Trade Marks Act B.Com 3rd Year Hindi Study Material Notes

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व्यावसायिक क्रियाओं के निरन्तर विकास एवं विस्तार तथा व्यवसाय के भूमण्डलीकरण के कारण उत्पन्न परिस्थितियों में निवेश एवं प्रौद्योगिकी के अन्तरण तथा अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार को प्रोत्साहित करने हेतु ट्रेड एण्ड मर्केन्डाइज अधिनियम, 1958 के स्थान पर एक नये अधिनियम की आवश्यकता अनुभव की गई। अत: भारत सरकार ने एक नया अधिनियम पारित एवं लागू किया है और जिसे ट्रेड मार्क्स अधिनियम, 1999 के नाम से जाना जाता है। ट्रेड मार्क्स अधिनियम, 1999 को राष्ट्रपति की मंजूरी/स्वीकृति 30 दिसम्बर, 1999 को मिली थी। इसे 15 सितम्बर, 2003 से लागू किया गया था। इस अधिनियम में सन् 2010 में संशोधन भी किया गया था। ट्रेड मार्क्स अधिनियम, 1999 जम्मू एवं कश्मीर राज्य सहित सम्पूर्ण भारत पर लागू होता है। इस अधिनियम का हिन्दी अनुवाद व्यापार चिन्ह अधिनियम है।

व्यापार चिन्ह/ट्रेड मार्क का अर्थ

(Meaning of Trade Mark) 

इस अधिनियम के अनुसार, ट्रेड मार्क से तात्पर्य ऐसे चिन्ह (Marks) से है जो रेखाचित्रीय/आलेखीय रूप से प्रस्तुत करने योग्य होता है तथा जो किसी व्यक्ति के माल या सेवाओं का दूसरे व्यक्ति के माल या सेवाओं के बीच विभेद (Distinguish) करने में सक्षम होता है, तथा इसमें माल की आकृति (Shape), उसकी पैकेजिंग तथा उसके रंगों का मिश्रण भी सम्मिलित हो सकता है।

[धारा 2 (1)(Zb)] 

यह उल्लेखनीय है कि ट्रेड मार्क शब्दावली में ‘सामूहिक मार्क’ अथवा ‘प्रमाणन ट्रेड मार्क’ (Collective mark and certification trade mark) का सन्दर्भ भी सम्मिलित है। साधारण शब्दों में, ट्रेड मार्क (जिसे सामान्यत: ब्राण्ड नाम के रूप में अधिक जाना जाता है) नाम, यन्त्र, ब्राण्ड नाम, लेबल, हस्ताक्षर/संकेतक, शब्द, अक्षर (Letter) संख्या, माल की आकृति, पकजिग या रंगों के मिश्रण अथवा उपर्युक्त सभी के किसी संयोजन/मिश्रण से बने सामान्य प्रतीक चिन्ह (Symbol) है जो किसी निर्माता या व्यापारी द्वारा अपने माल पर लगाया अथवा अपनी सेवाओं के सम्बन्ध में उपयोग किया जाता है ताकि अपने माल या सेवाओं तथा प्रतिस्पर्धी व्यवसायियों के समान प्रकार के माल या सेवाओं में भेद किया जा सके। उदाहरणार्थ, टाटा, बाटा, एडीदास, नाइके, एयरटेल, लक्स, पॉण्डस, रेमण्डस, कोकाकोला, पेप्सी, नेसकैफे, कोलगेट आदि ट्रेड मार्क ही हैं जिन्हें शब्दों, संकेतकों, रंगों के मिश्रण आदि से एक विशेष रूप में माल/सेवाओं के सम्बन्ध में उपयोग किया जाता है। ट्रेड मार्क से निकटतम रूप से सम्बन्धित निम्नांकित शब्दों का अर्थ समझना भी परमावश्यक हैं। ये शब्द निम्नानुसार हैं:

  1. मार्क (Mark)—मार्क में यन्त्र, ब्रॉण्ड, हैडिंग, लेबल, नाम, संकेत, शब्द, अंक, माल की आकृति, पैकेजिंग या रंगों का मिश्रण अथवा उपर्युक्त का कोई भी संयोजन या मिश्रण सम्मिलित है।

धारा 2(1) (m)]] 

सामूहिक मार्क (Collective Mark)—सामूहिक मार्क से तात्पर्य किसी ट्रेड मार्क से है जो किसी समूह/संघ (जिसमें साझेदारी सम्मिलित नहीं है) के सदस्यों के माल या सेवाओं का अन्य लोगों के माल या सेवाओं से विभेद करता है। इस प्रकार, सामूहिक ट्रेड मार्क का स्वामी कोई संघ व्यक्तियों का समूह होता है।

