधिकारी से निचली कोई भी अदालत इस अधिनियम के अन्तर्गत दण्डनीय किसी अपराध का परीक्षण नहीं करेगा। ___ धारा 23A से 23-E Securities Appellate Tribunal (SAT) को अपील के सम्बन्ध में मामलों तथा प्रविधि एवं ट्रिब्यूनल की शक्तियों का वर्णन करती है। धारा 23-A व्यवस्था करती है कि अधिनियम के अन्तर्गत या उसके अन्तर्गत निर्मित नियमविधानों के अनुसार सेबी के एक आदेश द्वारा पीड़ित कोई व्यक्ति इस मामले में कार्यक्षेत्र रखने वाले SAT के पास अपील दायर कर सकता है। टिब्यनल को की जाने वाली प्रत्येक अपील उस तिथि से 45 दिन की अवधि के भीतर फाईल की जा सकेगी जब सेबी द्वारा दिये गये आदेश की प्रति सम्बद्ध पक्षकार को प्राप्त कराई जाती है तथा यह निर्दिष्ट प्रारूप में होगी तथा उस पर निर्धारित शुल्क लगाया जायेगा। लेकिन ट्रिब्यूनल 45 दिन बीतने के बाद भी अपील को स्वीकार कर सकता है यदि वह संतुष्ट होता है कि उक्त अवधि के भीतर उसको फाईल न कराने के पीछे उचित कारण रहे हैं। अपील प्राप्त होने पर अपील के पक्षकारों को सुनवाई का अवसर देने के बाद SAT उस पर ऐसा आदेश दे सकता है जो वह ठीक समझे। वह अपील के अन्तर्गत आदेश की पुष्टि कर सकता है, संशोधित कर सकता है या रद्द कर सकता है। ट्रिब्यूनल उसके द्वारा दिये प्रत्येक आदेश की एक प्रति SEBI को तथा अपील के पक्षकारों को भेजेगा। ट्रिब्यूनल के समक्ष दायर अपील उसके द्वारा जहाँ तक सम्भव होगा सावधानीपूर्वक निपटायी जायेगी तथा उसका सदैव यही प्रयास रहेगा कि अपील की प्राप्ति की तिथि के 6 माह के भीतर अपील को अन्तत: निपटा लिया जाये। धारा 23-B अपील की प्रविधि तथा ट्रिब्यूनल की शक्तियों का वर्णन करती है। ट्रिब्यूनल Code of Civil Procedure, 1908 में व्यवस्थित प्रविधि का पालन विवश नहीं है लेकिन वह प्राकृतिक न्याय के सिद्धान्तों से मार्गदर्शन पायेगा तथा अधिनि तथा नियमावली के अनुसार काम करेगा, ट्रिब्यूनल को ऐसे स्थानों सहित अपनी निजी पनि का भी अधिकार होगा जहाँ वे अपनी सिटिंग्स (बैठकें) कर सकते हैं। इस अधिनियम के अन्तर्गत अपने कार्यों के निर्वाह के उद्देश्यों हेतु ट्रिब्यनला शक्तियाँ प्राप्त होंगी जो Code of Civil Procedure, 1908 के अन्तर्गत एक Civil Come रहती हैं, जब वह निम्नलिखित मामलों के सम्बन्ध में एक वाद का परीक्षण कर रहा हो. (अ) किसी व्यक्ति की उपस्थिति का सम्मन देना तथा लागू करना एवं शपथना प र परीक्षण करना; (ब) प्रपत्रों की खोज तथा प्रस्तुति की अपेक्षा करना;  (स) शपथनामे पर साक्ष्य पाना;  (द) प्रपत्रों या गवाहों के परीक्षण हेतु कमीशन्स जारी करना;  (इ) अपने निर्णयों की समीक्षा करना;  (फ) दोष हेतु किसी आवेदन को निरस्त करना या उसको एक पक्षीय घोषित करना; तथा (ग) हानि हेतु किसी आवेदन की खारिजी के किसी आदेश को या उसके द्वारा एकपक्षीय घोषित किये गये किसी आदेश को निरस्त करना। SAT के किसी निर्णय या आदेश से पीड़ित कोई भी पक्षकार उसको ट्रिब्यूनल के आदेश या निर्णय के संवहन की तिथि से 60 दिन के भीतर उच्चतम न्यायालय के पास अपील फाईल करा सकता है।


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