B.Com 3rd Year The Designs Act – Economic Laws Hindi Notes

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डिजाइन्स अधिनियम, 2000 को राष्ट्रपति की सहमति 25 मई, 2000 को प्राप्त हुई थी। इस अधिनियम को 11 मई, 2001 से लागू किया गया था। यह अधिनियम जम्मू एवं कश्मीर सहित सम्पूर्ण भारत पर लागू होता है।

अधिनियम में परिभाषित कछ शब्द _

  1. वस्तु (Article) वस्तु से तात्पर्य निर्माण की गई किसी भी वस्तु या पदार्थ से है जो कृत्रिम या अंशत: कृत्रिम तथा अंशत: प्राकृतिक है और इसके अन्तर्गत वस्तु का कोई ऐसा भाग भी सम्मिलित है जो पृथक रुप से बनाये एवं विक्रय किये जाने योग्य है।

धारा 2(a)] 

2.डिजाइन (Design)–डिजाइन से तात्पर्य केवल किसी वस्तु पर आकृति के लक्षणों, संरूपण (Configuration), प्रतिरूप (Pattern), अलंकरण/सजावट (Ornamentation) या रेखाओं या रंगों के संयोजन से है जो द्वि-आयामी (Two-dimensional) या त्रि-आयामी अथवा दोनों ही प्रकार की हो सकती है, जो किसी औद्योगिक प्रक्रिया या अन्य साधन से बनायी गयी हो सकती है, चाहे वह मानवीय, यान्त्रिक या रासायनिक तरीके से पृथक् रूप से या संयुक्त रूप से बनायी गयी हो तथा जो तैयार वस्तु में लगायी जाती है तथा जिसका अंकन या परख केवल आँख से होता है।

[धारा 2(d)] 

  1. मूल (Original)–डिजाइन के सन्दर्भ में, मूल से तात्पर्य स्वयं रचनाकार/निर्माता द्वारा उत्पन्न की हुई डिजाइन से है जिसमें ऐसे मामले भी सम्मिलित होंगे जो यद्यपि पुराने होंगे किन्तु उनके उपयोग नये होंगे।

[धारा 2 (g)] 

नियन्त्रक एवं अन्य अधिकारी

(Controller and Other Officers) 

1.ट्रेड एण्ड मर्केन्डाइज अधिनियम, 1958 के अधीन नियुक्त पेटेण्ट्स, डिजाइन्स तथा ट्रेड मार्क्स का महा-नियन्त्रक ही इस अधिनियम के अधीन डिजाइन्स नियन्त्रक होगा।

  1. केन्द्रीय सरकार जितने चाहे उतने ही परीक्षक (Examiners) तथा किसी भी पद वाले उतने ही अन्य अधिकारी नियुक्त कर सकती है। __
  2. इस अधिनियम में नियुक्त अधिकारी डिजाइन्स नियन्त्रक के निरीक्षण एवं निर्देशन में कार्य करेंगे तथा इस अधिनियम के अधीन अपने उन कार्यों का निर्वहन करेंगे जो समय-समय पर लिखित आदेश द्वारा निष्पादित करने को कहे जायेंगे। 

डिजाइन्स के पंजीयन पर निषेध (Prohibitions):

किसी डिजाइन का निम्नांकित दशाओं में पंजीयन नहीं किया जा सकेगा: 

  1. यदि वह नई या मौलिक नहीं है।
  2. यदि भारत में या किसी अन्य देश में मूर्त रूप में या उपयोग करके अथवा किसी अन्य रूप में पंजीयन के लिए पंजीयन के आवेदन की प्राथमिकता तिथि (Priority date of Applicatioin for Registration) से पूर्व ही प्रकट या प्रदर्शित कर दिया गया हो।
  3. यदि वह किसी ज्ञात डिजाइन या ज्ञात डिजाइनों के संयोजन से महत्वपूर्ण रूप से भिन्न या अन्तर करने योग्य नहीं है। 
  4. यदि इसमें कोई लज्जाजनक (Scandalous) या अश्लीलता का तत्व हो।