[धारा 2(1) (g)] 

  1. प्रमाणन ट्रेड मार्क (Certification Trade Mark)-प्रमाणन ट्रेड मार्क से तात्पर्य किसी ऐसे मार्क या चिन्ह से है जो यह प्रकट करता है कि जिस माल पर यह लगाया गया है उस माल के उद्गम, उसमें प्रयुक्त सामग्री, उसकी निर्माणी प्रक्रिया, गुणवत्ता आदि लक्षणों को सक्षम व्यक्ति द्वारा प्रमाणित किया जा रहा है।

[धारा 2(1) (e)] 

भारत में ‘एगमार्क’ (Agmark) खाद्य पदार्थों पर लगाया जाने वाला प्रमाणन ट्रेड मार्क ही है।

ट्रेड मार्क्स का रजिस्ट्रार (धारा 3)

(The Registrar of Trade Marks) 

केन्द्रीय सरकार राजपत्र में अधिसूचना जारी कर किसी व्यक्ति को ‘पेटेण्ट्स’ डिजाइन्स तथा ट्रेड मार्क्स का महानियन्त्रक (Controller General of Patents, Designs and Trade Marks) नियुक्त कर सकती है और वही व्यक्ति इस अधिनियम के उद्देश्यों के लिए ‘ट्रेड मार्क्स का पंजीयक/रजिस्ट्रार’ (Registrar of Trade Marks) होगा। ट्रेड मार्क रजिस्ट्रार के कर्त्तव्य हैं- (1) माल एवं सेवाओं का वर्गीकरण करना, (2) माल के वर्ग का निर्धारण करना, (3) वर्गीकरण की अनुक्रमणिका को प्रकाशित करना, (4) अनुक्रमणिका के उद्देश्य से माल या सेवाओं का वर्गीकरण करना।

ट्रेडमार्क का पंजीयन

(Registration of Trade Mark) 

ट्रेड मार्क के पंजीयन हेतु ट्रेड मार्क का स्वामी आवेदन कर सकता है। यदि कोई व्यक्ति ट्रेड मार्क एक से अधिक माल या सेवा के लिए पंजीकृत करवाता है तो प्रत्येक माल या सेवा के पंजीयन हेतु पृथक्-पृथक् आवेदन शुल्क जमा कराना होगा। ट्रेड मार्क के पंजीयन हेतु प्राप्त आवेदन-पत्र को स्वीकार कर लेने के पश्चात् रजिस्ट्रार (पंजीयन से पूर्व) विज्ञापन करवायेगा। किन्तु, जब रजिस्ट्रार को यह लगे कि ऐसे आवेदन-पत्र के अधीन ट्रेड मार्क के पंजीयन को किसी सापेक्ष या निरपेक्ष आधार पर अस्वीकृत किया जा सकता है तो उस आवेदन की स्वीकृति से पहले भी विज्ञापन किया जा सकता है। सामान्यतः ट्रेड मार्क का पंजीयन आवेदन-पत्र प्रस्तुत करने की तिथि से 18 माह के भीतर कर दिया जाता है। ट्रेड मार्क के पंजीयन की अवधि 10 वर्ष होती है जिसका समय समय पर नवीकरण करवाया जा सकता है। ट्रेड मार्क का पंजीकृत स्वामी उसके नवीकरण के लिये आवेदन कर सकता है और रजिस्ट्रार उसका आगामी 10 वर्षों के लिए नवीकरण कर सकता है। यह अवधि उस तिथि से गिनी जायेगी जिस तिथि को मूल पंजीयन या पूर्व नवीकृत पंजीयन समाप्त होगा। किसी भी ट्रेड मार्क के पंजीयन को हटाया जा सकता है यदि ट्रेड मार्क के अन्तिम पंजीयन की अवधि समाप्त होने के छ: माह के भीतर विधिवत् आवेदन नहीं किया जाता हैं।

सुप्रसिद्ध या सुपरिचित ट्रेडमार्क का निर्धारण 

सुप्रसिद्ध ट्रेडमार्क से आशय किसी ऐसे ट्रेडमार्क से है जो जनता के ऐसे पर्याप्त बड़े समूह या वर्ग में जाना-पहचाना है जो ऐसे मार्क वाले माल का उपयोग करता है अथवा सेवाओं को प्राप्त करता है और अन्य माल या सेवाओं के सम्बन्ध में उपयोग करने पर इस मार्क का व्यापार की प्रक्रिया में अथवा सेवा प्रदान करते समय उस माल या सेवा तथा प्रथम वर्जित माल या सेवा के सम्बन्ध में मार्क का उपयोग करने वाले व्यक्ति के बीच सम्बन्ध होने का संकेत मिल सकता है।