[धारा 4] 

डिजाइनों के पंजीयन की प्रक्रिया

(Procedure for Registration of Designs) 

डिजाइनों के पंजीयन की प्रक्रिया एवं उससे सम्बन्धित प्रावधान निम्नानुसार हैं:

  1. आवेदन-कोई भी व्यक्ति जो अपनी डिजाइन के पंजीयन का इच्छुक होगा उसे इस हेत यन्त्रक के पास एक आवेदन करना होगा। यह आवेदन पेटेण्ट कार्यालय में निर्धारित रीति से निर्धारित शुल्क के साथ किया जायेगा।

[धारा 5(2)] 

  1. आवेदन-पत्र को परीक्षक के पास भेजना-नियन्त्रक इस आवेदन-पत्र के परीक्षण हेत निराक्षक के पास भेजेगा। वह इस बात का परीक्षण करेगा कि आवेदन में वर्णित वह डिजाइन इस

अधिनियम के प्रावधानों एवं इसके अधीन बनाये गये नियमों के अधीन पंजीयन योग्य है अथवा र परीक्षक परीक्षण के बाद अपनी रिपोर्ट देगा जिस पर नियन्त्रक डिजाइन का पंजीयन करने से पूर्व विचार करेगा।

[धारा 5 (1)] 

  1. पंजीयन-परीक्षक की रिपोर्ट पर विचार करने के बाद नियन्त्रक उस आवेदन के अधीन प्राप्त डिजाइन का पंजीयन कर सकता है। रजिस्ट्रार पंजीयन से पूर्व निम्नांकित बातों पर विचार करेगा:

(i) वह डिजाइन नई या मौलिक है। 

(ii) वह डिजाइन पहले से ही किसी भी देश में प्रकाशित नहीं की गयी है। 

(iii) वह डिजाइन सार्वजनिक व्यवस्था एवं नैतिकता के प्रतिकूल नहीं है।

यह उल्लेखनीय है कि किसी भी डिजाइन को एक से अधिक वर्गों में पंजीकृत नहीं किया जा सकता है। इस बात पर सन्देह हो कि इस डिजाइन को किस वर्ग में पंजीकृत किया जाये तो नियन्त्रक स्वयं इस प्रश्न का निर्धारण कर सकेगा।

[धारा 5(3)] 

  1. पंजीयन की तिथि-जब किसी डिजाइन का पंजीयन हो जाता है तो यह माना जायेगा कि उस डिजाइन का पंजीयन उस तिथि को हो जाता है जिस तिथि को पंजीयन हेतु आवेदन किया गया था।

[धारा 5(6)] 

  1. पंजीयन प्रमाण-पत्र-डिजाइन के पंजीयन के उपरान्त नियन्त्रक उस डिजाइन के स्वामी को डिजाइन के पंजीयन का प्रमाण-पत्र प्रदान करेगा।

डिजाइन के पंजीयन प्रमाण-पत्र के खोने की दशा में अथवा ऐसी अन्य किसी दशा में नियन्त्रक जब उचित समझे तब उस प्रमाण-पत्र की एक या अधिक प्रतियाँ भी जारी कर सकेगा। 

[धारा 9]

डिजाइनों का रजिस्टर

(Register of Designs) 

पेटेण्ट ऑफिस में एक पुस्तिका रखी जायेगी जिसे ‘डिजाइनों का रजिस्टर’ कहा जायेगा। इसमें निम्नांकित बातों का उल्लेख होगाः

(i) पंजीकृत डिजाइनों के स्वामियों के नाम एवं पते। 

(ii) पंजीकृत डिजाइनों के हस्तांकन। 

(iii) पंजीकृत डिजाइनों के पारेषण (Transmission) 

(iv) अन्य निर्धारित की गई बातें।

डिजाइनों का रजिस्टर पूर्णतः अथवा अंशिक रूप से कम्प्यूटर फ्लॉपी या सीडी पर रखा जा सकता है, किन्तु ऐसा करने से पूर्व निर्धारित सुरक्षा उपाय करने होंगे। इस प्रकार रखे गये रजिस्टर को भी इस अधिनियम के अधीन रखे गये डिजाइनों के रजिस्टर के समान ही मान्यता होगी।

डिजाइनों का रजिस्टर प्रथम दृष्टया (Prima Facie) उन सभी विवरणों/मामलों का साक्ष्य होगा जिनकी इस अधिनियम के अधीन इसमें प्रविष्टि की जायेंगी।

[धारा 10] 

पंजीकृत डिजाइनों में कॉपीराइट

(Copyright In Registered Designs) 

पंजीयन पर कॉपीराइट-जब किसी डिजाइन का पंजीयन होगा तब उस डिजाइन के पंजीकृत स्वामी का उस डिजाइन में कॉपीराइट होगा। उसका कॉपीराइट पंजीयन की तिथि से 10 वर्षों तक रहेगा।

कभी-कभी इन 10 वर्षों की अवधि के समाप्त होने से पहले ही कॉपीराइट की अवधि को बढ़ाने देत नियन्त्रक के समक्ष आवेदन किया जाता है। ऐसी स्थिति में, नियन्त्रक निर्धारित रीति से आवेदन प्राप्त होने तथा निर्धारित फीस की प्राप्ति के बाद वह उसके कॉपीराइट की दूसरी अवधि को पाँच वर्ष बढ़ा सकता है। यह अवधि प्रथम 10 वर्षों की अवधि समाप्त होने के बाद से गिनी जायेगी 

[धारा 11]

पंजीकृत डिजाइनों की चोरी

(Piracy of Registered Designs) 

किसी भी डिजाइन में कॉपीराइट की विद्यमान देय अवधि में किसी भी व्यक्ति द्वारा निम्नांकित में से किसी भी क्रिया में लिप्त होना विधि सम्मत नहीं होगा:

1.किसी डिजाइन के पंजीकृत स्वामी की अनुमति के बिना, विक्रय हेतु किसी भी वस्तु पर वह डिजाइन लगाना अथवा लगवाना अथवा उस डिजाइन के लगाने में सहयोग देने के लिए कोई कार्य करना।

2.पंजीकृत स्वामी की अनुमति के बिना, विक्रय हेतु किसी ऐसी वस्तु का आयात करना जो उस वर्ग की है जिसके लिए वह डिजाइन पंजीकृत करवायी गयी है तथा उस पर वह डिजाइन लगाना अथवा

उसकी कपट पूर्ण तरीके से नकल का उपयोग करना। 

पंजीकृत डिजाइन की चोरी के लिए क्षतिपर्ति

यदि कोई व्यक्ति उपर्युक्त प्रावधानों का उल्लंघन करके किसी पंजीकृत डिजाइन की चोरी करता तो वह व्यक्ति प्रत्येक उल्लंघन/चोरी के लिए निम्नांकित राशि क्षतिपूर्ति के रूप में चुकाने के लिए उत्तरदायी होगा:

(i) वह पंजीकृत स्वामी को अधिकतम 25,000 रू. की राशि के लिए उत्तरदायी होगा जो अनुबन्ध के अधीन ऋण के समान वसूल की जा सकेगी।

(ii) यदि पंजीकृत स्वामी ऐसे उल्लंघन की क्षतिपूर्ति की वसूली के लिए वाद प्रस्तुत करने तथा ऐसे उल्लंघन की पुनरावृत्ति को रोकने के लिए निषेधाज्ञा के विकल्प का चयन करता है तो वह क्षतिपूर्ति की वह राशि चुकाने के लिए बाध्य होगा जो न्यायालय द्वारा आदेश की जायेगी तथा निषेधाज्ञा से उल्लंघन की पुनरावृत्ति करने से प्रतिबन्धित कर सकेगा।