[धारा 2(1)zg] 

कोई ट्रेडमार्क सुप्रसिद्ध/सुविदित है अथवा नहीं, इस बात पर विचार करते समय रजिस्ट्रार निम्नांकित घटकों के अतिरिक्त उन सभी घटकों पर भी ध्यान देगा जिन्हें वह सुसंगत समझेगा:

  1. सम्बन्धित जनता के समूह/वर्ग में उस ट्रेड मार्क की जानकारी या मान्यता तथा उस ट्रेडमार्क के प्रोत्साहन के परिणामस्वरूप भारत में प्राप्त ज्ञान/जानकारी
  2. उस ट्रेडमार्क के उपयोग की अवधि, विस्तार तथा भौगोलिक क्षेत्र।
  3. उस ट्रेडमार्क के संवर्द्धन की अवधि, विस्तार तथा भौगोलिक क्षेत्र जिसमें इस ट्रेडमार्क के उपयोग वाले माल या सेवाओं का विज्ञापन या प्रचार अथवा मेलों तथा प्रदर्शनियों में प्रदर्शन/प्रस्तुतीकरण भी सम्मिलित है।
  4. इस अधिनियम के अधीन उस ट्रेडमार्क के पंजीयन अथवा पंजीयन हेतु आवेदन की अवधि तथा भौगोलिक क्षेत्र जिनसे उस ट्रेड मार्क के उपयोग या मान्यता की सीमा ज्ञात होती हो।
  5. उस ट्रेडमार्क के अधीन अधिकारों के सफल प्रवर्तन (Enforcement) का कीर्तिमान (Record), विशेषकर उस कीर्तिमान के अधीन किसी न्यायालय या रजिस्ट्रार द्वारा उस ट्रेडमार्क को मान्यता प्रदान करने की सीमा।

[धारा 11(6)] 

ट्रेडमार्क का हस्तांकन तथा अन्तरण 

(Assignment and Transmission of Trade Mark) 

किसी भी पंजीकृत ट्रेडमार्क का हस्तांकन एवं अन्तरण उसके पंजीकृत स्वामी के आवेदन पर किया जा सकता है। ट्रेडमार्क का अन्तरण व्यवसाय की ख्याति के साथ अथवा बिना ख्याति के किया जा सकता है। अपंजीकृत ट्रेडमार्क का भी व्यवसाय की ख्याति के साथ या बिना ख्याति के हस्तांकन एवं अन्तरण किया जा सकता है। पंजीकृत उपयोगकर्ता द्वारा ट्रेडमार्क का अनुमति से उपयोग करना पंजीकृत स्वामी द्वारा ट्रेडमार्क का उपयोग किया हुआ ही माना जायेगा।

ट्रेडमार्क का उल्लंघन

(Infringement of Trade Mark) 

ट्रेडमार्क के उल्लंघन से आशय ट्रेडमार्क का किसी ऐसे व्यक्ति द्वारा उपयोग करना है जो उसके उपयोग का वैधानिक अधिकार नहीं रखता है। ट्रेडमार्क का उल्लंघन माना जानाः निम्नांकित दशाओं में किसी भी पंजीकृत ट्रेड मार्क का उल्लंघन हुआ माना जायेगा:

  1. यदि वह उस पंजीकृत ट्रेडमार्क का उपयोग किसी सामग्री पर करता है जिसका उपयोग माल की लेबलिंग अथवा पैकेजिंग के लिए किया जाता है।
  2. यदि वह उस पंजीकृत ट्रेडमार्क का उपयोग किसी ऐसी सामग्री पर करता है जिसका उपयोग किसी व्यावसायिक पत्र/प्रपत्र हेतु किया जाता है।
  3. यदि वह पंजीकृत ट्रेडमार्क का उपयोग किसी ऐसी सामग्री पर करता है जिसका उपयोग किसी माल या सेवाओं के विज्ञापन हेतु किया जाता है। __

इसके अतिरिक्त, किसी पंजीकृत ट्रेडमार्क का उल्लंघन किसी व्यक्ति द्वारा तब भी किया हुआ माना जाता है जब वह व्यक्ति किसी मार्क/चिन्ह के उपयोग के समय यह जानता है अथवा उसको यह ज्ञात होने का पर्याप्त कारण है कि उस मार्क/चिन्ह के उपयोग का अधिकार उसके स्वामी या लाइसेन्स प्रदाता (licensee) द्वारा विधिवत् रूप से प्रदान नहीं किया गया है।

[धारा 29 (7)] 

उल्लंघन के विरुद्ध पंजीकृत उपयोगकर्ता के अधिकार

कोई भी पंजीकत उपयोगकर्ता ट्रेडमार्क के उल्लंघन की दशा में स्वयं अपने नाम से उल्लंघन के विरुद्ध कार्यवाही कर सकता है मानो कि वह स्वयं ही उस ट्रेडमार्क का पंजीकृत स्वामी हो। ऐसी कार्यवाही में वह पंजीकत स्वामी को प्रतिवादी (Defendant) बना सकता है। ऐसी दशा में, पंजीकृत स्वामी तथा पंजीक़त उपयोगकर्ता के अधिकार एवं दायित्व एक समान माने जायेंगे। जब किसी पंजीकृत स्वामी को कार्यवाही में प्रतिवादी बनाया जाता है तब वह वाद लागतो (Costs) के भुगतान के लिए तब तक उत्तरदायी नहीं होगा जब तक वह कार्यवाही के दौरान उपस्थित होकर कार्यवाही में भाग नहीं लेता है।

[धारा 52]

अपराध एवं दण्ड

(Offence and Penalties) 

कभी-कभी कोई व्यक्ति किसी ट्रेडमार्क के स्वामी की सहमति के बिना उसी के समान या धोखेबाजी से समान प्रकार का ट्रेडमार्क बनाता है अथवा किसी वैध ट्रेडमार्क का छल-कपट या जालसाजी से किसी माल या सेवा के सम्बन्ध में कपटपूर्ण उद्देश्य से उपयोग करता है। ऐसे व्यक्ति को कम से कम 6 माह के कारावास की सजा दी जायेगी जो 3 वर्ष तक बढ़ायी भी जा सकेगी तथा उस पर कम से कम 50,000 रू. तक जुर्माना किया जायेगा जिसे 2 लाख रू. तक बढ़ाया भी जा सकेगा। किन्तु न्यायालय पर्याप्त एवं विशिष्ट कारणों के उल्लेख के बाद 6 माह से कम के कारावास तथा रू. 50,000 से कम के जुर्माने की सजा भी दे सकता है। कभी-कभी कोई व्यक्ति दूसरी बार या बाद में आगे भी ऐसे ही अपराध कर लेता है ऐसी दशा में उस अपराधी को उस दूसरे या पश्चात्वर्ती अपराध के लिए कम से कम एक वर्ष तक का कारावास जिसे तीन वर्ष तक बढ़ाया भी जा सकता है तथा कम से कम एक लाख रू. जुर्माना जिसे दो लाख रू. तक बढ़ाया भी जा सकता है, से दण्डित किया जा सकता है।

बौद्धिक सम्पदा अपील बोर्ड

(Intellectual Property Appellate Board) 

केन्द्रीय सरकार राजपत्र में अधिसूचना जारी कर एक अपील बोर्ड की स्थापना कर सकती है, जिसे बौद्धिक सम्पदा अपील बोर्ड के नाम से जाना जायेगा।

[धारा 83] 

कोई भी व्यक्ति जो रजिस्ट्रार के निर्णयों, आदेशों से पीड़ित है, वह अपील बोर्ड के समक्ष अपील कर सकता है। अपील सामान्यत: उस निर्णय/आदेश के सम्प्रेषित करने की तिथि से तीन माह के भीतर की जा सकती है। __ अपील बोर्ड अपनी निर्णयन कार्यवाही/प्रक्रिया में न्याय के नैसर्गिक सिद्धान्तों तथा इस अधिनियम के प्रावधानों तथा उसके अधीन बनाये गये नियमों को ध्यान में रखता है न कि नागरिक प्रक्रिया संहिता के प्रावधानों को। दीवानी न्यायालय की शक्तियाँ-इस अधिनियम के अधीन अपने कार्यों के निष्पादन के लिए अपील बोर्ड दण्ड प्रक्रिया संहिता में बताये गये दीवानी न्यायालय की शक्तियों का उपयोग निम्नांकित मामलों के विचारण के समय कर सकेगा: (i) साक्ष्य प्राप्त करने में।  (ii) गवाहों के परीक्षण का आदेश देने में।  (iii) किसी सार्वजनिक अभिलेख को माँगने में।  (iv) किसी अन्य मामले जो निर्धारित किया गया हो। न्यायिक कार्यवाही माना जाना-अपील बोर्ड की कार्यवाही को भारतीय दण्ड संहिता की धारा 193 से 228 के अर्थों में तथा धारा 196 के उद्देश्यों के लिए न्यायिक कार्यवाही माना जायेगा। दीवानी न्यायालय माना जाना-अपील बोर्ड को दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 195 तथा अध्याय XxVI के अधीन दीवानी न्यायालय माना जायेगा।

[धारा 92]


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