किन्तु, किसी भी स्थिति में किसी एक डिजाइन के सम्बन्ध में 50,000 रू. से अधिक की क्षतिपूर्ति वसल नहीं की जा सकेगी। इस हेतु कोई भी वाद या कार्यवाही जिला न्यायालय से नीचे के न्यायालय में प्रस्तुत नहीं की जा सकेगी।

[धारा 22(2)] 

नियन्त्रक की शक्तियाँ तथा कर्त्तव्य

(Powers and Duties of Controller) 

डिजाइन नियन्त्रक की शक्तियाँ तथा कर्त्तव्य निम्नानुसार हैं

  1. सिविल न्यायालय की शक्तियाँ-नियन्त्रक को निम्नांकित उद्देश्यों के लिये सिविल न्यायालय की शक्तियाँ प्राप्त होंगी:

(i) साक्ष्य स्वीकार करने 

(ii) शपथ दिलाने 

(ii) गवाहों को उपस्थिति के लिए बाध्य करने। 

(iv) प्रलेखों को खोजने एवं प्रस्तुत करने के लिए बाध्य करने। 

(v) गवाहों के परीक्षण हेतु आदेश जारी करने। 

(vi) लागतों/खर्चों के लिए आदेश देने।

[धारा 32] 

  1. विवेकाधीन शक्तियाँ-इस अधिनियम के द्वारा अथवा इसके अधीन नियन्त्रक को विवेकाधीन शक्तियाँ प्रदान की जा सकती हैं। वह ऐसी शक्तियों का उपयोग डिजाइनों के पंजीयन हेतु आवेदकों के विरुद्ध उपयोग तब तक नहीं करेगा जब तक कि वह उन्हें सुनवायी का अवसर नहीं दे देता है। 

[धारा 33]

  1. केन्द्रीय सरकार से निर्देश प्राप्त करने की शक्ति-यदि नियन्त्रक को इस अधिनियम के किसी भी प्रावधान के सम्बन्ध में कोई सन्देह या कठिनाई हो तो वह केन्द्रीय सरकार से निर्देश प्राप्त करने हेतु आवेदन कर सकता है।

[धारा 34] 

  1. पंजीयन से इन्कार करने की शक्ति-नियन्त्रक किसी भी ऐसी डिजाइन के पंजीयन से इन्कार करने की शक्ति रखता है जो उसकी राय में सार्वजनिक व्यवस्था अथवा नैतिकता (Public order or morality) के प्रतिकूल है।

[धारा 35] 

  1. लिपिकीय त्रुटियाँ ठीक करने की शक्ति-नियन्त्रक किसी आवेदन के शुल्क सहित प्राप्त होने का दशा में निम्नांकित में किसी भी लिपिकीय त्रुटि में सुधार कर सकता है:

(i) किसी डिजाइन के प्रस्तुतीकरण में रही त्रुटि को। 

(ii) किसी डिजाइन के स्वामी के नाम एवं पते में। 

(iii) डिजाइन रजिस्टर में प्रविष्ट की गई किसी भी विषय सामग्री में।

[धारा 29] 

उच्च न्यायालय को अपील

(Appeals in the High court) 

नियन्त्रक के आदेश के विरुद्ध उच्च न्यायालय में अपील की जा सकती है। नियन्त्रक के आदेश ताथ के तीन माह के भीतर उच्च न्यायालय में अपील की जा सकती है।

तीन माह की इस अवधि की गणना करते समय उस समयावधि को नहीं गिना जायेगा जो उस आदेश भातलिपि प्रदान करने में लगा है, जिसके विरुद्ध अपील की जानी है। 

उच्च न्यायालय उचित समझे तो वह ऐसी अपील के सम्बन्ध में निर्णय लेने हेतु किसी विशेषज्ञ की सेवाएँ प्राप्त कर सकता है। अपील पर उच्च न्यायालय का निर्णय अन्तिम निर्णय होगा।

[धारा 36]


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